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  • अध्याय-2 : बीसवीं सदी में राजपूताना के प्रमुख एवं सक्षम राज्य

     03.06.2020
    अध्याय-2 : बीसवीं सदी में राजपूताना के प्रमुख एवं सक्षम राज्य

    अध्याय-2


    बीसवीं सदी में राजपूताना के प्रमुख एवं सक्षम राज्य

    ऐतिहासिक परम्परा, राज्यों में अग्रता क्रम, आकार और वर्तमान में महत्त्व की दृष्टि से बीकानेर भी उदयपुर, जोधपुर और जयपुर की तरह राजपूताना का प्रमुख राज्य है।


    - वायसराय विलिंगडन।

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    बीसवीं सदी में राजपूताना के प्रमुख राज्य


    बीसवीं सदी के आरम्भ में, राजपूताना में जैसलमेर, जोधपुर, बीकानेर, जयपुर, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, बूंदी, कोटा, झालावाड़, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, सिरोही, किशनगढ़, शाहपुरा तथा टोंक को मिलाकर कुल 19 प्रमुख राज्य थे। ये सैल्यूट स्टेट्स कहलाते थे अर्थात् इन राज्यों के शासकों को ब्रिटिश सरकार से तोपों की सलामियां प्राप्त करने का अधिकार था। राजपूताना के तीन ठिकाने लावा, कुशलगढ़ तथा नीमराणा नॉन सैल्यूट स्टेट कहलाते थे। इनके अतिरिक्त राजपूताना के मध्य में एक ब्रिटिश शासित प्रदेश (अजमेर-मेरवाड़ा) भी था। उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ एवं शाहपुरा राज्यों पर गुहिलोत शासकों का; बूंदी, कोटा एवं सिरोही पर चौहानों का; जैसलमेर एवं करौली पर यादवों का; जयपुर एवं अलवर पर कच्छवाहों का; जोधपुर, बीकानेर एवं किशनगढ़ पर राठौड़ों का; भरतपुर तथा धौलपुर पर जाट राजाओं का; झालावाड़ पर झाला शासक का तथा टोंक पर मुस्लिम शासक का शासन था।

    तोपों की सलामी के अनुसार राज्यों की हैसियत

    ब्रिटिश सरकार की ओर से विभिन्न राज्यों के शासकों को तोपों की सलामी दी जाती थी जिनकी संख्या 9 से 21 तक निश्चित की गयी थी। तोपें उस समय दागी जाती थीं जब कोई राजा-महाराजा वायसराय से भेंट करने आता था। राज्यों में शासक या युवराज के जन्मदिन अथवा रियासती दरबार के अवसर पर तोपों की सलामी का प्रचलन था। लगभग 200 भारतीय शासक ऐसे थे जिन्हें तोपों की सलामियां प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। तोपों की सलामी की संख्या राजाओं के बीच कई बार विवाद का विषय बनीं क्योंकि इससे राज्यों की प्रमुखता का अहसास होता था। नरेंद्र मण्डल में प्रवेश के अधिकार को लेकर भी तोपों द्वारा दी जाने वाली संख्या के आधार पर बखेड़ा खड़ा किया गया।

    इस पर 20 जनवरी 1919 को वायसराय चैम्सफोर्ड ने राज्यों के सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा- 'मेरी और मिस्टर मॉण्टेग्यू की राय में सलामियों का पूरा सवाल बड़ी सावधानी से समझने और जांचने की आवश्यकता है, क्योंकि उसमें विषमतायें हैं। हमने तय किया है कि सलामियों की सूची जैसी बनी हुई है उसकी बुनियाद पर अधिक प्रभावशाली राज्यों और शेष राज्यों में कोई मौलिक अंतर मानना बड़ी नासमझी होगी।'

    3 नवम्बर 1919 को राज्यों के सम्मेलन में वायसराय चैम्सफोर्ड ने फिर कहा- 'मैं और मिस्टर मॉण्टेग्यू दोनों अनुभव करते हैं कि कुछ विषमताओं के कारण सलामियों का विषय जांचने योग्य है। अगर वह सिद्धांत जिसका मैं पक्ष करता हूँ, राज्यों के वर्गीकरण के लिये अपना लिया जाये तो वह और भी वांछनीय हो जायेगा कि शीघ्र से शीघ्र सलामियों के प्रश्न की जांच की जाये जिससे उसकी वर्तमान विषमताओं का निराकरण हो सके। मेरी सरकार इस विषय पर पूरा ध्यान देने और विचार करने को तैयार है और इस सम्बन्ध में राज्य सचिव को आवश्यक संस्तुतियां भेजेगी जो यथा अवसर सम्राट को प्रस्तुत की जायेंगी।'

    सक्षम राज्य की अवधारणा का विकास

    ई.1939 में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के लुधियाना अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसके अनुसार राज्यों के पृथक अस्तित्व हेतु आवश्यक सक्षमता के मानदण्ड के रूप में 20 लाख जनसंख्या और 50 लाख आय का होना आवश्यक समझा गया। इन राज्यों को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की सिफारिश की गयी। 6 अगस्त से 8 अगस्त 1945 के मध्य, अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की स्थायी समिति ने श्रीनगर की बैठक में, लुधियाना अधिवेशन में पारित प्रस्ताव की पुष्टि करते हुए निर्णय लिया कि उन समस्त छोटे राज्यों को जिनकी जनसंख्या 20 लाख और आय 50 लाख से कम है, उन्हें या तो प्रांतों में मिल जाना चाहिए अथवा आपस में मिलकर बड़े संघ का निर्माण कर लेना चाहिये ताकि वे भारतीय संघ में एक प्रभावी इकाई के रूप में भाग ले सकें।

    31 दिसम्बर 1945 से 2 जनवरी 1946 तक पं. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद के उदयपुर अधिवेशन में राज्यों की सक्षमता के मापदण्ड पर विचार किया गया। 20 लाख जनसंख्या के स्थान पर 50 लाख जनसंख्या तथा 50 लाख वार्षिक आय के स्थान पर 5 करोड़ वार्षिक आय सम्बन्धी प्रस्ताव पर चर्चा हुई किंतु इस सम्बन्ध में कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। 18 व 19 सितम्बर 1946 को दिल्ली की बैठक में परिषद की स्थायी समिति ने राज्यों के स्वतंत्र इकाई रहने योग्य सक्षमता के लिये 50 लाख जनसंख्या और तीन करोड़ वार्षिक आय का होना आवश्यक बताया।

    अखिल भारतीय प्रजा परिषद की राजस्थान प्रांतीय शाखा की कार्यकारिणी ने 3 नवम्बर 1946 की बैठक में प्रस्ताव पारित किया कि राजस्थान की कोई भी रियासत आधुनिक प्रगतिशील राज्यों की श्रेणी में नहीं आंकी जा सकती। 16-17 नवम्बर 1946 को इसी समिति ने एक अन्य प्रस्ताव में भारतीय सरकार से अनुरोध किया कि वह राजस्थान के राज्यों के किसी भी संघ को यहाँ के लोकप्रिय प्रतिनिधियों का समर्थन प्राप्त करने के पश्चात् ही मान्यता प्रदान करे। इस सम्बन्ध में भारत सरकार ने घोषणा की कि स्वतंत्र भारत में 1 करोड़ वार्षिक आय और 10 लाख जनसंख्या वाली रियासत पृथक अस्तित्व रखने योग्य समझी जायेगी। इन्हें पूर्ण राज्य, (Viable States) तथा पूर्ण अधिकार प्राप्त रियासतें भी कहा गया। इस परिभाषा के अंतर्गत भारत के 18 राज्य आते थे- हैदराबाद, मैसूर, जम्मू एवं कश्मीर, त्रावणकोर, ग्वालियर, रीवां, इंदौर, जयपुर, बीकानेर, जोधपुर, भोपाल, बड़ौदा, पटियाला, कोल्हापुर, मयूरभंज, कूचबिहार, उदयपुर तथा कोचीन।

    राज्यों की जीव्यता (Viability) सम्बन्धी, रियासती मंत्रालय की भावना की पुष्टि 16 दिसम्बर 1947 को सरदार पटेल ने राज्यों के विलय तथा उनके एकीकरण और संगठन संबंधी विस्तृत व्याख्या में की। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रशासन के प्रजातांत्रिकीकरण के पश्चात् यह स्वाभाविक है कि छोटे-छोटे राज्य विकसित प्रशासन स्थापित करने में असमर्थ रहते हैं। इसलिए प्रशासन की इकाई काफी बड़ी होनी चाहिये जिससे वहाँ स्वायत्तता सफल हो सके। छोटे राज्यों के समक्ष विलीनीकरण के अतिरिक्त अन्य उपाय नहीं है।

    राजपूताना के सक्षम राज्य राजपूताना के केवल 4 राज्य- जोधपुर, जयपुर, बीकानेर तथा उदयपुर ही ऐसे थे जिनकी जनसंख्या 10 लाख से ऊपर थी तथा जिनका वार्षिक राजस्व एक करोड़ रुपये से अधिक था। इस दृष्टि से केवल यही चार राज्य पृथक इकाईयों के रूप में रह सकते थे।

    जोधपुर राज्य

    जोधपुर राज्य 24¤ 37' से लेकर 27¤ 42' उत्तरी अक्षांश तथा 70¤ 6' से लेकर 75¤ 22' पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित था। जोधपुर नगर, राज्य की राजधानी था और राज्य का सबसे बड़ा नगर भी। राज्य का क्षेत्रफल 36,071 वर्गमील था। क्षेत्रफल के आधार पर राजपूताना में यह पहले स्थान पर था जबकि जनसंख्या के आधार पर यह दूसरे स्थान पर आता था। जोधपुर राज्य की जनसंख्या वर्ष 1881 में 17,57,681, वर्ष 1891 में 25,28,178, वर्ष 1901 में 19,35,565, वर्ष 1931 में 21,26,000 तथा वर्ष 1941 में 25,55,904 थी। कुल जनसंख्या में 83 प्रतिशत हिंदू, 7 प्रतिशत जैन, 8 प्रतिशत मुस्लिम तथा 2 प्रतिशत अन्य मतों एवं सम्प्रदायों को मानने वाले थे। ई.1901 में जोधपुर राज्य में ईसाई धर्म को मानने वाले मात्र 224 व्यक्ति थे। राज्य की जनसंख्या में प्रमुख जातियों का प्रतिशत इस प्रकार से था- जाट 11 प्रतिशत, ब्राह्मण 10 प्रतिशत, राजपूत 9 प्रतिशत, महाजन 9 प्रतिशत, भांभी 7 प्रतिशत, रेबारी 3.5 प्रतिशत, माली 3 प्रतिशत, शेष जातियां 46.5 प्रतिशत।

