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  • अध्याय-1 : राजपूताना राज्यों में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का प्रवेश एवं ब्रिटिश ताज की सम्प्रभुता की स्थापना

     03.06.2020
    अध्याय-1 : राजपूताना राज्यों में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का प्रवेश एवं ब्रिटिश ताज की सम्प्रभुता की स्थापना

    अध्याय-1


    राजपूताना राज्यों में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का प्रवेश एवं ब्रिटिश ताज की सम्प्रभुता की स्थापना

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    अगर हम सारे भारत को जिलों में बांट दें तो स्थितियां ऐसी नहीं हैं कि हमारा साम्राज्य 50 साल तक भी चले किंतु यदि हम कई देशी रियासतें, उन्हें बिना कोई राजनीतिक सत्ता दिये, किंतु शाही उपकरणों के रूप में रखें तो हम भारत में तब तक के लिये रहेंगे जब तक हमारी नौसैनिक शक्ति बनी रहेगी। -सर जान मैल्कम।


    राजपूताना शब्द का व्यावहारिक अर्थ है, वह क्षेत्र जिस पर राजपूत शासकों का शासन हो। राजपूताना का विस्तार 23¤ 3' उत्तरी अक्षांश से लेकर 30¤ 12' उत्तरी अक्षांश तथा 69¤ 30' पूर्वी देशांतर से लेकर 78¤ 17' पूर्वी देशांतर के मध्य था एवं कुल क्षेत्रफल 1,30,462 वर्गमील था। इसके पश्चिम में सिंधु घाटी, पूर्व में बुंदेलखण्ड, उत्तर में सतलुज का (दक्षिणी) बलुई खण्ड तथा दक्षिण में विंध्य पर्वत स्थित था। राजपूताना की रियासतें दिल्ली के दक्षिण पश्चिम में स्थित थीं। ये पंजाब, सिंध, गुजरात तथा मालवा से घिरी हुई थीं।

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राजपूताना को राजस्थान के नाम से जाना जाता है। इस प्रदेश का इतिहास गौरवशाली रहा है। राष्ट्र की संस्कृति के निर्माण में इस प्रदेश की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है जिसके कारण इसे राष्ट्रीय आन, बान और शान के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। विभिन्न राज्यों के शासकों में परस्पर मन मुटाव रहने तथा परस्पर युद्धरत रहने के उपरांत भी यहाँ के शासकों और जन सामान्य में जीवन मूल्यों के प्रति गहरी आस्था थी। यहाँ तक कि इन राज्यों के शासक और प्रजाजन शाश्वत जीवन मूल्यों की रक्षा के लिये अपने प्राण तक न्यौछावर कर देते थे। ब्राह्मण, स्त्री, धरती, गाय, शरणागत और देवविग्रह की रक्षा के लिये रणभूमि में कट मरना अत्यंत ही सौभाग्य का विषय माना जाता था। अपनी मातृभूमि तथा अपने कुल की मर्यादा के नाम पर कलंक न आये, इसके लिये वे सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर रहते थे।

    आजादी से पहले यह भू-भाग कभी भी एक राजनैतिक इकाई के रूप में संगठित नहीं हुआ। अंग्रेजों के इस क्षेत्र में आगमन से पहले इसे कभी एक नाम से संबोधित भी नहीं किया गया। यद्यपि विभिन्न नृ-वंशों के अधीन राजपूताना के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग बोलियां बोली जातीं थीं तथा भौगोलिक परिस्थितियों में भी अंतर था तथापि इन राज्यों के रीति-रिवाजों में समानता थी। इन राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्था प्राचीन भारतीय पद्धति पर आधारित होने से इन समस्त राज्यों का बाह्य स्वरूप भी एक जैसा दिखाई पड़ता था। इस भू-भाग में स्थित विभिन्न राज्यों में बहुत कुछ अलग होते हुए भी यहाँ के निवासियों में व्यापक साम्य था। इस प्रदेश के वासियों ने कभी मिल कर तो कभी अलग रह कर विदेशी आक्रांताओं से लोहा लिया। उनसे अनेक बार परास्त होकर भी, यहाँ तक कि उनके अधीन होकर भी यहाँ के निवासियों और शासकों ने अपनी पहचान नहीं खोई। सर्वप्रथम जार्ज टॉमस ने ई.1800 में इस प्रदेश को राजपूताना नाम दिया। जेम्स टॉड ने राजपूत राजाओं के इस प्रदेश को राजस्थान बताते हुए स्पष्ट किया कि इस क्षेत्र को रजवाड़ा, रायथान और राजपूताना भी कहा जाता है।

    शताब्दियों से इस क्षेत्र के विभिन्न भागों में अलग-अलग नृ-वंशों का शासन रहा। प्राचीन काल में इस क्षेत्र में नाग, यौधेय, मालव, शिवि, साल्व, अर्जुनायन, वाकाटक, कुणिंद, मघ, उत्तमभद्र आदि क्षत्रियों के राज्य थे। ये राज्य कभी स्वतंत्र रहकर तो कभी मगध की केन्द्रीय सत्ता के अधीन रहकर, कहीं राज्य सत्तात्मक तो कहीं गणतंत्रात्मक स्वरूप बनाये हुए थे। इन प्राचीन क्षत्रियों के नेतृत्व में सदियों तक यह प्रदेश अपने शत्रुओं से लोहा लेता रहा। शक, कुषाण, आभीर, पह्लव एवं हूण इत्यादि जातियां बड़े पैमाने पर आक्रांता के रूप में यहाँ आईं और कालांतर में इसी क्षेत्र के निवासियों में घुल-मिलकर अपनी पृथक पहचान खो बैठीं। प्राचीन भारतीय क्षत्रियों के नेपथ्य में चले जाने के साथ ही इस क्षेत्र में प्रतिहार, परमार, चौलुक्य, गुहिल और चौहान राजपूतों का प्रसार हुआ। इन राजवंशों में जहाँ एक ओर वैवाहिक सम्बन्ध थे तो दूसरी ओर सदैव ही परस्पर युद्ध चलते रहते थे। परस्पर युद्धरत रहने तथा तत्पश्चात् मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमण होने से इन नृ-वंशों की शक्ति बुरी तरह क्षीण हुई।

    ई.1192 में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद अजमेर से लेकर दिल्ली तक का भू-भाग तुर्कों के अधीन हो गया। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों और उनके गवर्नरों से इस प्रदेश के विभिन्न राज्यों ने निरंतर युद्ध किया। इन युद्धों में मिली पराजयों के उपरांत भी अधिकांश राज्य अपना अस्तित्व बचाये रहे। चौदहवीं शताब्दी में इस क्षेत्र में कन्नौज से आये राठौड़ों को अपनी शक्ति बढ़ाने और अपने राज्य स्थापित करने का अवसर मिला। मुगलों के आगमन से पहले राठौड़ अपने आप को पश्चिमी राजस्थान में भली भांति स्थापित कर चुके थे।

    राजपूताना के राज्य

    अकबर के समय में राजपूताना में 11 राज्य थे- मेवाड़, मारवाड़, बीकानेर, जैसलमेर, सिरोही, अजमेर, बूंदी, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ एवं करौली। मेवाड़ को छोड़कर लगभग पूरा राजपूताना मुगलों के अधीन था। अजमेर में मुगल सूबेदार नियुक्त था। उस काल में मेवाड़ (उदयपुर), मारवाड़ (जोधपुर) तथा आम्बेर (जयपुर) तीन बड़े राज्य थे। राजपूताना की अन्य रियासतों के संस्थापकों में से अधिकांश शासक इन्हीं तीन बड़े राज्यों के शासकों के वंशज थे। इनमें से मेवाड़ अपनी प्राचीनता, दृढ़ता एवं गौरव की दृष्टि से समस्त राज्यों में पहला स्थान रखता था। जहाँ राजपूताना की अन्य समस्त रियासतें अकबर के अधीन हो गयी थीं वहीं मेवाड़ ने अपनी स्वतंत्रता को बनाये रखा। जहांगीर के समय में मेवाड़ को मुगलों से संधि करनी पड़ी जो औरंगजेब के समय में भंग हो गयी।

