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  • युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 10

     02.06.2020
    युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 10

    महाराजा सूरजमल को राज्य की प्राप्ति (3)


    लूट का सामान

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    जब अहमदशाह अब्दाली अफगानिस्तान को लौटा तो उसके साथ भारत से लूटा गया माल हजारों ऊँटों, हाथियों और बैलों पर लदा था। अब्दाली का अपना सामान 28,000 ऊँटों, खच्चरों, बैलों और गाड़ियों पर लदा था। 200 ऊँट उस सामान से लदे थे जो दिल्ली के मरहूम बादशाह मुहम्मदशाह (द्वितीय) की विधवा स्त्रियों की सम्पत्ति थी। ये विधवाएं भी अब अब्दाली के साथ अफगानिस्तान जा रही थीं। 80,000 घुड़सवार और पैदल उसके अनुयायी थे जिनके पास अपना-अपना लूट का माल था। उसके घुड़सवार पैदल चल रहे थे क्योंकि घोड़ों पर लूट का माल लदा हुआ था। जिस-जिस रास्ते से यह कारवां गुजरता था, उस रास्ते पर एक भी घोड़ा, हाथी, गधा, खच्चर तथा बैल आदि पशु नहीं बचता था, समस्त भारवाहक पशु अब्दाली के आदमियों द्वारा छीन लिये जाते थे और उन पर लूट का माल लाद दिया जाता था।

    भरतपुर की तोपों की संख्या में वृद्धि

    जदुनाथ सरकार ने फॉल ऑफ दी मुगल एम्पायर में लिखा है कि अहमदशाह अब्दाली अपने साथ बड़ी संख्या में तोपें खींचकर लाया था। जब वह अफगानिस्तान को लौटने लगा तो उसने बड़ी संख्या में तोपों को दिल्ली में ही छोड़ दिया क्योंकि उन्हें खींचने वाले पशुओं पर तो अब लूट का माल लदा हुआ था। जब अब्दाली दिल्ली से निकल गया तो राजा सूरजमल उन तोपों को दिल्ली से खींचकर अपने किलों में ले आया। दिल्ली में किसी के पास एक तलवार तक न रही।

    दिल्ली का दुर्भाग्य

    कहने को तो अब भी मुगल बादशाह आलमगीर (द्वितीय) दिल्ली के तख्त पर बैठा था किंतु सच्चाई यह थी कि दिल्ली को पूरी तरह उसके दुर्भाग्य के हवाले कर दिया गया था। अहमदशाह अब्दाली के प्रस्थान के तुरंत बाद दिल्ली में दिमागी बुखार की महामारी फैली। इसी के साथ आंखों में संक्रमण का रोग फैल गया। नवम्बर 1757 में दिल्ली में जोरों को भूकम्प आया जिसके कारण बहुत बड़ी संख्या में घर गिर गये और लोग मर गये। खाने की चीजें बहुत महंगी हो गईं और दवाइयां तो ढूंढने पर भी नहीं मिलती थीं। शहर में लुटेरों और चोरों के झुण्ड आ बसे जो राहगीरों को दिन दहाड़े लूट लेते थे। सदियों से भारत की राजधानी रही दिल्ली, खण्डहरों और शवों की नगरी बनकर रह गई।

    दिल्ली और लाहौर पर मराठों का अधिकार

    अहमदशाह अब्दाली के जाते ही मराठे दिल्ली में आ धमके। जिस नजीब खां को अब्दाली अपने प्रतिनिधि के रूप में छोड़ गया था, उसने मल्हारराव को अपना धर्मपिता कहकर उसके पांव पकड़ लिये। रघुनाथराव ने पंजाब पर चढ़ाई की तथा अप्रेल 1758 में अब्दाली के पुत्र तैमूरशाह को वहाँ से मार भगाया।


