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  • अध्याय-4 : युद्ध-काल एवं उसके पश्चात् देशी राज्यों के प्रति ब्रिटिश नीति

     06.12.2017
    अध्याय-4 : युद्ध-काल एवं उसके पश्चात् देशी राज्यों के प्रति ब्रिटिश नीति

    अध्याय-4


    युद्ध-काल एवं उसके पश्चात् देशी राज्यों के प्रति ब्रिटिश नीति

    क्रिप्स मिशन से देशी नरेशों को यह अप्रिय तथ्य ज्ञात हुआ कि यदि ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों के हितों में टकराव हुआ तो ब्रिटिश सरकार निश्चित रूप से देशी राज्यों को नीचा दिखायेगी। -वी. पी. मेनन।

    मार्च 1940 में नयी दिल्ली में अयोजित नरेन्द्र मण्डल की बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया कि भारत के राजा अपने राज्यों की सम्प्रभुता की गारण्टी, संधि में प्रदत्त अधिकारों की सुरक्षा तथा ब्रिटिश प्रभुसत्ता के किसी अन्य भारतीय सत्ता को स्थानांतरण से पूर्व राजाओं की सहमति प्राप्त किये जाने की अनिवार्यता की शर्त पर ही डोमिनियन स्टेटस के लिये अपनी स्वीकृति प्रदान करेंगे। 'द टाइम्स' ने इस पर टिप्पणी की कि यह प्रस्ताव प्रदर्शित करता है कि भारतीय राजा संवैधानिक प्रगति तथा भारतीय आजादी का विरोध करते हैं। नरेन्द्र मण्डल के प्रस्ताव में कहा गया कि संविधान बनाये जाने के लिये नरेशगण ऐसे किसी भी विचार विमर्श में सम्मिलित होने के लिये तैयार हैं जो कि वायसराय द्वारा आरंभ किया गया हो किंतु तभी जबकि राजाओं की आवाज को उनकी महत्ता और ऐतिहासिक स्थिति के अनुसार आनुपातिक रूप से प्रमुखता दी जाये। द टाइम्स ने प्रस्ताव के इस बिंदु पर टिप्पणी की कि यह प्रस्ताव उन राजाओं के विरुद्ध है जो समस्त समस्याओं के निवारण के लिये संविधान सभा के निर्माण का विरोध करते हैं।

    सम्मेलन में महाराजा बीकानेर ने कहा कि राजाओं ने विगत 10 वर्षों में अपनी स्थिति बिना किसी त्रुटि के स्पष्ट की है। उन्होंने संवैधानिक सुधारों का समर्थन किया है जो ब्रिटिश ताज के अधीन डोमिनियन स्टेटस की ओर ले जाते हैं और इस समय वे केवल अपनी सम्प्रभुता की गारण्टी और सुरक्षा पर जोर दे रहे हैं, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं कर रहे हैं। गंगासिंह ने कहा कि भारत के समस्त प्रमुख राजनीतिक धड़ों में राजाओं को विश्वास में लिये बिना भारत का भविष्य निर्धारित किये जाने की मनोवृत्ति के परिप्रेक्ष्य में यह दोहराया जाना उपयुक्त था कि राज्यों की पूर्ण स्वतंत्रता तथा ब्रिटिश सत्ता के साथ चुनौती विहीन समानता को ध्यान में रखे बिना लिया गया कोई भी फैसला राजाओं को स्वीकार्य नहीं होगा। संवैधानिक समझौता दो पक्षों के बीच नहीं अपितु तीन पक्षों- ब्रिटिश ताज, ब्रिटिश भारत तथा देशी राज्यों के मध्य होना चाहिये। अब तक यह देखा गया है कि भारतीय राजा तस्वीर में ही नहीं लाये गये हैं। इसलिये इंगलैण्ड की प्रमुख राजनैतिक पार्टियों को चाहिये कि वे ब्रिटिश सरकार से प्रत्यक्ष वार्तालाप करें।

    महाराजा गंगासिंह ने कांग्रेस के इस दृष्टिकोण से असहमति जताई कि देशी राज्य अंग्रेजी साम्राज्य की उपज हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय राज्य भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना से भी पुराने हैं। देशी राज्य संधियों के माध्यम से व्यावहारिक सम्बन्धों के अंतर्गत आये। राजाओं के दावे हल्के रूप से लेकर खारिज नहीं किये जा सकते। ब्रिटिश भारत ब्रिटिश सरकार की उपज है। इससे पूर्व तो पूरा देश भारतीय राजाओं के अधीन था। देशी राजा कांग्रेस से अमित्रता पूर्वक नहीं थे अपितु कांग्रेस ही लगातार देशी राजाओं के प्रति सक्रिय विरोध का प्रदर्शन करती रही है।

    राजाओं ने ब्रिटिश ताज के प्रति वफादारी निभाने तथा साम्राज्य के प्रति सहयोग करते रहने का प्रस्ताव भी पारित किया। इस पर द टाइम्स ने टिप्पणी की कि ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा, आवश्यकता पड़ने पर देशी राजाओं के इस प्रस्ताव से लाभ उठाने की तैयारियां कर ली गयी हैं तथा भारतीय सैनिक टुकड़ियां ब्रिटिश सेनाओं के साथ मिलकर युद्ध में भाग ले रही हैं। सम्मेलन में वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने कहा कि यद्यपि संघीय योजना स्थगित कर दी गयी है किंतु सरकार विश्वास करती है कि भारतीय एकता केवल संघ के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। संघ को देशी राज्यों की विशेष परिस्थितियों एवं परम्पराओं को अनुमति देनी होगी। देशी राज्यों के बिना अखिल भारतीय संघ वैसा ही अविचारणीय होगा जैसा कि ब्रिटिश भारतीय संघ मुसलमानों के बिना। वायसराय ने बहुसंख्य छोटी रियासतों की समस्याओं की ओर भी राजाओं का ध्यान आकर्षित किया जिनके पास आधुनिक प्रशासन को चलाने के लिये न तो आदमी थे और न धन। सामान्य सेवाओं के निष्पादन के लिये, जहाँ कहीं भी भौगोलिक रूप से संभव हो, इन रियासतों के समूहीकरण द्वारा संघीय इकाईयों के निर्माण की योजना भी वायसराय के मस्तिष्क में थी। इससे इन देशी रियासतों के भारतीय संघ में सम्मिलन का मार्ग सरल हो जाता।

    कांग्रेस द्वारा बीकानेर नरेश के रुख की आलोचना

    गांधीजी के सहयोगी प्यारेलाल ने बीकानेर नरेश द्वारा चैम्बर ऑफ प्रिंसेज में दिये गये भाषण में कांग्रेस की आलोचना पर तीखी टिप्पणी की- 'नरेंद्र मण्डल की बैठक में बीकानेर महाराजा ने कहा बताते हैं कि 'कांग्रेस की तरफ से यह आरोप लगाया जा रहा है कि राजा लोग साम्राज्य की उपज हैं, यह भी कि राजा लोग ब्रिटिश ताज के चाकर हैं तथा ब्रिटिश ताज से अलग उनका कोई स्थान नहीं है, यह भी कि रियासतों का प्रश्न भारत की साम्राज्यिक प्रगति के उद्देश्य के लिये लटकायी गयी मछली है, यह कि रियासतों की समस्या ब्रिटिश सरकार द्वारा खड़ा किया गया भूत है, ........मुझे यह कहने की इजाजत होनी चाहिये कि कई छोटी और बड़ी रियासतें अपने अस्तित्व के लिये अपने प्राचीन शासकों की बलिष्ठ भुजाओं की ऋणी हैं तथा भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना से कहीं अधिक पुरानी हैं।'' दुर्भाग्य से इस प्रकार की बेतुकी बात हो गयी है किंतु यह बहुत विलम्ब से कही गयी है। परमोच्चसत्ता से राजाओं के सम्बन्धों की संवैधानिक स्थिति चाकर अथवा अधीनस्थ सहयोग की है, कोई भी कह सकता है कि यह कांग्रेस की शब्दावली नहीं है। इसकी नींव उस साम्राज्यवादी शासन द्वारा नियुक्त प्रतिनिधियों ने रखी थी जिसके बारे में बीकानेर महाराजा अनेक बार यह कह चुके हैं कि उन्हें इन सम्बन्धों पर गर्व है। महाराजा की इस बात पर उठायी गयी आपत्ति कि राजा ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रचना हैं, भारतीय राज्यों की यह परिभाषा भारत सरकार अधिनियम 1935 में देखी जा सकती है। बीकानेर महाराजा का यह बयान सच नहीं है कि राजा लोग साम्राज्यिक सत्ता की रचना नहीं हैं। सच्चाई यह है कि 562 रियासतों में से अधिकांश रियासतों का निर्माण ब्रिटिश सत्ता ने ही किया है। आज भारतीय रियसातों में आंतरिक प्रशासन के लिये अपनायी गयी पद्धति में न तो राजतंत्र के लिये आवश्यक खूबियां मौजूद हैं, न लोकप्रिय सरकारों की संवैधानिक पद्धतियां मौजूद हैं अपितु वह व्यक्तिपरक शासन है जो कि भारत में साम्राज्यिक पद्धति द्वारा प्रदत्त शासन का सहउत्पाद हैं। यह बात ऐतिहासिक तथ्यों से साम्य नहीं रखती कि ब्रिटिश सत्ता के संपर्क में आने से पूर्व भारतीय राज्य पूर्णतः स्वतंत्र थे। उनमें से कुछ का उद्धार किया गया, कुछ का निर्माण ब्रिटिश सत्ता द्वारा किया गया। परमोच्चता परमोच्चता के माध्यम से ही ये सम्बन्ध मजबूत बनाये गये हैं।...... जिनके ऊपर भारतीय राजा अपनी सुरक्षा के लिये पीढ़ियों से विश्वास कर सकते आये हैं। यदि परमोच्चता को समाप्त कर दिया जाये तो रियासतों के नष्ट होने तथा उन्हें संलग्न कर लिये जाने का अत्यधिक खतरा है। '

    देशी रजवाड़ों के फैडरेशन की योजना

    भारत सरकार द्वारा संघ योजना स्थगित किये जाने के बाद महाराजा गंगासिंह ने सम्राट के संरक्षण में एक ऐसे संघ की कल्पना की जिसमें भारतीय रियासतें समान जागीरदार के रूप में मानी जायें और राजाओं को सीधे वायसराय की देख-रेख में रखकर उनके विशेषाधिकार समझौते के अनुसार सुरक्षित रखे जायें। इसे देखते हुए 1941 में वी. पी. मेनन ने रजवाड़ों के संघ की योजना बनायी जिसके अनुसार रजवाड़ों को ब्रिटिश हिंदुस्तान का हिस्सा बन जाना था। इन राज्यों का आंतरिक प्रशासन राजाओं के ही हाथों में रहना था और सुरक्षा, विदेश तथा यातायात केंद्रीय सरकार के हाथों में ले लिया जाना था। इस योजना से केंद्रीय हिंदुस्तान की नींव पड़ सकती थी किंतु लार्ड लिनलिथगो ने उस योजना को उस कूड़े में डाल दिया जिस पर किसी की नजर भी नहीं पड़ सकती थी।

    द्वितीय विश्वयुद्ध में राजाओं द्वारा स्वामिभक्ति का प्रदर्शन द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ होने पर ब्रिटिश सरकार को राजाओं से आदमी, धन तथा सामग्री के रूप में सहायता की आवश्यकता थी। राजपूताने के राजाओं ने ब्रिटिष सरकार की भरपूर सहायता की। जोधपुर महाराजा ने 26 अगस्त 1939 को वायसराय को तार भेजकर अनुरोध किया कि भयानक अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में मैं यह अनुभव करता हूँ कि महामहिम वायसराय से अनुरोध करना मेरा कर्त्तव्य है कि कृपा करके संकट के समय महामना सम्राट के आदमियों तथा उनके सिंहासन के प्रति मेरी अविचल स्वामिभक्ति के बारे में सूचित किया जाये। मेरी प्रार्थना है कि युद्ध आरंभ होने पर मेरे राज्य के समस्त नागरिक एवं सैन्य संसाधन साम्राज्यिक सरकार के निष्पादन पर रखे जायें।

    जोधपुर नरेश भारत भर के राजाओं में सबसे पहले थे जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत सेवाएं तथा अपने राज्य के समस्त संसाधन साम्राज्यिक सरकार को सौंप दिये थे। वायसराय ने जोधपुर महाराजा को धन्यवाद का तार भिजवाया। जोधपुर का सरदार रिसाला प्रथम भारतीय राज्य इकाई थी जिसे भारतीय सेना में लिया गया तथा मोर्चे पर लड़ने के लिये चयनित किया गया। जोधपुर इन्फैण्ट्री युद्ध क्षेत्र में युद्ध के प्रारंभिक चरण में पहुंची। जोधपुर राज्य के सैनिक पांचवी सेना के साथ इटली के सलेरनो में उतरने वाले प्रथम सैनिक थे। जोधपुर वायु प्रशिक्षण केंद्र का भारतीय वायु सेना के पायलटों के प्रशिक्षण के लिये प्रबंधन किया गया। राज्य की ओर से तीन हवाई जहाज एवं एक गल-ग्लाईडर ब्रिटिश सरकार को दिये गये। वायसराय युद्ध कोष के लिये राज्य की ओर से 3 लाख रुपये तथा जनता की ओर से 20 हजार रुपये दिये गये। राज्य की ओर से 25 हजार रुपये रैडक्रॉस फंड में दिये गये। युद्ध विभाग के लिये जोधपुर रेलवे वैगन निर्माण कारखाने में मीटर गेज के डिब्बे बनाये गये। जोधपुर रेलवे ने फाइटर एयर क्राफ्ट के लिये 4 लाख रुपये दिये। जोधपुर राज्य की जनता की ओर से जोधपुर बॉम्बर के लिये 2 लाख 30 हजार रुपये लंदन भिजवाये गये। राज्य की ओर से 4,71,200 रुपये का सोडियम सल्फेट युद्ध कार्य के लिये उपलब्ध करवाया गया। 1942-43 में जोधपुर की ओर से वायसराय युद्ध कोष के लिये 4 लाख रुपये और भिजवाये गये। इसके अलावा भी बहुत से संसाधन भेजे गये। महाराजा उम्मेदसिंह अपने छोटे भाई के साथ स्वयं युद्ध के मोर्चे पर गये। जब मित्र राष्ट्रों की सेनाएं विजयी हुई तो जोधपुर में विजय समारोह आयोजित किये गये।

