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  • अध्याय- 5 : देशी राज्यों का संविधान सभा में प्रवेश एवं परमोच्चता का विलोपन

     06.12.2017
    अध्याय- 5 : देशी राज्यों का संविधान सभा में प्रवेश एवं परमोच्चता का विलोपन

    अध्याय- 5

    देशी राज्यों का संविधान सभा में प्रवेश एवं परमोच्चता का विलोपन

    हम इस समय भारत के इतिहास की महत्त्वपूर्ण अवस्था में हैं। अपने सप्रयत्न से हम देश को एक नई ऊँचाई तक पहुंचा सकते हैं जबकि एकता में कमी से हमें नये संकटों का सामना करना पड़ सकता है। मुझे आशा है कि भारतीय राज्य यह तथ्य ध्यान में रखेंगे कि व्यापक हित में सहयोग का विकल्प अराजकता और विप्लव है जिससे बड़े और छोटे समान रूप से नष्ट हो जायेंगे। - सरदार पटेल।

    29 जनवरी 1947 को बंबई के ताजमहल होटल में नरेंद्र मण्डल की बैठक हुई जिसमें चांसलर भोपाल नवाब ने कुछ व्यक्तियों द्वारा शासकों की बदनामी करने और उनकी बातों की गलत व्याख्या करने हेतु चलाये जा रहे सुनियोजित षड़यंत्र की शिकायत की। इस बैठक में 60 राजा और 100 राज्यों के मंत्री उपस्थित थे। नवाब ने कहा कि हमें कहा जा रहा है कि या तो हम हट जायें या फिर हाशिये पर जियें। हमारे लिये इन धमकियों के आगे घुटने टेक देना अशोभनीय होगा। नवाब ने वे आधारभूत सिद्धांत भी गिनाये जिन पर राज्य समझौता करने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने मांग की कि कैबीनेट मिशन योजना का पूर्ण अनुसरण किया जाये। त्रावणकोर के दीवान सर सी. पी. रामास्वामी ने संविधान सभा पर आरोप लगाया कि वह राज्यों में सरकार का प्रारूप निश्चित करने की चेष्टा कर रही है। सम्मेलन में पारित एक प्रस्ताव के माध्यम से राजाओं ने इच्छा प्रकट की कि कैबीनेट मिशन योजना के तहत प्रस्तावित भारत संघ में संविधान के निर्माण के लिये शासकगण अपना हर संभव सहयोग देने को तैयार हैं। इस प्रस्ताव में राज्यों द्वारा कैबीनेट मिशन योजना को स्वीकृत करने के लिये पाँच आधारभूत विचार दिये गये-

    1. भारत संघ में राज्यों का प्रवेश बातचीत के अतिरिक्त और किसी प्रकार से नहीं होना चाहिये। अंतिम निर्णय लेने का अधिकार प्रत्येक राज्य के पास होना चाहिये। संवैधानिक विचार विमर्श में राज्यों की भागीदारी राज्य के अंतिम निर्णय की वचनबद्धता नहीं है। ऐसा निर्णय केवल संविधान की पूर्ण तस्वीर सामने आने पर ही किया जा सकेगा।

    2. संघ को समर्पित विषयों को छोड़कर राज्यों के पास शेष समस्त विषय एवं शक्तियां बनी रहेंगी। अंतरिम काल की समाप्ति पर परमोच्चता (Paramountcy) समाप्त हो जायेगी वह न तो भारत सरकार में निहित होगी और न भारत सरकार को स्थानांतरित होगी। राज्यों द्वारा परमोच्च सत्ता को समर्पित किये गये अधिकार पुनः राज्यों को प्राप्त हो जायेंगे। प्रस्तावित भारत संघ राज्यों के मामले में केवल उन्हीं विषयों पर अपने अधिकार काम में लेगा जो कि संघ के विषय के रूप में संघ को प्राप्त होंगे। प्रत्येक राज्य की सम्प्रभुता, समस्त अधिकार व शक्तियां उस सीमा तक बने रहेंगे जिस सीमा तक कि उन्हें संघ को समर्पित न कर दिया गया हो। संघ के पास उन शक्तियों को धारण करने का कोई निहित अधिकार नहीं होगा जिन्हें कि राज्यों द्वारा विशेष रूप से समर्पित करने की विशिष्टि सहमति न दे दी गयी हो।

    3. प्रत्येक राज्य का संविधान, उसकी क्षेत्रीय एकता तथा शासकीय वंश का उत्तराधिकार राज्य की परम्परा, कानून एवं रीतिरिवाज के अनुसार होना चाहिये तथा उसमें संघ अथवा उसकी किसी इकाई को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। न ही उसकी वर्तमान सीमाओं में तब तक कोई परिवर्तन किया जाना चाहिये जब तक कि राज्य द्वारा ऐसा किये जाने की स्वतंत्र सहमति न दे दी गयी हो।

    4. संविधान सभा केवल संघ के लिये कैबीनेट मिशन योजना के अनुसार संविधान बनाने के लिये अधिकृत है। यह सभा राज्यों के आंतरिक प्रशासन अथवा प्रत्येक राज्य अथवा राज्य के समूहों के लिये संविधान बनाने हेतु अधिकृत नहीं है।

    5. सरकार ने पहले से ही स्पष्ट कर दिया है कि यह राज्यों पर है कि वे संघ में आयें अथवा न आयें। संधियों एवं परमोच्चता पर कैबीनेट योजना के 12 मई 1946 के स्मरणपत्र के अनुसार भी एक तरफ राज्य तथा दूसरी तरफ ब्रिटिश ताज एवं ब्रिटिश सरकार के मध्य चल रहीं मौजूदा राजनीतिक व्यवस्थायें अंतरिम काल के पश्चात समाप्त हो जायेंगी। अंतराल भरने के लिये राज्यों को भारत में बनने वाली उत्तराधिकारी सरकार के साथ संघीय सम्बन्ध बनाने होंगे अथवा विशेष राजनीतिक व्यवस्थाएं करनी पड़ेंगी।

    प्रस्ताव में कहा गया कि नरेंद्र मण्डल द्वारा बनायी गयी राज्य संविधान वार्त्ता समिति कैबीनेट मिशन योजना के अंतर्गत राज्यों की तरफ से केवल नये भारतीय संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत राज्यों की स्थिति के सम्बन्ध में प्रारंभिक वार्त्ता करने के लिये ही अधिकृत है। राज्यों के कोटे की सीटों का आवंटन केवल राज्यों द्वारा ही निर्धारित किया जाना है। राज्यों के प्रतिनिधियों के चयन की विधि राज्य संविधान वार्त्ता समिति तथा ब्रिटिश भारत की संविधान वार्त्ता समिति के मध्य विचार-विमर्श का विषय है। इसका अंतिम निर्णय सम्बद्ध राज्यों के द्वारा लिया जायेगा। इस प्रस्ताव में राज्य संविधान वार्त्ता समिति को दो बातों के लिये अधिकृत किया गया-

    (1.) केबीनेट मिशन योजना के प्रस्ताव के अनुच्छेद 19(6) के अंतर्गत संविधान सभा में राज्यों की भागीदारी की शर्तों पर वार्त्ता करना।

    (2.) अखिल भारतीय संघ में राज्यों की अंतिम स्थिति के संदर्भ में वार्त्ता करना।

    प्रस्ताव में कहा गया कि इन वार्ताओं में लिये गये निर्णयों की पुष्टि राज्यों द्वारा की जानी आवश्यक होगी। इस प्रस्ताव की प्रत्येक पंक्ति में अविश्वास भरा हुआ था जिसने देश में उत्तेजक विवाद को जन्म दिया। राजाओं द्वारा दी गयी इस धमकी पर कि यदि कांग्रेस आधारभूत विषयों को स्वीकार नहीं करती है तो शासकगण संविधान सभा का बहिष्कार करेंगे, लोगों में राजाओं के प्रति गुस्सा एवं विरोध था। कैबीनेट मिशन योजना में प्रस्तावित था कि प्रारंभिक अवस्था में संविधान निर्मात्री सभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व एक वार्त्ता समिति (Negotiation Committee) द्वारा किया जायेगा। विचार-विमर्श के अंतिम चरण में राज्यों के वास्तविक प्रतिनिधि भाग लेंगे। योजना के इसी भाग को आधार बनाकर 29 जनवरी के प्रस्ताव में घोषणा की गयी कि शासकगण संगठित रूप से विधान निर्मात्री परिषद में उस समय तक शामिल नहीं होंगे जब तक कि भारतीय विधान निर्मात्री परिषद् संविधान का पूरा ढांचा प्रस्तुत न कर दे और उसमें यह स्पष्ट न हो जाये कि रियासतों के राजाओं की प्रभुसत्ता को आँच नहीं आयेगी, तत्पश्चात शासकगण उचित समझेंगे तो अपने आपको संविधान निर्मात्री परिषद् में शामिल करेंगे।

    संविधान वार्त्ता समिति को लेकर राजाओं में मतभेद

    7 फरवरी 1947 को राज्य संविधान सभा वार्त्ता समिति की बैठक में बड़ौदा के दीवान सर बी. एल. मित्तर ने नरेंद्र मण्डल द्वारा संविधान वार्त्ता समिति नियुक्त किये जाने के अधिकार को चुनौती देते हुए कहा कि यह राजाओं की तरफ से वार्त्ता करने वाली एकमात्र संस्था नहीं है। संविधान सभा में बड़ौदा इस समिति के माध्यम से नहीं अपितु प्रत्यक्षतः स्वयं वार्त्ता करेगा। संविधान समिति द्वारा राजाओं के सिद्धांतों को न माने जाने की स्थिति में राजाओं द्वारा उसके बहिष्कार की घोषणा के सम्बन्ध में मित्तर ने कहा कि बड़ौदा के नेतृत्व में राजाओं का एक छोटा समूह संविधान सभा से वार्त्ता करेगा। उन्होंने कहा कि उन्हें न केवल बड़ौदा महाराजा की ओर से ऐसा कहने का अधिकार है अपितु बड़ौदा के प्रजा मंडल की ओर से भी ऐसा कहने का पूरा अधिकार प्राप्त है।

    अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की 1947 की दिल्ली बैठक में आशा व्यक्त की गयी कि संविधान निर्माण के कार्य में अधिक से अधिक रियासतों को जोड़ा जाना चाहिये। कांग्रेस के इन प्रयासों को आधार बनाकर कोरफील्ड ने नेहरू पर स्टेट्स नेगोशियेटिंग कमेटी को तोड़ने के आरोप लगाये- ब्रिटिश राज पर 'तोड़ो और राज करो' के आरोप लगते रहे हैं किंतु अब नेहरू ने उसे अपनी नीति के लिये उपयोगी समझा। नेहरू ने राज्यों के दीवानों को उकसाया ताकि वे कमेटी से बाहर रहकर व्यक्तिशः वार्त्ता करने की घोषणा करें। कुछ दीवान भविष्य के शासकों को संतुष्ट रखना चाहते थे। कुछ शासकों को एक मुस्लिम की अध्यक्षता वाली समिति में कोई रुचि नहीं थी। इस प्रकार राज्य संविधान वार्त्ता समिति कमजोर होती चली गयी। भोपाल नवाब तथा कोनार्ड कोरफील्ड को इससे बड़ी निराशा हुई।

    प्रजा मण्डल द्वारा संविधान सभा वार्त्ता समिति की नियुक्ति

    अखिल भारतीय राज्य प्रजा मंडल ने भी अपनी ओर से एक राज्य संविधान सभा वार्त्ता समिति नियुक्त कर दी तथा राजाओं द्वारा संविधान सभा में राज्य के प्रतिनिधि के चयन के अधिकार को चुनौती दी। प्रजा मंडल के अध्यक्ष डा. पट्टाभि सीतारमैया ने घोषणा की कि संविधान सभा में राजाओं का कोई स्थान नहीं है।

    शासकों द्वारा चांसलर का विरोध

    नरेन्द्र मण्डल का चांसलर भोपाल नवाब चाहता था कि रियासतें अलग-अलग कोई कार्यवाही न करें अपितु सब सामूहिक रूप से एवं अध्यक्ष की सहमति से ही कार्यवाही करें। चांसलर का यह तर्क बहुत से राजाओं के गले नहीं उतरा। कुछ सक्षम रियासतों ने भोपाल नवाब के विरुद्ध एक गुट बना लिया। इसमें बीकानेर, जयपुर, जोधपुर, पटियाला एवं ग्वालियर राज्य सम्मिलित थे। कोचीन महाराजा ने 30 जुलाई 1946 को ही घोषणा कर दी थी कि वे विधान निर्मात्री परिषद में भाग लेंगे। बड़ौदा के महाराजा ने भी 8 फरवरी 1947 को घोषणा की कि वे 29 जनवरी 1947 के नरेंद्र मण्डल के बम्बई प्रस्ताव से बंधे हुए नहीं हैं। वे भी विधान निर्मात्री परिषद में भाग लेंगे। इस पर भी चांसलर डटा रहा कि वह 29 जनवरी वाले प्रस्ताव के अनुसार कार्यवाही करेगा। इस प्रकार राजाओं के दोनों समूह अपनी-अपनी जिद्द पर अड़ गये। बातचीत ठप्प होने की स्थिति आ गयी तो पटियाला महाराजा ने फिर बातचीत शुरू करने का प्रयास किया किंतु शासकों में परस्पर विरोध काफी आगे बढ़ गया था।