    सदाशिव भाऊ से अनबन

    बल्लभगढ़, मथुरा और वृंदावन पर अभियान करके लौट जाने के बाद लगभग हर साल अब्दाली भारत आया किंतु ई.1760 में उसने फिर से दिल्ली का रुख किया। जब मराठों को यह ज्ञात हुआ कि अब्दाली फिर से दिल्ली की ओर आ रहा है तो वे उसका मार्ग रोकने के लिये सदाशिव भाऊ के नेतृत्व में दिल्ली की ओर चल पड़े। वे अपने साथ भारी-भरकम लवाजमा लेकर आये। उनके साथ बड़ी संख्या में उनके परिवारों की स्त्रियां, नृत्यांगनायें एवं भोग-विलास की सामग्री थी। उन्हें विश्वास था कि मराठों के लिये अब्दाली से निबटना बायें हाथ का खेल है। सदाशिव भाऊ तीस साल का अनुभवहीन युवक था। वह पेशवा बाजीराव प्रथम का भतीजा तथा चिम्माजी अप्पा का सिरफिरा और घमण्डी पुत्र था। उसे शत्रु और मित्र की पहचान नहीं थी। फिर भी उसने राजा सूरजमल को मराठों के विरुद्ध अपने साथ लेने की इच्छा व्यक्त की तथा उसे मराठों की तरफ से लड़ने का निमंत्रण भिजवाया। सूरजमल इस शर्त पर मराठों को अपने 10 हजार सैनिकों सहित सहायता देने के लिये तैयार हो गया कि मराठे उसके देश में उपद्रव नहीं करेंगे तथा चौथ वसूली के लिये तकाजे करके उसे तंग नहीं करेंगे। मराठों ने सूरजमल की शर्तें स्वीकार कर लीं। 8 जून 1760 को भाऊ ने मराठा सैनिकों पर, जाटों को सताने या उनके क्षेत्र में लूटपाट करने पर रोक लगा दी। इसके बदले में सूरजमल ने मराठों को एक माह के उपयोग जितनी खाद्य सामग्री प्रदान की।

    आगरा से 20 मील दूर बाणगंगा नदी के तट पर भाऊ का डेरा था। वहीं से उसने सूरजमल को लिखा कि सूरजमल अपनी सेना को लेकर आ जाये। सूरजमल को भाऊ पर विश्वास नहीं हुआ। इस पर मल्हारराव होल्कर तथा सिन्धिया ने सूरजमल की सुरक्षा के लिये शपथपूर्वक वचन दिया। 30 जून 1760 को सूरजमल अपने 10 हजार सैनिक लेकर भाऊ के शिविर में पहुंचा। भाऊ ने स्वयं दो मील आगे आकर सूरजमल का स्वागत किया। भाऊ ने यमुनाजी का जल हाथ में लेकर सूरजमल के प्रति अपनी मित्रता की प्रतिज्ञा दोहराई।

    भाऊ ने सूरजमल की सलाह पर मथुरा में एक युद्ध परिषद आहूत की जिसमें वजीर इमादुलमुल्क को भी बुलाया गया। इस युद्ध परिषद में सबसे सुझाव मांगे गये कि अहमदशाह अब्दाली का सामना किस प्रकार किया जाये।

    राजा सूरजमल ने सदाशिव भाऊ को सलाह दी कि मराठा महिलाएं, अनावश्यक सामान और बड़ी तोपें जो इस लड़ाई में कुछ काम न देंगी, चम्बल के पार ग्वालियर तथा झांसी के किलों में भेज दी जायें और आप स्वयं हल्के शस्त्रों से सुसज्जित रहकर अब्दाली का सामना करें। यदि आप अपनी महिलाओं को इतनी दूर न भेजना चाहें तो भरतपुर राज्य के किसी किले में भिजवा दें। सूरजमल ने यह भी सलाह दी कि अब्दाली से आमने-सामने की लड़ाई करने के स्थान पर छापामार युद्ध किया जाये तथा बरसात तक उसे अटकाये रखा जाये। जब बरसात आयेगी तो अब्दाली हिल भी नहीं पायेगा और संभवतः तंग आकर वह अफगानिस्तान लौट जाये। सूरजमल को विश्वास था कि मराठों को सिक्खों तथा बनारस के हिन्दू राजा से भी सहायता प्राप्त होगा। क्योंकि अब्दाली ने सिक्खों का बहुत नुक्सान किया था। इसी प्रकार बनारस का राजा बलवंतसिंह अवध के नवाब शुजाउद्दौला का शत्रु था। होलकर ने सूरजमल के सुझावों का समर्थन किया किंतु सदाशिव भाऊ अविवेकी व्यक्ति था, उसने सूरजमल के व्यवाहरिक सुझावों को भी मानने से मना कर दिया।

    मराठों और जाटों ने मथुरा से आगे बढ़कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया। दिल्ली हाथ में आते ही भाऊ तोते की तरह आंख बदलने लगा। सूरजमल के लाख मना करने पर भी उसने लाल किले के दीवाने खास की छतों से चांदी के पतरे उतार लिये और नौ लाख रुपयों के सिक्के ढलवा लिये। सूरजमल स्वयं दिल्ली का शासक बनना चाहता था। उसे यह बात बुरी लगी और उसने भाऊ को रोकने का प्रयत्न किया किंतु भाऊ नहीं माना। सूरजमल चाहता था कि इमादुलमुल्क को फिर से दिल्ली का वजीर बनाया जाये किंतु भाऊ ने घोषणा की कि वह नारोशंकर को दिल्ली का वजीर बनायेगा। इससे सूरजमल और इमादुलमुल्क का भाऊ से मोह भंग हो गया।

