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  • युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 8

     02.06.2020
    युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 8

    महाराजा सूरजमल को राज्य की प्राप्ति (1)


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    यद्यपि सूरजमल विगत 14 वर्षों से भरतपुर राज्य का काम देख रहा था किंतु ई.1756 में राजा बदनसिंह की मृत्यु होने पर सूरजमल विधिवत् भरतपुर का राजा बना। उसे अनेक युद्धों में भाग लेने का तथा लम्बे समय तक राज्य प्रबन्ध करने का अनुभव प्राप्त था। नादिरशाह द्वारा दिल्ली पर आक्रमण किये जाने एवं भारी तबाही मचाने के बाद मुगल साम्राज्य बहुत कमजोर हो गया था। जयपुर राज्य भी ईश्वरीसिंह और माधोसिंह के झगड़े में काफी कमजोर तथा अस्त-व्यस्त हो गया था। सूरजमल ने इन्हीं परिस्थितियों का लाभ उठाया और दिल्ली तथा उसके आस-पास के क्षेत्रों को जमकर लूटा तथा अपने राज्य का विस्तार किया। सूरजमल ने नवोदित भरतपुर राज्य को व्यवस्थित हिन्दू राज्य में बदल दिया।

    जवाहरसिंह का विद्रोह

    सूरजमल की तीसरी रानी गंगा के दो पुत्र थे- जवाहरसिंह तथा रतनसिंह। जवाहरसिंह क्रोधी तथा उतावले स्वभाव का युवक था। उसे महारानी किशोरी देवी ने गोद ले लिया। राजा बदनसिंह के मरने के बाद सूरजमल ने जवाहरसिंह को डीग का किलेदार नियुक्त किया। साथ ही सूरजमल ने कुछ ऐसे संकेत दिये कि सूरजमल के बाद उसका अन्य पुत्र नाहरसिंह राज्य का उत्तराधिकारी होगा। इस पर जवाहरसिंह ने विद्रोह कर दिया तथा स्वयं को डीग का स्वतंत्र शासक घोघित किया दिया। इस पर सूरजमल ने जवाहरसिंह को समझाने का प्रयास किया किंतु जवाहरसिंह ने सूरजमल की बात मानने से मना कर दिया। इस पर सूरजमल ने जवाहरसिंह के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये सेना भेजी। इस युद्ध में जवाहरसिंह बुरी तरह से घायल हो गया। बंदूक की एक गोली उसके पेट के निचले भाग में लगी तथा आर-पार हो गई। इससे जवाहरसिंह जीवन भर के लिये लंगड़ा हो गया। सम्भवतः महारानी किशोरी देवी ने दोनों के बीच समझौता करवाया तथा सूरजमल ने जवाहरसिंह का क्षमा कर दिया।


    ब्रजभूमि पर अहमदशाह अब्दाली का आक्रमण

    उस काल में एक तरफ तो बंगाल से अंग्रेज शक्ति पूर्व दिशा से उत्तरी भारत को दबाती हुई चली आ रही थी तथा दूसरी ओर पिण्डारी और मराठे दक्षिण दिशा से से उत्तरी भारत को रौंदने में लगे हुए थे। यह भारतीय इतिहास के मध्यकाल का अवसान था किंतु अफगानिस्तान की ओर से विगत कई शताब्दियों से आ रही मुस्लिम आक्रमणों की आंधी अभी थमी नहीं थी। ई.1757 में अफगान सरदार अदमदशाह दुर्रानी ने भारत पर चौथा आक्रमण किया। भारत के इतिहास में उसे अहमदशाह अब्दाली के नाम से भी जाना जाता है।

