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  • अध्याय-3 : अखिल भारतीय संघ के प्रति राजपूताना के सक्षम राज्यों की प्रतिक्रया

     06.12.2017
    अध्याय-3 : अखिल भारतीय संघ के प्रति राजपूताना के सक्षम राज्यों की प्रतिक्रया

    अध्याय-3


    अखिल भारतीय संघ के प्रति सक्षम राज्यों की प्रतिक्रया

    अब तक मैं इस निश्चय पर पहुँचा हूँ कि जोधपुर को संघ में सम्मिलित होने में कोई संकोच नहीं है........अगर संघ से यह तात्पर्य है कि इस राज्य में कम से कम ब्रिटिश भारत के प्रांतों की तरह उचित शासन हो तो मैं तुलना और कसौटी से भयभीत नहीं हूँ। - महाराजा उम्मेदसिंह।

    अंग्रेजी शासनकाल में भारत दो भागों में विभक्त हो गया। पहला भाग प्रांतों के रूप में था तथा ब्रिटिश भारत कहलाता था जबकि दूसरा भाग देशी राज्यों के रूप में था और रियासती भारत कहलाता था। ब्रिटिश भारत 11 प्रांतों से मिलकर बना था जबकि देशी राज्यों की संख्या 500 से 700 के बीच में घटती बढ़ती रहती थी। ब्रिटिश ताज ने इन दोनों भागों पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित करने के लिये दो प्रारूप अपनाये। उसने ब्रिटिश भारत पर सम्प्रभुता (Sovereignty) तथा रियासती भारत पर परमोच्चता (Paramountcy) स्थापित की। ब्रिटिश भारत पर स्थापित की गयी सम्प्रभुता के कारण ही ब्रिटिश शक्ति को भारत के देशी राज्यों पर परमोच्चता लादने का अवसर प्राप्त हुआ था।

    इन दोनों भागों में रहने वाली जनसंख्या में किसी तरह का सांस्कृतिक भेद नहीं था। दोनों ही भाग एक समान रूप से आक्रांताओं के अत्याचारों से पीड़ित होते रहे थे। यहाँ तक कि दोनों ही भागों में अंग्रेजी शासन का शोषण चक्र भी एक जैसा ही चला था। राज्यों एवं केंद्रीय सरकार के मध्य राजनीतिक विभाग के माध्यम से सम्पर्क था। वायसराय इस विभाग का प्रमुख था। केन्द्र सरकार का कोई भी अन्य विभाग राजनीतिक विभाग की सहमति के बिना, राज्यों से किसी तरह का व्यवहार नहीं कर सकता था।

    भारतीय संघ की अवधारणा का विकास

    ई.1904 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 20वें सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण में सर हेनरी कॉटन ने पहली बार कांग्रेस के मंच से संघीय विचार को स्पर्श किया। कॉटन ने भारतीय संघ की स्थापना को भारतीय देशभक्तों का आदर्श बताते हुए कहा कि 'यूनाईटेड स्टेट्स ऑफ इण्डिया' नामक एक ऐसे संघ की स्थापना हो जो स्वतंत्र और विलग राज्यों का, स्वायत्तशासी उपनिवेशों के साथ मैत्रीपूर्ण स्तर पर गठित संघ (Federation) हो और जो ब्रिटेन की छत्रछाया से परस्पर संयुक्त हो। 1914 में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने इस प्रकार के संयुक्तिकरण की साध्यता को अभिज्ञात किया। विशेष रूप से एक ऐसे तंत्र को विकसित करने की योजना जिसके द्वारा आंग्ल भारत तथा राजसी भारत के बीच सतत एवं सहज सहकारिता स्थापित हो सके जो स्वराज्य प्राप्त करने के लिये नितांत अनिवार्य थी।

    बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने 1914 में वायसराय के समक्ष एक मसविदा प्रस्तुत किया जिसमें सुझाव था कि समस्त देशी राज्यों का प्रतिनिधान करने वाले एक संघीय मंडल का क्रमशः विकास किया जा सकता है तथा यदि आवश्यक हो तो इस मंडल में आंग्ल-भारतीय प्रांतों का भी तत्सम्बन्धी राज्यपालों तथा उपराज्यपालों द्वारा प्रतिनिधान किया जा सकता है। महाराजा के इस सुझाव की चारों ओर प्रशंसा हुई। लगता है कि विदेशी शासकों, भारतीय नेताओं तथा आमजन की सहानुभूति बटोरने के उद्देश्य से ही महाराजा ने यह सुझाव दिया था क्योंकि आगे चलकर जब इसके क्रियान्वयन का वास्तविक अवसर आया तो महाराजा गंगासिंह संघ निर्माण के कार्य के सबसे बड़े विरोधी सिद्ध हुए। महाराजा गंगासिंह की संघ के प्रति अवधारणा को स्पष्टतः दो भागों में बांटा जा सकता है। पहले हिस्से में वे 1914 से लेकर 1930 (प्रथम गोलमेज सम्मेलन) तक संघ के लिये आवाज उठाते हैं तथा दूसरे हिस्से में वे गोलमेज सम्मेलन के बाद इसके घोर विरोधी हो जाते हैं। 1919 में माण्टेग्यू-चैम्सफोर्ड रिपोर्ट में कहा गया कि केंद्र सरकार भारतीय राज्यों के साथ एक संघ में प्रवेश कर सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि केंद्र सरकार भारतीय राज्यों के साथ तो संघ में प्रवेश कर सकती है किंतु वह ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के साथ इस तरह के सम्बन्ध नहीं बना सकती क्योंकि भारतीय प्रांत तो केंद्र सरकार के ही अभिकरण हैं।

    प्रथम गोलमेज सम्मेलन

    31 अक्टूबर 1929 को लॉर्ड इरविन ने घोषणा की कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद शीघ्र ही ब्रिटिश सरकार एक गोलमेज सम्मेलन का आयोजन करेगी जिसमें ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों के प्रतिनिधि ब्रिटिश सरकार से मिलेंगे और भारत के लिये नवीन संविधान के सिद्धांतों पर विचार करेंगे। इस घोषणा से यह पूर्णतः स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिश सरकार भारतीय रियासतों को ब्रिटिश प्रांतों के साथ एक समान राजनीतिक व्यवस्था में लाने को उत्सुक थी। प्रत्येक पक्ष द्वारा देशी राज्यों की ब्रिटिश प्रांतों के साथ एकता को प्रसन्नतादायी संवैधानिक प्रगति के रूप में पहचाना गया किंतु ब्रिटिश सरकार, ब्रिटिश प्रांतों के साथ भारतीय रियासतों की एकता संवैधानिक प्रगति की आवश्यकताओं के लिये नहीं करना चाहती थी अपितु भारत में तेजी से बढ़ रहे राष्ट्रवाद को संतुलित करने के लिये ब्रिटिश भारत के साथ अवरोधक भार बांधना चाहती थी। देशी रियासतें ब्रिटिश भारत की तुलना में अधिक संकीर्ण तथा ब्रिटिश सरकार के प्रति अधिक स्वामिभक्त थीं। यह भी स्पष्ट था कि ब्रिटिश पक्ष के द्वारा संघीय योजना को समर्थन दिये जाने का कारण ब्रिटिश भारत में खतरनाक प्रजातांत्रिक तत्वों के विकास के विरुद्ध संघर्ष करने के लिये विशुद्ध रूढ़िवाद को पनपाना था। भारत सरकार अधिनियम 1935 में किये गये कई प्रावधानों से भी यह बात स्पष्ट होती है।

    लॉर्ड इरविन की घोषणा के परिप्रेक्ष्य में ई.1930 में ब्रिटिश सरकार ने लन्दन में पहला गोलमेज सम्मेलन बुलाया। 12 नवम्बर 1930 को ब्रिटिश सम्राट ने इसका उद्घाटन किया। सम्मेलन की वास्तविक कार्यवाही 17 नवम्बर से आरंभ हुई। सम्मेलन का सभापतित्व इंगलैण्ड के प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनल्ड ने किया। सम्मेलन में कुल 89 प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिनमें से 16 प्रतिनिधि भारत की देशी रियासतों से तथा 57 प्रतिनिधि ब्रिटिश भारत से थे जिन्हें गवर्नर जनरल द्वारा मनोनीत किया गया था। शेष 16 प्रतिनिधि ब्रिटिश सरकार तथा इंगलैण्ड के दोनों सदनों में विपक्ष के सदस्य थे। भारतीय प्रतिनिधियों में हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, हरिजन, व्यापारी, जमींदार, श्रमिक आदि समस्त वर्गों का प्रतिनिधित्व था किंतु भारत के सर्वप्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस ने इसमें भाग नहीं लिया क्योंकि कांग्रेस 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित कर चुकी थी इसलिये वह ब्रिटिश सरकार द्वारा बुलाये गये ऐसे किसी भी सम्मेलन में भाग कैसे ले सकती थी जिसमें केवल औपनिवेशिक राज्य की बात की जाने वाली हो!

    सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रमुख नेताओं में सर तेजबहादुर सप्रू, एम. ए. जयकर, श्रीनिवास शास्त्री, सी. वाई.चिंतामणि, मुहम्मद अली जिन्ना तथा बी. आर. अम्बेडकर थे। भारतीय रियासतों से 16 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए जिनमें बीकानेर नरेश गंगासिंह तथा अलवर नरेश जयसिंह के साथ-साथ धौलपुर, पटियाला, बड़ौदा, कश्मीर, इंदौर, रीवा, नवानगर, कोड़िया, सांगली तथा सारिली के राजा, भोपाल के नवाब तथा हैदराबाद, ग्वालिअर व मैसूर राज्यों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। सम्मेलन 19 जनवरी 1931 तक चला।

    सम्मेलन में सर तेज बहादुर सप्रू ने भारतीय संघ के निर्माण का प्रस्ताव किया। उन्होंने कहा कि राजा लोग पहले देशभक्त हैं और बाद में राजा। सप्रू ने राजाओं से अनुरोध किया कि वे एक ऐसे संयुक्त भारत की रचना करने के लिये प्रस्तुत हो जायें जिसका प्रत्येक भाग आत्मशासित हो, जो अपनी सीमाओं के भीतर निरपेक्ष स्वतंत्रता का उपभोग करता हो, जो शेष भाग के साथ यथोचित सम्बन्धों से विनियमित हो। सप्रू ने कहा कि मैं संघीय प्रकार वाली सरकार में अत्यंत मजबूती से विश्वास करता हूँ। मेरा विश्वास है कि इसमें भारत की समस्याओं का हल तथा भारत की मुक्ति विद्यमान है। उन्होंने ब्रिटिश भारत के साथ भारतीय राज्यों के सहबंधन की वकालात करते हुए कहा कि इससे भारत की एकता तथा स्थायित्व की प्राप्ति होगी। रक्षा के विषय में उन्होंने कहा कि ब्रिटिश भारत में चाहा जा रहा व्यावहारिक अनुभव देशी राज्यों से प्राप्त हो सकेगा।

    मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि मुहम्मद अली जिन्ना तथा मुहम्मद शफी ने सप्रू द्वारा संघीय भारत (Federal India) के निर्माण की मांग का स्वागत किया। बीकानेर नरेश गंगासिंह द्वारा इस प्रस्ताव का बड़े उत्साह से समर्थन किया गया। उन्होंने कहा- 'पूरे भारत की समृद्धि और संतोष के लिये हम भारतीय राजा, अपना पूरा सहयोग देकर कर्त्तव्य पालन करने के लिये तैयार हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि हम अपना सहयोग उस संघीय सरकार द्वारा दे सकते हैं, जो रियासतों और ब्रिटिश भारत से मिलकर बनी हो।'

