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  • युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 4

     02.06.2020
    युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 4

    महाराजा सूरजमल के जन्म की पृष्ठभूमि (2)


    सिनसिनी के जाट


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    उन दिनों सिनसिनी दुर्ग जाटों की शक्ति का मुख्य केन्द्र था। सिनसिनी के अधीन केवल तीस गांव थे किंतु यह दुर्ग घने जंगल और दलदल से घिरा हुआ था। चारों ओर पैंघोर, कार्साट, सोगर, अबार, सौंख, रायसीस और सोंखरे-सोंखरी के छोटे दुर्ग बने हुए थे। इन्हें जीते बिना सिनसिनी तक पहुंचना सम्भव नहीं था।

    ई.1688 में महाराजा बिशनसिंह ने सौंख गढ़ी पर घेरा डाला। उसे जीतने में चार महीने लग गये किंतु इसके बाद सिनसिनी तक पहुंचने का मार्ग खुल गया। बिशनसिंह के पास कच्छवाहों के अलावा मुगल सेना भी थी। उसने सिसिनी के चारों तरफ का जंगल कटवा डाला तथा 15 फरवरी 1690 को सिनसिनी पर अधिकार कर लिया। राजाराम का बेटा फतहसिंह और चूड़ामन किसी तरह जान बचाकर भाग गये। इस युद्ध में 900 मुगल सैनिक तथा 1500 जाट सैनिक मारे गये। इसके बाद 21 मई 1691 को बिशनसिंह ने सोघोर गढ़ैया को जा घेरा। उस दिन दुर्ग में धान पहुंचाया जा रहा था। इस कारण दुर्ग के द्वार खुले हुए थे। ठीक उसी समय बिशनसिंह ने वहाँ पहुंचकर दुर्ग को अपने अधिकार में ले लिया। जिसने भी हथियार उठाया, उसे वहीं मार डाला गया। दुर्ग में जीवित बचे 500 जाटों को बंदी बना लिया गया। सिनसिनी की पराजय के बाद जाटों में झगड़ा हुआ और राजाराम के पुत्र फतहसिंह को पराजय का जिम्मेदार ठहराया गया। जाटों ने फतहसिंह के स्थान पर राजाराम के छोटे भाई चूड़ामन को अपना नेता चुन लिया। ई.1704 में चूड़ामन ने सिनसिनी का दुर्ग पुनः जीत लिया किंतु ई.1705 में यह दुर्ग पुनः मुगलों के अधिकार में चला गया।

    सिनसिनी के जाट शासक, अपना सम्बन्ध यदुवंशी राजा मदनपाल से बताते हैं। मदनपाल तजनपाल का तीसरा पुत्र था जो ग्यारहवीं शताब्दी में बयाना का शासक था और बाद में करौली राज्य का संस्थापक था। मदनपाल के वंशज बालचंद की एक स्त्री जाट जाति की थी। इस स्त्री से दो पुत्र हुए जिनमें से एक का नाम विजय तथा दूसरे का नाम सिजय रखा गया। इन दोनों लड़कों को क्षत्रिय न मानकर जाट माना गया। इन दोनों लड़के अपनी जाति सिनसिनवार लिखते थे क्योंकि उनके पैतृक गांव का नाम सिनसिनी था। सिनसिनी डीग से 13 किलोमीटर दूर दक्षिण में है। भरतपुर के जाट शासक अपना सम्बन्ध इन्हीं सिनसिनवारों से मानते हैं।

    चूड़ामन का नेतृत्व

    राजाराम की मृत्यु के बाद चूड़ामन जाटों का नेता बना। ई.1707 में औरंगजेब की मृत्यु हो जाने के बाद चूड़ामन ने अपनी शक्ति बहुत बढ़ा ली और बादशाह जहांदारशाह के हाथियों और खजाने को लूट लिया। उसने थूण दुर्ग में अपनी शक्ति एकत्रित की और शाही खजानों, व्यापारिक कारवों तथा अन्य लोगों को लूटने लगा।