    जोधपुर राज्य में कस्बों की संख्या 27 तथा गाँवों की संख्या 4,030 थी। राज्य का प्रशासन महकमा खास की सहायता से महाराजा द्वारा किया जाता था। महकमा खास में दो सदस्य होते थे। महाराजा की अनुपस्थिति एवं नाबालिगी में महकमा खास रेजीडेण्ट की देखरेख में कार्य करता था। राज्य 23 जिलों में विभक्त था जिन्हें हुकूमत कहते थे। इन पर हाकिम बैठते थे। राज्य के अपने कानून एवं विधान थे। राज्य में 41 दरबार कोर्ट तथा 44 जागीरदारी कोर्ट थे। राज्य का औसत वार्षिक राजस्व वर्ष 1901 में 55 से 56 लाख रुपये, वर्ष 1936 में 146 लाख रुपये तथा वर्ष 1945-46 में 216 लाख रुपये था।

    वर्ष 1901 में राज्य की प्रमुख मदों से आय इस प्रकार से थी, नमक से आय- 16.0 लाख रुपये, कस्टम- 10 से 11 लाख रुपये, भू राजस्व- 8 से 9 लाख रुपये, रेलवे- 8.0 लाख रुपये तथा जागीरदारों से करों की प्राप्तियां- 3.5 लाख रुपये थी। वर्ष 1901 में राज्य का कुल वार्षिक व्यय 36 लाख रुपये था जिसका मदवार विवरण इस प्रकार था- सेना एवं पुलिस पर व्यय- 7.75 लाख रुपये, सिविल एस्टाब्लिशमेंट पर व्यय- 4.0 लाख रुपये, सार्वजनिक कार्यों पर व्यय- 3 से 4 लाख रुपये, प्रिवी पर्स एवं महलों का व्यय- 3.0 लाख रुपये, केन्द्र सरकार को कर- 2.25 लाख रुपये तथा शेष अन्य व्यय।

    राज्य के 4,030 गाँवों में से 690 गाँव खालसा भूमि के अंतर्गत थे जो कि महाराजा के प्रत्यक्ष प्रबंधन में थे। खालसा भूमि में राज्य की 1/7 भूमि स्थित थी। शेष भूमि जागीरदारों भूमिया एवं इनामदारों में विभक्त थी। सामान्य जागीरदार वार्षिक सैन्य कर देते थे जो जागीर की कुल आय (रेख) का 8 प्रतिशत होता था। प्रति 1,000 की रेख पर एक घुड़सवार देना होता था। छोटे जागीरदारों को प्रति 500 रुपये एक पदाति सैनिक या प्रति 750 रुपये पर एक ऊंट सवार देना होता था। घुड़सवार के स्थान पर दरबार द्वारा निर्धारित राशि चुकानी होती थी। जागीरदार के उत्तराधिकारी को जागीरदार घोषित किये जाने पर जागीर को वार्षिक किराया मूल्य का 75 प्रतिशत हुक्मनामा अदा करना पड़ता था।

    ई.1908 तक राज्य में राजपूताना मालवा रेलवे की 114 मील रेलवे लाइन मौजूद थी जो राज्य के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित थी। राज्य की अपनी रेलवे भी थी जो मारवाड़ जंक्शन से लूनी तक जाती थी। एक रेल लाइन हैदराबाद से सिंध तक तथा दूसरी रेल लाइन जोधपुर शहर से उत्तर की ओर मेड़ता रोड एवं कुचामन तक जाकर राजपूताना मालवा रेलवे में मिल जाती थी। मेड़ता रोड से एक लाइन बीकानेर एवं भटिण्डा तक जाती थी। जोधपुर राज्य में लगभग 455 मील रेल लाइन थी जिसका पूंजीगत व्यय 122 लाख रुपये था। राज्य में 47 मील पक्की सड़कें तथा 108 मील कच्ची सड़कें थीं। इनका रख-रखाव राज्य करता था।

    राज्य में ई.1885-86 में इम्पीरियल पोस्टल सेवा आरंभ हुई तथा लगभग 100 ब्रिटिश पोस्ट ऑफिस एवं 5 तार घर खोले गये थे। राज्य के द्वारा 2 रेजीमेंटों का रख रखाव किया जाता था। एक रेजीमेंट में 605 सैनिक होते थे। स्थानीय सेना में 600 केवलरी (उँट सवारों सहित), 2400 इन्फैण्ट्री, 254 आर्टिलरी तथा 121 बंदूकें थीं। इनमें से 75 बंदूकें (45 फील्ड एवं 30 फोर्ट) काम में आने योग्य थीं। जागीरदारों द्वारा ई.1904-05 में दी गयी सेना इस प्रकार से थी- 1,785 माउण्टेड मैन तथा 234 इन्फैण्ट्री। राज्य में ई.1889-90 में इम्पीरियल सर्विस रेजीमेण्ट खड़ी की गयी थी जिसे सरदार रिसाला भी कहा जाता था। ई.1905 से इंसपैक्टर जनरल ऑफ पुलिस के नियंत्रण में पुलिस सेवा आरंभ की गयी जिसमें लगभग 1500 पुलिसकर्मी एवं अधिकारी थे। जोधपुर बीकानेर रेलवे के लिये एक छोटा पुलिस बल अलग से गठित किया गया था। साक्षरता में राजपूताना के 20 राज्यों एवं ठिकाणों में जोधपुर का स्थान दूसरा था। 1901 में राज्य में 5.4 प्रतिशत साक्षरता थी। राज्य की पुरुष साक्षरता दर 10 प्रतिशत तथा स्त्री साक्षरता दर मात्र 0.3 प्रतिशत थी।

    जोधपुर का 35वां राठौड़ शासक सरदारसिंह ई.1895 में 15 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठा। उसकी नाबालिगी के कारण शासन व्यवस्था रीजेंसी कौंसिल द्वारा की जाने लगी। महाराजा का चाचा सर प्रतापंसिंह रीजेंसी कौंसिल का अध्यक्ष बनाया गया। सरदारसिंह के गद्दी पर बैठने के 2 वर्ष बाद ही महारानी विक्टोरिया के शासन का हीरक जयंती उत्सव मनया गया। जोधपुर राज्य की ओर से सर प्रतापसिंह को इस उत्सव में भाग लेने के लिये लंदन भेजा गया। ई.1901 में सरदारसिंह ने लंदन जाकर ब्रिटिश सम्राट एडवर्ड सप्तम से भेंट की। राजपूताने के राजाओं में वह प्रथम था जो ब्रिटिश सम्राट से मिलने के लिये लंदन गया। ई.1908 में वायसराय मिंटो के जोधपुर आगमन पर उसका भव्य स्वागत किया गया। सरदारसिंह ने ई.1911 तक जोधपुर राज्य पर शासन किया। मात्र 31 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गयी।

    सरदारसिंह के बाद उसका नाबालिग पुत्र सुमेरसिंह मात्र 13 वर्ष की आयु में जोधपुर राज्य का शासक हुआ। उसके काल में भी सर प्रतापसिंह की अध्यक्षता में रीजेंसी कौंसिल बनायी गयी। उसके काल में प्रथम विश्वयुद्ध हुआ जिसमें जोधपुर राज्य ने ब्रिटिश शासन के प्रति पूर्ण स्वामिभक्ति का प्रदर्शन किया। जोधपुर राज्य की सेना- जोधपुर लांसर्स, प्रधानमंत्री सर प्रतापसिंह तथा महाराजा सुमेरसिंह, फ्रांस के मोर्चों पर लड़ने के लिये गये। सुमेरसिंह ने मात्र 7 वर्ष शासन किया। ई.1918 में सुमेरसिंह की मृत्यु हो गयी तथा उसका नाबालिग पुत्र उम्मेदसिंह मात्र 16 वर्ष की आयु में जोधपुर की गद्दी पर बैठा। राज्य के संचालन के लिये एक बार फिर रीजेंसी कौंसिल गठित की गयी तथा सर प्रतापसिंह को इस कौंसिल का अध्यक्ष बनाया गया।

    ई.1920 में वायसराय लॉर्ड चैम्सफोर्ड के जोधपुर आगमन पर उसका भारी स्वागत किया गया। ई.1920 में कांग्रेस ने राष्ट्रव्यापी असहयोग आंदोलन चलाया। जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री सर प्रतापसिंह ने ब्रिटिश सरकार को सलाह दी कि इस समस्या का सरल समाधान बंदूक की कुछ गोलियां ही हैं। जब असहयोग आंदोलन में ब्रिटिश भारत के नेता गोली, लाठी खा रहे थे तब जोधपुर राज्य ने ई.1921 में अपने विदेशी आकाओं को प्रसन्न करने के लिये प्रिंस ऑफ वेल्स (बाद में एडवर्ड अष्ठम्) के स्वागत में स्नानागार एवं शौचालय में उपयोग के लिये चांदी के शानदार फर्नीचर बनवाये। महाराजा उम्मेदसिंह के काल में मारवाड़ का चीफ मिनिस्टर सर डोनाल्ड फील्ड 'डीफैक्टो रूलर' था। ई.1923 में उम्मेदसिंह को जब शासनाधिकार दिये गये तो उस समय लॉर्ड रीडिंग स्वयं उपस्थित था लेकिन ये शक्तियां ब्रिटिश सरकार की सर्वोच्च सत्ता के अधीन थीं। रेजीडेण्ट स्वयं को मारवाड़ का एकमात्र अधिनायक नहीं तो तो संयुक्त शासक तो समझता ही था। इस प्रवृत्ति ने मारवाड़ के शासक की स्थिति घटाकर एक अधीनस्थ की कर दी थी। महाराजा का धैर्य भी चुक गया था क्योंकि हस्तक्षेप की नीति ने, महाराजा को जो भी थोड़ी बहुत स्वतंत्रता थी, उसे भी प्रतिबंधित कर दिया था।

