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  • युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 7

     02.06.2020
    युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 7

    चरम उत्कर्ष की ओर


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    सूरजमल के सहयोग से प्रसन्न होकर वजीर सफदरजंग ने मुगल बादशाह से अनुशंसा की कि सूरजमल को 3000 जात और 2000 घुड़सवार का मनसब दिया जाये तथा उसके पुत्र रतनसिंह को राव की उपाधि दी जाये। सूरजमल के पुत्र जवाहरसिंह के मनसब में भी वृद्धि की जाये। इसके कुछ दिन बाद सफदरजंग ने बादशाह से अनुशंसा की कि बदनसिंह को महेन्द्र की उपाधि देकर राजा और सूरजमल को राजेन्द्र की उपाधि देकर कुमार बहादुर बनाया जाये। बादशाह ने इस अनुशंसा को स्वीकार कर लिया। भव्य समारोहों में बदनसिंह तथा सूरजमल ने इन उपाधियों को धारण किया। इसके बाद सूरजमल ने अपना नाम जसवंतसिंह रख लिया किंतु वह इस नाम का उपयोग बहुत कम ही किया करता था। कवि सूदन ने सूरजमल के लिये सुजानसिंह नाम का भी प्रयोग किया है। इसके कुछ दिन बाद बादशाह ने सूरजमल को मथुरा का फौजदार बना दिया। इससे उसे आगरा प्रान्त में यमुना के दोनों ओर के अधिकांश प्रदेशों पर तथा आगरा नगर के आस पास के क्षेत्रों पर अधिकार प्राप्त हो गया। यह सचमुच जाटों का चरम उत्कर्ष था कि वे मथुरा और आगरा के निकटवर्ती क्षेत्रों के शासक बन जायें।

    दिल्ली की लूट

    मार्च 1753 में बादशाह अहमदशाह ने सफदरजंग को वजीर के पद से हटा दिया। इस पर सफदरजंग ने नाराज होकर विद्रोह कर दिया। उसने अपनी लेकर दिल्ली का लाल किला घेर लिया तथा सूरजमल को अपनी सहायता के लिये बुलाया। सूरजमल तत्काल एक सेना लेकर अपने मित्र सफदरजंग की सहायता करने के लिये चल पड़ा। मार्ग में उसने अलीगढ़ के निकट चकला कोइल के जागीरदार बहादुरसिंह बड़गूजर पर आक्रमण किया। उस समय बहादुरसिंह, घसीरा के दुर्ग में था। उसने अन्य कोई उपाय न देखकर अपनी स्त्रियों को मार डाला तथा दुर्ग के द्वार खोल दिये। 23 अप्रेल 1753 को सूरजमल ने समस्त बड़गूजरों को मारकर घसीरा के दुर्ग पर अधिकार किया। इस युद्ध में सूरजमल के 1500 सैनिक मारे गये।

    मई 1753 में सूरजमल 15 हजार घुड़सवारों की सेना लेकर दिल्ली पहुंचा। 9 मई से 4 जून के बीच जाटों ने दिल्ली में जमकर लूट मचाई। जाट सैनिकों ने दिल्ली के दरवाजे तक लूट लिये। बहुत बड़ी संख्या में दिल्ली के मकान ढहा दिये। उस काल के इतिहासकारों ने लिखा है कि जाटों की लूटपाट के बाद दिल्ली के निकट बसे हुए उपनगरों, चुरनिया तथा वकीलपुरा आदि में तो कोई दिया ही नहीं दिखता था। तभी से दिल्ली में जाट-गर्दी मुहावरा कहा जाने लगा। बाद में जब सदाशिव भाऊ ने दिल्ली में लूट मचाई तो भाऊगर्दी का तथा अहमशाह अब्दाली ने लूट मचाई तो शाह-गर्दी का मुहावरा प्रचलित हुआ।