    औरंगजेब की मृत्यु होने पर उसके पुत्रों बहादुर शाह तथा आजमशाह में मुगलिया तख्त पर अधिकार को लेकर झगड़ा हुआ। दोनों पक्ष जाजऊ के मैदान में आमने-सामने लड़कर फैसला करने के लिये आ डटे। चूड़ामन ने भी अपनी सेनाएं, इन दोनों सेनाओं के पास ला टिकाईं। जब दोनों ओर से तोपें आग बरसा रही थीं तब लड़ाई के मैदान में अचानक अराजकता फैल गई और आजमशाह के सेनापति आत्म समर्पण करके बहादुरशाह की ओर जाने लगे। अतः चूड़ामन आजमशाह के शिविर पर टूट पड़ा और उसमें लूटमार करने लगा। थोड़ी देर में बहादुरशाह के तम्बू में आग लग गई और वहाँ भी अफरा-तफरी मच गई। इस पर चूड़ामन आजमशाह के शिविर को छोड़कर बहादुरशाह के शिविर पर टूट पड़ा और पराजित छावनी को बुरी तरह लूटा। इस प्रकार चूड़ामन ने दोनों पक्षों की हार-जीत से कोई मतलब न रखकर, उन्हें निष्पक्ष होकर लूटा। इस युद्ध में बहादुरशाह की जीत हुई। अतः चूड़ामन ने बहादुरशाह से मित्रता कर ली। बादशाह ने चूड़ामन को 1500 जात और 500 सवारों का मनसबदार बनाया। इस प्रकार चूड़ामन लुटेरा न रहकर मुगलों का मनसबदार बन गया।

    ई.1712 में जहांदारशाह मुगलों के तख्त पर बैठा। उसने चूड़ामन की मनसब समाप्त कर दी किंतु जब फर्रूखसीयर सिर उठाने लगा तो जहांदारशाह ने चूड़ामन को बुलाकर फिर से पुराना मनसब सौंप दिया। जब जहांदारशाह और फर्रूखसीयर की सेनाएं लड़ रही थीं तब चूड़ामन, जहांदारशाह की ओर से लड़ने के लिये युद्ध के मैदान में पहुंचा। जैसे ही जहांदारशाह की सेना भारी पड़ने लगी, चूड़ामन और उसके सैनिक लड़ाई करना छोड़कर फर्रूखसीयर का शिविर लूटने में लग गये। इससे फर्रूखसीयर को मौका मिल गया और उसने जहांदारशाह को परास्त कर दिया। जब फर्रूखसीयर दिल्ली के तख्त पर बैठा तब चूड़ामन उसके दरबार में उपस्थित हुआ ओर बादशाह को इक्कीस मोहरें तथा दो घोड़े प्रदान किये। बादशाह फर्रूखसीयर ने उसे राव बहादुर की उपाधि दी, एक हाथी दिया तथा मनसब का दर्जा बढ़ा दिया। साथ ही दिल्ली से चम्बल तक की राहदारी भी उसे सौंपी गई। चूड़ामन के राहदार के पद पर टिप्पणी करते हुए कानूनगो ने लिखा है- 'एक भेड़िये को भेड़ों के झुण्ड का रक्षक बना दिया गया।'

    चूड़ामन ने इतनी कठोरता से राहदारी वसूलनी आरम्भ की कि चारों ओर हा-हाकार मच गया। उसने थूण परगने के प्रत्येक मनसबदार तथा जागीरदार से दो रुपया प्रति मनसबदार तथा जमींदार से नजराना वसूलना आरम्भ कर दिया। अब वह जागीरदारों के मामलों में बेखटके हस्तक्षेप करने लगा। उसकी टोलियों ने मथुरा और सीकरी के परगनों के गांवों को लूटना आरम्भ कर दिया। चूड़ामन ने गुप्त रूप से अस्त्र-शस्त्र बनवाये और गढ़ियों को मजबूत कर लिया।

    सवाई जयसिंह की नियुक्ति

    जब चूड़ामन का आतंक बढ़ गया तब बादशाह फर्रूखसीयर ने जयपुर नरेश सवाई जयसिंह को विपुल धन एवं विशाल सेना देकर चूड़ामन के विरुद्ध भेजा। चूड़ामन बीस वर्ष की खाद्य सामग्री एकत्र करके थूण के दुर्ग में बंद हो गया। जब सवाई जयसिंह, कोटा के महाराव भीमसिंह तथा बूंदी के महाराव बुधसिंह को लेकर थूण के निकट पहुंचा तो चूड़ामन में दुर्ग में स्थित व्यापारियों से कहा कि वे अपना धन एवं सामग्री किले में छोड़कर किले से बाहर चले जायें। यदि युद्ध के बाद वह जीता तो उनके सामान की भरपाई कर देगा। व्यापारी बुरी तरह लुट-पिटकर किले से बाहर निकल गये।