    जयपुर राज्य

    जयपुर राज्य 25¤ 41' से लेकर 28¤ 34' उत्तरी अक्षांश तथा 74¤ 41' से लेकर 77¤ 13' पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित था। जयपुर नगर राज्य की राजधानी था और राज्य का सबसे बड़ा नगर भी। राज्य का क्षेत्रफल 15,610 वर्गमील था। क्षेत्रफल के आधार पर राजपूताना में यह तीसरे स्थान पर था जबकि जनसंख्या के आधार पर यह पहले स्थान पर आता था। जयपुर राज्य की जनसंख्या वर्ष 1881 में 25,27,142, वर्ष 1891 में 28,23,966, वर्ष 1901 में 26,58,666, वर्ष 1931 में 26,32,000, वर्ष 1941 में 30,40,876 थी। कुल जनसंख्या में लगभग 90 प्रतिशत हिंदू, 7 प्रतिशत मुस्लिम, 1.5 प्रतिशत जैन तथा 1.5 प्रतिशत अन्य मतों एवं सम्प्रदायों को मानने वाले लोग रहते थे। ई.1901 में जयपुर राज्य में ईसाई धर्म को मानने वाले मात्र 364 व्यक्ति थे। राज्य की जनसंख्या में प्रमुख जातियों का प्रतिशत इस प्रकार से था- ब्राह्मण 13 प्रतिशत, जाट 10 प्रतिशत, मीणा 9 प्रतिशत, चमार 8 प्रतिशत, महाजन 8 प्रतिशत, गूजर 7 प्रतिशत, राजपूत 4.5 प्रतिशत, माली 4 प्रतिशत।

    राज्य का औसत वार्षिक राजस्व वर्ष 1901 में 65 लाख रुपये, वर्ष 1936 में 125 लाख रुपये तथा वर्ष 1945-46 में 280.5 लाख रुपये था। वर्ष 1901 में राज्य की विभिन्न मदों से आय इस प्रकार से थी- भू राजस्व- 42.0 लाख रुपये, कस्टम- 9.0 लाख रुपये, नमक संधि से राजस्व प्राप्ति- 7.5 लाख रुपये तथा जागीरदारों से करों की प्राप्तियां- 4.0 लाख रुपये। वर्ष 1901 में राज्य का कुल वार्षिक व्यय 59 लाख रुपये था जिसका मदवार विवरण इस प्रकार था- सिविल एवं ज्यूडिशियरी स्टाफ, सेना, इम्पीरियल सर्विस ट्रांसपोर्ट कोर- 10.0 लाख रुपये, सार्वजनिक कार्यों पर व्यय- 7.0 लाख रुपये, केन्द्र सरकार को कर- 4.0 लाख रुपये, पुलिस पर व्यय- 2.4 लाख रुपये, प्रिवीपर्स, महलों, दान एवं शिक्षा आदि पर व्यय- 84 हजार रुपये, चिकित्सा संस्थान एवं टीकाकरण- 70 हजार रुपये। राज्य पर किसी तरह का कर्ज नहीं था। ई.1905 तक राज्य में राजपूताना मालवा रेलवे की लम्बाई 243 मील थी। जयपुर राज्य द्वारा जयपुर से सवाईमाधोपुर तक 73 मील की लम्बाई में राज्य की रेल लाइन बनावाई गयी थी। राज्य में स्थानीय पोस्ट ऑफिसों की संख्या 86 तथा ब्रिटिश पोस्ट ऑफिसों की संख्या 34 थी। रेलवे स्टेशनों पर स्थित तारघरों के अतिरिक्त राज्य में 14 तारघर बन गये थे। डाक लाने ले जाने के लिये ऊँटों तथा धावकों की सेवाएं भी ली जाती थीं।

    जयपुर नरेश सवाई माधोसिंह (1880-1922) अशिक्षित तथा अत्यंत पुरातन विचारों का स्वामी था। ई.1902 में उसने सम्राट एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण में भाग लेने के लिये लंदन की यात्रा की। अंग्रेज अधिकारी उसे बहुत पसंद करते थे क्योंकि उसने अपनी ओर से अंग्रेजों के लिये कोई कठिनाई पैदा नहीं की। माधोसिंह ने प्रथम विश्व युद्ध के लिये राज्य तथा राजा की ओर से पंद्रह लाख रुपये युद्ध कोष में भिजवाये। इतनी ही राशि उसने अपने सरदारों और अधिकारियों से जुटा कर भिजवायी।

    बीकानेर राज्य

    बीकानेर राज्य 27¤ 12' से लेकर 30¤ 12' उत्तरी अक्षांश तथा 72¤ 12' से लेकर 75¤ 41' पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित था। बीकानेर नगर राज्य की राजधानी था और राज्य का सबसे बड़ा नगर भी। राज्य का क्षेत्रफल 23,311 वर्गमील था। क्षेत्रफल के आधार पर राजपूताना में यह दूसरे स्थान पर था जबकि जनसंख्या के आधार पर यह चौथे स्थान पर आता था। बीकानेर राज्य की जनसंख्या वर्ष 1881 में 5,09,021, वर्ष 1891 में 8,31,955, वर्ष 1901 में 5,84,627, वर्ष 1931 में 9,36,000 तथा वर्ष 1941 में 19,92,938 थी। कुल जनसंख्या में 84 प्रतिशत हिंदू, 11 प्रतिशत मुस्लिम, 4 प्रतिशत जैन तथा 1 प्रतिशत अन्य मतों एवं सम्प्रदायों को मानने वाले थे। राज्य की जनसंख्या में प्रमुख जातियों का प्रतिशत इस प्रकार से था- जाट 22 प्रतिशत, ब्राह्मण 11 प्रतिशत, चमार 10 प्रतिशत, महाजन 9.5 प्रतिशत, राजपूत 9 प्रतिशत तथा राठ (आदिवासी) 3 प्रतिशत।

    बीकानेर राज्य में कस्बों की संख्या 9 तथा गाँवों की संख्या 2,101 थी। प्रशानिक दृष्टि से राज्य को चार जिलों में बांटा गया था जिन्हें निजामत कहते थे। इन पर नाजिम बैठते थे। निजामतों को 11 तहसीलों में बांटा गया था जिन पर तहसीलदार बैठते थे। 7 उप तहसीलें थीं जिन पर नायब तहसीलदार बैठते थे। महाराजा पाँच सचिवों की परिषद की सहायता से राज्य का शासन करते थे। राज्य के अपने कानून थे जो ब्रिटिश भारत के कानूनों के आधार पर बनाये गये थे। वर्ष 1897 से राज्य में इण्डियन पीनल कोड तथा क्रिमिनल प्रोसीजर कोड भी प्रचलन में आ गये थे। नायब तहसीलदार तृतीय श्रेणी मजिस्ट्रेट होता था जो तीन सौ रुपये मूल्य तक के दीवानी मुकदमे सुन सकता था। तहसीलदार द्वितीय श्रेणी मजिस्ट्रेट थे जो 500 रुपये मूल्य तक के मुकदमों की सुनवाई कर सकते थे।

    नाजिम प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट होते थे जो नीचे की अदालतों के दीवानी एवं फौजदारी मुकदमों के फैसलों के विरुद्ध अपील सुन सकते थे तथा 10,000 रुपये तक के मुकदमों में अपना निर्णय दे सकते थे। नाजिम के फैसलों के विरुद्ध अपील कोर्ट में सुनवाई होती थी। अपील कोर्ट दीवानी मुकदमों में पूर्णतः निर्णय देने में सक्षम थी तथा फौजदारी मामलों में 10 वर्ष तक की सजा सुना सकती थी। हत्या के मामले महाराजा तक भेजे जाते थे जिन्हें मृत्यु दण्ड देने का अधिकार था। राजधानी बीकानेर तथा नोहर में ऑनरेरी मजिस्ट्रेट कोर्ट थे। राजधानी में मुंसिफ कोर्ट भी था। ऑनरेरी द्वितीय श्रेणी का मजिस्ट्रेट था जो छोटी राशि की अचल सम्पत्ति के प्रकरण सुनता था। मुंसिफ को 500 रुपये के मूल्य तक के मुकदमे सुनने के अधिकार थे।

    राज्य का औसत वार्षिक राजस्व वर्ष 1901 में 26 लाख रुपये, वर्ष 1936 में 119 लाख रुपये तथा वर्ष 1945-46 में 240 लाख रुपये था। वर्ष 1901 में राज्य की विभिन्न मदों से आय इस प्रकार से थी- भू राजस्व- 6.7 लाख रुपये, कस्टम- 6.0 लाख रुपये, रेलवे- 6.0 लाख रुपये, न्यायिक- 1.4 लाख रुपये, खनिज-1.5 लाख रुपये तथा जागीरदारों से करों की प्राप्तियां- 3.0 लाख रुपये। वर्ष 1901 में राज्य का कुल वार्षिक व्यय 21 लाख रुपये था जिसका मदवार विवरण इस प्रकार था- प्रिवी पर्स एवं महलों का व्यय- 3.4 लाख रुपये, प्रशासनिक स्टाफ पर व्यय- 2.4 लाख रुपये, रेलवे पर व्यय- 2.6 लाख रुपये, सेना पर व्यय- 2.4 लाख रुपये, सार्वजनिक कार्यों पर व्यय- 2.0 लाख रुपये, पुलिस पर व्यय- 1.1 लाख रुपये, चिकित्सा विभाग एवं नगरपालिकाएं- 75 हजार रुपये, कस्टम- 50 हजार रुपये। राज्य पर किसी प्रकार का कोई कर्ज नहीं था।

    राज्य में दो प्रकार के काश्तकार थे- खालसा अर्थात् वह भूमि जो महाराजा के प्रत्यक्ष प्रबंधन के अंतर्गत थी। इन पर अनुदानग्राही द्वारा काश्त की जाती थी। भूमि का वास्तविक स्वामी महाराजा था तथा काश्तकार तभी तक उस पर बना रह सकता था जब तक कि वह राजस्व मांग की आपूर्ति करता था। कुछ अनुदानग्राहियों को वार्षिक कर चुकाने से मुक्ति थी। शेष लोगों को निर्धारित वार्षिक शुल्क या सेवा चुकानी पड़ती थी। जागीरदार तथा पट्टेदार जो पहले सैनिक टुकड़ी से दरबार की सेवा करते थे, अब निश्चित रकम प्रदान करते थे जो सामान्यतः जागीर की आय का 1/3 हिस्सा थी। जागीरदारी प्राप्त करने पर एक वर्ष की आय नजराने के रूप में चुकानी पड़ती थी। महाराजा के सिंहासन पर बैठने या उनके विवाह के अवसर पर भी नजराना चुकाया जाता था। जागीरदार का बेटा ही जागीरदार बनता था। राज्य के विरुद्ध अपराध करने पर जागीर छीन ली जाती थी।