    दिल्ली की बादशाहत पर आये इस संकट में सफदरजंग तथा सूरजमल के अतिरिक्त अन्य समस्त शक्तियां बादशाह की ओर हो गईं। सूरजमल को बड़े प्रलोभन एवं धमकियां दी गईं ताकि वह सफदरजंग का साथ छोड़कर बादशाह के साथ आ जाये किंतु सूरजमल अपने मित्र के प्रति वचनबद्ध था और गद्दारी करने को तैयार नहीं था। सूरजमल पर नियंत्रण करने के लिये बादशाह ने मल्हारराव होलकर को दक्कन से बुलवाया किंतु सूरजमल पर उसका भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इससे पहले कि मराठे दिल्ली पहुंचते, सूरजमल ने दिल्ली के नये वजीर इन्तिजामुद्दौला तथा उसके भतीजे गाजीउद्दीन के बीच फूट डलवा दी। इस कारण बादशाह को सफदरजंग के समक्ष शांति एवं संधि का प्रस्ताव भेजना पड़ा। ई.1753 के अंतिम महीनों में जयपुर नरेश माधोसिंह दिल्ली पहुंचा। उसने सूरजमल को युद्ध बंद करने के लिये कहा किंतु सूरजमल ने कहा कि जब तक सफदरजंग को दुबारा वजीर नहीं बनाया जायेगा तथा सफदरजंग को अवध एवं इलाहाबाद के सूबे वापस नहीं दिये जायेंगे, युद्ध बंद नहीं होगा। बादशाह ने सूरजमल की मांग मान ली तथा युद्ध समाप्त हो गया। इसके बाद सफदरजंग तो अपने सूबों में चला गया किंतु राजा सूरजमल तथा दिल्ली के बादशाह के बीच जो शत्रुता उत्पन्न हुई, उसका दुष्परिणाम आगे चलकर सूरजमल को भोगना पड़ा।

    मराठों से सामना

    जब सफदरजंग अवध को चला गया तब मराठों की सेना ने मल्हारराव होलकर के पुत्र खांडेराव के नेतृत्व में राजपूताने में पैर रखा। वे सीधे जयपुर रियासत में जा घुसे और वहाँ के राजा माधोसिंह से कर मांगा। माधोसिंह से कर लेकर मराठे भरतपुर रियासत की ओर बढ़े। राजा सूरजमल भरतपुर की रक्षा का भार जवाहरसिंह को सौंपकर स्वयं कुम्हेर के दुर्ग में मोर्चाबंदी करके बैठ गया। यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि कुछ दिन पहले रूहलों के विरुद्ध सफदरजंग द्वारा किये गये अभियान में सूरजमल तथा मराठे एक होकर लड़े थे किंतु आज वही मराठे, सूरजमल द्वारा सफदरजंग को दी गई सहायता के लिये सूरजमल को दण्डित करने आ पहुंचे थे। वस्तुतः इसके पीछे मराठों की धन-लिप्सा काम कर रही थी। मराठों को ज्ञात था कि सूरजमल दिल्ली से अथाह खजाना लूट कर लाया है, मराठों को वह खजाना चाहिये था।

    सूरजमल ने खांडेराव के समक्ष मित्रता का प्रस्ताव भिजवाया किंतु होलकर के सेनापति रघुनाथराव ने सूरजमल के समक्ष दो करोड़ रुपयों की मांग रखी। सूरजमल के मंत्री रूपराम ने चालीस लाख रुपये देने स्वीकार किये किंतु मल्हारराव होलकर जो उस समय जयपुर में था, ने कहलवाया कि जाटों को चाहिये कि वे दो करोड़ रुपयों से अधिक राशि दें। इस पर नाराज होकर सूरजमल ने मराठों के सेनापति रघुनाथराव को तोप के पांच गोले और थोड़ा सा बारूद भिजवाया और कहलवाया कि या तो चालीस लाख रुपये ले ले या फिर परिणाम भुगतने को तैयार रहे।

    इस पर जनवरी 1754 में मराठों ने कुम्हेर को घेर लिया। मुगल सेना भी उनके साथ हो गई। सूरजमल के शत्रुओं की सेना में इस समय 80 हजार सैनिक थे। मराठों ने कुम्हेर के चारों ओर पंद्रह मील के घेरे में समस्त फसलें जलाकर राख कर दीं। कुम्हेर को जाने वाले समस्त रास्तों को बंद कर दिया तथा होडल पर अधिकार कर लिया। इमादुलमुल्क, खाण्डेराव, रघुनाथराव तथा मल्हारराव की सेनाओं ने सूरजमल को बुरी तरह घेर लिया। मुगलों और मराठों के दुश्मन हो जाने तथा जयपुर के तटस्थ हो जाने के कारण, राजा सूरजमल पूरे उत्तर भारत में अकेला पड़ गया किंतु उसने हिम्मत नहीं हारी। जयपुर नरेश माधोसिंह नहीं चाहता था कि जिस राज्य को उसके पुरखों ने अपने हाथों से स्थापित किया था, उस राज्य को नष्ट करने में वह योगदान करे। दूसरी तरफ वह मराठों को भी नाराज नहीं करना चाहता था। इसलिये उसने एक छोटी सी कच्छवाहा सेना मराठों के साथ भेज दी थी। राजा सूरजमल ने चार माह तक इस सम्मिलित सेना से लोहा लिया।

