• अध्याय-9 एकीकरण के पश्चात् की समस्याएं

     09.12.2017
    अध्याय-9 एकीकरण के पश्चात् की समस्याएं

    अध्याय-9


    एकीकरण के पश्चात् की समस्याएं

    (प्रशासनिक, राजनैतिक, नेतृत्व एवं वित्तीय मामले)

    जयपुर महाराजा राजप्रमुख, जयपुर का ही मुख्यमंत्री और जयपुर ही राजधानी, यह सब कुछ कई लोगों को हजम होने वाला नहीं था। - हीरालाल शास्त्री।

    राजस्थान संघ के अस्तित्व में आने के समय विभिन्न राज्यों के आकार, जनसंख्या, आर्थिक स्थिति, प्रशासनिक एवं न्यायिक प्रशासन, सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति तथा विभिन्न राज्यों में बोली जाने वाली भाषाओं में काफी अंतर था। यदि कोई समानता थी तो यही कि समस्त राज्यों में समस्त शक्तियां राजाओं के हाथों में थी। एकीकरण से पूर्व कुछ राज्यों में पड़ौसी अंग्रेजी प्रांतों के आधार पर आधुनिक सरकारों की स्थापना हो चुकी थी। कुछ राज्यों में मंत्री परिषद कार्यरत थी जिनमें लोकप्रिय मंत्री कार्य कर रहे थे। कुछ राज्यों में लोक सेवा आयोग के माध्यम से नियुक्तियां होती थीं तथा सुस्पष्ट नियमों एवं योग्यता के आधार पर पदोन्नतियां दी जाती थीं। कुछ राज्यों में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग किया जा चुका था। कुछ राज्यों में भ्रष्टाचार से निबटने के लिये भ्रष्टचार निरोधक विभाग बन चुके थे। राजकीय खातों के अंकेक्षण की भी व्यवस्था थी।

    राजस्थान के एकीकरण के पश्चात् कुछ प्रारंभिक वर्ष राज्य की अर्थव्यवस्था को स्थायित्व देने तथा समुचित कोष जुटाने में लगाये गये। इसके साथ ही राज्य के प्रशासनिक ढांचे को विकसित एवं सुदृढ़ करने के लिये नियमों व कानूनों को बनाने का काम आरंभ हुआ। नयी सेवाओं की स्थापना करना, लेखा नियम बनाना तथा विभिन्न राज्यों की सेवाओं का एकीकरण करना एक कठिन कार्य था। 30 मार्च 1949 को राजस्थान का विविधवत् उद्घाटन हो जाने के बाद मुख्यमंत्री का सबसे पहला कार्य था मंत्रिमण्डल की नियुक्ति करना। 4 अप्रेल 1949 को हीरालाल शास्त्री ने नये राज्य का कार्यभार संभाला। 7 अप्रेल 1949 को मुख्यमंत्री ने मंत्रिमंडल का विस्तार किया। सिद्धराज ढड्ढा (जयपुर), प्रेमनारायण माथुर और भूरेलाल बयां (उदयपुर), फूलचंद बाफना, नरसिंह कच्छवाहा और रावराजा हनुवंतसिंह (जोधपुर), रघुवरदयाल गोयल (बीकानेर) और वेदपाल त्यागी (कोटा) को मंत्रिमण्डल में सम्मिलित किया गया। जिस दिन मंत्रिमण्डल ने शपथ ली, उसी दिन अर्थात् 7 अप्रेल 1949 को राजस्थान सरकार ने जोधपुर, जयपुर, बीकानेर तथा जैसलमेर राज्यों का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया।


    प्रशासनिक समस्याएं

    राजधानी का बार-बार बदला जाना

    प्रथम राजस्थान संघ की राजधानी कोटा में रखी गयी थी। इसके बाद जब द्वितीय राजस्थान अर्थात् संयुक्त राजस्थान बना तो उसकी राजधानी उदयपुर में रखी गयी। तृतीय राजस्थान अर्थात वृहत् राजस्थान की राजधानी जयपुर में रखी गयी। वृहत् राजस्थान में मत्स्य संघ का विलय होने पर मत्स्य संघ की राजधानी जयपुर लायी गयी। राजधानी के बार-बार बदले से हर बार सरकारी तंत्र तथा अभिलेख एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना पड़ा किंतु इस समस्या को धैर्य पूर्वक सुलझा लिया गया तथा जयपुर के राजधानी बनने के बाद यह समस्या स्वतः समाप्त हो गयी।

    रियासती कस्टम सीमाओं की समाप्ति

    मंत्रिमंडल का विस्तार होने के दिन अर्थात् 7 अप्रेल 1949 को राज्य सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर अंतर रियासती कस्टम सीमाओं को समाप्त किया। इस प्रकार अब तक चली आ रही रियासत कालीन व्यवस्थाएं 7 अप्रेल 1949 से पूर्णतः समाप्त हो गयीं।

    पाकिस्तान से लगी सीमा की सुरक्षा

    वृहत् राजस्थान में सम्मिलित बीकानेर, जैसलमेर तथा जोधपुर रियासतों की सीमाएं पाकिस्तान से लगती थीं। राजस्थान बनने से पूर्व सीमा की रक्षा का कार्य भारतीय सेना तथा सेन्ट्रल रिजर्व पुलिस के द्वारा किया जाता था। राजस्थान बनने के बाद इस सीमा की सुरक्षा के लिये राजस्थान सरकार पर जिम्मेदारी आ गयी कि वह इस कार्य के लिये पुलिस बल की भर्ती एवं प्रशिक्षण करे तथा उसे सुसज्जित करे। यह कार्य अत्यंत शीघ्रता के साथ किया जाना था ताकि इसे नये संविधान से पूर्व ही कर लिया जाये। इस कार्य में विपुल धन राशि की आवश्यकता थी। राजस्थान संघ के वित्तीय संसाधनों के अंतर्गत यह कार्य किया जाना संभव नहीं था। अंत में यह कार्य केन्द्र सरकार ने अपने हाथ में ले लिया।

    संघीय इकाई का प्रशासन केन्द्र के हाथों में

    देश के रियासती विभाग का ध्यान इस ओर गया कि देश के भीतर बनने वाले संघों की सरकारों पर भारत सरकार का नियंत्रण किस प्रकार रहे! ये संघ भारत सरकार की पहल पर बन रहे थे और इनमें अच्छी सरकार प्रदान करने की जिम्मेदारी भारत सरकार पर आ पड़ी थी। भारत सरकार का इन संघों पर कोई संवैधानिक नियंत्रण नहीं था। अप्रिय घटित होने पर भारत सरकार कानूनी रूप से कुछ नहीं कर सकती थी। अब तक जो नियंत्रण बनाया गया था वह कांग्रेस पार्टी के तंत्र तथा सरदार पटेल के व्यक्तित्व के द्वारा बनाया गया था किंतु यह कोई संतोषजनक व्यवस्था नहीं थी। इन संघों में मिलने वाले अधिकतर राज्यों में राज्य प्रशासन राजा के व्यक्तिगत एवं वंशानुगत तरीकों से चल रहा था। राजाओं को उस प्रकार की कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता था जिस प्रकार की कठिनाईयां संघीय सरकारों के सामने आ रही थीं अथवा आने की संभावना थी। इन कठिनाईयों से निबटने के लिये संघीय सरकारों के पास किसी तरह के उपकरण नहीं थे। राजनैतिक संगठनों के पास भी प्रशासन चलाने के लिये अनुभवी एवं योग्य नेता नहीं थे।

    राजपूत राजाओं के राज्य संघ में मिल तो गये थे किंतु इन राज्यों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की निष्ठायें रातों-रात नहीं बदली जा सकती थीं। अनुभवहीन नेताओं तथा राजनैतिक अधिकारों से अनभिज्ञ जनता के भरोसे प्रशासन नहीं छोड़ा जा सकता था। विशेषज्ञ मार्गदर्शन दिया जाना आवश्यक था। यह भी देखना था कि राज्यों के एकीकरण एवं उनके प्रजातंत्रीकरण की प्रक्रिया पूर्ण गति एवं दक्षता से पूरी हो। मेनन ने सुझाव दिया कि जब तक राजस्थान की स्थानीय विधान सभा अपने लिये संविधान का निर्माण नहीं कर लेती तब तक राजप्रमुख तथा मंत्रिमण्डल भारत सरकार के सामान्य नियंत्रण में रहें तथा भारत सरकार द्वारा समय-समय पर दिये जाने वाले निर्देशों की पालना करें।

    प्रशासनिक अधिकारियों ने इस प्रस्ताव को तुरंत मान लिया किंतु लोकप्रिय नेताओं ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। लम्बे चौड़े बहस-मुसाहबे के बाद नेताओं ने भी इस प्रस्ताव को मान लिया। बाद में राजस्थान प्रसंविदा (Rajasthan Covenant) का यह प्रावधान अन्य राज्यों के लिये भी कर दिया गया। राजस्थान प्रसंविदा में अनिवार्य रूप से यह प्रावधान भी किया गया था कि राजप्रमुख एक नवीन विलय पत्र (Fresh Instrument Of Accession) अमल में लायेंगे जिसके अनुसार भारत की संविधान सभा द्वारा कर एवं शुल्क को छोड़कर, संघीय एवं राज्य की विधान सभा के विधान की समवर्ती सूची में शामिल किये जाने वाले समस्त विषयों को स्वीकार किया जाना आवश्यक था।

    सरकार पर आई.सी. एस. अधिकारियों का नियंत्रण

    भारत सरकार द्वारा राजस्थान सरकार में सलाहकार के रूप में नियुक्त आई.सी. एस. अधिकारियों को अधिकार दिया गया कि वे मंत्रिमंडल, मुख्यमंत्री एवं मंत्री के किसी भी निर्णय पर वीटो कर सकते हैं। इन अधिकारियों की सहमति के बिना मुख्यमंत्री अथवा मंत्री एक चपरासी तक की भी नियुक्ति अथवा स्थानांतरण नहीं कर सकते थे। अतः ये सलाहकार ही राज्य के सर्वेसर्वा बन गये। हीरालाल शास्त्री के अनुसार राजस्थान के एकीकरण की जिम्मेदारी निभाने के लिये तीन अनुभवी आई.सी. एस. अफसर केन्द्र से दिये गये थे। शास्त्री का उनसे कभी झगड़ा नहीं हुआ। शास्त्री ने आग्रह किया कि वित्त सचिव बाहर से नहीं आयेगा, अमुक स्थानीय व्यक्ति को वित्त सचिव बनाया जायेगा। वह झगड़ा दिल्ली तक पंहुचा। बड़ी बदमजगी भी हुई पर उसमें हार जीत नहीं हुई। अंत में पटेल ने मेनन की बात न मानकर शास्त्री की बात मानी। शास्त्री ने इन सलाहकारों तथा मेनन की राय के विरुद्ध एक कांग्रेसी कार्यकर्ता को लोक सेवा आयोग का सदस्य बनाया।

    रियासती सेनाओं का राष्ट्रीयकरण

    ई.1939 में इण्डियन स्टेट्स फोर्सेज स्कीम के तहत रियासतीं सेनाओं में तीन प्रकार की इकाईयां रखी गयीं थीं- फील्ड सर्विस यूनिट्स, जनरल सर्विस यूनिट्स तथा स्टेट सर्विस यूनिट्स। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश के 44 राज्यों की सेनाएं इण्डियन स्टेट्स फोर्सेज स्कीम के तहत थीं जिनमें 75,311 अधिकारी थे। शेष राज्यों में इस योजना से बाहर की सेनाएं थीं जिनमें अधिकतर पुलिस तथा अंलकरण इकाईयां थीं। आजादी के बाद कश्मीर अभियान तथा अन्य कठिन परिस्थितियों में भारत सरकार को जब सेनाओं की आवश्यकता हुई तो भारतीय सेनाओं की कई टुकड़ियां नियत स्थानों पर नहीं पहुँचीं। इस पर भारत सरकार ने राज्यों से अनुरोध किया कि वे अपनी सेनाऐं भेजें। अगस्त 1947 के प्रविष्ठ संलेख में राज्य की सुरक्षा का विषय केंद्र सरकार को दिया गया था। इसलिये राज्यों की सेनाओं को भारत सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया। जो सेना जहाँ नियत थी उसे वहीं रखा गया, उनके कार्य की शर्तों तथा परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं किया गया। इसके बाद योग्य सैनिकों को सेना में ग्रहण करने का कार्य शनैः-शनैः किया गया। जो सैनिक भारतीय सेना के मानकों के अनुरूप नहीं पाये गये, उन्हें समुचित रियायत देकर सेना से मुक्त कर दिया गया।

    राज्यों की सेनाओं पर नियंत्रण स्थापित करने के लिये निम्नलिखित उपाय किये गये-

    (1.) इन बलों का नियंत्रण राजप्रमुख के अधीन भारतीय सेना के किसी अधिकारी द्वारा किया जाये।

    (2.) इन बलों की संख्या तथा संगठन भारतीय प्रतिरक्षा के संदर्भ में निश्चित किया जाये।

    (3.) इन बलों का पुनर्गठन भारतीय सेना के मानकों के अनुसार किया जाये।

    (4.) अधिकारियों का चयन भारतीय सेना की चयन प्रक्रिया के अनुसार ही किया जाये। उनकी पदोन्नति आदि भी उसी तरह नियंत्रित की जाये।

    (5.) भारतीय सेनाओं तथा इन बलों के अधिकारियों की निश्चित संख्या में अदला-बदली की जाये। राज्यों का वित्तीय एकीकरण किये जाने के बाद इन बलों का व्यय केन्द्र सरकार द्वारा उठाया जाने लगा तथा 1 अप्रेल 1951 को ये सेनाएं पूरी तरह भारतीय सेना का हिस्सा बन गयीं।