    युद्ध आरंभ के अगले दिन अर्थात् 4 सितम्बर 1939 को बीकानेर महाराजा ने युद्ध क्षेत्र में जाने के सम्बन्ध में पूर्व में किये गये अपने अनुरोधों को दोहराया तथा डेढ़ लाख रुपये ब्रिटेन के सम्राट को भिजवाये और एक हजार पाउंड युद्ध कार्यों के लिये दिये। बीकानेर राज्य के गंगा रिसाला को मध्यपूर्व में लड़ने के लिये भेजा गया। गंगासिंह स्वंय रशिया तथा अदन के मोर्चे पर गये। सादुल लाइट इन्फैंट्री को ईराक तथा पर्शिया में लड़ने के लिये भेजा गया। बीकानेर विजय बैटरी ने भी विदेश में जाकर सम्राट की सेनाओं के साथ युद्ध सेवाएं दीं। इस सेना ने अराकान तथा मनिपुर में इन्फैन्ट्री की महत्त्वपूर्ण सहायता की।

    जयपुर नरेश मानसिंह भी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सम्राट को अपनी निजी सेवाएं तथा अपनी सैनिक सेवाएं अर्पित करने वाले प्रथम राजाओं में से थे। उन्हें विश्वास था कि ब्रिटेन नाजी जर्मनी से अपने स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों के लिये नहीं अपितु विश्वशांति तथा सभ्यता के संरक्षण के लिये लड़ रहा था। उनका दृढ़ विश्वास था कि इंगलैण्ड विश्व के नागरिकों के प्रजातांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिये लड़ रहा था। युद्ध आरंभ होने पर जयपुर की प्रथम बैटेलियन मध्य पूर्व में भेजी गयी जहाँ उसे मिश्र, साइप्रस, लीबिया, सीरिया तथा फिलिस्तीन में विभिन्न कामों पर लगाया गया। इसके बाद यह सेना इटली गयी जहाँ उसने जर्मनों के विरुद्ध लड़ते हुए अत्यंत कठिन बिंदु माउंट बफैलो पर अधिकार किया। युद्ध के दौरान प्रदत्त सेवाओं के लिये इस सेना को कई अलंकरण एवं पुरस्कार दिये गये।

    जयपुर नरेश मानसिंह को अपनी सेनाएं मोर्चे पर भेज कर ही संतोष नहीं हुआ। जिस दिन युद्ध आरंभ हुआ, उसी दिन महाराजा ने वायसराय को केबल भेजकर अनुरोध किया कि वह सम्र्राट से प्रार्थना करके मुझे अपने जीवन रक्षकों के साथ युद्ध के मोर्चे पर भिजवाये। वायसराय ने उत्तर भिजवाया कि अच्छा होगा कि वह भारत में ही रहे तथा अपने राज्य में कर्त्तव्य का निर्वहन करे। 12 सितम्बर को मानसिंह ने बकिंघम पैलेस को केबल किया कि मेरी व्यक्तिगत सेवाएं मेरे प्रिय संप्रभु के निष्पादन पर रखी जायें। बकिंघम पैलेस ने भी वही उत्तर दिया जो वायसराय ने दिया था। 1940 के पूरे वर्ष में राजा इस अनुरोध को दोहराता रहा। वह ब्रिटिश सम्राट को उसी प्रकार की सेवाएं देना चाहता था जैसी कि उसके पूर्वज मुगलों को देते आये थे। अंत में उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली गयी और अप्रेल 1941 में वह मध्यपूर्व के मोर्चे पर गया जहाँ कि उसकी अपनी रेजीमेण्ट तैनात थी। मानसिंह ने सम्राट जॉर्ज षष्ठम् का आभार व्यक्त करते हुए केबल के माध्यम से विश्वास दिलाया कि मेरी तथा मेरे परिवार की अविचलित स्वामिभक्ति तथा शाश्वत निष्ठा महामना सम्राट तथा उनके सिंहासन के प्रति सदैव बनी रहेगी। मानसिंह ने युद्ध आरंभ होते ही वायसराय युद्ध कोष में 3 लाख रुपये भिजवाये। 10 लाख रुपये युद्ध ऋण के लिये दिये। जयपुर राज्य ने द्वितीय विश्वयुद्ध पर लगभग एक करोड़ रुपये खर्च किये।

    मेवाड़ महाराणा भूपालसिंह ने युद्ध आरंभ होते ही 75 हजार रुपये युद्धकोष में भिजवाये तथा युद्ध चलने तक प्रतिवर्ष 50 हजार रुपये भिजवाने का वचन दिया। ई.1940 में मेवाड़ लांसर्स तथा मेवाड़ इन्फेंट्री को मध्यपूर्व में लड़ने के लिये भेजा गया। युद्धकाल में राजसमंद झील का उपयोग नौसैनिक वायुयानों के लिये लैंण्डिंग बेस के रूप में किया गया। ब्रिटिश आर्मी के लिये मेवाड़ी नौजवान भर्ती किये गये तथा युद्ध सामग्री भी प्रदान की गयी।

    भारत की आजादी के लिये अंतर्राष्ट्रीय दबाव

    दिसम्बर 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध में अमरीका का प्रवेश हुआ जिससे ब्रिटिश सरकार पर भारत प्रकरण को सुलझाने के लिये अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ने लगा। अमरीकी राष्ट्रपति इलियट रूजवेल्ट ने भारत की स्वतंत्रता के लिये ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाया। ब्रिटिश सरकार अमरीकी सरकार की सलाह की अनदेखी नहीं कर सकी क्योंकि अमरीकी सहायता के कारण ही युद्ध में ब्रिटेन की स्थिति में सुधार आया था तथा ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था स्थिर रह पायी थी। दूसरी तरफ मार्च 1942 में जापान की शाही फौज भारत के इतने नजदीक आ गयी कि उसका आक्रमण कभी भी आरंभ हो सकता था। यह आक्रमण भारत पर नहीं, भारत में डटे अंग्रेजों पर होना था। अंग्रेज जानते थे कि यदि भारत में स्वयं भारतीयों का सहयोग नहीं मिला तो जापानियों के सामने टिकना असंभव हो जायेगा। बदली हुई परिस्थितियों में ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने नरम रुख अपनाया। इस प्रकार भारत संघ योजना को फिर से आरंभ करना पड़ा।

    क्रिप्स योजना

    11 मार्च 1942 को हाउस ऑफ कॉमन्स में प्रधानमंत्री चर्चिल के बयान में कहा गया कि युद्ध मंत्रिमंडल, सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेज रहा है ताकि ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की इच्छाओं के अनुसार जिन सुधारों का प्रस्ताव किया है उनके बारे में भारतीयों के भय और शंकाओं का निवारण किया जाये। क्रिप्स को राजतंत्रीय सरकार का पूरा विश्वास प्राप्त है। क्रिप्स अपने साथ जो प्रस्ताव ला रहे हैं, वह या तो पूर्णतः स्वीकृत किया जाना चाहिये या फिर पूर्णतः अस्वीकृत। भारतीय रियासतों के सम्बन्ध में इस प्रस्ताव में पहले के समझौते के पुनर्परीक्षण की बात कही गयी थी। भारत पहुँचने से पहले क्रिप्स ने वायसराय को लिखा कि वे भारत में समस्त प्रमुख दलों के नेताओं से मिलना चाहेंगे। 22 मार्च 1942 को क्रिप्स दिल्ली पहुंचे।

    28 मार्च 1942 को क्रिप्स ने नरेंद्र मण्डल के प्रतिनिधि मण्डल से वार्त्ता की। इनमें नवानगर के जामसाहब, बीकानेर महाराजा, पटियाला महाराजा, भोपाल नवाब, सर वी.टी. कृष्णामाचारी, सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर, नवाब छतारी, सर एम. एन. मेहता तथा मीर मकबूल मुहम्मद शामिल थे। राजाओं ने क्रिप्स से पूछा कि इस योजना के लागू होने के बाद देशी राज्यों के सम्बन्ध ब्रिटिश क्राउन तथा भारत संघ के साथ किस प्रकार के होंगे। क्रिप्स ने बताया कि ब्रिटिश क्राउन द्वारा राज्यों के साथ दो प्रकार की संधियां की गयी थीं, पहली परमोच्चता सम्बन्धी संधियां थीं तथा दूसरी व्यापार, अर्थ तथा वित्तीय मामलों के सम्बन्ध में की गयी संधियां। यदि भारत संघ अस्तित्व में आता है तो राज्यों को बाद वाली संधियों में समायोजन की आवश्यकता होगी क्योंकि तब उनके सम्बन्ध स्वतंत्र उपनिवेश से होंगे न कि ब्रिटिश क्राउन से। जहाँ तक परमोच्चता वाली संधियों का सम्बन्ध है, ये तब तक अपरिवर्तित रहेंगी जब तक कि कोई राज्य नवीन परिस्थतियों में अपने आप को समायोजित करने के लिये इसे समाप्त करने की इच्छा प्रकट न करे। राजाओं ने पूछा कि नवीन व्यवस्था के तहत क्या गवर्नर जनरल एवं वायसराय एक ही व्यक्ति होगा?

    क्रिप्स का उत्तर था कि वे दो व्यक्ति भी हो सकते हैं। वायसराय के लिये किसी रियासत के भीतर अपरिदेशीय क्षेत्र (Extra Teritorial Area) की व्यवस्था करनी होगी। संघ के साथ की जाने वाली संधि में सेना के लिये गलियारे का प्रावधान करना होगा जो कि राज्यों के साथ हमारी संधियों के क्रियान्वयन के लिये आवश्यक होगा। राज्यों की सुरक्षा से संबंधित ब्रिटिश दायित्व उन राज्यों की संख्या एवं स्थिति पर निर्भर करेगा जो प्रस्तावित संघ से बाहर रहेंगी लेकिन नौसेना के मामले में किसी तरह की कठिनाई नहीं होगी क्योंकि सीलोन हमारे अधिकार में है। वायुसेना के मामले में विभिन्न राज्यों में हवाई अड्डों की व्यवस्था करनी पड़ेगी लेकिन संभावित परिस्थितियों की परिकल्पना करना असंभव है क्योंकि उनकी संख्या अनंत होगी।

    नरेंद्र मण्डल के प्रतिनिधि मण्डल से हुई इस वार्त्ता के सम्बन्ध में मीर मकबूल द्वारा पूछे गये एक प्रश्न के जवाब में र्लार्ड प्रिवीसील मि. टर्नबुल ने स्पष्ट किया कि सर क्रिप्स का यह आशय कतई नहीं है कि जो रियासतें नये संघ में सम्मिलित नहीं होंगी, वे भारत संघ के बराबर के स्तर पर अपना अलग से संघ बना सकेंगी । उनका आशय यह था कि यदि रियासतें संघ में सम्मिलित नहीं होती हैं और वे परस्पर किसी प्रकार का संयोजन करती हैं तो उसमें आपत्ति नहीं होगी किंतु इस प्रकार के संयोजन में, संलग्न राज्यों की स्थिति में किसी तरह का परिवर्तन नहीं होगा।

    29 मार्च 1942 को क्रिप्स ने एक पत्रकार वार्त्ता में विभिन्न पक्षों के मध्य समझौते के लिये एक योजना का प्रारूप प्रस्तुत किया जिसमें कहा गया कि भारत में प्रकट की गयी चिंता पर, महामना सम्राट की सरकार द्वारा भारत के भविष्य के सम्बन्ध में किये गये वायदों पर, भारत में स्वायत्त सरकार के निर्माण के लिये तत्काल संभावित कदम उठाने हेतु निम्न लिखित प्रस्ताव देने का निर्णय किया है -

    (अ.) प्रतिकूलताओं की समाप्ति के बाद, भारतीय संघ की स्थापना के उद्देश्य से नया संविधान बनाने हेतु एक निर्वाचित संविधान निर्मात्री निकाय का गठन किया जायेगा।

    (ब.) संविधान निर्मात्री निकाय में भारतीय राज्यों की भागीदारी का प्रावधान किया जायेगा।

    (स.) सम्राट की सरकार निम्नलिखित प्रकार से बनाये गये संविधान को कार्यान्वित करने की स्वीकृति का वचन देती है-

          (i) यदि ब्रिटिश भारत का कोई प्रांत उसे स्वीकार न करे तो वह अपनी यथावत स्थिति में रह सकता है पर उसे ब्रिटिश सरकार से संधि करनी होगी। अर्थात् यदि कोई प्रांत स्वयं का संविधान अलग से बनाना चाहेगा तो उसे ऐसा करने की छूट होगी तथा उसे भारत संघ के बराबर का दर्जा दिया जायेगा।   

          (ii) ब्रिटिश सरकार और संविधान निर्मात्री सभा के मध्य एक संधि होगी जिसमें महामना सम्राट की सरकार द्वारा प्रदत्त वचन के अनुसार ब्रिटिश हाथों से भारतीयों को उत्तरदायित्व के पूर्ण हस्तांतरण की बात होगी। इसमें जातीय एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की बात भी होगी किंतु भारत संघ पर ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के अन्य सदस्यों के साथ भविष्य के सम्बन्धों की कोई शर्त नहीं थोपी जायेगी। कोई राज्य, संविधान को स्वीकारने या न स्वीकारने का चयन करता है, उसके लिये संधि व्यस्थाओं के पुनरीक्षण करने की आवश्यकता होगी क्योंकि नवीन परिस्थिति के अंतर्गत ऐसा करना आवश्यक होगा।

