Blogs Home / Blogs / युग पुरुष भैंरोसिंह शेखावत / युग-पुरुष भैरोंसिंह शेखावत
  • युग-पुरुष भैरोंसिंह शेखावत

     24.05.2018
    युग-पुरुष भैरोंसिंह शेखावत

    धनतेरस को प्रकट हुई ज्योति

    श्री भैरोंसिंह शेखावत का जन्म 23 अक्टूबर 1923 को धनतेरस के दिन, राजपूताने की जयपुर रियासत के सीकर ठिकाणे के खाचरियावास गांव में एक सामान्य राजपूत कृषक परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम देवीसिंह शेखावत तथा माता का नाम बन्नेकंवर था। भैरोंसिंह अपने माता-पिता की प्रथम संतान थे। उनके बाद तीन छोटे भाई तथा चार बहिनों का जन्म हुआ। भैरोंसिंह का ननिहाल चूरू जिले के सहनाली बड़ी गांव में था।

    तीस किलोमीटर पैदल

    भैरोंसिंह के पिता देवीसिंह एक आदर्श अध्यापक थे। रूढ़िवाद के विरोधी और समाज में समता के पक्षधर देवीसिंह ने बुराइयों के समक्ष कभी सिर नहीं झुकाया। इसी आदत के कारण एक बार वे अपना गांव छोड़कर सवाईमाधोपुर जिले के बीछीदाना गांव में रहने लगे। वहीं पर उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई। भैरोंसिंह को सुंदर हस्तलेख और अनुशासन पिता से विरासत में मिले। बीछीदाना में पढ़ते हुए जब कुछ साल हो गये तो उन्हें जोबनेर के एंग्लोवैदिक स्कूल में पढ़ने भेजा गया। उस समय मोटरें नहीं थीं। कई बार वे जोबनेर से खाचरियावास तक की 30 किलोमीटर की दूरी वे पैदल ही पार करते थे। हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ई.1941 में उन्हें जयपुर के महाराजा कॉलेज के प्रथम वर्ष में भर्ती करवाया गया। कॉलेज की शिक्षा के दौरान उन्होंने नाटकों में भी भाग लिया।

    पीपल के पेड़ के नीचे बारात

    3 जुलाई 1941 को उनका विवाह जोधपुर रियासत के बुचकला गांव की सूरजकंवर से कर दिया गया। उनकी बारात जोबनेर से पीपाड़रोड तक रेलगाड़ी से पहुंची तथा वहां से बैलगाड़ियों में बैठकर बुचकला पहुंची। बुचकला में उनकी बारात अडूणिया बेरा के पीपल के नीचे दो दिन ठहरी। भैरोंसिंह के ससुराल में ससुर कल्याणसिंह राठौड़, सास सदाकंवर, पांच साले तथा एक साली थी। भैरोंसिंह की पत्नी सूरजकंवर अपने पीहर में सबसे छोटी थीं।

    नाडी का पानी पिया

    भैरोंसिंह अपने विवाह के पश्चात् पीपाड़ रोड से पैदल ही अपने ससुराल बुचकला पहुंचे थे। बीच मार्ग में जब उन्हें प्यास लगी तो उन्होंने एक नाडी में अपने हाथों से पानी पिया। इससे उन्हें नारू रोग हो गया। इस रोग का निशान जीवन भर उनके शरीर पर बना रहा। ई.2004 में भैरोंसिंह जब उपराष्ट्रपति थे, तब वे पुनः बुचकला गये और वहां आम सभा में उन्होंने स्वयं यह किस्सा सुनाया।

    सिर से पिता का साया उठा

    ई.1942 में देवीसिंह शेखावत का निधन हो गया। इसके बाद परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी मां बन्ने कंवर ने निभाई। उनकी माँ ने बहुत कठिन परिश्रम करके परिवार को चलाया। भैरोंसिंह स्वयं इस बात को कितनी ही बार दोहराते थे कि उनकी माता किस तरह चक्की चलाती थी। किंतु भैरोंसिंह की पढ़ाई आगे नहीं चल पाई। परिवार के निर्वहन के लिये भैरोंसिंह ने सीकर ठिकाणे के पुलिस विभाग में असिस्टेण्ट सब इंसपैक्टर की नौकरी कर ली किंतु पुलिस की नौकरी उन्हें रास नहीं आई। उनका मन राजनीति की ओर झुकने लगा।

    लगान वसूलने वालों ने बनाया उन्हें भैरोंसिंह

    एक बार उनके गांव में ड्डियों का दल सारे खेतों को चट कर गया। इसके उपरांत भी सरकारी हरकारे लगान लेने पहुंच गये। इस लगान के विरोध की भावना से एक नया भैरोंसिंह निकलकर सामने आया। उनकी मां कहती थी कि एक पण्डित ने उन्हें बताया था कि भैरोंसिंह गांव और परिवार का नाम रोशन करेगा। ई.1952 में विधायक बनने से लेकर अपने अंतिम समय तक उनके व्यवहार में कोई अंतर नहीं आया था।

    बिशनसिंह के कहने से मिला टिकट

    1952 के प्रथम आम चुनावों में जनसंघ को दाता रामगढ़ से कोई उपयुक्त प्रत्याशी नहीं मिल रहा था। तब बिशनसिंह शेखावत ने लालकृष्ण आडवानी को सुझाव दिया कि मेरे एक भाई भैरोंसिंह शेखावत पुलिस में हैं, आप उन्हें टिकट दे दें। इस पर उन्हें विधायक का टिकट दिया गया।

    सूरजकंवर से लिये दस रुपये

    चुनाव लड़ने के लिये सीकर जाना आवश्यक था और सीकर जाने के लिये जेब में रुपये होने आवश्यक थे किंतु मनमौजी भैरोंसिंह की जेब में कुछ भी नहीं था। उन्होंने अपनी पत्नी से दस रुपये मांगे। उदारमना पत्नी ने उनकी मांग पूरी की और भैरोंसिंह दस रुपये लेकर सीकर आ गये। इसके बाद उनका जनसंघ से जुड़ाव हुआ। उन्हें दीपक चुनाव चिह्न के साथ जनसंघ का टिकट मिला और वे 2,833 वोटों से जीत हासिल करके राजस्थान की प्रथम विधानसभा के सदस्य बन गये।

