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  • वरुण देव को समर्पित फाउण्टेन ऑफ नेप्च्यून, फ्लोरेंस (फोंटाना डेल नेट्टूनो)

     15.08.2019
    वरुण देव को समर्पित फाउण्टेन ऑफ नेप्च्यून,  फ्लोरेंस (फोंटाना डेल नेट्टूनो)

    वरुण देव को समर्पित फाउण्टेन ऑफ नेप्च्यून


    फ्लोरेंस (फोंटाना डेल नेट्टूनो)


    प्राचीन यूनानी धर्म में नेपच्यून को शुद्ध जल एवं समुद्रों का देवता माना जाता था। यह यूनानी देवता पोजीडोन का सहयोगी देवता है तथा इसे जूपीटर एवं प्लूटो का भाई माना जाता है। प्राचीन रोमन-वासी नेपच्यून को लैटिन भाषा में नेप्ट्यूनस कहते थे तथा जल एवं झरनों के देवता के रूप में उनकी पूजा करते थे। नेपच्यून स्वर्ग, धरती तथा पाताल लोक का देवता था। इसे घोड़ों के देवता के रूप में भी स्वीकार किया गया।

    नेपच्यून देवता की पत्नी का नाम सेलेसिया था। प्राचीन यूनानी धर्म में ओसेनस को भी समुद्र और नदियों का देवता माना जाता था। रोम वासियों ने उसे भी उसी रूप में स्वीकार किया। इटली की राजधानी रोम तथा अन्य नगरों में नेपच्यून तथा ओसेनस दोनों देवताओं के नाम वाले झरने एवं फव्वारे मिलते हैं जिनमें नेपच्यूटन अथवा ओसेनस देवताओं के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी लगी हुई हैं।

    प्राचीन यूनानी एवं प्राचीन रोमन देवी-देवताओं की अधिकांश प्रतिमाएं निर्वस्त्र हैं। कुछ मूर्तियों की कमर अथवा वक्ष पर एक कपड़ा उत्कीर्ण किया जाता है। यही कारण है कि इटली की राजधानी रोम एवं अन्य नगरों में चौराहों, मुख्य गलियों एवं झरनों तथा फव्वारों आदि पर संगमरमर एवं कांसे की विशाल निर्वस्त्र प्रतिमाएं दिखाई देती हैं।

    यूनानी एवं रोमन देवी-देवता वस्तुतः भारतीय वैदिक देवी-देवताओं के ही बदले हुए नाम हैं। वेदों में नेपच्यून को वरुण, जूपीटर को बृहस्पति तथा प्लूटो को यम कहा गया है जबकि ओसेनस ऋग्वेद में वर्णित वृत्र का बदला हुआ रूप है। वेदों में वृत्र को असुर माना गया है जिसने समुद्रों के जल को बांध लिया था और इंन्द्र ने वृत्र का वध करके समुद्रों के जल को मुक्त करवाया।

    रोम का मुख्य फव्वारा ओसेनस अर्थात् वृत्र को एवं फ्लोरेंस का मुख्य फव्वारा नेपच्यून अर्थात् वरुण देवता को समर्पित है। वेदों में वरुण भी पहले असुर था, बाद में उसे देवताओं में सम्मिलित किया गया। फ्लोरंस में नेपच्यून फाउंटेन के नाम से कई फव्वारे हैं जिनमें से पियाजा डेला सिगनोरिया अर्थात् सिगनोरिया चौक पर स्थित नेपच्यून फाउंटेन प्रमुख है।

    यह फव्वारा पलाज्जो वेचियो के सामने बना हुआ है। इस फव्वारे की मूर्तियों के निर्माण में संगमरमर तथा कांसे का प्रयोग हुआ है।यह फव्वारा मूलतः ई.1565 में बना था। इसका डिजाइन बेक्कियो बैण्डिनेली नामक शिल्पकार ने तैयार किया था। इस फव्वारे की मूर्तियां बर्टोलोमियो नामक मूर्तिकार ने बनाई थीं। कांसे के बने हुए समुद्री घोड़ों का निर्माण जियोवानी डा बोलोग्ना ने किया था।

    ई.1559 में फ्लोरेंस नगर में पेयजल की आपूर्ति के लिए एक नवीन नहर का निर्माण किया गया। तब फ्लोरेंस के शासक कोसीमो प्रथम मेडिसी ने इस फव्वारे को डिजाइन करने के लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन किया। उस समय रोम साम्राज्य का विस्तार लगभग सम्पूर्ण भू-मध्य सागरीय क्षेत्र पर था। इसलिए उस काल में रोम एवं फ्लोरेंस में बने अधिकांश फव्वारों में समुद्रों के देवता नेपच्यून एवं उससे सम्बद्ध देवी-देवताओं की प्रतिमाएं लगती थीं। जो रोमन साम्राज्य के भूमध्यसागर पर अधिकार होने का प्रतीक थीं।

    नेपच्यून को सामान्यतः रथ पर आरूढ़ दिखाया जाता था जिसे समुद्री घोड़ों द्वारा खींचा जाता था। फ्लोरेंस में हुई प्रतियोगिता में बेक्कियो बैण्डिनेली का डिजाइन चुना गया किंतु काम पूरा होने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद शिल्पकार अम्मान्नाटी को काम पूरा करने के लिए नियुक्त किया गया। इस फव्वारे में लगे नेपट्यून देवता का चेहरा, फ्लोरेंस के ग्राण्ड ड्यूक कोसीमो के चेहरे की अनुकृति है। यह प्रतिमा लगभग 13 फुट ऊंची है। इसे अपून मार्बल से बनाया गया है। यह मार्बल मकराना के मार्बल से भी अधिक सफेद है।