    गंगासिंह ने कहा कि राजा लोग भारतीय हैं। वे अपने देश की उन्नति के पक्ष में हैं और समस्त भारत की अधिकतम समृद्धि एवं संतुष्टि में भाग लेने की तथा उसमें अपना योगदान करने की इच्छा रखते हैं। उन्होंने मांग की कि भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासित राज्य का दर्जा दिया जाये तथा ब्रिटिश भारत व भारतीय रियासतों का एक संघ बनाया जाये किंतु उन्होंने कुछ शर्तें भी रखीं। उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त यह थी कि सम्राट के साथ राजाओं के समझौते के अधिकारों को माना जाये और उनकी इच्छा के बिना उन्हें बदला न जाये। महाराजा ने मांग की कि ब्रिटिश भारत के साथ संघीय समझौते में प्रवेश से पहले यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि संघ, संवैधानिक प्रावधान तथा आर्थिक सुरक्षा की दृष्टि से देशी राज्यों के लिये संतोषजनक हो।

    भोपाल नवाब हमीदुल्ला खां तो महाराजा गंगासिंह से भी एक कदम आगे बढ़ गये उन्होंने कहा कि हम केवल स्वयं शासित संघीय ब्रिटिश भारत के साथ संघ बना सकते हैं। नरेशों द्वारा इस प्रकार के मत को ग्रहण किये जाने की प्रत्याशा किसी को नहीं थी। अतः इससे सबको विस्मय हुआ। भारत को हर्ष हुआ तथा इंग्लैण्ड के प्रतिक्रियावादियों को आश्चर्यं इस महत्त्वपूर्ण वक्तव्य ने सम्मेलन के स्वरूप को पूर्णतः बदल दिया। राज्यों के प्रति केन्द्र के उत्तरदायित्वों तथा नरेशों के साथ केन्द्र के सम्बन्धों के प्रश्न को बहाना बना कर अंग्रेज केन्द्र के उत्तरदायित्वपूर्ण शासन स्थापित करने के विषय में टाल-मटोल कर रहे थे किंतु अब उनका यह बहाना असमर्थनीय हो गया.....। रेनॉल्ड्स तथा अन्य लोगों को आश्चर्य हुआ। रेनॉल्ड्स का विचार था कि राजाओं ने सोचा था कि वे ब्रिटिश नियंत्रण से मुक्त हो जायेंगे तथा उन पर संघ का बहुत ही कम नियंत्रण होगा।

    राजाओं की ओर से इस प्रकार का रवैया अपनाये जाने के कई कारण थे। कुछ रियासतों में जनता आंदोलन उत्पन्न कर रही थी तथा राजा के अधिकार को चुनौती दी जा रही थी। कुछ राजाओं को चिंता थी कि यदि उनकी रियासत में नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया गया तो वे क्या करेंगे? कुछ राजाओं को लगता था कि एकीकृत ब्रिटिश भारत में अपने अधिकार सुरक्षित रख पाने की अपेक्षा संघीय भारत अधिक लाभदायक है। कुछ राजाओं का यह भी सोचना था कि संघीय इकाई में सम्मिलित होने से उन्हें आर्थिक सहायता मिल सकेगी। कुछ राजाओं की अभिलाषा थी कि नयी सरकार में उन्हें उच्च पद प्राप्त हो जायेंगे।

    महाराजा पटियाला सर भूपिंदरसिंह तथा उनके समर्थक राजाओं का मत सप्रू से भिन्न था। वे चाहते थे कि 'फेडरल इण्डिया' में सम्मिलित होने से पहले देशी राज्यों का एक संघ बने। इसे उन्होंने 'इण्डियन इण्डिया' कहा।

    छोटे राज्यों ने इस मत का अधिक समर्थन किया क्योंकि इससे वे अपने आंतरिक शासन में फेडरल इण्डिया के नियंत्रण से बच सकते थे। संभवतः ही किसी भी संघीय योजना में अपने निजी अधिकार और हितों की सुरक्षा के लिए राजा लोग उत्सुक रहते थे और आश्वासन चाहते थे कि उनके निजी आन्तरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप न करे। बहुत से राजाओं को संघीय विचार पर सन्देह हुआ और वे अन्त में चुप होकर बैठ गये। ब्रिटिश भारत के अधिकतर प्रतिनिधि ब्रिटिश भारत में उत्तरदायी शासन की स्थापना के उद्देश्य से इस सम्मेलन में भाग लेने के लिये गये थे किंतु जब उन्होंने भारतीय राजाओं को भी संघीय संविधान में सम्मिलित होने की इच्छा व्यक्त करते हुए देखा तो उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ।

    इससे सम्मेलन में विचार विमर्श का पूरा वातावरण ही बदल गया। राजाओं ने उन्नीसवीं सदी के भारत को विलोपित होते हुए देखा। दूसरे अल्पसंख्यकों की भांति वे भी अपने दांवों को बाजी पर लगाना चाहते थे ताकि वे उसका अधिकतम लाभ उठा सकें। उनमें से कई राजा भारत को ब्रिटिश शिकंजे से मुक्त होते हुए देखना चाहते थे किंतु वे यह नहीं चाहते थे कि ब्रिटिश भारतीय संविधान के तहत वायसराय की शक्तियां किसी अन्य शक्ति को स्थानांतरित हो जायें।

    संघीय ढांचा उप समिति

    संघीय उत्तरदायित्व को सिद्धांत रूप में विनिश्चत कर लिये जाने के पश्चात इसका विवरण निष्पादित करने के लिये लार्ड सैंकी की अध्यक्षता में संघीय ढांचा उप समिति (Federal Structure Sub Committee) नियुक्त की गयी। इस समिति में भारतीय रियासतों एवं ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि सम्मिलित किये गये। इस समिति में संघीय अवयवों, संघीय विधान के प्रकार, संघ की शक्तियां, संविधान, चरित्र तथा संघीय कार्यकारिणी के उत्तरदायित्व पर हुए विचार विमर्श से स्पष्ट हो गया कि राजा वास्तव में एक संघ (Federation) नहीं चाहते थे, अपितु राज्यों अथवा राज्यसंघों का एक ढुलमुल गठबंधन चाहते थे। वे शक्तियों की एक लम्बी सूची संघीय सरकार के निष्पादन के लिये नहीं छोड़ने पर अड़े गये। यहाँ तक कि वे शक्तियां भी, जिन्हें कि वे संघीय सरकार को स्थानांतरित करने को तैयार थे, कुछ सीमा तक अपनी निजी सत्ता एवं अधिकार क्षेत्र में रखना चाहते थे।

    वे विषय, जो कि स्वाभाविक रूप से संघीय सरकार से सम्बन्धित हैं, जैसे मुद्रा, डाक, टेलिग्राफ तथा रेलवे आदि, उनके विषय में भी बीकानेर राज्य के प्रतिनिधि मनुभाई मेहता ने दलील दी कि राजा लोग स्वाभाविक रूप से अपनी स्वयं की स्वायत्तता के प्रति सजग हैं और जब वे सामान्य जनहित के लिये अपनी स्वयं की सम्प्रभुता में कमी करने को तैयार हैं, तब वे इस बात के लिये भी चिंतित हैं कि उनसे आवश्यकता विहीन बलिदान की मांग न की जाये। यह इस उद्देश्य के लिये है कि जब वे संघीय अधिकारियों, वैधानिक अधिकारों तथा उनके सामान्य संघीय विषयों पर नीति बनाने के अधिकारों को स्वीकार करने के लिये तैयार हैं, वे रेलवे, वायुसेवा.......आदि सामान्य विषयों पर अपने मालिकाना अधिकारों, अपने अधिकार क्षेत्र और अपने शासन को अलग करने के अनिच्छुक हैं।

    संघीय विधान मण्डल में प्रतिनिधित्व के मामले में भारतीय रियासतों ने जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व की मांग की किंतु जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व मिलने पर भी अपनी शक्तियों को संघीय सरकार के प्रति समर्पित करने के मामले पर राजाओं का उत्साह शीघ्र ही भंग हो गया। अतः केवल स्थूल सैद्धांतिक बातों पर ही सहमति बन सकी। इस समिति ने 15 जनवरी 1931 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें कहा गया कि-

    (1.) भारत के नवीन विधान का निर्माण संघ शासन के आधार पर होगा। ब्रिटिश प्रांत व देशी रियासतें इस संघ में सम्मिलित होंगी।

    (2.) प्रांतीय और केंद्रीय क्षेत्र में उत्तरदायी शासन स्थापित होगा। केन्द्रीय क्षेत्र में सुरक्षा और वैदेशिक विभाग, भारत के गवर्नर जनरल के अधीन रहेंगे।

    (3.) अंतरिम काल में कुछ रक्षात्मक विधान रखे जायेंगे।

    19 जनवरी 1931 को सम्मेलन सितम्बर 1931 तक के लिये स्थगित कर दिया गया। सम्मेलन के समापन भाषणों की भाषा सौहार्दपूर्ण एवं आशापूर्ण थी। अखिल भारतीय संघ के निर्माण की स्वीकृति इस सम्मेलन की उपलब्धि थी।

    द्वितीय गोलमेज सम्मेलन

    ई.1931 में गांधी और लार्ड इरविन के मध्य एक समझौता हुआ तथा 7 सितम्बर 1931 को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया। इसमें गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुए। सम्मेलन में सरोजनी नायडू, पं. मदनमोहन मालवीय, सर अली इमाम, सर मुहम्मद इकबाल तथा घनश्यामदास बिड़ला ने भाग लिया। शेष सदस्य लगभग वही थे जो प्रथम सम्मेलन में थे। इस सम्मेलन में बीकानेर नरेश गंगासिंह ने भी भाग लिया किंतु उन्होंने उतना उत्साह नहीं दिखाया जितना प्रथम सम्मेलन में दिखाया था। ऐसा लगता था कि राजाओं के संघ में प्रवेश को लेकर उनका उत्साह काफी मंद हो गया था। सम्मेलन में राजाओं के मध्य तीव्र मतभेद उभर कर सामने आये। ये मतभेद संघीय विधान में राज्यों के प्रतिनिधित्व तथा संघ में सम्मिलित होने वाली रियासतों की वित्तीय जवाबदेही को लेकर थे।

    संघीय विधान में राज्यों के प्रतिनिधित्व के बारे में राजाओं के तीन धड़े बन गये थे। हैदराबाद, मैसूर और बड़ौदा जैसी बड़ी रियासतों ने मांग की कि प्रतिनिधित्व रियासतों की जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिये। महाराजा बीकानेर ने मांग की कि उच्च सदन में 250 सीटें होनी चाहिये जिनमें से 50 प्रतिशत सीटें रियासतों को मिलनी चाहिये ताकि नरेन्द्र मण्डल के प्रत्येक सदस्य को सीट मिल सके। वे बड़े राज्यों को एक-दो सीटें अधिक देने के लिये भी तैयार थे। पटियाला महाराजा की मांग थी कि अखिल भारतीय संघ के निर्माण से पूर्व समस्त रियासतों का एक महासंघ बनना चाहिये।

    राज्यों को संघ से कुछ वित्तीय सुविधाएं मिलने के विषय पर इन्कार करके फेडरल स्ट्रक्चर समिति पहले ही राज्यों की आशा पर तुषारापात कर चुकी थी। अब राज्यों को यह चिंता सताने लगी थी कि संघीय सरकार के खर्चों को राज्यों पर डाला जायेगा तथा संघीय न्यायालय धीरे-धीरे राज्यों में अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करेगा। राजा लोग एक-एक करके अपने-अपने राज्यों से सम्बद्ध विशिष्ट प्रकरणों को भी सम्मेलन में उठाने लगे। इससे किसी भी सहमति पर पहुंचना असंभव हो गया।

    तृतीय गोलमेज सम्मेलन

    ई.1932 में दिल्ली में भारतीय नरेशों तथा मंत्रियों का सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें उन अनिवार्य सुरक्षणों को निर्धारित कर दिया गया जिनके अंतर्गत नरेश लोग संघ में मिलने के लिये तैयार थे। नरेंद्र मंडल में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि राज्यों की संधियों, सनदों तथा प्रतिज्ञाओं से उद्भूत होने वाले अधिकार अक्षत रहने चाहिये, राज्यों की प्रभुसत्ता अक्षुण्ण् रहनी चाहिये तथा राज्यों के प्रति सर्वोपरि राज्यशक्ति के दायित्व अपरिवर्तित रहने चाहिये। देशी राज्यों के प्रतिनिधि मंडल के कार्य सम्बन्धी प्रस्ताव पर आयोजित नरेंद्र मण्डल की बैठक की कार्यसूची संख्या-10 के द्वारा एक शर्त और जोड़ दी गयी जिसमें कहा गया कि देशी राज्यों के शासकों को भारतीय संघ में सम्मिलित होना तभी स्वीकार्य होगा यदि अंग्रेज सरकार आंतरिक स्वायत्तता और राज्यों की सार्वभौमिकता का आश्वासन दे।