    जागीरदारी प्रथा उन्मूलन का समर्थन

    सितम्बर 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं. दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ की स्थापना कर चुके थे। जनसंघ की शाखाएं गांवों एवं पंचायतों तक स्थापित करने में जागीरदारों ने अच्छा योगदान दिया। उन्हें आशा थी कि जागीरदारी प्रथा जारी रखवाने में जनसंघ से सहायता मिलेगी। राज्य विधानसभा के पहले चुनाव में जागीदारों की सहायता से जनसंघ ने 50 सीटों पर प्रत्याशी मैदान में उतारे। उनमें से 30 की जमानतें जब्त हो गईं। भैरोंसिंह सहित जनसंघ के केवल आठ विधायक जीते जिनमें से अधिकतर जागीरदार ही थे। राजस्थान की प्रथम निर्वाचित सरकार ने जागीरदारी उन्मूलन का कार्य आरंभ किया तो जनसंघ के विधायक इसके विरोध में खड़े हो गये किंतु भैरोंसिंह शेखावत तथा जगतसिंह झाला ने जागीरदारी प्रथा के उन्मूलन का समर्थन किया। पार्टी के छः विधायकों ने जो कि स्वयं जागीरदार थे, भैरोंसिंह को जनसंघ से निकलवाने के प्रयास आरम्भ कर दिये। इस पर भैरोंसिंह शेखवात दिल्ली जाकर श्यामाप्रसाद मुखर्जी तथा दीनदयाल उपाध्याय से मिले। दोनों नेता भैरोंसिंह के तर्कों से सहमत हुए और जागीरदार विधायकों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की गई।

    नमस्ते सदा वत्सले

    भारत माता के प्रति उनकी निष्ठा, भक्ति और समर्पण अटूट था। जब 1952 में वे जनसंघ से विधायक बने तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर उनका झुकाव हुआ। वे प्रायः संघ के कार्यक्रमों में संघ का गणवेश धारण करके जाते थे। सदा वत्सला भारत माता के प्रति उनका यह नमन सदैव बना रहा।

    लगातार चार बार विधायक बने

    वर्ष 1952 में दांता रामगढ़ विधान सभा सीट जीतने के बाद भैरोंसिंह शेखावत वर्ष 1957 में श्रीमाधोपुर सीट से विधायक निर्वाचित हुए। 1962 और 1967 में वे जयुपर की किशनपोल सीट से विधायक चुने गये। इस प्रकार वे अपने राजनीतिक जीवन के आरंभ में ही चार बार लगातार विधायक बने।

    गांधीनगर सीट से हारे

    1972 के विधानसभा आम चुनावों में भैरोंसिंह शेखावत ने गांधीनगर सीट से चुनाव लड़ा। उनके सामने कांग्रेस के जनार्दन सिंह गहलोत खड़े हुए। चुनाव प्रचार के दौरा भैरोंसिंह शेखावत वोट मांगने के लिये जनार्दनसिंह के माता-पिता के घर भी गये और उनसे अपने लिये वोट मांगा। एक बार प्रचार के दौरान दोनों प्रत्याशी आमने-सामने हो गये। इस पर भैरोंसिंह शेखावत ने जनार्दनसिंह से सबके सामने कह दिया कि तुम जीत रहे हो। ऐसा ही हुआ। भैरोंसिंह यह चुनाव हार गये।

    बाड़मेर सीट से हारे

    गांधीनगर सीट से चुनाव हारने के बाद भैरोंसिंह शेखावत ने बाड़मेर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा किंतु इस चुनाव में भी उन्हें कांग्रेस के अमृत नाहटा से पराजय का सामना करना पड़ा।

    राज्यसभा में

    दो बार लगातार विधान सभा चुनावों में मिली पराजय किसी के लिये भी बड़ा झटका हो सकती थी किंतु वर्ष 1974 में मध्यप्रदेश जनसंघ ने भैरोंसिंह शेखावत को राज्यसभा में मनोनीत कर दिया और वे 1974 से 1977 तक राज्यसभा के सदस्य रहे।

    पौने दो साल जेल में

    ई.1975 में जब देश में आपात् काल लगा तो जून 1975 से मार्च 1977 तक भैरोंसिंह शेखावत मीसा के अंतर्गत जेल में बंद रहे।

    पहली बार मुख्यमंत्री

    आपात्काल समाप्त होने के बाद वर्ष 1977 में देश में जनता पार्टी का गठन हुआ। इस नई पार्टी में जनसंघ का भी विलय हो गया। भैरोंसिंह भी जनता पार्टी में सम्मिलित हो गये। उसी वर्ष राजस्थान में विधानसभा के लिये मध्यावधि चुनाव हुए जिनमें जनता पार्टी को 200 में से 150 स्थान प्राप्त हुए। उस समय बहुत से सदस्य डूंगरपुर के पूर्व महारावल लक्ष्मणसिंह को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे जो कि उच्च कोटि के वक्ता और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे किंतु जनता पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व भैरोंसिंह शेखावत को मुख्यमंत्री बनाना चाहता था। विधायक दल की बैठक में मुख्यमंत्री पद के लिये जनता पार्टी के मास्टर आदित्येन्द्र तथा भैरोंसिंह शेखावत के बीच मुकाबला हुआ जिसमें शेखावत की जीत हुई और उन्होंने राज्य की पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनायी। शेखावत उस समय मध्यप्रदेश से राज्यसभा के सदस्य थे। 22 जून 19977 को चौपन वर्ष की आयु में उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली इस कारण उन्हें राज्यसभा की सदस्यता छोड़ देनी पड़ी।

    पहला मंत्रिमण्डल

    27 जून 1977 को शेखावत सरकार में मास्टर आदित्येन्द्र, प्रो. केदार नाथ, ललित किशोर चतुर्वेदी, सम्पत राम तथा त्रिलोकचंद जैन को कैबीनेट मंत्री, कैलाश मेघवाल, विज्ञान मोदी, महबूब अली और विद्या पाठक को राज्य मंत्री बनाया गया।

    छबड़ा से चुने गये

    शेखावत ने राज्य सभा से त्यागपत्र देकर 18 अक्टूबर 1977 को कोटा जिले के छबड़ा विधानसभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़ा तथा विधानसभा की सदस्यता प्राप्त की।