    संविधान वार्त्ता समितियों की संयुक्त बैठक 8 फरवरी 1947 को नरेंद्र मण्डल द्वारा नियुक्त संविधान वार्त्ता समिति तथा संविधान सभा द्वारा नियुक्त वार्त्ता समिति की संयुक्त बैठक हुई। इस प्रकार संविधान सभा ने ब्रिटिश भारत के नेताओं और राजाओं को पहली बार एक दूसरे के ठीक सामने ला खड़ा किया। ब्रिटिश भारतीय नेताओं- जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, पट्टाभि सीतारमैया तथा राज्य संविधान सभा वार्त्ता समिति के सदस्यों- भोपाल नवाब एवं सर सी. पी. रामास्वामी के मध्य प्रांरभ में ही तीखी नोंक झौंक हुई किंतु बाद में नेहरू तथा भोपाल नवाब ने बैठक के वातावरण को ठण्डा किया। अगले दिन नेहरू ने राज्य प्रतिनिधियों की मांगों के संदर्भ में कुछ अनुकूल घोषणायें कीं -

    1. संविधान सभा कैबीनेट मिशन योजना के प्रस्तावों की पूर्ण स्वीकृति के आधार पर कार्य करेगी। यह योजना पूर्णतः स्वैच्छिक है। शासक अकेले अथवा समूह के रूप में अथवा अन्य किसी प्रकार से संघ में प्रवेश कर सकते हैं। यदि कोई राज्य संघ में प्रवेश नहीं करना चाहता है तो हम उस पर संघ में सम्मिलित होने के लिये दबाव नहीं डालेंगे। यह अंत तक वार्त्ता का विषय होगा।

    2. संविधान सभा की ओर से तथा उसके बाहर से भी कई बार कहा जा चुका है कि हम राज्यों में राजवंशीय सरकार के विरुद्ध नहीं हैं। यह पूर्णतः स्पष्ट है।

    3. राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन नहीं किया जायेगा। केवल आर्थिक कारणों तथा सरकार की सुविधा के उद्देश्य से क्षेत्रीय सीमाओं में परिवर्तन किया जायेगा किंतु क्षेत्रीय पुनर्व्यवस्था सम्बद्ध राज्यों की सहमति से ही की जायेगी, बलपूर्वक नहीं।

    4. संविधान सभा में भाग लेना किसी तरह की अनिवार्यता नहीं है। राज्य अपनी इच्छा से किसी भी समय संविधान सभा में भाग लेने से मना कर सकते हैं।

    5. संघ के पास कैबीनेट मिशन योजना में प्रस्तावित विषय ही रहेंगे।

    भोपाल नवाब के द्वारा यह पूछा गया कि क्या परमोच्चता राज्यों को फिर से प्राप्त हो जायेगी जैसा कि कैबीनेट योजना के अंतर्गत प्रस्तावित किया गया है? इस पर नेहरू ने उत्तर दिया कि मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि परमोच्चता का प्रश्न कहाँ आड़े आता है! यह समान अधिकारों एवं हैसियत वाली स्वायत्तशासी इकाईयों का संघ होगा। केंद्रीय परमोच्चता में प्रत्येक इकाई की भागीदारी होगी। राज्य भी उसी स्तर पर रहेंगे जिस स्तर पर कि अन्य इकाईयां रहेंगी। इस पर नवाब भोपाल ने पूछा कि क्या परमोच्चता समाप्त हो जायेगी? इस पर नेहरू ने कहा कि हाँ वह समाप्त हो जायेगी।

    एटली की घोषणा

    20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने 'हाउस ऑफ कॉमन्स' में घोषणा की कि जून 1948 तक भारत की एक उत्तरदायी सरकार को सत्ता हस्तांतरित कर दी जायेगी। इस घोषणा में स्पष्ट कहा गया कि सरकार भारतीय संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान जिसमें समस्त भारतीयों की सहमति हो, भारत में लागू करने की संसद में संस्तुति करेगी। यदि जून 1948 तक इस प्रकार का संविधान, संविधान सभा द्वारा नहीं बनाया गया तो ब्रिटिश सरकार यह सोचने के लिये विवश होगी कि ब्रिटिश भारत में केंद्र की सत्ता किसको सौंपी जाये? नयी केंद्रीय सरकार को या कुछ क्षेत्रों में प्रांतीय सरकारों को? या फिर किसी अन्य उचित माध्यम को भारतीय जनता के सर्वोच्च हित के लिये दी जाये......। राज्यों के सम्बन्ध में कहा गया कि सरकार की यह मंशा नहीं है कि परमोच्चता के अधीन राज्यों की शक्तियां तथा दायित्व ब्रिटिश भारत में किसी अन्य सरकार को सौंपी जायें। यह मंतव्य भी नहीं है कि सत्ता के अंतिम हस्तांतरण की तिथि के पूर्व परमोच्चता को समाप्त कर दिया जाये। अपितु यह विचार किया गया है कि अंतरिम काल के लिये राज्यों के साथ ब्रिटिश ताज के सम्बन्ध किसी समझौते के द्वारा समायोजित किये जा सकते हैं।

    राजाओं की प्रतिक्रिया

    प्रधानमंत्री एटली की घोषणा का राजाओं द्वारा एक स्वर से स्वागत किया गया। नवाब भोपाल ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि जब ब्रिटिश चले जायेंगे तो परमोच्चता समाप्त हो जायेगी तथा राज्य स्वतंत्र हो जायेंगे। सर सी. पी. रामास्वामी का मानना था कि प्रधानमंत्री एटली के वक्तव्य ने कैबीनेट मिशन योजना को आच्छादित (Supersede) कर लिया है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री की इस घोषणा ने देश में राजनीतिक वातावरण को गर्मा दिया तथा उसमें तात्कालिकता का तत्व भी जोड़ दिया। इससे कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा राजाओं को भी भागम-भाग मचानी पड़ी।

    संविधान वार्त्ता समितियों पर एटली की घोषणा का प्रभाव संविधान निर्मात्री सभा की समझौता समितियों पर एटली की घोषणा का अच्छा प्रभाव पड़ा। 1 मार्च 1947 को दोनों समझौता समितियों की संयुक्त बैठक में नेहरू ने कहा कि ब्रिटिश सरकार की घोषणा ने तत्काल कार्यवाही करने की आवश्यकता उत्पन्न कर दी है। न केवल ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों अपितु राज्यों के प्रतिनिधियों को भी संविधान सभा में तुरंत भाग लेने से अपार लाभ होगा यदि राज्यों के प्रतिनिधि अप्रेल सत्र से संविधान सभा की कार्यवाही में भाग लें। नरेंद्र मण्डल के चांसलर ने कहा कि इस विषय में समय की महत्त्वपूर्ण भूमिका है किंतु राज्यों में सीटों के बंटवारे को लेकर मतभेद हैं। सीटों के निर्धारण के लिये एक उपसमिति का गठन किया गया। उपसमिति ने अपनी रिपोर्ट दी कि संविधान सभा में मनोनीत किये जाने वाले राज्य प्रतिनिधियों में से कम से कम 50 प्रतिशत चुने हुए हों तथा जहाँ तक संभव हो चुने हुए प्रतिनिधियों का कोटा बढ़ाया जाये। नेहरू ने संविधान सभा द्वारा बनायी गई समितियों में भाग लेने के लिये राज्यों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया, विशेषकर संघ शक्ति समिति तथा मौलिक अधिकार समिति में किंतु चांसलर ने विरोधी प्रवृत्ति दर्शाते हुए कहा कि ऐसा करने से पूर्व उसे नरेंद्र मण्डल की अनुमति लेनी होगी और वे विश्वास दिलाते हैं कि नरेंद्र मण्डल की बैठक शीघ्र बुलायी जायेगी।

    हिन्दू महासभा का प्रस्ताव

    9 मार्च 1947 को अखिल भारतीय हिंदू महासभा की कार्यकारिणी में नयी दिल्ली में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें उन हिन्दू राज्यों के राजाओं की दूरदर्शिता की प्रशंसा की गयी जिन्होंने समस्त तरह के विरोधों के उपरांत भी संविधान सभा में भाग लेने के लिये अपनी सहमति प्रदान कर दी है।

    माउंटबेटन की नियुक्ति ब्रिटिश सरकार ने भारत की आजादी को कार्यरूप देने के लिये लॉर्ड वेवेल के स्थान पर लॉर्ड माउन्टबेटन को भारत का वायसराय नियुक्त किया। माउंटबेटन भारत में ब्रिटिश क्राउन के बीसवें और अंतिम प्रतिनिधि थे। उनका पूरा नाम लुई फ्रांसिस एल्बर्ट विक्टर निकॉलस माउंटबेटन था। वे इंगलैण्ड की उसी महारानी विक्टोरिया के प्रपौत्र थे जिसने कैसरे हिंद की उपाधि धारण करके भारत को अपने साम्राज्य में सम्मिलित करने का उद्घोष किया था। माउंटबेटन में भारतीय रजवाड़ों के लिये न तो प्रशंसा का भाव था न धैर्यं जो सबसे अच्छे राजा थे उन्हें वह अर्धविकसित तानाशाह समझते थे और जो सबसे खराब थे उन्हें गया-बीता और चरित्रहीन! उनका मानना था कि कांग्रेस की बढ़ती हुई ताकत को देखकर भी रजवाड़ों ने अपने प्रशासन में किसी तरह की प्रजातांत्रिक प्रणाली शुरू नहीं की। 1935 में अवसर था किंतु वे भारत संघ में सम्मिलित नहीं हुए। इन क्रियाकलापों के कारण माउंटबेटन उन्हें मूर्खों की जमात कहते थे।

    प्रधानमंत्री एटली ने वायसराय को पत्र लिखकर ब्रिटिश सरकार की नीति स्पष्ट की कि सम्राट की सरकार का यह एक निश्चित उद्देश्य है कि भारत में ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के दायरे में संविधान सभा की सहायता से एक सरकार केबीनेट मिशन की योजना के आधार पर बने और काम करे। अपनी पूरी ताकत लगाकर आपको समस्त दलों को इस लक्ष्य की ओर ले जाना चाहिये। चूंकि यह योजना प्रमुख दलों की सहमति से ही बन सकती है इसलिये किसी दल को विवश न किया जाये। यदि आप समझते हों कि भारतीय राज्यों की सहायता के साथ या उनके बिना भारत में एक सरकार बनाने की कोई संभावना नहीं है तो आपको इसकी सूचना सरकार को देनी चाहिये और सलाह भेजनी चाहिये कि किस तरह निश्चित तिथि तक सत्ता हस्तांतरित की जा सकती है। यह महत्त्वपूर्ण है कि भारतीय राज्य ब्रिटिश भारत में बनने वाली नयी सरकार से अपने सम्बन्धों का समायोजन करें किंतु सरकार का मंतव्य यह नहीं है कि परमोच्चता के अधीनस्थ शक्तियों एवं दायित्वों का स्थानांतरण नयी उत्तराधिकारी सरकार को कर दिया जाये। यह मंशा नहीं है कि सत्ता के स्थानांतरण से पूर्व परमोच्चता को एक निर्णायक पद्धति के तौर पर लिया जाये अपितु आवश्यकता पड़ने पर वायसराय प्रत्येक राज्य के साथ अलग से ब्रिटिश क्राउन के सम्बन्धों के साथ समायोजन पर वार्त्ता कर सकते हैं। वायसराय देशी राज्यों की सहायता करेंगे ताकि राज्य ब्रिटिश भारत के नेताओं के साथ भविष्य के लिये उचित एवं न्यायपूर्ण सम्बन्ध बना सकें।