    राज्य द्वारा इम्पीरियल सर्विस केमल कोर का रख रखाव किया जाता था जिसमें 500 मजबूत ऊँट सवार थे तथा एक अस्थायी सेना होती थी जिसमें 380 कैवलरी, 500 इन्फैण्ट्री तथा 38 आर्टिलरीमैन होते थे। राज्य के पास 94 बंदूकें भी थीं। जिनमें से 33 सेवा योग्य थीं। राज्य के पुलिस बल में कुल 900 पुलिस कर्मी थे जो जनरल सुपरिंटेंडेण्ट के अधीन थे। राज्य में कुल 70 पुलिस स्टेशन थे। राजपूताने के बीस राज्यों एवं ठिकानों में से बीकानेर साक्षरता के मामले में 13वें स्थान पर था। इसकी कुल साक्षरता दर 2.5 प्रतिशत, पुरुष साक्षरता दर 4.7 प्रतिशत तथा महिला साक्षरता दर 0.2 प्रतिशत थी।

    बीकानेर महाराजा गंगासिंह (अगस्त 1887-फरवरी 1943) की छवि राष्ट्रीय स्तर पर अद्भुत राजा की थी। एक अवसर पर गांधीजी ने कहा कि बीकानेर राज्य में सांप्रदायिक सद्भाव श्रेष्ठतम स्तर पर है और राज्य का शासन प्रबंध बहुत अच्छा है अतः मेरी इच्छा होती है कि मैं भी बीकानेर जाकर रहूँ। राज्य के आंतरिक प्रशासन में ब्रिटिश हस्तक्षेप को लेकर महाराजा गंगासिंह का ब्रिटिश अधिकारियों के साथ कई बार विवाद हुआ। राज्य के जागीरदारों को राज्य से बाहर जाने के लिये पोलिटिकल एजेंटों से अनुमति लेनी पड़ती थी। यदि महाराजा किसी जागीरदार को राज्य से बाहर जाने के लिये रोकना चाहता तो वह भी जागीरदार को सीधे आदेश देने के बजाय पोलिटिकल एजेंट के माध्यम से ही कह सकता था। दिसम्बर 1899 में महाराजा गंगासिंह ने अपने जागीरदार भैंरूसिंह को राज्य से बाहर जाने से रोकने के लिये पोलिटिकल एजेंट को पत्र लिखा कि चूंकि जागीरदार के विरुद्ध जांच चल रही है इसलिये उसे राज्य से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जाये।

    अंग्रेजों द्वारा आंतरिक शासन में दिन प्रतिदिन हस्तक्षेप बढ़ाते जाने पर भी इन राजाओं ने अंग्रेजी सत्ता को रक्षा कवच की तरह ओढ़ लिया था और भारत में अंग्रेजी शासन को बनाये रखने के लिये वे सब कुछ करने को तत्पर थे। जब इंगलैण्ड चीन के साथ युद्ध में फंस गया तो राजपूताना के राजाओं ने अंग्रेजों को तन मन और धन से सहायता देने के लिये अपनी ओर से बढ़ चढ़ कर प्रस्ताव भिजवाये। राजाओं ने यह भी नहीं देखा कि उस समय राजपूताने में भयानक अकाल था। 5 नवम्बर 1900 को कप्तान बेली द्वारा महाराजा गंगासिंह को लिखे गये एक पत्र से इस स्थिति को बेहतर समझा जा सकता है।

    बेली ने लिखा- 'सर डब्लू. कनिंघम ने आशा जताई है कि यह जानकर आपका दुःख हलका हो जायेगा कि एक ऐसे गहन दुर्भिक्ष तथा संकट के समय में, जैसा कि इस समय राजपूताने में विद्यमान है, एक नरेश साम्राज्ञी के शत्रुओं के विरुद्ध समरभूमि में अपनी व्यक्तिगत सेवा से भी अधिक अपने निजी, राज्य तथा प्रजा के हितों की देखभाल करके साम्राज्ञी को अधिक मूल्यवान सेवायें अर्पित कर सकता है।' इस इन्कार के बावजूद महाराजा ने अंग्रेज सरकार से स्वीकृति प्राप्त की और वह अपनी जनता को अकाल में तड़पता हुआ छोड़कर युद्ध में भाग लेने के लिये चीन गया। ई.1900 में पोलिटिकल एजेंट कप्तान एस. एफ. बेली हनुमानगढ़ जिले में भ्रमण के लिये आया। उस समय बीकानेर राज्य में शिकार पर प्रतिबंध था तथा बिना अनुज्ञा पत्र लिये किसी भी पशु-पक्षी का शिकार नहीं किया जा सकता था। अतः महाराजा गंगासिंह ने कप्तान बेली को शिकार खेलने का अनुज्ञा पत्र (लाइसेंस) भिजवा दिया ताकि यदि बेली शिकार खेले तो किसी अप्रिय स्थिति का सामना नहीं करना पड़े। बेली ने महाराजा गंगासिंह को लिखा- 'आपके द्वारा शिकार खेलने का अनुज्ञा पत्र पाकर मेरा बड़ा मनोरंजन हुआ। मैं इस अनुज्ञा पत्र को फ्रेम में मंढ़वा कर रखूंगा तथा अपने साथियों को भी दिखाऊंगा कि बीकानेर इतना उन्नत राज्य है जहाँ पोलिटिकल एजेंट भी बिना लाइसेंस के शिकार नहीं खेल सकते। 

    ई.1904 में बीकानेर नरेश गंगासिंह ने अपने जागीरदारों- बीदासर के हुकुमसिंह, अजीतपुरा के भैरूंसिंह तथा गोपालपुरा के ठाकुर रामसिंह को गैर कानूनी रूप से सभायें आयोजित करने का दोषी पाया और उनके विरुद्ध प्रशासनिक कार्यवाही करनी चाही तो ये ठाकुर लॉर्ड कर्जन की शरण में चले गये। कर्जन ने ए.जी.जी. से रिपोर्ट मांगी तथा महाराजा को आदेश दिया कि वे अपने निर्देश बदल दें। ई.1910 में गंगासिंह ने स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना की। राजपूताना में यह प्रथम राज्य था जिसने कार्यपालिका से न्यायपालिका को अलग करने का कदम उठाया। ई.1911 में जब लॉर्ड हार्डिंग द्वारा जार्ज पंचम के राज्यारोहण का समारोह आयोजित किया गया तो बीकानेर नरेश गंगासिंह के पुत्र शार्दूलसिंह ने अंग्रेज सम्राट के बाल-भृत्य के रूप में काम किया।

    ई.1912 में महाराजा गंगासिंह ने बीकानेर राज्य में प्रतिनिधि सभा की स्थापना की घोषणा कर अगले वर्ष उसके प्रथम अधिवेशन का उद्घाटन किया। उत्तरी भारत के राज्यों में तब अपने ढंग की यह एकमात्र संस्था थी। ई.1913 में गंगासिंह ने बीकानेर राज्य के लिये प्रतिनिधि सभा का गठन किया। उस समय इसमें कुल 35 सदस्य थे। ई.1917 में इसे विधानसभा का नाम दिया गया। महाराजा गंगासिंह प्रथम भारतीय नरेश थे जिन्होंने अलग से प्रिवीपर्स तथा सिविल लिस्ट पद्धति चालू की। प्रिवीपर्स की रकम राज्य की सामान्य आमदनी का पाँच प्रतिशत निश्चित की गई। रीजेंसी कौंसिल के समय में उर्दू को बीकानेर रियासत की सरकारी भाषा बना दिया गया था। ई.1912 में महाराजा ने अपने शासन की रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में पुनः हिन्दी को सरकारी कामकाज की भाषा बना दिया। यह आदेश ई.1914 में पूर्ण रूप से लागू हुआ।

    प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1919) में बीकानेर राज्य ने बीकानेर राज्य की सेना- गंगा रिसाला; स्वेज नहर, इजिप्ट, पर्सिया एवं इराक के मोर्चे पर लड़ने के लिये भेजा। बीकानेर नरेश गंगासिंह का साम्राज्यिक सरकार पर अच्छा प्रभाव था। ब्रिटिश साम्राज्य की पहली युद्ध परिषद तथा बाद में वर्साइ की संधि में भारतीय नरेशों के प्रतिनिधि के रूप में महाराजा गंगासिंह भी सम्मिलित हुए। प्रथम विश्वयुद्ध में देशी नरेशों ने अंग्रेजों का पूरा साथ दिया था जिसके बदले में राजा लोग पुरस्कार चाहते थे। राजाओं के सहयोग को देखते हुए ब्रिटिश सरकार द्वारा साम्राज्य परिषद का गठन किया गया। इसके माध्यम से आंग्ल शासन भारतीयों को यह प्रतीत कराने के लिये आतुर था कि वह भारतीयों को साम्राज्य से सम्बन्ध रखने वाले विषयों में सहकारी बनाने का अभिलाषी है। ई.1916 में निर्णय लिया गया कि अधिराज्य तथा उपनिवेशों पर शासन करने वाले राज्य के बीच घनिष्ठ साहचर्य अपेक्षित है। ई.1917 में लन्दन में एक साम्राज्यिक सम्मेलन बुलाया गया जिसमें सम्मिलित होने के लिये तीन भारतीय प्रतिनिधियों- बीकानेर नरेश गंगासिंह, सर जेम्स मेस्टन तथा सर एस. पी. सिन्हा को मनोनीत किया गया। महाराजा गंगासिंह के लंदन रवाना होने से पूर्व उनके सम्मान में भारतीय नरेशों द्वारा बम्बई के ताज होटल में भोज दिया गया।

