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  • युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 9

     02.06.2020
    युग निर्माता महाराजा सूरजमल- 9

    महाराजा सूरजमल को राज्य की प्राप्ति (2)


    चौमुहा की लड़ाई

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    इसके बाद अहमदशाह अब्दाली ने मथुरा पर आक्रमण किया। मथुरा से आठ मील पहले चौमुहा में जवाहरसिंह ने दस हजार जाट सैनिकों को लेकर अब्दाली का मार्ग रोका। नौ घण्टे तक दोनों पक्षों में भीषण लड़ाई हुई जिसमें जाट सैनिक परास्त हो गये। जाटों को भारी क्षति उठानी पड़ी। इसके बाद अब्दाली की सेना ने मथुरा में प्रवेश किया। 1 मार्च 1757 को अब्दाली मथुरा में घुसा, उस दिन होली के त्यौहार को बीते हुए दो ही दिन हुए थे। अहमदशाह के सिपाहियों ने माताओं की छाती से दूध पीते बच्चों को छीनकर मार डाला। हिन्दू सन्यासियों के गले काटकर उनके साथ गौओं के कटे हुए गले बांध दिये। मथुरा के प्रत्येक स्त्री-पुरुष को नंगा किया गया। जो पुरुष मुसलमान निकले उन्हें छोड़ दिया गया, शेष को मार दिया गया। जो औरतें मुसलमान थीं उनकी इज्जत लूट कर उन्हें जीवित छोड़ दिया गया तथा हिन्दू औरतों को इज्जत लूटकर मार दिया गया।

    मथुरा में विध्वंस मचाकर 6 मार्च 1757 को अब्दाली ने वृंदावन की ओर रुख किया। वहाँ भी वही सब दोहराया गया जो बल्लभगढ़ और मथुरा में किया गया था। चारों ओर मनुष्यों के शवों के ढेर लग गये।

    यह एक आश्चर्य की बात लग सकती है कि जिस समय अहमदशाह बल्लभगढ़, मथुरा और वृदावन में कत्ले आम मचा रहा था, सूरजमल डीग में बैठा था किंतु इसमें सूरजमल की सोची-समझी रणनीति काम कर रही थी। वह जानता था कि किले से बाहर निकलकर वह अफगानिस्तान से आई सेना का मुकाबला नहीं कर सकेगा किंतु यदि अफगानिस्तान की सेना डीग, कुम्हेर अथवा भरतपुर पर आक्रमण करती है तो उसे इन तीन दुर्गों के मकड़जाल में फांसकर मारा जा सकता है।

    सर्वाधिक आश्चर्य की बात तो यह थी कि जो मराठे हिन्दू पदपादशाही स्थापित करने का स्वप्न देखते न थकते थे, उन्होंने इस विपत्ति में स्वयं को उत्तर भारत से दूर रखा। भगवान कृष्ण की जन्मस्थली और लीला स्थली बुरी तरह नष्ट-भ्रष्ट की गईं किंतु मराठों की धर्म के प्रति निष्ठा नहीं जाग सकी।

    मथुरा और वृंदावन में हिन्दुओं का इतना रक्त बहा कि यमुना का पानी लाल हो गया। अब्दाली के आदमियों को वही पानी पीना पड़ा। इससे फौज में हैजा फैल गया और सौ-डेढ़ सौ आदमी प्रतिदिन मरने लगे। अनाज की कमी के कारण सेना घोड़ों का मांस खाने लगी। इससे घोड़ों की कमी होने लगी। अब्दाली ने इन बातों की परवाह किये बिना, 21 मार्च 1757 को आगरा पर आक्रमण किया। उसे ज्ञात हुआ था कि दिल्ली से बहुत से व्यापारी तथा अमीर, अपना धन लेकर आगरा भाग आये हैं। इसलिये अब्दाली जितनी जल्दी हो सके आगरा को लूटना चाहता था। उसके पंद्रह हजार घुड़सवार सैनिक आगरा में घुसकर लूट मचाने लगे। ठीक इसी समय सेना में हैजे का उग्र प्रकोप हुआ और अब्दाली के सैनिक अपने घरों को लौटने के लिये विद्रोह करने पर उतारू हो गये।