    राजस्थान के राजप्रमुख को रियासती सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति बनाया गया। राजप्रमुख के नीचे बीकानेर रियासत के प्रधान सेनापति जनरल जयदेवसिंह को रखा गया। राजपूताने की रियासतों की सेनाओं के एकीकरण के मामले में काफी असंतोष उभर कर सामने आया। रियासती सेनाओं के शानदार लड़ाकों के साथ अशोभनीय व्यवहार हुआ। कई लोगों को शारीरिक योग्यता (में कमी) के कारण नौकरी से छुट्टी दे दी गयी। ट्रेकोमा, आंखों में दाने पड़ जाना, राजस्थान में एक आम नेत्र रोग है। यह सेना के लोगों के लिये अयोग्यता का एक कारण माना गया और इसके आधार पर छुट्टी दे दी गयी। भारतीय सेना ने निर्णय किया कि वरिष्ठता निश्चित करने या भारतीय सेना में पदोन्नति के लिये रियासती सेना के अधिकारियों की नौकरी की अवधि घटा दी जाये। यह बात उन छोटी रियासतों के लिये तो तर्कपूर्ण हो सकती थी जहाँ की सेनाएं भारतीय सेना के बराबर नहीं रखी गयीं लेकिन यह नियम बीकानेर, जयपुर, जोधपुर, हैदराबाद, पटियाला, कोटा और उदयपुर जैसी रियासतों के लिये दुर्भाग्यपूर्ण था क्योंकि इन रियासतों में प्रथम श्रेणी की सेना थी। भारतीय सेना में रियासती सेनाओं के जो अधिकारी लिये गये उनमें से बहुतों की बाद में पदावनति कर दी गयी तथा उन्हें आर्थिक हानि उठानी पड़ी। राजस्थान की सेनाओं के भारतीय सेना में मिलने से राजप्रमुख भी राजस्थान की सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति न रहा।

    राज्य अधिकारियों का एकीकरण

    विभिन्न राज्यों के अधिकारियों की सेवाओं का राजस्थान सरकार द्वारा एकीकरण किया गया। विभिन्न राज्यों में अधिकारियों के पदनाम तथा उनके वेतनमान के अंतर के कारण भारी विसंगतियां उत्पन्न हो गयीं। कुछ बड़े राज्यों में राजस्थान बनने से पहले कर्मचारियों एवं अफसरों के वेतन मनचाही रीति से बढ़ा दिये गये। शास्त्री ने ऐसा नहीं किया इससे जयपुर के अफसर घाटे में रह गये। जोधपुर राज्य के क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी गणेशदत्त छंगाणी, जो उन दिनों राज्य के पैट्रोल राशनिंग ऑथर्टी तथा जोधपुर राज्य के लोक सेवा आयोग के सचिव भी थे, ने अन्य राज्यों द्वारा कर्मचारियों के वेतनमानों में की गई वृद्धि का तुलनात्मक चार्ट बनाकर जोधपुर राज्य के मुख्यमंत्री जयनाराण व्यास के सम्मुख प्रस्तुत किया किंतु व्यास ऐसा नहीं कर सके जिससे जोधपुर राज्य के कर्मचारी अन्य राज्यों की तुलना में पिछड़ गये। आई.सी.एस. अधिकारियों ने राज्य सेवाओं में ऐसी धांधली मचायी कि तहसीलदार राजस्थान प्रशासनिक सेवा में आ गये और रियासतों में रहे विभागाध्यक्ष तहसीलदार बना दिये गये। एक बड़ी इकाई का चीफ इंजीनियर, असिस्टेंट इंजीनियर बना दिया गया, जबकि उसके अधीन रहे असिस्टेंट इंजीनियर को एक्जीक्यूटिव इंजीनियर बना दिया गया। कुछ लिपिकों को सहायक सचिव एवं सहायक सचिवों को लिपिक बना दिया गया। सचिवालय में सचिवों, उपसचिवों एवं विभागाध्यक्षों के प्रायः समस्त स्थानों पर केंद्र अथवा अन्य राज्यों के अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर लाकर नियुक्त कर दिया गया। फलस्वरूप विभिन्न रियासतों से आये हुए अधिकारियों एवं कर्मचारियों में भयंकर असंतोष फैल गया। समस्त स्तरों पर राज्यकार्य ठप्प सा हो गया।

    कांग्रेसी कार्यकर्ताओं द्वारा सरकारी नौकरी की मांग

    कुछ कांग्रेसी कार्यकर्ता स्वतंत्रता आंदोलन में दिये गये सहयोग के बदले में सरकारी नौकरियां मांगने लगे। मेवाड़ राज्य की स्टेट गैरेज का एक मैकेनिक नौकरी छोड़कर प्रजामण्डल में सम्मिलित हो गया था। जब राजस्थान बना तो उसने प्रधानमंत्री माणिक्यलाल वर्मा से मांग की कि उसे राजस्थान स्टेट गैरेज का अधीक्षक बना दिया जाये। स्थानीय कांग्रेस सेवा दल के एक कमाण्डेण्ट ने मांग की कि उसे पुलिस अधीक्षक बनाया जाये। जिला कांग्रेस समिति के सचिव ने मांग की कि उसे जिले का कलक्टर बनाया जाये। इनमें से किसी को नौकरी पर नहीं लिया गया। टोंक रियासत के माली को नवाब से अलग होने के उपहार के रूप में तहसीलदार बनाया गया। उसके उच्च वेतनमान को देखते हुए ऐसा किया गया। वह पूर्णतः अशिक्षित था। माली ने तहसीलदार की नौकरी छोड़ दी तथा सरकार से मांग की कि उसे माली ही रहने दिया जाये। उसे फिर से माली बना दिया गया किंतु टोंक नवाब के वायदे का सम्मान करने के लिये उसका वेतनमान तहसीलदार वाला रखा गया।

    वित्तीय एकीकरण

    संविधान सभा द्वारा राज्यों के वित्तीय एकीकरण के उपाय सुझाने के लिये नलिनी रंजन सरकार की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने दिसम्बर 1947 में अपनी रिपोर्ट दी। समिति द्वारा अनुभव किया गया कि राज्यों के वित्तीय एकीकरण की सबसे बड़ी बाधा वित्तीय आंकड़ों की अनुपलब्धता है। इस समिति ने सुझाव दिया कि समस्त राज्यों में संपूर्ण देश के समान कर व्यवस्था लागू होनी चाहिये। यह व्यवस्था 15 वर्ष के लिये लागू की जानी चाहिये। समस्त राज्यों को निर्देशित किया जाना चाहिये कि वे राज्य के बजट का निर्माण आवश्यक रूप से करें तथा खातों व लेखों की अंकेक्षण व्यवस्था करें। 22 अक्टूबर 1948 को वी. टी. कृष्णामाचारी की अध्यक्षता में 'इण्डियन स्टेट्स फाइनेंसेज इंक्वायरी कमेटी' का गठन किया गया। विभिन्न राज्यों तथा संघ राज्यों ने इस समिति का विरोध किया क्योंकि राज्य तथा राज्य संघ वित्तीय मामालों में केंद्र का हस्तक्षेप नहीं चाहते थे। 1 अप्रेल 1950 को राज्य का वित्तीय एकीकरण हुआ। इसके अनुसार राज्य सरकार द्वारा रेलवे, सेना और ऑडिट विभाग तथा उससे सम्बन्धित स्थावर और जंगम संपत्ति भारत सरकार को बिना किसी मुआवजे के सौंप दी गयी। राज्य पर बाह्य आक्रमणों से निबटने का उत्तरदायित्व केन्द्र सरकार पर चला गया।


    कानून व्यवस्था की समस्याएं

    राजस्थान के अस्तित्व में आने के समय अधिकांश राज्यों में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी हुई थी तथा प्रशासन अत्यंत बदतर अवस्था में था। कानून सतही तथा अपर्याप्त थे। प्रशासनिक प्रक्रियाएं सुस्पष्ट नहीं थीं। बड़ी सीमा तक प्रशासन व्यक्तिगत प्रकृति का था तथा राजा और उसके सलाहकारों की मर्जी से चलता था। नवनिर्मित राजस्थान में इन राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्था को एक स्तर पर लाना सबसे बड़ी चुनौती थी। सबसे पहला कार्य डकैतों और लुटेरों पर काबू पाकर कानून की पुनर्स्थापना का था जो कि गाँवों और दूर दराज के क्षेत्रों में आतंक मचाये हुए थे। यह कार्य बहुत शीघ्रता और अत्यंत दक्षता से किया गया।

    जागीरदारों में बेचैनी

    राजस्थान की रियासतों में राजस्व संग्रहण की दृष्टि से दो प्रकार की भूमि थी, खालसा भूमि तथा जागीरी भूमि। खालसा भूमि के अंतर्गत 50,126 वर्गमील तथा जागीरी भूमि के अंतर्गत 77,110 वर्गमील क्षेत्रफल था। राजस्थान के 16,638 गाँव खालसा के अंतर्गत तथा 16,780 गाँव जागीरों के अंतर्गत आते थे। राजस्थान संघ के बनने से चूंकि रियासतें ही नहीं रह गयीं थीं इसलिये जागीरी प्रथा नितांत अप्रासंगिक हो गयी थी। विभिन्न राज्यों के प्रजामण्डलों एवं प्रजा परिषदों जैसी लोकप्रिय संस्थाओं ने जागीरों को समाप्त करने की मांग की। 25 जनवरी 1949 को सरदार पटेल ने जोधपुर में आयोजित एक आम सभा में कहा कि जागीरदार बदले हुए समय को पहचानें। जो लोग गलत काम करते हुए पाये जायेंगे उनसे दूसरी तरह का व्यवहार किया जायेगा। जागीरदारों को समझना चाहिये कि गलत क्या है उन्हें यह भी समझना चाहिये कि आज के युग में बड़े और छोटे का भेद तथा स्वामी और सामान्य आदमी का भेद समाप्त हो गया है तथा यह प्रचलन से बाहर हो गया है। उन्हें उन लोगों के भाग्य से सबक लेना चाहिये जो प्रजातंत्र के साथ नहीं चले या एकीकरण की प्रक्रिया के साथ नहीं चले। हमने एकीकरण की दिशा में जो कुछ भी प्राप्त किया है वह राजाओं की साख और सहयोग से प्राप्त किया है। कोई भी जागीरदार बलपूर्वक, डकैती से या बदला लेने की विधि से कुछ भी हासिल नहीं कर सकेगा। यह एक परिणामहीन व्यापार है। भारत उपनिवेश शांति तथा सुरक्षा के लिये उत्तरदायी है। सरदार ने मारवाड़ प्रजा परिषद के नेताओं तथा स्थानीय कांग्रेसी नेताओं को सलाह दी कि वे जागीरदारों का अपमान करने वाली टिप्पणियां न करें। उन्हें जागीरदारों की समस्या को समाप्त करने के लिये समझाईश से काम लेना चाहिये तथा जागीरदारों के हृदय में स्थान बनाना चाहिये।

    14 फरवरी 1949 को जोधपुर महाराजा ने अधिसूचना जारी की कि जागीरदारों से मालगुजारी की वसूली के अधिकार वापिस लिये जाते हैं। इस पर जागीरदारों का असंतोष चरम पर पहुँच गया। 16 फरवरी को महाराजा ने इस आदेश को वापिस ले लिया। वापसी के आदेश में कहा गया कि 14 फरवरी की अधिसूचना से लोगों में गलतफहमी पैदा हुई है। वास्तव में यह अधिसूचना भविष्य के लिये थी। जब तक इस सम्बन्ध में कोई कानून पास न हो जाये, तब तक जागीरदार प्रचलित स्थानीय रिवाज या प्रथा के अनुसार रोकड़ या किस्म में लगान वसूली करते रहेंगे। वृहद राजस्थान बनने के बाद जागीरदारी अधिकार लोप अध्यादेश जारी किया गया जिसे लेकर जागीरदारों में बेचैनी उत्पन्न हो गयी। 8 मई 1949 को राजस्थान क्षत्रिय महासभा के जयपुर अधिवेशन में कई प्रस्ताव पारित किये गये। सभापति ठाकुर माधोसिंह संखवास ने कहा कि राजस्थान संघ के निर्माण के समय जब राजस्थान क्षत्रिय महासभा के पदाधिकारी रियासती विभाग के अधिकारियों से मिले थे तब हमें आश्वासन दिया गया था कि हमारी मुख्य मांगों को स्वीकार किया जायेगा। जब जागीरदारी अधिकार लोप अध्यादेश जारी हुआ तब भी हमने अपनी आपत्तियां रियासती विभाग को प्रस्तुत की थीं किंतु उन पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है। हमारे सामने इस समय तीन प्रश्न विचाराधीन हैं- राजस्व अधिकारी का आदेश, मंत्रिमण्डल का उचित निर्माण तथा क्षत्रिय समाज के विरुद्ध पक्षपात एवं अन्याय पूर्ण कानून। कांग्रेस जागीरदारी प्रथा का नाश चाहती है किंतु मैं इस अन्याय पूर्ण सिद्धांत के विरुद्ध हूँ.......आज हमारे सामने जीवन मरण का प्रश्न है।