    इस अवसर पर महाराजा गंगासिंह ने अपने भाषण में कहा- 'आप लोग चाहे आंग्ल भारत के राज्य क्षेत्रों से आये हैं या भारतीय राज्यों के शासन क्षेत्रों से, आप सब लोग भारतीय हैं जो अपने सम्राट के प्रति निष्ठा तथा अनुरक्ति में अपने मूल राज्य के प्रति अनुराग में तथा भारत के समस्त धर्म, मतों एवं संप्रदायों के अपने भ्रातृगण के प्रति अपनी अगाध एवं अकृत्रिम उत्सुकता में पूर्ण रूपेण एकीकृत हैं।' उन्होंने विश्वास प्रकट किया कि युद्ध के समाप्त होने पर भारत के सम्बन्ध में दृष्टिकोण को प्रत्येक उचित व परिपक्व राजनीतिक सुधार के अनुकूल और भी अधिक परिवर्तित कर दिया जायेगा तथा ब्रिटेन के मार्ग प्रदर्शन एवं संरक्षण में अपने भाग्य का निर्माण करने की भारत की न्याय पूर्ण अभ्यर्थनाओं एवं महत्वाकांक्षाओं को भुलाया नहीं जायेगा।

    महाराजा गंगासिंह का यह भाषण भारतीय एकता एवं राष्ट्रीयता की भावना के विकास में एक महत्त्वपूर्ण अवस्था का सूचक था। उन्होंने उस पारस्परिक अविश्वास के आवरण को नष्ट कर दिया जो अब तक आंग्ल भारत तथा देशी राज्यों के बीच सहभावना के स्वतंत्र प्रवाह को रोक रहा था। उन्होंने तत्कालीन भारत के जीवन पर प्रकाश डाला, राजा एवं कृषक, शिक्षित एवं अशिक्षित को सहयोगार्थ प्रेरित किया तथा एक नवीन चेतना प्रदर्शित की जिसने आंग्ल सम्राट के अधीन भारत को आंग्ल साम्राज्य की एक शोभा बना देने वाले एक पूरिपूर्ण जीवन के लिये उत्कण्ठित भारत के सदस्य की गहराइयों को आंदोलित कर दिया।

    24 अप्रेल 1917 को एम्पायर पार्लियामेंटरी एसोसिएशन द्वारा हाउस ऑफ कॉमन्स हाइकोर्ट रूम में आयोजित एक मध्याह्न भोज में गंगासिंह ने अपने भाषण में कहा- 'जहाँ तक भारत के देशी राज्यों का सम्बन्ध है, कुछ निवेशों में किये जाने वाले विश्वास के विपरीत, नरेश वास्तव में इस प्रकार की प्रगति पर हर्ष का अनुभव करेंगे तथा किसी भी राजनैतिक उन्नति पर कदापि आक्रोश नहीं करेंगे।' 10 मई 1917 को टाइम्स को दी गयी एक भेंटवार्त्ता में महाराजा ने कहा- 'आंग्ल भारत में किसी प्रकार की राजनीतिक प्रगति से राजा लोग अप्रसन्न होंगे, आलोचकों के हृदय से राजाओं के प्रति इस प्रकार की प्रत्येक भ्रांत धारणा एवं निराधार संदेह को दूर करने के अपने प्रयास को उन्होंने दोहराया। उन्होंने दृढ़ता पूर्वक कहा कि ठीक इसके विपरीत भारत को आंग्ल ध्वजा के नीचे संवैधानिक प्रणाली से राजनीतिक प्रगति करते देखकर नरेश लोग अत्यंत आनंदित होंगे। '

    ई.1920 में बीकानेर राज्य में सहकारी समिति कानून पास किया गया तथा राज्य की पहली सहकारी समिति ने काम करना आरंभ कर दिया। अक्टूबर 1930 के अंत तक राज्य में ऐसी 89 सहकारी समितियां काम कर रही थीं। किसानों की समस्याओं के निराकरण के लिये महाराजा गंगासिंह ने ई.1921 में जमींदार बोर्ड की स्थापना की। जब गंगानगर एक अलग प्रशासनिक डिवीजन बन गया तो ई.1929 में इन बोर्डों की संख्या बढ़ाकर दो कर दी गई।

    ई.1928 में महाराजा ने ग्राम पंचायतों को दीवानी, फौजदारी और प्रबंध सम्बन्धी निश्चित अधिकार प्रदान कर दिये। ई.1937 में महाराजा ने अपने राज्य में म्युनिसिपल बोर्ड और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड स्थापित किये। नगर पालिकाओं को अधिक अधिकार और स्वतंत्रता दी गई। महाराजा गंगासिंह ने राज्य में अनेक स्कूल और कॉलेज खोले और कन्या पाठशालायें बनवाईं। बीकानेर नगर में स्त्री और पुरुषों के लिये अलग-अलग अस्पताल खुलवाये और बड़े कस्बों में भी अस्पताल खुलवाये। उनके समय में बीकानेर का प्रिंस विजयसिंह मेमोरियल जनाना और मर्दाना अस्पताल उत्तरी भारत के प्रमुख अस्पतालों में से एक था।

    आधुनिक विचारधारा का राजा होते हुए भी गंगासिंह ने राजनैतिक आंदोलनों को बुरी तरह से कुचला। एक सुयोग्य, दूरदर्शी एवं अनुभवी शासक होते हुए भी तब महाराजा गंगासिंह समय की गति तथा उसकी द्रुत परिवर्तनशीलता को ठीक तरह नहीं समझ रहा था। उसने अपने शासनकाल की प्रारंभिक दूरदर्शिता इस समय नहीं दिखाई और दमनपूर्ण सुदृढ़ शासन की नीति को ही अपनाया। बीकानेर में राजनैतिक जागृति का आरंभ 1920 ईस्वी के लगभग हुआ। इस रियासत में जनता को अपने विचार प्रकट करने की कम ही स्वतंत्रता थी। अपने मौलिक अधिकारों की मांग करना यहाँ अपराध माना जाता था। राज्य का विरोध करने वालों को नमकहराम माना जाता था। कोई भी प्रतिष्ठित व्यक्ति राजनीति में भाग लेना अपनी मर्यादा व प्रतिष्ठा के विरुद्ध समझता था। भले घरों के लोग राजनीति को घटिया कृत्य व सड़कों पर नारेबाजी को घृणा की दृष्टि से देखते थे। बीकानेर के परलोकवासी महाराजा गंगासिंहजी ने इस युग में भी अपनी पुरानी दंड व भेद नीति से ही काम लिया।

    उदयपुर राज्य

    उदयपुर राज्य 23¤ 49' से लेकर 25¤ 58' उत्तरी अक्षांश तथा 73¤ 1' से लेकर 75¤ 49' पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित था। उदयपुर नगर राज्य की राजधानी था और राज्य का सबसे बड़ा नगर भी। राज्य का क्षेत्रफल 12,691 वर्गमील था। क्षेत्रफल के आधार पर राजपूताना में यह चौथे स्थान पर था जबकि जनसंख्या के आधार पर यह तीसरे स्थान पर आता था। उदयपुर राज्य की जनसंख्या वर्ष 1881 में 14,94,220, वर्ष 1891 में 18,45,008, वर्ष 1901 में 10,18,805, वर्ष 1931 में 15,67,000 तथा वर्ष 1941 में 19,26,698 थी। कुल जनसंख्या में 77 प्रतिशत हिंदू, 6 प्रतिशत जैन, 4 प्रतिशत मुस्लिम तथा 13 प्रतिशत अन्य मतों एवं सम्प्रदायों को मानने वाले लोग रहते थे। ई.1901 में उदयपुर राज्य में ईसाई धर्म को मानने वाले मात्र 184 व्यक्ति थे। राज्य की जनसंख्या में प्रमुख जातियों का प्रतिशत इस प्रकार से था- 12 प्रतिशत भील, 9 प्रतिशत महाजन, 9 प्रतिशत ब्राह्मण, 9 प्रतिशत राजपूत, 6 प्रतिशत जाट, 5 प्रतिशत गूजर तथा 4 प्रतिशत बलाई।

    उदयपुर राज्य में कस्बों की संख्या 14 तथा गाँवों की संख्या 6,030 थी। राज्य का प्रशासन महकमा खास की सहायता से महाराणा द्वारा किया जाता था। महकमा खास में दो मंत्री होते थे। राज्य को 11 जिलों तथा 6 परगनों में विभक्त किया गया था जिन पर हाकिम बैठते थे। प्रत्येक जिले को 2 या अधिक उपखण्डों में विभक्त किया गया था जिन पर नायब हाकिम का नियंत्रण रहता था। राज्य के दीवानी एवं फौजदारी न्यायालयों में ब्रिटिश भारत के कानून, हिन्दू लॉ तथा स्थानीय परम्पराओं पर आधारित कानून चलते थे। हाकिमों को 5,000 तक के दीवानी मुकदमे सुनने का अधिकार था और वे एक साल तक की कैद की सजा सुना सकते थे। उनके फैसलों के विरुद्ध राजधानी के मुख्य दीवानी न्यायालय (चीफ सिविल कोर्ट) या मुख्य फौजदारी न्यायालय (चीफ क्रिमिनल कोर्ट) में अपील की जा सकती थी। दीवानी न्यायालय 10 हजार रुपयों तक के मुकदमे सुन सकता था। फौजदारी न्यायालय को 3 साल तक की कैद तथा 1000 रुपये का जुर्माना करने के अधिकार थे। इसके ऊपर महेंद्राज सभा थी जिसमें 8 सदस्य थे। यह मुख्य न्यायालयों के मुकदमे सुन सकती थी जो 15 हजार रुपये तक की कीमत के हों। उनमें 7 साल की सजा तथा 5 हजार रुपये तक का जुर्माना कर सकती थी। जब इस न्यायालय की अध्यक्षता महाराणा करते थे तब इसे इजलास कामिल कहते थे। यह राज्य की सबसे बड़ी कोर्ट थी।

    राज्य का औसत वार्षिक राजस्व वर्ष 1901 में 26.5 लाख रुपये, वर्ष 1936 में 66 लाख रुपये, वर्ष 1945-46 में 130 लाख रुपये था। वर्ष 1901 में राज्य की विभिन्न मदों से आय इस प्रकार से थी- भू राजस्व- 13.6 लाख रुपये, कस्टम- 7.2 लाख रुपये, रेलवे- 2.0 लाख रुपये तथा जागीरदारों से करों की प्राप्तियां- 1.3 लाख रुपये। वर्ष 1901 में राज्य का कुल वार्षिक व्यय 26 लाख रुपये था जिसका मदवार विवरण इस प्रकार था- सेना एवं पुलिस पर व्यय- 7.0 लाख रुपये, प्रिवी पर्स एवं महलों का व्यय- 4.0 लाख रुपये, सिविल एवं ज्यूडिशियरी स्टाफ- 3.2 लाख रुपये, केन्द्र सरकार को कर- 2.0 लाख रुपये तथा सार्वजनिक कार्यों पर व्यय- 1.8 लाख रुपये।