    17 नवम्बर 1932 को लंदन में तृतीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया। अवैध संस्था घोषित हो जाने के कारण कांग्रेस इस सम्मेलन में भाग नहीं ले सकी। सम्मेलन में कुल 46 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। ब्रिटेन के विरोधी मजदूर दल के सदस्यों ने सम्मेलन में भाग लेने से इन्कार कर दिया। राज्यों की ओर से अधिकतर नरेशों के स्थान पर राज्यों के वरिष्ठ मंत्री इस सम्मेलन में भाग लेने के लिये इंगलैण्ड गये। इस संक्षिप्त सत्र में संघीय संविधान के संगठन तथा संघ में सम्मिलन के लिये राज्यों की ओर से निष्पादित किये जाने वाले प्रविष्ठ संलेख (Instrument Of Accession) पर विचार विमर्श किया गया।

    संघ में राज्यों के सम्मिलन की शर्तों को विनिश्चत किये जाने में हो रहे विलम्ब पर ब्रिटिश भारतीय नेताओं द्वारा चिंता व्यक्त की गयी। सर तेजबहादुर सप्रू ने कहा कि 1930 में संघ निर्माण का निमंत्रण देने के बाद से इस दिशा में राजाओं की ओर से कोई प्रगति नहीं की गयी है। उन्होंने पूछा कि क्या राजा लोग निश्चित हैं कि यदि उनके अधिकारों को सुरक्षित रखा गया तो वे संघ में आने के लिये तैयार होंगे।

    स्पष्ट था कि भारतीय नरेशों और ब्रिटिश भारतीय राजनीतिज्ञों के उद्देश्य एक दूसरे के विपरीत थे। भारतीय नरेश इस बात पर अड़े हुए थे कि संघीय विधान मण्डल में उनके द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि रहें जबकि कांग्रेस की मांग थी कि जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को ही मान्यता दी जाये। इसी बात से आधुनिक भारत के इतिहास के एक प्रामाणिक परिच्छेद की समाप्ति हो गयी। प्रतिनिधियों के चुने जाने या मनोनीत होने के विषय में भारतीय नरेशों तथा ब्रिटिश भारत के नेताओं में मतभेद तो एक कारण था ही किंतु नरेशों द्वारा लगायी गयी कई शर्तों ने दोनों पक्षों के बीच एक ऐसी खाई खोद दी जिसे पाटना असंभव हो गया। नरेशों की अनुचित शर्तों ने संघीय विधान मण्डल पर विचार किया जाना बंद कर दिया। भारतीय नरेश, ब्रिटिश नेताओं और सरकारी मंत्रियों से मिलकर यह सोच रहे थे कि ब्रिटिश भारतीय प्रतिनिधियों की आजादी हासिल करने की हर एक कोशिश को किस तरह नाकामयाब कर दिया जाये।

    संघीय निर्माण समिति की बैठकों के पहले तमाम तजवीजों का जाल बिछाया गया और योजनाएं बनायी गयीं कि कांग्रेसी नेताओं का विरोध करके या तो सम्मेलन असफल कर दिया जाये अथवा विधान मण्डल में अपने मनोनीत सदस्यों का अधिक से अधिक अनुपात में प्रतिनिधित्व प्राप्त किया जाये ताकि देश का शासन एक प्रकार से राजाओं के हाथों में ही रह सके। जब भारतीय नरेशों को अपने उद्देश्यों की पूर्ति में असफलता मिली तब वे संघ को संदेह की दृष्टि से देखने लगे। गोलमेज सम्मेलन की समाप्ति पर उनका दृष्टिकोण निराशा का था और कुछ सदस्य सोच रहे थे कि सम्मेलन की असफलता निश्चित है।

    संयुक्त प्रवर समिति

    तीन गोलमेज सम्मेलनों के बाद 15 मार्च 1933 को ब्रिटिश सरकार द्वारा एक श्वेतपत्र प्रकाशित किया गया। ब्रिटिश संसद के दोनों सदनों की एक संयुक्त प्रवर समिति द्वारा इस श्वेतपत्र का अध्ययन किया गया। इसे जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी तथा इण्डियन कंस्टीट्यूशन रिफॉर्म्स कमेटी 1933-34 भी कहते हैं। लार्ड लिनलिथगो इस समिति के अध्यक्ष थे। ब्रिटिश भारत तथा देशी राज्यों के 27 व्यक्ति इस समिति के साथ जोड़ दिये गये जिनकी कोई संवैधानिक स्थिति नहीं थी। संयुक्त प्रवर समिति ने अप्रेल 1933 से नवम्बर 1934 तक लगातार 159 बैठकें करके अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं। समिति ने भारत सरकार विधेयक पर रिपोर्ट दी कि राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या राज्य परिषद (उच्च सदन) में अधिक से अधिक 104 तथा ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों की संख्या 156 हो। विधानसभा (निम्नसदन) में 250 प्रतिनिधि ब्रिटिश भारत के तथा अधिक से अधिक 125 प्रतिनिधि रियासतों के रहें।

    कांग्रेस तथा अन्य राजनीतिक दलों के नेता संयुक्त प्रवर समिति द्वारा की गयी इस सिफारिश से डर गये जिसमें कहा गया था कि संघीय विधानसभा के ऊपरी तथा निम्न सदनों में रियासतों के प्रतिनिधि शासकों द्वारा मनोनीत होंगे, जनता द्वारा नहीं चुने जायेंगे।

    बम्बई सम्मेलन

    फरवरी 1935 में बम्बई में देशी राजाओं और उनके प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन बुलाया गया। इसमें अनुभव किया गया कि यद्यपि कुछ राजाओं ने भले ही संघ के लिये मुखसेवा (Lip Service) की हो किंतु सामान्यतः राजा लोग अभी तक संघ के मूलभूत सिद्धांत को मानने के लिये तैयार नहीं थे कि संघीय इकाईयों की शक्तियां सीमित हो जायें तथा रजवाड़ों की आंतरिक सम्प्रभुता का कुछ हिस्सा हमेशा के लिये समाप्त हो जाये, इसके बदले में उन्हें सरकार में हिस्सेदारी मिले। भारतीय रियासतों के प्रतिनिधि मण्डल ने बम्बई सम्मेलन में सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि रियासतों के लिये ऊपरी सदन में कम से कम 125 सीटों की मांग की जाये जिससे नरेन्द्र मण्डल के सारे सदस्यों को व्यक्तिगत और समान प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके। निम्न सदन में 350 में से 40 प्रतिशत के अनुपात से उन्होंने 140 सीटों की मांग करना निश्चित किया। कुछ बड़ी रियासतों ने मैसूर के दीवान सर मिर्जा इस्माइल के नेतृत्व में उस प्रस्ताव का विरोध किया जो उनकी अनुपस्थिति में पारित कर लिया गया था। पाँच बड़ी रियासतों ने जिन्हें 21 तोपों की सलामियां मिलती थीं, संघीय निर्माण विधान मण्डल में अपना प्रतिनिधित्व बढ़ाये जाने की मांग की।

    भारत सरकार अधिनियम 1935

    भारत सरकार विधेयक पर ब्रिटिश संसद के निम्न सदन में 43 दिन तक तथा उच्च सदन में 13 दिन तक बहस चली। कंजरवेटिव पार्टी के नेता विंस्टल चर्चिल ने हाउस ऑफ कामन्स में तथा लॉर्ड सेलिसबरी ने हाउस ऑफ लार्ड्स में इस बिल का कड़ा विरोध किया। ब्रिटिश संसद में विधेयक के द्वितीय एवं तृतीय वाचन में व्यापक स्तर पर सहमति बन गयी। 4 अगस्त 1935 को विधेयक को सम्राट की स्वीकृति प्राप्त हो गयी तथा भारत सरकार अधिनियम 1935 (Government Of India Act 1935) का निर्माण हुआ। इस अधिनियम के द्वारा निर्धारित किया गया कि एक अखिल भारतीय संघ (All India Federation) की स्थापना की जायेगी जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रांतों के अतिरिक्त देशी राज्य भी सम्मिलित होंगे। प्रांतों को स्वशासन का अधिकार दिया जायेगा। शासन के विषय तीन भागों में विभक्त किये जायेंगे-

    (1) संघीय विषय, जो केन्द्र के अधीन होंगे।

    (2) प्रांतीय विषय, जो पूर्णतः प्रांतों के अधीन होंगे तथा

    (3) समवर्ती विषय, जो केन्द्र और प्रांत के अधीन रहेंगे। विरोध होने पर केन्द्र का कानून ही मान्य होगा।

    संघीय संविधान के तहत दो सदनों की व्यवस्था की गयी जिसमें राज्यों के प्रतिनिधियों को शासकों द्वारा नामित किया जाना था। कौंसिल ऑफ स्टेट अर्थात् उच्च सदन में ब्रिटिश भारत के सदस्यों की संख्या 156 निश्चित की गयी जबकि राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या अधिकतम 104 हो सकती थी। हाउस ऑफ एसेम्बली अर्थात् निम्न सदन में ब्रिटिश भारत के 250 प्रतिनिधि एवं राज्यों के अधिकतम 125 सदस्य होने थे। इस अधिनियम के तहत क्राउन प्रतिनिधि (Crown Representative) का एक नया पद सृजित किया गया। वायसराय को गवर्नर जनरल के साथ-साथ क्राउन प्रतिनिधि का पदभार भी संभालना था। क्राउन प्रतिनिधि को राज्य सचिव के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा गया था जो कि भविष्य में गवर्नर जनरल पर कम नियंत्रण रखने वाला था।

    राज्यों के सम्बन्ध में क्राउन प्रतिनिधि की सहायता के लिये राजनीतिक सलाहकार (Political Advisor) का पद सृजित किया गया। राजनीतिक सलाहकार को गवर्नर जनरल की परिषद का सदस्य बनाया गया था। राज्यों को संघीय विषयों में संघ के अध्यक्ष के रूप में गवर्नर जनरल से व्यवहार करना था जबकि परमोच्चसत्ता से सम्बद्ध विषयों के लिये क्राउन प्रतिनिधि से व्यवहार करना था। संविधान में प्रावधान किया गया था कि गवर्नर जनरल तथा क्राउन प्रतिनिधि एक व्यक्ति भी हो सकता था किंतु देाहरी जिम्मेदारियों को संभालने के लिये उसके पास दो भिन्न सचिवालय एवं भिन्न अभिकरण होने थे।

    यद्यपि 1935 के अधिनियम में वे विषय स्पष्टतः निश्चित नहीं किये गये थे जो कि रियासत द्वारा संघीय विषय के रूप में स्वीकार किये जायेंगे, तथापि यह आशा की गयी थी कि अधिकांश रियासतों के शासक प्रविष्ठ संलेख में दी गयी महत्त्वपूर्ण संघीय विषयों की सूची में से अधिकांश विषयों को स्वीकार कर लेंगे। संघीय योजना में देशी राज्यों के सम्मिलित होने के सम्बन्ध में ब्रिटिश संसद द्वारा आशा व्यक्त की गयी थी कि देशी राज्यों को संघीय विषयों में से प्रथम 45 मदों को स्वीकार करने के लिये आमंत्रित किया जायेगा तथा वे अपनी इच्छा से अन्य विषयों को चुनने के लिये भी स्वतंत्र होंगे।