    कोटा, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, किशनगढ़ तथा शाहपुरा राज्यों की स्थापना मुगलों के काल में हुई। राजपूताना के राज्य दिल्ली की केन्द्रीय सत्ता के अधीन थे किंतु आंतरिक शासन संचालन में वे लगभग स्वतंत्र थे। औरंगजेब ने अकबर की नीति का त्याग कर दिया जिससे अधिकांश राजपूत राज्यों के सम्बन्ध मुगलों से विच्छेद हो गये तथा उसकी मृत्यु (ई.1707) के पश्चात मुगल साम्राज्य अस्ताचल को चला गया। मुगलों की निर्बलता का लाभ उठाकर भारत में मराठा सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित हुए।

    राजपूताने में मराठा शक्ति का विस्तार

    शिवाजी के वंशज सतारा में निवास करते थे किंतु वे मराठा संघ के नाम मात्र के मुखिया थे। राज्य का संचालन पेशवा द्वारा किया जाता था जो पुणे में रहता था। मराठा राज्य के महत्त्वपूर्ण सूबेदारों में से सिंधिया ग्वालियर में, भौंसले नागपुर में, होल्कर इन्दौर में तथा गायकवाड़ बड़ौदा में नियुक्त थे। ई.1735 में मुगल बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने मराठों को चौथ देना स्वीकार कर लिया तो पेशवा बाजीराव राजपूताने के राज्यों से भी चौथ मांगने लगा क्योंकि राजपूताना के राज्य मुगल सल्तनत के अधीन थे। राजपूताने के राज्यों ने अलग-अलग रह कर स्वयं को मराठों से निबटने में असमर्थ पाया। इसलिये ई.1734 में राजपूताने के शासकों ने हुरड़ा नामक स्थान पर एक सम्मेलन आयोजित किया जिसे हुरड़ा सम्मेलन कहते हैं। इस सम्मेलन में मराठों के विरुद्ध राजपूताने के राज्यों का संघ बनाया गया किंतु इस संघ ने कोई कार्यवाही नहीं की।

    ई.1736 में उदयपुर के महाराणा जगतसिंह ने मराठों को कर देना स्वीकार कर लिया। ई.1737 में कोटा मराठों से परास्त हुआ और उसने मराठों को चौथ देना स्वीकार किया। उसी वर्ष कोटा में मराठों का प्रतिनिधि नियुक्त हुआ जो कोटा और बूंदी से कर वसूलता था। जयपुर के महाराजा जयसिंह ने भी पेशवा बाजीराव से संधि कर ली और कर देना स्वीकार कर लिया। सिंधिया, होल्कर और पेशवा की सेनाओं ने मेवाड़ को जी भर कर लूटा। मेवाड़ नरेश जगतसिंह (ई.1734-51) से लेकर मेवाड़ नरेश अरिसिंह (ई.1761-73) के समय तक मराठों ने मेवाड़ से 181 लाख रुपये नगद तथा 28.5 लाख रुपये की आय के परगने छीन लिये। मराठों की रानी अहिल्याबाई ने केवल चिट्ठी से धमकाकर मेवाड़ से नींबाहेड़ा का परगना छीन लिया।

    मराठों के आतंक से त्रस्त होकर जयपुर नरेश ईश्वरीसिंह ने आत्महत्या कर ली। माधोसिंह मराठों का समर्थन प्राप्त कर जयपुर की गद्दी पर बैठा किंतु उसके राज्य-काल में होल्कर एवं सिंधिया ने जयपुर को बुरी तरह लूटा। इससे राज्य की आर्थिक स्थिति शोचनीय हो गयी। राजा की निर्बलता से उत्साहित होकर सामन्तगण राज्य की खालसा भूमि को बलपूर्वक दबाने लगे। राज्य के सामन्तों में गुटबंदी होने लगी जिससे राज्य में घोर अराजकता एवं अव्यवस्था फैल गयी। मराठों ने मारवाड़ नरेश रामसिंह और विजयसिंह के बीच हुए झगड़े में हस्तक्षेप किया और मारवाड़ पर आक्रमण कर दिया। विजयसिंह की सेना मराठों से हार गयी और विजयसिंह ने मराठों को चौथ देना स्वीकार कर अपना पीछा छुड़ाया। कोटा के दीवान जालिमसिंह ने मराठों से सहयोग एवं संधि का मार्ग अपनाया। भरतपुर के जाट राजा ने मराठों के सहयोग से अपनी शक्ति बढ़ाई। बीकानेर राज्य मराठों के आक्रमण से अप्रभावित रहा। राजपूताने के राजा मराठा शक्ति से इतने संत्रस्त थे कि अहमदशाह अब्दाली द्वारा ई.1761 में पानीपत के मैदान में मराठों को परास्त कर दिये जाने के उपरांत भी वे अपने राज्यों से मराठों को बाहर नहीं धकेल सके। एक ओर राजपूताना के छोटे-छोटे राज्यों में मन-मुटाव और निरंतर संघर्ष चल रहा था तो दूसरी ओर मराठों के निरंतर आक्रमणों ने राजपूताना की राजनैतिक शक्ति को तोड़कर रख दिया था।

    देशी राज्यों में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का प्रवेश

    जहांगीर के समय से भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की व्यापारिक गतिविधियां आरंभ हो गयी थीं। लगभग 150 वर्षों तक अंग्रेज व्यापारी ही बने रहे और उन्होंने 'व्यापार, न कि भूमि' की नीति अपनाई। मुगलों के अस्ताचल में जाने एवं पुर्तगाली, डच तथा फ्रैंच शक्तियों को परास्त कर भारत में अपने लिये मैदान साफ करने में अंग्रेजों को अठारहवीं सदी के मध्य तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। 23 जून 1757 के प्लासी युद्ध के पश्चात् ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारत में प्रथम बार राजनीतिक सत्ता प्राप्त हुई। इसके बाद अंग्रेजों ने अपनी नीति 'भूमि, न कि व्यापार' कर दी।

    देशी राज्यों के परिप्रेक्ष्य में ब्रिटिश नीति में कई परिवर्तन हुए किंतु भारत में साम्राज्यिक शासन को बनाये रखने का प्रमुख विचार, उन परिवर्तनों को जोड़ने वाले सूत्र के रूप में सदैव विद्यमान रहा। यह नीति तीन मुख्य चरणों से निकली जिन्हें घेराबंदी (Ring Fence) सहायक समझौता (Subsidiary Alliance) तथा अधीनस्थ सहयोग ( Subordinate Co-operation) कहा जाता है। राज्यों की दृष्टि से इन्हें 'ब्रिटेन की सुरक्षा', 'आरोहण' तथा 'साम्राज्य' कहा जा सकता है। ब्रिटिश नीति के प्रथम चरण (ई.1765-98) में नियामक विचार 'सुरक्षा' तथा 'भारत में इंगलैण्ड की स्थिति का प्रदर्शन' था। इस काल में कम्पनी अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रही थी। यह चारों ओर से अपने शत्रुओं और प्रतिकूलताओं से घिरी हुई थी। इसलिये स्वाभाविक रूप से कम्पनी ने स्थानीय संभावनाओं में से मित्र एवं सहायक ढूंढे। इन मित्रों के प्रति कम्पनी की नीति चाटुकारिता युक्त, कृपाकांक्षा युक्त एवं परस्पर आदान-प्रदान की थी।

    ई.1756 से 1813 तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने देशी राज्यों के प्रति 'घेरा डालने की नीति' अपनायी। इस अवधि में देशी रियासतों के साथ समानता और स्वतंत्रता के आधार पर समझौते किये गये। भारतीय रियासतों को इसलिये सहन किया गया क्योंकि वे उन लोगों के लिये शरणस्थली थीं जिनकी युद्ध, षड़यंत्र और लूट-मार की आदत उन्हें ब्रिटिश भारत में शांतिपूर्ण नागरिकों के रूप में नहीं रहने देती थी। लॉर्ड क्लाइव (ई.1758-67) ने मुगल सत्ता की अनुकम्पा प्राप्त की। ई.1765 में बक्सर युद्ध के पश्चात् हुई इलाहबाद संधि से ईस्ट इण्डिया कम्पनी राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हुई। वारेन हेस्टिंग्स (ई.1772-1785) के काल में स्थानीय शक्तियों की सहायता से विस्तार की नीति अपनाई गई। ई.1784 के पिट्स इण्डिया एक्ट में घोषणा की गयी कि किसी भी नये क्षेत्र को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के क्षेत्र में जबर्दस्ती नहीं मिलाया जायेगा। लार्ड कार्नवालिस (ई.1786-1793) तथा सर जॉन शोर (ई.1793-1798) ने देशी राज्यों के प्रति 'अहस्तक्षेप की नीति' अपनायी। इस नीति को अपनाने के पीछे उनका विचार मित्र शक्तियों की अवरोधक दीवार खड़ी करने तथा जहाँ तक संभव हो विजित मित्र शक्तियों की घेरेबंदी में रहने का था।