    राज्य की भूमि 13.5 भागों में बंटी हुई थी जिसमें से 7 भाग जागीर या भूम में, 3 सासन में तथा 3.5 खालसा के अंतर्गत थी। राजपूत जागीरदार, महाराणा को कर के रूप में छटूंद अर्थात् जागीर की वार्षिक आय का 1/6 भाग देते थे। जागीरदार की मृत्यु हो जाने पर उसकी जागीर खालसा में मिला ली जाती थी। महाराणा मृत जागीरदार के पुत्र या उत्तराधिकारी को नये सिरे से जागीर प्रदान करते थे। उस समय नया पट्टा जारी किया जाता था। राजपूत जागीरदारों के अतिरिक्त अन्य जागीरदार छटूंद के स्थान पर महाराणा के बुलाये जाने पर सेवा प्रदान करते थे। राज्य का कुल सैन्य बल 6,015 था जिसमें से 2,549 नियमित सैन्य बल तथा 3,466 अनियमित सैन्य बल था। नियमित सेना में 1,750 इन्फैण्ट्री, 560 कैवलरी तथा 239 गनर्स थे। अनियमित सेना में 3000 इन्फैण्ट्री तथा 466 कैवलरी थी। राज्य के पास 128 बंदूकें थीं जिनमें से 56 काम में आने के योग्य थीं। राज्य को जागीरदारों के द्वारा घुड़सवार एवं पदाति सैनिक प्रदान किये जाते थे। राज्य में खैरवाड़ा तथा कोटड़ा में ब्रिटिश छावनियों का प्रबंध किया जाता था जहाँ मेवाड़ भील कोर स्थित थी। राज्य द्वारा इन सेनाओं के रख रखाव के लिये 66 हजार रुपया वार्षिक प्रदान किया जाता था। साक्षरता के मामले में राज्य की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। 1901 में राज्य में केवल 4 प्रतिशत साक्षरता थी। राज्य की पुरुष साक्षरता दर 7.4 प्रतिशत तथा स्त्री साक्षरता दर मात्र 0.2 प्रतिशत था।

    उदयपुर राज्य ने प्रथम विश्वयुद्ध में अपनी सेना भारत सरकार के सैनिकों के साथ यूरोप के मोर्चे पर भेजी। महाराणा ने राजपूताना एयर क्राफ्ट तथा मशीनगन फंड के लिये एक लाख रुपये, इम्पीरियल रिलीफ फंड के लिये दो लाख रुपये तथा वार ऋण के लिये आठ लाख रुपये भिजवाये। राजपूताना की रियासतों में से मेवाड़ रियासत ऐसी थी जिसके महाराणाओं का अक्सर ही ब्रिटिश सरकार से विरोध रहा। यद्यपि मेवाड़ का महाराणा अपनी उच्चता को बनाये रहा किंतु ऐसे अवसर भी आये जब महाराणा को अंग्रेजी सत्ता के दबाव के कारण अपनी गद्दी छोड़नी पड़ी।

    जब बिजोलिया आंदोलन के कारण किसानों ने मेवाड़ के महाराणा को राजस्व देने से मना कर कर दिया तो ब्रिटिश सरकार के कान खड़े हुए। ब्रिटिश सरकार का मानना था कि इस आंदोलन से महाराणा को सहानुभूति है जिसके कारण आंदोलन नहीं कुचला गया। ब्रिटिश सरकार ने महाराणा फतहसिंह को आदेश दिये कि वे राज्याधिकार अपने पुत्र को सौंप दें। महाराणा को महाराज कुमार भूपालसिंह के पक्ष में अपने अधिकार त्यागने पड़े। इस घटना के बाद महाराणा फतहसिंह अंग्रेजों से घृणा करने लगा। जब वायसराय की काउंसिल का सदस्य बी. नरसिंह शर्मा उदयपुर आया तो ब्रिटिश रेजीडेंट ने उसे महाराणा से नहीं मिलने दिया। एक दिन अचानक जब महाराणा घूमने निकला हुआ था तब शर्मा दौड़कर महाराणा फतहसिंह के काफिले में घुस गया। महाराणा ने उसके कान में कहा- देश को इन दुष्टों से मुक्ति दिलवाओ। जब ई.1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स उदयपुर आया तो महाराणा ने यह कहकर उससे मुलाकात नहीं की कि महाराणा बीमार हैं। ब्रिटिश सरकार ने इसे महाराणा द्वारा की गयी विरोध पूर्ण कार्यवाही समझा।

    नरेंद्र मंडल की स्थापना

    ई.1920 के दशक में देश में संवैधानिक सुधारों की मांग होने लगी। यह मांग दोहरे स्तर पर थी। एक ओर कांग्रेस असहयोग आंदोलन चला रही थी जबकि दूसरी ओर राजा लोग प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सरकार का भरपूर साथ देने के बदले में पुरस्कार मांग रहे थे। रजवाड़ों की मांगों को देखते हुए मांटेग्यू चैम्सफोर्ड रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया था कि भारतीय नरेशों की एक स्थायी परिषद होनी चाहिये। फलतः ई.1921 में नरेंद्र मण्डल (Chamber of Princes) की स्थापना की गयी। 8 फरवरी 1921 को सम्राट जार्ज पचंम के चाचा ड्यूक ऑफ कैनॉट ने दिल्ली के किले में इसका उद्घाटन किया। इस अवसर पर सम्राट की ओर से की गयी घोषणा में कहा गया कि मेरे पूर्वजों द्वारा एवं स्वयं मेरे द्वारा अनेक अवसरों पर दिये गये आश्वासनों के अनुसार मैं भारतीय शासकों के विशेषाधिकारों, अधिकारों एवं उनकी गरिमा को बनाये रखूंगा.......राजा लोग इस बात को लेकर निश्चिंत रहें, यह प्रतिज्ञा सदैव अनुल्लंघनीय एवं पवित्र बनी रहेगी।

    नरेंद्र मण्डल की स्थापना, भारतीय रजवाड़ों के सम्बन्ध में अब तक चली आ रही ब्रिटिश नीति में बहुत बड़ा परिवर्तन था। अब तक ब्रिटिश नीति यह रही थी कि नरेशों को एक-दूसरे से अलग-थलग रखा जाये किंतु नरेंद्र मण्डल ने भारतीय राजाओं को एक साथ बैठने तथा एक आवाज में बोलने का अवसर प्रदान कर दिया था। नरेंद्र मण्डल की अध्यक्षता वायसराय करता था। वायसराय की अनुपस्थिति में चांसलर द्वारा अध्यक्षता की जाती थी। इसका अधिवेशन प्रतिवर्ष जनवरी या फरवरी में दिल्ली में होता था। ई.1927 तक इसका अधिवेशन बन्द कमरे में होता था किंतु ई.1928 से इसका खुला अधिवेशन होने लगा। इस संस्था के प्रथम चासंलर बीकानेर महाराजा गंगासिंह थे। 9 फरवरी 1921 को उन्हें नरेन्द्र मण्डल का चांसलर चुना गया, ई.1926 तक वे इस पद पर रहे।

    इस संस्था से अपेक्षा की गयी थी कि यह देशी राज्यों में प्रशासनिक सुधार के काम को आगे बढ़ायेगी किंतु हैदराबाद, कश्मीर, बड़ौदा, मैसूर, त्रावणकोर, कोचीन और इन्दौर आदि कई बड़ी रियासतें नरेंद्र मंडल में शामिल नहीं हुईं, दूसरी ओर 127 छोटी-छोटी रियासतों में से कुल 12 सदस्य ही नरेंद्र मंडल में लिये गये। इन दोनों कारणों से यह संस्था मध्यमवर्गीय रियासतों की संस्था बन कर रह गयी। यह एक परामर्शदात्री संस्था थी। इसकी बैठक वर्ष में कम से कम एक बार अवश्य होती थी। इस संस्था का मुख्य कार्य ब्रिटिश सरकार से परामर्श लेना तथा ब्रिटिश सरकार को परामर्श देना था किंतु बाद में यह संस्था भारतीय राजाओं के अधिकारों के सम्बन्ध में तथा ब्रिटिश नीति के सम्बन्ध में भी विचार विमर्श करने लगी। आरंभ में नरेंद्र मण्डल के अनेक सदस्य अखिल भारतीय संघ के निर्माण के पक्ष में थे। केन्द्रीय धारासभा, गोलमेज सम्मेलन या इस प्रकार के अन्यान्य सम्मेलनों में प्रस्तुत प्रस्ताव, विधेयक नरेश मंडल की स्वीकृति के बिना संवैधानिक स्तर प्राप्त नहीं कर सकते थे। इस प्रकार यह 'नरेश मंडल' या 'देशी राज्यों का संघ' सरकार की सुरक्षा प्राचीर था जिसकी चिनाई बाँटो और राज करो के चूने-गारे से हुई थी।

    भारतीय संविधान आयोग

    ई.1927 में भारतीय संविधान आयोग की नियुक्ति की गयी जिसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे तथा आयोग के समस्त सातों सदस्य अंग्रेज थे। इसे साइमन कमीशन तथा व्हाइट कमीशन भी कहा जाता है। साइमन कमीशन 3 फरवरी 1927 को भारत पहुँचा। कमीशन की रिपोर्ट मई 1930 में प्रकाशित हुई जिसमें पूरे भारत के लिये एक संघ प्रस्तावित किया गया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत का अंतिम संविधान संघीय होना चाहिये। केवल संघीय संविधान के तहत ही भारत के विभिन्न प्रांतों एवं विविधता युक्त देशी रियासतों को आंतरिक स्वायत्तता के साथ एक इकाई में सम्मिलित किया जा सकता है। आयोग इस बात से सहमत था कि जब भारत के लिये किसी संवैधानिक परिवर्तन की अनुशंसा की जाये तो केवल ब्रिटिश भारत के लिये नहीं, अपितु भविष्य के उस संपूर्ण भारत के लिये की जाये जिसमें देशी रियासतें भी सम्मिलित होकर ब्रिटिश क्राउन के अधीन कॉमनवेल्थ ऑफ नेशन्स में स्थान पायेंगी।