    संघ के निर्माण के सम्बन्ध में रियासती प्रजा को कुछ भी कहने का अधिकार नहीं दिया गया था। यह केवल रियासत के शासक की इच्छा पर छोड़ दिया गया था कि वह संघ में सम्मिलित हो अथवा नहीं। यदि ब्रिटिश प्रांत, संघ बनाने के पक्ष में होते तो भी देशी रियासतों की स्पष्ट सहमति के बिना संघ नहीं बन सकता था। दूसरी ओर यदि देशी रियासतें संघ बनाने के पक्ष में होतीं तो प्रांतों को भी अनिवार्य रूप से संघ में सम्मिलित होना पड़ता। इस प्रकार संघ का आरंभ होना अथवा न होना, केवल रियासतों के ऊपर निर्भर हो कर रह गया था। राजाओं द्वारा नामित प्रतिनिधियों और ब्रिटिश भारत द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों को मिलाकर संघ बनाने की योजना पर लॉर्ड मेस्टॅन ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि कानून ने तेल और पानी का मिश्रण बनाने की चेष्टा की है।

    भारत सरकार अधिनियम 1935 में प्रावधान किया गया था कि ब्रिटिश भारत और स्वेच्छा से शामिल होने वाली देशी रियासतों के अखिल भारतीय संघ में पूर्ण उत्तरदायित्व युक्त सरकार का निर्माण हो। इस अधिनियम के प्रावधानों से बड़ी विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गयी। एक ओर तो राजा लोग अपनी सम्प्रभुता तथा ब्रिटिश ताज के साथ हुई संधियों को अलंघनीय बताकर, अपने विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखे बिना, संघ में सम्मिलित होने को तैयार नहीं थे तथा दूसरी ओर उनके संघ में सम्मिलित होने से उन्हें संघ के माध्यम से ब्रिटिश भारत के शासन में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिलने वाला था। राजाओं को यह आशंका भी थी कि यदि वे अपनी प्रभुसत्ता संघ को समर्पित करेंगे तो उनके राज्यों की प्रजा के ब्रिटिश भारतीय प्रांतों की प्रजा और उनके नेताओं के संपर्क में आने से राज्यों में भी ब्रिटिश भारतीय प्रांतों की भांति राजनीतिक प्रदूषण फैल जायेगा। पटियाला के महाराजा भूपिन्दरसिंह ने संघ योजना के विरोध का नेतृत्व किया। 25 फरवरी 1935 को नरेंद्र मण्डल की बैठक में बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने भी महाराजा पटियाला तथा नवाब भोपाल के साथ संघीय योजना में छिद्र ढूंढने का काम किया।

    सक्षम राज्यों के साथ संघीय योजना पर विचार विमर्श

    1936 में लॉर्ड विलिंगडन के बाद मारकीस ऑफ लिनलिथगो को भारत का वायसराय बनाया गया। लिनलिथगो संयुक्त प्रवर समिति के अध्यक्ष भी रह चुके थे। वे अपने कार्यकाल में भारत संघ के उद्घाटन की इच्छा लेकर भारत आये। लिनलिथगो को भारतीय राजाओं से सहानुभूति थी। वे ऐसा कुछ नहीं करना चाहते थे जिससे राजाओं का दिल दुखे। उनकी राय में राजा ही भारत से ब्रिटिश सम्बन्धों का प्रमुख आधार एवं तत्व थे। संघ योजना में राजाओं को अड़ंगा लगाते हुए देखकर वायसराय लिनलिथगो ने संघ निर्माण के लिये देशी राज्यों में अपने तीन विशेष प्रतिनिधियों- सर कोर्टने लेटीमर, सर फ्रांसिस वायली तथा सर आर्थर लोथियान को भेजा। फ्रांसिस वायली को राजपूताना के नरेशों से वार्त्ता करने के लिये भेजा गया। लिनलिथगो का मानना था कि संघ योजना देशी राज्यों के शासकों के हित में थी। इसलिये उसने अपने प्रतिनिधियों को दायित्व सौंपा कि वे राजाओं तथा उनके मंत्रियों को संघ में सम्मिलन की प्रक्रिया तथा उसका अर्थ समझायें।

    जैसे ही शासकों को वायसराय के इस निर्णय की जानकारी हुई, वे चौकन्ने हो गये। वे पहले से ही कांग्रेस द्वारा प्रजा मण्डलों के माध्यम से बनाये जा रहे इस दबाव से त्रस्त थे कि शासक अपने आंतरिक शासन को समर्पित कर दें। शासकों ने समझा कि अब परमोच्चसत्ता राज्यों का आंतरिक शासन भविष्य में बनने वाले संघ को समर्पित कर देने के लिये दबाव बना रही है तथा परमोच्चसत्ता शासकों से सौदा करना चाहती है। इसलिये शासकों ने इन विशेष प्रतिनिधियों से वार्त्ता करने के लिये चालाक मंत्रियों एवं संवैधानिक विशेषज्ञों को नियुक्त किया।

    भारत सचिव वायसराय की इस कार्यवाही को उचित नहीं मानते थे किंतु बाद में वे सहमत हो गये। इन अधिकारियों को प्रविष्ठ संलेख की प्रतियाँ उपलब्ध करवायी गयीं जो कि राज्यों को पहले से ही भेजी जा चुकी थीं। इन अधिकारियों को वायसराय के लिखित आदेश भी दिये गये। वायसराय के इन विशेष अधिकारियों ने 1936-37 की सर्दियों में विभिन्न राज्यों का दौरा किया तथा राज्याधिकारियों एवं शासकों से हुए विचार विमर्श के दौरान पाया कि राज्यों के शासकों का मानस संघ में सम्मिलन का नहीं था। वे प्रस्तावित संघ को अपनी सुरक्षा तथा सम्प्रभुता के लिये सबसे बड़ा खतरा समझते थे।

    इन विचार विमर्शों के दौरान शासकों ने स्पष्ट कर दिया कि शासकों के लिये देश की एकता की प्रेरणा प्रमुख नहीं थी और न ही वे संघ में सम्मिलन के लिये चिरौरी करने की इच्छा रखते थे। उन्हें जिस प्रश्न ने विचलित कर रखा था वह यह नहीं था कि संघ का निर्माण उन्हें सम्पूर्ण भारत के हित के लिये भागीदारी निभाने का अवसर देगा, अपितु उनके समक्ष विचलित करने वाला प्रश्न यह था कि उनकी अपनी स्थिति संघ के भीतर अधिक सुरक्षित और बेहतर होगी अथवा संघ से बाहर।

    जोधपुर: संघ के प्रति सहमति

    वायसराय द्वारा 18 अगस्त 1936 को जोधपुर नरेश को एक पत्र लिखा गया जिसके जवाब में 26 अगस्त 1936 को जोधपुर महाराजा ने वायसराय को लिखा कि मुझे आपके पत्र का जवाब देने का सम्मान प्राप्त हुआ है जिसमें महामहिम वायसराय द्वारा अपनाई जाने वाली उस विशेष प्रक्रिया के बारे में लिखा गया है जो कि प्रांतीय स्वायत्तता की स्थापना के यथासंभव तुरंत पश्चात पूर्ण भारतीय संघ की स्थापना के दृष्टिकोण से प्रविष्ठ संलेख के प्रारूप पर किये जोन वाले विचार विमर्श को सुविधाजनक एवं त्वरित बनाने तथा विभिन्न राज्यों की सम्बद्ध अनुसूचियों के बारे में है। मैं महामहिम द्वारा इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रकरण में राजाओं के प्रति प्रदर्शित की गयी उत्सुकता तथा प्रवृत्ति की अत्यंत प्रखरता से प्रशंसा करता हूँ तथा उस प्रस्ताव का स्वागत करता हूँ कि महामहिम के व्यक्तिगत प्रतिनिधि मि. वायली नवीन अधिनियम के तहत संघीय राज्यों की वास्तविक स्थिति के बारे में मेरी तथा मेरी सरकार की सहायता के लिये जोधपुर की यात्रा करेंगे तथा तथा भारतीय संघ के साथ मेरे राज्य के भविष्य के सम्बंधों का निर्धारण करने वाले विषयों को स्पष्ट करेंगे। मेरा दृढ़ विश्वास है कि मि. वायली जैसे अनुभवी एवं योग्य अधिकारी से मिलने वाली मदद मेरे लिये अत्यंत मूल्यवान सिद्ध होगी। मेरे मंत्रिगण संघ के प्रश्न की जांच करने में पहले से ही व्यस्त हैं तथा मुझे आशा है कि मैं सावधानी पूर्वक किये गये विचार विमर्श के पश्चात, बिना किसी अनावश्यक विलम्ब के किसी निर्णय पर पहुंचने की स्थिति में होऊंगा।

    अगस्त 1936 में जोधपुर महाराजा को, नवम्बर 1936 में समस्त छोटे बड़े राजाओं के मध्य प्रविष्ठ संलेख के मानक प्रारूप के निर्धारण के लिये होने वाले विचार-विमर्श में भाग लेने के लिये पटियाला महाराजा का एक निमंत्रण मिला। जोधपुर महाराजा को संघ के प्रश्न पर नरेंद्र मण्डल या एकीकृत कार्य की उपयोगिता में अधिक विश्वास नहीं था किंतु उन्होंने अनुभव किया कि महाराजा पटियाला के सुझाव को अस्वीकृत करना अभद्रता होगी। इसलिये राय बहादुर कंवरसेन जोधपुर राज्य के न्यायिक सदस्य को निर्देशित किया गया कि वह नरेंद्र मण्डल के कार्यकारी चांसलर को इस आशय का तार भेजे कि महाराजा इस प्रस्ताव से सहमत हैं। जोधपुर महाराजा की ओर से नरेंद्र मण्डल के कार्यकारी चांसलर धौलपुर महाराजा को भेजे गये तार में कहा गया कि मैं इस इस सुझाव से सहमत हूँ कि यदि संघ के प्रश्न पर विचार विमर्श किया जाना संभव हो तो नवम्बर 1936 में या तो नरेंद्र मण्डल की बैठक या अनौपचारिक सम्मेलन आयोजित किया जाना चाहिये।

    नवम्बर 1936 में वायसराय का विशेष दूत फ्रांसिस वायली जोधपुर आया। 17 व 18 नवम्बर को वायली ने राज्य के अधिकारियों से संघ योजना पर विचार विमर्श किया। वह महाराजा उम्मेदसिंह से वार्तालाप के पश्चात् संतुष्ट हुआ। उसने वायसराय को भेजी रिपोर्ट में महाराजा के रुख की प्रशंसा की कि किसी भी अन्य राज्य में इस विषय को उस तरह से नहीं उठाया गया जिस तरह से जोधपुर राज्य में उठाया गया। महाराजा तथा उनके अधिकारी इस बात पर सहमत थे कि इस विषय पर समस्त पूर्वाग्रह केवल संदेह के कारण उत्पन्न हुए तथा वे स्वीकार करने योग्य नहीं हैं। उन्होंने संघ के निर्माण के प्रति पूर्णतः समर्थन व्यक्त किया। मुझे इस बात में तनिक भी संशय नहीं है कि जब जनवरी 1937 में राज्य द्वारा भारत सरकार को इस विषय पर उत्तर दिया जायेगा तो वे उन शर्तों पर संघ में सम्मिलित होने की सहमति प्रदान करेंगे जिन्हें स्वीकार करना कठिन नहीं होगा।

    21 नवम्बर 1936 को बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने जोधपुर महाराजा उम्मेदसिंह को एक तार भेज कर अनुरोध किया कि मैं 25 नवम्बर को दिल्ली जा रहा हूँ अतः यदि आप लाला कंवरसेन को बीकानेर भेज दें ताकि मुझे यह पता लग सके कि जोधपुर में वायली के विचार विमर्श का क्या परिणाम रहा। जोधपुर महाराजा ने बीकानेर महाराजा को जवाब दिया कि कंवरसेन संघीय प्रकरण तथा अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों में व्यस्त हैं इसलिये उन्हें तत्काल भेजा जाना संभव नहीं है। फिर भी मैंने कंवरसेन को निर्देशित किया है कि वह आपको वायली के नोट का सारांश भिजवा दे जिसमें जोधपुर राज्य द्वारा उठायी गयी कठिनाईयों तथा वायली द्वारा दिये गये उत्तर की जानकारी हो। आप विश्वास करें कि इससे आपको पूरी जानकारी प्राप्त हो जायेगी। कंवरसेन ने महारजा बीकानेर को ये सूचनायें प्रेषित कीं-