    मारवाड़ रियासत ने ई.1786, 1790 तथा 1796 में, जयपुर रियासत ने ई.1787, 1795 तथा 1799 में एवं कोटा रियासत ने ई.1795 में मराठों के विरुद्ध अंग्रेजों से सहायता मांगी किंतु अहस्तक्षेप की नीति के कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इन अनुरोधों को स्वीकार नहीं किया। शीघ्र ही अनुभव किया जाने लगा कि यदि स्थानीय शक्तियों की स्वयं की घेरेबंदी नहीं की गयी तथा उन्हें अधीनस्थ स्थिति में नहीं लाया गया तो अंग्रेजों की सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी। इस कारण लॉर्ड वेलेजली (ई.1798 से 1805) के काल में ब्रिटिश नीति का अगला चरण आरंभ हुआ। इस चरण (1798-1858) में 'सहयोग' के स्थान पर 'प्रभुत्व' ने प्रमुखता ले ली। वेलेजली ने अधीनस्थ संधि की पद्धति निर्मित की। इस पद्धति में शासक, रियासत के आंतरिक प्रबंध को अपने पास रखता था किंतु बाह्य शांति एवं सुरक्षा के दायित्व, ब्रिटिश शक्ति को समर्पित कर देता था। इस प्रकार वेलेजली ने 'अधीनस्थ संधियों' के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को समस्त भारतीय राज्यों पर थोपने का निर्णय लिया ताकि अधीनस्थ राज्य, ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध किसी तरह का संघ न बना सकें। उसने 'सहायता के समझौतों' से ब्रिटिश प्रभुत्व को और भी दृढ़ता से स्थापित कर दिया। वेलेजली ने प्रयत्न किया कि राजपूताने के राज्यों को ब्रिटिश प्रभाव एवं मित्रता के क्षेत्र में लाया जाये किंतु उसे इस कार्य में सफलता नहीं मिली।

    कम्पनी द्वारा ई.1803 में अलवर, भरतपुर, जयपुर तथा जोधपुर राज्यों के साथ, ई.1804 में धौलपुर तथा प्रतापगढ़ राज्यों के साथ ई.1805 में पुनः भरतपुर राज्य के साथ संधि की गयी। दिसम्बर 1803 में अंग्रेजों ने सिंधिया के साथ सुरजी अर्जुनगांव की संधि की। इसके बाद अंग्रेजों की राजपूताना में रुचि समाप्त हो गयी। इस कारण ई.1803 में लॉर्ड लेक ने जोधपुर राज्य के साथ जो समझौता किया वह कभी लागू न हुआ। जयपुर के साथ भी ई.1803 में किया गया समझौता विफल हो गया। अंग्रेज ई.1803 की संधियों के उत्तरदायित्व से सुविधानुसार विमुक्त हो गये किंतु उन्होंने संधि उल्लंघन का दोष अपने मित्रों पर डाल दिया।

    ई.1805 में वेलेजली के लौट जाने के बाद ब्रिटिश नीति में एक बार फिर परिवर्तन आया। लॉर्ड कार्नवालिस (ई.1805) तथा बारलो (ई.1805-1807) ने देशी रियासतों की ओर से किये जा रहे संधियों के प्रयत्नों को अस्वीकृत किया विशेषतः जयपुर के मामले में। जोधपुर महाराजा मानसिंह ने ई. 1805 तथा 1806 में पुनः संधि के प्रस्ताव भेजे किंतु वे स्वीकृत नहीं हुए। नवम्बर 1808 में बीकानेर महाराजा सूरतसिंह ने एल्फिंस्टन से अनुरोध किया कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी बीकानेर राज्य को अपने संरक्षण में ले किंतु एल्फिंस्टन ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

    राजपूताने में पिण्डारियों का आतंक

    अहस्तक्षेप की नीति के कारण न केवल मध्य भारत और राजपूताना की रियासतें, पिंडारियों और दूसरे लुटेरों की क्रीड़ास्थली बनीं बल्कि मराठों की शक्ति घटने से पिंडारी बहुत शक्तिशाली बन गये और वे अंग्रेजी इलाकों पर भी धावा मारने लगे। पिण्डारियों ने ब्रिटिश संरक्षित हैदराबाद राज्य तथा मद्रास प्रेसीडेंसी के कुछ क्षेत्रों पर धावे किये। इस काल में पिण्डारियों के पाँच प्रमुख नेता थे- करीमखां, मुहम्मद खां, वसील खां, चीतू खां तथा अमीर खां। अमीर खां ने मारवाड़, आम्बेर और मेवाड़ राज्यों के आपसी संघर्ष का लाभ उठाया और तीनों ही राज्यों की प्रजा तथा राजाओं को जी भर कर लूटा। अमीर खां ने मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह को विवश करके राजकुमारी कृष्णा कुमारी को जहर दिलवा दिया।

    इस काल में एक ओर तो राजपूताने की रियासतें मराठों और पिण्डारियों से अपनी रक्षा करने में असमर्थ थीं तो दूसरी ओर अंग्रेज भी मराठों और पिण्डारियों से अपने क्षेत्रों की सुरक्षा करने में विफल होते जा रहे थे। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा अनुभव किया गया कि सुरक्षा की कोई पंक्ति या सेना का प्रबंध अंग्रेजी क्षेत्रों की रक्षा नहीं कर सकती। इस काल में राजपूताने की दशा का अनुमान ई.1818 में कर्नल टॉड द्वारा किये गये वर्णन से लगाया जा सकता है। उन्होंने लिखा है- 'जहाजपुर होकर कुंभलमेर जाते समय मुझे एक सौ चालीस मील में दो कस्बों के सिवा और कहीं मनुष्य के पैरों के चिह्न तक नहीं दिखाई दिये। जगह-जगह बबूल के पेड़ खड़े थे और रास्तों पर घास उग रही थी। उजड़े गावों में चीते, सूअर आदि वन्य पशुओं ने अपने रहने के स्थान बना रखे थे। उदयपुर में जहाँ पहले 50,000 घर आबाद थे अब केवल तीन हजार रह गये थे। मेर और भील पहाड़ियों से निकल कर यात्रियों को लूटते थे।'

    देशी रियासतों की आंतरिक स्थिति

    देशी राज्यों में राजा के उत्तराधिकार को लेकर खूनी संघर्ष होते थे जिनके कारण राज्यवंश के सदस्य, राज्य के अधिकारी एवं जागीरदार दो या अधिक गुटों में बंटे रहते थे। जोधपुर, जयपुर, बीकानेर, उदयपुर तथा कोटा जैसे बड़े राज्य अपने ही सामंतों से झगड़ों में उलझे हुए थे। शासकों द्वारा अपने सामंतों पर नियंत्रण करने के प्रयास पूर्णतः विफल रहे। वरिष्ठ मराठा नेताओं की मृत्यु के बाद जब सिंधिया तथा होलकर परिवारों का नेतृत्व अपरिपक्व युवकों के हाथों में चला गया तब भी राजपूत शासकों और सामंतों को अपनी सीमित परिधि से बाहर देखने का अवसर नहीं था। वे अपने घरेलू झगड़ों और षड़यंत्रों में इतने लिप्त थे कि बाहर हो रहे परिवर्तनों के बारे में उन्हें पता ही नहीं चला।

    लॉर्ड हेस्टिंग्ज की नीति

    ई.1813 से 1858 तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने देशी राज्यों के प्रति 'अधीनस्थ अलगाव की नीति' अपनायी। लॉर्ड हेस्टिंग्ज (ई.1813-1823) द्वारा पद संभालने के समय अलवर, भरतपुर और धौलपुर को छोड़कर प्रायः समस्त राजपूताना अंग्रेजी नियन्त्रण से बाहर था। दिल्ली स्थित ब्रिटिश रेजीडेंट चार्ल्स मेटकाफ का सुझाव था कि ब्रिटिश सरंक्षण के अधीन राजपूत राज्यों का एक संघ बनाया जाये। हेस्टिंग्ज ब्रिटिश संरक्षण में राजपूत राज्यों का संघ बनाने के लिये सहमत नहीं था। वह प्रत्येक राजपूत राज्य से अलग-अलग संधि करके उनसे सीधा सम्पर्क स्थापित करना चाहता था। उसने राजाओं को एक दूसरे से इतना अलग-थलग करने का निश्चय किया कि उनमें कोई भी मेल असम्भव हो जाये। राजाओं को शांति और सुरक्षा का दाना डाला गया। उन्हें इतना कमजोर और पतित किया जाना था कि वे ब्रिटिश शक्ति के लिये खतरा न बन सकें अपितु वे स्वयं अपनी सुरक्षा के लिये ब्रिटिश शक्ति पर निर्भर हो जायें। ई.1813 के बाद ब्रिटिश नीति में परिवर्तन आने का एक कारण यह भी था कि इस समय तक पिण्डारियों ने बड़ा आतंक पैदा कर दिया था जिससे ब्रिटेन के जनमत में भी उल्लेखनीय परिवर्तन हो चुका था।