    कच्छवाहा राजा सवाई जयसिंह, हाड़ा राजा महाराव भीमसिंह तथा हाड़ा राजा महाराव बुधसिंह की सेनाएं सात माह तक थूण का दुर्ग घेरे रहीं किंतु चूड़ामन को किले से बाहर नहीं निकाल सकीं। इस पर मुगल साम्राज्य की पूरी ताकत थूण के विरुद्ध झौंक दी गई तथा थूण के चारों ओर का जंगल काटकर साफ कर दिया गया। इस प्रकार दो वर्ष बीत गये और इस अभियान पर मुगल बादशाह के दो करोड़ रुपये खर्च हो गये। अंत में ई.1718 में दोनों पक्षों (जाटों और मुगलों) में समझौता हुआ। इस समझौते से महारा जयसिंह को दूर रखा गया। इस समझौते के अनुसार चूड़ामन को क्षमा कर दिया गया और उसे अनी पत्नी, पुत्र तथा भतीजों सहित मुगल दरबार में उपस्थित होने के लिये कहा गया। डीग तथा थूण के किलों को नष्ट करने की आज्ञा दी गई और चूड़ामन को मुगलों की नौकरी में रख लिया गया।

    जब कुछ समय बाद फर्रूखसीयर को गद्दी से उतारा गया तो चूड़ामन ने सैयद बंधुओं का साथ दिया। जब सैयद बंधुओं ने बादशाह का महल घेर लिया तब किले तथा महल की सारी चाबियां चूड़ामन ने ले लीं ओर बादशाह को अंधा करके कैद में डाल दिया गया। फर्रूखसीयर के बाद रफीउद्दरजात को तख्त पर बैठाया गया। इस पर शहजादे नेकूसीयर ने विद्रोह कर दिया। इस पर चूड़ामन नेकूसीयर के पास गया और उसने गंगाजल हाथ में उठाकर कसम खाई कि नेकूसीयर को सुरक्षित रूप से जयपुर नरेश के राज्य में पहुंचा देगा। नेकूसीयर पचास लाख रुपये तथा अपने भतीजे मिर्जा असगरी को साथ लेकर चूड़ामन के साथ चल पड़ा। चूड़ामन ने नेकूसीयर को तो रफीउद्दरजात को सौंप दिया तथा रुपये अपने पास रख लिये।

    इस प्रकार चूड़ामन ने अन्य कई अवसरों पर भी बहुत से व्यक्तियों के साथ विश्वासघात किया तथा उन्हें लूट-खसोट कर दुर्भाग्य के हवाले कर दिया। उसने जाटों के विख्यात नेता एवं अपने भतीजे बदनसिंह को बंदी बना लिया। चूड़ामन के इस कुकृत्य से समस्त जाट, चूड़ामन से नाराज हो गये और वे चूड़ामन का साथ छोड़कर बदनसिंह के साथ हो लिये। चूड़ामन के लड़के चूड़ामन से भी अधिक धूर्त्त निकले। उसके पुत्र मोहकमसिंह ने अपने किसी सम्बन्धी की काफी बड़ी सम्पत्ति पर अधिकार कर लिया। इस सम्पत्ति में चूड़ामन के दूसरे पुत्र जुलकरण ने भी हिस्सा मांगा। इस बात पर दोनों भाइयों में झगड़ा हो गया तथा दोनों एक दूसरे को मारने के लिये तैयार हो गये। इस पर चूड़ामन ने मोहकमसिंह से कहा कि वह जुलकरण को कुछ सम्पत्ति दे दे। इस पर मोहकमसिंह चूड़ामन को भी मारने के लिये तैयार हो गया। इस पर चूड़ामन ने दुःखी होकर जहर खा लिया।

    मोहकमसिंह का नेतृत्व

    चूड़ामन के मरते ही मोहकमसिंह ने स्वयं को जाटों का नेता घोषित कर दिया और स्वर्गीय ब्रजराज के पुत्र बदनसिंह को बंदी बनाकर खोह नामक स्थान पर कारागार में डाल दिया। बाद में जाटों ने मोहकमसिंह के गुरु माखनदास बैरागी से कहकर बदनसिंह को छुड़वाया। बदनसिंह जयपुर नरेश सवाई जयसिंह के पास चला गया। मोहकमसिंह ने मुगल बादशाह को भी अपने विरुद्ध कर लिया। इससे जयसिंह ने मोहकमसिंह को थूण के किले में जा घेरा। मोहकमसिंह प्रबल शत्रु को सम्मुख आया देखकर स्वयं ही गढ़ी में बारूदी सुरंगें बिछाकर और उनमें पलीता दिखाकर गढ़ से भाग गया। बदनसिंह के माध्यम से जयसिंह को इस बात का पता लग गया। अतः महाराजा सवाई जयसिंह, थूण गढ़ से दूर चला गया और उसके प्राण बच गये।

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