    पहली सरकार का विस्तार

    7 फरवरी 1978 को शेखावत सरकार का विस्तार किया गया। सूर्यनारायण चौधरी, भंवरलाल शर्मा, जयनारायण पूनिया, दिग्विजय सिंह व पुरुषोत्तम मंत्री को कैबीनेट मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया। कैलाश मेघवाल को भी कैबीनेट मंत्री का दर्जा दिया गया। लाल चंद डूडी तथा नन्दलाल मीणा को राज्यमंत्री बनाया गया। जुलाई 1978 में केन्द्र में मोरारजी सरकार गिर गयी और चरणसिंह सरकार का जन्म हुआ। इस कारण राजस्थान में लालचंद डूडी तथा विज्ञान मोदी ने 8 जुलाई 1978 को भैरोंसिंह सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 5 नवम्बर 1978 को शेखावत मंत्रिमण्डल का तीसरा विस्तार किया गया। माणकचंद सुराणा, कल्याणसिंह कालवी, डॉ. हरिसिंह और बिरदमल सिंघवी को कैबीनेट मंत्री के रूप में तथा हरिसिंह यादव और भैरवलाल काला बादल को राज्य मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया। 18 मई 1979 को मास्टर आदित्येन्द्र, 21 जुलाई को प्रो. केदार नाथ और 2 अगस्त को डॉ. हरिसिंह ने शेखावत सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 20 दिसम्बर 1979 को शिवचरण सिंह गुर्जर को सरकार में कैबीनेट मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया।

    कर्मचारियों को वापस नौकरी में लिया

    आपात्काल में बहुत से कर्मचारियों को राजकीय सेवा से निकला दिया गया था। भैरोंसिंह शेखावत अभावों की मार को अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने आपात काल में निकाल गये समस्त कर्मचारियों को फिर से सेवा में रख लिया और जितने समय वे बंदी रहे, उस काल के समस्त वित्तीय लाभ भी उन्हें दे दिये। आपात् काल के बाद प्रमुख लोग तो जेलों से बाहर आ गये किंतु बहुत से सामान्य जन अब भी जेलों में बंद थे। भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने उन सबको भी जेल से बाहर निकाला।

    जस्टिस कानसिंह परिहार आयोग का गठन

    आपात् काल में कुछ सरकारी कर्मचारियों ने जनता के साथ ज्यादतियां कीं। उनका प्रतिकार करने के लिये भैरोंसिंह शेखावत सरकार ने राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जस्टिस कानसिंह की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन किया। इस आयोग के पास शिकायतों के ढेर लग गये। ये आवेदन आपातकाल में जबरन नसबंदी करने, जबरन सेवानिवृत्ति करने, अकारण बंदी बनाने तथा अतिक्रमण नाम देकर वैध निर्माणों को तोड़ने से सम्बन्धित थे। जस्टिस परिहार ने कड़ी मेहनत करके इन शिकायतों का वर्गीकरण किया तथा उनके सम्बन्ध में पांच सौ प्रतिवेदन तैयार किये। इनमें से कुछ प्रतिवेदनों पर ही सरकार कार्यवाही कर सकी। शेष पर कार्यवाही होने से पहले ही राज्य में पुनः राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

    बाण्या की नौकरी कर ले

    मुख्यमंत्री बनने के बाद भैरोंसिंह शेखावत को प्रायः सचिवालय में बैठकर देर रात तक काम करना पड़ता था। उनकी माँ को यह समझ में नहीं आया कि बेटे ने कौनसी नौकरी कर ली है। न तो समय पर घर आता है और न समय पर खाना खाता है। एक दिन मां से रहा नहीं गया और अपने मुख्यमंत्री पुत्र से बोली- बेटा इसी कुण सी नौकरी कर ली, जो खाबा को पतो न सोबा को। तू तो आ नौकरी छोड, कोई बाण्या की नौकरी कर ले।

    अपने विरोध के लिये दी गई पार्टी में पहुंचे

    एक बार जनार्दनसिंह गहलोत ने भैरोंसिंह शेखावत की सरकार के विरोध में कार्यवाही करने के लिये अपने घर पर कुछ नेताओं की पार्टी रखी। इसमें भैरोंसिंह शेखावत मंत्रिमण्डल के कुछ कैबीनेट मंत्री और विधायक भी सम्मिलित हुए। यह बात भैरोंसिंह शेखावत को ज्ञात हो गई। इस पर शेखावत ने उन्हें फोन करके उलाहना दिया कि मुझे भोज में क्यों नहीं बुलाया। मैं आ रहा हूँ। आधे घण्टे में ही शेखावत, जनार्दनसिंह के घर पहुंच गये। जनार्दनसिंह की सारी योजना पर पानी फिर गया।

    उन्होंने निर्धनता का दंश स्वयं झेला था

    भैरोंसिंह शेखावत ने स्वयं निर्धनता का दंश झेला था। निर्धन के उत्थान के प्रति उनके मन में सदैव ललक रहती थी। वे राजस्थान मंक आदर्श गांवों की स्थापना करना चाहते थे। जब वे उपराष्ट्रपति बने तो प्रायः अपने भाषणों में एक बात कहा करते थे कि गरीबों को लोकतंत्र के पांचवे स्तम्भ के रूप में स्थापित कर, देश के संसाधनों पर उनका सर्वोपरि अधिकार स्थापित किया जाना चाहिये।

    अंत्योदय योजना के जनक

    भैरोंसिंह शेखावत गरीबों के सम्मानपूर्ण जीवन के पक्षधर थे। इसके लिये उन्होंने अंत्योदय योजना बनाई और उसे सर्वप्रथम राजस्थान में ही लागू किया। इस योजना के आरंभिक प्रावधानों में प्रत्येक गांव से सबसे गरीब पांच परिवारों को चयन करना, उन्हें विभिन्न आर्थिक गतिविधियों यथा पशुपालन, कुटीर उद्योग, ऊँटगाड़ा आदि के लिये बैंकों से कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करवाना आदि सम्मिलित थे। बाद में यह योजना पूरे देश में लागू हुई और आगे चलकर एकीकृत ग्रामीण विकास योजना का मुख्य आधार बनी। इस योजना के सम्बन्ध में उनका कहना था- जैसे शरीर के एक अंग में विकृति आने से पूरे शरीर पर असर पड़ता है, इसी तरह समाज में कहीं भी विकृति आने से लोगों पर उसका प्रभाव पड़ता है। इस योजना का अंत्योदय योजना ही सफल प्रयोग है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस योजना की प्रशंसा की। आज भी यह योजना भारत सरकार द्वारा केन्द्र प्रवर्तित योजना के रूप में चला रही है।

    भारत के रॉक्फेलर

    अंत्योदय योजना इतनी प्रसिद्ध हुई कि विश्व बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष रॉबर्ट मैक्नमारा ने इस योजना की सराहना करते हुए भैरोंसिंह को भारत का रॉक्फेलर कहा।