    ई.1814 में चार्ल्स मेटकाफ ने लॉर्ड हेस्टिंग्ज को लिखा कि यदि समय पर विनम्रतापूर्वक मांग करने पर भी संरक्षण प्रदान नहीं किया गया तो शायद बाद में, प्रस्तावित संरक्षण भी अमान्य कर दिये जायेंगे। जॉन मैल्कम की धारणा थी कि सैनिक कार्यवाहियों तथा रसद सामग्री दोनों के लिये इन राज्यों के प्रदेशों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण होना चाहिये अन्यथा ये राज्य हमारे शत्रुओं को हम पर आक्रमण करने के लिये योग्य साधन उपलब्ध करवा देंगे।

    हेस्टिंग्स का मानना था कि राजपूत रियासतों पर हमारा प्रभाव स्थापित होने से सिक्खों और उनको सहायता देने वाली शक्तियों के बीच शक्तिशाली प्रतिरोध बन जायगा। इससे न केवल सिन्धिया, होल्कर और अमीर खां की बढ़ती हुई शक्ति नियंत्रित होगी, जो उसके अनुमान से काफी महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था, बल्कि उससे मध्य भारत में कम्पनी की सैनिक और राजनैतिक स्थिति को अत्यधिक सुदृढ़ बनाने में भी सहायता मिलेगी। ई.1817 में पिण्डारी नेता अमीर खां की गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिये टोंक रियासत का निर्माण किया गया। इस नीति के तहत ई.1817 में लॉर्ड हेस्टिंग्ज राजपूत राज्यों से संधियां करने को तत्पर हुआ। हेस्टिंग्ज ने अपना उद्देश्य लुटेरी पद्धति के पुनरुत्थान के विरुद्ध अवरोध स्थापित करना तथा मराठा शक्ति के विस्तार को रोकना बताया। उसने तर्क दिया कि चूंकि मराठे, पिण्डारियों की लूटमार को नियंत्रित करने में असफल रहे हैं अतः मराठों के साथ की गयी संधियों को त्यागना न्याय संगत होगा।

    हेस्टिंग्स ने चार्ल्स मेटकाफ को राजपूत शासकों के साथ समझौते सम्पन्न करने का आदेश दे दिया। गवर्नर जनरल का पत्र पाकर चार्ल्स मेटकॉफ ने समस्त राजपूत शासकों के नाम पत्र भेजकर उन्हें कम्पनी का सहयोगी बनने के लिये आमंत्रित किया। इस पत्र में कहा गया कि राजपूताना के राजा जो खिराज मराठों को देते आये हैं उसका भुगतान ईस्ट इण्डिया कम्पनी को करें। यदि किसी अन्य पक्ष द्वारा राज्य से खिराज का दावा किया जायेगा तो उससे कम्पनी निबटेगी। राजपूताना के अन्य छोटे राज्यों के साथ कोटा, जोधपुर, उदयपुर, बूंदी, बीकानेर, जैसलमेर तथा जयपुर राज्यों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

    चार्ल्स मेटकाफ तथा सर जॉन मैलक्म को देशी राज्यों के साथ संधियां करने का दायित्व सौंपा गया। मैटकाफ ने ई.1817 में कोटा तथा करौली से, ई.1818 में जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, जैसलमेर, किशनगढ़, जयपुर तथा बूंदी राज्यों से संधियां कीं। मालवा के रेजीडेंट जॉन मैल्कम ने ई.1818 में प्रतापगढ़, बांसवाड़ा तथा डूंगरपुर से संधियां कीं। ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि करने वाले राज्यों के शासकों को अपने आंतरिक मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र आचरण करने का अधिकार था किंतु उन्हें अपने खर्चे पर ब्रिटिश फौजों को अपने राज्य में रखना पड़ता था। कम्पनी द्वारा संरक्षित राज्य को दूसरे राज्य से संधि करने के लिये पूरी तरह कम्पनी पर निर्भर रहना पड़ता था। इस सब के बदले में कम्पनी ने राज्य की बाह्य शत्रुओं से सुरक्षा करने तथा आंतरिक विद्रोह के समय राज्य में शांति स्थापित करने का दायित्व लिया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजपूताने के प्रत्येक राज्य के साथ अलग-अलग संधि की गयी।

    ब्रिटिश शासित प्रदेश

    ई.1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के जनरल ऑक्टर लोनी ने मरहठा शासक दौलतराम सिंधिया से संधि करके अजमेर पर अधिकार कर लिया। बाद में इसमें मेरवाड़ा क्षेत्र भी मिला दिया गया। इस प्रकार ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन काल में एक ब्रिटिश शासित प्रदेश- 'अजमेर-मेरवाड़ा' भी अस्तित्व में आया।

    देशी राज्यों को बनाये रखने की वकालात

    ई.1825 में सर जॉन स्टुअर्ट मिल ने वकालात की कि देशी राज्यों को समाप्त किया जाये किंतु कम्पनी के अनुभवी अधिकारियों- सर जॉन मैल्कम, सर थॉमस मुनरो, सर हेनरी रसेल, जनरल वाल्टर तथा ड्यूक ऑफ वेलिंगटन ने इस विचार के विरुद्ध चेतावनी दी। सर जॉन मैल्कम ने कहा कि मेरा निश्चित विचार है कि हमारे विस्तृत साम्राज्यिक क्षेत्रों में शांति, न कि सुरक्षा, स्थानीय राज्यों को बनाये रखने में निहित है जो कि अपनी सुरक्षा के लिये हम पर निर्भर हैं। देशी राज्य स्पष्टतः हमारी दया पर निर्भर हैं तथा वे इतनी संपूर्णता के साथ हमारी पकड़ में हैं कि उनसे हुई संधियों के कारण उनसे मिलने वाले अन्य बड़े लाभों के अतिरिक्त, हमारे शासन के साथ उनका सहअस्तित्व ही हमारी राजनीतिक शक्ति का स्रोत है। इस शक्ति का अनुमान हमें तब तक नहीं होगा जब तक कि हम उसे खो न देंगे।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारत सरकार के रूप में कार्य आरंभ

    ई.1832 में रियासतों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने के लिये एजेंट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना का पद बनाया गया। राजाओं से कहा गया कि वे अपने वकीलों की नियुक्ति करें जो अजमेर में रहकर ए. जी. जी. के सम्पर्क में रहें ताकि ए. जी. जी. उन्हें राज्य के सम्बन्ध में दिशा निर्देश दे सके। ई.1833 में चार्टर एक्ट के माध्यम से कम्पनी की व्यापारिक गतिविधियां समाप्त कर दी गयीं।

    देशी राज्यों में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का हस्तक्षेप

    इन संधियों से राजाओं को सुरक्षा तो मिली किंतु उनकी स्वतंत्रता नष्ट हो गयी। कहने को तो देशी राज्यों को अपने आंतरिक मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र आचरण करने का अधिकार था किंतु इन राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति पूर्णतः छोड़ दी गयी। राज्यों की सेवा में अपने मन पसंद अधिकारियों की नियुक्ति करके उन्होंने सहायक संधि के स्थान पर हस्तक्षेप की नीति अपना ली। अंग्रेज अधिकारी देशी राज्य के उत्तराधिकारी के मनोनयन में भी हस्तक्षेप करने लगे। राजाओं को सामंतों द्वारा अतिक्रमण किये हुए क्षेत्रों को वापस दिलवाने, खिराज को नियमित रूप से वसूल करने और शासकों तथा उनके उत्तराधिकारियों को मान्यता देने सम्बन्धी अधिकार इतने व्यापक थे कि इनसे आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप बहुत बार होना स्वाभाविक था।