    राज्यों के सम्बन्ध में चिंता

    जब ब्रिटेन ने भारत छोड़ने का निर्णय लिया तथा सत्ता हस्तांतरण की तिथि निश्चित की तो आश्चर्यजनक रूप से न तो व्हाइट हॉल ने और न ही राजाओं ने संधियों का उल्लेख किया। जिस समय माउंटबेटन को वायसराय बनाकर भेजा गया उस समय ब्रिटिश सम्राट जार्ज षष्ठम् ने माउंटबेटन से कहा कि मुझे भारतीय राज्यों की स्थिति के बारे में चिंता है क्योंकि उनका ब्रिटेन से सीधा संधि मूलक सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध भारत की स्वतंत्रता के साथ समाप्त हो जायेगा। स्वतंत्रता के बाद जो देश बनेंगे उनसे जब तक राज्य सम्बन्ध न जोड़ लें, अपने को एक खतरनाक स्थिति में पायेंगे। इसलिये माउंटबेटन, राजाओं को होनी पर संतोष करने के लिये समझायें और जो नई सरकार या सरकारें बनें, उनसे किसी न किसी तरह का समझौता कर लेने की सलाह दें। माउंटबेटन ने सम्राट के कथन का अर्थ लगाया कि राज्यों को भारत या पाकिस्तान में से किसी न किसी देश के साथ मिल जाना चाहिये। वास्तव में उस समय राजा का क्या मंतव्य था, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं था।

    ब्रिटिश भारत विभाजन की ओर

    24 मार्च 1947 को माउंटबेटन ने भारत में वायसराय का कार्यभार संभाला। उस समय देश विचित्र स्थिति में फंसा हुआ था। देश की जनसंख्या लगभग 35 करोड़ थी जिसमें से 10 करोड़ मुस्लिम एवं 25 करोड़ हिन्दू तथा अन्य मतावलम्बी थे। कांग्रेस देश का सबसे बड़ा राजनैतिक दल था जिसे विश्वास था कि उसे 100 प्रतिशत हिन्दू, सिख एवं अन्य मतावलम्बियों का तथा 90 प्रतिशत मुसलमानों का नेतृत्व प्राप्त था। जबकि मुस्लिम लीग का मानना था कि लीग को देश के 90 प्रतिशत मुसलमानों का समर्थन प्राप्त था। माउंटबेटन ने भारत में अपने प्रथम भाषण में कहा कि उनका कार्यालय सामान्य वायसराय का नहीं रहेगा। वे ब्रिटिश सरकार की घोषणा के परिप्रेक्ष्य में जून 1948 तक सत्ता का हस्तांतरण करने तथा कुछ ही माह में भारत की समस्या का समाधान ढूंढने के लिये आये हैं। माउंटबेटन ने एटली सरकार को 2 अप्रेल 1947 को अपनी पहली रिपोर्ट भेजी जिसमें उन्होंने लिखा कि देश का आंतरिक तनाव सीमा से बाहर जा चुका है। चाहे कितनी भी शीघ्रता से काम किया जाये, गृहयुद्ध आरंभ हो जाने का पूरा खतरा है।

    प्रधानमंत्री की घोषणा तथा वायसराय के वक्तव्यों से राजाओं को अच्छी तरह समझ में आ गया कि अब देश आजाद होने वाला है। इसलिये टालमटोल की नीति आगे चलने वाली नहीं है और उन्हें अपने भवितव्य के निर्धारण के लिये कोई न कोई निर्णय लेना ही पड़ेगा। 24 मार्च 1947 को, जिस दिन माउंटबेटन ने वायसराय एवं गवर्नर जनरल के पद की शपथ ली, बीकानेर महाराजा ने माउंटबेटन को अवगत कराया कि बीकानेर महाराजा तथा उनका गुट विधान निर्मात्री सभा में सम्मिलित होंगे जिससे नया शासन काफी मजबूत हो जायेगा।

    नरेंद्र मण्डल के मंत्रियों की समिति की बैठक

    30 मार्च 1947 को बम्बई में चैम्बर ऑफ प्रिसेंज के मंत्रियों की समिति की बैठक हुई। दीर्घ विचार-विमर्श के पश्चात् समिति ने निम्नलिखित संभावनायें व्यक्त कीं-

    (1.) कुछ राज्य अथवा राज्यों के समूह भारत में बनने वाली उत्तराधिकारी सरकारों में से किसी एक के साथ संघीय सम्बन्ध बनाकर संघ में प्रवेश कर सकते हैं या एक अथवा एक से अधिक सरकारों के साथ किसी विशिष्ट प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश को प्राथमिकता दे सकते हैं। राज्यों को यह राय कैबीनेट मिशन की 12 मई की घोषणा के परिप्रेक्ष्य में दी गयी है।

    (2.) कुछ राज्य अथवा उनके समूह ब्रिटिश भारत के विवाद से बाहर रहने को प्राथमिकता दे सकते हैं तथा स्वतंत्र इकाई के रूप में ब्रिटिश भारत में बनने वाली किसी एक अथवा एक से अधिक उत्तराधिकारी सरकारों के साथ किसी विशिष्ट प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश कर सकते हैं।

    (3.) कुछ राज्य अथवा उनके समूह राज्यसंघों का निर्माण कर सकते हैं और उनके माध्यम से ब्रिटिश भारत के प्रांतों की सरकारों के साथ विशिष्ट प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश कर सकते हैं।

    (4.) कुछ राज्य अथवा उनके समूहों की भौगोलिक स्थिति इस प्रकार की है कि यदि बिटिश भारत में एक अखिल भारतीय सरकार की स्थापना न हो सकती हो तो वे राज्य अथवा उनके समूह एक से अधिक सरकारों के साथ किसी राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश कर सकते हैं। कुछ रियासतें अथवा उनके समूह किसी एक क्षेत्र में स्थित हो सकते हैं किंतु सिंचाई परियोजनाएं, रेलवे लाइनें तथा अन्य आम सेवाओं के रूप में उनके बड़े आर्थिक हित दूसरे क्षेत्रों से जुड़े हुए हो सकते हैं।

    (5.) भारत में एक उत्तराधिकारी सरकार बने अथवा एक से अधिक, यह स्पष्ट है कि रक्षा, संचार तथा विदेश मामलों के सम्बन्ध में इन इकाईयों के मध्य सहयोग के कुछ उपायों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। राजनीतिक दलों के मध्य इस बात पर असहमति हो सकती है कि सहयोग का स्वीकृत आधार संविधान अथवा बहुपक्षीय संधि अथवा किसी तरह का समझौता होना चाहिये। इस प्रकार के सहयोग के समुचित आधार के निर्धारण के लिये भारत की मुख्य राजनीतिक पार्टियों एवं रियासतों के बीच एक गोलमेज सम्मेलन बुलाया जाना चाहिये।

    समिति में हुए निर्णय को स्टेडिंग कमेटी ऑफ प्रिंसेज तथा 1 व 2 अप्रेल को होने वाले राजाओं के सम्मेलन के सम्मुख रखने का निर्णय लिया गया। 31 मार्च 1947 को बम्बई में आयोजित राज्य संविधान वार्त्ता समिति की बैठक में नरेंद्र मण्डल के चांसलर ने फिर दोहराया कि भारतीय राज्यों के प्रतिनिधियों को संविधान निर्मात्री सभा के अंतिम चरण में सम्मिलित होना चाहिये। इस पर महाराजा बीकानेर ने कहा कि संविधान निर्मात्री सभा के अंतिम चरण में सम्मिलित होने का निर्णय संपूर्ण विश्व एवं भारतीय राज्यों में संदेह से देखा जायेगा।

    राजाओं में मतभेद

    अप्रेल 1947 में संविधान सभा की वार्त्ता समिति तथा नरेंद्र मण्डल की संविधान वार्त्ता समिति में राज्यों के प्रतिनिधित्व एवं उनके संविधान सभा में सम्मिलित होने के सम्बन्ध में समझौता हो गया। समाजवादी पार्टी के महासचिव जयप्रकाश नारायण ने इस समझौते पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि राज्यों से आने वाले कुल प्रतिनिधियों में विधानसभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित सदस्यों की संख्या 50 प्रतिशत से कम नहीं होनी चाहिये। जब यह समझौता नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति में अनुमोदनार्थ रखा गया तो स्थायी समिति में मतभेद उत्पन्न हो गये। चांसलर के नेतृत्व में राजाओं का एक शक्तिशाली गुट यह चाहता था कि देशी राज्यों के प्रतिनिधि संविधान सभा में तभी भेजे जायें जबकि संविधान सभा संघीय सरकार के संविधान पर चर्चा शुरू करे। राजाओं का एक गुट भोपाल नवाब की नीति से सहमत नहीं था। यह गुट बीकानेर नरेश के नेतृत्व में यह चाहता था कि अविलम्ब ही संविधान सभा में सम्मिलित हुआ जाये।

    अप्रेल 1947 के प्रथम सप्ताह में नरेंद्र मण्डल की सामान्य बैठक आयोजित की गयी। बीकानेर महाराजा ने चांसलर द्वारा घोषित नीति का विरोध किया तथा चांसलर की 'वेट एण्ड सी' की नीति पर प्रश्न चिह्न लगाया। उन्होंने कहा कि केबिनेट मिशन योजना को कांग्रेस ने मूल रूप में स्वीकार कर लिया था और मुस्लिम लीग ने भी उस पर अपनी स्वीकृति दे दी थी किंतु बाद में मुस्लिम लीग मुकर गयी। अब राजाओं का उससे मुकर जाना यह छवि देगा कि राजा लोग ब्रिटिश भारत की किन्हीं पार्टियों के हाथों में खेल रहे हैं। रियासतों के हित में भी यही ठीक होगा कि जून 1948 में सत्ता परिवर्तन के समय भारत में एक मजबूत केन्द्रीय सत्ता की स्थापना हो। इसलिये राजाओं का हित इसमें है कि मजबूत केन्द्र के निर्माण में जी जान से सहयोग करें। राज्यों की जनता के हित में मजबूत केंद्र की स्थापना के लिये, राज्यों को ब्रिटिश भारत से हाथ मिला लेना चाहिये। यदि राजा इस लक्ष्य की प्राप्ति में सहायता करते हैं तो लोगों तथा राजाओं के हित एक जैसे बने रहेंगे किंतु यदि राजा किसी भी कारण से दूसरे प्रकार का निर्णय लेते हैं तो वे अपनी प्रजा की इच्छाओं और उनके हितों के विरोध का कड़ा सामना करेंगे।

    बीकानेर महाराजा को महाराजा पटियाला का पूरा सहयोग मिला और उन्होंने चांसलर हमीदुल्लाखां द्वारा अपनायी गयी 'बाड़ पर बैठने की नीति' की भर्त्सना की। बीकानेर महाराजा की धारणा के विपरीत कुछ राज्यों का यह विचार था कि उन्हें संविधान सभा की कार्यवाही में भाग नहीं लेना चाहिये अपितु संविधान बन जाने के बाद उन्हें अलग से एक समझौते के द्वारा केंद्र में प्रवेश करना चाहिये जिससे उनकी स्थिति भारत सरकार के समक्ष उतनी ही मजबूत बनी रहेगी जितनी कि आज है।

    बीकानेर के प्रधानमंत्री सरदार पन्निकर ने कहा कि इस दृष्टिकोण पर राज्यों के बीच मतभेद नहीं हो सकता कि संविधान निर्मात्री सभा में भागीदारी इस शर्त पर आधारित है कि इसे स्वीकार करने के लिये दोनों समितियां सहमत होनी चाहिये। उदयपुर के प्रधानमंत्री सर टी. विजयराघवाचारी ने कहा कि संविधान सभा में सहमति के विषय पर सशर्त प्रवेश बड़ी गलती होगी तथा राजाओं पर भारत की प्रगति का शत्रु होने का आरोप लगेगा। डूंगरपुर के महाराजा ने कहा कि भारतीय राजा भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में हैं किंतु सहयोग का अर्थ समर्पण नहीं होता। भारत की स्वतंत्रता का अर्थ भारतीय जीवन के समस्त अंगों की स्वतंत्रता से है जिनमें भारतीय नरेश भी सम्मिलित हैं।

    महाराजा बीकानेर का नरेंद्र मण्डल से बहिर्गमन

    धौलपुर महाराजा ने शासकों से अपील की कि वे जल्दबाजी में कोई कदम न उठायें। अलवर महाराजा ने भी शासक बंधुओं का आह्वान किया कि वे इस घड़ी में चांसलर का साथ दें। इसके बाद स्थायी समिति ने बीकानेर महाराजा का सुझाव अस्वीकार कर दिया। नरेन्द्र मण्डल को प्रभावित करने में बीकानेर महाराजा के सारे प्रयत्न विफल हो चुके थे इसलिये उन्होंने नरेन्द्र मण्डल की बहुमत की नीति के विरुद्ध स्पष्ट घोषणा की कि वे संविधान निर्मात्री सभा में भाग लेने जा रहे हैं। उन्होंने 1 अप्रेल 1947 को नरेंद्र मण्डल की बैठक का बहिष्कार कर दिया और वक्तव्य देकर बहिर्गमन कर गये। सादूलसिंह ने स्थायी समिति के अध्यक्ष के नाम एक टिप्पणी लिखी कि स्थायी समिति में और अधिक न रहने के लिये मुझे क्षमा किया जाये क्योंकि इसमें मेरी स्थिति बड़ी कठिन हो जायेगी। इस समय राजाओं और देश के सामने जो समस्याएं हैं, उनके बारे में मेरे विचार स्थायी समिति और अध्यक्ष से बिल्कुल भिन्न हैं। न तो मैं चुप रह सकता हूँ और न अपने दृष्टिकोण के बारे में, जिसे मैं श्रीमानों के समक्ष अनेक बार स्पष्ट कर चुका हूँ, और अधिक कहना चाहता हूँ। सादूलसिंह ने राजाओं से अपील की कि अविलम्ब ही संविधान सभा में अपने प्रतिनिधि भेजें। सादूलसिंह की इस कार्यवाही से राजाओं में खलबली मच गयी।