    इस पर अब्दाली ने अपना अभियान समाप्त कर दिया और दिल्ली के बादशाह आलमगीर द्वितीय को संदेश भिजवाया कि हम अपना अभियान समाप्त करके दिल्ली लौट रहे हैं। अब्दाली ने सूरजमल को भी एक चिट्ठी भिजवाई कि यदि वह कर नहीं देगा तो उसके परिणाम बहुत भयंकर होंगे। अब्दाली ने एक और पत्र सूरजमल को लिखकर धमकाया कि यदि वह रुपये नहीं देगा तो भरतपुर, डीग तथा कुम्हेर के किले धरती में मिला दिये जायेंगे। इस पर सूरजमल ने अहमदशाह अब्दाली को अपना उत्तर भिजवाया-

    हिन्दुस्तान के साम्राज्य में मेरी कोई महत्त्वपूर्ण स्थिति नहीं है। मैं रेगिस्तान में रहने वाला एक जमींदार हूँ और मेरी कोई कीमत नहीं है, इसलिये इस काल के किसी भी बादशाह ने मेरे मामलों में दखल देना अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं समझा। अब हुजूर जैसे एक शक्तिशाली बादशाह ने युद्ध के मैदान में मुझसे मिलने और मुकाबला करने का दृढ़ निश्चय किया है और इस नगण्य से व्यक्ति के विरुद्ध अपनी सेनाएं ला खड़ी की हैं। खाली यह कार्यवाही ही बादशाह की शान और बड़प्पन के लिये शर्मनाक होगी। इससे मेरी स्थिति ऊँची होगी तथा मुझ जैसे तुच्छ व्यक्ति के लिये यह अभिमान की वस्तु होगी। दुनिया कहेगी कि ईरान और तूरान के शाह ने बहुत ही ज्यादा डरकर, अपनी सेनाएं लेकर एक कंगाल बंजारे पर चढ़ाई कर दी। केवल ये शब्द ही राजमुकुट प्रदान करने वाले हुजूर के लिये कितनी शर्म की चीज होगी। फिर अंतिम परिणाम भी अनिश्चितता से पूरी तरह रहित नहीं है। यदि इतनी शक्ति और साज-सामान लेकर आप मुझ जैसे कमजोर को बरबाद कर देने में सफल भी हो जाएँ तो उससे आपको क्या यश मिलेगा ? मेरे बारे में लोग केवल यही कहेंगे, उस बेचारे की ताकत और हैसियत ही कितनी सी थी ! परंतु भगवान की इच्छा से, जो किसी को भी मालूम नहीं है, मामला कहीं उलट गया तो उसका परिणाम क्या होगा ? यह सारी शक्ति और प्रभुत्व, जो हुजूर के बहादुर सिपाहियों ने ग्यारह बरसों में जुटाया है, पल भर में गायब हो जायेगा।

    यह अचरज की बात है कि इतने बड़े दिलवाले हुजूर ने इस छोटी सी बात पर विचार नहीं किया और इतनी सारी भीड़भाड़ और इतने बड़े लाव-लश्कर के साथ इस सीधे-सादे तुच्छ से अभियान पर स्वयं आने का कष्ट उठाया। जहाँ तक मुझे और मेरे देश को कत्ल करने और बरबाद कर देने की धमकी भरा प्रचण्ड आदेश देने का प्रश्न है, वीरों को इस बात को कोई भय नहीं हुआ करता। सब को ज्ञात है कि कोई भी समझदार व्यक्ति इस क्षण-भंगुर जीवन पर तनिक भी भरोसा नहीं करता। रही मेरी बात, मैं जीवन के पचास सोपानों को पहले ही पार कर चुका हूँ और अभी कितने बाकी हैं, यह मुझे कुछ पता नहीं। मेरे लिए इससे बढ़कर वरदान और कुछ नहीं हो सकता कि मैं बलिदान के अमृत का पान करूँ। यह देर-सबेर योद्धाओं के अखाड़े में और युद्ध के मैदान में वीर सैनिकों के साथ करना ही पड़ेगा। और काल-ग्रन्थ के पृष्ठों पर अपना और अपने पूर्वजों का नाम छोड़ जाऊँ, जिससे लोग याद करें कि एक बेजोर किसान ने एक ऐसे महान और शक्तिशाली बादशाह से बराबरी का दम भरा, जिसने बड़े-बड़े राजाओं को जीतकर अपना दास बना लिया था और वह किसान लड़ते-लड़ते वीर गति को प्राप्त हुआ।