    ई.1820 में राजपूताने के रेजीडेण्ट ऑक्टरलोनी ने महाराणा भीमसिंह की इच्छा के विरुद्ध उदयपुर राज्य के अधीन आने वाला मेरवाड़ा क्षेत्र ब्रिटिश शासित प्रदेश में मिला लिया। ई.1843 में कैप्टेन लडलो ने जोधपुर महाराजा मानसिंह की इच्छा के विरुद्ध नाथों को पकड़ कर अजमेर भिजवा दिया। ई.1835 में जयपुर के 16 माह के शिशु राजा रामसिंह को अंग्रेजों ने अपने संरक्षण में ले लिया जिससे जयपुर राज्य में बड़ी उत्तेजना फैली तथा अंग्रेज अधिकारी मि. ब्लैक की हत्या कर दी गयी। ई.1838 में कोटा नरेश रामसिंह तथा झाला जालिमसिंह के वंशज मदनसिंह के झगड़े को समाप्त करने के लिये कोटा राज्य में से कुछ हिस्सा अलग करके झालावाड़ रियासत का निर्माण किया गया। ई.1845 में अंग्र्रेजों ने डूंगरपुर के राजा जसवंतसिंह को पदच्युत करके वृंदावन भेज दिया तथा उसके स्थान पर दलपतसिंह को शासक बना दिया।

    अमानवीय प्रथाओं का उन्मूलन

    अनेक अंग्रेज अधिकारियों ने रियासती जनता के मध्य व्याप्त अमानवीय प्रथाओं को पहचाना और उनके उन्मूलन का प्रयास किया। जनवरी 1832 में अजमेर दरबार के दौरान विलियम बैंटिक ने राजस्थान के शासकों एवं ब्रिटिश अधिकारियों को नयी सामाजिक नीति को राजस्थान में अपनाने के लिये प्रेरित किया। ई.1834 में मेवाड़ राज्य ने कन्या वध को प्रतिबंधित कर दिया। ई.1839 में जयपुर राज्य की संरक्षक परिषद के अध्यक्ष ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट ने जयपुर राज्य में दास व्यापार को न केवल प्रतिबंधित किया बल्कि दासों के गोला-गोली जैसे अपमान जनक सम्बोधन पर ही रोक लगा दी। 1 दिसम्बर 1840 को जोधपुर राज्य में भी दास व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया गया। ई.1844 में राजपूताना के ए. जी. जी. सदरलैण्ड, जयपुर में पॉलिटिकल एजेण्ट लुडलो तथा नीमच के पॉलिटिकल एजेण्ट रॉबिन्सन के संयुक्त प्रयासों के परिणाम स्वरूप राजस्थान के समस्त राज्यों में कन्यावध को प्रतिबंधित कर असंवैधानिक घोषित कर दिया गया। ई.1847 में राजस्थान के समस्त राज्यों ने लड़के-लड़कियों की खरीद बेच को असंवैधानिक घोषित कर दिया। 5 फरवरी 1847 को जयपुर संरक्षण परिषद ने जयपुर राज्य में नागाओं, दादूपंथियों, सादों इत्यादि द्वारा चेला बनाने हेतु की जाने वाली बच्चों की खरीद को असंवैधानिक घोषित किया।

    अंग्रेज अधिकारियों ने समाधि प्रथा पर रोक लगाने के लिये प्रयास आरंभ किये। हाड़ौती के पॉलिटिकल एजेंट कैप्टेन रिचार्ड ने 28 अप्रेल 1840 को एक परिपत्र द्वारा कोटा, बूंदी एवं झालावाड़ के शासकों को समाधि जैसी अमानवीय प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की इच्छा प्रकट की। जॉन लुडलो जुलाई 1844 में जयपुर में इसे प्रतिबंधित करवाने में सफल रहा। इसी प्रकार कैप्टेन मैलकम ने ई.1847 में जोधपुर राज्य में समाधि पर प्रतिबंध लगवाने में सफलता प्राप्त की। धीरे-धीरे इस प्रथा पर सम्पूर्ण राजस्थान में ही रोक लगा दी गयी। ई.1861 में समाधि के लिये भी उसी सजा का प्रावधान किया गया जो सती प्रथा को प्रोत्साहित करने के अपराध के बदले दी जाती थी।

    26 अप्रेल 1846 को जयपुर संरक्षक परिषद ने जयपुर राज्य में सती प्रथा को दण्डनीय अपराध घोषित किया। 1856 के अंत तक मेवाड़ को छोड़कर राजस्थान के समस्त राज्यों में इस बुराई को पूर्णतः समाप्त कर दिया गया। अक्टूबर 1853 तक ए.जी.जी. के निर्देश पर महाराणा मेवाड़ को छोड़कर समस्त शासकों ने डाकन प्रथा को असंवैधानिक घोषित कर असहाय की सहायता के लिये प्रेरित किया। मगरापाल के आदिवासी प्रतिनिधियों ने रिखबदेव में राजपूताना के ए.जी.जी. वाल्टर को, डाकन प्रथा पर रोक लगाने की सहमति प्रदान की तथा भविष्य में इस अपराध में संलिप्त अपराधियों को स्वयं पकड़कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का भी वायदा किया।

    व्यपगत का सिद्धांत

    लॉर्ड डलहौजी (ई.1848-56) ने घोषणा की कि भारत के समस्त देशी राज्यों के अस्तित्व की समाप्ति सिर्फ कुछ समय की बात है। इस नीति के लिये प्रकट कारण इस धारणा को बताया गया कि देशी शासकों के भ्रष्ट और अत्याचारी प्रशासन की अपेक्षा ब्रिटिश प्रशासन काफी बेहतर है किंतु इस नीति का आधारभूत उद्देश्य भारत में ब्रिटिश माल का आयात बढ़ाना था। डलहौजी का विश्वास था कि भारत के देशी राज्यों में ब्रिटिश माल का आयात कम होने का मूल कारण उन राज्यों में भारतीय शासकों का कुप्रशासन है। उसने सोचा कि भारतीय सहयोगियों (देशी राजाओं) से भारत में ब्रिटिश विजय को आसान बनाने का काम लिया जा चुका है और अब उनसे पिण्ड छुड़ा लेना लाभदायक होगा।

    डलहौजी ने व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of lapse) का अविष्कार किया और देशी राज्यों को हड़पना आरंभ किया। भाग्यवश राजपूताने का कोई भी राज्य व्यपगत के सिद्धांत की भेंट नहीं चढ़ा। ई.1852 में करौली के अल्पवयस्क शासक नरपालसिंह ने अपनी मृत्यु के एक दिन पूर्व भरतपाल को गोद लिया। डलहौजी ने करौली राज्य पर व्यपगत का सिद्धांत लागू करने का विचार किया किंतु अंत में भरतपाल को राज्य का शासक मान लिया गया। लार्ड डलहौजी का खौफ इस कदर राजाओं में पैठ गया कि स्वयं डलहौजी के अनुसार एक महत्त्वपूर्ण रियासत के शासक ने उसके पैरों के नीचे की धूल चाटी।

    1857 का विद्रोह

    ई.1857 तक राजपूताना की समस्त देशी रियासतों पर अंग्रेजों ने अधिकार जमा लिया था एवं अब राज्यों के पास अपनी सैन्य शक्ति कुछ भी शेष नहीं बची थी। देशी राजाओं की स्थिति यह हो चुकी थी कि एक तरफ तो वे अंग्रेज अधिकारियों के शिकंजे में कसे जाकर छटपटा रहे थे तो दूसरी ओर उन्हें यह भी स्पष्ट भान था कि यदि देशी राज्यों को बने रहना है तो अंग्रेजी शासन को मजबूत बनाने के लिये हर संभव उपाय करना होगा। घरेलू अत्याचार तथा पारदेशिक आक्रमण से सुरक्षा, भारतीय नरेशों के लिये महंगी पड़ी। उनको अपनी स्वतंत्रता, राष्ट्रीय आचरण तथा जो कुछ मनुष्य को आदरणीय बनाता है, इत्यादि का बलिदान करना पड़ा था।

    ई.1857 में ब्रिटिश भारत में ब्रिटिश शासन के प्रति सैनिक विद्रोह हुआ। देशी राज्यों के कई ठिकानों में भी इसकी चिन्गारी फैली किंतु देशी राजाओं के सहयोग से इस विद्रोह को शीघ्र ही कुचल दिया गया। कर्नल स्लीमैन की वह भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई थी कि राजा लोग एक दिन संकट में सहायक स्वरूप प्रमाणित होंगे। देशी राजाओं के सहयोग और समर्थन पर टिप्प्णी करते हुए वायसराय लॉर्ड केनिंग ने कहा- 'देशी राज्यों के शासकों ने तूफान के लिये तरंगरोध का काम किया।'