    सभा में पारित एक प्रस्ताव में कहा गया कि राजस्थान क्षत्रिय महासभा पहले वाली राजस्थान सरकार (संयुक्त राजस्थान) के राजस्व सम्बन्धी उस आदेश पर खेद व्यक्त करती है कि इस आदेश ने निश्चित वर्ग के जागीरदारों की राजस्व शक्ति समाप्त कर दी तथा समस्त जागीरदारों द्वारा अपने क्षेत्र के भूस्वामियों से राजस्व वसूलने के अधिकारों को भी समाप्त कर दिया। काश्तकारों से भूमि का किराया वसूल करना जागीरदारी प्रथा का मूलभूत अधिकार है। इसे समाप्त करना जागीर प्रथा को जड़ से काट फैंकने जैसा है जो इसे पूरी तरह समाप्त कर देगा। क्षत्रिय महासभा, सरकार के इस कृत्य को गैरकानूनी तथा अन्यायपूर्ण मानते हुए इसका विरोध करती है। उस समय राजप्रमु,ख महाराणा उदयपुर ने आश्वासन दिया था कि वे इस आदेश को रद्द कर देंगे किंतु इस दिशा में कुछ नहीं किया गया। इसलिये यह सभा वर्तमान सरकार से अनुरोध करती है कि इस आदेश को रद्द कर दे। सभा में पारित एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया कि भू काश्तकारी प्रथा के सम्बन्ध में वर्तमान सरकार द्वारा हाल ही में गठित समिति के बारे में सभा का मानना है कि यह समिति एक आम नीति तैयार करने के लिये बनायी गयी है। राजस्थान सरकार को सर्वेक्षण एवं चकबंदी के सम्बन्ध में यथा स्थिति बनाये जाने के लिये कहा जाना चाहिये तथा आम नीति का निर्माण होने तक राजस्थान सरकार द्वारा वर्तमान में की जा रही कार्यवाही को रोक दिया जाना चाहिये। चकबंदी विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न आधार पर की जाती है जिससे संदेह एवं अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। यह आवश्यक है कि चकबंदी समान आधार पर की जानी चाहिये। जागीरदारों एवं भूस्वामियों के लिये खुदकाश्त का विषय अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। सर्वेक्षण तथा चकबंदी का काम आगे बढ़ाने से पहले इस प्रश्न को सुलझाया जाना चाहिये अन्यथा शेखावाटी के उदयपुरवाटी तथा तोरावाटी क्षेत्रों की तरह बड़ा असंतोष उत्पन्न हो जायेगा। इस विषय को आवश्यक कार्यवाही के लिये जागीर उपसमिति को सौंप दिया जाना चाहिये। आजकल कुछ व्यक्ति देश में होने वाले दंगों एवं गैर कानूनी डकैती आदि कुकृत्यों को केवल क्षत्रियों का कर्त्तव्य बताकर क्षत्रिय समाज के प्रति दूषित वातावरण उत्पन्न करते हैं। क्षत्रिय महासभा उनकी इस नीति का तीव्र विरोध करती है और इसे असत्य एवं निराधार ठहराती है।

    भारत सरकार के प्रस्ताव संख्या आर (61)-पी/49 दिनांक 30 अगस्त 1949 को यह प्रस्ताव किया गया कि राजस्थान तथा मध्यभारत की जागीरों के सम्बन्ध में एक समिति बनायी जाये जो इन जागीरों का भविष्य तय करने के लिये अपनी रिपोर्ट प्रदान करे। इस क्रम में सी. एस. वेंकटाचार की अध्यक्षता में एक समिति बनायी गयी जिसमें राजस्थान से गोकुलभाई भट्ट एवं सीताराम जाजू को तथा मध्य भारत से ब्रजचंद शर्मा एवं वी. विश्वनाथन को लिया गया। इस समिति ने 18 दिसम्बर 1949 को अपनी रिपोर्ट दी जिसमें कहा गया कि जागीरदारी प्रथा समाप्त होनी चाहिये तथा राजस्व संग्रहण का कार्य सरकार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में होना चाहिये। जागीरदारी अधिकार सम्पत्ति के अधिकार नहीं हैं अतः जागीरदारों को कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी जानी चाहिये। जिन जागीरदारों के नियंत्रण में पूरा गाँव है, उन्हें पुनर्वास सहायता दी जानी चाहिये। जागीर के लिये वार्षिक मूल्य दिया जाना चाहिये। जागीरदारों, माफीदारों इत्यादि को उनके अधिकार वाली कृषि जोत तथा भूखण्डों की पूर्ण वार्षिक आय अगले 12 वर्षों तक दी जानी चाहिये। काश्तकारों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिये ताकि जागीरदार उनकी भूमि को हड़प न सकें।

    अकाल की समस्या

    जिस समय वृहद राजस्थान अस्तित्व में आया उस समय पश्चिमी राजस्थान में भयानक अकाल एवं सूखे की स्थिति थी। बाड़मेर क्षेत्र के पशुपालकों एवं किसानों ने एक ज्ञापन रीजनल कमिश्नर को भिजवाया। इस पत्र में वृहद राजस्थान सरकार से अपील की गयी कि विगत 45 वर्षों से इस क्षेत्र के गाँवों में सूखा पड़ रहा है। हमारे पास न तो बीज हैं न बैल हैं। अतः सरकार हमारी मदद के लिये आगे आये ताकि हमारे बच्चे जीवित रह सकें। पहले हम लोग सिंध क्षेत्र में पलायन कर जाते थे किंतु अब देश के विभाजन के कारण वहाँ जाना संभव नहीं रह गया है। पहले सूद पर पैसा देने वाले लोग हमें प्रसन्नता पूर्वक ऋण दे देते थे किंतु अब उन्हें भय है कि सरकार हमें कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करवायेगी इसलिये वे हमें ऋण नहीं दे रहे।

    पाकिस्तान जा चुके कर्मचारियों से ऋण वूसली की समस्या

    विभिन्न रियासतों में कार्यरत कुछ मुस्लिम राजकीय कर्मचारी पाकिस्तान चले गये। उनमें से कई कर्मचारियों ने राज्यकोष से ऋण ले रखे थे जिनकी उनसे वसूली की जानी थी। निम्बाहेड़ा के मजिस्ट्रेट अजीमुद्दीन खान ने टोंक रियासत से ऋण लेकर अपने भाई को डॉक्टरी की पढ़ाई करवायी थी। जब देश का विभाजन हुआ तो अजीमुद्दीन खान ने अपने भाई को लाहौर भेज दिया तथा स्वयं भी अपने मकान का सौदा करके लाहौर चला गया। पाकिस्तान जाने से पहले उसने यह टिप्प्णी भी कि चूंकि अब राजस्थान में हिन्दुओं की सरकार बनेगी इसलिये मुसलमानों को यहाँ नहीं रहना चाहिये। अजीमुद्दीन खान द्वारा टोंक रियासत के समय में लिये गये ऋण की वसूली करने तथा एक मजिस्ट्रेट द्वारा इस प्रकार की अनर्गल टिप्पणी करने के लिये उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के लिये टोंक से रामरख पटेल ने राजपूताना के रीजनल कमिश्नर को एक पत्र लिखा।

    सुवाणा गोली काण्ड

    21 जुलाई 1949 को भीलवाड़ा जिले के सुवाणा गांव में लेवी के विरोध में प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस ने फायरिंग की जिससे 21 से अधिक किसान मारे गये और अनेक घायल हो गये। मुख्यमंत्री ने इस कांड के लिये कांग्रेसी नेताओं को दोषी ठहराया। न तो मुख्यमंत्री स्वयं और न मंत्रिमण्डल का कोई सदस्य घटना स्थल पर पहुँचा। इससे क्षुब्ध होकर जयप्रकाश नारायण ने 29 जुलाई 1949 को सुवाणा दिवस मनाने का आह्वान किया। समाजवादी नेता जय प्रकाश नारायण ने इस काण्ड की तुलना जलियांवाला कांड से की।


    राजनैतिक समस्याएँ


    राजप्रमुख एवं उपराजप्रमुख के पद की नियुक्ति

    द्वितीय राजस्थान संघ की राजस्थान प्रसंविदा (Rajasthan Covenant) में राजस्थान संघ में सम्मिलित राज्यों के राजाओं को राजप्रमुख एवं उप-राजप्रमुख चुनने के लिये एक एक मत का अधिकार दिया गया। बाद में अनुभव किया गया कि राजस्थान संघ में प्रवेश करने वाली बड़ी रियासतों- जयपुर, जोधपुर एवं बीकानेर को कुछ अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिये। अतः राजाओं की परिषद के प्रत्येक सदस्य के पास उस राज्य की प्रति लाख जनसंख्या के अनुसार मतदान का अधिकार दिया गया।

    राजाओं के विशेषाधिकार

    राज्यों के राजस्थान में विलय के पश्चात ही राजाओं के शासनाधिकार समाप्त हो गये किंतु उनके कुछ विशेषाधिकार और प्रिवीपर्स बने रहने दिये गये। बहुत से लोगों का मानना था कि अब राजाओं को विशेषाधिकार किस बात के मिलने चाहिये? राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री का मानना था कि राजाओं ने अपने राज्य छोड़ दिये तो उनके साथ मिठास का व्यवहार होना चाहिये। छोटी-छोटी बातों में उनको नाराज या उदास नहीं करना चाहिये। अपनी जीवनी में उन्होंने लिखा है- किसी भी राजा या रानी ने मुझसे कुछ चाहा तो मैंने तत्परता के साथ वह कर दिया।

    जोधपुर महाराजा हनवंतसिंह का मानना था- 'नरेशों को उन्हें दिये गये विशेषाधिकारों की रक्षा के लिये हाय-तौबा करने की क्या आवश्यकता है? जब रियासतें ही भारत के मानचित्र से मिटा दी गयीं तो थोथे विशेषाधिकार केवल बच्चों के खिलौनों का सा दिखावा हैं। सामंती शासन का युग समाप्त हो जाने के बाद भूतपूर्व नरेशों के सामने एक ही रास्ता है कि वे जनसाधारण की कोटि तक उठने की कोशिश करें। एक निरर्थक आभूषण के रूप में जीवन बिताने की अपेक्षा कहीं ज्यादा अच्छा होगा कि वे राष्ट्र की जीवनधारा के साथ चलते हुए सच्चे अर्थ में जनसेवक बनें और उसी आधार पर अपने बल की नींव डालें।' 

    जयपुर राज्य के सीकर, खेतड़ी व उणियारा ठिकानों के ठिकानेदारों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे। राजस्थान के एकीकरण के पश्चात् उन्हें वापस लेने की बात उठी। मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री ने तीनों ठिकानेदारों को बुलाकर कहा कि आपके ये विशेषाधिकार वापस लिये जा रहे हैं। इनमें से एक ठिकाणेदार बहुत राजी से, दूसरा तटस्थ भाव से और तीसरा कुछ हुज्जत के बाद अपने विशेषाधिकार छोड़ने के लिये मान गया।

    मत्स्य संघ का विलय

    18 मार्च 1948 को मत्स्य संघ अस्तित्व में आया था और उसे काम करते हुए कुछ माह ही हुए थे किंतु इस संघ में चारों ओर असंतोष व्याप्त हो गया। संघ में जाटवाद बनाम समाजवाद का झगड़ा फैल गया। समाजवादी दल, जनाधिकार समिति तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने सरकार की नीतियों का विरोध किया। भरतपुर में किसान सभा और नागरिक सभा भी विरोध पर उतर आयी। सरकार ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं को बड़ी संख्या में गिरफ्तार कर लिया। जनता इन सब बातों के कारण मत्स्य संघ की सरकार से तंग आ गयी और इस संघ का कोई विकल्प ढूंढने लगी। कांग्रेसी कार्यकर्ता चाहते थे कि मत्स्य संघ को या तो संयुक्त प्रांत में मिला दिया जाये या फिर दिल्ली के साथ जोड़ दिया जाये। जागीरदार वर्ग इस संघ को राजस्थान में मिलाने के लिये उत्सुक था। किसान चाहते थे कि भरतपुर और धौलपुर क्षेत्र को एक पृथक इकाई बनाया जाये और इसका नाम बृजप्रदेश रखा जाये। मेव लोग अब भी मेवस्तान की स्थापना का स्वप्न देख रहे थे। इन आंदोलनों के चलते भारत सरकार को भय हुआ कि कहीं संघ का विघटन न हो जाये।

    13 फरवरी 1949 को अलवर, भरतपुर, धौलपुर तथा करौली के शासकों व मत्स्य संघ के मंत्रियों को दिल्ली बुलवाया गया। अलवर और करौली ने संघ को राजस्थान में मिलाने की स्वीकृति प्रदान की किंतु भरतपुर नरेश तथा धौलपुर नरेश इसपर सहमत नहीं हुए। इन दोनों राज्यों के नेताओं में भी विवाद हो गया। उनमें से कुछ राजस्थान में तो कुछ उत्तर प्रदेश में मिलना चाहते थे। 23 मार्च 1949 को पुनः एक बैठक हुई जिसमें भरतपुर तथा धौलपुर नरेशों ने राजस्थान में मिलने की इच्छा व्यक्त की। धौलपुर नरेश ने शर्त रखी कि यदि बाद में धौलपुर, उत्तर प्रदेश में मिलना चाहे तो उसका प्रावधान रखा जाये।

    मत्स्य संघ के निर्माण के समय भी भरतपुर एवं धौलपुर राज्यों की जनता यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ राजस्थान तथा यूनाईटेड प्रोविंसेज (उत्तर प्रदेश) में सम्मिलित होने को लेकर दो भागों में बंट गयी थी। अतः जब मत्स्य संघ के वृहद राजस्थान में विलय की योजना सामने आयी तो रियासती विभाग ने दोनों राज्यों की जनता की राय जानने के लिये आई.सी.एस. अधिकारी शंकरराव देव की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की। आर. के. सिधवा एवं प्रभुदयाल हिम्मतसिंहका को समिति का सदस्य नियुक्त किया गया। 4 अप्रेल 1949 को इस सम्बन्ध में एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गयी। समिति ने भरतपुर एवं धौलपुर राज्यों में विभिन्न समुदायों से बात करके अपनी रिपोर्ट दी जिसमें कहा गया कि मत्स्य संघ को वृहत् राजस्थान में मिलाया जाना उचित रहेगा किंतु एक निश्चित समय के बाद लोगों की राय को दुबारा से जाना जाये। भारत सरकार ने यह अनुशंसा स्वीकार कर ली तथा 1 मई 1949 को समाचार पत्रों के माध्यम से इसकी सूचना प्रकाशित करवायी।

    10 मई 1949 को पुनः चारों राजाओं तथा राजस्थान संघ के राजप्रमुख को दिल्ली बुलाया गया। चारों राजाओं ने मत्स्य संघ के राजस्थान में विलय के लिये तैयार की गयी प्रसंविदा (Covenant) पर हस्ताक्षर कर दिये। राजस्थान संघ की ओर से राजप्रमुख ने हस्ताक्षर किये। प्रसंविदा में प्रवाधान किया गया कि जब भारत सरकार अनुभव करे तब भरतपुर तथा धौलपुर की जनता की इच्छा का पता लगाया जाये कि वह राजस्थान के साथ ही रहना चाहती है या यूनाईटेड प्रोविंसेज में सम्मिलित होने की इच्छा रखती है। 15 मई 1949 को मत्स्य संघ का प्रशासन वृहत् राजस्थान को स्थानांतरित हो गया। मत्स्य संघ के मुख्यमंत्री शोभाराम को हीरालाल शास्त्री मंत्रिमंडल में सम्मिलित कर लिया गया।