    एक दिन जब खांडेराव दुर्ग के बाहर खुदवाई गई खंदकों का निरीक्षण कर रहा था, दुर्ग के भीतर स्थित तोप से चले एक गोले से खांडेराव मारा गया। उसकी नौ रानियां उसके शव के साथ सती हो गईं। उसकी रानी अहिल्याबाई गर्भवती होने के कारण सती नहीं हो सकी। पुत्र शोक में पागल होकर मल्हारराव ने प्रतिज्ञा की कि वह जाटों का समूल नाश करेगा। अब मराठों ने कुम्हेर पर हो रहे आक्रमणों को भयानक बना दिया। ऐसी स्थिति में सूरजमल की रानी हँसिया ने रूपराम के पुत्र तेजराम कटारिया को सूरजमल की पगड़ी और एक पत्र देकर ग्वालियर के सिंधिया राजा को भेजा। उस समय सिंधिया, होलकर के साथ था। जब सिंधिया को रानी हँसिया का प्रस्ताव मिला तो उसने बदले में अपनी पगड़ी, एक उत्साहवर्द्धक पत्र तथा अपनी कुलदेवी के प्रसाद का एक बिल्वपत्र रानी को भिजवाया। जब हँसिया के पत्रवाहक और सिंधिया के बीच हुए पत्र व्यवहार की जानकारी मल्हारराव को हुई तो उसके हौंसले टूट गये।

    जब मराठे, जाटों पर पर्याप्त दबाव नहीं बना पाये तो वजीर इमादुलमुल्क ने दिल्ली से सहायता मंगवाई। बादशाह को लगा कि यदि मराठे, कुम्हेर को तोड़ लेंगे तो जाटों की अपार सम्पत्ति मराठों के हाथ लग जायेगी। इसलिये उसने अतिरिक्त सेना नहीं भिजवाई। इन सब कारणों से मराठों को बाजी अपने हाथ से जाती हुई लगी। उन्होंने सूरजमल से संधि कर ली। सूरजमल ने रूपराम कटारिया के माध्यम से मराठों को आश्वासन दिया कि वह मराठों को तीन साल में तीस लाख रुपये देगा किंतु उसने केवल दो लाख रुपये ही दिये। मराठे अपना घेरा उठाकर दक्कन को चले गये। इस सफलता से सूरजमल की धाक जम गई। मुगल वजीर इमादुलमुल्क अपना सिर धुनता हुआ दिल्ली चला गया जहाँ उसने बादशाह अहमदशाह की आंखें फोड़कर उसे कैद में डाल दिया और उसकी हत्या करवा दी।

    नजीब खां से संधि

    मराठों के जाते ही सूरजमल और जवाहरसिंह ने पलवल और बल्लभगढ़ पर अधिकार कर लिया। ये क्षेत्र उस समय मराठों के अधिकार में चल रहे थे। जून 1755 के मुगल सेनापति नजीब खां ने गंगा-यमुना दो-आब के उन क्षेत्रों को वापस लेने के लिये अभियान किया जिन पर सूरजमल ने अधिकार कर लिया था। इस पर सूरजमल ने नजीब खां के पास संधि का प्रस्ताव भिजवाया तथा दोनों पक्षों के बीच संधि हो गई। इस संधि की शर्तें इस प्रकार थीं-

    1. अलीगढ़ जिले में जिन क्षेत्रों पर राजा सूरजमल का अधिकार था, वे सूरजमल के पास ही रहेंगे।

    2. इन जमीनों पर स्थायी राजस्व छब्बीस लाख रुपये तय हुआ जिनमें से अठारह लाख रुपये उन जागीरों के नगद मुआवजे के कम किये जाने थे, जो अहमदशाह के शासनकाल में खोजा जाविद खां ने सूरजमल के नाम कर दी थीं परंतु उन दिनों की निरंतर अशांति के कारण जिन्हें बाकायदा हस्तान्तरित नहीं किया जा सका था।

    3. सूरजमल सिकन्दराबाद के किले और जिले को खाली कर देगा जो मराठों ने उसे दिया था।

    4. बाकी आठ लाख रुपयों में से जो कि शाही राजकोष को मिलने थे, सूरजमल दो लाख रुपये डासना-सन्धि पर हस्ताक्षर करते समय और बाकी छः लाख एक साल में चुका देगा।

    राजा बदनसिंह का निधन

    आंखों की ज्योति खराब हो जाने के कारण बदनसिंह ने राजकार्य सूरजमल पर छोड़ रखा था। जीवन के अन्तिम दिनों में राजा बदनसिंह सहार चला गया जहाँ 7 जून 1756 को उसकी मृत्यु हो गई।

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