    ब्रिटिश ताज का शासन

    1857 के सैनिक विद्रोह के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सत्ता समाप्त हो गयी और ब्रिटिश सरकार ने भारत के शासन पर अपना सीधा नियंत्रण स्थापित किया। राजपूताना के राज्य जिस अधीनस्थ संधि के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन थे, वे अब ब्रिटिश सरकार के अधीन हो गये। देश के एक तिहाई क्षेत्र में देशी राज्य थे किंतु 1857 के विद्रोह में उनके द्वारा प्रदर्शित राजभक्ति के कारण उन्हें ब्रिटिश राज्य में नहीं मिलाया गया अपितु भविष्य के किसी संकट में ब्रिटिश राज्य को बचाने के लिये अवरोध (बांध) माना गया। देशी नरेशों को उदारता पूर्वक सनद (अधिकार पत्र) दिये गये।

    1 नवम्बर 1858 को ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया ने एक घोषणा की जिसे भारत के प्रत्येक शहर में पढ़कर सुनाया गया। इस घोषणा में ब्रिटिश सरकार ने उन मुख्य सिद्धान्तों का विवरण दिया जिनके आधार पर भारत का भविष्य का शासन निर्भर करता था। घोषणा में कहा गया कि भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा प्रशासित क्षेत्रों का शासन अब प्रत्यक्ष रूप से ब्रिटेन के ताज द्वारा किया जायेगा। कम्पनी के समस्त असैनिक और सैनिक पदाधिकारियों को ब्रिटिश ताज की सेवा में ले लिया गया तथा उनके सम्बन्ध में बने हुए समस्त नियमों को स्वीकार कर लिया गया। भारतीय नरेशों के साथ कम्पनी द्वारा की गयी समस्त संधियों और समझौतों को ब्रिटिश क्राउन द्वारा यथावत् स्वीकार कर लिया गया। 'डॉक्टराइन ऑफ लैप्स' को त्याग दिया गया। भारतीय नरेशों को बच्चा गोद लेने का अधिकार दिया गया तथा व्यवस्था की गयी कि राजगद्दी, राजा का अधिकार न होकर, परमोच्च शक्ति से मिला हुआ उपहार होगी। यह आश्वासन भी दिया गया कि ब्रिटिश क्राउन अब भारत में राज्य विस्तार की आकांक्षा नहीं करता और भारतीय नरेशों के अधिकारों, गौरव एवं सम्मान का उतना ही आदर करेगा जितना वह स्वयं का करता है। महारानी ने अपनी भारतीय प्रजा को आश्वासन दिया कि उनके धार्मिक विश्वासों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा। भारतीयों को जाति या धर्म के भेदभाव के बिना उनकी योग्यता, शिक्षा, निष्ठा और क्षमता के आधार पर सरकारी पदों पर नियुक्त किये जाने हेतु समान अवसर प्रदान किया जायेगा। रानी की सरकार सार्वजनिक भलाई, लाभ और उन्नति के प्रयत्न करेगी तथा शासन इस प्रकार चलायेगी जिससे उसकी समस्त प्रजा का हित साधन हो।

    महारानी विक्टोरिया की घोषणा का मूल लक्ष्य भारत में स्थापित ब्रिटिश साम्राज्य को सुरक्षा प्रदान करना था। इस उद्देश्य को लेकर भारतीय नरेशों के सम्मान और अधिकारों की सुरक्षा का आश्वासन दिया गया। भविष्य में ब्रिटिश सरकार की नीति भारतीय नरेशों, जागीरदारों और प्रतिक्रियावादी तत्वों के संरक्षण की रही जिनका प्रयोग वह भारत के प्रगतिशील तत्वों के विरोध में करती रही। महारानी की घोषणा में योग्यतानुसार पद की प्राप्ति का आश्वासन भारतीय शिक्षित वर्ग का समर्थन प्राप्त करने के लिए दिया गया था, यद्यपि इस आश्वासन की पूर्ति ब्रिटिश सरकार ने कभी नहीं की। भारतीयों को उनके धर्म, परम्पराओं आदि में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन भारतीय जन साधारण को संतुष्ट करने के लिए दिया गया था क्योंकि इस प्रकार के हस्तक्षेप को विद्रोह के कारणों में से प्रमुख कारण समझा गया था जबकि इस घोषणा के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने भारत में धर्मान्धता, अंधविश्वास, जातीयता, क्षेत्रीयता आदि को खूब बढ़ावा दिया जिससे भारतीय आपस में बंटे रहें और प्रगतिशील विचारों के सम्पर्क में न आयें। नयी व्यवस्था के तहत गवर्नर जनरल को ब्रिटिश भारत में गवर्नर जनरल कहा गया किंतु देशी राज्यों से सम्बन्ध स्थापित करते समय उसे वायसराय कहा गया। मेवाड़, मारवाड़, जयपुर एवं बीकानेर के शासकों को 17 तोपों की सलामी लेने का अधिकार दिया गया।

    ई.1860 में लॉर्ड केनिंग ने कहा- 'बहुत समय पहले सर जान मैल्कम ने कहा था कि अगर हम सारे भारत को जिलों में बांट दें तो स्थितियां ऐसी नहीं हैं कि हमारा साम्राज्य 50 साल तक भी चले किंतु यदि हम कई देशी रियासतें, उन्हें बिना कोई राजनीतिक सत्ता दिये, किंतु शाही उपकरणों के रूप में रखें तो हम भारत में तब तक के लिये रहेंगे जब तक हमारी नौसैनिक शक्ति बनी रहेगी। इस राय में निहित ठोस सत्य के बार में मुझे कोई संदेह नहीं है और हाल की घटनाओं ने उसे पहले की अपेक्षा अधिक ध्यान देने योग्य बना दिया है।' ब्रिटिश इतिहासकार पी. ई. राबर्ट्स ने भी माना है कि- 'उन्हें (राज्यों को) साम्राज्य के तंरगरोध के रूप में इस्तेमाल करना सदा से ब्रिटिश नीति रही है।'

    रशबु्रक विलियम्स के अनुसार- 'देशी राज्यों के शासक अंग्रेजी सम्बन्ध के प्रति बहुत अधिक राजभक्त सिद्ध हुए हैं। इनमें से बहुतों का अस्तित्व अंग्रेजी न्याय और सेनाओं पर निर्भर था।'

    1857 के विद्रोह के बाद से ब्रिटिश सरकार राज्यों के नरेशों के साथ प्रिय बालकों जैसा व्यवहार करने लगी। जोधपुर महाराजा तखतसिंह ने सैनिक विद्रोह के समय ब्रिटिश साम्राज्य की जो सेवा की उसके लिये उसे ई.1862 में उत्तराधिकारी गोद लेने की सनद प्राप्त हुई। जयपुर महाराजा रामसिंह (ई.1835-1880) द्वारा सैनिक विद्रोह के समय ब्रिटिश साम्राज्य को दी गयी सेवा के लिये कोट कासिम का परगना दिया गया तथा ई.1859 में आयोजित आगरा दरबार में उसकी प्रशंसा की गयी। ई.1861 में उसे इंडियन लेजिस्लेटिव कौंसिल का सदस्य नामित किया गया। 1857 के सैनिक विद्रोह के समय मेवाड़ महाराणा स्वरूपसिंह द्वारा दी गयी सेवा के लिये उसे 20 हजार रुपये का नगद पुरस्कार दिया गया। सैनिक विद्रोह के समय बीकानेर महाराजा सरदारसिंह द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य को दी गयी सेवाओं को ए.जी.जी. ने राजपूताना के समस्त शासकों में सबसे बढ़कर बताया। गवर्नर जनरल ने उसे खिलअतें प्रदान कीं तथा महाराजा को हिसार जिले में 41 गांव प्रदान किये गये।