    विश्व बैंक भी सहायता के लिये आगे आया

    राजस्थान के मुख्यमंत्री रहते भैरोंसिंह शेखावत ने अपना गांव - अपना काम योजना एवं काम के बदले अनाज योजना आरंभ कीं। इन योजनाओं को गरीबी उन्मूलन के लिये अत्यंत उपयोगी माना गया। कुछ समय बाद केन्द्र सरकार के निर्देश पर अन्त्योदय योजना को काम के बदले अनाज योजना में बदल दिया गया। इस योजना में राजस्थान ने अन्य समस्त राज्यों की अपेक्षा सर्वाधिक कार्य किया तथा 1,80,000 टन अनाज उठाया। इस कारण विश्व बैंक भी इन योजनाओं के संचालन के लिये राज्य सरकार की सहायता करने के लिये आगे आया।

    पंचायतों को काम करने के अधिकार दिये

    उस समय तक पंचायतें कवल पांच सौ रुपये तक की योजनाएं ही हाथ में ले सकती थीं किंतु भैरोंसिंह शेखावत की पहली सरकार ने इस सीमा को पाचास हजार रुपये कर दिया तथा प्रत्येक पंचायत समिति के लिये निर्माण कार्यों की सीमा दस लाख रुपये कर दी।

    भारतीय जनता पार्टी में

    वर्ष 1980 में जनता पार्टी का विघटन हुआ। अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी तथा भैरोंसिंह शेखावत ने मिलकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। इस प्रकार वे भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से थे।

    राज्य में राष्ट्रपति शासन

    जनवरी 1980 में केन्द्र में कांग्रेस (इ) सरकार का निर्माण हुआ जिसने 17 फरवरी 1980 को राज्य की शेखावत सरकार की प्रथम सरकार को बर्खास्त करके विधान सभा को भंग कर दिया। राज्य मं। तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने अपनी पहली पारी में 2 वर्ष 8 महीने कार्य किया।

    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष

    1980 के विधानसभा चुनावों में श्री भैरोंसिंह शेखावत ने छबड़ा से दुबारा चुनाव लड़ा और वे विजयी रहे किंतु उनकी पार्टी चुनाव हार गई तथा कांग्रेस की सरकार बनी। भैरोंसिंह शेखावत भापजा विधायक दल के नेता चुने गये तथा नेता प्रतिपक्ष बने। पूरे पांच साल तक वे इस पद पर बने रहे।

    दुबारा नेता प्रतिपक्ष

    1985 में आठवीं राजस्थान विधान सभा में भी कांग्रेस की सरकार बनी। इस विधानसभा के लिये भैरोंसिंह शेखावत ने निंबाहेड़ा तथा अजमेर विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ा और वे दोनों ही सीटों पर विजयी रहे। इस विधानसभा में भी भैरोंसिंह शेखावत नेता प्रतिपक्ष के पद पर कार्य करते रहे।

    सती प्रथा का प्रबल विरोध

    4 सितम्बर 1987 को सीकर जिले के दिवराला गांव में रूपकंवर सती काण्ड हुआ। देश भर में इसकी तीव्र निंदा हुई। उस समय श्री हरिदेव जोशी राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने सती प्रथा को समाप्त करने के लिये कानून बनाया। 2 नवम्बर 1987 को राजस्थान विधान सभा में भैरोंसिंह शेखावत ने इस प्रथा का प्रबल विरोध किया भैरोंसिंह शेखावत ने विगत 150 वर्षों में राज्य में सती हुई स्त्रियों के आंकड़े एकत्रित किये तथा यह सिद्ध कर दिया कि यह एक भ्रम है कि सती प्रथा राजपूतों में प्रचलित है। विगत 150 वर्षों में अन्य जातियों में राजपूतों की स्त्रियों से भी अधिक स्त्रियां सती हुई हैं। उनका तर्क था कि इस कुरीति को जड़ से नष्ट करने के लिये प्रभावी उपाय होने चाहिये।

    भैरोंसिंह शेखावत की दूसरी सरकार

    वर्ष 1990 में राजस्थान में नवम् विधानसभा के लिये चुनाव हुए जिनमें भारतीय जनता पार्टी को 85, जनता दल अविभाजित को 54 तथा कांग्रेस (इ) को 50 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। भाकपा का एक प्रत्याशी जीता। निर्दलियों को 9 स्थानों पर विजय मिली। भाजपा के प्रत्याशी के रूप में भैरोंसिंह शेखावत ने दो सीटों- छबड़ा और धौलपुर से चुनाव लड़ा और दोनों ही स्थानों से विजयी रहे। इस कारण भाजपा की झोली में केवल 84 विधायक रह गये तथा किसी भी दल को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। भाजपा ने जनता दल (अविभाजित) से सरकार में शामिल होने का अनुरोध किया जो कि स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार 4 मार्च 1990 को भैरोंसिंह शेखावत ने प्रदेश में दूसरी बार सरकार बनायी।

    शेखावत के साथ भाजपा के भंवरलाल शर्मा व ललित किशोर चतुर्वेदी ने और जनता दल के नत्थीसिंह ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। 14 मार्च 1990 को भाजपा के कृष्ण कुमार गोयल, चतुर्भुज वर्मा, विजयसिंह झाला, रामकिशोर मीणा तथा पुष्पा जैन ने और जनता दल के दिग्विजय सिंह, चन्द्रभान एवं सुमित्रासिंह ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। भाजपा के हरलाल सिंह खर्रा, रमजान खां, कालूलाल गुर्जर, मोहन मेघवाल, जीवराज कटारा, कुंदनलाल मिगलानी, चुन्नीलाल गरासिया तथा जनता दल के फतहसिंह ने राज्यमंत्री पद की शपथ ली। 16 मार्च 1990 को हरिशंकर भाभड़ा को विधान सभा का अध्यक्ष चुना गया। 5 जुलाई 1990 को जनता दल के यदुनाथसिंह सर्वसम्मति से उपाध्यक्ष चुने गये। बाद में 19 मार्च 1991 को यदुनाथसिंह ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया एवं भाजपा के हीरासिंह चौहान उपाध्यक्ष बने।