    पटियाला महाराजा ने बीकानेर महाराजा का पक्ष लिया। इसके बाद अन्य नरेश भी धीरे-धीरे इसी मत का समर्थन करने लगे और एक-एक करके संविधान सभा में भाग लेने लगे। अंत में स्थायी समिति ने एक नया प्रस्ताव पारित करके राजाओं को छूट दी कि वे जब चाहें तब संविधान सभा में अपने प्रतिनिधि भेजें। चांसलर तथा स्थायी समिति को सत्ता के हस्तांतरण तथा परमोच्चता की समाप्ति के विषय पर क्राउन प्रतिनिधि से वार्त्ता करने हेतु अधिकृत किया गया। सादूलसिंह के बहिर्गमन की देश भर के समाचार पत्रों में प्रशंसा हुई। उन्हें राष्ट्रभक्त राजा घोषित किया गया। सरदार पटेल तथा अनेक कांग्रेसी नेताओं ने भी उनकी देशभक्ति की प्रशंसा की। लियाकतअली खां ने आरोप लगाया कि महाराजा ने बहिर्गमन का निर्णय कांग्रेस के दबाव में आकर लिया। सादूलसिंह ने इसका खण्डन किया।

    भोपाल नवाब द्वारा शासकों का आह्वान

    भोपाल नवाब ने राजाओं को संविधान सभा में भाग लेने से रोकने के लिये अंतिम प्रयास किया तथा राजाओं से अपील की कि वे नरेंद्र मण्डल की सामान्य सभा में पारित किये गये प्रस्ताव पर दृढ़ रहें। नवाब ने पटियाला महाराजा से अपील की कि नरेंद्र मण्डल के सदस्यों को व्यक्तिगत भेद भुलाकर, नरेंद्र मण्डल में पारित किये गये प्रस्तावों पर कार्यवाही करनी चाहिये। इस पर पटियाला नरेश ने कहा कि किसी भी सदस्य शासक के लिये नरेंद्र मण्डल के निर्णयों को मानना बाध्यकारी नहीं है। सम्मेलन में पारित प्रस्ताव के विरुद्ध हैदराबाद, मैसूर, कश्मीर, बड़ौदा, त्रावणकोर, कोचीन, पटियाला, जोधपुर तथा जयपुर ने घोषणा की कि वे इस सम्मेलन में आगे भाग नहीं लेंगे।

    राजाओं द्वारा संविधान सभा में भाग लिये जाने की घोषणा

    10 अप्रेल 1947 को बड़ौदा, पटियाला, बीकानेर, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर तथा रीवां ने संविधान सभा में सम्मिलित होने की घोषणा की। 18 अप्रेल 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद के आठवें अधिवेशन में राजाओं को चेतावनी दी कि जो राजा इस समय संविधान सभा में सम्मिलित नहीं होंगे उन्हें देश का शत्रु समझा जायेगा और उन्हें इसके दुष्परिणाम भोगने होंगे। लियाकत अली ने राजाओं का आह्वान किया कि वे नेहरू की धमकियों में न आयें।

    28 अप्रेल 1947 को बड़ौदा, कोचीन, उदयपुर, जोधपुर, जयपुर तथा बीकानेर के प्रतिनिधियों ने संविधान सभा में अपना स्थान ग्रहण कर लिया। बीकानेर राज्य के प्रतिनिधि के रूप में के. एम. पन्निकर ने विधान निर्मात्री समिति में अपना स्थान ग्रहण किया। जयपुर की ओर से 3 सदस्य नियुक्त किये गये जिनमें से एक हीरालाल शास्त्री थे। यह नरेंद्र मण्डल द्वारा बनाये गये यूनाईटेड फ्रंट की समाप्ति की शुरुआत थी। इसके बाद एक-एक करके राज्यों ने संविधान सभा में प्रवेश कर लिया। जुलाई 1947 में अन्य 37 रियासतों के प्रतिनिधि भी संविधान सभा में सम्मिलित हो गये।

    वायसराय द्वारा राज्यों की स्थिति पर विचार

    नेहरू तथा कांग्रेस का मानना था कि भारतीय रियासतें केवल मध्यकालीन सामंतवाद के ऐतिहासिक चिह्न हैं। इनकी वर्तमान परिस्थिति से संगति नहीं होती। समाज और राजनीति की वर्तमान स्थिति में इनका कोई स्थान नहीं है। इसलिये कांग्रेस रजवाड़ों को समाप्त करने के पक्ष में थी किंतु अंग्रेजों ने रजवाड़ों के माध्यम से ही देश में लगभग 200 वर्षों तक अपनी राजसत्ता को बनाये रखा था इसलिये वे रजवाड़ों के साथ किसी तरह का धोखा नहीं करना चाहते थे। वे देश छोड़ने से पहले रजवाड़ों को अधिकतम संभव स्तर तक संतुष्ट करना चाहते थे। इसलिये वायसराय द्वारा रजवाड़ों की स्थिति को लेकर कई तरह के प्रस्तावों पर विचार किया गया। उनमें से एक यह भी था कि ब्रिटिश सरकार सत्ता के हस्तांतरण के बाद भी कुछ निश्चित रियासतों पर अपनी परमोच्चता बनाये रखे किंतु ऐसा करना असंभव प्रायः ही था। ऐसा करने से यही प्रतीत होता कि ब्रिटेन भारत में अपनी टांग अड़ाये रखना चाहता है तथा ऐसा करके वह एक कमजोर एवं खण्ड-खण्ड भारत का निर्माण करना चाहता है। ऐसी स्थिति में यह भी संभव था कि आगे चलकर ब्रिटिश संरक्षित रजवाड़ों तथा भारत एवं पाकिस्तान की सरकारों के मध्य युद्ध हों।

    ब्रिटिश सरकार इतना ही कर सकती थी कि रजवाड़ों को मजबूत बनाये ताकि जब उत्तराधिकारी सरकार के साथ रजवाड़ों के समझौते हों तो रजवाड़े अपने लिये अधिक से अधिक सुविधायें ले सकें। ऐसा करने के लिये एक ही उपाय दिखाई पड़ता था कि रजवाड़ों पर से परमोच्चता को समाप्त कर दिया जाये, उसे किसी अन्य सरकार को नहीं सौंपा जाये। जब स्वतंत्रता पर विचार-विमर्श चल रहे थे, तब ब्रिटिश शासकों के पास इस बात पर विस्तार से विचार करने के लिये वास्तव में कोई समय नहीं था कि जब सत्ता का अंतिम रूप से स्थानांतरण हो जाये तब राजाओं को किस तरह से कार्य करना चाहिये किंतु पूरी ब्रिटिश सरकार इस बात पर सुस्पष्ट थी कि देशी रजवाड़ों पर से परमोच्चता का हस्तांतरण किसी अन्य सरकार को नहीं किया जाना चाहिये क्येांकि 1946 में कैबिनेट मिशन यह आशा एवं अपेक्षा प्रकट कर चुका था कि समस्त राज्य प्रस्तावित भारत संघ के साथ मिल जायेंगे।

    परमोच्चता के विलोपन की तैयारियां

    अप्रेल 1947 के द्वितीय सप्ताह में राजनीतिक अधिकारियों एवं रेजीडेंटों की एक बैठक बुलाई गयी ताकि परमोच्चता की समाप्ति के सम्बन्ध में की जाने वाली कार्यवाही पर विचार किया जा सके। राज्य सचिव ने वायसराय को परमोच्चता में ढील देने की नीति को इस शर्त के साथ कार्यान्वित करने के अधिकतम विवेकाधिकार प्रदान कर दिये थे कि संचार तथा प्रतिरक्षा के मामले में भारत की एकता खतरे में न पड़े तथा 1947 के अंत तक परमोच्चता का अधिकतम संभावित विलोपन किया जा सके। बैठक को बुलाने का उद्देश्य यह भी था कि राज्यों को अपने पैरों पर खड़े होने में सक्षम बनाया जा सके, उन्हें एक साथ रहने के लिये प्रोत्साहित किया जा सके तथा वे ब्रिटिश सरकार के साथ पूर्ण सहयोग करें। राजनीतिक अधिकारियों एवं रेजीडेंटों की बैठक में प्राप्त सुझावों के आधार पर राजनीतिक विभाग ने 10 बिंदु तैयार किये जिन पर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट लॉर्ड लिस्टोवल से विचार विमर्श किया गया।

    ये बिंदु मुख्यतः प्रशासनिक विषयों से सम्बद्ध थे जो कि परमोच्चता की समाप्ति, राजनीतिक अधिकारियों तथा उनके कार्मिकों की निकासी, रेजीडेंसियों के हस्तांतरण, दस्तावेजों के निस्तारण, नई बनने वाली औपनिवेशिक सरकारों से संपर्क बनाने के लिये किये जाने वाले अंतरिम प्रबंध तथा रेलवे, डाक सेवा, टेलिग्राफ सेवा एवं मुद्रा आदि के सम्बन्ध में यथास्थिति समझौतों (Standstill Agreements) से सम्बन्धित थे। पोलिटिकल एजेंटों को शरद काल तक एवं रेजीडेंटों को 1947 के अंत तक राज्यों से हटाने तथा राजनीतिक विभाग के कर्त्तव्यों को मार्च 1948 तक पूरा कर लेने का कार्यक्रम बनाया गया। राजनीतिक विभाग द्वारा यह कदम उठाया जाना भी प्रस्तावित किया गया कि क्राउन रिप्रजेंटेटिव पुलिस फोर्स (सी. आर. पी. एफ.) को विभिन्न राज्यों को सौंप दिया जाना चाहिये। इस बल का रख रखाव भारत सरकार के राजस्व से राजनीतिक विभाग द्वारा किया जाता था। बैठक राज्यों और ब्रिटिश भारत के मध्य चुंगी, नमक, अफीम, कर, डाक, तार तथा ऐसे ही अन्य आर्थिक महत्त्व के मुद्दों पर किसी भी निर्णय पर नहीं पहुँच सकी।

    माउंटबेटन योजना को स्वीकृति

    माउंटबेटन ने सत्ता के हस्तांतरण के लिये अपने चीफ ऑफ स्टाफ लॉर्ड इस्मे तथा जॉर्ज एबेल से भारत विभाजन पर आधारित एक योजना तैयार करवानी आरंभ की। इसे माउंटबेटन योजना तथा इस्मे योजना भी कहा जाता है। इस योजना को बनाने में अंग्रेज अधिकारियों को लगाया गया। भारतीयों को यहाँ तक कि मेनन को भी इससे पूरी तरह अलग रखा गया। वायसराय को आशंका थी कि मेनन के हिंदू होने के कारण मुसलमान आपत्ति करेंगे। नीति विषयक प्रश्न पहले से ही कैबीनेट मिशन द्वारा निर्धारित कर दिया गया था जो कि योजना में जोड़ा जाना था। भारत की आजादी की योजना के सम्बन्ध में माउंटबेटन व उनके सलाहकार पहले से ही निश्चित थे जो वे अपने साथ लेकर आये थे।

    2 मई 1947 को लॉर्ड इस्मे तथा जार्ज एबेल भारत विभाजन का प्रस्ताव लेकर वायसराय के विशेष विमान से लंदन गये ताकि उस प्रस्ताव पर मंत्रिमंडल की सहमति प्राप्त की जा सके। इंगलैण्ड भेजने से पहले यह योजना किसी भी भारतीय नेता अथवा अधिकारी को नहीं दिखायी गयी। उन्हें योजना का केवल ढांचा ही बताया गया। माउंटबेटन का विश्वास था कि योजना में वे सब बातें सम्मिलित कर ली गयी हैं जो नेताओं से हुए विचार विमर्श के दौरान सामने आयीं थीं। माउंटबेटन ने एटली सरकार को विश्वास दिलाया कि जब योजना भारतीय नेताओं के समक्ष रखी जायेगी, वे इसे स्वीकार कर लेंगे।