    राजनीतिक विभाग का गठन

    ई.1858 से 1947 तक ब्रिटिश शासन ने भारत के देशी राज्यों के साथ अधीनस्थ संघ की नीति अपनाई। इस काल में अंग्रेजों ने भारत में सार्वभौम सत्ता स्थापित करने के प्रयास किये तथा इसकी अभिव्यक्ति के लिये अनेक उपाय किये। देशी राज्यों में नियुक्त अंग्रेज अधिकारियों ने देशी राज्यों में अंग्रेजी ढंग की प्रशासनिक व्यवस्था लागू की ताकि अंग्रेजों के राजनैतिक प्रभुत्व को बल मिल सके। राज्यों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से राजनीतिक विभाग (Political Department) का गठन किया गया। इस विभाग में नियुक्ति के लिये इण्डियन पोलिटिकल सर्विस का गठन किया गया। इस सेवा में इण्डियन सिविल सर्विस तथा सेना के अधिकारी लिये जाते थे।

    राजनीतिक विभाग की अपनी पुलिस थी जिसका व्यय केन्द्र सरकार के राजस्व तथा देशी राज्यों के आर्थिक अंशदान से चलाया जाता था। राजनीतिक विभाग के अधीन समस्त प्रमुख रियासतों एवं रियासतों के समूहों के लिये रेजीडेंट्स एवं पोलिटिकल एजेण्ट रखे गये। राजपूताना में भारत सरकार के राजनीतिक विभाग का अधिकारी एजेंट टू दी गवर्नर जनरल (ए.जी.जी.) नियुक्त था। ए.जी.जी. के अधीन 3 रेजीडेंट तथा 5 पोलिटिकल एजेंट थे। इस प्रकार राजपूताना एजेंसी के अंतर्गत 3 रेजीडेंसी एवं 5 एजेंसी थीं। प्रत्येक रेजीडेंसी /एजेंसी का औसत क्षेत्रफल 16 हजार वर्गमील था। ई.1901 में प्रत्येक रेजीडेंसी/ एजेंसी की औसत जनसंख्या 12.5 लाख थी। इनके अंतर्गत विभिन्न रियासतें एवं ठिकाने (चीफशिप) स्थित थीं-

    1. मेवाड़ रेजीडेंसी: इसमें उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर व प्रतापगढ़ रियासतें थीं।

    2. वेस्टर्न स्टेट रेजीडेंसी: इसमें जोधपुर, जैसलमेर तथा सिरोही रियासतें थीं।

    3. जयपुर रेजीडेंसी: इसमें जयपुर व किशनगढ़ रियासतें एवं लावा ठिकाना थे।

    4. हाड़ौती टोंक एजेंसी: इसमें बूंदी, टोंक, शाहपुरा रियासतें आती थीं।

    5. ईस्टर्न स्टेट एजेंसी: इसमें भरतपुर, धौलपुर तथा करौली रियासतें आती थीं।

    6. कोटा झालावाड़ एजेंसी: इसमें कोटा तथा झालावाड़ रियासतें आती थीं।

    7. बीकानेर एजेंसी: इसमें बीकानेर रियासत आती थी।

    8. अलवर ऐजेंसी: इसमें अलवर रियासत आती थी।

    राजपूताना एजेंसी के मध्य में अजमेर मेरवाड़ा ब्रिटिश शासित क्षेत्र था। राजपूताना का एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल इसका चीफ कमिश्नर होता था। राजनीतिक अधिकारियों के पास अलिखित अधिकार थे। उनके द्वारा देशी राज्यों को शेष भारत से उसी तरह अलग कर दिया गया जिस प्रकार भारत को शेष एशिया से अलग कर दिया गया था।

    सर्वोच्च सत्ता का प्रदर्शन

    लॉर्ड केनिंग ने ई.1862 में घोषणा की कि इंग्लैण्ड के शासक समस्त भारत के असंदिग्ध शासक हैं तथा उनमें सर्वोच्च सत्ता निहित है। लॉर्ड एलगिन (ई.1862-1863) ने भारतीय रियासतों एवं ब्रिटिश राज्य को निकट लाने के उद्देश्य से वाराणसी, कानपुर, आगरा तथा अम्बाला में अनेक दरबार आयोजित किये। इन दरबारों के आयोजन का परिणाम यह हुआ कि राज्यों की स्वतंत्रा घट गयी और वे पूर्णतः अधीनस्थ स्थिति में हो गयीं।

    लॉर्ड मेयो (ई.1869-ई.1872) ने राजपूताने के शासकों के समक्ष घोषणा की कि-

    (1.) अंग्रेज सरकार भारतीय शासकों के कुशासन के कारण उनके राज्यों में हस्तक्षेप करने का अधिकार रखती है।

    (2.) अंग्रेज सरकार राज्य में विद्रोह को दबाने का अधिकार रखती है।

    (3.) अंग्रेज सरकार राज्य में गृह-युद्ध नहीं होने देगी।

    मेवाड़ महाराणा शंभुसिंह ने ई.1870 में लॉर्ड मेयो द्वारा आयोजित अजमेर दरबार में उपस्थित होने की सहमति इस शर्त पर प्रदान की कि उसकी प्रतिष्ठा और उच्चता को ध्यान में रखा जायेगा। महाराणा सज्जनसिंह ई.1875 में प्रिंस ऑफ वेल्स के स्वागत के लिये भारत भर के राजाओं के साथ बम्बई में उपस्थित हुआ किंतु उसने बड़ौदा के महाराजा के पीछे बैठना स्वीकार नहीं किया और वह उल्टे पांव वापस आ गया। ई.1876 में प्रिंस ऑफ वेल्स आगरा आया। बीकानेर महाराजा डूंगरसिंह उसका स्वागत करने के लिये रेलवे स्टेशन पर उपस्थित हुआ। द्वितीय अफगान युद्ध के समय महाराजा डूंगरसिंह ने अपनी सेनाएं युद्ध के लिये समर्पित कीं। बीकानेर राज्य से ब्रिटिश सेनाओं को परिवहन हेतु 800 ऊँट प्रदान किये गये।

    ई.1876 में लॉर्ड लिटन ने घोषणा की कि इंग्लैण्ड की राजशाही को अब से एक शक्तिशाली देशी अभिजाततंत्र की आशाओं, आकांक्षाओं, सहानुभूतियों और हितों के साथ अपना घनिष्ठ संबंध स्थापित करना होगा। राजाओं, जागीरदारों और जमींदारों ने इस घोषणा का अर्थ यह लगाया कि वे तब तक बने रहेंगे जब तक कि ब्रिटिश शासन बना रहेगा। अंग्रेज अधिकारियों ने राजाओं को और अधिक स्वामिभक्त बनाने के क्रम में राजाओं, राजकुमारों तथा अन्य लोगों को अंग्रेजी उपाधियों से सम्मानित करने का सिलसिला आरंभ किया।

    ई.1876 में रानी विक्टोरिया ने संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश प्रभुसत्ता जताने के लिये भारत की साम्राज्ञी की उपाधि धारण की। 1 जनवरी 1877 को लॉर्ड लिटन ने दिल्ली में साम्राज्यिक दरबार का आयोजन किया। मेवाड़ महाराणा ने इस दरबार में भाग लिया। महाराणा की तोपों की व्यक्तिगत सलामियों की संख्या 19 से बढ़ाकर 21 कर दी गयी। इस दरबार में जोधपुर नरेश जसवंतसिंह की तोपों की सलामी की संख्या 17 से बढ़ाकर 19 की गयी। महारानी के सम्मान में ई.1877 में इम्पीरियल सर्विस टुªप्स तथा भारतीय राजाओं के लिये इम्पीरियल कैडेट कोर की स्थापना की गयी। राजाओं को सेना में ऑनरेरी कमीशन दिये गये ताकि वे अधीनस्थ स्थिति को प्राप्त कर सकें।

    ई.1878 में जोधपुर नरेश जसवंतसिंह के अनुज प्रतापसिंह को जोधपुर राज्य का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। द्वितीय अफगान युद्ध के समय प्रतापसिंह को ब्रिटिश आर्मी में भर्ती होने के निर्देश दिये गये। इस पर प्रतापसिंह ब्रिटिश सेना में भर्ती हो गया तथा युद्ध में भाग लेने के लिये काबुल गया। जब डफरिन ने इम्पीरियल सर्विस ट्रुप्स का उद्घाटन किया तो जोधपुर राज्य ने सरदार रिसाला के नाम से दो रेजीमेंटों की स्थापना की।