    30 मई 1990 को भाजपा के हरि कुमार औदिच्य तथा विद्या पाठक को एवं जनता दल के प्रो. केदार नाथ, सम्पतराम व मदन कौर को कैबीनेट मंत्री बनाया गया। उसी दिन भाजपा के जोगेश्वर गर्ग तथा शांतिलाल चपलोत को एवं जनता दल के रामेश्वर दयाल यादव, देवीसिंह भाटी, नफीस अहमदखां व गोपालसिंह खण्डेला को राज्यमंत्री बनाया गया। 23 अक्टूबर 1990 को भाजपा की अयोध्या रथ यात्रा के कारण जनता दल ने भाजपा सरकार से अलग होने का निर्णय लिया। 7 कैबीनेट मंत्रियों- नत्थीसिंह, सम्पतराम, प्रो. केदार, दिग्विजय सिंह, चन्द्रभान, सुमित्रा सिंह और मदनकौर तथा चार राज्य मंत्रियों- फतहसिंह, गोपालसिंह खण्डेला, रामेश्वर दयाल यादव तथा नफीस अहमद ने सरकार से त्यागपत्र दे दिये जिससे सरकार अल्पमत में आ गयी। 5 नवम्बर 1990 को जनता दल के 22 विधायकों ने नत्थीसिंह के नेतृत्व को अस्वीकार करते हुए भाजपा को समर्थन जारी रखने की घोषणा की।

    8 नवम्बर 1990 को शेखावत सरकार ने विधान सभा में विश्वास का मत अर्जित कर लिया। सरकार के पक्ष में 116 तथा विरोध में 80 मत आये। विधान सभा अध्यक्ष ने मतदान नहीं किया। 24 नवम्बर 1990 को मंत्रिमण्डल का विस्तार किया गया। जनता दल (दिग्विजय) के दिग्विजय सिंह, गंगाराम चौधरी, लालचंद डूडी, भंवरलाल शर्मा, सम्पतसिंह, जगमालसिंह यादव, रामनारायण विश्नोई को कैबीनेट मंत्री, नफीस अहमद खां, उम्मेदसिंह, जगतसिंह दायमा, मान्धातासिंह, बाबूलाला खाण्डा और रतनलाल जाट को राज्य मंत्री तथा मिश्रीलाल चौधरी एवं डूंगरराम पंवार को उपमंत्री बनाया गया। निर्दलीय मदन मोहन सिंहल को राज्य मंत्री एवं रामप्रताप कासनिया को उपमंत्री बनाया गया। 9 जनवरी 1992 को जनता दल (दिग्विजय) के सम्पतसिंह और जगमाल सिंह ने सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 24 जनवरी 1992 को भाजपा के जोगेश्वर गर्ग और चुन्नीलाल गरासिया ने मुरली मनोहर जोशी की यात्रा में सम्मिलित होने के लिये मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। 17 फरवरी 1992 को भाजपा के कैलाश मेघवाल ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। 1 दिसम्बर 1992 को भाजपा के कैबीनेट मंत्री ललित किशोर चतुर्वेदी ने अयोध्या में कारसेवा में भाग लेने के लिये मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।

    तीन जिलों का जन्म

    अपनी दूसरी सरकार के कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत ने दौसा, राजसमंद तथा बारां जिलों का गठन किया। इससे राज्य में जिलों की संख्या 27 से बढ़कर 30 हो गई। अपने इस कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत केन्द्र सरकार की आठवीं पंचवर्षीय योजना में राजस्थान को 11500 करोड़ रुपये स्वीकृत करवाने में सफल रहे। दूसरी सरकार भी राष्ट्रपति शासन की भेंट चढ़ी 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में हुई गतिविधियों को लेकर केन्द्र सरकार ने शेखावत सरकार को अपदस्थ कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया तथा विधानसभा भंग कर दी गयी। भैरोंसिंह शेखावत की तीसरी सरकार राज्य में दसवीं विधान सभा के लिये 11 नवम्बर 1993 को मतदान हुआ। 27 नवम्बर को मतों की गिनती की गयी एवं चुनाव परिणाम घोषित किये गये। भाजपा को 95 स्थान, कांग्रेस (इ) को 76 स्थान, माकपा को 1 स्थान, जनता दल को 6 स्थान एवं निर्दलीय एवं अन्य को 21 स्थान प्राप्त हुए। भाजपा ने बाड़मेर में गंगाराम चौधरी को, चौहटन में भगवान दास डोसी को एवं डीग क्षेत्र में कुंवर अरुणसिंह को समर्थन प्रदान किया। इन तीनों को ही चुनावों में विजय प्राप्त हुई।

    भैरोंसिंह शेखावत ने दसवीं विधानसभा का चुनाव पाली जिले की बाली सीट से लड़ा थाजिसमें वे विजयी रहे। इस प्रकार 11 दिसम्बर 1993 को भैरोंसिंह शेखावत ने निर्दलियों के सहयोग से राज्य में तीसरी बार अपनी सरकार का गठन किया। जब उन्होंने अपनी तीसरी सरकार का गठन किया तो राष्ट्रपति शासन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने इसे 'सरकारी अवकाश' बताया।

    उनके साथ भाजपा के भंवरलाल शर्मा, ललित किशोर चतुर्वेदी, देवीसिंह भाटी, गुलाबचंद कटारिया, एवं निर्दलीय सुजानसिंह यादव एवं गंगाराम चौधरी को कैबीनेट मंत्री बनाया गया। भाजपा के नाथूसिंह गुर्जर, राजेन्द्रसिंह राठौड़, जसवंतसिंह विश्नोई, श्रीकिशन सोनगरा, नन्दलाल मीणा, रामप्रताप कासनिया, अनंग कुमार जैन, मदन दिलावर, अचलाराम मेघवाल, सांवरलाल जाट, निर्दलीय रोहिताश्व कुमार, ज्ञानसिंह चौधरी, नरेन्द्र कंवर तथा शशि दत्ता को राज्य मंत्री बनाया गया। निर्दलीय गुरजंट सिंह तथा मंगलाराम कोली को उपमंत्री बनाया गया।

    22 दिसम्बर 1993 को भाजपा के अर्जुन सिंह देवड़ा को राज्यमंत्री पद की शपथ दिलवायी गयी। 20 फरवरी 1994 को भाजपा के कैलाश मेघवाल एवं रघुवीरसिंह कौशल को कैबीनेट मंत्री के पद की शपथ दिलवायी गयी। जनता दल के 6 सदस्यों में से तीन सदस्यों ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। 6 अक्टूबर 1994 को विधानसभा अध्यक्ष हरिशंकर भाभड़ा को कैबीनेट मंत्री, नसरूखां, बृजराजसिंह एवं पूंजालाल गरासिया को राज्यमंत्री बनाया गया। 27 फरवरी 1995 को बृजराजसिंह का निधन हो गया। मुख्यमंत्री से मतभेदों के कारण 17 जनवरी 1997 को शशि दत्ता ने तथा 20 जनवरी 1997 को पूंजालाल गरासिया ने मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। 7 दिसम्बर 1997 को एक वरिष्ठ अधिकारी से अशोभनीय व्यवहार करने पर देवीसिंह भाटी को भी मुख्यमंत्री के निर्देश पर त्यागपत्र देना पड़ा। 21 मार्च 1998 को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष चुन लिये जाने के बाद रघुवीरसिंह कौशल ने भी त्यागपत्र दे दिया। 1 जून 1998 को ज्ञानसिंह चौधरी ने निजी कारणों से त्यागपत्र दे दिया।