    (द) संविधानसभा का निर्माण युद्ध के पश्चात विभिन्न प्रांतों की विधान सभाओं (व्यवस्थापिका सभाओं) के निम्न सदनों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से किया जायेगा। इस हेतु नये चुनाव करवाये जायेंगे। समस्त निम्न सदनों में जितने सदस्य होंगे उनकी दशांश संख्या, संविधान निर्मात्री सभा की होगी। संविधान निर्मात्री सभा में भारतीय रियासतें को अपनी जनसंख्या के अनुपात से प्रतिनिधि भेजने के लिये आमंत्रित किया जायेगा। रियासतों के प्रतिनिधियों के अधिकार ब्रिटिश भारतीय प्रतिनिधियों के समान ही होंगे। रियासतों को यह छूट होगी कि वे नया संविधान स्वीकार करें या न करें। (प्रो. कूपलैण्ड के अनुसार इस विधान परिषद में कुल 207 सदस्य होने थे जिनमें से 158 ब्रिटिश भारत के तथा 49 रियासतों के। )

    (य) संक्रांतिक काल में और जब तक कि नवीन संविधान का निर्माण न हो जाये, सम्राट की सरकार, भारत के विश्वयुद्ध उपक्रम का हिस्सा होने के कारण, भारत की रक्षा का भार अपने हाथ में रखेगी परंतु सेना, साहस तथा सामग्री संसधान उपलब्ध करवाने का दायित्व भारत के नागरिकों के सहयोग से भारत सरकार पर होगा। सरकार की इच्छा है कि प्रमुख भारतीय दलों के नेताओं को अपने देश की कौंसिलों, कॉमनवेल्थ तथा यूनाईटेड नेशन्स में परामर्श के लिए तुरन्त और प्रभावोत्पादक ढंग से भाग लेने के लिये आमंत्रित किया जाये जिससे वे भारत की स्वतत्रंता के लिये आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण सक्रिय तथा निर्माणकारी सहयोग देने में समर्थ हो सकें।

    इस प्रस्ताव के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने पहली बार भारत की स्वाधीनता के दावे को स्वीकार करते हुए कहा कि भारत को स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा दे दिया जायेगा। ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में रहना उसकी इच्छा पर निर्भर करेगा। योजना का सबसे विवादित बिंदु यह था कि भारत का कोई भी प्रांत अपना संविधान बनाकर स्वतंत्र हो सकता था। ऐसा पाकिस्तान की मांग को ध्यान में रखकर किया गया था।

    योजना प्रस्तुत किये जोन के बाद पत्रकारों के प्रश्नों का जवाब देते हुए क्रिप्स ने कहा कि भारत संघ के निर्माण के लिये तत्काल प्रयास किये जायेंगे। युद्ध समाप्त होने की प्रतीक्षा नहीं की जायेगी। विभिन्न पक्षों में सहमति बनते ही प्रांतीय चुनाव करवाये जायेगें। चुनाव परिणाम प्राप्त होते ही संविधान निर्माण सभा स्थापित की जायेगी। हम भारत पर कुछ भी थोपना नहीं चाहते यहाँ तक कि समय सीमा भी नहीं। पत्रकारों ने पूछा कि क्या आपको पता है कि इंगलैण्ड का इतिहास अपने वायदों से मुकर जाने का रहा है। क्या आप इन प्रस्तावों की प्रत्याभूति (guarantee) प्रेसिडेण्ट रूजवेल्ट से दिलवा सकते हैं?

    क्रिप्स का उत्तर था कि यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो किसी चीज की कोई प्रत्याभूति नहीं है। इसके लिये प्रेसिडेण्ट रूजवेल्ट उपलब्ध नहीं होंगे। क्रिप्स से पूछा गया कि इन प्रस्तावों के तहत संविधान निर्मात्री सभा में राज्यों की जनता की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। इस पर क्रिप्स ने कहा कि यदि किसी राज्य में निर्वाचन का कोई तरीका है तो उनका उपयोग किया जायेगा किंतु यदि किसी राज्य में चुनी हुई संस्थायें नहीं हैं तो वहाँ यह कार्य नामित प्रतिनिधियों द्वारा किया जायेगा। यह पूछे जाने पर कि आप कैसे पता लगायेंगे कि राज्य भारत संघ में शामिल होने जा रहे हैं, क्रिप्स ने कहा कि राज्यों से यह पूछकर कि क्या उनकी इच्छा संघ में मिलने की है! जब यह पूछा गया कि क्या राज्यों के नागरिकों की कोई आवाज होगी, क्रिप्स ने कहा कि इसका निर्णय उन राज्यों की वर्तमान सरकारों द्वारा किया जायेगा। हम किसी प्रकार की नयी सरकारों का निर्माण नहीं करेंगे। राज्यों के साथ ब्रिटिश सरकार के सम्बन्ध संधियों के माध्यम से हैं, वे संधियां तब तक बनी रहेंगी जब तक कि राज्य उन्हें बदलने की इच्छा प्रकट न करें। यदि भारतीय राज्य, संघ में सम्मिलित होते हैं तो वे ठीक उसी परिस्थिति में रहेंगे जिसमें कि वे आज हैं।

    जब उनसे यह पूछा गया कि यदि कोई प्रांत या राज्य सम्मिलित न होना चाहे तो क्या उनके साथ समायोजन की कोई विधि होगी, तो क्रिप्स ने कहा कि वे दूसरे राज्यों के साथ उसी प्रकार का व्यवहार करेंगे जैसा कि वे अन्य शक्तियों यथा जापान, स्याम, चायना, बर्मा अथवा अन्य किसी देश के साथ करते हैं। एक प्रश्न के उत्तर में क्रिप्स ने कहा कि संघ में सम्मिलित होने के लिये राज्यों की कोई संख्या निश्चित नहीं की गयी है। क्रिप्स से पूछा गया कि यदि भारतीय राज्य, भारत संघ में सम्मिलित नहीं होते और परमोच्च सत्ता के सहयोगी बने रहते हैं तो क्या परमोच्च सत्ता इन संधि दायित्वों के निर्वहन के लिये भारत में इम्पीरियल ट्रूप्स की व्यवस्था करेगी, इस पर क्रिप्स ने जवाब दिया कि ऐसा होने पर ब्रिटिश सरकार किसी एक राज्य में इम्पीरियल ट्रूप्स रख सकती है लेकिन उन्हें भारत संघ में नहीं रखा जायेगा। संधि में इन समस्त बातों को रखा जायेगा जैसे कि सत्ता का हस्तांतरण दो या तीन माह में होगा तथा उसके हस्तांतरण का तरीका क्या होगा।

    क्रिप्स से पूछा गया कि ब्रिटिश सरकार राज्यों को अनिवार्य रूप से भारत संघ में सम्मिलित होने के लिये क्यों नहीं कहती, इस पर क्रिप्स ने कहा कि ब्रिटिश सरकार की यह इच्छा है कि समस्त राज्य भारत संघ में सम्मिलित हों किंतु ब्रिटिश सरकार संधि दायित्वों को भंग करके उनसे जबर्दस्ती ऐसा करने को नहीं कहेगी। क्रिप्स ने कहा कि मेरा यह विश्वास है कि यह भारतीय समस्या का सबसे उत्तम समाधान है और मैं इस योजना से पूरी तरह सहमत हूँ। संविधान निर्माण सभा में भाग लेने के लिये भारतीय राज्यों को उनकी जनसंख्या के अनुपात के आधार पर ब्रिटिश प्रतिनिधियों के समान अधिकारों के साथ आमंत्रित किया जायेगा। एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा कि यदि कोई राज्य संविधान निर्मात्री निकाय में भाग लेता है किंतु संविधान निर्माण के पश्चात संघ में सम्मिलित नहीं होता है तो वह राज्य फिर से अपनी वर्तमान स्थिति को प्राप्त कर लेगा किंतु उसे नवीन संघ के साथ रेलवे, डाक और तार जैसे आर्थिक विषयों पर समायोजन करने पड़ेंगे।

    2 अप्रेल 1942 को राज्यों के शासक फिर क्रिप्स से मिले। इनमें बीकानेर नरेश सादूलसिंह, नवानगर के जाम साहब और पटियाला के महाराजा यदुवेंद्रसिंह शामिल थे। भोपाल नवाब की ओर से नवाब छतारी ने भेंट की। राजाओं ने कई बिंदुओं पर स्पष्टीकरण चाहा। पहला बिंदु यह था कि यदि कुछ रियासतें संघ में शामिल होना उचित नहीं समझें तो क्या ऐसी रियासतों अथवा रियासतों के समूहों को अपना अलग से पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न संघ बनाने का अधिकार होगा? रियासतों के प्रतिनिधि मण्डल द्वारा सर स्टैफर्ड क्रिप्स को जो स्मृतिपत्र दिया गया, उसमें अनुरोध किया गया कि यदि क्रिप्स चाहें तो रियासतों को अपना एक निजी संगठन बनाने का अधिकार प्रदान कर दें। साथ ही, यह भी कहा गया कि इसका मतलब अलग संगठन वास्तविक रूप में बनाना नहीं अपितु भारतीय संघ में रियासतों की मर्यादा को बढ़ाना है। क्रिप्स द्वारा कहा गया कि वैयक्तिक स्तर पर कमीशन को इस सुझाव में कोई आधारभूत कठिनाई दिखायी नहीं देती किंतु चूंकि इस परिस्थिति पर विचार नहीं किया गया है इसलिये कमीशन इस सम्बन्ध में निश्चित उत्तर देने की स्थिति में नहीं है। ब्रिटिश सरकार ऐसे किसी प्रस्ताव पर विचार कर सकती है।

    कुछ प्रश्न संघ निर्मित होने के बाद की स्थिति के सम्बन्ध में पूछे गये। क्या संघ बनने के बाद राज्यों की जनता, संघ की जनता हो जायेगी? क्या संघ राज्यों के ऊपर परमोच्च सत्ता प्राप्त कर लेगा? क्या किसी राज्य के लिये यह संभव होगा कि वह संघ में मिलने के बाद भी शासक के वंशानुगत अधिकारों एवं व्यक्तिगत मामलों को केवल ब्रिटिश क्राउन के अधिकार क्षेत्र में बना रहने दे? इन सब प्रश्नों का यह जवाब दिया गया कि सब कुछ आगे चलकर वास्तव में की जाने वाली व्यवस्था पर आधारित होगा जो कि संविधान निर्मात्री निकाय तथा राज्यों के मध्य होने वाले समझौते पर निर्भर करेगा किंतु किसी भी स्थिति में ब्रिटिश सरकार ने परमोच्चसत्ता किसी अन्य संस्था को देने का निर्णय नहीं किया था। संघ में राज्य के सम्मिलन का प्रभाव ब्रिटिश क्राउन के दायित्व का संघ में स्वतः विलय के रूप में होगा। दूसरी ओर परमोच्चता उन राज्यों के मामले में बनी रहेगी जो राज्य संघ में मिलना स्वीकार नहीं करते हैं।

    दूसरा बिंदु यह उठाया गया कि राज्यों द्वारा संघ में मिलने से मना करने पर क्या क्राउन राज्यों के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करता रहेगा? क्रिप्स का उत्तर था कि जो राज्य, संघ में मिलने से इन्कार कर देंगे, ब्रिटिश सरकार उन राज्यों के प्रति, संधि के तहत स्थापित दायित्वों का निर्वहन करती रहेगी। ब्रिटिश सरकार संघ में सम्मिलित न होने वाले राज्यों के प्रति अपने संधि दायित्वों का निर्वहन करने के लिये सब कुछ उपलब्ध करवायेगी। इसमें अंतिम उपाय के रुप में सेना का प्रयोग भी शामिल होगा।

    यद्यपि क्रिप्स स्वयं कोई वचन नहीं देना चाहते थे कि सरकार द्वारा इन उपायों को किन शर्तों के अधीन किया जायेगा। कुछ राज्य इस बात को लेकर संशय में थे कि क्रिप्श मिशन द्वारा यह क्यों कहा जा रहा है कि राज्य चाहे संघ में सम्मिलित हों अथवा नहीं, ब्रिटिश सरकार के साथ की गयी उनकी संपूर्ण संधियों को पुनरीक्षित किया जाना आवश्यक होगा? क्रिप्स द्वारा इस प्रश्न का स्पष्टीकरण इस प्रकार दिया गया कि संधियों को पुनरीक्षित करने की बात इसलिये कही जा रही है क्योंकि नवीन परिस्थितियों में ऐसा किया जाना अत्यंत आवश्यक होगा तथा इसका प्रावधान इसलिये रखा जा रहा है क्योंकि ब्रिटिश भारत को सत्ता हस्तांतरित किये जाने के बाद राज्यों एवं ब्रिटिश भारत के मध्य आर्थिक हितों के लिये नये समझौते करने पड़ेंगे। क्रिप्स ने कहा कि परमोच्चता एवं राज्यों के संरक्षण से सम्बन्धित संधियां सम्बन्धित राज्यों की सहमति के बिना पुनरीक्षित नहीं की जायेंगी।

    राजाओं द्वारा पूछा गया कि क्या प्रस्तावित संघ भौगोलिक निरंतरता तक सीमित रहेगा। क्रिप्स का उत्तर था कि सामान्यतः ऐसा ही होगा जब तक कि मध्यवर्ती राज्यों अथवा इकाईयों के बीच कुछ व्यवहारिक प्रबंध न कर लिये जायें। इन विवादों को सुलझाने के लिये ब्रिटिश सरकार के कार्यालय मौजूद रहेंगे। राज्यों तथा प्रांतों को संघ में सम्मिलित होने या न होने की पूरी छूट दी गयी है। वे चाहें तो नये प्रस्तावित संघ से बाहर रहें और चाहें तो उसमें शामिल हों। क्रिप्स द्वारा कहा गया कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों की इच्छा के बिना भारत में बने रहना नहीं चाहती। जब तक कि भारतवासी अपने हित के लिये ब्रिटिश सरकार को भारत में बने न रहने देना चाहें, ब्रिटिश सरकार भारत में बनी नहीं रहेगी किंतु संघ में शामिल न होने वाले राज्यों के प्रति संधि दायित्वों का निर्वहन करने की सीमा तक वह भारत में बनी रहेगी।