    ऐसा ही शुभ संकल्प मेरे निष्ठावान अनुयायियों और साथियों के हृदय में भी विद्यमान है। यदि मैं चाहूँ भी कि आपके दैवी दरबार की देहरी पर उपस्थित होऊँ, तो भी मेरे मित्रों की प्रतिष्ठा मुझे ऐसा करने नहीं देगी। ऐसी दशा में यदि न्याय के निर्झर हुजूर मुझे, जो कि तिनके सा कमजोर है, क्षमा करें और अपना ध्यान किन्हीं और महत्त्वपूर्ण अभियानों पर लगायें तो उससे आपकी प्रतिष्ठा या कीर्ति को कोई हानि नहीं पहुंचेगी। मेरे इन तीन किलों (भरतपुर, डीग और कुम्हेर) के बारे में जिन पर हुजूर को रोष है और जिन्हें हुजूर के सरदारों ने मकड़ी के जाले सा कमजोर बताया है, सचाई की परख असली लड़ाई के बाद ही हो पायेगी। भगवान ने चाहा तो वे सिकन्दर के गढ़ जैसे ही अजेय रहेंगे।

    कुदरतुल्लाह नामक एक लेखक ने अपने ग्रंथ जाम-ए-जहान-नामा में प्रसंग लिखा है जिसमें अहमदशाह अब्दाली के साथ सूरजमल से चली समझौता वार्त्ता की चर्चा संक्षेप में की गई है-

    धन से भरपूर राजकोष, सुदृढ़ दुर्गों, बहुत बड़ी सेना और प्रचुर मात्रा में युद्ध सामग्री के कारण सूरजमल ने अपना स्थान नहीं छोड़ा और वह युद्ध की तैयारी करता रहा। उसने अहमदशाह के दूतों से कहा- अभी तक आप लोग भारत को नहीं जीत पाये हैं। यदि आपने एक अनुभव शून्य बालक इमादुलमुल्क गाजीउद्दीन को जिसका कि दिल्ली पर अधिकार था, अपने अधीन कर लिया, तो इसमें घमण्ड की क्या बात है ! यदि आपमें सचमुच कुछ दम है, तो मुझ पर चढ़ाई करने में इतनी देर किस लिये ? शाह जितना समझौते का प्रयास करता गया, उतना ही उस जाट का अभिमान और धृष्टता बढ़ती गई। उसने कहा, मैंने इन किलों पर बड़ा रुपया लगाया है। यदि शाह मुझसे लड़े तो यह उसकी मुझ पर कृपा होगी क्योंकि तब दुनिया भविष्य में यह याद रख सकेगी कि एक बादशाह बाहर से आया था और उसने दिल्ली जीत ली थी, पर वह एक मामूली से जमींदार के मुकाबले में लाचार हो गया। जाटों के किलों की मजबूती से डरका शाह वापस चला गया। दिल्ली में बादशाह मुहम्मदशाह की बेटी से अपना और बादशाह आलमगीर की बेटी से अपने पुत्र का विवाह करके और नजीब खां रूहेला को भारत में अपना सर्वोच्च प्रतिनिधि नियुक्त करके वह कान्धार लौट गया।

    जब अहमदशाह आगरा से दिल्ली को लौट रहा था, तब पूरे मार्ग के दौरान सूरजमल के आदमी उसे समझौता वार्त्ता में उलझाये रहे। अंत में उसे दस लाख रुपये देने का आश्वासन दिया गया। जब अहमदशाह दिल्ली पहुंच गया तब सूरजमल को विश्वास हो गया कि अब यह अफगानिस्तान लौट जायेगा, इसलिये समस्त प्रकार की वार्त्ता बंद कर दी गई तथा उसे एक भी रुपया नहीं दिया गया। इस प्रकार अहमदशाह अब्दाली को भरतपुर, डीग और कुम्हेर को लूटे बिना ही तथा भरतपुर से कोई रुपया लिये बिना ही, अफगानिस्तान लौट जाना पड़ा।

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