    ई.1887 में बीकानेर महाराजा डूंगरसिंह की निःसंतान अवस्था में मृत्यु हो गयी तथा उसका छोटा भाई गंगासिंह 7 वर्ष की आयु में बीकानेर का शासक हुआ। राज्य का शासन चलाने के लिये ब्रिटिश पोलिटिकल एजेंट की अध्यक्षता में रीजेंसी कौंसिल स्थापित की गयी। ई.1895 में चित्राल संकट के समय, ई.1896 में सूडान में युद्ध फैल जाने पर तथा ई.1899 में बोअर युद्ध के समय गंगासिंह ने अपनी व्यक्तिगत सेवाएं ब्रिटिश सरकार को समर्पित कीं किंतु उसके अवयस्क होने के कारण इन प्रस्तावों को अस्वीकृत कर दिया गया। ई.1898 में गंगासिंह को कुछ प्रतिबंधों के साथ शासन के पूर्ण अधिकार सौंपे गये।

    19वीं सदी के अंत में और 20वीं सदी के प्रारंभ में देशी राज्यों में ब्रिटिश हस्तक्षेप बढ़ता गया जिससे ब्रिटिश ताज और देशी राज्यों के बीच बराबरी की बात समाप्त हो गयी। राज्यों के बाहरी मामलों पर भारत सरकार का पूरा नियंत्रण था। रेल, संचार, सड़कें, डाकघर आदि के निर्माण से इन राज्यों में ब्रिटिश हस्तक्षेप होता रहा साथ ही ब्रिटिश अधिकारी इन राज्यों में प्रशासन का नियंत्रण भी करते थे। इस प्रकार बीसवीं शताब्दी के आगमन तक भारतीय राज्यों पर ब्रिटिश शिकंजा पूरी तरह कसा जा चुका था। भारतीय राजा अपने राज्यों के नाम मात्र के शासक रह गये थे। ई.1903 में लॉर्ड कर्जन (ई.1899-1905) ने स्पष्ट किया कि राजा अपने राज्यों पर ब्रिटिश शासन के एजेंट के रूप में शासन कर रहे हैं। ब्रिटिश क्राउन की परमोच्चता हर स्थान पर चुनौती रहित है। इसने अपने निर्बाध अधिकारों को स्वयं सीमित कर रखा है। कर्जन के समय में देशी राज्यों के शासकों पर ब्रिटिश अधिकारियों का इतना प्रभाव हो चुका था कि एक राज्य के शासक ने लार्ड कर्जन के पैर छुए। शासकों को राज्यों को अपने पास रखने तथा उनका प्रशासन चलाने की स्वीकृति दी गयी थी न कि सम्प्रभुता की तथा उनके अधिकार ब्रिटिश राजमुकुट से सहयोग तथा अधीनता की शर्तों के अधीन थे।

    लार्ड हार्डिंग ने राजाओं को शाही हुकूमत के महान कार्य में सहायक और सहयोगी बताया। इस कारण आवश्यकता पड़ी कि नरेशों का एक संघ बनाया जाना चाहिये जिसके द्वारा उनका सहयोग प्राप्त करने में आसानी हो। 28 मई 1906 को लॉर्ड मिण्टो ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट लॉर्ड मार्ले को एक पत्र लिखा- 'कांग्रेस के उद्देश्यों को चकनाचूर करने के लिये मैं हाल में बड़ी गंभीरता से सोचता रहा हूँ। मेरे विचार में राजाओं की एक काउंसिल बना देने से हमारा अभिप्राय सिद्ध हो सकता है।' इसी विचार से प्रेरित होकर लार्ड हार्डिंग ने भारतीय नरेशों से सलाह लेने की पद्धति चालू की। इस तरह की पहली कान्फ्रेन्स ई.1913 में हुई।

    देशी राज्यों के राजाओं ने अधीनता की इस स्थिति को इसलिये स्वीकार किया और वे साम्राज्य में कनिष्ठ भागीदार इसलिये बन गये क्योंकि उन्हें अपने राज्यों के शासक के रूप में उनके अस्तित्व की निरंतरता का आश्वासन दे दिया गया था। जैसे-जैसे भारत में अंग्रेजों का राज्य फैलता गया वैसे-वैसे उनके मन में यह विश्वास जड़ जमाता गया कि गोरी जाति श्रेष्ठ और ऊंची है। काले भारतीय नीच और मूर्ख हैं। उन पर शासन करने की जिम्मेदारी 'ईश्वर' नामक रहस्यमय शक्ति ने अंग्रेजों के ही कंधों पर रखी है। अंग्रेज वह जाति है जो केवल जीतने और शासन करने के लिये पैदा हुई है। देशी राजाओं में हीनता का भाव लाने तथा उन पर अंग्रेजी चकाचौंध का सम्मोहन चढ़ाने के लिये अंग्रेज अधिकारियों द्वारा देशी राजाओं को विदेश यात्राओं के लिये प्रोत्साहित किया जाने लगा। विदेश भ्रमण के समय राजाओं को इतनी अधिक सुविधायें दी जाती थीं कि स्वदेश लौटने के बाद भी उनकी आत्मा विदेशों के होटलों और नाचघरों में भटका करती थी। राजाओं की यह मनोदशा देशी राज्यों में अंग्रेजों के राजनीतिक प्रभुत्व के क्रमिक विकास में सहायक सिद्ध हुई। ब्रिटिश नीति के परिणामस्वरूप देशी नरेश हिन्दुस्तान के साम्राज्यवादी संगठन का आवश्यक अंग बन गये। बहुत से राजा अपने महलों की अपेक्षा मोंटे कार्लो, पेरिस और लंदन में ज्यादा समय बिताते थे।

    अंग्रेज अधिकारी भारतीयों को आधे गोरिल्ला, आधे हब्शी, निम्न कोटि के पशु, मूर्तिपूजक, काले भारतीय आदि कहकर उनका मखौल उड़ाया करते थे। आम आदमी के साथ अंग्रेज अधिकारियों का बर्ताव बहुत बुरा था। भारतीयों को रेलवे की उच्च श्रेणी के डिब्बों में यात्रा करने का अधिकार नहीं था। शासक वर्ग के राजा आदि लोगों को ऊंचे दर्जे के डिब्बे में यात्रा के समय शिकार से लौटे साहब लोगों के जूतों के फीते खोलने और उनकी थकी टांगों पर तेल लगाने के लिये मजबूर किया जाता था। किसी भी भारतीय जज को अंग्रेज के मुकदमे सुनने का अधिकार नहीं था। भारत में अंग्रेजों की शासन पद्धति शुरू से कुछ ऐसी रही जैसे कोई बूढ़ा स्कूल मास्टर कक्षा के उज्जड विद्यार्थियों को बेंत के जोर पर सही करने निकला हो। इस स्कूल मास्टर को पूरा विश्वास था कि विद्यार्थियों को जो शिक्षा वह दे रहा है, वही उनके लिये सही और सर्वश्रेष्ठ है।

    अंग्रेजों द्वारा भारत में अंग्रेजी शासन को न्यायोचित बताने के लिये यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया कि वे भारतीयों को सभ्य बनाने के लिये आये हैं। भारतीय सामाजिक व सांस्कृतिक परम्पराओं को अमानवीय, बर्बर एवं पिछड़ी हुई सिद्ध करना ही अंग्रेज शासकों का ध्येय हो गया था। शासक को उच्च संस्कृति का प्रतीक तथा शासित को असभ्य, पिछड़ा तथा मानवीय गुणों से रहित सिद्ध करना अंग्रेजों की समाज सुधार नीति का अंग था।

    उपरोक्त घटनाओं से स्पष्ट है कि राजपूताना के समस्त राज्य 18वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में मुगलों के चंगुल से निकल कर मराठों के जबड़ों के नीचे आ गये और वहाँ से निकलने की कोशिश में 19वीं शताब्दी के द्वितीय दशक में वे सुरक्षा का दाना चुगने के चक्कर में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा फैलाये गये जाल में जा फंसे। कम्पनी ने भारत में अपनी लगातार बदलती हुई नीतियों के तहत देशी राज्यों को पूरी तरह से अपने आश्रित कर लिया। राजाओं की स्वयं की शक्ति लगभग नष्ट हो गयी और वे अपने अस्तित्व तथा सुरक्षा के लिये कम्पनी सरकार पर इतने निर्भर हो गये कि बीसवीं सदी के आते आते ब्रिटिश क्राउन तथा देशी राज्यों के बीच बराबरी की बात पूरी तरह समाप्त हो गयी। राज्यों के प्रशासन में अंग्रेज अधिकारियों का हस्तक्षेप एवं वर्चस्व सर्वत्र दिखायी देने लगा।

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