    क्रिप्स ने आशा व्यक्त की कि समस्त भारतीय समझदार हैं और वे एक संघ के नीचे आने में सक्षम होंगे। अन्यथा उन्हें कई संघ बनाने होंगे और कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। क्रिप्स ने राज्यों को सलाह दी कि छोटे राज्यों को पहला कदम यह उठाना चाहिये कि वे अपने समूह बनायें अथवा संघीय सम्बन्ध स्थापित करें ताकि सहकारिता पर आधारित समूहों की भावना को बड़ी इकाईयों तक विस्तारित किया जा सके। विशेषकर साझा औद्योगिक एवं आर्थिक हितों के मामलों में, ताकि राज्य ब्रिटिश भारत से पीछे न रह जायें और संपूर्ण भारत के एक साथ विकास पर जोर दिया जा सके। राजाओं को चाहिये कि वे इस मुद्दे पर वायसराय से बात करें।

    एक राजा ने क्रिप्स से पूछा कि क्या नवीन परिस्थितियों में राजाओं को ब्रिटिश भारत के राजनीतिक दलों से सम्पर्क करना चाहिये? इस सवाल के जवाब में क्रिप्स ने कहा कि यह प्रश्न वायसराय के लिये है किंतु मेरी सलाह है कि राज्यों के शासक ब्रिटिश भारत के राजनीतिक दलों के नेताओं से सम्पर्क स्थापित करें ताकि भविष्य में होने वाले संवैधानिक परिवर्तनों के दौरान राजाओं को सुविधा रहे।

    उन दिनों भारतीय प्रेस में इस तरह की कटु आलोचनाएं छप रही थीं कि राजाओं ने अपना अलग संघ बनाने की छूट देने की मांग राजनीतिक विभाग के उकसाने पर की। अखिल भारतीय प्रजा परिषद के एक सम्मेलन में नेहरू ने राज्यों को सलाह दी कि छोटे राज्यों को अपने निकटतम प्रांत में मिल जाना चाहिये न कि किसी अन्य राज्य में। 2 अप्रेल को क्रिप्स ने तीन नरेशों को, जो उनसे मिलने आये थे, गुस्से में आकर कहा कि उन्हें अपना फैसला कांग्रेस या गांधीजी से करना होगा क्योंकि हम तो अब बिस्तर बोरिया बांधकर भारत से कूच करने वाले हैं। इस प्रकार क्रिप्स ने राजाओं को स्पष्ट किया कि वे अपने भविष्य के लिये भारत सरकार की तरफ देखें न कि ब्रिटिश सरकार की तरफ। क्रिप्स मिशन के इस रवैये से राजाओं को यह अप्रिय तथ्य स्पष्ट हो गया कि यदि ब्रिटिश भारत और राजसी भारत के हितों के बीच किसी तरह का विवाद हुआ तो महामना सम्राट की सरकार देशी राज्यों को नीचा दिखायेगी।

    क्रिप्स प्रस्ताव में प्रांतों को तो अपना पृथक संघ बनाने की आजादी थी परंतु रियासतों के लिये ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गयी थी। क्या ब्रिटिश सरकार अपनी बरसों पुरानी भेदनीति को फिर से कार्यान्वित करने जा रही थी? इसमें कोई शक नहीं कि अगर उन्हें ऐसा करने का अधिकार दे दिया जाता तो भारत में पूरी तरह से बाल्कन राष्ट्र जैसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाती। पूरा देश अनुभव कर रहा था कि राजाओं के इस प्रस्ताव में व्यवहारिकता का अभाव था क्योंकि देश के समस्त रजवाड़ों की सीमा ब्रिटिश भारत के क्षेत्र से संलग्न थी। अतः इस तरह का कोई संघ कैसे काम कर सकता था!

    क्रिप्स प्रस्ताव पर अपना निर्णय सुनाने से पहले राजन्य वर्ग ब्रिटिश भारतीय नेताओं की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगा। 9 अप्रेल 1942 तक यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ही दल इस प्रस्ताव को स्वीकार करने वाले नहीं हैं। राजाओं ने इस परिस्थिति से लाभ उठाने का मानस बनाया। 10 अप्रेल को रियासतों के प्रतिनिधि मंडल ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया कि भारत के लिये एक संविधान बनाने में अपनी मातृभूमि के हित में भारतीय रियासतों को, रियासतों की अखण्डता और प्रभुसत्ता के अनुरूप प्रत्येक उचित तरीके से अपना योग देने में हमेशा की तरह प्रसन्नता होगी पर रियासतों को इस बात का विश्वास दिलाया जाये कि जिन रियासतों के लिये अलग रहना संभव न होगा तो वे रियासतें या रियासतों के समूह अपनी इच्छा के अनुसार अपना एक संघ बना सकेंगे जिसे इस उद्देश्य के लिये बनाये गये उपयुक्त और स्वीकृत तरीके के अनुसार पूर्ण प्रभुसत्ता का दर्जा प्राप्त होगा।

    11 अप्रेल को कांग्रेस तथा मुस्लिमलीग ने क्रिप्स प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया। 22 अप्रेल को क्रिप्स लंदन चले गये। उनका मिशन असफल हो गया जिससे राजाओं ने चैन की सांस ली। राजाओं की इस दोहरी चाल से कांग्रेस को खासी निराशा हुई। उन्होंने राजाओं के विरुद्ध वक्तव्य दिये। इन्हीं दिनों जवाहरलाल नेहरू ने अपने भाषण में कहा कि राजाओं से की गयी संधियां समाप्त कर दी जानी चाहिये परंतु भारत सचिव एमरी ने दोहराया कि संधियां ज्यों की त्यों बनी रहेंगी। नेहरू ने उन लोगों की पीठ थपथपायी जो राजाओं को धूर्त, झक्की अथवा मूर्ख कहते थे।

    क्रिप्स मिशन की असफलता पर यह शक किया जाने लगा कि या तो क्रिप्स की पीठ में ब्रिटिश सरकार ने छुरा भौंक दिया है अथवा डीक्वेंस के शब्दों में चालाक क्रिप्स महज धोखेबाजी, छल कपट, विश्वासघात और दुहरी चालों से काम ले रहे थे और उन्हें इस पर जरा भी पश्चाताप नहीं था! गांधीजी के अनुसार क्रिप्स योजना आगे की तारीख का चैक था जिसका बैंक खत्म होने वाला था। मिशन के असफल हो जाने पर चर्चिल ने मित्र राष्ट्रों को सूचित किया कि कांग्रेस की मांगों को मानने का एक ही अर्थ होता कि हरिजनों तथा अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक हिंदुओं की दया पर छोड़ दिया जाता। अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट को उसने समझा दिया कि भारतीय नेता परस्पर एकमत नहीं हैं।

    क्रिप्स योजना के कुछ बिंदुओं पर भारत सचिव मि. एमेरी ने असंतोष व्यक्त किया। उनके अनुसार ब्रिटिश सरकार भारतीय राज्यों में प्रजातंत्र का विकास होते हुए देखना चाहती है जबकि क्रिप्स प्रस्तावों में राज्यों में योग्य प्रतिनिधि संस्थाओं के विकास का उल्लेख किया गया है। प्रस्तावों में कहा गया कि जो राज्य प्रस्तावित संघ में सम्मिलित हो जायेंगे उन पर से परमोच्च्ता समाप्त हो जायेगी क्योंकि स्वतंत्र राज्यों में खराब प्रशासन की स्थिति में ब्रिटिश सरकार के लिये उन राज्यों को संरक्षण प्रदान करना संभव नहीं होगा। एमेरी का विचार था कि राजाओं को अपने भविष्य के लिये अधिकतम संभावित स्तर तक मिलजुल कर काम करने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये तथा राजपूताना खण्ड का राज्य संघ तथा उनके जैसे अन्य संघों के अस्तित्व में आने को गंभीरता से लेना चाहिये। क्रिप्स योजना पर राजपूताना के राज्यों में बीकानेर के अतिरिक्त अन्य किसी राज्य की पृथक प्रतिक्रिया या भूमिका देखने देखने को नहीं मिलती। इस समय तक समस्त राजा नरेंद्र मण्डल के माध्यम से ही ब्रिटिश सरकार के साथ मोलभाव करते हुए दिखायी देते हैं।

    भारत छोड़ो आंदोलन

    क्र्रिप्स मिशन के लौट जाने पर अगस्त 1942 में कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया। गांधीजी ने इस बात को आधार बनाया कि जब तक अंग्रेज भारत में बने रहेंगे, तब तक भारत पर जापान के आक्रमण का खतरा बना रहेगा। गांधीजी का मानना था कि स्वतंत्र भारत ही जापानियों का सक्षमता से मुकाबला कर पायेगा।

    लॉर्ड वेवेल की नियुक्ति

    क्रिप्स के लौट जाने के बाद कांग्रेस तथा राजाओं के मध्य रस्साकशी होने लगी। कांग्रेस चाहती थी कि देशी राज्य भारत संघ में मिलें और राज्यों के निर्वाचित प्रतिनिधि विधान निर्मात्री समिति में राज्यों का प्रतिनिधित्व करें। राजा मानते थे कि संघ में मिलना या न मिलना, संविधान निर्मात्री सभा में सम्मिलित होना या न होना, उनका विशेषाधिकार है। वे ये भी चाहते थे कि उनका प्रतिनिधित्व उनके द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि करें। सरकार दोनों पक्षों को संतुष्ट करना चाहती थी। उसने कांग्रेस को संतुष्ट करने के लिये राज्यों पर जोर डाला कि वे प्रशासन को आधुनिक रूप दें और लोकप्रिय सरकारें स्थापित करें। राज्यों को आश्वासन दिया गया कि परमोच्च सत्ता उत्तराधिकारी राज्यों को स्थानांतरित नहीं की जायेगी। विश्वयुद्ध में इंगलैण्ड की लगातार पतली हो रही हालत, क्रिप्स मिशन की असफलता तथा भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठ भूमि में अक्टूबर 1943 में लॉर्ड वेवेल भारत के नये वायसराय नियुक्त किये गये। उन्होंने घोषणा की कि मैं अपने थैले में बहुत सी चीजें ला रहा हूँ।

    ढुलमुल केन्द्र की मांग

    जिस समय वेवेल भारत के गवर्नर जनरल बनकर आये उस समय कांग्रेस अखण्ड भारत के लिये लड़ रही थी जबकि मुस्लिम लीग भारत का एक खण्ड हथियाना चाहती थी। इस संघर्ष में तृतीय पक्ष राजाओं का था जिन्हें भय था, कहीं कांग्रेस राज्यों की प्रभुसत्ता भी न हथिया ले। वे नरेंद्र मण्डल के चांसलर के नेतृत्व में अपनी लड़ाई लड़ रहे थे। इन तीनों पक्षों के संघर्ष के कारण ही भारत की स्वतंत्रता लम्बे समय से टलती आ रही थी। नरेंद्र मण्डल के चांसलर नवाब भोपाल एक ढुलमुल केंद्र के पक्षधर थे जिसमें अवशिष्ट शक्तियां राज्यों में निहित हों। नरेंद्र मण्डल का चांसलर बनने के बाद एक वक्तव्य में नवाब ने कहा था कि अनुदार व्यक्तियों ने हमें अभी से धमकाना आरंभ कर दिया है कि जब समय आयेगा, इंगलैण्ड परेशानी पैदा करने में सक्षम शत्रुओं को गले लगाने के लिये, हमें नीचा दिखायेगा। कृपया इंगलैण्ड को बता दें कि भारतीय राज्य इस लांछन को कपटपूर्ण मानते हुए इसका खण्डन करते हैं। हमें इंण्लैण्ड द्वारा इन कठिन परिस्थितियों में दिये गये वचन का पूरा विश्वास है।

    18 सितम्बर 1944 को नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति की बैठक में चांसलर ने अपने निश्चय की सूचना दी कि दिसम्बर 1944 में होने वाले अधिवेशन में वे निम्नलिखित प्रस्ताव रखेंगे-

    ब्रिटिश सत्ता के साथ राज्यों के जो सम्बन्ध रहे हैं तथा हैं, और ब्रिटिश सत्ता को राज्यों में जो अधिकार प्राप्त हैं, सम्बन्धित राज्यों से विचार विमर्श के बिना किसी तीसरे पक्ष को हस्तांतरित नहीं कर सकते। ब्रिटिश सत्ता के प्रतिनिधि सम्राट की सरकार को सूचित करें कि शाही घोषणाओं द्वारा तथा हाल ही में जब सरकार द्वारा दिये गये आश्वासनों में यह कहा गया है कि राज्यों के साथ की हुई संधियां, सनदें, अधिकार पत्र तथा आंतरिक स्वतंत्रता सम्बन्धी समझौते स्थापित रखना और उनके स्थायी रहने की व्यवस्था करना सरकार की निश्चित नीति है, तब ऐसी दशा में सम्राट और राज्यों के सम्बन्धों में परिवर्तन करने तथा सम्राट के अन्य पक्षों के साथ किये गये समझौतों को, बिना राज्यों की पूर्व स्वीकृति लिये राज्यों पर लागू करने की प्रवृत्ति ने राज्यों में गंभीर आशंका और चिंता की स्थिति उत्पन्न कर दी है जिसका शीघ्र निराकरण आवश्यक है। सरकार की यह इच्छा कभी नहीं रही होगी कि राज्यों को लावारिस जमीन की तरह छोड़ दे। अगर कांग्रेस हमें नीचा दिखाना और लूटना चाहती है तो हम लड़ेंगे। 26 नवम्बर 1944 को वायसराय वेवेल ने चासंलर द्वारा प्रस्तावित इस प्रस्ताव को यह कह कर निषिद्ध कर दिया कि जब इस विषय पर वायसराय और राजाओं के मध्य विचार-विमर्श चल रहा है तब इस प्रकार का प्रस्ताव पारित करने से जनता में मिथ्या संदेश जायेगा।

    नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति ने मांग की कि ब्रिटिश भारत को सत्ता का हस्तांतरण किये जाने से पूर्व राज्यों के आंतरिक प्रशासन में ब्रिटिश सरकार के हस्तक्षेप को पूर्णतः समाप्त कर दिया जाना चाहिये ताकि प्रत्येक प्रकार के भय को समाप्त किया जा सके। राजाओं का मानना था कि संधि अधिकारों के अंतर्गत ऐसी मांग करना उनका कर्त्तव्य था और ऐसा किये बिना वे भविष्य की व्यवस्था में अपना समुचित स्थान पाने के लिये ब्रिटिश भारतीय राजनीतिज्ञों से सफलता पूर्वक समझौता नहीं कर सकेंगे। राजनीतिक विभाग नरेंद्र मण्डल के इस विचार से सहमत नहीं हुआ तथा इस सम्बन्ध में उसने कड़ा रुख अपनाया। राजनीतिक विभाग से प्राप्त हुए पत्रों के कारण स्थायी समिति ने अपने आपको अपमानित अनुभव किया और राज्यों की स्थिति के लगातार क्षय के विरोध में दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में सामूहिक त्यागपत्र दे दिया।

    संघ निर्माण हेतु सप्रू समिति एवं अन्य व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत योजनाएं

    दिसम्बर 1944 में तेज बहादुर सप्रू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। प्रांतों एवं राज्यों के प्रस्तावित भारतीय संघ में सम्मिलित होने अथवा अलग रहने के प्रश्न पर समिति ने सिफारिश की कि ब्रिटिश भारत के किसी भी प्रांत को संघ में शामिल नहीं होने का विकल्प नहीं होगा। ब्रिटिश भारत का प्रांत हो या देशी राज्य, एक बार सम्मिलित होने के बाद उसे संघ से अलग होने का अधिकार नहीं होगा। ब्रिटिश भारत, जिस तरह से किसी भी ब्रिटिश भारतीय प्रांत को अलग होने की आज्ञा देना स्वीकार नहीं कर सकता उसी तरह देशी राज्यों को भी इसकी अनुमति नहीं दे सकता। सप्रू समिति में राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं था, इसलिये समिति ने अपनी इच्छा से संघ में शामिल होने के अतिरिक्त रियासतों के विषय में कोई और सिफारिश नहीं की। समिति द्वारा यह सिफारिश भी की गई कि जहाँ तक हो सके राज्य प्रमुख, राज्यों के शासकों में से ही चुना जाना चाहिए। साथ ही उसमें राज्यों के मंत्री पद की भी व्यवस्था हो जिसकी सहायता के लिए राज्यों की सलाहकार समिति हो। सप्रू समिति की अवधारणा के अनुसार भारतीय संघ केवल एक राज्य होगा जिसमें संघीय इकाइयां होंगी चाहे वह प्रांतों की हों या राज्यों की। संघ से असंबद्ध राज्य भी होंगे। किसी भी विदेशी शक्ति का इन इकाइयों पर कोई अधिकार नहीं होगा चाहे वे संघ में शामिल हों या न हों।

    रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से एम. एन. राय द्वारा स्वतंत्र भारत के संविधान का प्रारूप तैयार किया गया। 6 जनवरी 1945 को ऑल इण्डिया कान्फ्रेन्स ऑफ दी रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी के द्वारा इस प्रारूप को पृष्ठांकित किया गया जिसमें कहा गया कि अंतरिम सरकार को संपूर्ण भारत के लिये संविधान की घोषणा करनी चाहिये तथा उसे भारतीय रियासतों पर भी लागू किया जाना चाहिये। इसे पूर्व में ब्रिटिश सरकार तथा भारतीय राजाओं के मध्य हुए द्विपक्षीय संधियों के माध्यम से किया जाना चाहिये जिसके माध्यम से भारतीय राजाओं को कुछ वित्तीय अनुदानों के बदले अपने अधिकार भारत सरकार के समक्ष समर्पित करने होंगे।

    प्रो. कूपलैण्ड ने नदियों को आधार बनाकर जनसंख्या के अनुसार उनके क्षेत्रीय विभाजन की योजना प्रस्तुत की। सर सुल्तान अहमद ने भारत तथा यूनाइटेड किंगडम के मध्य संधि के माध्यम से भारत पाक विभाजन की योजना प्रस्तुत की इनमें देशी राज्यों के बारे में कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की गयी। 1943 में अर्देशिर दलाल, डा. राधा कुमुद मुखर्जी तथा डा. भीमराव अम्बेडकर ने भी अपनी योजनाएं प्रस्तुत कीं जिनमें भारत की सांप्रदायिक समस्या का समाधान ढूंढने की चेष्टा की गयी किंतु देशी राज्यों की समस्या को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया।

    वेवेल योजना

    25 जून 1945 को लार्ड वेवेल ने शिमला में समस्त सम्बद्ध पक्षों का एक सम्मेलन बुलाया जो 18 दिन तक चला। वेवेल द्वारा कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच समझौता करवाने तथा अंतरिम सरकार गठित करने का प्रयास किया गया। वायसराय ने राजाओं को आश्वासन दिया कि राज्यों के साथ ब्रिटिश ताज के सम्बन्धों को राज्यों की सहमति प्राप्त किये बिना किसी अन्य अभिकरण को स्थानांतरित नहीं किया जायेगा यदि शासकगण यह आश्वासन दें कि भविष्य में किसी समझौते के परिणाम स्वरूप ऐसे किसी प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता हो तो शासकगण अयुक्तियुक्त रूप से इन्कार नहीं करेंगे। नरेंद्र मण्डल के चांसलर ने घोषणा की कि राजाओं का अभिप्राय भविष्य में होने वाले संवैधानिक परिवर्तन के तहत भारत के भविष्य के लिये आवश्यक व्यवस्था हेतु किये गये ऐसे किसी फैसले को मानने से मना करने का नहीं है जिसे हम भारत के व्यापक हित में युक्तियुक्त समझें। स्थायी समिति ने अपने त्यागपत्र भी वापस ले लिये।

    जुलाई 1945 में लेबर पार्टी ने ब्रिटेन में सरकार बनायी। मि. क्लेमेंट एटली इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री बने। भारतीय स्वाधीनता के कट्टर शत्रु और भारत विरोधियों को उकसाने वाले एल. एस. एमरी को भारत कार्यालय से हटा दिया गया। उनका स्थान लॉर्ड पैथिक लारेन्स ने लिया। क्लेमेंट एटली भारतीय स्वतंत्रता के उत्साही समर्थक तो नहीं थे किंतु वह महान यथार्थवादी थे। उन्होंने यह समझ लिया था कि चकनाचूर हुआ ब्रिटेन, भारत में रक्षक सेना का उत्तरदायित्व नहीं उठा सकेगा। नये मंत्रिमंडल से सलाह करके वायसराय ने 19 सितम्बर 1945 को घोषणा की कि सम्राट की सरकार भारत को शीघ्र स्वशासन सौंपने के लिये एक संविधान परिषद का निर्माण करेगी ताकि भारतीय अपना संविधान खुद बना सकें। सर्दी में देश में चुनाव कराये जायेंगे ताकि संविधान परिषद बन सके। राज्यों के प्रतिनिधियों से विचार विमर्श करके निश्चित किया जायेगा कि किस प्रकार से वे संविधान निर्मात्री निकाय में सर्वोत्तम विधि से भाग ले सकते हैं। कांग्रेस ने जोर दिया कि संविधान निर्मात्री सभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व वे प्रतिनिधि ही कर सकते हैं जिनका निर्वाचन व्यापक स्तर पर हुए चुनावों में हुआ हो। इस घोषणा से राजाओं को भय हुआ कि ब्रिटिश सरकार राज्यों के सम्बन्ध में भी परमोच्चता को स्थानांतरित कर सकती है।

    जल-वायु सेनाओं में विद्रोह

    20 जनवरी 1946 को बम्बई, लाहौर तथा दिल्ली के वायु सैनिक हड़ताल पर चले गये। 19 फरवरी 1946 को जल सेना में भी हड़ताल हो गयी। हड़तालियों ने आजाद हिंद फौज के बिल्ले धारण किये। कराची, कलकत्ता और मद्रास के नौ-सैनिक हड़ताल पर चले गये। अंग्रेज सैन्य अधिकारियों ने इस हड़ताल को बंदूक से कुचलना चाहा। इस कारण दोनों तरफ से गोलियां चलीं। ठीक इसी समय जबलपुर में भारतीय सिगनल कोर में भी 300 जवान हड़ताल पर चले गये। इन हड़तालों से अंग्रेज सरकार थर्रा उठी। उसने भारत को शीघ्र से शीघ्र आजादी देने के लिये उच्चस्तरीय मंत्रिमंडल मिशन भेजने की घोषणा की। तीन कैबीनेट मंत्री एक नये प्रस्ताव के साथ भारत भेजे गये।

    मंत्रिमण्डल योजना (कैबीनेट मिशन प्लान)

    19 फरवरी 1946 को ब्रिटिश सरकार ने भारत सचिव लार्ड पैथिक लारेन्स, व्यापार मंडल के अध्यक्ष सर स्टैफर्ड क्रिप्स और फर्स्ट लॉर्ड आफ द एडमिरेल्टी ए. वी. अलैक्जेंडर की एक समिति बनाई जिसे कैबिनेट मिशन कहा जाता है। 15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री मि. एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा की कि लेबर सरकार ब्रिटेन और हिन्दुस्तान तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के गतिरोध को समाप्त करने का प्रयास करने के लिये एक कैबीनेट मिशन भारत भेज रही है। मुझे आशा है कि ब्रिटिश भारत तथा रियासती भारत के राजनीतिक एक महान नीति के तहत, इन दो भिन्न प्रकार के अलग-अलग भागों को साथ-साथ लाने की समस्या का समाधान निकाल लेंगे। हमें देखना है कि भारतीय राज्य अपना उचित स्थान पायें। मैं एक क्षण के लिये भी इस बात पर विश्वास नहीं करता कि भारतीय राजा भारत के आगे बढ़ने के कार्य में बाधा बनने की इच्छा रखेंगे अपितु जैसा कि अन्य समस्याओं के मामले में हुआ है, भारतीय इस समस्या को भी स्वयं सुलझायेंगे।

    इस ऐतिहासिक घोषणा ने राजाओं की भूमिका एवं भारतीय राजनीतिक प्रगति के लिये एक नवीन ध्वनि तथा रेखा निश्चित की। भूतकाल से बिल्कुल उलट, इस बार ब्रिटिश सरकार राजाओं से अपेक्षा कर रही थी कि वे भारत की स्वतंत्रता की प्राप्ति में बाधा न बनें अपितु भागीदारी निभायें। वायसराय के नाम भेजे एक तार में प्रधानमंत्री एटली ने लिखा कि 'लेबर गवर्नमेंट' वायसराय को नजर अंदाज नहीं करना चाहती किंतु यह अनुभव करती है कि ऐसा दल जो वहीं फैसला कर सके, समझौते की बातचीत को काफी सहारा देगा और हिंदुस्तानियों को यह विश्वास दिलायेगा कि इस बार हम इसे कर दिखाना चाहते हैं।

    सरकार को राजाओं की ओर से आशंका थी कि वे अपनी संप्रभुता की दुहाई देकर एक बार फिर योजना के मार्ग में आ खड़े होंगे। इसलिये उन्होंने राजाओं को पहले ही आश्वासन दे दिया कि सम्राट के साथ उनके सम्बन्धों या उनके साथ की गयी संधियों और समझौतों में दिये गये अधिकारों में उनकी सहमति के बिना कोई परिवर्तन नहीं किया जायेगा। 12 मार्च 1946 के पत्र में लार्ड वेवेल ने इस आश्वासन को दोहराया। इस पत्र में कहा गया कि बातचीत के अतिरिक्त और किसी आधार पर रियासतों को भारतीय ढांचे में मिलाने की योजना बनाने की कोई इच्छा नहीं है। इस प्रकार सत्ता के संवैधानिक हस्तांतरण के विकास क्रम में अंतिम, गंभीरतम और अपेक्षाकृत अधिक विमलमति युक्त परिणाम देने के लिये सम्राट की सरकार के तीन मंत्रियों का मिशन 24 मार्च 1946 को भारत आया।

    इस मिशन के आगमन से राजनीतिक विभाग ने समझ लिया कि अब राज्यों को नये ढांचे में समाहित करने की शीघ्रता करने का समय आ गया है। 25 मार्च को एक प्रेस वार्त्ता के दौरान लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि हम इस आशा से भारत में आये हैं कि भारतीय एक ऐसे तंत्र का निर्माण कर सकें जो सम्पूर्ण भारत के लिये एक संवैधानिक संरचना का निर्माण कर सके। उनसे पूछा गया कि राज्यों का प्रतिनिधित्व राजाओं के प्रतिनिधि करेंगे या जनता के प्रतिनिधि? इस पर पैथिक लॉरेंस ने जवाब दिया कि हम जैसी स्थिति होगी वैसी ही बनी रहने देंगे। नवीन संरचनाओं का निर्माण नहीं करेंगे।

    प्रेस वार्त्ता के दौरान लॉर्ड लॉरेंस से पूछा गया कि राज्यों का सहयोग आवश्यक होगा या अनिवार्य? इस पर लॉरेंस ने जवाब दिया कि हमने संवैधानिक संरचना की स्थापना करने वाले तंत्र को बनाने के लिये विचार-विमर्श करने हेतु राज्यों को आमंत्रित करने की योजना बनायी है। यदि मैं आपको रात्रि के भोजन पर आमंत्रित करता हूँ तो आपके लिये वहाँ आना अनिवार्य नहीं है। यह निश्चय किया गया कि मिशन रियासती भारत के निम्नलिखित प्रतिनिधियों से साक्षात्कार करेगा-