    इस्मे के साथ इंग्लैण्ड भेजी गयी योजना कैबीनेट मिशन के प्रस्तावों पर ही आधारित थी जिसमें कहा गया था कि पार्टी के नेताओं की सहमति के बिना ही प्रांतों को सत्ता हस्तांतरित कर देनी चाहिये और केन्द्र में मजबूत केंद्रीय सरकार के स्थान पर एक संघ होना चाहिये। यदि किसी प्रांत की जनता चाहे तो भारत और पाकिस्तान में से किसी के भी साथ मिलने से इंकार करके अपने प्रांत को स्वतंत्र राज्य बना सकती है। माउंटबेटन का तर्क था कि प्रजा पर न तो भारत थोपा जाये और न ही पाकिस्तान। प्रजा अपना निर्णय स्वयं करने के लिये स्वतंत्र रहे। जो पाकिस्तान में मिलना चाहे, पाकिस्तान में मिले। जिसे भारत के साथ मिलना हो, वह भारत का अंग बने। जिसे दोनों से अलग रहना हो, वह सहर्ष अलग रहे। ऐसा बंगाल की स्थिति को देखते हुए किया गया था क्योंकि आबादी के अनुसार पूर्वी बंगाल को पाकिस्तान में तथा पश्चिमी बंगाल को भारत में सम्मिलित होना था।

    नेहरू द्वारा आपत्ति

    7 मई 1947 को वायसराय ने योजना वी. पी. मेनन को दिखायी। मेनन ने योजना को देख कर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की क्योंकि इससे भारत के छिन्न भिन्न हो जाने की पूरी संभावना थी। 10 मई 1947 को लंदन से इस्मे योजना मंत्रिमंडल की स्वीकृति के साथ तार से वापस आ गयी। एटली और उनके मंत्रिमंडल की सलाह पर उसमें कई संशोधन किये गये थे किंतु मूल योजना ज्यों की त्यों थी। वायसराय ने अपने प्रेस सलाहकार कैम्पबेल जॉनसन से अखबारों में विज्ञप्ति प्रकाशित करवायी कि 17 मई को दिल्ली में एक महत्त्वपूर्ण बैठक होगी जिसमें भारतीय नेताओं को बुलाया जायेगा और वायसराय नेताओं के सामने भारतीयों को सत्ता सौंपने की योजना प्रस्तुत करेंगे जिसे ब्रिटिश सरकार की स्वीकृति मिल चुकी है।

    10 मई को वायसराय ने मंत्रिमंडल से स्वीकृत योजना नेहरू को दिखाईं नहेरू इस योजना को पढ़कर गुस्से से भर गये और यह कहते हुए उन्होंने योजना मेज पर रख दी कि इससे काम नहीं चलेगा। इस तरह की योजना को मैं नहीं मान सकता, इस तरह की योजना कांग्रेस नहीं मान सकती और इस तरह की योजना को भारत भी नहीं मान सकता। योजना में एक ओर तो देशी रियासतों को अपनी मर्जी से भारत या पाकिस्तान में मिलने अथवा स्वतंत्र रहने की छूट दे दी गयी थी तो दूसरी ओर ब्रिटिश प्रांतों को भी इन दोनों देशों से अलग रहकर कोई स्वतंत्र देश बना लेने की छूट दे दी गयी थी। नेहरू तुरंत समझ गये कि जो सुविधा केवल बंगाल की प्रजा को ध्यान में रखकर प्रस्ताव में सम्मिलित की गयी है, उसका लाभ देश के समस्त रजवाड़े उठाना चाहेंगे। देश की एकता में अनेकानेक छिद्र पड़ जायेंगे उनमें से भारत का रक्त रिस-रिस कर बहेगा।

    योजना का पुनर्निर्माण

    माउंटबेटन ने वी. पी. मेनन से इस योजना को नये सांचे में ढालने को कहा। मेनन को निर्देश दिये गये कि विभाजन का मुद्दा ज्यों का त्यों रहेगा। शेष मुद्दों को चाहे जिस रूप में बदल दिया जाये किंतु सर्वोपरि भावना यह रहे कि प्रांतों को भारत अथवा पाकिस्तान किसके साथ जुड़ना है, इसका फैसला जनता के हाथ में हो। प्रांतीय विधान सभाओं के माध्यम से जनता अपना फैसला सामने रख सकती है। मेनन ने देश के विभाजन पर एक वैकल्पिक योजना प्रस्तुत की और इस पर पटेल का समर्थन प्राप्त किया। वायसराय ने कैम्पबेल जॉनसन से अखबारों में विज्ञप्ति दिलवाई कि चूंकि लंदन में संसद की बैठक समाप्त होने वाली है इसलिये बैठक की तिथि 17 मई से बढ़ाकर 2 जून कर दी गयी है। वायसराय ने लंदन तार भिजवाया जिसमें प्रधानमंत्री मि. एटली से कहा गया कि आपके द्वारा स्वीकृत योजना को रद्द समझा जाये। संशोधित योजना भिजवायी जा रही है।

    माउंटबेटन की भारत विभाजन योजना पर लंदन की प्रथम प्रतिक्रिया विपरीत थी। इसलिये माउंटबेटन से कहा गया कि वे लंदन आयें। इसलिये वे 14 मई को इंगलैण्ड गये। 15 मई को भारतीय पत्रकार कातियाल ने हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक दुर्गादास को केबल से सूचित किया कि लेबर सरकार को भारत विभाजन की योजना स्वीकार नहीं है इसलिये माउंटबेटन को लंदन बुलाया गया है तथा कोरफील्ड, जैन्किंस एवं एबेल को हटाये जाने पर भी जोर दिया जा रहा है। माउंटबेटन ने इंगलैण्ड पहुंचकर संशोधित योजना प्रधानमंत्री एटली के सामने रखी और कहा कि संशोधित योजना को कांग्रेस अवश्य स्वीकार कर लेगी। प्रधानमंत्री एटली ने इस नयी योजना को केवल पाँच मिनट की बहस के बाद स्वीकार कर लिया। धैर्य, विलक्षण योजना और असाधारण लचीलेपन के कारण मेनन अपनी योजना स्वीकृत करवा सके। सरदार पटेल तो हमेशा परदे के पीछे थे ही। प्रधानमंत्री की सलाह पर माउंटबेटन ने योजना चर्चिल के समक्ष रखी और बताया कि भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को कॉमनवैल्थ की सदस्यता ग्रहण करने के लिये सहमत कर लिया गया है। चर्चिल चाहते थे कि कॉमनवैल्थ के माध्यम से ही सही किंतु इंगलैण्ड और भारत के सम्बन्ध बने रहने चाहिये। उन्होंने योजना को स्वीकृति दे दी।

    2 जून की बैठक

    2 जून 1947 को माउंटबेटन ने भारतीय नेताओं को अपने निवास पर आमंत्रित किया और उन्हें योजना की प्रतिलिपियां सौंप दीं। उसी दिन वायसराय ने इस योजना पर भोपाल नवाब तथा बीकानेर महाराजा की प्रतिक्रयाओं को जांचा। बीकानेर महाराजा ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि योजना में दोनों देशों को उपनिवेश का दर्जा दिया जायेगा जिससे ब्रिटिश ताज से सतत सम्बन्ध बना रहेगा। इस प्रावधान के कारण राजाओं पर संविधान सभा में सम्मिलित होने के लिये अच्छा प्रभाव पड़ेगा। नवाब की प्रतिक्रिया थी कि सरकार ने शासकों को मंझधार में छोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि हम कैबीनेट योजना के तहत कमजोर केंद्र में सम्मिलित हो सकते थे किंतु इस योजना के तहत हमें मजबूत केंद्र में सम्मिलित होना पड़ेगा। चाहे हम किसी भी उपनिवेश में सम्मिलित हों, वह हमें बुरी तरह नष्ट कर देगा।

    2 जून की प्रातः ए. पी. आई.द्वारा एक प्रमुख कांग्रेसी नेता के हवाले से समाचार पत्रों में टिप्पणी प्रकाशित हुई कि एक प्रमुख कांग्रेसी नेता ने राजाओं को चेतावनी दी है कि वे भारत की स्वतंत्रता के विरुद्ध न जायें। यह उनके लिये खतरनाक होगा। उन्हें कुछ ही महीनों में बिना कोई गोली चलाये नष्ट कर दिया जायेगा। इस नेता के हवाले से कह गया कि राज्यों में लोकप्रिय आंदोलन एवं आर्थिक दबाव राज्यों के अलगाव को नष्ट कर देंगे। उसी शाम महात्मा गांधी ने अपनी प्रार्थना सभा में राजाओं का आह्वान किया कि वे और अधिक विभाजन उत्पन्न न करें तथा संविधान सभा में भाग लें। उन्होंने त्रावणकोर द्वारा स्वतंत्रता दिवस के दिन हड़ताल रखने की घोषणा पर खेद व्यक्त किया।

    संविधान वार्त्ता समिति के सदस्यों के साथ बैठक

    3 जून को वायसराय ने राज्य संविधान वार्त्ता समिति के सदस्यों से वार्त्ता की तथा योजना का खुलासा किया। बैठक में राजनीतिक सलाहकार सर कोनार्ड कोरफील्ड, लॉर्ड इस्मे तथा सर एरिक मेविली भी उपस्थित थे। वायसराय ने सदस्यों को देश के विभाजन पर हुई वार्ताओं का ब्यौरा बताया तथा स्पष्ट किया कि राज्यों पर इस नवीन योजना का प्रभाव दो तरफा होगा। पहला तो यह कि दो नये बनने वाले उपनिवेशों में पूर्व में प्रस्तावित ढुलमुल केंद्र के बनने की संभावना नहीं है तथा दूसरा यह कि दो विलग उपनिवेश ब्रिटिश कॉमनवैल्थ के सदस्य होंगे, जिनके माध्यम से कॉमनवैल्थ में राज्यों का प्रतिनिधित्व होगा जो कि ब्रिटेन के पुराने सहयोगी एवं मित्र हैं। योजना की प्रतियाँ सदस्यों में बांट दी गयीं तथा सामान्य विचार विमर्श आरंभ हुआ। कोरफील्ड ने कहा कि कई राज्य परमोच्चता को सत्ता हस्तांतरण के समय तक बने रहना देखना चाहते हैं। नवाब भोपाल ने भी इस शर्त के साथ कोरफील्ड के विचार से सहमति दर्शायी कि नरेन्द्र मण्डल की स्थायी समिति इस विषय पर कोई भी रुख अपना सकती है। कोरफील्ड ने कहा कि परमोच्चता पहले से ही संकुचन की प्रक्रिया में है।

    बड़ौदा के दीवान बी. एल. मित्तर ने पूछा कि परमोच्चता की समाप्ति के बाद आर्थिक एवं वाणिज्यिक समझौतों का क्या होगा? वायसराय ने उत्तर दिया कि परमोच्चता की समाप्ति तथा नवीन समझौतों के निष्पादन के मध्य के अंतराल के लिये अंतरिम समझौते किये जाने की आवश्यकता होगी तथा किसी तरह की प्रशासनिक रिक्तता नहीं होगी। ये अंतरिम समझौते यथास्थिति के आधार पर होंगे तथा ब्रिटिश ताज के द्वारा राज्यों को पूर्ण अधिकार लौटा दिये जाने के कारण उनमें आवश्यकतानुसार संशोधन किये जायेंगे। वायसराय तथा पोलिटिकल विभाग शेष संक्षिप्त काल के लिये राज्यों की सहायता करेंगे।

    बैठक में कोरफील्ड ने कुछ उदाहरण दिये कि यथास्थिति के आधार पर किस प्रकार के अंतरिम प्रबंधन किये जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि जब केंद्र सरकार नमक कर समाप्त करने का निर्णय करेगी तो वह इस बात का भी ध्यान रखेगी कि वर्तमान समझौते की शर्तों के अनुसार उस समय तक के लिये राज्यों को कितना भुगतान किया जाना है जब तक कि नयी अंतरिम व्यवस्था लागू नहीं हो जाती है। यह यथास्थिति के आधार पर की जाने वाली व्यवस्था का एक उदाहरण था। इसी प्रकार उन्होंने डाक व तार की व्यवस्थाओं के उदाहरण भी दिये। उन्होंने कहा कि जब परमोच्चता की समाप्ति हो जायेगी तो राज्य साम्राज्यिक डाक घर के पोस्टमास्टर को बंदी बनाने के लिये भी स्वतंत्र होंगे। यद्यपि ऐसा करके वे शेष भारत के संचार से कट जायेंगे। अतः उन्हें इस बात पर सहमत होना चाहिये कि वे पोस्ट ऑफिस को निरंतर काम करने दें। अगला उदाहरण रेलवे तथा सैनिक छावनियों का था जहाँ क्राउन प्रतिनिधि का कार्यक्षेत्र अभी भी बना हुआ था। परमोच्चता की समाप्ति के बाद ये राज्यों को लौटा दी जायेंगी किंतु अंतरिम सरकार से कहा जायेगा कि वे रेलवे तथा सैनिक छावनियों को बने रहने देने के लिये राज्यों के साथ नये समझौते करें।