    जब दिल्ली की जनता को ज्ञात हुआ कि अहमदशाह अब्दाली दिल्ली पर आक्रमण करने वाला है तो दिल्ली की जनता मुगल बादशाह की राजधानी को छोड़कर अन्य स्थानों पर भाग गई। अधिकतर लोगों ने राजा सूरजमल द्वारा शासित क्षेत्रों में शरण ली। मथुरा पर उन दिनों सूरजमल का अधिकार था। इसलिये दिल्ली की जनता ने बड़ी संख्या में मथुरा में शरण ली। बादशाह ने जाटों और मराठों का सहयोग प्राप्त करने के लिये अपने दूत भिजवाये। सूरजमल ने तिलपत में मुगल सरदारों तथा नजीब खां रूहेला से लम्बी वार्त्ता की। सूरजमल चाहता था कि नजीब खां, रूहेलों, जाटों, राजपूतों और मुगलों की सेना को एकत्रित करके उनका नेतृत्व करे तथा मराठों को नर्बदा के पार जाने के लिये कह दिया जाये किंतु दिल्ली का वजीर इमादुलमुल्क, सूरजमल के विचारों से सहमत नहीं हुआ। इमादुलमुल्क नहीं चाहता था कि नजीब खां को जाटों तथा रूहेलों का साथ मिल जाये। इसलिये यह वार्त्ता विफल हो गई। इस पर सूरजमल अपने लड़के जवाहरसिंह को दिल्ली में छोड़कर स्वयं भरतपुर लौट गया।

    अब्दाली तेज गति से दिल्ली की ओर बढ़ा। उधर नजीब खां, अहमदशाह अब्दाली से मिल गया और 17 जनवरी 1757 की रात्रि में वह यमुना को पार करके अब्दाली के पास चला गया। केवल अंताजी मानकेश्वर इस समय ऐसा वीर था जो अपनी छोटी सी सेना के साथ, अब्दाली का मार्ग रोककर खड़ा हुआ। उसे अब्दाली की सेना ने सरलता से परास्त कर दिया। उसका परिवार भरतपुर में होने के कारण सुरक्षित रहा। नजीब खां और अब्दाली की दोस्ती हुई जानकर वजीर इमादुलमुल्क ने अपने शत्रु सूरजमल से संधि कर ली और अपने परिवार को डीग भेज दिया। बादशाह आलमगीर द्वितीय ने अब्दाली के समक्ष समर्पण कर दिया। अब्दाली ने उससे एक करोड़ रुपये लिये तथा उसे हिन्दुस्तान का बादशाह और नजीब को उसके दरबार में अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया गया। इसके बाद अहमदशाह के आदमियों ने दिल्ली को लूटना आरम्भ किया। एक महीने तक दिल्ली को लूटा और नष्ट किया गया। दिल्ली पूरे मध्यकाल में लुटती आई थी इसलिये भूखे-नंगे शहर में लूटने को बहुत कुछ बचा भी नहीं था। अहमदशाह तो अपार धन की आशा में भारत आया था। वह और अधिक बेचैन हो उठा।

    भरतपुर की ओर

    अहमदशाह अब्दाली ने सुन रखा था कि भारत में दो ही धनाढ्य व्यक्ति हैं- एक तो बंगाल का नवाब शुजाउद्दौला तथा दूसरा भरतपुर का राजा सूरजमल। उसे यह भी जानकारी थी कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपने खूनी पंजे नवाब शुजाउद्दौला की गर्दन में भलीभांति गाढ़ दिये हैं। अतः अहमदशाह अब्दाली भरतपुर के खजाने को लूटने के लिये व्याकुल हो उठा। वह भरतपुर की दाढ़ में से अंताजी मानकेश्वर के परिवार तथा वजीर इमादुल्मुल्क के परिवार को निकालना चाहता था। राजा नागरमल भी सूरजमल की शरण में था। अब सूरजमल ने जवाहरसिंह को मथुरा की रक्षा पर नियत किया और स्वयं डीग में जाकर मोर्चा बांधकर बैठ गया।