    (1.) नरेंद्र मण्डल के चांसलर से।

    (2.) मध्यम आकार की रियासतों के प्रतिनिधि के रूप में पटियाला, बीकानेर तथा नवानगर के शासकों से संयुक्त रूप से।

    (3.) लघु राज्यों के प्रतिनिधि के रूप में डूंगरपुर तथा बिलासपुर के शासकों से संयुक्त रूप से तथा

    (4.) हैदराबाद के प्रतिनिधि के रूप में नवाब छतारी, त्रावणकोर के प्रतिनिधि सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर एवं जयपुर के प्रतिनिधि मिर्जा इस्माइल से अलग-अलग। इस सुझाव पर कि मिशन को राज्यों की जनता के प्रतिनिधियों से भी साक्षात्कार करना चाहिये, न तो राजनीतिक विभाग ने सहमति दी, न ही नरेंद्र मण्डल के चांसलर सहमत हुए, न ही मिशन ने इस प्रश्न पर जोर दिया।

    भारतीय राजाओं के साथ विचार विमर्श

    2 अप्रेल 1946 को कैबिनेट मिशन तथा वायसराय के साथ साक्षात्कार के दौरान नरेंद्र मण्डल के चांसलर नवाब भोपाल ने स्पष्ट कर दिया कि राज्य अपनी अधिकतम प्रभुसत्ता के साथ अपने अस्तित्व को कायम रखना चाहते हैं। वे अपने आंतरिक मामलों में ब्रिटिश भारत का कोई हस्तक्षेप नहीं चाहते। उन्होंने सलाह दी कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर भारतीय राज्यों तथा ब्रिटिश भारत प्रांतों का एक प्रिवी कौंसिल बनाया जाना चाहिये। जब भारत में दो राज्यों (भारत एवं पाकिस्तान) का निर्माण हो सकता है तब तीसरे भारत को मान्यता क्यों नहीं दी जा सकती जो कि राज्यों से मिलकर बना हो?

    कोई भी भारतीय राजा भारत सरकार अधिनियम 1935 में दी गयी संवैधानिक संरचना को स्वीकार नहीं करना चाहता। परमोच्चता भारत सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये। उसी संध्या को कैबीनेट मिशन ने नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति के प्रतिनिधियों से बात की जिनमें भोपाल, पटियाला, ग्वालियर, बीकानेर तथा नवानगर के शासक सम्मिलित थे। इस बैठक में लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि यदि ब्रिटिश भारत स्वतंत्र हो जाता है तो परमोच्चता समाप्त हो जायेगी तथा ब्रिटिश सरकार भारत में आंतरिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिये सैनिक टुकड़ियां नहीं रखेगी। राज्यों को संधि दायित्वों से मुक्त कर दिया जायेगा क्योंकि ब्रिटिश क्राउन संधि दायित्वों के निर्वहन में असक्षम हो जायेगा।

    मिशन ने इस स्थिति को शासकों के समक्ष स्पष्ट कर देना आवश्यक समझा किंतु शासकों ने इस पर कोई जोर नहीं दिया न ही इस विषय पर ब्रिटिश भारतीय नेताओं से बात की क्योंकि उन्हें लगता था कि इसके समर्थन में कोई भी सकारात्मक बयान देने से ब्रिटिश भारतीय नेताओं के साथ किसी भी मंच पर होने वाली उनकी बातचीत में शासकों की स्थिति कमजोर हो जायेगी। अंग्रेजों को स्वाभाविक तौर पर भारतीय राज्यों के साथ लम्बे समय से चले आ रहे सम्बन्धों को बनाये रखने में रुचि थी किंतु ये सम्बन्ध नवीन भारत में राज्यों की स्थिति पर निर्भर होने थे। यदि राज्य अपनी प्रभुसत्ता का समर्पण करते हैं तो ये सम्बन्ध केवल संघ के माध्यम से ही हो सकते थे। राज्यों के महासंघ के निर्माण के प्रश्न पर लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि मिशन के लिये यह नया विचार है इसलिये वे इस पर विशद गहराई के साथ विचार नहीं कर सकते। यह सुझाव उन्हें रोचक और अच्छा लगा था इसलिये उन्होंने इस सुझाव को पूरी तरह रद्द नहीं किया। क्रिप्स का मानना था कि इससे भौगोलिक समस्याएं पैदा होंगी।

    नवाब भोपाल ने पूछा कि क्या अंतरिम काल में संधियां बनी रहेंगी? राज्य सचिव ने जवाब दिया कि वे बनी रहेंगी किंतु उनका विचार था कि आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्रों में की गयी संधियां एवं व्यवस्थाएं तथा संचार व्यवस्थाएं आगे तक भी चल सकती हैं तथा बाद में उनका पुनरीक्षण किया जा सकता है। भोपाल नवाब का विचार था कि इस सम्बन्ध में अलग से कोई समझौता नहीं था तथा न ही अलग से ऐसा कोई मुद्दा था इसलिये संधियों को विभाजित नहीं किया जा सकता। क्रिप्स का मानना था कि तकनीकी रूप से कैसी भी स्थिति हो किंतु जिस दिन नयी सरकार को सत्ता का हस्तांतरण किया जाये उससे पहले, वर्तमान आर्थिक व्यवस्थाओं को यकायक भंग हो जाने से बचाने के लिये कुछ न कुछ व्यवस्था की जानी चाहिये। ऐसा व्यवधान राज्यों और ब्रिटिश भारत दोनों के लिये हानिकारक होगा तथा इसे राज्यों के विरुद्ध लीवर के रूप में प्रयुक्त किया जायेगा। यह वार्तालाप मिशन द्वारा जाम साहब की इस प्रार्थना की स्वीकृति के साथ समाप्त हुआ कि जब ब्रिटिश भारत के भविष्य का प्रारूप निर्धारित हो जाये तब राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ एक बार फिर से विचार विमर्श किया जाये।

    छोटे राज्यों के प्रतिनिधि डूंगरपुर एवं बिलासपुर के शासकों के साथ 4 अप्रेल को साक्षात्कार किया गया। 
    डूंगरपुर के शासक ने कहा कि केवल आधा दर्जन राज्य ही ऐसे हैं जो ब्रिटिश भारत के प्रांतों की तुलना के समक्ष खड़े रह सकते हैं इसलिये यह आवश्यक है कि छोटे राज्यों को अपनी प्रभुसत्ता बचाने के लिये क्षेत्रीयता एवं भाषा के आधार पर मिलकर बड़ी इकाई का निर्माण कर लेना चाहिये। छोटे राज्यों को भय है कि बड़े राज्य उन्हें निगल जाना चाहते हैं। छोटे राज्य संतोषजनक गारंटी चाहते हैं। यह सुझाव गलत है कि छोटे राज्यों का कोई भविष्य नहीं है। वे बड़े राज्यों से भी अधिक बलिदान देने को तैयार हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि हैदराबाद, कश्मीर तथा मैसूर को छोड़कर शेष राज्यों को 9 क्षेत्रीय इकाईयों में विभक्त किया जाना चाहिये। बिलासपुर के राजा ने कहा कि प्रत्येक राज्य को उसकी पुरानी आजादी पुनः लौटा दी जानी चाहिये तथा उसे अपनी मनमर्जी के अनुसार कार्य करने के लिये छोड़ दिया जाना चाहिये।

    त्रावणकोर के दीवान सर सी. पी. रामास्वामी से 9 अप्रेल को साक्षात्कार किया गया। उन्होंने कहा कि परमोच्चसत्ता किसी उत्तराधिकारी सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये। अंतरिम काल में परमोच्चता का संरक्षण किया जाना चाहिये किंतु यदि कोई विवाद न हो तो राजनीतिक विभाग के तंत्र को पुनरीक्षित किया जाना चाहिये। सर सी. पी. रामास्वामी का विश्वास था कि 601 राज्य भविष्य के भारत में प्रभावी इकाई नहीं हो सकेंगे। छोटे राज्यों को बता दिया जाना चाहिये कि या तो वे स्वयं अपने आप समूह बना लें या फिर उन्हें अपने भाग्य पर छोड़ दिया जायेगा। हैदराबाद के प्रतिनिधि ने मांग की कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा छीनी गयी सीमाओं को फिर से हैदराबाद को लौटा दिया जाना चाहिये तथा उसे समुद्र तक का स्वतंत्र मार्ग दिया जाना चाहिये।

    जयपुर के दीवान मिर्जा इस्माइल ने अपने साक्षात्कार का बड़ा भाग इस विषय पर खर्च किया कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के भेद कैसे दूर हो सकते हैं! उन्होंने जोर दिया कि भारतीय शासक परिवारों को बनाये रखना चाहिये क्योंकि वे भारत की संस्कृति और सभ्यता का हिस्सा हैं। ब्रिटिश सरकार को भारत की समस्त समस्याओं को सुलझाये बिना ही भारत छोड़ देना चाहिये। इस प्रकार राज्यों के प्रतिनिधियों से वार्त्ता के उपरांत यह बात सामने आयी कि परमोच्चसत्ता उत्तराधिकारी सरकार को स्थानांतरित न करके उसे समाप्त किया जाये। राज्यों पर संघ अथवा संघों में से किसी एक में मिलने के लिये दबाव नहीं डाला जाये। राज्यों के शासक चाहें तो राज्यों का महासंघ बनाये जाने पर कोई आपत्ति नहीं की जानी चाहिये। राज्यों के आंतरिक मामलों में ब्रिटिश भारत को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिये।

    संधियों एवं परमोच्चता पर स्मरण पत्र

    कैबीनेट मिशन ने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेताओं से बात की तथा उनके द्वारा सुझाये गये बिंदुओं पर विचार करने के लिये ने 9 मई 1946 को भोपाल नवाब को फिर से बुलाया। नवाब ने असंतोष व्यक्त किया कि अन्य दलों के सुझावों पर बात करने के लिये तो उन्हें बुलाया गया है किंतु राज्यों ने जो सुझाव दिये थे उन पर विचार नहीं किया गया है। इस पर मिशन ने नवाब की शंकाओं का समाधान किया। मिशन ने राज्यों के सम्बन्ध में अपनी नीति स्पष्ट करते हुए 12 मई 1946 को भोपाल नवाब को एक स्मरणपत्र- 'संधियां एवं परमोच्चता' दिया। यद्यपि समाचार पत्रों में इसका प्रकाशन 22 मई को करवाया गया किंतु इसे '12 मई 1946 का स्मरण पत्र' कहा जाता है।

    इसमें कहा गया कि नरेंद्र मंडल ने पुष्टि कर दी है कि भारत की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति की अभिलाषा में भारतीय रियासतें देश के साथ हैं। परमोच्चता समाप्त कर दी जायेगी तथा नयी बनने वाली सरकार या सरकारों को स्थानांतरित नहीं की जायेगी। सम्राट के साथ अपने सम्बन्धों द्वारा रियासतों ने जो अधिकार प्राप्त कर रखे हैं वे आगे नहीं रहेंगे तथा रियासतों ने सम्राट को जो अधिकार सौंप रखे हैं वे उन्हें वापस मिल जायेंगे। भारत से ब्रिटिश सत्ता के हट जाने पर जो रिक्तता होगी उसकी पूर्ति रियासतों को नये सम्बन्ध जोड़कर करनी होगी। भारतीय व्यवस्था में पारस्परिक समझौते के अतिरिक्त किसी भी बुनियाद पर रियासतों के प्रवेश का प्रावधान किये जाने का मंतव्य नहीं है। भारतीय रियासतें उपयुक्त मामलों में बड़ी प्रशासनिक इकाईयां बनाने या उनमें शामिल होने की इच्छा रखती हैं ताकि संवैधानिक योजना में वे उपयुक्त बन सकें और आंग्ल भारत के साथ बातचीत कर सकें। राजा लोग यह जानकर प्रसन्न हुए कि परमोच्चता समाप्त कर दी जायेगी तथा किसी अन्य सत्ता को स्थानांतरित नहीं की जायेगी। समस्त अधिकार राज्यों को मिल जायेंगे किंतु वे इस प्रस्ताव की प्रशंसा नहीं कर सके क्योंकि परमोच्चता की समाप्ति के बाद राज्यों को अपनी रक्षा के लिये अपने ऊपर ही निर्भर रहना था। लोकतांत्रिक पद्धति से निर्मित शक्तिशाली भारत सरकार उनके व्यक्तिगत शासन को बनाये रखने में क्यों रुचि लेगी? कांग्रेस ने इस स्मरण पत्र तथा उसके प्रभावों पर अधिक ध्यान नहीं दिया।

    संयुक्त भारत योजना

    मिशन ने 16 मई 1946 को अपनी योजना प्रकाशित की। इसे कैबीनेट मिशन प्लान तथा संयुक्त भारत योजना भी कहते हैं। इसके द्वारा संघीय संविधान (Federal Constitution) का निर्माण किया जाना प्रस्तावित किया गया जिसके तहत भारत संघ की व्यवस्था जानी थी। प्रस्तावित संघ में सरकार के तीनों अंग- विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका रखे गये थे। प्रस्तावित संघ में ब्रिटिश भारत के 11 प्रांत और समस्त देशी रियासतें शामिल होंगी। केन्द्रीय सरकार का अधिकार क्षेत्र रक्षा, वैदेशिक मामले और संचार तक सीमित होगा। शेष समस्त विषय और अधिकार रियासतों के पास ही रहेंगे। विधान निर्मात्री परिषद में रियासतों के प्रतिनिधियों की संख्या 93 से अधिक नहीं होगी जो बातचीत के द्वारा तय की जायेगी। साम्प्रदायिक प्रश्न उस सम्प्रदाय के सदस्यों द्वारा ही निर्धारित किया जायेगा। शेष समस्त विषयों पर राज्यों का अधिकार होगा।