    जयपुर के दीवान सर वी. टी. कृष्णामाचारी ने वर्तमान समझौतों के बारे में संयुक्त विचार विमर्श करने के लिये एक तंत्र स्थापित किये जाने की वकालात की। कोरफील्ड ने कहा कि एक सूत्र (formula) ढूंढने के प्रयास किये गये हैं जो यथास्थिति समझौते में समाविष्ट किया जायेगा। यदि ये प्रयास सफल रहते हैं तो नये समझौतों के लिये संयुक्त विचार विमर्श की या तो प्रत्येक संविधान सभा में व्यवस्था की जायेगी या फिर एक तदर्थ समझौता वार्त्ता समिति की व्यवस्था की जायेगी। बिलासपुर के राजा ने पूछा कि क्या किसी भी उपनिवेश में प्रवेश करने के लिये राज्यों को पूर्ण छूट होगी? इस पर वायसराय ने कहा कि हाँ।

    बिलासपुर के राजा ने पूछा कि उन राज्यों का क्या होगा जो दोनों में से किसी भी संविधान सभा में भाग नहीं लेंगे? क्या सरकार उन राज्यों से आगे भी सम्बन्ध बनाये रखेगी? इस पर वायसराय ने कहा कि जब तक यह निश्चित नहीं हो जाता कि दोनों उपनिवेशों की वास्तविक आकृति क्या होगी, तब तक यह एक काल्पनिक प्रश्न है तथा इस समय वे इस प्रश्न का उत्तर देने की स्थिति में नहीं हैं किंतु इतना निश्चित है कि राज्यों को प्रशासनिक व्यवस्थाओं के सम्बन्ध में ब्रिटिश भारत में बनने वाली किसी एक अथवा दूसरी अथवा दोनों उत्तराधिकारी सरकारों के साथ समझौता वार्त्ता करने के लिये कदम उठाना ही होगा। कोई राज्य किसी एक उपनिवेश में सम्मिलित हो अथवा नहीं किंतु भौगोलिक एवं आर्थिक कारणों से नये प्रबंध करने आवश्यक होंगे। वायसराय ने शासकों को स्पष्ट किया कि जो राज्य स्वतंत्र रहने का निर्णय लेंगे, उन्हें उपनिवेश का दर्जा नहीं दिया जायेगा। उन्होंने सुझाव दिया कि राज्यों की समझौता वार्त्ता समिति को अगले दो या तीन माह तक समस्याओं के मुख्य सिद्धांतों पर निरंतर विचार विमर्श करते रहना चाहिये। सर सी. पी. रामास्वामी ने आपत्ति की कि समझौता वार्त्ता समिति में राज्यों के लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं है, इसलिये यह समिति इस कार्य को नहीं कर सकती।

    माउंटबेटन ने सुझाव दिया कि दोनों संविधान सभाओं से समझौता वार्त्ता करने के लिये दो अलग-अलग समझौता वार्त्ता समितियां होनी चाहिये। इस पर भोपाल नवाब ने कहा कि वे इस प्रस्ताव को नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति के समक्ष रखेंगे तथा वहाँ हुए निर्णय से वायसराय को अवगत करा देंगे। वायसराय ने कहा कि जिन राजाओं को किसी भी संविधान सभा में सम्मिलित होने अथवा न होने के विषय में संदेह है उन्हें वे आधिकारिक रूप से कोई सलाह नहीं देना चाहते कि उन्हें क्या कदम उठाने चाहिये किंतु यदि कोई शासक व्यक्तिगत रूप से उनकी राय जानना चाहे तो वह पूछ सकता है। बैठक के अंत में वायसराय ने राजाओं के मंतव्य की दुबारा जांच की। इसमें यह बात उभर कर आयी कि राजाओं को सर्वाधिक चिंता इस बात की थी कि क्या इस बात की कोई संभावना है कि परमोच्चता की समाप्ति, वास्तविक सत्ता के हस्तांतरण से पूर्व कर दी जाये ताकि वे उत्तराधिकारी सरकारों के साथ बरबारी के स्तर पर समझौता वार्ताएं कर सकें।

    रेडियो पर घोषणा

    3 जून 1947 को शाम सात बजे वायसराय तथा भारतीय नेताओं ने माउंटबेटन योजना को स्वीकार कर लिये जाने तथा अंग्रेजों द्वारा भारत को शीघ्र ही दो नये देशों के रूप में स्वतंत्रता दिये जाने की घोषणा की। इस रेडियो प्रसारण में सरकार की ओर से जो वक्तव्य दिया गया उसमें 20 बिंदु सम्मिलित किये गये। इनमें से केवल एक बिंदु राज्यों के सम्बन्ध में था जिसमें कहा गया कि इस प्रसारण में घोषित निर्णय ब्रिटिश भारत के सम्बन्ध में हैं। भारतीय राज्यों के बारे में सरकार की नीति कैबीनेट मिशन के 12 मई 1946 के मैमोरेण्डम के अनुसार ही रहेगी, उसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं किया गया है।

    स्वतंत्रता की तिथि की घोषणा

    4 जून को भारत विभाजन की योजना पर विस्तार से जानकारी देने के लिये लॉर्ड माउंटबेटन ने एक पत्रकार सम्मेलन बुलाया और उसमें भारतीय स्वतंत्रता की तिथि 15 अगस्त घोषित कर दी। 15 अगस्त की तिथि को इसलिये चुना गया क्योंकि उस दिन मित्रराष्ट्रों के समक्ष जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी वर्षगांठ थी। अनेक ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि यदि भारत को आजादी 15 अगस्त को मिली तो देश में बाढ़, तूफान, दंगे सूखे तथा अकाल का प्रकोप बड़े पैमाने पर होगा। अतः देश अंग्रेजों की गुलामी एक दो दिन और सह ले। इस कारण देश की आजादी की तिथि 15 अगस्त रखते हुए उसे 14 व 15 अगस्त की मध्यरात्रि कर दिया गया।

    नरेंद्र मण्डल के भंग होने की घोषणा

    जैसे ही वायसराय ने भारत की स्वतंत्रता की योजना घोषित की, नवाब भोपाल ने चांसलर के पद से त्यागपत्र दे दिया तथा वायसराय को सूचित किया कि भोपाल राज्य अब नरेंद्र मण्डल तथा उसकी किसी भी अधीनस्थ संस्था से कोई सम्बन्ध नहीं रखेगा। इस पर प्रो-चांसलर पटियाला महाराजा को नरेंद्र मण्डल का नया चांसलर बनाया गया। वास्तविकता यह थी कि भारत की स्वतंत्रता की तिथि की घोषणा के साथ ही नरेंद्र मण्डल बिखर चुका था। वास्तविकता को पहचानते हुए नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति ने एक प्रस्ताव पारित किया कि परमोच्चता की समाप्ति के साथ ही नरेंद्र मण्डल भी स्वतः भंग हो जायेगा।

    कांग्रेस अधिवेशन में भारत विभाजन प्रस्ताव को स्वीकृति

    14 जून 1947 को अखिल भारतीय कांग्रेस के अधिवेशन में देश के विभाजन का प्रस्ताव रखा गया। कांग्रेस के कई नेताओं ने इस प्रस्ताव का विरोध किया किंतु नेहरू, पटेल, गोविंदवल्लभ पंत तथा गांधीजी ने विभाजन के पक्ष में भाषण दिये। जब प्रस्ताव पर मतदान हुआ तो प्रस्ताव के पक्ष में 29 तथा विरोध में 157 मत आये, 32 मतदाता तटस्थ रहे।

    माउंटबेटन योजना पर प्रतिक्रियाएं

    नेहरू का यह विचार था कि यदि उन परिस्थितियों में मुस्लिम लीग भारत में रहने का फैसला करती तो वह एक बहुत कमजोर भारत होता। उसमें विखण्डन के कई तत्व मौजूद होते। हमारे पास शीघ्र स्वतंत्रता प्राप्त करने का और कोई रास्ता भी मौजूद नहीं था। हमें एक मजबूत भारत बनाना था। यदि दूसरे उसमें नहीं रहना चाहते थे तो हम कैसे और क्यों किसी को उसमें बने रहने के लिये दबाव डाल सकते थे? बहुत से लोगों का आरोप है कि कांग्रेसी नेताओं को आजादी का फल प्राप्त करने की शीघ्रता थी। जब कांग्रेसी नेताओं ने तीस वर्ष के संघर्ष के साथ प्रतीक्षा की थी तो क्या वे माउंटबेटन योजना को अस्वीकार करके कुछ दिन और भारत की आजादी की प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे ताकि आजादी और देश की एकता दोनों को हासिल किया जा सके? जैसा कि गांधीजी ने सुझाव दिया था।

    उन दिनों जोधपुर महाराजा हनवंतसिंह दिल्ली स्थित बीकानेर हाउस में थे। एक संध्या को उन्होंने कर्नल महाराज प्रेमसिंह जो रिश्ते में जोधपुर नरेश के चाचा थे, से पूछा कि गांधी, पटेल और नेहरू ने यह क्या किया? क्या उनकी बुद्धि उन्हें तलाक दे गयी? इस पर प्रेमसिंह ने जवाब दिया कि अन्नदाता! नेताओं की बुद्धि कहीं नहीं गयी है। वे बहुत चालाक हैं। नेहरू व पटेल ने सोचा कि कुर्सी हाथ से नहीं चली जाये और गांधीजी ने सोचा कि चेले हाथ से नहीं निकल जायें। प्रेमसिंह की सही व रोचक समीक्षा से महाराजा हँस पड़े।

    कांग्रेस द्वारा परमोच्चता की नयी परिभाषा

    कांग्रेस परमोच्चता को राजाओं पर शासन करने के लिये ब्रिटिश सत्ता द्वारा सृजित उपकरण मानती थी तथा उसने परमोच्चता के मामले पर कभी भी ब्रिटिश दृष्टिकोण से सहमति नहीं दिखायी। इतिहासकारों की दृष्टि में परमोच्चता का विचार ब्रिटिशों द्वारा अनुभव की फैक्ट्री में गढ़ा गया एक मौलिक राजनीतिक विचार था। जब कांग्रेस ने भारत की आजादी की मांग की तो ब्रिटिश अधिकारियों ने परमोच्चता के अधिकार को कांग्रेस के विरुद्ध प्रयुक्त किया। 14 जून 1947 को दिल्ली में कांग्रेस कमेटी की बैठक में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि कांग्रेस, परमोच्चता के अर्थ पर ब्रिटिश सरकार से सहमत नहीं। परमोच्चता के समाप्त हो जाने पर भी रजवाड़ों और हिंदुस्तान के सम्बन्ध में कोई अंतर नहीं पड़ता। किसी भी राज्य को अपनी स्वतंत्रता घोषित करने का अधिकार नहीं है। न अपने आप को शेष भारत से अलग रखने का। ऐसा करना देश के इतिहास तथा भारतीय जनता के उद्देश्यों के विपरीत होगा। परमोच्चता के समाप्त हो जाने से राज्यों की सुविधायें, अधिकार तथा आभारों पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा और न ही भारत सरकार तथा राज्यों के सम्बन्ध समाप्त होंगे।

    जिन्ना ने परमोच्चता के सम्बन्ध में कांग्रेस द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत का विरोध किया तथा घोषणा की कि न तो ब्रिटिश सरकार, न ब्रिटिश संसद, न कोई अन्य शक्ति राज्यों को उनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ भी करने के लिये बाध्य नहीं कर सकती है और न उन्हें ऐसा करने का कोई अधिकार है। कोरफील्ड भी कांग्रेस के तर्क से सहमत नहीं थे।

    भारतीय स्वतंत्रता विधेयक में भारतीय रियासतों हेतु किये गये प्रावधान

    वायसराय के सलाहकारों की एक बैठक में भारतीय स्वतंत्रता विधेयक की धारा 7 में भारतीय रियासतों के सम्बन्ध में किये गये प्रावधानों पर विचार विमर्श किया गया। इस धारा में कहा गया था कि राज्यों के भारत में सम्मिलन के ठीक पहले, किसी क्षेत्र में शांति अथवा अच्छे शासन की, सम्राट की सरकार की कोई जवाबदेही नहीं होगी। भारतीय राज्यों पर सम्राट की संप्रभुता समाप्त हो जायेगी तथा जिस दिन यह अधिनियम पारित होगा उसी दिन सम्राट तथा विभिन्न राज्यों के मध्य की गयी समस्त संधियां एवं व्यवस्थायें, सम्राट द्वारा भारतीय रियासतों में किये जाने वाले कार्य, सम्राट के समस्त दायित्व तथा शक्तियां, प्राधिकार या अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जायेंगे।