    सिरोही राज्य के उत्तराधिकारी की समस्या

    23 जनवरी 1946 को सिरोही महाराजा सरोपरामसिंह का निधन हो गया। उनके कोई पुत्र नहीं था। इसलिये तेजसिंह, अभयसिंह तथा लखपतसिंह ने सिरोही राज्य की गद्दी पर दावा किया। तेजसिंह शासक परिवार की मण्डार शाखा से था, अभयसिंह महाराव उम्मेदसिंह के भाई का पौत्र था तथा लखपतसिंह महाराव सरोपरामसिंह की एक राजपूत स्त्री से उत्पन्न पुत्र था। क्राउन प्रतिनिधि ने तेजसिंह को सिरोही का शासक स्वीकार कर लिया। इस पर शेष दावेदारों ने क्राउन प्रतिनिधि के समक्ष पुनर्विचार याचिका प्रस्तुत की। यह विवाद आजादी के बाद तथा राजस्थान के निर्माण के बाद भी चलता रहा। 10 मार्च 1949 को भारत सरकार द्वारा सौराष्ट्र उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सर एच. वी. देवतिया, महाराजा जयपुर तथा महाराजा कोटा की सदस्यता वाली समिति का गठन किया गया। समिति की अनुशंसा पर अभयसिंह को सिरोही का वास्तविक अधिकारी मान लिया गया।

    सिरोही राज्य का विलय

    15 अगस्त 1947 से माउण्ट आबू का प्रशासन केन्द्र सरकार द्वारा चलाया जा रहा था। 1 फरवरी 1948 को सिरोही राज्य राजपूताना एजेंसी से हटाकर बंबई प्रांत के वेस्टर्न इण्डियन स्टेट्स एजेंसी के अंतर्गत रख दिया गया था। सिरोही राज्य की जनता ने मांग की कि सिरोही राज्य को बम्बई में न मिलाया जाकर संयुक्त राजस्थान में मिलाया जाये। जब उदयपुर राज्य ने संयुक्त राजस्थान में मिलने का निर्णय लिया तो यह मांग और अधिक प्रबल हो गयी। अ.भा.दे.रा. लोक परिषद् की राजपूताना प्रांतीय सभा के महामंत्री हीरालाल शास्त्री ने 10 अप्रेल 1948 को सरदार पटेल को लिखा कि उदयपुर संयुक्त राजस्थान में सम्मिलित हो रहा है इससे सिरोही का राजस्थान में सम्मिलित होना और भी अवश्यंभावी हो गया है। फिर हमारे लिये सिरोही का अर्थ है गोकुलभाईं बिना गोकुल भाई के हम राजस्थान नहीं चला सकते। शास्त्री को इस तार का कोई उत्तर नहीं मिला। इस पर शास्त्री ने 14 अप्रेल 1948 को दूसरा तार भेजा- हम लोग कोई कारण नहीं देखते कि क्षण मात्र के लिये भी सिरोही को राजस्थान की बजाय रियासतों के अन्य किसी समूह में मिलाने की दिशा में सोचा जा सकता है।.....इस प्रश्न पर मैं आपसे निवेदन करना चाहूंगा कि आप राजस्थान की जनता की भावना की अनदेखी न करें।........मुझे विश्वास है कि आप हमारी सर्वसम्मत प्रार्थना को स्वीकार कर हमारी सहायता करेंगे।

    18 अप्रेल 1948 को जब जवाहरलाल नेहरू संयुक्त राजस्थान के उद्घाटन के लिये उदयपुर आये तो राजस्थान के कार्यकर्ताओं ने नेहरू को जनभावनाओं से अवगत करवाया। नेहरू ने दिल्ली लौटते ही सरदार पटेल को पत्र लिखकर सूचित किया कि राजस्थान भर में कार्यकर्ताओं में जिस सवाल पर सबसे अधिक रोष था, वह था सिरोही के बारे में। ....... मुझे बार-बार कहा गया कि सिरोही गत 300 वर्षों से भाषा और अन्य प्रकार से राजस्थान प्रदेश का अंग रहा है। अतः उसे राजस्थान से मिलना चाहिये। मैंने उनसे कहा कि मुझे इस विषय के विभिन्न पहलुओं की जानकारी नहीं है, अतः मैं इस सम्बन्ध में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूँ। पर साधारणतः जहाँ मतभेद हो, वहाँ जनता की राय ही मान्य होनी चाहिये। पटेल ने नेहरू को लिखा कि सिरोही के सम्बन्ध में मेरी इन लोगों से कई बार बात हुई है। समस्त सम्बन्धित मुद्दों पर विचार करने के बाद ही हम इस निर्णय पर पहुँचे कि सिरोही गुजरात को जाना चाहिये। राजस्थान वालों को सिरोही नहीं गोकुलभाई भट्ट चाहिये। उनकी यह मांग सिरोही को राजस्थान को दिये बिना ही पूरी की जा सकती है।

    इस समय सिरोही राज्य का शासक अल्पवयस्क था तथा शासन प्रबंध राजमाता के नेतृत्व में रीजेंसी कौंसिल द्वारा किया जाता था। राज्य के उत्तराधिकार के प्रश्न पर भी विवाद चल रहा था। वी. पी. मेनन ने राजमाता के सलाहकार गोकुलभाई भट्ट से विचार विमर्श किया जो उस समय राजस्थान प्रोविंशियल कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी थे। 8 नवम्बर 1948 को भारत सरकार ने सिरोही रीजेंसी कौंसिल से समझौता किया जिसके अनुसार 5 जनवरी 1949 को सिरोही का शासन प्रबंध बम्बई सरकार को दे दिया गया। गुजरातियों का दावा था कि माउण्ट आबू परम्परा से तथा ऐतिहासिक रूप से गुजरात से जुड़ा हुआ रहा था एवं आबू पर्वत पर स्थित जैन मंदिरों के दर्शनार्थ गुजरात तथा काठियावाड़ के जैन परिवार पूरे वर्ष बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। सिरोही के राजपरिवार का काठियावाड़ और कच्छ के राजपरिवार से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। राजस्थान के नेताओं का तर्क था कि सिरोही कई वर्षों से राजपूताना का भाग रहा है। सिरोही राज्य में गुजराती बोलने वालों का बहुमत नहीं है। भाषा और संस्कृति की दृष्टि से सिरोही को राजस्थान में मिलना चाहिये। ग्रीष्म काल में राजपूताना के रईसों का आवास आबू पर्वत रहता था। आबू पर्वत पर उनकी कोठियां बनी हुई हैं। आबू के अतिरिक्त राजस्थान में और कोई पर्वतीय स्थल नहीं है।

    सिरोही राज्य के लोकप्रिय नेता भी इस विषय पर दो भागों में विभक्त थे। समस्त पक्षों को सुनने के बाद वी. पी. मेनन ने निर्णय दिया कि संपूर्ण सिरोही राज्य को बम्बई प्रांत में मिलाया जाना उचित नहीं होगा राज्य का विभाजन किया जाना ही इस समस्या का एकमात्र हल है। सरदार पटेल से विचार विमर्श के बाद गोकुलभाई भट्ट तथा सिरोही राज्य के अन्य लोकप्रिय नेताओं को दिल्ली बुलाया गया। मेनन ने इन नेताओं के समक्ष अपना और सरदार पटेल का दृष्टिकोण स्पष्ट किया। इस पर हीरालाल शास्त्री और गोकुल भाई भट्ट ने माणिक्यलाल वर्मा को बताया कि सरदार पटेल सिरोही को गुजरात में मिलाना चाहते हैं किंतु यदि राजस्थान वाले आबू पर अपना अधिकार छोड़ दें तो पटेल शेष सिरोही को राजस्थान में मिला देंगे। माणिक्यलाल वर्मा ने इस प्रस्ताव को यह कह कर अस्वीकार कर दिया कि आबू राजस्थान की नाक है। हम आबू पर अपना हक नहीं छोड़ेंगे। जब मेनन ने गोकुल भाई भट्ट आदि नेताओं को सरदार पटेल के सिरोही विभाजन के फैसले की जानकारी दी तो इन नेताओं ने फैसले के प्रति उत्साह तो नहीं दिखाया किंतु अवश्यंभावी कहकर इसे स्वीकार कर लिया। यह निश्चित किया गया कि आबूरोड तथा देलवाड़ा तहसीलों को बम्बई प्रांत में तथा शेष राज्य को राजस्थान में मिलाया जाना चाहिये। 24 जनवरी 1950 को पटेल ने लोकसभा में माउंट आबू और देलवाड़ा तहसील जिसमें 89 गांव थे, तत्कालीन बंबई राज्य में और शेष सिरोही को राजस्थान में मिलाने की घोषणा की। इस निर्णय के विरोध में सिरोही की जनता ने आंदोलन आरंभ किया। लगभग पौने सात साल तक यह आंदोलन चलता रहा। अंत में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर 1 नवम्बर 1956 को आबूरोड और देलवाड़ा तहसील जिसमें आबूपर्वत भी शामिल था, को राजस्थान में मिला दिया गया।

    कच्छ के राजस्थान में विलय की मांग

    कुछ संस्थाओं एवं व्यक्तियों द्वारा कच्छ क्षेत्र को काठियावाड़ अथवा बम्बई प्रांत में सम्मिलित न करके राजस्थान में सम्मिलित करने की मांग की गयी। इन लोगों का तर्क था कि राजस्थान का विशाल क्षेत्र कच्छ से जुड़ा हुआ है तथा इस क्षेत्र को राजस्थान में सम्मिलित करने से राजस्थान को बंदरगाह की सुविधा मिल जायेगी जिससे राजस्थान में औद्योगिक एवं व्यापारिक विकास की गति को बढ़ाने में सहायता मिलेगी। कच्छ को काठियावाड़ या बम्बई में मिलने से कोई महत्ता प्राप्त नहीं होगी क्योंकि उन प्रदेशों में पहले से ही कई बंदरगाह स्थित हैं जबकि राजस्थान में मिलने से कच्छ को महत्त्वपूर्ण स्थिति प्राप्त हो जायेगी। कच्छ को राजस्थान में मिलाने की मांग करने वालों का तर्क यह भी था कि कच्छ के राजाओं के वैवाहिक सम्बन्ध राजपूताने की रियासतों के शासकों से हैं इससे भी कच्छ को राजस्थान में मिलने में कोई कठिनाई नहीं होगी। इसके अतिरिक्त अभी भी कच्छ का एक सौ मील से भी अधिक क्षेत्र राजस्थान में सम्मिलित किया गया है अतः पूरे कच्छ को राजस्थान में मिलाना अधिक उचति रहेगा। भारत सरकार ने यह मांग नहीं मानी।

    राजस्थानी भाषा को मान्यता देने की मांग

    राजस्थानी भाषा को स्थापित करने के उद्देश्य से राजस्थानी भाषा के विद्वान चालीस के दशक से ही प्रयत्नशील थे। 1942 में ठाकुर रामसिंह ने प्रयास किया कि हिन्दू विश्व विद्यालय में राजस्थानी विभाग स्थापित हो। 5 अक्टूबर 1947 को जोधपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र 'मारवाड़ी' के सम्पादक श्रीमंत कुमार व्यास ने महाराजा जोधपुर को लिखा कि राजस्थानी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलवाने के लिये एक आंदोलन चलाया गया है जिसके लिये समाचार पत्र को जोधपुर नरेश से सहयोग, सुविधा तथा उत्साह पाने की पूरी आशा है। राजस्थान के गठन के साथ ही राजस्थानी भाषा को संविधान में मान्यता देने तथा इसे राजभाषा घोषित करने की मांग उठी। राष्ट्रीय नेता इस मांग को उचित नहीं समझते थे इसलिये इस मांग को स्वीकार नहीं किया गया। कन्हैयालाल सेठिया के एक पत्र के उत्तर में भारत सरकार के कृषि मंत्री के. एम. मुंशी ने लिखा- 'राजस्थान में तो सवर्तः हिन्दी भाषा का प्रयोग किया जाता है फिर राजस्थानी भाषा को स्वीकार कराने से क्या लाभ है?' 

