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मेरी जीवन गाथा (प्रथम भाग)

Author : श्री ओंकारसिंह
Anand Prakashan Jodhpur
( customer reviews)
250 250
Category:
Book Type: Hard Copy
Size: 272 paged
Downloads: 5
Language

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मेरी जीवन गाथा (प्रथम भाग): लेखक ओंकारसिंह: मेरी जीवन गाथा शीर्षक यह ग्रंथ भारत की एक रियासत जोधपुर के गौरवमय अतीत एवं उसके सांस्कृतिक वैभव का सुनहरा दस्तावेज है। इस पुस्तक के लेखक श्री ओंकारसिंहजी पूर्व आई.ए.एस. अधिकारी हैं, जिन्होंने एम.ए. तथा एल.एल.बी. तक की शिक्षा प्राप्त की है। इस तरह वे सुशिक्षित, प्रशासनिक क्षमता युक्त, ईमानदार एवं आदर्श क्षत्रिय के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनके इन्हीं चारित्रिक गुणों के कारण वे आज विशिष्ट हैं तथा भविष्य में विशिष्ट बने रहेंगे। यह कृति एक प्रतिभा सम्पन्न एवं परिश्रमी क्षत्रिय युवक के जीवन की संघर्ष गाथा है, जिसने कठिन परिश्रम, दृढ़ संकल्प एवं चारित्रिक गुणों तथा अपने वंदनीय अतीत से प्रेरणा तथा प्रभाव ग्रहण कर आदर्श जीवन व्यतीत किया है। उस काल खण्ड में राजाओं के प्रति सामान्य जन में आदर भाव था। शासन राजाओं के अधीन था किंतु जनतांत्रिक व्यवस्था देने लगी थी। समाज जाति, धर्म एवं अर्थ तंत्र के अधीन था। शासन एवं न्याय व्यवस्था पर भी राजा एवं जागीरदारों का प्रभाव था किंतु न्याय व्यवस्था सुदृढ़ थी। अधिकांश जन गांवों में निवास करते थे जहां विभिन्न जातियों, धर्मों तथा वर्गों के लोग मिलजुलकर शांति एवं बंधुत्व के बंधनों से बंधे थे। साम्प्रदायिक सद्भाव बना हुआ था। गरीबी तथा अशिक्षा अधिक थी। स्वरोजगार महिलाओं में भी लोकप्रिय था। यह पुस्तक अपने युग का दर्पण है, जिसमें एक ओर हमारा यथार्थ है तो दूसरी ओर सांस्कृतिक विरासत की झांकी है। यह कृति हमारी रियासतों, राज परिवार, राजा-महाराजाओं तथा रियासती समाज की मध्यमवर्गीय एवं साधारण जन के समाज, उसकी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक एवं धार्मिक-सांस्कृतिक स्थिति का अवलोकन कराती है। प्रथम विश्वयुद्ध के कारण रोजगार के अवसर मिलने लगे थे, विशेष कर सेना में। इन आलेखों में एक सुयोग्य क्षत्रिय युवा की जीवनी की विभिन्न घटनाओं के शब्द चित्र हैं जिसने परिश्रम, लगन और संघर्ष से अपनी जीवन यात्रा को उल्लेखनीय बनाया है। इस जीवन-गाथा से क्षत्रिय समाज कुछ प्रेरणा, शिक्षा तथा परिश्रम का संदेश प्राप्त कर सके तो लेखक का उद्देश्य सफल होगा। इस ग्रंथ में आजादी से पूर्व की रियासती शिक्षा, समाज व्यवस्व्था, शासन व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, राजनैतिक वातावरण आदि का यथार्थ विवरण लिपिबद्ध है। विद्यालय एवं महाविद्यालय स्तर की शिक्षा तत्कालीन रियासतों में दी जा रही थी किंतु विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा प्राप्त करने के लिऐ उत्तर प्रदेश में जाना पड़ता था। लेखक श्री ओंकारसिंह जोधपुर रियासत के महाराजा हनवंतसिंहजी के निजी उपसचिव रहे हैं। यह वह समय था जब अंग्रेज भारत छोड़कर ब्रिटेन जा रहे थे-भारत स्वतंत्र हो रहा था। -प्रो. (डॉ.) कल्याणसिंह शेखावत, सम्पादक

 श्री ओंकारसिंह का जन्म 21 जुलाई 1921 को पाली जिले के बाबरा गांव में हुआ। उनके पिता ठाकुर धूलसिंह अपने समय के सुविख्यात व्यक्ति थे। श्री ओंकारसिंह ने एम.ए. एल.एल.बी. तक शिक्षा प्राप्त की तथा 1946 में जोधपुर राज्य की सेवा में प्रवेश किया। यह वह समय था जब अंग्रेज भारत छोड़कर ब्रिटेन जा रहे थे-भारत स्वतंत्र हो रहा था। वे जोधपुर रियासत के महाराजा हनवंतसिंहजी के निजी उपसचिव रहे। राजस्थान बनने के बाद वे आईएएस बने। वे कई जिलों में जिला कलक्टर, कई विभागों में निदेशक, सचिव, आयुक्त आदि पदों पर रहे। वे सुशिक्षित, प्रशासनिक क्षमता युक्त, ईमानदार एवं आदर्श क्षत्रिय के रूप में प्रसिद्ध हैं। 




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