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मीराँबाई का ऐतिहासिक एवं प्रामाणिक जीवनवृत्त

Author : Prof. (Dr.) Kalyan Singh Shekhawat
Anand Prakashan Jodhpur
( customer reviews)
250 250
Category:
Book Type: Hard Copy
Size: Printed Pages 80
Downloads: 3
Language

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यह निश्चित है कि वि.सं. 1591 से पूर्व ही मीराँ ने चित्तौड़ छोड़ दिया था अन्यथा वि.सं. 1591 के चित्तौड़ के दूसरे साके के समय यदि वे चित्तौड़ में होती तो जीवित कदापि न बचती। इस दूसरे साके में किले में रहने वाली स्त्रियों में से एक भी नहीं बची, यह इतिहास के साथ-साथ लोक धारणा है। मेड़ता के शासक और मीराँ के बड़े पिता (बाबोसा) राव वीरमदे दूदावत को जब महाराणा विक्रमादित्य (सांगावत) द्वारा कष्ट देने की सूचनाएं मिलीं तो वे स्वयं चित्तौड़ गये ओर मीराँबाई को मेड़ता ले आये (वि.सं.1589 में ही) मीराँ मेड़ता एक-दो वर्ष ही रह पाई थी कि जोधपुर के शासक राव मालदेव गांगावत ने वि.सं.1591 में मेड़ता पर आक्रमण कर राव वीरमदेव (दूदावत) को सपरिवार मेड़ता छोड़ने पर विवश कर दिया। मेड़ता से राव राव वीरमदेव (दूदावत) अजमेर गया और वहां बहादुशाह से अजमेर ले लिया। - इसी पुस्तक से।

राजस्थानी भाषा के उद्भट् विद्वान प्रोफेसर (डॉ.) कल्याणसिंह शेखावत का जन्म 7 जुलाई 1942 को हुआ। आप जयनारायण विश्वविद्यालय जोधपुर के कला, शिक्षा, एवं समाज विज्ञान संकाय के पूर्व अधिष्ठाता हैं तथा राजस्थानी विभाग के संस्थापक प्रोफेसर हैं। अपकी अब तक दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। मीराँबाई पर आपने जो महत्वपूर्ण शोध कार्य किया है, उसके परिणाम स्वरूप मीराँबाई के बहुत से ज्ञात एवं अज्ञात पदों को उनके शुद्ध स्वरूप में लाया जाना सम्भव हो सका है।
आपके लिखे हिन्दी भाषा के ग्रंथों में मीराँबाई का जीवनवृत्त एवं काव्य (1978), मीराँ वृहत्पदावली (द्वितीय भाग-1975), मीराँ ग्रंथावली (भाग-1 एवं 2 - 2001), मीराँ वाणी (1984), राजस्थानी भाषा एवं साहित्य (2003), वीरवर राव जयमल (मोनोग्राफ- 2003), मीराँबाई का ऐतिहासिक एवं प्रामाणिक जीवनवृत्त (2013) सम्मिलित हैं।
आपके लिखे राजस्थानी भाषा के ग्रंथों में राजस्थानी निबंध (साहित्यिक निबंध संग्रह-1981), मणिमाळ (मौलिक निबंध संग्रह-1995), राजस्थानी साहित्य- छंद एवं अलंकार (पाठ्य पुस्तक), नारायणसिंह भाटी (मोनोग्राफ-2005), विरासत (चिंतन प्रधान मौलिक निबंध-2005), गढ री सीख (सांस्कृतिक आलेख-2006), रस कळस (निबंध संग्रह-2006) सम्मिलित हैं।
आपके द्वारा सम्पादित ग्रंथों में राजस्थानी गद्य संकलन (1977), राजस्थानी काव्य संकलन (1977), रामकथा (राजस्थानी भाषा की प्राचीन गद्य रचना-1982), तेजा लोक काव्य (1982), कूंपळ (1982), राजस्थानी की प्रतिनिधि कहानियां (1984), गुरांसा री ख्यात (ऐतिहासिक ग्रंथ-2000), गिरधर अनुरागी मीराँ-2010) सम्मिलित हैं।
आपको राजस्थान रत्नाकर दिल्ली द्वारा सम्मानित किया गया। मीराँ स्मृति संस्थान चित्तौड़गढ़ द्वारा सार्वनिक अभिनंदन कर रजतपत्र दिया गया। आप भारतीय साहित्य संगम नई दिल्ली द्वारा साहित्य वागीश की मानद उपाधि से सम्मानित किये गये। मीराँ कला केन्द्र उदयपुर द्वारा आयोजित मीराँ समारोह पर आपको सम्मानित किया गया। राजस्थान सरकार की ओर से जिला प्रशासन जोधपुर द्वारा सम्मानित किया गया। वीर दुर्गादास राठौड़ स्मृति समिति जोधपुर द्वारा साहित्य सेवा के लिये सम्मानित किया गया। राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर द्वारा राजस्थानी भाषा के उन्नयन एवं संवर्धन हेतु सम्मानित किया गया। आप मीराँ सम्मान एवं पुरस्कार से पुरस्कृत हैं। महाराजा जोधपुर द्वारा हाथी सिरोपाव से सम्मानित किया गया तथा मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट जोधपुर द्वारा मारवाड़ रत्न सम्मान 2011 से सम्मानित किया गया। आपने वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय कोटा के दो प्रमाणपत्र पाठ्यक्रमों, बी. ए. तथा एम. ए. पाठ्यक्रमों के लिये 16 पुस्तकों का सम्पादन एवं संयोजन किया है।
सम्पर्क: शिवगंगा, 15, सुभाषचंद्र बोस कॉलोनी, रक्षा प्रयोगशाला मार्ग, रातानाडा, जोधपुर- 342001, मोबाइल फोन: 0 93147 10732




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