    गोकुलभाई भट्ट ने 14 नवम्बर 1949 को कन्हैयालाल सेठिया को लिखा कि अगर राजस्थान की किसी रियासत ने राजस्थानी को पहले से स्थान दिया होता तो राजस्थानी को समर्थन होता। सब रियासतों ने हिन्दी को ही राजभाषा माना था, इसलिये मुझे (राजस्थानी को राजभाषा के रूप में स्वीकृत करवाने का) खास मौका नहीं मिला है। जयनारायण व्यास ने सेठिया को लिखा कि अभी तक सिरोही के प्रश्न की अंत्येष्टि नहीं हुई है। अतः सिरोही दिवस मनाना मरने के पहिले मरसिया गाना है। राजस्थानी भाषा है और उसका प्रचार-प्रसार होना चाहिये। यह मेरी राय पहिले थी और अब भी है पर एक खानगी सी मीटिंग में मैंने अपने समाज को अवश्य कोसा कि उसने इस भाषा को जीवित और प्रचलित रखने के लिये कुछ नहीं किया जिससे लोगों को हमारी भाषा को मान्यता नहीं देने का साहस और उत्साह हो जाता है। मैंने यातियों की पौशालों का कभी जिक्र किया था जिसके द्वारा भाषा जीवित थी पर हमारी उपेक्षा से वे भी समाप्त हो गयीं।

    नरोत्तम स्वामी ने 1949 में कन्हैयालाल सेठिया को लिखा कि राजस्थानी आंदोलन का नेतृत्व करना मेरे वश की बात नहीं। दौड़ना-भागना, लोगों से मिलना-मिलाना, उन्हें कायल करना, भाषणों या लेखों द्वारा धुंआँधार प्रचार करके एक आंदोलन खड़ा कर देना ये कार्य मेरे लिये संभव नहीं। उन्होंने सुझाव दिया कि हिन्दी भले ही राजभाषा के रूप में सरकारी कार्यालयों एवं न्यायालयों में बनी रहे किंतु लोगों को यह अधिकार दिया जाये कि वे राजस्थानी में अर्जियां दे सकें।


    नेतृत्व की समस्याएं

    कांग्रेस की राजस्थान इकाई में शास्त्री का विरोध

    राजस्थान के एकीकरण के बाद प्रदेश में जो पहली लोकप्रिय सरकार बनी, उसे लेकर कांग्रेस के भीतर सरदार पटेल का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ। शास्त्री के नेता पद पर चुने जाने के ढंग पर प्रांत भर में आलोचना हुई। इसे एक फासिस्टी चुनाव कहा गया, जिससे लोकतंत्र की हत्या हुई है। 7 अप्रेल 1949 को जयपुर के सिद्धराज ढड्ढा, उदयपुर के प्रेमनारायण माथुर और भूरेलाल बया तथा बीकानेर के रघुबरदयाल गोयल ने मंत्री पद की शपथ ली। बाद में कोटा के वेदपाल त्यागी, जोधपुर के फूलचंद बाफणा, नृसिंह कच्छवाहा और रावराजा हणूंतसिंह ने शपथ ली। मत्स्य राज्य का वृहत् राजस्थान में विलय होने पर मई 1949 में मत्स्य राज्य के मुख्यमंत्री शोभाराम ने भी शास्त्री मंत्रिमंडल में मंत्री के रूप में शपथ ली। शास्त्री, व्यास को गृहमंत्री बनाना चाहते थे लेकिन व्यास की सलाह पर उनके दो सहयोगियों को मंत्री बनाने को नहीं माने, अतः व्यास गृहमंत्री बनने को तैयार नहीं हुए। जयपुर और बीकानेर से भी शास्त्री ने अपनी पसंद के मंत्री लिये। मुख्यमंत्री पर दबाव डाला गया कि वे जोधपुर से दो, उदयपुर से एक, जयपुर से एक तथा बीकानेर से एक और व्यक्ति को मंत्रिमण्डल में लें किंतु हीरालाल शास्त्री ने यह कहकर कि मंत्रिमण्डल छोटा ही होना चाहिये। उन्होंने अधिक लोगों को मंत्री बनाना अस्वीकार कर दिया।

    व्यास को आशा थी कि शास्त्री उनकी सलाह से काम करेंगे किंतु शास्त्री ने अपने मंत्रिमंडल के निर्माण में न तो जयनारायण व्यास और माणिक्यलाल वर्मा को ही विश्वास में लिया और न ही अपने संभाग के सरदार हरलालसिंह और टीकाराम पालीवाल जैसे लोकप्रिय नेताओं का सहयोग लिया।........प्रतिभा की दृष्टि से यह एक अच्छा मंत्रिमंडल था किंतु दुर्भाग्य से उनमें से अधिकतर सदस्यों का जनाधार नहीं था, न ही उन्हें अपने क्षेत्र के नेताओं का आशीर्वाद प्राप्त था। ये समस्त ऐसे व्यक्ति थे जिनका कांग्रेस संगठन में कोई प्रभाव नहीं था और न ही इन्हें कार्य का अनुभव था। प्रसिद्ध नेता बाहर रखे गये थे। प्रांत में इसका विरोध हुआ और प्रांतीय कार्यसमिति के चार सदस्यों- जयनारायण व्यास, माणिक्यलाल वर्मा, गोकुललाल असावा तथा मीठालाल त्रिवेदी ने त्यागपत्र दे दिया।

    गोकुलभाई भट्ट के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव

    शास्त्री को अपना मंत्रिमंडल बनाये हुए दो सप्ताह भी नहीं हुए कि प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं ने प्रदेश अध्यक्ष गोकुलभाई भट्ट एवं मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री के विरुद्ध अभियान आरंभ कर दिया। जोधपुर में मारवाड़ कांग्रेस कमेटी की बैठक में मथुरादास माथुर ने शास्त्री को पटेल की फासिस्टी विचारधारा का प्रतीक बताया जो व्यास और वर्मा को कमजोर करना चाहते हैं क्योंकि वे नेहरू की प्रगतिशील विचारधारा को मानते हैं। व्यास ने आरोप लगाया कि राजस्थान के निर्माण के बाद की कार्यवाही उनसे छिपायी गयी है। बैठक में पारति एक प्रस्ताव द्वारा मंत्रिमंडल निर्माण, राजधानी और राज्य कर्मचारियों की अनिश्चितता पर असंतोष प्रकट किया गया। बीकानेर, जयपुर और उदयपुर के कांग्रेसियों में भी मंत्रिमंडल के गठन पर रोष था। यह निश्चय हुआ कि प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्ष भट्ट के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रखा जाये। गोकुलभाई भट्ट हीरालाल शास्त्री के समर्थक थे, असंतुष्ट कांग्रेसियों को यह आशा थी कि भट्ट के हटते ही शास्त्री भी हट जायेंगे।

    25 अप्रेल 1949 को सरदार पटेल ने जयनारायण व्यास को चेतावनी दी कि वे उनकी गतिविधियों को देख रहे हैं और व्यास को यह समझ लेना चाहिये कि वे गलत रास्ते पर हैं। 30 अप्रेल 1949 को प्रदेश कांग्रेस समिति ने गोकुल भाई भट्ट तथा हीरालाल शास्त्री के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर विचार करने के लिये 9 जून को एक बैठक बुलायी। इस पर पटेल ने कांग्रेसी नेताओं को पुनः चेतावनी दी कि यदि उन्होंने मंत्री बनने के लोभवश की जा रही हरकतों को बंद नहीं किया तो केन्द्रीय सरकार शासन अपने हाथ में ले लेगी। भट्ट ने प्रांत के कांग्रेसी नेताओं को लिखा कि अखिल भारतीय कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया ने यह मामला पटेल पर छोड़ दिया है, अतः मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास के पूर्व प्रांतीय नेता, पटेल से बात करें। 9 जून 1949 को प्रांतीय कमेटी में दोनों प्रस्ताव प्रचंड बहुमत से पारित हो गये। प्रांतीय कार्यकारिणी के 80 सदस्यों ने गोकुलभाई भट्ट के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित किया। 11 जून को समिति ने जयनारायण व्यास को कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया। गोकुलभाई भट्ट ने 11 जून 1949 को प्रांतीय कमेटी की बैठक बुलाई और कहा कि यदि एक भी सदस्य उन्हें नहीं चाहेगा तो वे पद से हट जायेंगे।

    सरकार विरोधियों के प्रति सरदार पटेल की नाराजगी

    11 जून को ही जयनारायण व्यास ने तार द्वारा रियासती मंत्रालय के प्रभारी मंत्री सरदार पटेल को राजस्थान के प्रधानमंत्री के विरुद्ध प्रदेश कांग्रेस कमेटी में अविश्वास प्रस्ताव के पारित होने की सूचना दी। इस तार में कहा गया कि- आज राजस्थान कांग्रेस की विशेष बैठक में गोकुलभाई भट्ट के त्यागपत्र को स्वीकार करके मुझे अध्यक्ष चुना गया है। कमेटी ने एक प्रस्ताव द्वारा हीरालाल शास्त्री और कांग्रेसी मंत्रियों से त्यागपत्र की मांग की है। 88 सदस्यों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, 1 ने विरोध, कुछ तटस्थ थे, जबकि भट्ट और उनके साथी मतदान के समय चले गये।

    सरदार पटेल द्वारा 12 जून को इस तार का उत्तर दिया गया जिसमें कहा गया- 'आपका तार दो बातों को सूचित करता है- प्रथम, भट्ट का त्यागपत्र और उनकी जगह आपका चयन, जो स्थानीय कांग्रेस का मामला है जिससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं। द्वितीय, शास्त्री और मंत्रियों से त्यागपत्र की मांग। मैं नहीं जानता कि वैधानिक रूप से यह कार्यवाही ठीक है लेकिन आपको समझना चाहिये कि राजस्थान के प्रधानमंत्री शास्त्री, प्रदेश कांग्रेस के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं। प्रदेश कांग्रेस विधान सभा का स्थान नहीं ले सकती। शास्त्री प्रधानमंत्री इसलिये नहीं बने कि उन्हें प्रदेश कांग्रेस ने चुना है, वरन् आप सबकी प्रार्थना पर मैंने चुना है। चुनाव होने तक वे अपने पद पर बने रहेंगे यदि इस बीच वे हमारा विश्वास न खो दें। इस स्थिति को जानते हुए आपका सतत् अनुचित और घातक गतिविधियों में लगे रहना आपके स्वयं के लिये नुक्सान देय होगा।'

    हीरालाल शास्त्री का कहना है कि- 'मैंने व्यासजी, वर्माजी और जयपुर के कुछ साथियों के आग्रह करने पर भी कुछ भाइयों को मंत्रिमण्डल में नहीं लिया। मेरे कुछ कहने सुनने पर भी खुद व्यासजी ने भी मंत्रिमण्डल में आना मंजूर नहीं किया। प्रदेश कांग्रेस कमेटी की ओर से मंत्रिमण्डल का बाकायदा विरोध शुरू हो गया। सरदार ने मुझसे कह दिया कि आप तो अपना काम किये जाओ। जब प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने मेरे विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास करके सरदार को तार दिया तो उन्होंने बड़ा सख्त तार जवाब में दिया कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी को इस काम में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी का निर्णय भी यही हुआ। गोकुलभाई भट्ट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे, उन्होंने त्यागपत्र दे दिया तब भी उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास किया गया।'

    पं. नेहरू ने व्यासजी को पत्र लिखा कि उनकी ओर से जो कुछ किया जा रहा है सो अनुचित और हानिकारक है।

    केन्द्रीय संचार मंत्री रफी अहमद किदवई ने पटेल को पत्र लिखकर उनके द्वारा व्यास को भेजे गये तार पर आश्चर्य और दुख प्रकट किया और कहा कि- 'कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राजेंद्र बाबू और पट्टाभि सीतारमैया अपने निर्देंशों में बार-बार यह कह चुके हैं कि कांग्रेसी सरकारों और संगठनों में सहयोग रखा जाये। जब मंत्रिमंडल में ऐसे व्यक्ति हों जिनमें संगठन का विश्वास न हो तब यह कैसे संभव है। जब विख्यात नेता यह घोषणा करते हैं कि प्रांतीय मंत्रिमंडल के निर्माण में कांग्रेस का हाथ नहीं है तो संस्था को समाप्त करने के समान ही है।'

    रफी ने पटेल के तार के प्रचार पर कड़ी आपत्तिा की। जवाब में पटेल ने लिखा कि- 'वह समझ नहीं सके कि रफी की शिकायत क्या है? शास्त्री को सर्वसम्मति से नेता चुना गया, जब व्यास और वर्मा के प्रतिनिधियों को मंत्रिमंडल में नहीं लिया गया तो हर प्रकार के उपाय काम में लिये गये। क्या कोई ऐसे संगठन को विश्वास से देख सकता है? क्या ऐसा संगठन कांग्रेस को शक्तिशाली बना सकता है?' पटेल ने लिखा कि-समझौते के अनुसार रियासती मंत्रालय को नियंत्रण और निर्देशन का अधिकार है।' 

    असंतुष्ट नेताओं की कार्यकारिणी

    जयनारायण व्यास ने राज्य कांग्रेस कार्यकारिणी में प्रांत के प्रसिद्ध नेताओं को लिया। उदयपुर से माणिक्यलाल वर्मा और मोहनलाल सुखाड़िया, बीकानेर से कुंभाराम आर्य, अलवर से मास्टर भोलानाथ, भरतपुर से आदित्येन्द्र, जयपुर से टीकाराम पालीवाल, डूंगरपुर से भोगीलाल पंड्या, झुंझुनूं से चौधरी हरलालसिंह, शाहपुरा से गोकुललाल असावा, जोधपुर से मीठालाल त्रिवेदी और कोटा से अभिन्न हरी। इस कार्यकारिणी ने पटेल द्वारा व्यास को दिये गये तार की शैली पर आपत्ति की तथा इस बात को जनतंत्रीय सिद्धांतों तथा परम्पराओं के विरुद्ध बताया कि पटेल का विश्वास न खो देने तक शास्त्री बने रहेंगे। कार्यकारिणी ने यह भी कहा कि शास्त्री का चयन सर्वसम्मति से न होकर बिना किसी विरोध के हुआ था। इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस कमेटी को प्रतिनिधि सभा माना गया था। पटेल ने यह भी माना है कि यह समस्त की प्रार्थना पर किया गया था। यह तर्क ठीक नहीं कि प्रदेश कांग्रस कमेटी विधान सभा का कार्य नहीं कर सकती क्योंकि कमेटी ने नेता का चुनाव किया था और मंत्रिमंडल के निर्माण के बारे में निर्देश दिये थे।

    जन समर्थन की रस्साकशी

    हीरालाल शास्त्री ने इस आरोप का खंडन किया कि उन्होंने संगठन की उपेक्षा की है। वे कांग्रेस की नीतियों और कार्यक्रम को मानने के लिये बाध्य हैं, उनका दोष यही है कि वे अपने उन मित्रों को संतुष्ट नहीं कर सके हैं जो कुछ व्यक्तियों को मंत्रिमंडल में लेने पर जोर दे रहे थे। राजस्थान के दौरे से यह स्पष्ट हो गया है कि जनता उनके साथ है। वे कुर्सी पर चिपके रहना नहीं चाहते लेकिन वे इसे छोड़ने के लिये स्वतंत्र नहीं हैं। जयनारायण व्यास ने शास्त्री के इस दावे का खंडन किया कि जनसमर्थन उनके साथ है। उनका कहना था कि राजस्थान तो दूर जयपुर के कांग्रेसी नेता भी उनके साथ नहीं हैं। जोधपुर नगर परिषद् द्वारा शास्त्री के अभिनंदन के प्रस्ताव का समर्थन करने वाले 15 सदस्यों में से केवल 5 निर्वाचित थे जबकि विरोध में 11 सदस्य थे। बीकानेर नगर परिषद् के 40 सदस्यों में से केवल 4 ने ऐसे प्रस्ताव का समर्थन किया और 3 ने विरोध, शेष ने बहिष्कार किया। 1 जुलाई 1949 को जयनारायण व्यास ने समस्त कांग्रेसियों से मंत्रियों का बहिष्कार करने की अपील की। इस बीच राजस्थान के व्यास समर्थक समाचार पत्रों में लगातार यह प्रचार किया जा रहा था कि नेहरू और पटेल के सम्बन्ध ठीक नहीं हैं और नेहरू स्वयं रियासती मंत्रालय संभाल रहे हैं। यह भी समाचार था कि रफी अहमद किदवई, सुचेता कृपलानी और निजलिंगप्पा ने पटेल को राजस्थान के बारे में पत्र लिखे हैं और कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया राजस्थान आ रहे हैं।