    2 जुलाई 1998 को भाजपा के घनश्याम तिवाड़ी को कैबीनेट मंत्री के रूप में तथा राजपाल सिंह शेखावत, कालीचरण सर्राफ, राजेन्द्र गहलोत, कन्हैयालाल मीणा, भंवरसिंह डांगावास, बाबूलाल वर्मा, सुन्दरलाल, अमराराम चौधरी, दलीचंद, शिवदानसिंह, महावीर भगोरा तथा उजला अरोड़ा को राज्यमंत्री नियुक्त किया गया। 8 जुलाई 1998 को विजयेन्द्रपाल सिंह को कैबीनेट मंत्री तथा चुन्नीलाल धाकड़ को राज्यमंत्री बनाया गया। दो उपमंत्रियों गुरजंट सिंह और मंगलाराम कोली को पदोन्नति देकर राज्यमंत्री बनाया गया।

    नये उद्योगों की स्थापना पर जोर

    भैरोंसिंह शेखावत ने राजस्थान में नये उद्योगों की स्थापना पर जोर दिया और एक लाख तक की जनसंख्या वाले नगरों में नया उद्योग लगाने वालों को राजकीय सहायता देने का निर्णय किया। साक्षरता, वृक्षारोपण, परिवार नियोजन, स्त्री शिक्षा, आदि उनकी प्राथमिकता के मुख्य कार्यक्रम थे। जब 1993 में वे तीसरी बार मुख्यमंत्री बने तो परिवार नियोजन उके लिये पंचायती राज कानून में संशोधन करके एक प्रावधान किया गया कि दो से अधिक संतान वाला व्यक्ति पंच-सरपंच का चुना नहीं लड़ सकता। इसी कार्यकाल में शेखावत ने पंचायती राज तथा स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ी जातियों तथा महिलाओं के लिये आरक्षण का प्रावधान करके भारत के लोकतंत्रीय इतिहास में नई मिसाल स्थापित की। यह आरक्षण रोटेशन प्रणाली के आधार पर लागू किया गया।

    केन्द्र सरकार हमें रेल दे दे

    राजस्थान के विपुल खनिज भण्डार की शक्ति से भैरोंसिंह भलीभांति परिचित थे। इसलिये वे प्रायः कहते थे कि केन्द्र सरकार हमें रेल दे दे, हमारा राज्य देश भर की सीमेण्ट तथा मार्बल की मांग पूरी करने में सक्षम है।

    चुंगी की समाप्ति

    अपनी तीसरी सरकार के कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत ने नगर पालिका नाकों पर चुंगी वसूलने में हो रहे भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये चुंगी समाप्त कर दी।

    नौवीं पंचवर्षीय योजना के आकार में ऐतिहासिक वृद्धि

    राजस्थान को स्वीकृत नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997 से 2000) के आकार में, आठवीं पंचवर्षीय योजना की तुलना में लगभग ढाई गुना की वृद्धि हुई। यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। जहां आठवीं पंचवर्षीय योजना का आकर 11,500 करोड़ रुपये था, वहीं नौंवी पंचवर्षीय योजना का आकार 27,400 करोड़ रुपये हो गया।

    दो जिलों का निर्माण

    इस कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत सरकार ने राजस्थान में दो नये जिलों का गठन किया। श्रीगंगानगर जिले को विभाजित करके श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिले बनाये गये तथा सवाईमाधोपुर जिले को विभाजित करके सवाईमाधोपुर एवं करौली जिले बनाये गये। इस प्रकार राज्य में जिलों की संख्या 32 हो गई।

    साक्षरता अभियान को अभूतपूर्व सफलता

    भैरोंसिंह शेखावत की इस तीसरी सरकार ने राज्य में सघन साक्षरता अभियान चलाया जिसे अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई। वर्ष 1991 की जनगणना में राज्य की साक्षरता 38 प्रतिशत पाई गई थी जो इस अभियान के कारण वर्ष 2001 में बढ़कर 61 प्रतिशत हो गई। इस प्रकार निरक्षर राजस्थान साक्षर राजस्थान में बदल गया।

    तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष

    भैरोंसिंह शेखावत की तीसरी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया किंतु इसके बाद 1998 में ग्यारहवीं विधानसभा के लिये हुए चुनावों में भाजपा परास्त हो गई। उसे केवल 33 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस 150 सीटें जीत कर प्रबल बहुमत के साथ सत्ता में पहुंची। इस विधान सभा के लिये भैरोंसिंह शेखावत ने बाली सीट से चुनाव लड़ा था जिसमें वे विजयी रहे तथा तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष बने।

    उपराष्ट्रपति पद पर विजयी

    वर्ष 2002 में भैरोंसिंह शेखावत ने भारत के उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी श्री सुशील कुमार शिंदे को सीधी टक्कर में परास्त किया। 19 अगस्त 2002 को भैरोंसिंह शेखावत ने भारत के 11वें उपराष्ट्रपति बने।

    जीवन भर पढ़ते रहे

    भैरोंसिंह शेखावत हाई स्कूल तक पढ़े हुए थे किंतु सीखने, जानने और पढ़ने की ललक उनमें जीवन भर बनी रही। वे अपने सहायकों से विविधि विषयों पर नोट्स तैयार करवाते और उनका अध्ययन करके ही किसी विषय पर अपनी धारणा बनाते थे।

    तीन बार डॉक्टर ऑफ लिट्रेचर

    आन्ध्र विश्वविद्यालय, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय तथा महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी ने भैरोंसिंह शेखावत को डॉक्टर ऑफ लिट्रेचर की उपाधियाँ दीं। एशियाटिक सोसाइटी मुम्बई ने उन्हें ऑनरेरी फैलोशिप दी। येरेवान स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी आर्मेनिया ने उन्हें डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की उपाधि एवं स्वर्ण पदक प्रदान किया।