    (1) प्रविष्ठ संलेख का कच्चा प्रारूप,

    (2) प्रविष्ठ संलेख के साथ संलग्न की जाने वाली संभावित प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ अनुसूचियां

    (3) 17 व 18 नवम्बर 1936 को जोधपुर राज्य के साथ हुए विचार-विमर्श के सम्बन्ध में मि. वायली के नोट का सारांश।

    जोधपुर राज्य के मुख्यमंत्री ने 9 अप्रेल 1937 को वेस्टर्न राजपूताना स्टेट्स के रेजीडेण्ट को सूचित किया कि जोधपुर राज्य, संघ में प्रवेश के लिये तैयार है तथा राज्य ने भारत सरकार अधिनियम 1935 की सातवीं अनुसूची में दिये गये 47 मदों पर संघ का निर्माण प्रस्तावित किया है। कृपया आप समुचित ढंग से भारत सरकार को सूचित कर दें कि जोधपुर के महाराजा संघीय नीति के प्रति कृतसंकल्प होने पर सहमत हैं। 19 अप्रेल 1937 को ए.जी.जी. ने इस रिपोर्ट को भारत सरकार को भिजवा दिया। 21 अक्टूबर 1937 को राजपूताना के रेजीडेंट ने क्राउन रिप्रेजेंटेटिव को सूचित किया कि मैं जोधपुर राज्य के मुख्यमंत्री के पत्र संख्या सी/42/सी/38/7-पी-। दिनांक 29 सितम्बर 1937 की एक प्रति प्रेषित कर रहा हूँ। महाराजा बिना किसी शर्त के संघीय विधान की मद संख्या 3, 6, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 16, 17, 18, 21, 22, 23, 27, 33, 37, 38, 40, 42, 43, 48, 49, 52 तथा 59 को स्वीकार करते हैं। महाराजा कतिपय शर्तों के साथ मद संख्या 1, 2, 4, 5, 7, 14, 15, 19, 20, 24, 25, 26, 28, 29, 30, 31, 32, 34, 39, 41, 44, 45, 46, 47, 53 एवं 60 (वायली द्वारा सुझाया गया नया मद) को स्वीकार करते हैं तथा मद संख्या 35, 36, 50, 51, 54, 55, 57 एवं 58 को स्वीकार करने के इच्छुक नहीं हैं।

    मेवाड़: असंतोषजनक रुख

    अगस्त 1936 में वायसराय लिनलिथगो ने उदयपुर के महाराणा को वायली की नियुक्ति के बारे में सूचित किया जो संघ के प्रभावों को स्पष्ट करने के लिये वायसराय के निजी दूत के रूप में उदयपुर की यात्रा करेगा। 20 नवम्बर 1936 को ऑग्लिवी तथा वायली ने उदयपुर में संघ संबंधी विभिन्न समस्याओं पर विचार विमर्श किया। 21 नवम्बर को ऑग्लिवी ने ग्लांसी को सूचित किया कि कल उदयपुर के हिज हाइनेस तथा उनके मुसाहिबे आला दीवान बहादुर पण्डित धर्मनारायण के साथ संघीय वार्तालाप हुआ जिसका परिणाम संतोष जनक नहीं रहा। महाराणा को संघ के मसले की कोई जानकारी नहीं है तथा मुसाहिबे आला पं. धर्मनारायण ने बहुत बड़ी संख्या में अस्वीकार्य बाधाएं प्रस्तुत की हैं जिनका उद्देश्य स्पष्टतः संघीय मामलों में राज्य की संप्रभुता तथा आंतरिक अधिकार क्षेत्र को किंचित भी चोट नहीं आने देना है। आज प्रातः मैंने पं. धर्मनारायण से लम्बी वार्त्ता की तथा राज्य द्वारा इस प्रकार का रुख अपनाये जाने पर असंतोष तथा आश्चर्य व्यक्त किया। उन्होंने मुझे बताया कि उनके लिये संघ के मार्ग में आने वाली प्रत्येक संभावित कठिनाई को सामने लाना अत्यंत आवश्यक था क्योंकि राज्य के ऐसे कई हित हैं जो हिज हाइनेस के आत्मविश्वास को डगमगाने के लिये अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि कोई भी व्यक्ति बाद में मुझे यह नहीं कहे कि मैंने यह बात हिज हाइनेस को नहीं बताईं हालांकि उन्होंने संघ में शामिल नहीं होने की इच्छा का खण्डन किया है किंतु मेरा विश्वास है कि इतने सारे पूर्वाग्रहों के कारण वे संघ में सम्मिलन के लिये ऐसी शर्तें लगायेंगे जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकेगा।

    मुख्यमंत्री की सलाह पर कुछ समय पहले ही महाराणा ने राजपूताने के समस्त राजाओं को संघ के प्रश्न पर विचार विमर्श करने के लिये दिसम्बर में उदयपुर आने का निमंत्रण दिया है। यदि 6 साल पहले महाराणा ने इस प्रकार का कदम उठाया होता तो उसमें कोई उद्देश्य निहित होता किंतु निर्णय की इस अंतिम घड़ी में राजपूताना के राजाओं को सामूहिक रूप से बुलाने के पीछे मुझे तथा वायली को अत्यंत खराब सलाह जान पड़ती है। मैंने पं. धर्मनारायण से कहा कि क्या इस तरह का कदम उठाने के पीछे तथा कल जो वार्तालाप हुआ है उसके पीछे महाराणा की इच्छा राजपूताने के अन्य राजाओं को यह सलाह देने की है कि वे संघ में सम्मिलित न हों? यदि हिज हाइनेस की इच्छा मशीन में धूल डालने की है तो इसके परिणाम बुरे होंगे। यदि महाराणा स्वयं संघ में सम्मिलित न होना चाहें तो यह उनका अपना मामला है किंतु अन्य छोटे राज्यों को अपने स्वतंत्र चिंतन से रोकने की सलाह नहीं दी जा सकती। उन्हें बिना किसी बाह्य दबाव के, स्वतंत्रता पूर्वक अपने निर्णय पर पहुंचना है। मैंने धर्मनारायण से यह भी कहा कि यदि छोटे राज्यों ने उदयपुर में विचार विमर्श के बाद संघ में न मिलने का निर्णय लिया तो उसका केवल यही अर्थ निकाला जायेगा कि महाराणा ने उन्हें उकसाया है। इस पर धर्मनारायण ने कहा कि यदि यह प्रस्ताव महामहिम वायसराय को पसंद नहीं है तो हिज हाइनेस इस पर आगे नहीं बढ़ेंगे। मैंने धर्मनारायण से कहा कि यही उचित होगा कि इस समय उदयपुर में राजाओं का सम्मेलन न बुलाया जाये।

    जब 28 नवम्बर को वायसराय महाराणा से मिलेंगे तो इस विषय पर बात करने की स्थिति में होंगे। अब तक की स्थिति के अनुसार मैं समझता हूँ कि धौलपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, बंूदी, सिरोही तथा झालावाड़ के शासकों ने निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है जबकि बीकानेर महाराजा ने महाराणा को आगे आने के लिये बधाई का तार भेजा है तथा स्वयं उनकी उपस्थिति अनिश्चित है। जबकि दूसरी तरफ जोधपुर महाराजा ने जवाब दिया है कि इस अंतिम समय में उन्हें संघ पर विचार विमर्श करने में आपत्ति है। मुझे संदेह है कि जयपुर महाराजा, जिन्होंने कि अब तक कोई जवाब नहीं भेजा है, उदयपुर आयेंगे। पं. धर्मनारायण ने मुझे कहा है कि महाराणा यह कहकर इस बैठक को निरस्त कर सकते हैं कि चूंकि जोधपुर के महाराजा इसमें भाग लेने के लिये नहीं आ रहे हैं इसलिये इस बैठक का कोई औचित्य नहीं है।

    22 नवम्बर 1936 को महाराणा ने वायसराय को लिखा कि आपके विशेष दूत तथा राजपूताना के ए.जी.जी. की यात्रा मेरे लिये अत्यंत मूल्यवान रही है। मेरी इच्छा उच्च अभिसंधान व्यक्त करने की है जो महामहिम की संतुष्टि तथा अपनी सहमति के लिये है। 23 नवम्बर 1936 को वायली ने राजनीतिक सचिव को पत्र लिखा कि उदयपुर में संघीय विचार विमर्श कल हुआ तथा उसी दिन समापन भी हो गया.... सिरोही के अतिरिक्त अन्य किसी राज्य ने, जिनमें कि मैं गया हूँ, ने इतनी अधिकता के साथ भारत संघ की योजना के लिये र्पंशसा का अभाव नहीं दिखाया है जितना कि उदयपुर ने दिखाया है। पूरे राज्य का वातावरण इतना संकुचित है....... यदि उदयपुर में राजपूताना के राजाओं का सम्मेलन हो जाता है तो महाराणा तथा उनके सलाहकार राजपूताना के राजाओं को कोई उचित सलाह नहीं दे पायेंगे क्योंकि उन्हें इस योजना का कोई ज्ञान ही नहीं है।

    10 फरवरी 1937 को राजपूताना के ए.जी.जी. ने भारत सरकार को मेवाड़ राज्य से प्राप्त जवाब भिजवाया- राज्य से प्राप्त जवाब मेरी तथा मि. वायली की आशा से कहीं अधिक संतोषजनक है। महाराणा ने सारा मामला भारत सरकार के हाथ में यह कहकर छोड़ दिया है कि जिन मामलों में महाराणा की शर्तें हैं, उन मामलों में भारत सरकार मेवाड़ राज्य के साथ वही बर्ताव करेगी जो वह अन्य प्रमुख राज्यों के साथ किया जाना सुनिश्चित करेगी। महाराणा 47 मदों में से कुल 24 मद, मद संख्या 2, 4, 6, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 16, 18, 21, 22, 23, 25, 27, 28, 37, 38, 40, 41,42,43, तथा 52 बिना किसी शर्त के स्वीकार करते हैं। महाराणा, मद संख्या 1, 3, 5, 7, 17, 19, 20, 24, 26, 29, 30, 31, 32, 33, 34, 35, 39, 44, 45, 46, 47, 53 तथा 59 अर्थात् कुल 20 मद कुछ शर्तों के साथ स्वीकार करते हैं तथा मद संख्या 15 एवं 36 को स्वीकार नहीं करते हैं तथा उनका मानना है कि शेष मदों पर इस समय प्रवेश करना आवश्यक नहीं है। मद संख्या 45 पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है तथा इसके बारे में बाद में सूचित करने का आश्वासन दिया है।

    जयपुर: सतर्क रवैया

    अगस्त 1936 में महाराजा मानसिंह को वायसराय द्वारा वायली के जयपुर भ्रमण की नियुक्ति की सूचना मिली। 4 सितम्बर 1936 को महाराजा ने वायसराय को पत्र लिखा कि संघ योजना में उठने वाले संभावित बिंदुओं पर मुझे सलाह देने हेतु मि. वायली को भेजने के लिये मैं महामहिम के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ ....... मैं महामहिम द्वारा इस महत्त्वपूर्ण एवं कठिन विषय पर प्रदर्शित उनकी व्यक्तिगत राय के लिये भी आभार व्यक्त करता हूँ तथा मुझे आपको आश्वस्त करने की शायद ही आवश्यकता है कि आप द्वारा अपनाये गये मार्ग पर चलने के लिये आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैं। मेरे जिम्मे में आये काम को त्वरित गति से निबटाने में मेरा पूरा सहयोग रहेगा ताकि मेरा उत्तर जनवरी 1937 के अंत तक आप तक पहुंच जाये। उदयपुर के पश्चात वायली जयपुर आये तथा राज्य के प्रतिनिधियों के साथ संघ के विषय पर विचार विमर्श किया। राज्य सचिव को भेजी गयी अपनी रिपोर्ट में वायली ने लिखा कि राज्य को बम्बई सामग्री मिल चुकी थी तथा सर तेजबहादुर सप्रू की सलाह भी। इसलिये विचार विमर्श जोधपुर में हुए विचार विमर्श के ही अनुरूप हुआ। यद्यपि जयपुर राज्य के प्रतिनिधि का रुख जोधपुर के प्रतिनिधि की अपेक्षा अधिक संदेहास्पद था तथा मैं अनुभव करता हूँ कि राज्य संघ में मिलने से पहले निश्चित प्रगति चाहेगा। ये दोनों राज्य एक दूसरे के निकट सम्पर्क में हैं तथा इनकी मनोवृत्ति में अंतर रोचक है। जयपुर राज्य के प्रतिनिधि ने उदयपुर के पं. धर्मनारायण से उलट, स्पष्टीकरणों को ध्यान से सुना और स्वीकार किया कि अधिकतर शंकायें विचार विमर्ष के दौरान निबट गयी हैं।