    नेहरू की आपत्ति

    16 जुलाई 1949 को नेहरू ने जयनारायण व्यास को एक पत्र लिखकर आपत्ति की कि उन्हें इस विवाद में खींचा जा रहा है। नेहरू ने स्पष्ट किया कि इस तरह के प्रचार से व्यास, राजस्थान तथा कांग्रेस का नुक्सान कर रहे हैं। 18 जुलाई 1949 को अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यकारिणी ने समस्त प्रांतीय समितियों को निर्देश दिये कि वे किसी कांग्रेसी मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित न करें। शिकायतें कार्यसमिति और संसदीय बोर्ड के समक्ष रखी जायें। कार्यसमिति ने ध्यान दिलाया कि दिल्ली में हुए समझौते के अनुसार राजस्थान का मंत्रिमंडल केंद्रीय सरकार के नियंत्रण में कार्य कर रहा है। इस समझौते पर व्यास और वर्मा ने भी हस्ताक्षर किये थे। इस पर राजस्थान कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित कर अखिल भारतीय कांग्रेस को सूचित किया कि स्वयं पट्टाभि ने अपने पत्र में व्यास को लिखा था कि अगर नेता पं्रातीय कांग्रेस द्वारा चुना जायें तो प्रांतीय कमेटी को अधिकार है कि वह अपना निर्णय बदल सके। अतः कमेटी यह मानती है कि वह अविश्वास प्रकट कर सकती है।

    असंतुष्ट नेताओं पर मुकदमे

    जब व्यास तथा उनके साथियों की कार्यवाही बंद नहीं हुई तो दिसम्बर 1949 में राजप्रमुख ने अध्यादेश जारी करके एक विशेष अदालत नियुक्त की और इसमें जोधपुर राज्य के तीन भूतपूर्व मंत्रियों जयनारायण व्यास, द्वारकादास पुरोहित और मथुरादास माथुर पर भोजन, यातायात के झूठे बिलों और कीमती कारों को लेने के बारे में मुकदमे चलाये गये। उदयपुर के भूतपूर्व मंत्रियों पर ऐसे मुकदमे नहीं चले क्योंकि माणिक्यलाल वर्मा ने हरिभाऊ उपाध्याय को साथ लेकर सरदार पटेल को 50 हजार रुपये का हिसाब देकर अपनी सफाई दे दी थी। हीरालाल शास्त्री के अनुसार मुकदमे चलाने का फैसला करने से पहले पटेल को जितना सोच विचार करना चाहिये था उतना शायद उन्होंने नहीं किया और शास्त्री को भी जितना ध्यान इस तरफ देना चाहिये था, नहीं दिया। शास्त्री को इस बात का बड़ा भारी खेद था कि उन्होंने दूसरे साथियों के खिलाफ मुकदमे चलाने का इल्जाम अपने ऊपर ख्वामखा आने दिया।

    जनवरी 1950 में संविधान लागू होने पर भूतपूर्व मंत्रियों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जिससे मुकदमे की कार्यवाही रोक दी गयी। जयनारायण व्यास ने अपना विरोध जारी रखते हुए प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्यों के नाम एक पत्र में केन्द्रीय करण की प्रवृत्ति की निंदा की और कहा कि इन नये राजाओं से पुराने राजा ही अच्छे थे। शास्त्री ने इसके जवाब में व्यास को चुनौती दी कि वे उनके विरुद्ध शिकायतें प्रकाशित करें। शास्त्री ने आरोप लगाया कि व्यास दिल से राजस्थान का निर्माण नहीं चाहते थे। मुकदमे चलाने के साथ-साथ व्यास पर मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिये भी दबाव डाला जा रहा था। डा. राजेंद्र प्रसाद, वी. पी. मेनन आदि अनेक व्यक्ति व्यास और उनके साथियों पर चलाये जा रहे मुकदमों को ठीक नहीं मानते थे। पटेल के निजी सचिव शंकर और कुछ अन्य व्यक्तियों के कारण व्यास और उनके साथी पटेल को समझाने में सफल हुए।

    शास्त्री सरकार का पतन

    रियासती मंत्रालय द्वारा बदले की भावना से की गयी इस कार्यवाही से प्रदेश कांग्रेस में शास्त्री का विरोध और भी बढ़ गया। शास्त्री ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को अपनी ओर मिलाने के लिये आदिवासी मंडल, हरिजन मंडल, गृह उद्योग मंडल आदि कुल 12 मंडलों का गठन किया तथा उनमें कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को शामिल किया। इन कार्यकर्ताओं ने सरकार से वेतन और भत्ते तो उठाये किंतु शास्त्री के विरुद्ध प्रचार जारी रखा। 14 दिसम्बर 1950 को सत्यदेव विद्यालंकार ने कन्हैयालाल सेठिया को लिखा कि राजस्थान की स्थिति फिर बिगड़ रही है। दलबंदी का नया दौर शुरू है। सरदार की बीमारी के कारण ढील पड़ गयी और मामला बीच में लटक गया। इसमें भी भला इतना ही है कि शास्त्रीजी अपने असली रूप में प्रकट हो रहे हैं। इसी बीच जुलाई 1950 में आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच राजस्थान कांग्रेस कमेटी के सदस्यों का चुनाव हुआ जिसमें व्यास समर्थकों ने 131 में से 103 स्थान प्राप्त किये। सरदार पटेल पर इसका प्रभाव पड़ा।

    सितम्बर 1950 में नासिक में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता के लिये सरदार पटेल पुरुषोत्तम दास टंडन का समर्थन कर रहे थे जबकि जवाहरलाल नेहरू आचार्य जे. बी. कृपलानी के साथ थे। जयनारायण व्यास इस समय राजस्थान कांग्रेस के एकछत्र नेता थे, वे कृपलानी को चाहते थे किंतु पटेल चाहते थे कि व्यास टंडन का समर्थन करें। व्यास समझ चुके थे कि नेहरू उनकी कोई सहायता नहीं कर सकते और नेहरू के साथ रहने में वे घाटे में रहेंगे । जबकि दूसरी ओर पटेल कह चुके थे कि वे राजस्थान की परिस्थितियों को समझ चुके हैं। हीरालाल शास्त्री भी त्यागपत्र के लिये तैयार थे। राजस्थान के कांग्रेसियों का भारी बहुमत टंडन के पक्ष में गया और वही निर्णायक रहा। 5 जनवरी 1951 को एक आई.ए. एस. अधिकारी को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया गया। इस सरकार ने व्यास तथा उनके साथियों के विरुद्ध चल रहे मुकदमे वापिस ले लिये। राजस्थान उच्च न्यायालय में सरकार के इस निर्णय के विरुद्ध एक याचिका प्रस्तुत की गयी लेकिन न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए कहा कि जब व्यास जैसे नेता यह कहते हैं कि भूलवश यात्रा बिलों पर हस्ताक्षर कर दिये गये तो हमें मान लेना चाहिये।

    टंडन की जीत से पटेल का शास्त्री पर से भरोसा उठ गया। उन्होंने शास्त्री को उनके पद से हटाने का निर्णय लिया पर इस निर्णय पर कोई कार्यवाही हो पाती इससे पहले ही 15 दिसम्बर 1950 को सरदार पटेल का देहांत हो गया। पटेल की मृत्यु के बाद हीरालाल शास्त्री जवाहरलाल नेहरू से मिले और उन्हें कहा कि मेरे द्वारा कृपलानी को समर्थन दिये जाने के कारण पटेल ने मुझे हटाने का निर्णय लिया था। अतः इस निर्णय पर पुनर्विचार किया जाना चाहिये। नेहरू शास्त्री की बात से प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने शास्त्री को सलाह दी कि राज्य में उनका बहुमत नहीं है अतः वे त्यागपत्र दे दें साथ ही नेहरू ने रियासती सचिवालय को शास्त्री मंत्रिमंडल का इस्तीफा लेने के लिये कह दिया। नेहरू के कहने के उपरांत शास्त्री ने त्यागपत्र नहीं दिया। एक ज्योतिषी की सलाह पर शास्त्री भूमिगत हो गये। खोज के बाद पता चला कि वे इंदौर में हैं। उनसे कहा गया कि वे अविलंब त्यागपत्र दें अन्यथा उन्हें अपदस्थ कर दिया जायेगा। अतः विवश होकर 3 जनवरी 1951 को शास्त्री ने राजप्रमुख को अपना त्यागपत्र दे दिया। इस प्रकार 21 माह तक अधरझूल में झूलती रही सरकार का बिना किसी उपलब्धि के पतन हो गया। शास्त्री सरकार आम जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति करने में असफल रही।

    वित्तीय समस्याएं

    राजाओं तथा उनके उत्तराधिकारियों के प्रिवीपर्स

    एकीकरण के समझौते में यह कहा गया राजा लोग अपनी निजी सम्पत्ति रख सकेंगे, उनकी गद्दी का उत्तराधिकार बना रहेगा, उनके अधिकार और विशेषाधिकार बने रहेंगे तथा उन्हें व उनके उत्तराधिकारियों को एक निश्चित प्रिवीपर्स मिलती रहेगी। राजाओं की प्रिवीपर्स निश्चित करने और उनकी निजी सम्पत्ति को रियासत से स्पष्टतः अलग करने के लिये आवश्यक कदम उठाये गये। निजी सम्पत्ति का निपटारा करते समय यह सिद्धांत अपनाया गया कि राजा द्वारा तैयार की गयी निजी संपत्ति की सूची पर वह, राजप्रमुख (संघ में मिलने वाली वाली रियासतों के लिये) अथवा प्रांतीय सरकार का एक प्रतिनिधि (प्रांतों में मिलने वाली रियासतों के लिये) और रियासती मंत्रालय का एक प्रतिनिधि मिलकर विचार करें। सार्वजनिक हितों का पूर्ण ध्यान रखते हुए मेल की भावना से समझौता किया जाये।

    शासनाधिकार छोड़ने के एवज में राजाओं को राज्य की औसत वार्षिक आय के प्रथम एक लाख का पंद्रह प्रतिशत, बाद के चार लाख का दस प्रतिशत और पाँच लाख से ऊपर साढ़े सात प्रतिशत प्रिवीपर्स निश्चित किया गया किंतु यह राशि दस लाख रुपये वार्षिक से अधिक नहीं हो सकती थी। कुछ बड़ी और अलग रहने वाली रियासतें इसका अपवाद थीं। उनका प्रिवीपर्स 10 लाख से अधिक स्वीकृत किया गया था और वह भी समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले शासक के जीवन काल तक ही था। उसके उत्तराधिकारी को प्रिवीपर्स कम करके 10 लाख रुपया वार्षिक दिया जाना था। वृहत राजस्थान के निर्माण के समय लोकप्रिय नेताओं द्वारा यह सुझाव दिया गया था कि जयपुर, जोधपुर एवं बीकानेर रियासतें इंदौर रियासत के लगभग बराबर ही हैं जिसके (इंदौर के) महाराजा को पन्द्रह लाख रुपये का प्रिवीपर्स दिया गया है तथा उपराज्य प्रमुख के भत्ते के रूप में ढाई लाख रुपये दिये गये हैं। अतः जयपुर, जोधपुर एवं बीकानेर के राजाओं को साढ़े सतरह लाख रुपये का वार्षिक प्रिवीपर्स निश्चित कर दिया जाये। यह भी सुझाव दिया गया कि जयपुर के महाराजा को राजप्रमुख के नाते साढ़े पाँच लाख रुपये दिये जायें। अंत में बीकानेर नरेश को सत्रह लाख, जोधपुर नरेश को साढ़े सत्रह लाख तथा जयपुर नरेश को अठारह लाख रुपये का प्रिवीपर्स दिया जाना निश्चित किया गया। राजप्रमुख को साढ़े पाँच लाख रुपये का वार्षिक भत्ता दिया जाना निश्चित किया गया।

    बीकानेर के महाराजा सादूलसिंह ने रियासती विभाग से मांग की कि चूंकि उन्होंने वृहद राजस्थान में अपनी रियासत का विलय 7 अप्रेल 1949 को किया है। इसलिये 1 अप्रेल से 6 अप्रेल 1949 तक कुल 6 दिन की अविध के लिये उन्हें बीकानेर अधिनियम 1947 के अनुसार ही प्रिवीपर्स का भुगतान किया जाये। रियासत विभाग ने महाराजा की यह मांग मान ली। 25 सितम्बर 1950 को बीकानेर नरेश सादूलसिंह की मृत्यु होने पर उनके उत्तराधिकारी करणीसिंह को 10 लाख रुपये वार्षिक प्रिवीपर्स स्वीकार किया गया। अन्य रियासतों के शासकों की मृत्यु होने पर प्रिवीपर्स के मामले में यही सिद्धांत अपनाया गया केवल हैदराबाद के निजाम की मृत्यु होने पर उसके पोते को 20 लाख रुपये वार्षिक प्रिवीपर्स स्वीकृत किया गया।

    कुशलगढ़ के शासक ने राजस्थान के राजप्रमुख को पत्र लिखकर मांग की कि मुझे जो प्रिवीपर्स स्वीकृत किया गया है उसमें बच्चों की पढ़ाई का व्यय उठाना संभव नहीं है। अतः उनके लिये अलग से भत्ता दिया जाये। कुशलगढ़ के शासक ने एक अन्य पत्र के माध्यम से राजप्रमुख से अनुरोध किया कि मेरी दो बुआऐं अविवाहित हैं जिनके विवाह के लिये पर्याप्त धन राशि राज्यकोष से प्रदान की जाये।