    जान साइमन ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को सलाह दी कि आयोग का कार्य पूर्ण होने के बाद ब्रिटिश सरकार को ब्रिटिश भारत एवं देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के साथ अंतिम प्रस्तावों पर सहमति हेतु अधिकतम संभावना की तलाश के उद्देश्य से एक अलग से सम्मेलन करना चाहिये तथा सरकार का यह कर्त्तव्य होना चाहिये कि उस सहमति को संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाये। साइमन ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को संकेत किया कि भारत के शासन के उस अंतिम रूप के बारे में, जिसमें राज्यों को भी सम्मिलित किया जाना है, केवल राजाओं की सहमति से ही कोई संकल्प किया जाना संभव है। यद्यपि लगभग पूरे भारत ने साइमन कमीशन की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया किंतु भारत के संवैधानिक विकास में साइमन कमीशन मील का पत्थर सिद्ध हुआ। साइमन कमीशन की अनुशंसा के आधार पर ही ब्रिटिश सरकार ने लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलन आयोजित किये। आगे चलकर ई.1935 के अधिनियम का मूल आधार साइमन कमीशन की रिपोर्ट ही बनी।

    नेहरू रिपोर्ट

    जब कांग्रेस ने साइमन कमीशन की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया तब ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को चुनौती दी कि वह एक ऐसी रिपोर्ट तैयार करके दिखाये जो भारत में लगभग हर पक्ष को स्वीकार्य हो। इस पर 28 फरवरी 1928 को कांग्रेस ने एक सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया जिसमें 29 संस्थाओं ने भाग लिया। 10 मई 1928 को दूसरा सर्वदलीय सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस, सर तेजबहादुर सप्रू, शुऐब कुरेशी, सरदार मंगलसिंह, एम. एम. अणे, सर अली इमाम और जी. आर. प्रधान की एक समिति को भावी संविधान की रूपरेखा तैयार करने के लिये कहा गया। इसके अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे। इस समिति ने 10 अगस्त 1928 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसे नेहरू रिपोर्ट कहा जाता है।

    समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यदि भारत का संविधान संघीय होना है तो संघ के साथ भारतीय राज्यों के सम्बन्धों के विषय में स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट किया जाना चाहिये। अगस्त 1928 में लखनऊ में सर्वदलीय सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें मणिलाल कोठारी, विजयसिंह पथिक और रामनारायण चौधरी देशी राज्यों की जनता के प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुए। नेहरू समिति ने देशी नरेशों के इस दावे को नहीं माना था कि उनका सीधा सम्बन्ध ब्रिटिश सम्राट से है। इस विषय पर बोलते हुए कोठारी ने कुछ राजाओं के लिये नामर्द शब्द का प्रयोग किया। इससे उत्तेजित होकर बीकानेर के महाराजा ने अपने एक भाषण में अपने पुरखों की तलवार का उल्लेख किया। राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने इस पर यह टिप्पणी की कि जो लोग विदेशियों के सामने भेड़ बने रहें और अपनों को शमशीर दिखावें, वे मर्द नहीं कहे जा सकते। इन सब विवादों के कारण नेहरू रिपोर्ट अमान्य हो गयी।

    इण्डियन स्टेट्स समिति (बटलर समिति)

    लार्ड रीडिंग (ई.1921-26) ने हैदराबाद के निजाम को लिखे एक पत्र में स्पष्ट किया कि राजा, परमोच्च सत्ता के साथ बराबरी का दावा नहीं कर सकते थे। ब्रिटिश सरकार कहने को भले ही यह बात कह रही थी किंतु वास्तविकता यह थी कि ब्रिटिश भारत में बढ़ते हुए राष्ट्रवाद के कारण ब्रिटिश सरकार के लिये देशी राज्यों के शासकों का महत्त्व बढ़ता जा रहा था। मई 1927 में आयोजित एक कान्फ्रेन्स में भारतीय राजाओं ने ब्रिटिश सरकार की बदली हुई भाषा एवं नयी परिस्थितियों से लाभ उठाने के उद्देश्य से लॉर्ड इरविन (ई.1926-1931) से मांग की कि परमोच्च सत्ता के साथ देशी राज्यों के सम्बन्धों की समीक्षा की जाये। तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मि. बर्कनहैड ने राजाओं की इस मांग का स्वागत किया और उसने 16 दिसम्बर 1927 को सर हरकोर्ट बटलर की अध्यक्षता में तीन सदस्यों की इण्डियन स्टेट्स समिति गठित की जिसे बटलर समिति भी कहते हैं। इस समिति में प्रोफेसर डब्लू. एस. होल्ड्सवर्थ तथा एस. सी. पील को भी सदस्य बनाया गया।

    बटलर समिति जनवरी 1928 में भारत आयी। इस समिति ने 16 रियासतों का दौरा किया। बटलर समिति के गठन को लेकर राजाओं में असंतोष फैल गया। अतः कुछ लोगों ने समाचार पत्रों के माध्यम से प्रचारित किया कि राजाओं के लिये इस समिति का बहिष्कार करना एक अत्यंत बुद्धिमानी का कार्य होगा। महाराजा गंगासिंह ने इस सुझाव का अत्यंत दृढ़ता से विरोध किया और कहा कि यदि उन्होंने समिति का बहिष्कार किया तो यह केवल मूर्खता की पराकाष्ठा होगी तथा प्रत्येक रीति से यह राजकौशल का ठीक प्रतिवाद होगा। जो अवसर राजाओं को प्राप्त हुआ है, उसका लाभ उठायें तथा आशा एवं विश्वास के साथ भविष्य की प्रतीक्षा करें। बटलर समिति का स्वागत करते हुए फरवरी 1928 में महाराजा गंगासिंह ने नरेन्द्र मण्डल में एक प्रस्ताव रखा कि राज्यों के साथ साम्राज्य के जो सम्बन्ध हैं उन्हें नियंत्रित करने वाले तंत्र को सुधारना आवश्यक है। उनका मत था कि यह समस्या कठिन अवश्य है किंतु इसका हल निकाला जा सकता है।

    बटलर समिति ने रियासतों के शासकों की मांग को तो सुना किंतु रियासतों की जनता को सुनने से यह कहकर इन्कार कर दिया कि यह समिति के अधिकार क्षेत्र में सम्मिलित नहीं है। बटलर समिति के समक्ष सर लेसली स्कॉट ने राजाओं का पक्ष प्रस्तुत किया। स्कॉट ने राजाओं की तरफ से बटलर समिति से अनुरोध किया कि परमोच्च सत्ता को स्वीकार करने के बाद, राजा लोग पहले से ही चली आ रही सम्प्रुभता तथा प्रतिष्ठा का उपभोग करते रहे हैं। इस सम्प्रभुता में केवल उसी सीमा तक परिवर्तन किया गया था जिस सीमा तक राजाओं ने अपने अधिकारों का परमोच्च सत्ता के समक्ष समर्पण किया था। स्कॉट तथा उसके साथियों ने समिति के समक्ष दलील दी कि देशी राज्यों के आपसी सम्बन्ध तथा देशी राज्यों के ब्रिटिश भारत सरकार के साथ सम्बन्ध एक समान हैं। इसलिये उनका सम्मान अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अन्तर्गत ही किया जाना चाहिये।

    लेसली स्कॉट ने तर्क दिया कि परमोच्च सत्ता को अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिये कि परमोच्च सत्ता निरंकुश शक्तियों की स्वामी है। राज्यों एवं ब्रिटिश सरकार के मध्य सम्बन्ध परस्पर सहमति के अधिकारों एवं कर्त्तव्यों पर आधारित हैं। संधियां एवं उपबन्ध ही सम्बन्धों का वास्तविक आधार हैं। केवल लघु रीति-रिवाज एवं परम्पराएं इन बंधनों को संकुचित नहीं कर सकतीं। क्योंकि रीति रिवाज एवं परम्पराएं अपने आप में कोई नया अधिकार सृजित नहीं करतीं और न ही कोई नया दायित्व थोपती हैं। राजाओं की ओर से समिति के समक्ष यह तर्क भी दिया गया कि राज्यों के सम्बन्ध ब्रिटिश ताज से हैं तथा वे अपरिवर्तनीय हैं। इसलिये ब्रिटिश ताज, राज्यों को अपनी स्वामिभक्ति किसी तृतीय पक्ष के प्रति समर्पित करने के लिये नहीं कह सकता। और न ही राज्यों की सहमति के बिना, ब्रिटिश ताज राज्यों की आंतरिक अथवा बाह्य सुरक्षा अथवा वैदेशिक सम्बन्धों को किन्हीं ऐसे व्यक्तियों को सौंप सकता है जो ब्रिटिश ताज के नियंत्रण से अलग एवं स्वतंत्र अस्तित्व रखते हों।

    बटलर समिति ने दो वर्ष बाद अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में देशी राज्यों की स्वामिभक्ति को इन शब्दों में व्यक्त किया गया- साम्राज्यिक इतिहास में भारतीय देशी रियासतों ने मुख्य भूमिका निभाई थी। विद्रोह के समय उनकी स्वामिभक्ति, देशभक्ति पूर्ण दावों के प्रति उनका रुख, महायुद्ध के समय उनकी अनुपम सेवाएं, ब्रिटिश ताज, सम्राट तथा राज परिवार के प्रति उनका अद्भुत समर्पण, हमारे साम्राज्य का ऐतिहासिक गौरव हैं। समिति ने परमोच्च सत्ता की परिभाषा इस प्रकार दी- सम्राट का अधिकार, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट तथा गवर्नर जनरल इन कौंसिल के द्वारा ग्रेट ब्रिटेन की पार्लियामेण्ट के प्रति उत्तरदायी है। बटलर समिति ने अपना निर्णय दिया कि परमोच्चता सदैव के लिये परमोच्च है तथा राजाओं को स्मरण दिलाया कि परमोच्चता ने ही उनके अस्तित्व को बनाये रखा है। समिति ने राज्यों की यह मांग स्वीकार कर ली कि राज्यों के सम्बन्ध भारत सरकार से न होकर इंगलैण्ड की सरकार से माने जायें। इस मांग को प्रस्तुत करने में बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने विशेष भूमिका निभाई।