    मई 1937 में राजपूताना के रेजीडेंट ने सरकार को जयपुर राज्य के सम्मिलन के सम्बन्ध में सूचित किया कि कराधान, राज्य में भूमि या सम्पत्ति के अधिग्रहण तथा राज्य में संघीय सरकार द्वारा करारोपण के बारे में महाराजा जयपुर की कुछ शर्तें हैं। उन्होंने संघीय अभिकरणों, अधिकारियों एवं प्रतिनिधियों पर जबकि वे राज्य में अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर रहे हों, राज्य के कानून लगाने की इच्छा व्यक्त की है। हिज हाइनेस संघीय सूची के मद संख्या 4, 6, 8, 9, 11, 12, 13, 14, 16, 18, 21, 22, 23, 25, 27, 28, 32, 46 तथा 53 को बिना किसी शर्त के स्वीकार करते हैं, मद संख्या 1, 2, 3, 5, 7, 10, 15, 17, 19, 20, 24, 26, 29, 30, 31, 33, 34, 35, 36, 37, 38, 39, 42, 43, 44, 45, 47 तथा 59 को कुछ शर्तों के साथ स्वीकार करते हैं एवं मद संख्या 41 के बारे में जयपुर राज्य इस समय कोई शर्त नहीं रखना चाहता है। मद संख्या 45 के बारे में राज्य ने पूछा है कि इसे किस तरह लागू किया जाये जिससे उनका लक्ष्य प्राप्त हो जाये। हिज हाइनेस मद संख्या 48, 49, 50, 51, 52, 54, 55, 56, 57 तथा 58 पर सम्मिलन करने के इच्छुक नहीं हैं।

    बीकानेर: संघ के विरुद्ध पैंतरा

    अगस्त 1936 में महाराजा बीकानेर को वायसराय द्वारा फ्रांसिस वायली को निजी दूत के रूप में बीकानेर भ्रमण हेतु नियुक्त किये जाने की सूचना मिली। महाराजा ने वायसराय को भेजे उत्तर में अपने सहयोग के प्रति आश्वस्त किया। दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में महाराजा और उसके प्रतिनिधियों ने वायली के साथ संघीय विचार विमर्श किया। वायसराय को भेजी गयी रिपोर्ट में वायली ने महाराजा गंगासिंह के रुख को स्पष्ट करते हुए लिखा कि 29 दिसम्बर तथा उसके बाद के दिनों में बीकानेर राज्य के साथ संघीय विचार विमर्श किया गया। बैठक में जो कुछ हुआ उसका सारांश मैंने अलग से एक नोट में लिखा है। जैसा कि पटियाला के प्रकरण में हुआ, मुझे भय है कि आप उसे भयानक दस्तावेज के रूप में पायेंगे। संघीय विचार विमर्श के दौरान मैं अब तक जहाँ कहीं भी गया हूँ मैंने संघीय विचार के प्रति ऐसा दृढ़ विरोध अन्यत्र कहीं नहीं पाया जैसा कि बीकानेर महाराजा ने किया। ऐसा रुग्ण दृष्टिकोण उन्हें अनुकूल कैसे जान पड़ा, इसके बारे में जोर देना अनावश्यक है।

    महाराजा गंगासिंह ने निर्धारित समय सीमा में भारत सरकार को समुचित प्रत्युत्तर भिजवाने में भी यह कहकर अपनी असमर्थता व्यक्त की कि वायली ने विचार विमर्श 31 दिसम्बर 1936 को ही पूर्ण किया है तथा विचार विमर्श का अभिलेख अत्यंत लम्बा है जो कि अगले चार या पाँच दिन में तैयार नहीं हो पायेगा। बीकानेर सरकार विचार विमर्श के आलोक में कुछ बिंदुओं पर नये सिरे से विचार करना चाहती है। इसके अतिरिक्त महाराजा 27 जनवरी तक अवकाश पर रहेंगे इसलिये भारत सरकार को उसके बाद ही उत्तर भेजा जा सकेगा। 7 जनवरी 1937 को राजनीतिक सचिव ने ए.जी.जी. को निर्देशित किया कि वह बीकानेर महाराजा को फरवरी के आरंभ में जवाब भेजने के लिये स्मरण करवाये।

    अप्रेल 1937 में राजपूताना के रेजीडेंट ने भारत सरकार को बीकानेर राज्य द्वारा संघ में सम्मिलन के सम्बन्ध में भिजवाये गये उत्तर की जानकारी भेजी- महाराजा ने कराधान, राज्य के भीतर भूमि या सम्पत्ति के अधिग्रहण तथा राज्य में करारोपण के सम्बन्ध में संघीय विधान की शक्तियों के बारे में कुछ शर्तें रखी हैं। उन्होंने संघीय अभिकरणों, अधिकारियों एवं प्रतिनिधियों पर जबकि वे राज्य में अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर रहे हों, राज्य के कानून लगाने की इच्छा व्यक्त की है। हिज हाइनेस बिना किसी शर्त के संघीय सूची की मद संख्या 6, 9, 13, 18, 21, 22, 23 तथा 28 पर सम्मिलन करना स्वीकार करते हैं, मद संख्या 1, 2, 3, 4, 5, 7, 8, 10, 11, 12, 14, 15, 16, 17, 19, 20, 24, 25, 26, 27, 29, 30, 31, 32, 33, 34, 35, 37, 38, 39, 40, 41, 42, 43, 44, 45, 46, 47, 58 तथा 59 को शर्तों के साथ स्वीकार करते हैं तथा मद संख्या 36, 48, 50, 51, 52, 53, 54, 55, 56 तथा 57 पर सम्मिलन करने के इच्छुक नहीं हैं।

    1937 के आरंभ में वायसराय के विशेष अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट वायसराय को प्रस्तुत कर दी जिसमें कहा गया कि शासक संघ में सम्मिलन के प्रश्न पर सौदेबाजी करने की इच्छा रखते हैं तथा कई तरह की सुविधायें चाहते हैं। सर आर्थर लोथियान ने अपनी रिपोर्ट में मिशन की असफलता के छः कारण बताये-

    (1.) समय का बीत जाना।

    (2.) 1939 में युद्ध का आरंभ हो जाना।

    (3.) भारत सरकार अधिनियम 1935 में आंतरिक व्यवधानों की स्थिति से निबटने के लिये किये गये प्रावधानों की अपर्याप्तता के आधार पर राजाओं का यह मानना कि संघ में भी उनके अधिकारों की सुरक्षा पर्याप्त सिद्ध नहीं होगी।

    (4.) संघीय योजना के लाभों को समझने में राजाओं की अदूरदर्शिता।

    (5.) राजाओं के संघ में मिलने से रोकने के लिये किये जाने वाले प्रयासों के विरुद्ध कार्यवाही का निषेध।

    (6.) अधिनियम में किये गये उन प्रावधानों की प्रवृत्ति जिनमें मोलभाव तथा लगातार विलम्ब की संभावना को बनाये रखा गया है।

    यदि व्हाइट हॉल, समझौता वार्ताओं को सम्पूर्ण ढांचे के बंधन के अवसर के रूप में व्यवहृत नहीं करता तो इतना विलम्ब नहीं हुआ होता। इन सारी बातों के विरुद्ध ब्रिटेन में प्रतिपक्ष के नेता चर्चिल को भी संघीय योजना की असफलता के लिये जिम्मेदार माना जा सकता है जो कि पूरी योजना को ही ध्वस्त करने के लिये कटिबद्ध थे। अधिकतर शासकों (जिनमें बड़ी रियासतें भी सम्मिलित थीं), ने मांग की कि उनके वर्तमान में मौजूद राजस्व के स्रोतों को संघ के समय में भी बने रहने का अधिकार दिया जाये। राज्यों की इस मांग का समर्थन वायसराय लिनलिथगो द्वारा भी किया गया। राज्य सचिव ने वायसराय के इस प्रस्ताव का विरोध किया। उनकी दृष्टि में यह ब्रिटिश भारत की कीमत पर राज्यों के हित में किया गया स्थायी परिवर्तन होगा। यह संघ की मूल भावना के विरुद्ध होगा तथा ब्रिटेन तथा भारत में इसका बड़ा भारी विरोध होगा। जब राजनीतिक विभाग ने देखा कि राज्य सचिव वित्तीय मामलों पर राज्यों की यथापूर्व स्थिति को बनाये रखने के लिये संविधान में परिवर्तन करने को तैयार नहीं है तो राजनीतिक विभाग ने इस संभावना को तलाषना आरंभ किया कि वर्तमान संविधान के अंतर्गत ही राज्यों की मांगों को कहाँ तक पूरा किया जा सकता है तथा शासकों को कहाँ तक संतुष्ट किया जा सकता है!

    एक ओर तो राजा लोग अपने स्वार्थ की लड़ाई लड़ रहे थे तो दूसरी ओर राष्ट्रीय नेता भी ब्रिटिश प्रांतों के सम्बन्ध में किये गये प्रावधानों से संतुष्ट नहीं थे। संघीय योजना के उन प्रावधानों को देखते हुए जिनके अनुसार प्रान्तीय स्वशासन की स्थापना नाम मात्र के लिये भी नहीं थी, कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने इस व्यवस्था का विरोध किया। जिन्ना ने संघ योजना को अस्वीकार करते हुए कहा कि राजाओं ने संघ योजना को असंभव शर्तों से पूर्णतः खराब कर दिया है। उस समय केवल हिन्दू महासभा ही एक मात्र ऐसा राजनीतिक दल था जो अब भी संघ योजना के समर्थन में था। देशी राज्यों तथा ब्रिटिश भारत, दोनों ही पक्षों की तरफ से हो रहे विरोध के उपरांत भी ब्रिटिश सरकार ने अप्रेल 1937 से भारत सरकार अधिनियम 1935 को लागू कर दिया। अक्टूबर 1937 से संघीय न्यायालय ने कार्य करना आरंभ कर दिया।

    मई 1937 में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मारकीस ऑफ जेटलैण्ड ने ब्रिटेन में भारतीय शासकों एवं ब्रिटिश भारतीय नेताओं से वार्तालाप किया तथा पाया कि सामान्यतः राजा लोग संघ में सम्मिलन के इच्छुक नहीं थे तथा वायसराय सौदा बेचने के अनिच्छुक लोगों के साथ मोल-भाव कर रहा था। वायसराय के प्रस्तावों ने राजाओं की आकांक्षाओं को बढ़ा दिया था। यदि राजाओं को यह अनुभव करवाया जाता कि वे संघ के भीतर अधिक सुरक्षित और आरामदेह स्थिति में होंगे तो स्थिति कुछ भिन्न होती। इनके अतिरिक्त अलग-अलग राजा से निश्चित मदों पर मोलभाव करने में अधिक खतरा था।

    जून 1937 में अपने जुबली दरबार के आयोजन से पहले गंगासिंह ने लंदन में घोषणा की कि ब्रिटेन के साथ अपने सम्बन्ध तोड़ने की स्वीकृति देने की अपेक्षा वे और उनके आदमी लड़ते हुए मिट जाना पसंद करेंगे। गंगासिंह ने बीकानेर में आयोजित अपने जुबली दरबार के अवसर पर लॉर्ड लिनलिथगो को सम्राट के प्रति अपनी स्वामिभक्ति का विश्वास दिलाते हुए कहा- मैं बुरे समय में राज्य के समस्त स्रोतों, आदमियों और सम्पत्ति को महामना सम्राट के निष्पादन पर समर्पित कर देने को तैयार हूँ। वायसराय ने सम्राट के प्रति महाराजा की स्वामिभक्ति और उनके द्वारा दी गयी अद्भुत सेवाओं की प्रशंसा की।

    1938 में जब जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया की मांग की तो बीकानेर नेरश गंगासिंह ने केबल भेजकर सम्राट जॉर्ज षष्ठम् से अनुरोध किया कि उसकी अपनी तलवार, सेना तथा राज्य के समस्त संसाधन सम्राट के नियंत्रण में रखे जायें। सम्राट ने इन अनुरोधों की सराहना की। नवम्बर 1938 में राज्यों के शासकों ने घोषणा की कि राष्ट्र की बदलती हुई परिस्थितियों में उनके तथा उनके उत्तराधिकारियों के लिये असंभव होगा कि वे विशिष्ट एवं प्रभावी सुरक्षात्मक उपायों की सहायता के बिना ब्रिटिश क्राउन, अपने राज्य तथा अपनी प्रजा के प्रति कर्त्तव्यों का निर्वहन कर सकें।

    जनवरी 1939 में वायसराय लिनलिथगो ने राज्यों के शासकों को उनकी मांगों, आशंकाओं तथा प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया एक पुनरीक्षित प्रविष्ठ संलेख (Revised Instrument of Accession) भिजवाया। इसे अखिल भारतीय संघ निर्माण की दिशा में वायसराय लिनलिथगो की ओर से किया गया अंतिम प्रयास माना जाता है। वायसराय द्वारा भेजे गये परिपत्र में कहा गया कि शासक वायसराय को छः माह के भीतर सूचित करें कि क्या वे इन नयी शर्तों पर संघ में सम्मिलन के लिये तैयार हैं?