    स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व कई रियासतों में वित्तीय वर्ष अलग-अलग माह से आरंभ होते थे । जबकि संघ इकाईयों द्वारा निर्धारित कलैण्डर के अनुसार वित्तीय वर्ष का निर्धारण 1 अप्रेल से 31 मार्च तक किया गया था। इस कारण कुछ रियासतों के शासकों ने अपनी रियासत के शासनाधिकार संघ इकाई को सौंपने से पहले ही राज्य कोष से प्रिवीपर्स की राशि उठा ली और जब संघ इकाई अस्तित्व में आयीं तो उन्होंने नये कलैण्डर के अनुसार दुबारा प्रिवीपर्स की मांग की। ग्वालियर रियासत के महाराजा द्वारा यही किया गया। इस पर रियासती विभाग ने कड़ी आपत्ति की तथा इसे वित्तीय अनियमितता माना। ग्वालियर राज्य में वित्तीय वर्ष 1 अक्टूबर से आरंभ होता था जबकि मध्यभारत संघ इकाई का वित्तीय वर्ष 1 जुलाई से आरंभ होता था। रियासती विभाग द्वारा समस्त संघ इकाईयों को यही नीति अपनाने के निर्देश जारी किये गये।

    प्रतापगढ़ रियासत के शासक द्वारा वित्तीय वर्ष 1947-48 में स्वीकृत बजट से 68,816 रुपये अधिक व्यय कर दिये जाने पर तथा उसके अतिरिक्त राज्य कोष से 26,608 रुपये अधिक निकाल लिये जाने पर, राजस्थान संघ के प्रधानमंत्री माणिक्यलाल वर्मा ने प्रतापगढ़ शासक का प्रिवीपर्स बंद कर दिया। इस कार्यवाही को रियासती विभाग ने बड़ी गंभीरता से लिया। वी. पी. मेनन ने राजस्थान यूनियन के प्रधानमंत्री माणिक्यलाल वर्मा को पत्र लिखकर नाराजगी व्यक्त की कि इस तरह की कार्यवाही करने से पहले राजस्थान सरकार को रियासती विभाग से विचार विमर्श अवश्य करना चाहिये। रियासती विभाग ने राजस्थान यूनियन के प्रधानमंत्री को निर्देशित किया कि महारावत का प्रिवीपर्स निलंबित न किया जाये। इस पर माणिक्यलाल वर्मा ने उत्तर दिया कि महारावत का प्रिवीपर्स निलंबित नहीं किया गया है। महारावल ने राज्यकोष से 68,816 रुपये अधिक ले लिये हैं उनके समायोजन की कार्यवाही की जा रही है। यह पद्धति अन्य शासकों के मामले में भी अपनायी गयी है।

    शासकों की निजी सम्पत्तियों का निर्धारण

    3 जून 1948 को राजप्रमुख महाराणा भूपालसिंह, मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री व उप मुख्यमंत्री के बीच राजाओं की निजी सम्पत्तियों के निर्धारण के लिये वार्त्ता हुई। मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि सम्बन्धित राज्य के भीतर मूलतः शासकों तथा शासकों के परिवारों के लिये निर्मित भवन, जो उनके द्वारा प्रयुक्त हैं, शासकों की निजी सम्पत्ति माने जाने चाहिये। जो भवन एक पर्याप्त अवधि में उनके द्वारा प्रयुक्त किये गये हैं वे भी शासकों की निजी सम्पत्ति माने जाने चाहिये। उक्त सिद्धांत के अनुसार शासक की निजी सम्पत्ति का निर्धारण करते समय राजा के द्वारा रखी जा रही कुल सम्पत्ति, राज्य के स्रोतों के अनुपात में होनी चाहिये। शासकों के अधिकार में आयी हुई भूमि का आकलन किया जाना चाहिये। शासकों से अनुरोध किया जाना चाहिये कि वे भू-राजस्व का भुगतान करें। शासकों को उतनी ही भूमि रखनी चाहिये जितना कि उनका स्तर है तथा जितनी उनकी निजी आवश्यकताएं हैं। कृषि भूमि के सम्बन्ध में मंत्रिपरिषद ने सलाह दी कि यह राजाओं की गरिमा के अनुकूल नहीं होगा कि वे काश्तकार बनें। शासकों को सहमति के आधार पर समुचित मूल्य चुकाकर उन आवासीय सम्पत्तियों को खरीदने का अधिकार होगा जिन्हें राज्य सम्पत्ति घोषित किया गया है। इन सिद्धांतों के अनुसरण में सरकार प्रत्येक सम्पत्ति के निरीक्षण के लिये एक अधिकारी नियुक्त करेगी, इस अधिकारी के साथ राजप्रमुख का प्रतिनिधि भी रहेगा। शासकों द्वारा राजप्रमुख को निजी सम्पत्ति की सूचियां उपलब्ध करवायी गयीं किंतु उन पर शीघ्र निर्णय नहीं किया जा सका जिससे राजाओं में बेचैनी बनी रही और शासक रियासती विभाग को बार-बार पत्र लिखकर इन सूचियों को अंतिम रूप देने का निवेदन करते रहे।

    शासकों की निजी सम्पत्तियों को नुक्सान पहुँचाये जाने की समस्या

    बांसवाड़ा के महारावल ने मांग की कि शासकों की व्यक्तिगत सम्पत्ति की जो सूचियां सरकार को उपलब्ध करवायी गयी थी उनके सम्बन्ध में शीघ्र निर्णय लिया जाये। जो आदिवासी लोग जंगलों को काटते हैं, वे राजाओं की निजी सम्पत्ति में आने वाले जंगलों को भी काट रहे हैं तथा उनके बीच में स्थित भवनों में तोड़-फोड़ कर रहे हैं एवं कृषि क्षेत्र को हानि पहुंचा रहे हैं। जब तक निजी सम्पत्तियों का निर्धारण न हो जाये तब तक राजाओं द्वारा इन सम्पत्तियों की रक्षा की जानी संभव नहीं है। अतः अनुरोध है कि इस ओर व्यक्तिगत ध्यान देकर इस प्रकरण का निस्तारण करें।

    रियासती विभाग के सचिव वी. पी. मेनन ने राजस्थान के राजप्रमुख महाराणा भूपालसिंह को पत्र लिख कर अनुरोध किया कि राजाओं ने निजी सम्पत्तियों की जो सूचियां भेजी थीं, उनके सम्बन्ध में समस्त शासकों को समुचित उत्तर दे दिये गये हैं। यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ राजस्थान के उद्घाटन के समय यह निश्चित किया गया था कि राजाओं की निजी सम्पत्तियों के सम्बन्ध में निर्णय शीघ्र लिया जायेगा। महाराणा इस सम्बन्ध में अपने स्तर पर शीघ्र निर्णय लें तथा इस सम्बन्ध में उठाये गये कदमों की जानकारी बांसवाड़ा के शासक को भी दें ताकि वे सुनिश्चित हो सकें कि इस मामले की उपेक्षा नहीं की जा रही है। अप्रेल 1949 के अंतिम सप्ताह में माउंट आबू मे पूर्वं रियासतों के शासकों तथा संयुक्त राजस्थान के राजप्रमुख के बीच एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें समस्त शासकों की निजी सम्पत्तियों का निर्धारण किया गया तथा अधिकांश मामलों में शासकों द्वारा प्रस्तुत सूचियों में वर्णित सम्पत्तियों को ही उनकी निजी सम्पत्ति मान लिया गया।

    शासकों के निजी भवनों के रख-रखाव की समस्या

    शासकों के जिन आवासीय महलों एवं भवनों को भारत सरकार द्वारा शासकों की निजी सम्पत्ति मान लिया गया था उनके रख रखाव, बिजली, पानी आदि के व्यय के पुनर्भरण के लिये कई शासकों द्वारा राज्य सरकार से मांग की गयी। महाराजा जयपुर ने मांग की कि उनके दिल्ली स्थित जयपुर भवन तथा उसमें स्थित साजोसामान, पशुधन एवं आदमी की आवश्यकता महाराजा को उत्सवों के दौरान होती है, उनका रख रखाव राजस्थान सरकार के द्वारा किया जाये। इस पर ने महाराजा को लिखा कि दिल्ली स्थित जयपुर हाउस के बारे में आपके साथ हुए विचार-विमर्श के दौरान आम सहमति से यह निर्णय लिया गया था कि इस भवन की यथा पूर्व स्थिति बनाये रखी जाये। महाराजा के व्यक्तिगत सामान की जो सूची महाराजा द्वारा सरकार को उपलब्ध करवायी गयी थी, वह महाराजा की व्यक्तिगत सम्पत्ति मानी जायेगी। इसलिये हम यह नहीं सोचते कि राजस्थान सरकार को यह उत्तरदायित्व सौंपा जा सकता है कि वह महाराजा के समारोहों में प्रयुक्त होने वाले पशुधन तथा आदमियों का रखरखाव करे। राजस्थान सरकार को केवल यह अनुमति देने के लिये तैयार रहना चाहिये कि वह परिस्थितियों के अनुसार, अपने उपलब्ध स्रोतों को महाराजा के समारोहों में प्रयुक्त होने दे। कई भवन जनानी ड्यौढ़ी के निस्तारण पर छोड़े गये हैं। उन भवनों का प्रयोग इनमें रहने वाले लोगों के द्वारा अपने जीवन काल में और किसी उद्देश्य के लिये नहीं किया जाना चाहिये। महाराजा साहब इस बात से सहमत होंगे कि राजस्थान सरकार को इन भवनों के रखरखाव और मरम्मत का व्यय वहन करने के लिये नहीं कहा जाना चाहिये।

    झालावाड़ के महाराजराणा ने अपने महलों के बिजली व्यय के पुनर्भरण की मांग की तो रियासती विभाग ने महाराजराणा को लिखा कि जिन महलों/भवनों को राजाओं की व्यक्तिगत सम्पत्ति घोषित कर दिया गया है उनके विद्युत व्यय एवं विद्युत संस्थापन आदि का व्यय राजाओं के प्रिवीपर्स में से किया जाये न कि राज्य व्यय से।

    सरदारों तथा राजमाताओं के भत्तों के भुगतान की समस्या

    संयुक्त राजस्थान सरकार ने नवम्बर 1948 में कुछ शासकों के सम्बन्धियों को निश्चित भत्ते देने का निर्णय लिया था। इस निर्णय के क्रियान्वयन पर पूर्व शासकों तथा राजस्थान सरकार के मध्य कई बार तनाव की स्थितियां बनीं। राजमाताओं के भत्तों तथा राजपरिवारों के अन्य सदस्यों के भत्तों के निर्धारण के लिये 17 सितम्बर 1948 को रियासती विभाग द्वारा नयी दिल्ली में एक बैठक आयोजित की गयी। इस बैठक में समस्त संघ इकाईयों के सलाहकार उपस्थित थे। बैठक में निश्चित किया गया कि राजमाताओं को निर्वहन भत्ते दिये जाने के लिये राज्य सरकार वचनबद्ध है। राजमाताओं को निर्वहन भत्ते की राशि के निर्धारण के सम्बन्ध में सामान्य सिद्धांत यह रहेगा कि शासकों ने अपने शासनाधिकार राजस्थान सरकार को सौंपने से पहले राजमाताओं को जो भत्ते स्वीकृत कर रखे थे, वे उन्हें उनके जीवन काल के लिये जारी रखे जायें। अन्य भत्तों का निर्धारण पूरी जांच के बाद किया जाये। टोंक तथा किशनगढ़ आदि कुछ रियासतों ने राजस्थान में अपने विलय से ठीक पहले ही राजमाताओं (शासक की माता अथवा दादी) को जागीरें प्रदान कीं ताकि राजमाताओं को अधिक से अधिक भत्ते प्राप्त हो सकें। जब इनकी शिकायत रियासती विभाग को की गयी तो रियासती विभाग ने इन प्रकरणों की जांच करवाने के आदेश जारी किये।

    टोंक रियासत की राजमाताओं को भुगतान में विलम्ब

    टोंक रियासत में सरदारों तथा राजमाताओं को बख्शीगिरि कार्यालय के माध्यम से प्रतिमाह भत्तों का भुगतान किया जाता था। जब टोंक में कलक्टर मुख्यालय स्थापित कर दिया गया तो यह कार्य कलक्टर को दे दिया गया। बख्शीगिरि कार्यालय के जो कर्मचारी इस कार्य को करते थे उनका स्थान नये कर्मचारियों ने ले लिया। इससे भुगतान में विलम्ब होने लगा। टोंक जिला मुख्यालय पर उपकोषालय बनाये जाने से वहाँ कम राशि रखी जाती थी जो सरदारों तथा राजमाताओं को भत्तों का भुगतान करने के लिये अपर्याप्त थी। इससे टोंक कलक्टर द्वारा सरदारों तथा राजमाताओं को समय पर भुगतान नहीं किया जा सका। यूनाईटेड स्टेट ऑफ राजस्थान सरकार ने व्यवस्था की कि इन भत्तों का भुगतान महालेखाकार द्वारा जारी चैक के माध्यम से हो। इस व्यवस्था पर पूर्व टोंक रियासत के नवाब के मिनिस्टर इन वेटिंग ने यूनाईटेड स्टेट ऑफ राजस्थान के मुख्य सचिव तथा वित्त सचिव को कड़ा पत्र लिखकर रोष व्यक्त किया कि यह जानबूझ कर तंग किये जाने का मामला है। अतः टोंक जिला मुख्यालय पर जिला कोषालय स्थापित किया जाये तथा बख्शीगिरि कार्यालय के उन्हीं कर्मचारियों को कलक्टर कार्यालय में इस कार्य पर नियुक्त किया जाये जो कर्मचारी इस कार्य को वर्षों से करते रहे हैं।