    महाराजा सूरजमल चाहता था कि दिल्ली के बादशाह आलमगीर (द्वितीय) को मार डाला जाये किंतु आलमगीर, भाऊ को अपना धर्मपिता कहकर उसके पांव पकड़ लेता था। महाराजा सूरजमल आलमगीर से इसलिये नाराज था क्योंकि इस बार अब्दाली को भारत आने का निमंत्रण आलमगीर ने ही भेजा था ताकि सूरजमल को कुचला जा सके। भाऊ का आलमगीर के प्रति अनुराग देखकर सूरजमल नाराज हो गया। सूरजमल चाहता था कि दिल्ली की सुरक्षा का भार सूरजमल पर छोड़ा जाये किंतु भाऊ ने दिल्ली के महलों पर अपनी सेना का पहरा बैठा दिया। इन सब बातों से सूरजमल खिन्न हो गया। उसने भाऊ से कहा कि वह दीवाने आम की चांदी की छत फिर से बनवाये तथा इमादुलमुल्क को दिल्ली का वजीर बनाने की घोषणा करे, अन्यथा भाऊ को सूरजमल की सहायता नहीं मिल सकती।

    इस पर भाऊ ने तैश में आकर जवाब दिया- 'क्या मैं दक्खन से तुम्हारे भरोसे यहाँ आया हूँ। जो मेरी मर्जी होगी, करूंगा। तुम चाहो तो यहाँ रहो, या चाहो तो अपने घर लौट जाओ। अब्दाली से निबटने के बाद मैं तुमसे निपट लूंगा।’

    होलकर तथा सिन्धिया ने सूरजमल की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली थी किंतु वे समझ गये थे कि अब सूरजमल दिल्ली में सुरक्षित नहीं है। इसलिये उन्होंने सूरजमल के सलाहकार रूपराम कटारिया से कहा कि जैसे भी हो, सूरजमल को दिल्ली से निकल जाना चाहिये। रूपराम कटारिया ने यह बात सूरजमल को बताई। सूरजमल उसी दिन मराठों को त्यागकर बल्लभगढ़ के लिये रवाना हो गया। होलकर और सिंधिया ने सूरजमल के निकल भागने की सूचना बहुत देर बाद भाऊ को दी। इस पर भाऊ, सूरजमल से बहुत नाराज हो गया। इमाद-उस-सादात के लेखक का कथन है- 'भाऊ ने सूरजमल से दो करोड़ रुपये मांगे और उसे संदेहजनक पहरे में रख दिया।’ संभवतः सूरजमल को इस पहरे में से निकलने के लिये विशेष प्रबंध करने पड़े।

    सूरजमल द्वारा मराठों का त्याग करते ही मराठों पर विपत्तियां आनी आरम्भ हो गईं। अहमदशाह अब्दाली की सेनाओं को रूहेलों के राज्य से अनाज की आपूर्ति हो रही थी तथा मराठों को सूरजमल के राज्य से अनाज मिल रहा था किंतु सूरजमल के चले जाने से दिल्ली में अनाज की कमी होने लगी और अनाज के भाव अचानक बढ़ गये। दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों को विगत कुछ वर्षों में इतना अधिक रौंदा गया था कि वहाँ से अनाज प्राप्त करना सम्भव नहीं रह गया था। भाऊ के बुरे व्यवहार के उपरांत भी सूरजमल की सहानुभूति मराठों से बनी रही।

    अहमदशाह अब्दाली ने सूरजमल से समझौता करने का प्रयास किया। वह चाहता था कि सूरजमल, भावी युद्ध से तटस्थ रहने की घोषणा कर दे ताकि मराठों को पूरी तरह से अकेला बनाया जा सके किंतु सूरजमल ने अब्दाली से किसी तरह का समझौता करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया।

    जैसे-जैसे अब्दाली की सेनाएं दिल्ली के निकट आती गईं, वैसे-वैसे दिल्ली, आगरा और अन्य क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपने परिवारों को लेकर भरतपुर राज्य में शरण लेने के लिये आने लगे। सूरजमल ने इन शरणार्थियों के लिये अपने राज्य के दरवाजे खोल दिये। यहाँ तक कि घायल मराठा सरदार जनकोजी सिंधिया और उसका परिवार भी कुम्हेर आ गया। मुगल बादशाह के वजीर इमादुलमुल्क ने भी अपना परिवार सूरजमल के संरक्षण में भेज दिया। उदारमना सूरजमल ने अपने प्रबल शत्रुओं और उनके परिवारों को दिल खोलकर शरण दी। दूसरी तरफ रूहेले, पहले की ही तरह अहमदशाह अब्दाली के साथ हो गये। अवध का नवाब शुजाउद्दौला भी अब्दाली की तरफ हो गया।

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