    योजना में प्रांतों को 'ए', 'बी' और 'सी' श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव था। पहली श्रेणी में हिन्दू बहुसंख्यक प्रांत- मद्रास, बम्बई, मध्यप्रांत व बरार, संयुक्त प्रांत, व बिहार थे। दूसरी श्रेणी में पंजाब, सिंध बलूचिस्तान और उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत थे जहाँ मुसलमानों का बहुमत था। तीसरी श्रेणी में बंगाल और असम थे जहाँ मुसलमानों का हल्का बहुमत था। ये तीनों ही संविभाग अपने समूह के लिये संविधान बनाने के अधिकारी थे। यह प्रावधान भी किया गया था कि ये प्रांत आपस में मिलकर गुट बना सकेंगे। इस योजना के तहत की गयी व्यवस्था की प्रत्येक 10 वर्षों के बाद समीक्षा करने का प्रावधान किया गया।

    राज्यों के सम्बन्ध में कैबीनेट मिशन ने कहा कि ब्रिटिश भारत के ब्रिटिश कॉमनवैल्थ के अंतर्गत अथवा उससे बाहर स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही, ब्रिटिश ताज और देशी राज्यों के विद्यमान सम्बन्ध समाप्त हो जायेंगे। ब्रिटिश सरकार न तो अपने हाथ में सर्वोच्च सत्ता रखेगी न ही उसे नई सरकार को हस्तांतरित करेगी। राज्यों को उनके अधिकार वापिस कर दिये जायेंगे। अतः देशी राज्यों को चाहिये कि वे अपने भविष्य की स्थिति में उत्तराधिकारी भारतीय सरकार से बातचीत करके व्यवस्थित करें। अर्थात् रजवाड़े अपनी शर्तों पर भारतीय संघ में शामिल हो सकते थे। कैबीनेट मिशन का विचार था कि यदि एक सत्तात्मक भारत बना तो रजवाड़े शक्तिशाली तीसरी शक्ति बन जायेंगे। मिशन ने कहा कि शासकों ने भारत 
    में होने वाले नवीन संवैधानिक परिवर्तनों के दौरान अपना पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया है किंतु यह सहयोग नवीन संवैधानिक ढांचे के निर्माण के दौरान समझौता वार्त्ता (Negotiation) के द्वारा ही प्राप्त हो सकेगा तथा यह समस्त राज्यों के मामले में एक जैसा नहीं होगा। प्रारंभिक अवस्था में संविधान निर्मात्री सभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व वार्त्ता समिति (Negotiation Committee) द्वारा किया जायेगा। विचार-विमर्श के अंतिम चरण में राज्यों के वास्तविक प्रतिनिधि भाग लेंगे जिनकी संख्या 93 से अधिक नहीं होगी। राज्यों के प्रतिनिधियों के चयन की प्रक्रिया सम्बद्ध पक्षों के आपसी विचार-विमर्श से निश्चित की जायेगी। परमोच्च सत्ता की समाप्ति के बाद रियासतों को पूर्ण अधिकार होगा कि वे अपना भविष्य निश्चत करें परंतु उनसे यह आशा की जाती है कि वे संघीय सरकार के साथ कुछ समझौता अवश्य कर लेंगी।

    17 मई को एक प्रेस वार्त्ता के दौरान लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने स्वीकार किया कि राज्यों के साथ महामना सम्राट की सरकार के सम्बन्ध, ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के साथ सम्बन्धों से नितांत भिन्न थे। उन्होंने योजना के प्रस्तावों के बाहर जाने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि राज्यों के प्रति सख्त रवैया अपनाने से न तो राज्यों की जनता का भला होगा और न ही ब्रिटिश प्रांतों की जनता का। उन्होंने कहा कि अंतरिम काल में राज्यों के साथ ब्रिटिश सम्बन्ध वैसे ही बने रहेंगे जैसे कि वे वर्तमान में हैं।

    भोपाल नवाब की आपत्ति

    17 मई 1946 को नवाब भोपाल ने लॉर्ड वेवेल को एक पत्र लिखकर कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा कि रक्षा मामलों में, प्रस्तावित संघीय सरकार एवं संविधान के अधिकार का प्रावधान, राज्यों की अपनी सशस्त्र सेनाओं को तो प्रभावित नहीं करेगा? वित्त के मामले में भी संघ का अधिकार केवल उन्हीं राजस्व स्रोतों तक सीमित होना चाहिये जिन पर सहमति बनती है। किसी अन्य माध्यम से कर उगाहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिये। संचार के सम्बन्ध में वर्तमान में राज्यों को प्राप्त अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिये। संविधान सभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व का तरीका राज्यों की सरकारों या समूहों के अधीन होना चाहये। संविधान सभा में सांप्रदायिकता का बड़ा प्रकरण, सभा में राज्यों के प्रतिनिधियों की बहुसंख्य उपस्थिति के दौरान मतदान से निर्धारित किया जाना चाहिये। नवाब ने मिशन से आश्वासान मांगा कि सांप्रदायिकता के प्रश्न पर राज्य अपनी शर्तों पर एक अथवा एक से अधिक समूह बना सकेंगे। राज्यों को यह अधिकार होगा कि वे प्रत्येक 10 वर्ष के अंतराल पर संघीय संविधान के पुनरीक्षण के लिये कह सकेंगे। संविधान निर्मात्री निकाय को यह अधिकार नहीं होना चाहिये कि वह राज्यों में सरकार के प्रकार अथवा शासक वंश के सम्बन्ध में किसी तरह का विचार विमर्श करे या उसके ऊपर अपनी कोई अभिशंसा दे। संविधान निर्मात्री निकाय में राज्यों के सम्बन्ध में लिया गया निर्णय या अभिशंसा को लागू करने से पूर्व उसकी अभिपुष्टि की जानी आवश्यक होगी।

    29 मई को लॉर्ड वेवेल ने एक पत्र भोपाल नवाब को भिजवाया जिसमें उन्होंने कहा कि नवाब द्वारा उठायी गयी अधिकतर बातें संविधान निर्मात्री सभा में राज्यों और ब्रिटिश भारत के सदस्यों के मध्य होने वाले विचार-विमर्श (Negotiation) के मुद्दे हैं। नवाब का यह तर्क काफी वजन रखता है कि संविधान सभा में प्रतिनिधि का चुनाव केवल शासकों के विवेकाधीन होना चाहिये किंतु मिशन का उद्देश्य ब्रिटिश भारत और रियासती भारत के मध्य स्वतंत्र सहलग्नता को बढ़ावा देने का है। नवाब को वेवेल का पत्र निराश करने वाला प्रतीत हुआ। उन्होंने 2 जून 1946 को फिर से वायसराय को पत्र लिखा- राज्यों को यह अधिकार है कि वे इस बात की मांग करें कि ब्रिटिश ताज राज्यों को ब्रिटिश भारत की दया पर न छोड़ दे, कम से कम राज्यों को संविधान सभा या संघीय संविधान में खराब स्थिति में तो न छोड़ें। नवाब विशेषतः इस मुद्दे पर परेशान थे कि कम से कम संघीय संविधान सभा में राज्यों को प्रभावित करने वाले मुद्दों को सांप्रदायिक मुद्दों के समकक्ष रखा जाये तथा संविधान सभा में राज्यों के प्रतिनिधि का चुनाव पूर्णतः राज्यों पर छोड़ा जाये।

    नवाब ने विश्वास व्यक्त किया कि सम्राट की सरकार की यह इच्छा तो कभी नहीं रही होगी कि राज्यों को उनकी वैधानिक एवं उचित मांगों तथा प्रभुसत्ता पूर्ण निकायों के रूप में उनके स्थापित और स्वीकृत अधिकारों को संरक्षित करने के लिये ताज की तरफ से कोई प्रयास किये बिना लावारिस बालक की भांति छोड़ दिया जाये। उन्होंने वायसराय से अपील की कि अपने उन मित्रों के विरुद्ध पक्ष न बनें जिन मित्रों ने अच्छे और बुरे समय में आपका साथ निभाया है तथा जो अपने शब्दों एवं आश्वासनों के प्रति वफादार रहे हैं। 4 जून 1946 को वायसराय ने नवाब के पत्र का जवाब दिया तथा शासकों की ओर से प्रकट की गयी उनकी चिंता की प्रशंसा की तथा लिखा कि नवाब राजनीतिक सलाहकार कोरफील्ड से इस पृष्ठभूमि पर किये गये विचार विमर्श के उपरांत दूसरा दृष्टिकोण अपना सकते थे। ये बातें बम्बई में होने वाली स्थायी समिति की बैठक में रखनी चाहिये।

    कोनार्ड कोरफील्ड द्वारा शासकों को सलाह

    8 जून 1946 को बम्बई में आयोजित नरेंद्र मण्डल की संवैधानिक सलाहकार समिति, 9 जून को आयोजित रियासती मंत्रियों की समिति तथा 10 जून को नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति की बैठक में कोनार्ड कोरफील्ड ने कहा कि अंतरिम काल के पश्चात् परमोच्चता की समाप्ति का निर्णय राज्यों को भविष्य की संवैधानिक संरचना में समुचित स्थान दिलाने हेतु मोलभाव करने के लिये सर्वाधिक संभव अच्छी स्थिति में रख देगा। उन्होंने राज्यों को सलाह दी कि वे एक संविधान वार्त्ता समिति (Constitutional Negotiating Commiittee) का निर्माण करें जो संविधान सभा में किये जाने वाले विचार-विमर्श के लिये शर्तें तय करे। उन्होंने राज्यों को आश्वस्त किया कि परमोच्चता की समाप्ति के बाद के अंतरिम काल में राजनीतिक विभाग, राज्यों के हितों की सुरक्षा करने, संविधान सभा में विचार-विमर्श करने, समूहीकरण एवं सहबद्धता की व्यवहारिक योजनाएं बनाने, प्रत्येक राज्य की व्यक्तिगत संधियों के पुनरीक्षण करने, उनके आर्थिक हितों को सुरक्षित बनाने तथा अल्पसंख्यकों के प्रशासन हेतु की जानी वाली व्यवस्थाओं में राज्यों की सहायता करेगा। यदि शासक राज्यों की जनता से व्यक्तिगत संपर्क रखेंगे तो उन्हें आंतरिक समर्थन प्राप्त होगा।

    स्थायी समिति का प्रस्ताव

    कोरफील्ड द्वारा सुझाये गये बिंदुओं ने नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति द्वारा 10 जून 1946 को पारित किये गये प्रस्ताव के लिये प्रचुर सामग्री प्रदान की। इस प्रस्ताव में कहा गया कि कैबीनेट मिशन योजना ने भारत की स्वतंत्रता के लिये आवश्यक तंत्र प्रदान किया है तथा भविष्य में होने वाले विचार-विमर्श के लिये भी समुचित आधार प्रदान किया है। इस प्रस्ताव में मिशन द्वारा परमोच्चता के सम्बन्ध में की गयी घोषणा का भी स्वागत किया गया किंतु अंतरिम काल में की जाने वाली व्यवस्थाओं के लिये आवश्यक समायोजनों की आवश्यकता भी जताईं प्रस्ताव में कहा गया कि कैबीनेट योजना में उल्लेख किये गये आधारभूत महत्त्व के अनेक मामलों की व्याख्या की जानी आवश्यक है जिन्हें कि भविष्य के विचार-विमर्श के लिये छोड़ दिया गया है। नरेन्द्र मण्डल की स्थायी समिति ने कोरफील्ड की सलाह पर एक समझौता समिति (Negotiating Commiittee) का निर्माण किया तथा चांसलर को अधिकृत किया कि वह कैबिनेट योजना में सुझाये गये प्रावधान के अनुसार संविधान सभा में ब्रिटिश भारतीय समिति से विचार विमर्श करे।

    समझौता समिति के गठन पर प्रजा परिषद की आपत्ति

    अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद ने नरेंद्र मण्डल के चांसलर के अधिकारों को चुनौती दी। परिषद पूर्व में ही 21-23 अक्टूबर 1945 को जयपुर में आयोजित बैठक में मांग कर चुकी थी कि संभावित भारतीय संविधान निर्मात्री समिति में राज्यों के प्रतिनिधियों को जनता द्वारा चुनकर भेजा जाना चाहिये। परिषद का यह भी कहना था कि नरेंद्र मंडल को देशी राज्यों का अधिवक्ता कैसे माना जा सकता है जबकि देश की सात बड़ी रियासतें- हैदराबाद, कश्मीर, बड़ौदा, मैसूर, ट्रावनकोर, कोचीन और इन्दौर नरेंद्र मण्डल की सदस्य कभी नहीं रहीं। कैबीनेट योजना के अंतर्गत इन सात राज्यों को जनसंख्या के आधार पर संविधान निर्मात्री सभा में 40 प्रतिशत से भी अधिक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार था। वार्त्ता समिति में जनता के प्रतिनिधियों को सम्मिलित नहीं किया गया था। अतः समिति को किसी प्रकार का निर्णय लेने का वैध अधिकार नहीं है।