    आदिवासी क्षेत्र में कार्य करने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ सम्राट द्वारा अनुदान, अनुग्रह तथा अनुकंपा के सम्बन्ध में की गयी संधियां, सम्राट की कोई भी शक्ति, प्राधिकार या अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जायेंगे। कांग्रेसी नेताओं ने अनुभव किया कि विधेयक में राज्यों के सम्मिलन के सम्बन्ध में कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं किये गये हैं। वे चाहते थे कि धारा 2 में इस आशय का प्रावधान किया जाये। समझा जाता है कि ब्रिटिश सरकार द्वारा यह मान लिया गया था कि राज्यों के सम्मिलन के लिये भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत कार्यवाही कर ली जायेगी तथा नये अधिनियम में इसके लिये किसी तरह का प्रावधान करने की आवश्यकता नहीं है। अनुच्छेद 5 में परमोच्च्ता की समाप्ति के संदर्भ में कहा गया था कि इससे जो अधिकार तथा दायित्व पुनः राज्यों को प्राप्त हो जायेंगे, उनसे उत्पन्न अंतराल को भरने के लिये राज्यों को उत्तराधिकारी सरकारों के साथ संघीय समझौते अथवा नवीन राजनीतिक व्यवस्थायें करनी पड़ेगी किंतु परमोच्चता की तिथि जून 1948 से खिसककर अगस्त 1947 हो जाने से नवीन समझौते किये जाने संभव नहीं हैं। नवीन समझौतों में वैयक्तिक विचार विमर्श में कई पक्ष होंगे। राज्यों की संख्या अधिक होने के कारण यह काफी लम्बा एवं परिश्रम वाला कार्य होगा। इसलिये कांग्रेस ने प्रस्ताव किया कि जब तक नयी व्यवस्थाएं न हो जायें, यथास्थिति बने रहने का प्रावधान विधेयक में होना चाहिये जिसके अनुसार ब्रिटिश ताज तथा विभिन्न राज्यों के मध्य समान हितों वाले जो समझौते तथा प्रबंध किये गये थे वे नयी सरकारों तथा राज्यों के मध्य बने रहेंगे। मुस्लिम लीग को धारा 7 के विषय में कोई आपत्ति नहीं थी।

    राज्य सचिव ने कांग्रेस से असहमति जताते हुए कहा कि इस नये प्रस्तावित प्रावधान का अर्थ होगा राज्यों में संसदीय विधान को कुछ और समय तक बनाये रखना। इस प्रस्ताव पर विकट आपत्तियां व्यक्त की गयीं। पहली आपत्ति यह कि भारतीय राज्य ब्रिटिश राज्यक्षेत्र में नहीं थे तथा उनकी प्रजा संसदीय विधान के अंतर्गत नहीं थी जिनपर उनकी सहमति के बिना दायित्व लादे जा सकें तथा इस प्रकार की सहमति को स्वतः प्रदत्त नहीं माना जा सकता था। दूसरी आपत्ति यह थी कि राज्य सचिव ब्रिटिश भारत में सत्ता हस्तांतरण की एक तिथि तथा रियासती भारत में परमोच्चता समाप्ति की दूसरी तिथि नहीं दे सकते थे। इसके अतिरिक्त राज्यों ने कैबीनेट मिशन प्रस्तावों को स्वीकार करते समय यह स्पष्ट कर दिया था कि उन्होंने परमोच्चता की समाप्ति की घोषणा के आधार पर योजना के सामान्य सिद्धांत को स्वीकार किया है जिसका अनुसरण ब्रिटिश सरकार की 3 जून की घोषणा में किया गया है।

    राज्य सचिव का मानना था कि कांग्रेस द्वारा प्रस्तावित प्रावधान से इस वचन का उल्लंघन होगा। वायसराय का मानना था कि बिना शर्त संधियों एवं समझौतों की समाप्ति भी राज्यों को बुरी चोट पहुँचायेगी। राज्य सचिव, राज्यों के सम्मिलन के सम्बन्ध में विशेष प्रावधान रखने के लिये तैयार हो गये। धारा 2 के अंत में एक नवीन उपधारा जोड़ी गयी- इस अनुच्छेद की उपधारा 3 की सामान्य स्थिति को अप्रभावित रखते हुए, यह अनुच्छेद भारतीय राज्यों के नवीन उपनिवेशों में सम्मिलन को बाधित नहीं करेगा। धारा 7 के अंत में राज्य सचिव एक महत्त्वहीन सा प्रावधान जोड़ने को तैयार हो गये किंतु कांग्रेसी नेता इससे संतुष्ट नहीं हुए।

    सर बी. एन. राव ने माउंटबेटन के माध्यम से प्रयास किया कि विधेयक में यह प्रावधान किया जाये कि उन 327 शासकों को जिनके कि राज्यों का औसत क्षेत्रफल 20 वर्ग मील जितना था तथा जिनकी जनसंख्या 3,000 के लगभग थी, उन्हें अपनी प्रजा को मृत्युदण्ड देने का अधिकार न मिले तथा यह अधिकार सम्बद्ध उपनिवेश के पास रहे। वायसराय ने स्थिति की गंभीरता का आकलन करते हुए भारत सचिव को सूचित किया कि मैं स्वयं यह अनुभव नहीं कर सका कि जो राजा इस समय केवल तीन माह तक की कैद की सजा दे सकते हैं वे परमोच्चता हट जाने के बाद मृत्युदण्ड भी दे सकेंगे। अतः विधेयक में से परमोच्चता की समाप्ति का प्रावधान हटा दिया जाये। भारत सचिव ने जवाब दिया कि यह संभव नहीं है क्योंकि इससे राज्यों के प्रति विधेयक की जो मंशा थी वह पूरी तरह बदल जायेगी।

    मेनन का विचार था कि कुछ महत्त्वपूर्ण समझौते ऐसे हैं जो राज्य तथा ब्रिटिश भारत के समान हितों वाले हैं तथा उन समझौतों का आधार परमोच्चता नहीं है। उदाहरण के लिये 1920 में बहावलपुर तथा बीकानेर राज्यों से सतलुज नहर परियोजना के सम्बन्ध में किया गया समझौता, जयपुर तथा जोधपुर से भारत सरकार द्वारा नमक के सम्बन्ध में किये गये समझौते। परमोच्चता की समाप्ति के बाद भी ये समझौते निरस्त नहीं होंगे। कोरफील्ड का मानना था कि भारत सरकार द्वारा राज्यों के साथ जो समझौते किये गये थे, वे ब्रिटिश ताज की तरफ से ही थे। वायसराय ने न तो मेनन के विचार का समर्थन किया और न कोरफील्ड के विचार का, उन्होंने दोनों अधिकारियों के विचार भारत कार्यालय को भेज दिये। भारत कार्यालय ने कोरफील्ड के विचार का समर्थन किया।

    कोरफील्ड का षड़यंत्र

    वायसराय के राजनीतिक सलाहकार तथा राजनीतिक विभाग के सचिव सर कोनार्ड कोरफील्ड रजवाड़ों से इस कदर प्रेम करते थे कि रजवाड़ों के हित को ही वे भारत का हित समझते थे। नेहरू और कांग्रेस के नाम से वे उतना ही खार खाते थे जितने कि स्वयं राजे-महाराजे। कोनार्ड ने स्वीकार किया है कि मुझे रियासती भारत उस दो तिहाई भारत से अधिक वास्तविक भारत दिखाई देता था जो इण्डियन सिविल सर्विस के अधीन था। कोरफील्ड ने रजवाड़ों में मची भगदड़ को रोकने के लिये रजवाड़ों को दो सलाहें दीं- एक तो यह कि वे अपने प्रशासन को उदार बनायें तथा दूसरी यह कि वे अपना संगठन मजबूत बनायें ताकि उनके राज्यों में कांग्रेस के हस्तक्षेप को रोका जा सके।

    नरेंद्र मण्डल दो धड़ों में बंट गया था इनमें से पहला धड़ा- 'राजाओं का एकीकृत मोर्चा' (UNNITED FRONT OF PRINCES) नवाब भोपाल के नेतृत्व में काम कर रहा था। इस धड़े को प्रोत्साहन देने का काम कोरफील्ड कर रहे थे। कोरफील्ड ने लंदन जाकर अपने प्रिय रजवाड़ों के हितों की रक्षा का अभियान चलाया। कोरफील्ड ने तर्क दिया कि रजवाड़ों ने अपनी शक्तियां केवल सम्राट के आगे समर्पित की हैं किसी भी अन्य व्यक्ति के आगे नहीं। फलस्वरूप सम्राट का शासन जब हटेगा तो समस्त रजवाड़ों को उनकी शक्तियां अपने आप वापस मिल जायेंगी। यह पूर्णतः रजवाड़ों पर आधारित रहना चाहिये कि वे भारत के साथ जायें या पाकिस्तान के साथ, अथवा स्वतंत्र बने रहना चाहें। भारत सचिव लिस्टोवेल ने कोरफील्ड की मान्यता को समर्थन दिया और भारत की स्वतंत्रता के विधेयक में यह प्रावधान कर दिया गया। माउंटबेटन तथा भारतीय नेताओं के लाख जोर लगाने पर भी इस प्रावधान को हटाया नहीं जा सका।

    जब माउंटबेटन भारत विभाजन की योजना मंत्रिमंडल से स्वीकृत कराने के लिये लंदन गये तो कोरफील्ड ने अपने विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिये कि वे रियासतों से सेनायें हटाने, रेल बंद करने, डाक व तार की व्यवस्था समाप्त करने आदि की कार्यवाही करें। वह देशी राज्यों और भारतीय संघ के सम्बन्धों में रिक्तता एवं व्यवधान उत्पन्न करने हेतु प्रयत्नरत थे। उन्होंने देशी राज्यों से सम्बन्धित पत्रों व फाइलों को नष्ट करने के आदेश दिये। परिणामस्वरूप बहुत सा महत्त्वपूर्ण अभिलेख जला दिया गया। कुल मिलाकर चार टन कागज नष्ट किये गये।

    कोरफील्ड के आदेश पर गोरे अधिकारियों ने आनन-फानन में उन फाइलों, रिपोर्टों, फोटोग्राफों और दस्तावेजों का लगभग चार टन वजनी ढेर जलाया जिनमें पूरे विस्तार के साथ वह ब्यौरा अंकित था जो राजा, महाराजा और नवाबों आदि की पिछली पाँच पीढ़ियों की सनकों, विलासिताओं, मक्कारियों, क्रूरताओं और यौन आनंद कार्यक्रमों इत्यादि को समेटे हुए था। देशी शासकों के रोमांचक कारनामों की अनेक सचित्र और अचित्र गाथायें विदेशी शासकों ने रस ले-लेकर गुप्त फाइलों में अंकित की थीं, न जाने इनका कब कैसा काम पड़ जाये।...........मनमौजी और मसखरे, क्रूर और कामी, न जाने कितने देशी राजाओं की कैसी-कैसी कहानियां, उन चिताओं में भस्म होकर आकाश में जा रही थीं। ऐसे अवसर कई बार आये जब देशी राजाओं और विदेशी शासकों के आपसी सम्बन्ध टूट जाने की सीमा तक तनावपूर्ण हो गये। ऐसे भी कई किस्से उन चिताओं में भस्म हुए होंगे।

    कोरफील्ड ने एटली सरकार से यह काम करने की अनुमति इस तर्क के आधार पर ली थी कि यदि हम राजाओं का भविष्य सुरक्षित नहीं बना सकते तो कम से कम उनका भूतकाल तो सुरक्षित बना ही दें ताकि स्वतंत्र भारत में कोई व्यक्ति राजाओं को ब्लैकमेल न कर सके। नेहरू और पटेल तक ये समाचार पहुँचे कि राजनीतिक विभाग संपूर्ण अभिलेखों को नष्ट कर रहा है, रेजीडेंसियों को बंद किया जा रहा है तथा क्राउन फोर्सेज एवं सैन्य छावनियों को विभिन्न राज्यों को सौंपा जा रहा है। नेहरू ने इन अग्निकाण्डों पर तत्काल रोक लगाने की चेष्टा की क्योंकि इस बहाने न जाने क्या-क्या ऐतिहासिक और कीमती चीजें जलाकर खाक कर दिये जाने का खतरा था किंतु देर हो चुकी थी। पटियाला, हैदराबाद, इंदौर, मैसूर, बड़ौदा, पोरबंदर, कोचीन और नयी दिल्ली आदि अनेक स्थानों पर फाइलें जलाई जा चुकी थीं।