    1939 में जब ये प्रविष्ठ संलेख शासकों को भिजवाये गये, उस समय कोनार्ड कोरफील्ड राजपूताने के रेजीडेंट का कार्य देख रहा था। जब ये संलेख राजाओं को मिले तो उनमें से कईयों ने पोलिटिकल एजेंण्टों से सलाह मांगी। बीकानेर के महाराजा पहले से ही संघ में न मिलने का निश्चय कर चुके थे। यहाँ तक कि वे संघ का विरोध करने वाले शासकों का नेतृत्व भी कर रहे थे किंतु कुछ शासक महाराजा बीकानेर का अनुसरण करने की इच्छा नहीं रखते थे तथा राजनीतिक अधिकारियों की राय जानना चाहते थे। अधिकतर शासक यह जानना चाहते थे कि यदि वे प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर देते हैं तो क्या वे राज्य के दीर्घ इतिहास, परम्परा और निष्ठा के प्रति अविश्वसनीय हो जायेंगे? एक शासक जो कई विवादों के बाद राज्य का उत्तराधिकारी बना था, उसने कोरफील्ड से पूछा कि क्या मुझे भी हस्ताक्षर कर देने चाहिये? कोरफील्ड ने उत्तर दिया कि ऐसा करने से क्राउन प्रतिनिधि राजा की शासकीय योग्यता से प्रभावित होगा।

    एक अन्य शासक जो कि एक बार राजपूताना की समस्त रियासतों का नेता स्वीकार किया गया था, वह इस सुझाव से प्रभावित था कि यदि वह सबसे पहले हस्ताक्षर करता है तो ऐसा करके वह अपने अन्य राजपूत शासक भाईयों का नेतृत्व करेगा। एक तीसरे शासक ने यह दृष्टिकोण अपनाया कि वह अपने (ब्रिटिश मूल के) प्रधानमंत्री की सलाह लेने के अतिरिक्त शायद ही कुछ अच्छा कर सकता था जिस पर कि वह पूरी तरह विश्वास करता था। लॉर्ड लिनलिथगो ने कोरफील्ड को बताया कि केवल राजपूताना ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ से आवश्यक 50 प्रतिशत शासकों की सहमति प्राप्त हो चुकी है किंतु बडे़ राज्यों की सहमति के बिना, 50 प्रतिशत जनसंख्या वाली शर्त पूरी नहीं हो सकती थी इसलिये इन राज्यों की सहमति का कोई परिणाम नहीं निकलने वाला था।

    बम्बई में आयोजित राजाओं व उनके मंत्रियों के दूसरे सम्मेलन में एक प्रस्ताव पारित किया गया कि पुनरीक्षित प्रविष्ठ संलेख में दी गयी नवीनीकृत शर्तें भी मूल रूप से असंतोषजनक हैं तथा हैदरी समिति के अनुसार नहीं हैं जिन्हें कि ग्वालियर सम्मेलन द्वारा सुनिश्चित किया गया था, इसलिये शासकों को स्वीकार्य नहीं हैं। कुछ राजाओं का व्यवहार देखने वाला था। उन्होंने अनौपचारिक बैठकों में कोई निश्चित रुख नहीं अपनाया अपितु वे बार बार राजनीतिक विभाग के पास भागते और उनसे कुछ छूट देने की प्रार्थना करते। राजनीतिक विभाग के अधिकारी वासयराय से बात करने के लिये जाते। इस प्रकार मेरी गो राउंड जैसी स्थिति बन गयी।

    28 फरवरी 1939 को वायसराय के सम्मान में जयपुर में राज्य की ओर से आयोजित भोज में महाराजा सवाई मानसिंह ने अपने भाषण में वायसराय को आष्वस्त किया कि मैंने सावधानी पूर्वक प्रविष्ठ संलेख के प्रारूप पर विचार किया है, जो कि हाल ही में प्राप्त हुआ है। 1 मार्च 1939 को वायसराय के सम्मान में जोधपुर में राज्य की ओर से आयोजित भोज में महाराजा उम्मेदसिंह ने दोहराया कि जोधपुर को संघ में प्रवेश करने से जी चुराने की कोई आवश्यकता नहीं है। राज्य के कई विभागों में तो हम संघ को पिछले कई वर्षों से अपना भी चुके हैं......संघ का प्रारूप भारत को ब्रिटिश कॉमनवैल्थ के अधीन एक मजबूत स्वशासी इकाई बनाने के लिये तैयार किया गया है ताकि भविष्य में हम न केवल अपने मामलों को सुलझा सकें अपितु स्वतंत्रता की रक्षा और स्वतंत्र संविधान के लिये शनैः-शनैः महान ब्रिटिश साम्राज्य के साथ खड़े हो सकें। वायसराय ने जोधपुर नरेश की इस मनोवृत्ति की प्रशंसा की।

    4 मार्च 1939 को वायसराय लिनलिथगो उदयपुर आये। उनके सम्मान में राज्य की ओर से आयोजित भोज के अवसर पर महाराणा ने अपने भाषण में कहा कि चूंकि वे प्रविष्ठ संलेख के प्रारूप पर विचार कर रहे हैं इसलिये उसके बारे में कोई रुख स्पष्ट करना अवधि पूर्व कदम होगा। इस पर लिनलिथगो ने अपने भाषण में महाराणा को जवाब दिया कि मैं केवल यह दोहराना चाहूंगा कि भारतीय राज्यों तथा वस्तुतः संपूर्ण भारत के सम्बन्ध में मूलभूत महत्त्व के इस प्रकरण में निर्णय केवल एक ही है कि उसे सम्बन्धित राजा के व्यक्तिगत निर्धारण के लिये छोड़ दिया गया है।

    वायसराय लिनलिथगो ने महाराजा गंगासिंह को लिखा कि संघ योजना के सम्बन्ध में इस समय घोषित की गयी शर्तों के बारे में वास्तविक रूप से समझ लिया जाना चाहिये कि अब इनमें और अधिक शिथिलिकरण की गुंजाइश नहीं है। क्योंकि ये शर्तें उस दूरतम सीमा का प्रतिनिधित्व करती हैं जहाँ तक समस्त वाद विषयों पर जिनमें राज्यों के कल्याण एवं हितों को सुरक्षित करने के विषय को प्रमुख रूप से ध्यान में रखा गया था, अधिकतम गंभीर प्रयास करने के पश्चात् राज्यों द्वारा व्यक्त की गयी आकांक्षाओं एवं आशंकाओं को तुष्ट करने के लिये महामान्य सम्राट की सरकार ने किया जाना सम्भव पाया।

    महाराजा गंगासिंह ने बड़े असंतोष के साथ वायसराय लिनलिथगो को लिखा कि राज्यों को उनकी संधियों तथा समझौतों से उद्भूत होने वाले उनके अधिकारों के सम्बन्ध में पर्याप्त संरक्षण नहीं दिया गया है तथा राज्य इन अधिकारों को त्यागने के लिये उद्यत नहीं हैं। संघीय विषयों की सूची को अत्यंत बढ़ा दिया गया है तथा राज्यों द्वारा संघीय कानूनों की व्यवस्था करने के जो अंतिम प्रस्ताव रखे गये हैं वे न केवल समझौता वार्ताओं की विभिन्न अवस्थाओं में प्रतिपादित किये गये प्रस्तावों से मूल रूप में भिन्न हैं अपितु तत्वतः भी भिन्न हैं। महाराजा ने लिनलिथगो को स्पष्ट रूप से कह दिया कि उनके लिये इसके सिवाय और कोई चारा नहीं है कि वे संघ में सम्मिलित होने से अलग रहें। महाराजा ने अपने राज्य को भारतीय संघ में सम्मिलित न करने का कारण अंग्रेजी प्रांतों में व्याप्त विध्वंसक प्रवृत्तियों को बताया जिनका प्रभाव समीपवर्ती राज्यों की सत्ता पर क्षति पहुँचाने वाला हो सकता था। उन्होंने इस बात की गारंटी मांगी कि तत्काल या भविष्य में किसी समय मेरे राज्य पर इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    गंगासिंह ने अपने पत्र में यह भी लिखा कि यद्यपि संघ के कानूनी ढांचे को ऐसा बनाया गया है कि इकाईयों को पूर्ण आंतरिक स्वायत्तता रहे किंतु यह स्पष्ट है कि जिन राजनैतिक दलों के कार्यक्रम में राजाओं और उनकी रियासतों को कोई स्थान नहीं है, उनके दबाव में आकर कुछ प्रांतीय सरकारों द्वारा यह मूल बात हटाई जा सकती है और बचाव निरर्थक किये जा सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में संघ में सम्मिलित होना उस विनाशकारी आंदोलन को बढ़ावा देने के समान होगा, जिसका उद्देश्य रियासतों के लोगों को अपने शासकों के प्रति जो राजभक्ति है, उससे विमुख करना है। उन्होंने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि अगर उन्हें संघ में सम्मिलित होने का विकल्प मानना पड़े तो इसका मतलब उनको ऐसे लोगों के साथ काम करना होगा जिनका उद्देश्य पूर्ण स्वतंत्रता है और जो खुले रूप से साम्राज्य के विरोधी हैं। ऐसा करना उनके दृढ़ विश्वास के विपरीत होगा। अतः इसके सिवाय और कोई चारा नहीं है कि वे संघ में सम्मिलित होने से अलग रहें।

    21 अगस्त 1939 को शिमला में आयोजित नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति की बैठक में वायसराय ने कहा कि मैंने राज्यों को संघ योजना की सिफारिश नहीं की होती यदि मैं स्वयं इससे संतुष्ट नहीं होता कि इस योजना में राजाओं के भविष्य की पूर्ण और प्रभावी सुरक्षा निहित है। उन्होंने घोषणा की कि इस प्रस्ताव में उन सुरक्षात्मक उपायों को साकार किया गया है जिन्हें कि उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु महामना सम्राट की सरकार समुचित एवं पर्याप्त समझती है। संघ में देशी राज्यों के शासकों की आवाज बहुत महत्त्वपूर्ण होगी। उनके लिये निम्न सदन में 125 सीटें अर्थात् 1/3 सीटें तथा उच्च सदन में 104 सीटें अर्थात् 2/5 सीटें निर्धारित की गयी हैं। वायसराय ने कहा कि एक राजा ने यह सुझाव दिया है कि वह संघ के प्रस्ताव का विरोध करके ब्रिटिश क्राउन के प्रति अपनी राज्यभक्ति प्रदर्शित करेगा, इससे अधिक बेतुका अथवा असंगत सुझाव हो ही नहीं सकता। अनुमान होता है कि वायसराय का संकेत महाराजा गंगासिंह की तरफ था।