    राष्ट्रपति का चुनाव हारे

    जुलाई 2007 में राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का कार्यकाल पूरा हुआ। भैरोंसिंह शेखावत ने राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। वे स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में खड़े हुए। एनडीए के समस्त घटक दलों ने उनका समर्थन किया। उनके सामने राजस्थान की राज्यपाल प्रतिभा देवीसिंह पाटील खड़ी हुईं। उन्हें यूपीए के घटक दलों एवं वामपंथी दलों ने समर्थन दिया। इस चुनाव में प्रतिभा देवीसिंह पाटील विजयी रहीं। 21 जुलाई 2007 को भैरोंसिंह शेखावत ने उपराष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद वे सदैव के लिये सक्रिय राजनीति से हट गये। इस समय तक उनकी आयु 84 वर्ष हो गई थी।

    कैंसर ने झकझोरा

    84 वर्ष की आयु में भैरोंसिंह शेखावत को कैंसर का दंश झेलना पड़ा। भारत के विभिन्न चिकित्सालयों में उनका उपचार करवाया गया किंतु वे पूर्णतः स्वस्थ नहीं हो सके।

    जाति एवं समाज से निर्भय रहे

    4 सितम्बर 1987 को रूपकंवर सती हुई। उन दिनों राज्य के मुख्यमंत्री श्री हरिदेव जोशी थे। भैरोंसिंह उन दिनों इंगलैण्ड की यात्रा पर थे। उन्होंने लंदन से वक्तव्य जारी करके सती काण्ड के दाषियों को दण्डित करने की मांग की। राजपूत समाज का बड़ा हिस्सा ऐसे किसी कदम के विरुद्ध पहले ही प्रतिबद्धता जता चुका था।

    भैरोंसिंह निर्भय होकर, अपने सिद्धांतों पर चले। वे जाति एवं समाज की नाराजगी से कभी डरे नहीं। जब कांग्रेस सरकार सती प्रथा के विरोध में कानून लाई तो भैरोंसिंह उसके समर्थन में खड़े हुए। शेखावत जब लंदन से लौटे तो उन्हें गद्दार कहा गया किंतु वे निर्भीक होक जनसभाओं में गये और अपने तर्को से सबको निरुत्तर कर दिया।

    रामनिवास मिर्धा से मिलता था चेहरा

    भैरोंसिंह शेखावत का चेहरा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामनिवास मिर्धा से मिलता था। कोई भी आदमी रामनिवास मिर्धा को देखकर उन्हें शेखावत समझने की भूल कर सकता था और कोई भी आदमी शेखावत को देखकर रामनिवास समझने की भूल कर सकता था। रामनिवास मिर्धा की पुत्री के विवाह में भैरोंसिंह साफा पहनकर पहुंचे। दोनों के साफे भी लगभग एक जैसे थे। इस पर रामनिवास मिर्धा ने भैरोंसिंह शेखावत से कहा कि आप तो मेहमानों का स्वागत करो, मैं मण्डप में जा रहा हूँ। इस पर शेखावत, मिर्धा के परिजनों के साथ उनके आगे खड़े हो गये। बहुत से लोग उन्हें मिर्धा समझकर लिफाफे पकड़ा गये। जब मिर्धा मण्डप से बाहर आये तो वे यह देखकर हैरान हो गये कि अतिथि किस तरह शेखावत को मिर्धा समझकर भ्रमित हो रहे हैं। शेखावत ने हँसकर लोगों को अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं रामनिवास मिर्धा हूँ और ये भैरोंसिंह शेखावत हैं।

    जूते खाओ, पर पुष्पचक्र चढ़ाओ

    1996 में मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भैरोंसिंह ने अपने दो मंत्रियों राजेन्द्रसिंह राठौड़ तथा रोहिताश्व शर्मा को प्रबंधन की जानकारी प्राप्त करने के लिये हैदराबाद भेजा। उन्हीं दिनों आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. टी. रामाराव का निधन हो गया। इस पर भैरोंसिंह ने दोनों मंत्रियों को निर्देश दिये कि वे सरकार की ओर से रामाराव की पार्थिव देह पर पुष्पचक्र अर्पित करके आयें। जब राजस्थान सरकार के दोनों मंत्री पुष्पचक्र अर्पित करने गये तो लोगों ने उन पर चप्पलें फैंकनी आरंभ कर दीं तथा वापस जाओ-वापस जाओ के नारे लगाने लगे। इससे राजस्थान सरकार के मंत्री रामाराव की पार्थिव देह तक नहीं पहुंच सके। उन्होंने भैरोंसिंह को यह बात बताई तो भैरोंसिंह ने उन्हें निर्देश दिये कि चाहे कितने ही जूते चप्पल खाने पड़ें, पुष्पचक्र अर्पित करके ही आना। दोनों मंत्री पुनः उस स्थान पर गये जहां रामराव की पार्थिव देह दर्शनार्थियों के लिये रखी गई थी। इस बार वे अपने काम में सफल रहे। बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि लोग राजेन्द्रसिंह राठौड़ को एन. टी. रामाराव को चंद्रबाबू नायडू समझ रहे थे जिन्होंने कुछ दिन पहले ही अपने श्वसुर की सरकार का तख्ता पलट किया था।

    गुटखा खाने वाले बाबोसा

    अपने गांव खाचरियावास में भैरोंसिंह शेखावत को बाबोसा के नाम से जाना जाता था। वे गुटखा (पान मसाला) खाने के शौकीन थे, राजस्थान का शायद ही ऐसा कोई गांव या नगर हो जिसमें उन्होंने अपने ऐसे मित्र न बना रखे हों जिनसे वे गुटखा मांगकर न खाते हों। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नवल किशोर शर्मा भी पान मसाला खाते थे। वे दोनों प्रायः परस्पर परिहास किया करते थे कि पान मसाला बनाने वाले हमें ही अपना ब्राण्ड एम्बेसेडर क्यों नहीं रख लेते।

    दाम्पत्य जीवन से एक पुत्री

    भैरोंसिंह शेखावत और सूरजकंवर को अपने दाम्पत्य जीवन से एक पुत्री प्राप्त हुई जिसका नाम रतनकंवर रखा गया। रतनकंवर का विवाह नरपतसिंह राजवी से हुआ जो वसुंधरा राजे मंत्रिमण्डल में मंत्री रहे। रतनकंवर के दो पुत्र विक्रमादित्यसिंह तथा अभिमन्युसिंह हुए।

    भयभीत सांसद ने पांव पकड़े

    भैरोंसिंह शेखावत जब राज्यसभा के सभापति थे, उन दिनों एक सांसद लगातार तीन बार प्रश्नकाल के दौरान अनुपस्थित रहा। शेखावत राजस्थान विधानसभा के अनुभवों से समृद्ध थे। उन्होंने सांसद की पृष्ठभूमि की जांच करवाई। सांसद को भी जानकारी हो गई कि भैरोंसिंह शेखावत ने उनकी पृष्ठभूमि की जांच करवाई है। जब भैरोंसिंह शेखावत ने उस सांसद को अपने चैम्बर में बुलाया तो उस सांसद ने उनके पांव पकड़कर माफी मांग ली। भैरोंसिंह शेखावत ने उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया। इसके बाद ऐसे सदस्य या तो प्रश्न पूछते ही नहीं थे, और यदि पूछते थे तो सदन से अनुपस्थित नहीं रहते थे।