    ऑल इण्डिया स्टेट्स पीपुल्स कान्फ्रेन्स ने एक प्रस्ताव पारित करके मांग की कि राजनीतिक विभाग तथा उसके समस्त अभिकरणों को तुरंत नवीन भारत सरकार को स्थानांतरित किया जाये या राजनीतिक विभाग के कार्यों को सम्पादित करने के लिये केंद्र सरकार के अधीन एक नये विभाग की स्थापना की जाये। 13 जून को वायसराय की अध्यक्षता में एक बैठक हुई जिसमें नेहरू, पटेल, कृपलानी, जिन्ना, लियाकत अली, अब्दुर राब निश्तर, सरदार बलदेवसिंह तथा कोरफील्ड उपस्थित थे। नेहरू ने इस काण्ड के लिये सीधे तौर पर कोरफील्ड को जिम्मेदार ठहरया। नेहरू ने कोरफील्ड पर देश को कलंकित करने का आरोप लगाया।

    जिन्ना ने कोरफील्ड का पक्ष लिया और नेहरू से कहा कि यदि बिना सबूत के आरोप लगाने हैं तो इस बैठक का कोई अर्थ नहीं है। कोरफील्ड के अनुसार वेकफील्ड ने योजना बनायी थी कि ऐतिहासिक महत्त्व के अभिलेखों को दिल्ली स्थिति ब्रिटिश हाईकमिश्नर के माध्यम से लंदन स्थित भारत कार्यालय को भिजवा दिया जाये तथा शासकों के व्यक्तिगत महत्त्व के प्रकरणों से सम्बन्धित अभिलेखों को नष्ट कर दिया जाये। बैठक में तय किया गया कि वे कागज जिन्हें ब्रिटिश सरकार भारत सरकार को सौंपना नहीं चाहती उन्हें जलाया नहीं जायेगा बल्कि ब्रिटिश उच्चायुक्त को सौंपा जायेगा। रजवाड़ों के सम्बन्ध में विचार करने हेतु राजनीतिक विभाग का गठन किया जायेगा।

    जिन्ना ने कहा कि मुस्लिम लीग भी एक राजनीतिक विभाग का गठन करेगी। कोरफील्ड ने आपत्ति की कि भारत की स्वतंत्रता से पहले न तो कांग्रेस और न मुस्लिम लीग ऐसा कर सकती है। क्योंकि इससे लगेगा कि आजादी से पहले की परमोच्चता राजनीतिक विभाग से नये राजनीतिक विभागों को प्राप्त हो गयी है। वायसराय ने कहा कि दो नये विभाग गठित होने चाहिये किंतु इनका नाम राजनीतिक विभाग (Political Department) न होकर रियासती विभाग (States Department) होना चाहिये। यह पूर्णतः राज्यों के ऊपर छोड़ दिया जाना चाहिये कि वे अपने प्रतिनिधि को दिल्ली भेजते हैं या कराची या फिर वे उत्तराधिकारी सरकारों के प्रतिनिधियों को अपने यहाँ बुलाते हैं।

    भारत स्वतंत्रता अधिनियम

    18 जून 1947 को भारत स्वतंत्रता विधेयक ने कानून का रूप ले लिया। इस अधिनियिम में प्रावधान किया गया कि 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश सरकार द्वारा सत्ता हस्तांतरित करने के बाद दो उपनिवेश भारत तथा पाकिस्तान अस्तित्व में आयेंगे। सत्ता हस्तांतरण की तिथि को राज्यों पर से परमोच्चता विलोपित हो जायेगी तथा राज्यों एवं ब्रिटिश ताज के मध्य समस्त संधियां एवं व्यवस्थायें भी समाप्त हो जायेंगी।

    शासकों की सरदार पटेल से भेंट

    10 जुलाई 1947 को कुछ शासकों और राज्यों के मंत्रियों ने सरदार पटेल से उनके निवास पर भेंट की। इनमें पटियाला तथा ग्वालियर के महाराजा और बीकानेर, बड़ौदा एवं पटियाला के दीवान सम्मिलित थे। पटेल ने कहा कि जो राज्य, संविधान सभा में भाग ले रहे हैं उन्हें तीन विषयों पर भारत सरकार के साथ मिल जाना चाहिये इससे वे केंद्र सरकार द्वारा बनायी जा रही नीतियों के निर्माण में प्रत्यक्षतः जुड़ जायेंगे। राजाओं और उनके मंत्रियों ने इस सुझाव का स्वागत किया। बैठक में निर्धारित किया गया कि रियासती विभाग नीति निर्धारक मामलों पर कार्य करेगा। जैसे ही केंद्रीय संविधान लागू होगा वैसे ही रियासती विभाग काम करना बंद कर देगा। तब तक यह राज्यों के मंत्रियों की सलाहकार समिति के परामर्श से कार्य करे।

    इस बैठक ने भारत सरकार एवं राज्यों के मध्य चले आ रहे गतिरोध को समाप्त कर दिया। शासकों के मन में रियासती विभाग को लेकर जो संदेह थे उनका भी समाधान हो गया। 24 जुलाई को कुछ शासकों तथा मंत्रियों ने फिर से पटेल तथा मेनन से भेंट की। इनमें पटियाला, ग्वालियर, बीकानेर तथा नवानगर के शासक एवं मैसूर, जोधपुर बीकानेर के दीवान सम्मिलित थे। यह बैठक इस बात का परिचायक थी कि भारत सरकार के प्रयासों को सफलता मिलनी आरंभ हो गयी थी और शासक नवाब भोपाल के नेतृत्व को छोड़ कर पटेल तथा मेनन के साथ आ रहे थे।

    भारत विभाजन की तैयारियां

    विभाजन का काम दक्षता से निबटाने के लिये वायसराय की अध्यक्षता में विभाजन कौंसिल का गठन किया गया जिसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में एच. एम. पटेल तथा पाकिस्तान के प्रतिनिधि के रूप में चौधरी मोहम्मद अली को रखा गया। उनकी सहायता के लिये बीस समितियां और उपसमितियां गठित की गयीं जिनमें लगभग सौ उच्च अधिकारियों की सेवाएं ली गयीं। इन समितियों का काम विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव तैयार करके अनुमोदन के लिये विभाजन कौंसिल के पास भेजना था। उस समय तक भारत में चुनी हुई वैधानिक संसद के अस्तित्व में नहीं होने से संविधान सभा को ही संसद तथा संविधान सभा का दोहरा दर्जा दिया गया। विभाजन से पहले भारत में जो अंतरिम सरकार चल रही थी उसमें से लॉर्ड माउंटबेटन ने दो वैकल्पिक सरकारों का निर्माण किया जो 15 अगस्त को अस्तित्व में आने वाले दोनों देशों के प्रशासन को संभाल सकें। 1935 के भारत सरकार अधिनियम में सुविधापूर्ण सुधार करके भारत में ई.1947 से 1950 तक तथा पाकिस्तान में ई.1947 से 1956 तक संविधान का काम लिया गया।

    पंजाब में शांति बनाये रखने के लिये गोरखाओं की एक फौज बनायी गई जिसका नाम पंजाब बाउंड्री फोर्स रखा गया। इसमें 55 हजार सैनिकों की नियुक्ति की गयी तथा उसे पंजाब में उन स्थानों पर लगाया गया जहाँ कत्लेआम होने की सर्वाधिक संभावना थी। इस सेना ने 1 अगस्त 1947 से अपना कार्य करना आरंभ कर दिया। भारत व पाकिस्तान की सीमाओं का निर्धारण करने के लिये 27 जून 1947 को रैडक्लिफ आयोग का गठन किया गया। इसके अध्यक्ष सर सिरिल रैडक्लिफ इंगलैण्ड के जाने माने वकील थे।

    रैडक्लिफ 8 जुलाई 1947 को दिल्ली पहुँचे। उनकी सहायता के लिये प्रत्येक प्रांत में चार-चार न्यायाधीशों के एक बोर्ड की नियुक्ति की गयी थी। इन न्यायाधीशों में से आधे कांग्रेस द्वारा व आधे मस्लिम लीग द्वारा नियुक्त किये गये थे। पंजाब के गवर्नर जैन्किन्स ने माउंटबेटन को पत्र लिखकर मांग की कि रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट 15 अगस्त से पूर्व अवश्य ही प्रकाशित कर देनी चाहिये ताकि लोगों की भगदड़ खत्म हो। भारत विभाजन समिति ने भी वायसराय से यही अपील की। आयोग की रिपोर्ट 9 अगस्त 1947 को तैयार हो गयी किंतु लॉर्ड माउंटबेटन ने उसे एक सप्ताह तक प्रकाशित नहीं करने का निर्णय लिया ताकि स्वतंत्रता दिवस के आनंद में रसभंग की स्थिति न बने। इस कारण पंजाब और बंगाल में असमंजस की स्थिति बनी रही।

    सत्ता का हस्तान्तरण

    7 अगस्त 1947 को जिन्ना ने सदा-सदा के लिये भारत छोड़ दिया और वे कराची चले गये। जिन्ना के जाने के अगले दिन सरदार पटेल ने वक्तव्य दिया कि भारत के शरीर से जहर अलग कर दिया गया। हम लोग अब एक हैं और अब हमें कोई अलग नहीं कर सकता। नदी या समुद्र के पानी के टुकड़े नहीं हो सकते। जहाँ तक मुसलमानों का सवाल है, उनकी जड़ें, उनके धार्मिक स्थान और केंद्र यहाँ हैं मुझे पता नहीं कि वे पाकिस्तान में क्या करेंगे। बहुत जल्दी वे हमारे पास लौट आयेंगे। 14 अगस्त को हिन्दू एवं मुस्लिम बहुल जनसंख्या के आधार पर दो देश अस्तित्व में आये। ब्रिटिश शासन के अधीन हिन्दू बहुल क्षेत्र 'भारत संघ' के रूप में तथा मुस्लिम बहुल क्षेत्र 'पाकिस्तान' के रूप में अस्तित्व में आया।

    14 अगस्त को वायसराय ने पाकिस्तान की संविधान निर्मात्री परिषद में भाषण दिया और पाकिस्तान के स्वतंत्र राज्य की स्थापना की घोषणा की। वायसराय उसी दिन वायुयान से दिल्ली आये और मध्यरात्रि को भारत की संविधान निर्मात्री परिषद में भाषण देकर भारत की स्वतंत्रता की घोषणा की। ब्रिटिश नियंत्रण से मुक्त होने के तुरंत बाद भारत और पाकिस्तान के लिये एक-एक गवर्नर जनरल नियुक्त किया जाना था। भारत स्वतंत्रता अधिनियम में प्रावधान किया गया था कि दोनों देश चाहें तो एक ही व्यक्ति को दोनों देशों का गवर्नर जनरल बना सकते थे।

    ऐसा माना जा रहा था कि माउंटबेटन दोनों देशों के लिये विश्वसनीय होंगे तथा दोनों देश कुछ समय के लिये उन्हें ही अपना गवर्नर जनरल बनायेंगे। भारत ने माउंटबेटन को स्वाधीन भारत का प्रथम गवर्नर जनरल नियुक्त किया किंतु पाकिस्तान में जिन्ना गवर्नर जनरल बने।

    उपरोक्त तथ्यों से स्प्ष्ट है कि भोपाल नवाब नरेंद्र मण्डल के चांसलर पद का दुरुपयोग करते हुए केन्द्र में एक मजबूत संघ का निर्माण नहीं होने देना चाहते थे। ऐसी परिस्थति में बीकानेर नरेश सादूलसिंह राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर देश के राजाओं का नेतृत्व करने के लिये आगे आये और उन्होंने नवाब द्वारा रचे गये चक्रव्यूह को भेद डाला। 10 अप्रेल 1947 को बड़ौदा, पटियाला, बीकानेर, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर तथा रीवां जैसे महत्त्वपूर्ण राज्यों ने संविधान सभा में सम्मिलित होने की घोषणा करके नवाब के मंसूबों को पूरी तरह नष्ट कर दिया। शासकगण चाहते थे कि परमोच्चता की समाप्ति तुरंत हो ताकि वे अपने अधिकारों के लिये अधिक मजबूती से मोल भाव कर सकें किंतु ब्रिटिश सरकार का मानना था कि ब्रिटिश भारत के लिये सम्प्रभुता की समाप्ति तथा रियासती भारत के लिये परमोच्चता की समाप्ति की अलग-अलग तिथियां नहीं हो सकतीं। राजपूताना के राज्यों ने आजादी के द्वार पर खड़े देश के इतिहास के रुख को सदा-सदा के लिये सही दिशा में मोड़ दिया। राजपूताना के राजाओं ने इस समय इस बात का विशेष ध्यान रखा कि उन पर भारत की संवैधानिक प्रगति का शत्रु होने का आरोप न लगे।

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