    अब्दाली ने सूरजमल को आदेश भिजवाया कि वह कर देने के लिये स्वयं हाजिर हो और अब्दाली के झण्डे के नीचे रहकर सेवा करे। जिन इलाकों को सूरजमल ने हाल ही में अपने अधीन किया है, उन इलाकों को भी लौटा दे। इस पर सूरजमल ने व्यंग्य भरा जवाब भिजवाया-

    जब बड़े-बड़े जमींदार हुजूर की सेवा में हाजिर होंगे, तब यह दास भी शाही ड्यौढ़ी का चुम्बन करेगा। मैं राजा नागरमल तथा अन्य लोग जो मेरी शरण लिये हुए हैं, उन्हें कैसे भिजवा सकता हूँ?

    यह जवाब मिलने के बाद अब्दाली ने जाट राज्य पर आक्रमण करने के लिये दिल्ली से प्रस्थान किया।

    बल्लभगढ़ का विनाश

    अहमदशाह अब्दाली ने सूरजमल के राज्य पर आक्रमण के लिये प्रस्थान किया। एक दिन राजकुमार जवाहरसिंह ने अचानक ही अब्दाली की सेना पर आक्रमण किया और उसके बहुत से सैनिकों को मारकर बल्लभगढ़ में जा बैठा। इस पर अब्दाली बल्लभगढ़ पर चढ़ बैठा। उसने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। बल्लभगढ़ के दुर्ग में अब्दाली को केवल 12 हजार रुपये, सोने-चांदी के कुछ बर्तन, 14 घोड़े, 11 ऊँट और कुछ अनाज हाथ लगा। जवाहरसिंह अपने आदमियों के साथ रात के अंधेरे का लाभ उठाकर बल्लभगढ़ से जीवित ही निकल गया। इससे चिढ़कर अब्दाली ने बल्लभगढ़ के समस्त नर-नारियों को मार डाला। इन मनुष्यों के सिर काटकर गठरियों में बांध कर घोड़ों पर रख दिये गये। कुछ लोगों को पकड़कर घोड़ों के पीछे बांध दिया गया ताकि वे भी कटे हुए सिरों को उठा सकें।

    प्रातःकाल होने पर लोगों ने देखा कि प्रत्येक घुड़सवार एक घोड़े पर चढ़ा हुआ था। उसने उस घोड़े की पूंछ के साथ दस से बीस घोड़ों की पूंछों को बांध रखा था। समस्त घोड़ों पर लूट का सामान लदा हुआ था तथा बल्लभगढ़ से पकड़े गये स्त्री-पुरुष बंधे हुए थे। प्रत्येक आदमी के सिर पर कटे हुए सिरों की गठरियां रखी हुई थीं। अहमदशाह के सामने कटे हुए सिरों की मीनार बनायी गयी। जो लोग इन सिरों को अपने सिरों पर रख कर लाये थे, उनसे पहले तो चक्की पिसवाई गयी तथा उसके बाद उनके भी सिर काटकर मीनार में चिन दिये गये।

    जब अब्दाली बल्लभगढ़ पर आक्रमण करने गया तब उसने नजीबुद्दौला तथा जहानखां को 20 हजार सिपाही देकर निर्देश दिये-

    'उस अभागे जाट के राज्य में घुस जाओ। उसके हर शहर और हर जिले को लूटकर उजाड़ दो। मथुरा नगर हिन्दुओं का तीर्थ है। मैंने सुना है कि सूरजमल वहीं है। इस पूरे शहर को तलवार के घाट उतार दो। जहाँ तक बस चले, उसके राज्य में और आगरा तक कुछ मत रहने दो। कोई चीज खड़ी न रहने पाये। उसने अपने सैनिकों को आज्ञा दी कि मथुरा में एक भी आदमी जीवित न रहे तथा जो मुसलमान किसी विधर्मी का सिर काटकर लाये उसे पाँच रुपया प्रति सिर के हिसाब से ईनाम दिया जाये।’

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