    कांग्रेस द्वारा कैबीनेट मिशन को स्वीकृति

    ब्रिटिश भारतीय नेताओं के अनुसार कैबीनेट मिशन द्वारा घोषित प्रांतों के समूहीकरण की योजना भारतीय संघ की एकता व अखंडता के लिये अत्यधिक घातक व खतरनाक प्रमाणित हो सकती थी। इस घोषणा ने देशी शासकों को अंतरिम सरकार के साथ समानता का दर्जा दे दिया था। कांग्रेस इस स्थिति से अप्रसन्न थी तथा पहले ही कह चुकी थी कि कैबीनेट मिशन योजना ने केंद्र को केवल रक्षा, विदेश एवं संचार के अधिकारों से युक्त एक कमजोर केंद्र की प्रस्तावना की है। देश को ए, बी एवं सी क्षेत्रों में बांटकर मुस्लिम लीग द्वारा निर्धारित की गयी सीमाओं वाले पाकिस्तान की अवधारणा को पुष्ट किया गया है। कांग्रेस का मानना था कि प्रांतों के समूहीकरण में प्रांतों को छूट रहेगी कि वे अपने लिये उपयुक्त समूह का चुनाव करें अथवा समूह से बाहर रह सकें जबकि मुस्लिम लीग का मानना था कि प्रांतों को उनके लिये निर्धारित समूह में शामिल होना आवश्यक होगा। इस प्रकार कांग्रेस ने कई आपत्तियां उठाईं और कई बातों पर स्पष्टीकरण चाहा। उसकी मांग यह भी थी कि प्रतिनिधि चाहे प्रांतों के हों अथवा रियासतों के, विधान सभा के लिये एक जैसी चुनाव प्रक्रिया होनी चाहिये।

    कैबीनेट योजना के प्रस्तावों पर गांधीजी का कहना था कि दुःख दर्द से भरे इस देश को अभाव और दुःख से मुक्त करने का यह बीज है। वर्तमान परिस्थिति में इससे अच्छा वे कुछ नहीं कर सकते थे। स्वयं कैबीनेट मिशन ने इस योजना के बारे में घोषणा की थी कि यह भारतीयों को शीघ्रातिशीघ्र आजादी देने का एक मार्ग है जिसमें आंतरिक उपद्रव एवं झगड़े की संभावनायें न्यूनतम हैं। 6-7 जुलाई 1946 को कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में नेहरू ने कैबीनेट योजना को स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा जो 51 के मुकाबले 205 मतों से स्वीकृत हो गया। नेहरू को विश्वास था कि प्रांतों का कोई समूह बनेगा ही नहीं। क्योंकि संविभाग ए के समस्त और बी तथा सी के कुछ राज्य समूहीकरण के विरुद्ध रहेंगे।

    नरेन्द्र मण्डल का ऐतिहासिक प्रस्ताव

    17 जुलाई 1946 को आयोजित नरेंद्र मण्डल के सम्मेलन में ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें घोषणा की गयी कि नरेंद्र मण्डल देश की इस इच्छा से पूर्ण सहमति रखता है कि भारत को तत्काल राजनीतिक महिमा प्राप्त हो। राजाओं की इच्छा संवैधानिक समास्यों के निस्तारण के कार्य में प्रत्येक संभावित योगदान देने की है। ब्रिटिश सरकार पहले ही यह कह चुकी थी कि यदि ब्रिटिश भारत स्वतंत्रता चाहता है तो उसके रास्ते में कोई बाधा नहीं आयेगी। अब राजाओं ने भी घोषणा कर दी कि वे भी बाधा नहीं बनना चाहते तथा किसी भी आवश्यक परिवर्तन के लिये दी गयी उनकी सहमति अनावश्यक रूप से वापस नहीं ली जायेगी।

    बीकानेर महाराजा द्वारा कैबीनेट योजना के प्रस्तावों का स्वागत

    बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने कैबीनेट मिशन की घोषणा को भारत की स्वतंत्रता के लिये सबसे महान कदम बताते हुए कहा कि स्वतंत्र भारत में राजाओं को अपने पद की चिंता नहीं करनी चाहिये। उन्हें परिवर्तन का महत्त्व अनुभव करना चाहिये और उसी के अनुसार अपने को ढालना चाहिये। 27 जुलाई 1946 को बीकानेर नरेश ने एक बार फिर कहा कि 16 मई की योजना, जिसमें रियासतों और प्रांतों दोनों को मिलाकर संघ बनाने का प्रस्ताव है, की स्वीकृति भारत की स्वतंत्रता के लिये उठाया गया सबसे महान कदम है। मैंने यह सदा अनुभव किया है कि यदि राजा और रियासतें इस समय भारत में होने वाले परिवर्तनों की महत्ता को पूरी तरह ध्यान में रखें और अपने मन और नीति को उसके अनुसार बनायें तो स्वतंत्र भारत में अपने उपयुक्त स्थान के बारे में उन्हें कोई डर नहीं होना चाहिये। यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिये कि जो कुछ हो रहा है, वह बहुत गम्भीर है। करणीसिंह ने देशी राज्यों द्वारा इस योजना को स्वीकार कर लिये जाने का श्रेय बीकानेर महाराजा सादूलसिंह को दिया है। रियासतों ने सर्वसम्मति से योजना को स्वीकार कर लिया लेकिन इसमें आंतरिक कठिनाइयां थीं। महाराजा सादूलसिंह के प्रयत्नों के फलस्वरूप ही ये कठिनाइयां दूर हुई और एक सर्व-सम्मत निर्णय हो सका। यह नहीं सोचना चाहिये कि यह निर्णय बिना किसी आंतरिक कठिनाई के लिया गया। राजाओं और मन्त्रियों का एक ऐसा प्रभावशाली समूह था जो भारतीय संघ के प्रश्न को इसी रूप में नहीं देखता था। उसका विचार भारतीय रियासतों का अलग संघ बनाने का था। यह भारत का तीसरा विभाजन होता। इससे हिन्दुस्तान के टुकड़े-टुकड़े हो जाते और वह कमजोर तथा असमर्थ होता। इस खतरनाक विचार को महाराजा सादूलसिंह और उनके मित्रों की दृढ़ता ने आरंभ में ही खत्म कर दिया।

    कैबीनेट मिशन की मौत

    कैबीनेट मिशन योजना में एक अंतरिम सरकार के गठन का भी प्रस्ताव किया गया था। वायसराय को छोड़कर शेष समस्त पदों को भारतीयों से भरा जाना था। जातीय-दलीय कोटे से 14 सदस्यों की सम्मिलित सरकार बननी थी जिसमें कांग्रेस के 5 सवर्ण हिंदू सदस्य, मुस्लिम लीग के 5 सदस्य, परिगणित हिंदू जाति का 1 सदस्य और अन्यान्य अल्पसंख्यकों के 3 सदस्य होने थे। गांधीजी ने कांग्रेस के 5 सदस्यों में 1 राष्ट्रवादी मुसलमान को शामिल करने पर जोर दिया। इस पर जिन्ना पूर्व की भांति फिर अड़ गये कि कि मुस्लिम लीग ही एकमात्र संस्था है जो मुसलमानों का नेतृत्व कर सकती है। कांग्रेस को इसका अधिकार नहीं। जिन्ना के इस दावे के सामने वायसराय वेवेल, कैबिनेट मिशन तथा कांग्रेस ने आत्मसमर्पण कर दिया।

    10 जुलाई 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने एक प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों से कहा कि कांग्रेस पर समझौतों का कोई बंधन नहीं है और वह हर स्थिति का सामना करने के लिये उसी तरह तैयार है जैसे कि अब तक करती आयी है। मुस्लिम लीग ने नेहरू के वक्तव्य का अर्थ यह लगाया कि एक बार सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद कांग्रेस इस योजना में संशोधन कर देगी। अतः जिन्ना ने 27 जुलाई को ही मुस्लिम लीग की बैठक बुलाई और कैबीनेट मिशन योजना की अपनी स्वीकृति रद्द करके पाकिस्तान प्राप्त करने के लिये सीधी कार्यवाही की घोषणा कर दी। इस घोषणा में कहा गया कि आज से हम वैधानिक तरीकों से अलग होते हैं। मुस्लिम लीग के साथ-साथ अन्य राजनीतिक तत्वों ने भी इस योजना को अस्वीकार कर दिया। नेहरू की घोषणा पर मौलाना अबुल कलाम आजाद ने टिप्पणी की कि 1946 की गलती बड़ी महंगी साबित हुई।

    मंत्रिमण्डल योजना में राज्यों की जनता का उल्लेख नहीं किया गया था, उसमें केवल नरेशों को प्रधानता दी गयी थी। जयनारायण व्यास ने इसका विरोध किया और दिल्ली में एक विराट सम्मेलन का आयोजन कर ऐसा वातावरण पैदा कर दिया कि नेहरू और पटेल को भी उसमें उपस्थित होकर आश्वासन देना पड़ा कि ऐसी कोई योजना स्वीकार नहीं की जायेगी जिसमें देशी राज्यों की जनता की उपेक्षा हो। अंत में गांधी के यह विश्वास दिलाने पर कि देशी राज्यों की जनता के हितों की उपेक्षा नहीं की जायेगी, व्यास चुप हुए।

    इस प्रकार चारों ओर कैबीनेट मिशन योजना के विरुद्ध घनघोर वातावरण बन गया तथापि कांग्रेस इस बात पर सहमत थी कि कैबीनेट योजना के तहत देश में एक अंतरिम सरकार का तत्काल गठन किया जाना चाहिये। 29 जून 1946 को कैबीनेट मिशन इस आशा के साथ भारत छोड़ चुका था कि और कुछ नहीं तो कम से कम संविधान सभा का गठन तो होगा ही। क्रिप्स तथा पैथिक लारेंस ने ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि मिशन अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल रहा। 16 मई 1946 की कैबिनेट मिशन योजना यद्यपि एक अभिशंषा के रूप में प्रस्तुत की गयी थी किंतु फिर भी यह किसी पंचनिर्णय (Award) से कम नहीं थी क्योंकि मिशन, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य सहमति के निर्माण में असफल रहा था। कैबिनेट मिशन योजना और उसके अनंतर गतिविधियों के सर्वेक्षण से यह निष्कर्ष निकालना कठिन नहीं होगा कि क्रिप्स मिशन की ही भांति मौत कैबीनेट मिशन की भी लिखी थी। 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग ने सीधी कार्यवाही दिवस मनाया जिसके कारण कलकत्ता में हजारों हिन्दुओं की जानें गयीं।

    अंतरिम सरकार का गठन

    वायसराय चाहता था कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों दलों के सहमत होने पर अंतरिम सरकार का गठन हो किंतु मुस्लिम लीग सरकार में शामिल हाने के लिये सहमत नहीं हुई। अगस्त 1946 के अंत में र्पंधानमंत्री एटली ने वायसराय लॉर्ड वेवेल को व्यक्तिगत तार भेजकर निर्देशित किया कि मुस्लिम लीग के बिना ही अंतरिम सरकार का गठन किया जाये। वेवेल ने कैबीनेट मिशन के प्रस्तावों के अनुसार 2 सितम्बर 1946 को दिल्ली में अंतरिम सरकार का गठन किया। इसमें केवल कांग्रेसी नेता शामिल हुए। इसलिये पाँच पद स्थानापन्न रखे गये जो कि मुस्लिम लीग के लिये थे। 15 अक्टूबर 1946 को मुस्लिम लीग भी अंतरिम सरकार में शामिल हो गयी।

    विधान निर्मात्री सभा का गठन

    कैबीनेट मिशन योजना के प्रस्तावों के तहत कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने संविधान निर्मात्री सभा में भाग लेने पर अपनी सहमति दी थी किंतु बाद में कुछ बिंदुओं की व्याख्या पर दोनों दलों में विवाद हो गया तथा मुस्लिम लीग ने अपनी सहमति वापिस ले ली। जुलाई 1946 में संविधान निर्मात्री समिति के सदस्यों का चुनाव संपन्न हुआ जिसमें कांग्रेस के 212 सदस्यों के मुकाबले मुस्लिम लीग के मात्र 73 सदस्य ही हो पाये। इसलिये मुस्लिम लीग संविधान सभा के जाल में फंसना नहीं चाहती थी। मुस्लिम लीग ने अपने आप को इससे अलग कर लिया। गांधीजी की टिप्पणी थी कि हो सकता है कि केवल कांग्रेस प्रांत और देशी नरेश ही इसमें सम्मिलित हों। मेरे विचार से यह शोभनीय और पूर्णतः तथ्यसंगत होगा। 9 दिसम्बर 1946 को तनाव, निराशा एवं अनिश्चितता के वातावरण में विधान निर्मात्री समिति ने कार्य करना आरंभ कर दिया।

    21 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा ने नरेंद्र मण्डल द्वारा गठित राज्य संविधान वार्त्ता समिति से वार्त्ता करने के लिये संविधान वार्त्ता समिति नियुक्त की। इसके प्रस्ताव पर जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि मैं स्पष्ट कहता हूँ कि मुझे खेद है कि हमें राजाओं की समिति से वार्त्ता करनी पड़ेगी। मैं सोचता हूँ कि राज्यों की तरफ से हमें राज्यों के लोगों से बात करनी चाहिये थी। मैं अब भी यह सोचता हूँ कि यदि वार्त्ता समिति सही कार्य करना चाहती है तो उसे समिति में ऐसे प्रतिनिधि सम्मिलित करने चाहिये किंतु मैं अनुभव करता हूँ कि इस स्तर पर आकर हम इसके लिये जोर नहीं डाल सकते।

    इस प्रकार 1940 से लेकर 1946 तक के काल में राजपूताना के राज्यों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के लिये अपने राज्य के संसधान ब्रिटिश सरकार को सौंपकर स्वामिभक्ति का प्रदर्शन किया किंतु संघ के निर्माण की दिशा में ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तुत क्रिप्स प्रस्ताव तथा कैबिनेट मिशन प्रस्ताव में रुचि का प्रदर्शन नहीं किया। जयपुर, जोधपुर एवं बीकानेर के प्रतिनिधि नरेंद्र मण्डल के माध्यम से क्रिप्स एवं कैबीनेट मिशन के साथ हुई वार्ताओं में भाग लिया किंतु उदयपुर लगभग अनुपस्थित दिखायी दिया। जयपुर एवं जोधपुर राज्य ब्रिटिश प्रधानमंत्रियों एवं पुलिस अधिकारियों के माध्यम से प्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण में थे तो उदयपुर राज्य भी ब्रिटिश साम्राज्य के हाथों की कठपुतली बना रहा।

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