    मैं यहाँ क्या लेने आया हूँ

    भैरोंसिंह शेखावत को जातिवाद से बहुत चिढ़ थी। वे व्यक्तिवाद और जातिवाद के स्थान पर समष्टिवाद में विश्वास रखते थे। वर्ष 2007 में वे चक्रेश्वरी देवी के नागाणा मंदिर में दर्शनों के लिये आये। इस अवसर पर आयोजित सार्वजनिक सभा के मंच से चक्रेश्वरी देवी को बार-बार राठौड़ों की देवी कहकर सम्बोधित किया गया। इससे वे खीझ पड़े और अपने भाषण में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बोले- देवी देवता किसी व्यक्ति या जाति के नहीं होते, वे तो पूरे समाज के होते हैं। यदि यह राठौड़ों की देवी है और मैं शेखावत हूँ, तो मैं यहाँ क्या लेने आया हूँ!

    अस्पताल पहुंचे अशोक गहलोत

    भैरोंसिंह शेखावत एक वर्ष से बीमार चल रहे थे। 13 मई 2010 को उन्हें 15 मई 2010 की प्रातः मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत को ज्ञात हुआ कि भैरोंसिंह शेखावत की हालत चिंता जनक है, उसी समय प्रातः 9 बजे उन्होंने सवाई मानसिंह अस्पताल के आईसीयू में पहुंचकर डॉक्टरों से उनके स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के बारे में जानकारी ली।

    वैशाख की दूज को ज्योति विलीन हुई

    वैशाख की तृतीया को राजस्थान में आखातीज कहा जाता है जो समस्त शुभकार्यों के लिये अबूझ सावे के रूप में विख्यात है। इसी आखातीज से एक दिन पहले, वैशाख माह की द्वितीया अर्थात् 15 मई 2010 को प्रातः 11 बजकर 10 मिनट पर हृदयाघात से उनका निधन हो गया। कार्तिक माह की त्रयोदशी को जो ज्योति प्रकट हुई वह वैशाख माह की द्वितीया को विलीन हो गई।

    सारे काम छोड़कर दौड़े अशोक गहलोत

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, भैरोंसिंह के हालचाल पूछकर अभी लौटे ही थे कि उन्हें शेखावत के निधन का सामचार मिला। वे हाथ के सारे काम छोड़कर उसी समय फिर सवाई मानसिंह अस्पताल पहुंचे। उन्होंने शेखावत के परिजनों को ढाढ़स बंधवाया तथा उनके निधन पर राजस्थान में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया।

    शवयात्रा में सम्मिलित हुआ पूरा देश

    उनके निवास पर पहुंचकर श्रद्धांजलि देने वालों में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम, पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे, गुजरात की राज्यपाल डॉ. कमला भी शामिल थीं। उनकी शवयात्रा में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, राजस्थान के राज्यपाल शिवराज पाटिल, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी- एल- जोशी, हरियाणा के राज्यपाल जगन्नाथ पहाड़िया, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाशसिंह बादल, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह] उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल, पूर्व उपप्रधान मंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे, केन्द्रीय मंत्री डॉ- सी- पी- जोशी एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंतसिंह, भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति सम्मिलित हुए।

    शेखावत स्मृति संस्थान की घोषणा

    मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने भैरोंसिंह शेखावत की स्मृतियों को बनाये रखने के लिये जयपुर में शेखावत स्मृति संस्थान को राज्य सरकार की ओर से भूमि देने की घोषणा की। सीकर रोड पर विद्याधर नगर स्टेडियम के पास इस संस्थान को भूमि आवंटित की गई।

    उनके जैसा व्यक्ति मुश्किल से दिखाई पड़ता है

    शेखावत के निधन पर यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने भैरोंसिंह की पत्नी को लिखे एक पत्र में इन शब्दों में शोक प्रकट किया- मुझे भैरोंसिंह शेखावत के देहावसान का बहुत अफसोस हुआ। सार्वजनिक जीवन में उनके जैसा व्यक्ति मुश्किल से दिखाई पड़ता है। शेखावत साहब के सार्वजनिक व्यवहार, उनकी सूझबूझ, और राजनीतिक प्रतिभा का महत्व सभी लोग स्वीकार करते हैं। सभी पक्षों में संवाद का जैसा गुण उनमें था, वह प्रायः विरल होता है। आपका उनसे जीवन भर का साथ रहा है। उनके गुणों के बारे में आपसे ज्यादा कौन जान सकता है। आपके अभाव और पीड़ा की कल्पना मैं कर सकती हूँ। इसलिये ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि वह आपको यह दुःख सहने की शक्ति दे और उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

    उन्होंने लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उच्च प्रतिमान स्थापित किये

    शेखावत के निधन पर मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने कहा- शेखावत उन बिरले नेताओं में से थे जिन्होंने राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। मुख्यमंत्री, प्रतिपक्ष के नेता और उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी विद्वता, वाक्पटुता और मिलनसार व्यवहार की अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने राजनीति में रहकर लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उच्च प्रतिमान स्थापित किये। उन्होंने राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर व्यक्तिगत सम्पर्कों को सदा महत्व दिया।

    पूरा देश उन्हें सदियों तक याद करता रहेगा

    पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने उनके निधन पर कहा- शेखावत का निधन पूरे देश के लिये अपूर्ण क्षति है। वे विराट व्यक्तित्व के धनी और जन-जन के नेता थे। उनसे राजनीति में बहुत कुछ सीखा है। राजनीति के एक युग का अंत हो गया। पूरा देश उन्हें सदियों तक याद करता रहेगा।

    हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने हाड़-मांस का ऐसा मानव देखा

    उनके निधन के बाद सुप्रसिद्ध पत्रकार चंदन मित्रा ने 17 मई 2010 को राजस्थान पत्रिका में एक लेख लिखा जिसकी अंतिम पंक्तियों में लिखा था- उन्होंने पूरी शान से जीवन बिताया। भावी पीढ़ियां उन्हें छपे हुए शब्दों व टीवी फुटेज से जानेंगी। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने हाड़-मांस का ऐसा मानव देखा।


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×