    गंगासिंह के इस रवैये पर करणीसिंह ने अपनी ओर से सफाई दी है कि महाराजा गंगासिंह में तीन निष्ठायें साथ-साथ काम कर रही थीं। उनकी प्रथम निष्ठा सम्राट की प्रति थी। यह उनमें धार्मिक पवित्रता का रूप ले चुकी थी। वे एक क्षण के लिये भी नहीं सोच सकते थे कि भारत, सम्राट से अपने सम्बन्ध तोड़ ले अथवा साम्राज्य से अलग हो जाये। उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत, राष्ट्र मंडल का सदस्य रहकर ही उन्नति कर सकता है और सुरक्षित रह सकता है। उनका मत था कि भारत की सीमायें दूर-दूर तक फैली हुई हैं और वे अंग्रेजी समुद्री बेड़े और सेना की शक्ति से ही सुरक्षित रह सकती हैं। साथ ही भारत का व्यवस्थित और शांतिपूर्ण विकास ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा प्रदत्त सुविधाओं और साधनों पर काफी निर्भर है। वस्तुतः बीकानेर राज्य परिवार के सदस्य होने के कारण करणीसिंह यह मानने को तैयार नहीं थे कि इन सब बातों की आड़ में महाराजा गंगासिंह अपने अधिकारों को छोड़ने के लिये तैयार नहीं थे। वे ऊपर से तो संघ के समर्थन का ढिंढोरा पीट रहे थे किंतु अंदर ही अंदर इसके घनघोर विरोधी थे।

    ब्रिटिश भारत के राजनैतिक दलों की प्रतिक्रियावादी और शत्रुतापूर्ण प्रवृत्ति ने राजाओं के मन में एक स्वाभाविक अविश्वास और संदेह उत्पन्न कर दिया। न केवल अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये, जो एक मूल प्रवृत्ति है बल्कि संघ की अपनी मूल धारणा को पूर्ण न होते देख कर भी राजा लोग निराश हो गये। जो भी हो, राजाओं के सौभाग्य से 3 सितम्बर 1939 को द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हो गया। ब्रिटिश सरकार ने प्रजातंत्र और स्वतंत्रता के नाम पर भारतीयों से अपील की कि वे साम्राज्य की रक्षा करें। 11 सितम्बर 1939 को वायसराय ने दोनों सदनों में घोषणा की कि अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण भारत संघ के निर्माण की योजना स्थगित की जा रही है। इस प्रकार संघ योजना असफल हो गयी तथा विगत 12 वर्षों से भी अधिक समय में व्यय किया गया धन, श्रम एवं समय व्यर्थ चला गया।

    देशी राजाओं के अड़ियल रवैये को देखते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ई.1938 के हरिपुरा सम्मेलन में और उसके पश्चात ऑल इण्डिया स्टेट्स पीपुल्स कान्फ्रेंस ने ई.1939 के लुधियाना सम्मेलन में भारतीय राज्यों को भारत का अभिन्न अंग बनाने का संकल्प व्यक्त किया। लुधियाना सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि भारतीय राज्यों का अस्तित्व इसलिये बचा रहा क्योंकि अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने उन्हें कृत्रिम समर्थन दिया हुआ था। इनमें आंतरिक जीवन रस सूख चुका था और इनकी शक्ति केवल अंग्रेजी साम्राज्यवाद पर आधारित थी। पं. नेहरू ने इन राज्यों द्वारा अंग्रेजों के साथ स्थापित संधियों को भी मानने से इन्कार कर दिया तथा भारतीय राज्यों की पद्धति को भी अस्वीकार्य घोषित कर दिया।

    गांधीजी ने भी राजाओं के रवैये की आलोचना की- जहाँ तक राजाओं का सम्बन्ध है, वे नेशनल एसेम्बली में भाग लेने के लिये स्वतंत्र हैं। यह सभा कुछ व्यक्तियों के स्थान पर चुने हुए लोगों के अनुसार भारत के भाग्य का निर्माण करेगी। मेरा अनुमान है कि राजा ब्रिटिश ताज के चाकर हैं तथा ब्रिटिश ताज के बिना उनका कोई अस्तित्व नहीं है। वे ताज से वरिष्ठ तो हो ही नहीं सकते। यदि ताज जो कि आज पूरे भारत पर शासन कर रहा है, अपनी सत्ता छोड़ने जा रहा है तो राजा भी स्वतः अपनी सत्ता खो देंगे। राजाओं को इस बात पर गर्व होना चाहिये कि ब्रिटिश ताज के उत्तराधिकारी जो कि राजाओं के सम्मान की सुरक्षा करेंगे, भारत के लोग हैं। मैं यह दावा कांग्रेस की ओर से नही, अपितु भारत के लाखों बेजुबान लोगों की ओर से कर रहा हूँ। ब्रिटिश भारत साम्राज्य के निर्माताओं ने इसके चार स्तंभ खड़े किये हैं- यूरोपियन हित, सेना, राजा लोग, सांप्रदायिक विभाजन। आखिरी तीन स्तंभों को पहले स्तंभ की सेवा करनी है। यदि साम्राज्य निर्माताओं को सम्राज्य समाप्त करना है तो उन्हें ये चारों स्तंभ नष्ट करने होंगे किंतु वे राष्ट्रवादी लोगों अथवा साम्राज्यवादी भावना के विध्वंसक लोगों से कहते हैं कि तुम्हें इन चारों स्तंभों से स्वयं निबटना होगा। दूसरे शब्दों में वे ये कह रहे हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की गारण्टी दो, अपनी सेना स्वयं बनाओ तथा राजाओं और अल्पसंख्यक कहे जाने वाले साम्प्रदायिक लोगों से निबटो। साम्राज्य को नष्ट करने को आतुर लोगों का कहना है कि तुमने (अंग्रेजों ने) यूरापीय लोगों के हितों को हम पर लादा, उनकी रक्षा के लिये सेना बनायी और उन हितों की बेहतरी से सुरक्षा की, तुमने अपने उद्देश्यों के लिये तत्कालीन राजाओं का उपयोग किया। तुमने उन्हें बनाया और बिगाड़ा, नये राजाओं का निर्माण किया, तुमने उन्हें शक्तियां दीं, इससे पहले वे सुरक्षा के साथ आनंद नहीं मना सकते थे। वास्तव में तुमने भारत का विभाजन कर दिया ताकि पूरा देश एक साथ तुम्हारे विरुद्ध खड़ा नहीं हो सके।

    राष्ट्रीय नेताओं का यह भी मानना था कि यद्यपि संघ हमारे लिये अपरिहार्य है किंतु इसके लिये हम कोई बड़ी कीमत नहीं चुकाना चाहते। यदि संघ के निर्माण के लिये हमसे अत्यधिक कीमत मांगी जाती है तो उचित यह होगा कि हम अधिक अनुकूल परिस्थितियों के आने तक प्रतीक्षा करें। इस प्रकार ई.1937-39 के मध्य भारतीय संघ में सम्मिलित होने से इन्कार करके शासकों ने अविश्वसनीय अयोग्यता का परिचय दिया तथा अपने महत्त्व को सदा के लिये कम करवा लिया। उन पर न तो राष्ट्रीय नेता और न ही अंग्रेज किसी तर्क संगत नीति अपनाने के लिये भरोसा कर सकते थे। वे केवल अपने सम्मान, गौरव, प्रतिष्ठा में इतने डूबे रहे कि उन्हें पानी के गहरे होने का अनुभव ही नहीं हुआ। 1939 के पश्चात् उनके प्रभाव के घटने में अधिक समय नहीं लगा।

    संघ योजना की विफलता के लिये ब्रिटिश सरकार जिम्मेदार

    तत्कालीन राष्ट्रीय नेताओं द्वारा ब्रिटिश सरकार पर लगाया गया यह आरोप सत्य जान पड़ता है कि ब्रिटिश सरकार ही राजाओं के माध्यम से संघ निर्माण की योजना में रोड़े अटका रही थी। यदि अधिनियम में संघ निर्माण के लिये रखी गयी केवल इसी शर्त की जाँच की जाये कि देशी राज्यों को संघ में मिलाया जाना केवल उसी स्थिति में संभव था जबकि कम से कम इतने देशी राज्य संघ में सम्मिलित होने की सहमति दें, जिनके द्वारा काउंसिल ऑफ स्टेट्स में कम से कम 52 प्रतिनिधि भेजे जाते हों तथा संघ में सम्मिलित होने की घोषणा करने वाले राज्यों की जनसंख्या देशी राज्यों की कुल जनसंख्या के 50 प्रतिशत से कम न हो, तो भी ब्रिटिश सरकार के इरादों की सच्चाई सामने आ जायेगी। उस समय भारत के देशी राज्यों में रहने वाली जनसंख्या 7 करोड़़ 90 लाख थी जिसका 50 प्रतिशत 3 करोड़़ 95 लाख होता है। जबकि भारत की सबसे बड़ी केवल 17 रियासतों की जनसंख्या 5 करोड़़ 3 लाख 77 हजार थी जो कि कुल रियासती जनसंख्या की तीन चौथाई थी किंतु इन रियासतों के संघ में मिलने का निर्णय लेने पर भी संघ का निर्माण किया जाना संभव नहीं था क्योंकि इन रियासतों द्वारा काउंसिल ऑफ स्टेट्स में मात्र 41 सदस्य ही भेजे जाने थे। संघ निर्माण के लिये अधिनियम में यह अत्यंत अव्यवहारिक शर्त रखी गयी थी।

    भारत सरकार अधिनियम 1935 की प्रथम सूची के अनुभाग XVII में वर्णित लघु राज्यों को संघीय प्रस्ताव नहीं भेजे गये क्योंकि योजना के आरंभिक चरण में यह विचार था कि ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तथा सक्षम राज्यों का ही संघ बनाया जाये तथा बाद में लघु राज्यों को इसमें सम्मिलित किया जाये। भारत सचिव का मानना था कि लघु राज्यों को पृथक इकाई के रूप में संघ में सम्मिलित किये जाने में तीन कठिनाइयां थीं-

    (1) इन राज्यों में प्रशासनिक व्यय चलाने के लिये आर्थिक स्रोत पर्याप्त नहीं थे। इन राज्यों की जनता संघ में प्रवेश पाने के बाद इस बात की प्रत्याशा करती कि उन्हें भी वैसा ही प्रशासन मिले जैसा कि बड़े राज्यों में है या ब्रिटिश भारतीय प्रांतों में है।

    (2) इन राज्यों के कार्मिक बहुत कम वेतन पाते थे तथा उनका प्रशिक्षण भी पर्याप्त नहीं था। वे इतने सक्षम सिद्ध होने वाले नहीं थे कि संघीय कानून के अनुसार प्रशासन चला पाते।

    (3) ब्रिटिश भारत के प्रमुख राजनीतिक घटकों की रुचि इस बात में थी कि रियासती प्रजा संवैधानिक संघर्ष में उलझ जाये तथा राज्य के प्रशासन में प्रत्यक्ष तथा निर्णयकारी भागीदारी प्राप्त करे। बड़े राज्यों में तो इस प्रकार के आंदोलनों को समाप्त किया जाना सरल था किंतु लघु राज्यों में राज्यों के प्रशासन के लिये इस प्रकार के आंदोलनों पर नियंत्रण पाने के लिये पर्याप्त साधन नहीं थे।

    संघ योजना के असफल हो जाने के बाद टिप्पणी की गयी कि इसकी जड़ें सड़ी हुई हैं, पूरा ढांचा रद्दी वस्तुओं से बनाया गया है जिसके बाहर की ओर वार्निश, पॉलिश, रंग करके उसे नया रूप दे दिया गया है। इस प्रकार की जड़ों से किसी स्वस्थ विकास की आशा नहीं की जा सकती। इस प्रकार की संरचना में किसी प्रसन्नतादायी जीवन की संभावना नहीं हो सकती।

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