    समिति ने अनुशंसा की कि ब्रिटिश सरकार की परमोच्चता को बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि देशी राज्यों के शासन में चलने वाले जन आंदोलन को समाप्त करने के लिये ब्रिटिश सरकार राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करे। बटलर समिति की रिपोर्ट की समस्त ओर से आलोचना की गयी। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि हम प्रतिबद्ध हैं कि इस बिना पर कि राजाओं की गंभीर आशंकाओं की ओर ध्यान आकर्षित करें और दृढ़ता से अपनी राय दें कि परमोच्च सत्ता और राजाओं के सम्बन्धों की ऐतिहासिक प्रकृति को दृष्टि में रखते हुए, उनको बिना उनकी सम्मति के किसी भारतीय सत्ता से जो भारतीय विधान मण्डल के प्रति उत्तरदायी हो, सम्बन्ध रखने के लिये हस्तांतरित न किया जाये।

    बटलर समिति की रिपोर्ट को देखकर राजाओं में क्षोभ उत्पन्न हुआ। इसमें केवल इतना कहा गया कि देशी राज्यों के संधि विषयक सम्बन्ध सम्राट के साथ हैं अतः उनको देशी राज्यों की सहमति के बिना किसी भी ऐसी अन्य सत्ता को नहीं सौंपा जा सकता जिस पर कि सम्राट का पूर्ण नियंत्रण न हो। रिपोर्ट के शेष भाग में भारत सरकार की वर्तमान व विगत कार्यवाहियों का समर्थन किया गया था। राजाओं की इस मांग के प्रति कि सर्वोपरि सत्ता को सीमांकित किया जाये, प्रतिवेदन में कहा गया था, सर्वोपरि सत्ता सर्वदा सर्वोपरि ही रहनी चाहिये।

    फरवरी 1930 में नरेन्द्र मण्डल के अधिवेशन में गंगासिंह ने राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के आधार की परिभाषा सम्बन्धी प्रस्ताव रखते हुए इस विषय में बटलर समिति द्वारा अपनाई गई विचार पद्धति की तीव्र भर्त्सना की। उन्होंने स्वीकार किया कि सर्वोपरि सत्ता ने बाह्य आक्रमण एवं आंतरिक विद्रोह के विरुद्ध राज्यों के सामान्य संरक्षण का दायित्व ले रखा है, उसे हस्तक्षेप करने का अधिकार है किंतु यह अधिकार कुछ निश्चित मामलों तक ही सीमित है। महाराजा ने कहा कि कभी-कभी तो मामले की स्थिति तथा वास्ततिकता की ओर ध्यान दिये बिना ही केवल राजप्रतिनिधियों की सत्ता एवं उनके अधिकारों का प्रदर्शन करने के उद्देश्य से ही यह हस्तक्षेप किया गया है। अतः सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न सर्वोपरि सत्ता द्वारा उसके हस्तक्षेप करने के अधिकारों का परिसीमन करने का तथा उन क्षेत्रों को सूक्ष्म तथा निर्धारित करने का है।

    नरेन्द्र मण्डल में भाषणों का लहजा बदल चुका था। इससे न केवल भारत सरकार को अपितु आंग्ल भारत की जनता को भी भारी विस्मय हुआ। बटलर समिति की योजनाओं के विरोध का बल स्पष्ट था। नरेशों के स्थान को सुरक्षित करने की तथा एक सुनिश्चित विचार पद्धति अपनाने की आवश्कता थी। अपने घटते प्रभाव को सुरक्षित रखने के लिये भारतीय नरेश उत्तरोत्तर अपने आप को राष्ट्रीय आंदोलन के विरुद्ध प्रस्तुत करते रहे। बटलर समिति का प्रमुख प्रयोजन देशी राजाओं और साम्राज्यवादियों के गठजोड़ से राष्ट्रीय आंदोलन की धार को कुण्ठित बनाना था।

    उस समय, आंग्ल भारत के समाचार पत्रों में एवं सार्वजनिक मंचों से ये आलोचनायें की जा रही थीं कि आंग्ल भारत में संवैधानिक प्रगति का विरोध करने के लिये राजा लोग अंग्रेजों के साथ षड़यंत्र में शामिल हो गये हैं। महाराजा गंगासिंह ने अत्यंत दृढ़ता से इन आरोपों का खण्डन किया और निर्देश दिया कि ठीक इसके विपरीत नरेशों ने सामूहिक रूप से अनेक अवसरों पर यह पूर्णतः स्पष्ट कर दिया है कि वे न केवल आंग्ल भारत में अपने देशवासियों की राजनीतिक एवं संवैधानिक प्रगति के प्रति सहानुभूतिक हैं अपितु उन्होंने उनके प्रति अपना अनुमोदन एवं पक्षपोषण भी व्यक्त किया है।

    नरेंद्र मंडल द्वारा पूर्ण स्वराज्य का विरोध

    कांग्रेस के ई.1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित किया गया। अंग्रेजों की ओर से राजपूताना के शासकों से यह अपेक्षा की जा सकती थी कि कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज्य के रूप में खड़ी की गयी चुनौती को हल करने में पहल करें क्योंकि बीकानेर महाराजा गंगासिंह तथा अलवर महाराजा जयसिंह नरेंद्र मण्डल की राजनीति में अग्रणी रहे थे। यही कारण था कि ई.1929 के आरंभ में राजस्थान के कुछ शासकों ने अपने आपको राष्ट्रीय धारा के मार्ग में एक बड़े पत्थर की भांति खड़ा कर दिया।

    फरवरी 1929 में नरेन्द्र मण्डल की एक सभा में कांग्रेस की पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की आलोचना की गयी। बीकानेर नरेश गंगासिंह ने इस सम्मेलन में कहा कि हम अंग्रेजी ताज के साथ अपनी संधियों के द्वारा बंधे हुए हैं जिसके कारण शासक किसी भी ऐसी ख्याली और असंभव योजना को सहन नहीं कर सकते जिसका लक्ष्य अंग्रेजों से सम्बन्ध विच्छेद और पूर्ण स्वतंत्रता स्थापित करना हो। गंगासिंह यहाँ तक कह गये कि अंग्रेजी सम्बन्ध विच्छेद के बाद ब्रिटिश भारत और भारतीय राज्यों के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित होने के मार्ग में दुर्गम कठिनाइयां पैदा हो जायेंगी।

    19 दिसम्बर 1929 को बीकानेर नरेश ने बीकानेर राज्य की विधानसभा में भाषण देते हुए कहा कि मैं उस दिन को देख रहा हूँ जब एकीकृत भारत, महामना सम्राट की छत्रछाया में डोमिनियन स्टेटस का आनंद ले रहा होगा तथा भारतीय राज्य एवं राजा लोग एक ठोस संघीय ढांचे में ब्रिटिश भारत के प्रांतों के साथ परम समानता की स्थिति को प्राप्त करने का आनंद लेंगे जिसके कि वे पूरे हकदार हैं। अलवर महाराजा ने भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मेरा लक्ष्य यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इण्डिया का है जहाँ प्रत्येक प्रांत, प्रत्येक रियासत, अपनी नियति, अपने वातावरण, परम्पराओं, इतिहास तथा धर्म के साथ एकत्र होकर, साम्राज्यिक तथा महान उद्देश्यों के लिये कार्य करें।

    ई.1929 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने कुछ भारतीय नरेशों से सम्पर्क किया किंतु जब अंग्रेजों को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने शासकों के अहम को उभारते हुए कहा कि क्या वे अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के प्रतिनिधियों के साथ बराबर के स्तर पर वार्त्ता करने को तैयार होंगे और अगर ऐसा हुआ तो दोनों को एक ही सदन में बैठकर काम करना होगा। इससे शासक लोग बिदक गये और उन्होंने कांग्रेस के नेताओं से बात तक नहीं की। इन शासकों में पटियाला राज्य के शासक के साथ-साथ बीकानेर नरेश गंगासिंह भी थे। फरवरी 1930 में आयोजित नरेंद्र मंडल के अधिवेशन में महाराजा गंगासिंह ने कहा कि जब विभिन्न प्रांत अधिकतर स्वायत्तता के लिये तथा नये अधिकारों के उपहार के लिये दुहाई मचा रहे हैं, राजा लोग भी अपनी मूल आंतरिक स्वायत्तता के पुनः स्थापन की प्रत्याशा करते हैं। जवाहरलाल नेहरू ने इस पर टिप्पणी की कि आंग्ल भारत द्वारा अखिल भारत के लिये अधिराज्य प्रतिष्ठा की मांग, बटलर समिति के निष्कर्ष तथा साइमन आयोग की नियुक्ति के परिणाम स्वरूप राजा लोग स्वभावतः उद्विग्न हो उठे थे।

    उपरोक्त तथ्यों के आलोक में स्पष्ट है कि बीसवीं सदी के प्रारंभ में राजपूताना के चारों सक्षम राज्यों में ब्रिटिश प्रभाव के कारण राजस्व प्रशासन, न्याय, संचार, सड़क परिवहन तथा रेलवे जैसी संस्थाओं का क्रमिक विकास हुआ। शिक्षा की दृष्टि से राजपूताना इस काल में जबर्दस्त पिछड़ा हुआ था। प्रथम विश्वयुद्ध में देशी राज्यों द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य को दी गयी सहायता के बदले में, युद्ध की समाप्ति के बाद राज्यों के शासकों ने ब्रिटिश शासन से पुरस्कार की अपेक्षा रखते हुए परमोच्चता को परिभाषित करने की मांग की किंतु इस सम्बन्ध में ब्रिटिश सरकार द्वारा अपनाये गये रुख ने राजाओं की महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं होने दी। राष्ट्रीय आंदोलन के कारण ब्रिटिश शासन के लिये राज्यों का महत्त्व बढ़ गया। यही कारण है कि ब्रिटिश शासन ने स्वयं आगे आकर नरेंद्र मण्डल जैसी संस्था का गठन किया ताकि राजाओं को संगठित करके ब्रिटिश भारत में चल रहे आंदोलन के साथ एक अवरोधक भार बांधा जा सके। नरेंद्र मण्डल के माध्यम से देशी राज्यों के शासकों ने कांग्रेस द्वारा पारित पूर्ण स्वराज्य के प्रस्ताव का विरोध करके साम्राज्यिक उद्देश्यों को सफल बनाने में सहायता दी।

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