    यह फव्वारा ई.1565 में बनकर तैयार हुआ ताकि फ्लोरेंस के तत्कालीन शासक फ्रैंसिस्को डे मेडिसी प्रथम तथा ऑस्ट्रिया की राजकुमारी ग्राण्ड ड्यूश जोहान्ना के विवाह को यादगार बनाया जा सके। फ्लोरेंसवासियों को यह फव्वारा पसंद नहीं आया और उन्होंने फव्वारे में लगी नेपट्यून की मूर्ति को ‘विशाल सफेद दैत्य’ कहकर नकार दिया। नेपच्यून की प्रतिमा के चारों ओर कांसे की देव-प्रतिमाएं लगाई गई हैं जिन्हें उनके गहरे हरे रंग के कारण सहज ही पहचाना जा सकता है।

    फव्वारे के निकट अन्य देवी-देवताओं के साथ-साथ नेप्ट्यून की पत्नी देवी सैयला तथा चैरीब्डिस की प्रतिमाएं बनाई गई हैं। ये सभी प्रतिमाएं निर्वस्त्र हैं। क्योंकि प्राचीन यूनानी एवं रोमन देवता इसी प्रकार बिना कपड़ों के ही बनाए जाते थे। फव्वारे के चारों ओर लगी तथा उसके निकट चौक में यत्र-तत्र बनी हुई संगमरमर एवं कांसे की प्रतिमाओं के निर्माण में लगभग 10 साल लगे।

    फव्वारे के चारों ओर अष्टकोणीय कुण्ड बनाया गया है उसके ठीक मध्य में नेप्ट्यून का प्लेटफॉर्म खड़ा किया गया है। इस चौक में खड़ी समस्त प्रतिमाएं ई.1574 तक बनकर तैयार हुईं। ई.1800 में उन प्रतिमाओं की अनुकृतियां तैयार करवाई गईं तथा मूल प्रतिमाओं को राष्ट्रीय संग्रहालय में भेज दिया गया। विगत चार सौ सालों में इस फव्वारे को अनेक प्रकार के नुक्सान सहन करने पड़े।

    कुछ समय बाद फव्वारा उजड़ गया तथा इसका कुण्ड धोबियों द्वारा कपड़े धोने के काम में लिया जाने लगा। 25 जनवरी 1580 को इस फव्वारे में वाण्डाल आक्रांताओं द्वारा तोड़ फोड़ की गई। इस फव्वारे में एक सैटिर की प्रतिमा लगी हुई थी जिसे ई.1830 के कार्निवल के दौरान किसी ने चुरा लिया। जंगल के देवता को सैटिर कहते हैं।

    यूनान में इसका अंकन एक ऐसे मनुष्य की तरह किया जाता था जिसके कान तथा पूंछ घोड़े की तरह हों। रोमन सैटिर में इसका अंकन ऐसे मनुष्य की तरह किया जाता था जिसके कान, पूंछ, पैर तथा सींग बकरी के जैसे होते थे। कुछ देशों में इस देवता का अंकन पंख वाले मनुष्य के रूप में किया जाता था। ई.1848 में इस फव्वारे पर बमों से हमला किया गया। सरकार द्वारा इसे बनाया जाता था तथा उपद्रवी तत्वों द्वारा इसे तोड़ दिया जाता था। इसका मुख्य कारण यह प्रतीत होता है कि इस काल में ईसाई संघ के कुछ पदाधिकारी नहीं चाहते थे कि प्राचीन रोमन धर्म के देवी-देवताओं की प्रतिमाएं लोगों को दिखाई दें तथा उनमें अपने पुराने धर्म के प्रति आस्था का उदय हो।

    फिर भी सरकार समय-समय पर इस फव्वारे को कलाकृति एवं फ्लोरेंस शहर की पहचान के रूप में इसका जीर्णोद्धार करवाती रही। 4 अगस्त 2005 की रात्रि में कुछ गुण्डों ने फव्वारे पर हमला किया। तीन लोग नेप्ट्यून देवता की प्रतिमा पर चढ़ गए और उन्होंने प्रतिमा का हाथ एवं त्रिशूल तोड़ दिया। वर्ष 2007 में इस प्रतिमा की मरम्मत की गई। वर्ष 2007 में एक बार पुनः चार लड़कों ने इस फव्वारे को नुक्सान पहुंचाया।

    इटली में लगभग एक दर्जन नूप्ट्यून फाउण्टेन हैं। फ्लोरेंस शहर के बोबोली गार्डन्स में पलाजो पित्ती के पीछे भी एक नेप्ट्यून फाउण्टेन है। इस फव्वारे की प्रतिमाएं भी बोलोग्ना ने बनाई थीं। इस फव्वारे को देखने के लिए संसार भर से आए पर्यटकों की इतनी भीड़ रहती है कि इसका चित्र उतारना भी आसान नहीं है। आइए आप भी इस फव्वारे के अवलोकन का आनंद लीजिए।

    उन्हीं दिनों जियोवान्नी एंजिलो मोण्टोर्सोली ने इटली के सिसली राज्य में स्थित मेसीना शहर में ऐसा ही फव्वारा बनाया। ई.1878 में रोम में भी नेप्ट्यून फाउण्टेन बनाया गया जिसमें नेप्ट्यून को एक ऑक्टोपस से लड़ते हुए दिखाया गया है।


    डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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