    3 अक्टूबर 1948 को रियासती विभाग ने एक पत्र जारी कर समस्त प्रांतों के मुख्य सचिवों को निर्देशित किया कि कई पूर्व रियासतों की राजमाताओं से शिकायतें प्राप्त हो रही हैं कि उन्हें भत्तों का भुगतान समय पर नहीं हो रहा है। इस सम्बन्ध में समस्त शंकाओं का निवारण 17 सितम्बर 1948 को दिल्ली में आयोजित बैठक में किया जा चुका है जिसमें समस्त प्रांतों के सलाहकार उपस्थित थे। अतः शासकों तथा राजमाताओं को इस सम्बन्ध में सूचना भिजवायी जाये कि इस विषय पर कार्यवाही की जा रही है। ताकि उन्हें यह न लगे कि इस विषय की उपेक्षा की जा रही है।

    विभिन्न संघ इकाईयों में सम्मिलित पूर्व रियासतों के शासकों ने रियासती विभाग को सूचित किया कि जिन राजमाताओं को पूर्व में राज्यकोष से भत्ते मिलते रहे थे, उनके बंद हो जाने के कारण शासकों द्वारा अपने प्रिवीपर्स में से भुगतान किया जा रहा है। यह भुगतान अधिक समय तक नहीं किया जा सकता। इसलिये राजपरिवारों के सदस्यों, विशेषतः राजमाताओं को भत्तों का भुगतान अलग से किया जाये। इस पर रियासती विभाग ने निर्णय लिया कि राजाओं की यह मांग सही है कि जिन सदस्यों को पहले से ही अलग से भत्ते मिल रहे थे, उन्हें राज्य के राजस्व से भत्तों का भुगतान किया जाना चाहिये न कि शासकों के प्रिवीपर्स से। शासक के प्रिवीपर्स में केवल शासक के बच्चे व पत्नियां ही सम्मिलित की गयी हैं। ये भत्ते जीवन भर के लिये दिये जाने चाहिये।

    जयपुर महाराजा द्वारा स्वर्ण के लिये झगड़ा

    जयपुर महाराजा ने राजस्थान के एकीकरण के पश्चात् कुछ स्वर्ण पर अपना दावा किया जिसका मूल्य एक करोड़ रुपये था। मुख्यमंत्री ने उसे राज्य का बताते हुए देने से मना कर दिया। बात सरदार पटेल तक गयी। सरदार पटेल ने मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री से पूछा कि सोना किसका है? इस पर शास्त्री ने जवाब दिया कि सोना पहले तो राजा का ही रहा होगा, पर बाद में राज्य के बजट में दर्ज हो गया। अतः अब राज्य का मानना पड़ेगा। सरदार ने पूछा कि आपकी राय क्या है? शास्त्री ने कहा कि मेरी राय में सोना महाराजा को दे देना चाहिये। सरदार बोले क्यों? शास्त्री ने कहा इतना बड़ा राज्य किसी का आपने ले लिया है सा इतना सा सोना उसे दे देने में क्या संकोच करना चाहिये। सरदार ने सोना महाराजा को देने की अनुमति दे दी।

    जैसलमेर महारावल द्वारा 1,06,900 रुपये के पुनर्भुगतान की मांग

    जैसलमेर के महारावल ने वर्ष 1927-28 में अपने निजी धन से 1 लाख 10 हजार रुपये राज्य कोष में जमा करवाये। यह राशि एक विद्यालय एवं एक पुस्तकालय भवन बनाने के लिये दी गयी थी। इसी प्रकार महारावल द्वारा एक अस्पताल बनाने के लिये भी 40 हजार रुपये दिये गये। जैसलमेर रियासत के वृहद राजस्थान में सम्मिलित हो जाने के बाद महारावल ने रियासती विभाग को एक पत्र लिखकर मांग की कि विद्यालय भवन तथा चिकित्सालय भवन का उपयोग उन्हीं कार्यों के लिये हो रहा है जिन कार्यों के लिये महारावल ने धन दिया था किंतु चूंकि पुस्तकालय भवन का उपयोग महकमा खास के कार्यालयों के लिये हो रहा है इसलिये महारावल द्वारा इस भवन को बनाने के लिये दी गयी राशि, ब्याज सहित (कुल 1,06,900 रुपये) फिर से महाराजा को लौटा दिये जाने चाहिये।

    राजस्थान के रीजनल कमिश्नर वी. के. बी. पिल्लई ने रियासती विभाग से अनुशंसा की कि शासकों की निजी सम्पत्ति के निर्धारण के लिये माउण्ट आबू में जो बैठक हुई थी उसके आधार पर यह समझ लिया गया था कि शासक द्वारा कोई अन्य दावा नहीं किया जायेगा। यह उस समय का प्रकरण है जब शासक के प्रिवीपर्स तथा रियासत के राजस्व का कोई स्पष्ट विभाजन नहीं था। न ही यह प्रावधान किया गया था कि यदि इस भवन का उपयोग पुस्तकालय के रूप में नहीं किया गया तो यह राशि महारावल को पुनः लौटायी जायेगी। केवल इस आधार पर इस दावे का भुगतान नहीं किया जा सकता क्योंकि पुस्तकालय के लिये निर्मित भवन का उपयोग पुस्तकालय के लिये नहीं किया गया। यदि इस तरह के दावों को स्वीकार कर लिया गया तो रियासती विभाग में शासकों की ओर से धन राशि की मांग के दावों की बाढ़ आ जायेगी। जैसलमेर के शासक को राज्य के राजस्व से निर्मित कई भवन दिये गये हैं। उसे राज्य कोष से 14 लाख रुपये भी दिये गये हैं। अतः महाराजा का यह दावा निरस्त किये जाने के योग्य है। रीजनल कमिश्नर की अनुशंसा पर रियासती विभाग ने महारावल के दावे को अस्वीकार कर दिया।

    झालावाड़ शासक द्वारा बिजलीघर पर दावा

    राजस्थान में सम्मिलित हो जाने के बाद झालावाड़ के शासक द्वारा दावा किया गया कि महल परिसर में विद्युत आपूर्ति के बिलों का भुगतान नहीं किया जायेगा क्योंकि महल परिसर में स्थित बिजलीघर शासक की स्वयं की निजी सम्पत्ति है। साथ ही राजस्थान सरकार द्वारा इस महल के बिजलीघर में स्थित पुरानी मशीनों की नीलामी भी नहीं की जा सकती क्योंकि यह महाराजा की निजी सम्पत्ति में आती हैं। शासक ने दावा किया कि राजस्थान में सम्मिलन के प्रसंविदा समझौते में यह प्रावधान किया गया था कि शासकों द्वारा 15 अगस्त 1947 से पूर्व उठाई जा रही सुविधाओं को बने रहने दिया जायेगा, चाहे वे प्रादेशिक सीमाओं से बाहर की प्रकृति की हों अथवा स्थानीय प्रकृति की। निशुल्क विद्युत आपूर्ति प्राप्त करना शासकों की स्थानीय प्रकृति की सुविधाओं में आता है। राज्य में इस बिजलीघर की स्थापना पहले बिजलीघर के रूप में हुई थी तथा शासक द्वारा इस बिजलीघर की सुविधा का उपयोग तब से किया जाता रहा है। झालावाड़ राज्य में दो बिजलीघर हैं। पहला बिजलीघर पृथ्वीविलास पैलेस में है जिससे शासक के महल को विद्युत आपूर्ति होती है तथा दूसरा बिजलघर शहर की विद्युत आपूर्ति के काम आता है। जब राजस्थान का निर्माण हुआ तब शासक ने यह बिजलीघर राजस्थान सरकार को समर्पित कर दिया क्योंकि उसे विश्वास था कि राजस्थान सरकार द्वारा शासकों की उन सुविधाओं को जारी रखा जायेगा जिन सुविधाओं का उपभोग शासक करते आये हैं। अब शासक को ज्ञात हुआ है कि राजस्थान सरकार बिजली आपूर्ति जैसी सुविधाओं को जारी नहीं रखेगी। अतः रियासती विभाग राजस्थान सरकार को निर्देश दे कि वह बिजलीघर शासक को वापस लौटा दे तथा वह इस बिजलीघर के पुराने प्लाण्ट को नीलाम न करे। इस पर रियासती विभाग ने राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव को सूचित किया कि इस प्रकरण को तब तक लम्बित रखा जाये तथा इस पर कोई कार्यवाही न की जाये जब तक कि स्वयं वी. पी. मेनन राजस्थान की यात्रा के दौरान इस प्रकरण का निस्तारण न कर दें।

    टोंक रियासत की सम्पत्ति को नीलाम किये जाने का मामला

    टोंक कलक्टर ने पूर्व टोंक रियासत की कुछ सम्पत्ति जिसमें घोड़े, बग्घियां, कार, अस्तबल आदि सम्मिलित थे, को सरकारी सम्पत्ति मानकर नीलाम करने का निर्णय लिया। इस पर टोंक नवाब ने रीजनल कमिश्नर आबू को तार भेज कर अनुरोध किया कि जब तक टोंक नवाब की निजी सम्पत्ति के सम्बन्ध में अंतिम निर्णय न हो जाये तब तक उक्त नीलामी रोकी जाये। टोंक कलक्टर ने पूर्व रियासत के बंगला संख्या 1,2,3 एवं 4 के फर्नीचर, क्रॉकरी तथा कटलरी आदि को हटा लिया। टोंक नवाब ने इस पर भी आपत्ति की। इस पर मुख्य सचिव ने टोंक कलक्टर को आदेश दिये कि इन वस्तुओं को इन बंगलों से न हटाया जाये। राजस्थान सरकार ने उक्त नीलामी को रोक दिया।

    शासकों द्वारा सरकार को समर्पित भूमि पर कृषि किये जाने की समस्या

    राजस्थान सरकार तथा शासकों के मध्य हुए समझौते की शर्तों के अनुसार शासकों के निजी अधिकार में चल रही जो भूमि रियासत की सम्पत्ति मानी जाये वह भूमि राज्य सरकार को समर्पित की जानी थी किंतु कई शासकों ने अच्छी एवं उपजाऊ भूमि पर काश्त करने के अपने अधिकार को छोड़ना नहीं चाहा था। इसलिये यह तय किया गया था कि सहमति के आधार पर उचित मूल्य चुकाकर शासक उस भूमि पर काश्त कर सकते हैं। डूंगरपुर महारावल के अधिकार में माही नदी के बीच में स्थित एक टापू पर ऐसी ही भूमि थी जो बेंका (सोहन बीड) के नाम से जानी जाती थी। यह एक विशाल भूमि थी जिसमें सिंचाई के लिये माही नदी का जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। महारावल ने रियासती विभाग को पत्र लिखकर यह भूमि महारावल को ही काश्त के लिये दिये जाने की मांग की। रियासती विभाग ने राजस्थान के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर सिफारिश की कि उक्त भूमि समुचित आकलन के आधार पर महारावल को काश्त के लिये दे दी जाये।

    राजाओं द्वारा जारी वित्तीय आदेशों की मान्यता की समस्या

    रियासती विभाग ने 11 फरवरी 1949 को जयपुर, जोधपुर, बीकानेर तथा जैसलमेर के प्रधानमंत्रियों तथा राजस्थान के मुख्यमंत्री माणिक्यलाल वर्मा को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया कि चूंकि वृहद राजस्थान के निर्माण का कार्य चल रहा है इसलिये इसमें सम्मिलित होने वाली किसी भी इकाई द्वारा न तो नीति निर्धारण के सम्बन्ध में कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय लिये जायें और न ही कोई नवीन संविधान लागू किये जायें। इन इकाईयों को कोई भी नवीन वित्तीय प्रतिबद्धता व्यक्त नहीं करनी चाहिये। विविध विषयों पर नयी सरकार द्वारा ही नीति सम्बन्धी निर्णय लिये जायेंगे। इस आदेश की अवहेलना करके कुछ शासकों द्वारा प्रशासनिक आदेश जारी किये गये किंतु राजस्थान सरकार ने उन आदेशों को मान्यता देने से मना कर दिया। इस सम्बन्ध में रियासती मंत्रालय ने निर्णय दिया कि केवल वही आदेश मान्य होंगे जो कि महाराजा द्वारा अपने प्रधानमंत्री की सहमति से जारी किये गये होंगे। ऐसा एक प्रकरण बीकानेर के मामले में हुआ। महाराजा सादुलसिंह ने 6 अप्रेल 1949 को आदेश जारी किया कि राजवियों के घर निर्माण के लिये राज्य की ओर से 80 हजार रुपये दिये जायेंगे। राजस्थान सरकार ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया। महाराजा ने इसकी शिकायत रियासती मंत्रालय को की। इस पर रियासती मंत्रालय ने बीकानेर राज्य के तत्कालीन प्रधानमंत्री आई.सी. एस. अधिकारी वेंकटाचार से पूछा किंतु वेंकटाचार ने इस निर्णय को अपनी सहमति से होना नहीं बताया। इस पर रियासती मंत्रालय ने महाराजा को सूचित किया कि उनके इस आदेश को नहीं माना जा सकता। इसलिये राजस्थान सरकार राजवियों को 80 हजार रुपये नहीं देगी।


    शासकों द्वारा की गयी वित्तीय अनियमितताओं की समस्या

    कुछ शासकों द्वारा अपनी रियासतों के राज्य इकाईयों में विलय से पूर्व कुछ वित्तीय अनियमिततायें की गयीं। प्रसंविदा समझौते की शर्तों के अनुसार शासकों द्वारा अपनी रियासतों के प्रशासन के हस्तांतरण से पूर्व अपने विवेकाधिकार के तहत किये गये कार्यों के लिये उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हो सकती थी। जब कुछ शासकों द्वारा जानबूझ कर की गयी वित्तीय अनियमितताएं सामने आयीं तो रियासती विभाग ने स्पष्टीकरण दिया कि यह प्रावधान शासकों द्वारा निष्ठापूर्वक की गयी कार्यवाही के सम्बन्ध में था न कि जानबूझ कर की गयी अनियमितता के सम्बन्ध में की गयी कार्यवाही के सम्बन्ध में। ऐसे प्रकरणों की जांच की जाये तथा उनके निष्कर्षों से रियासती विभाग को सूचित किया जाये।

    इस प्रकार वृहत् राजस्थान के गठन के समय एवं उसके बाद उभर कर आई विभिन्न समस्याओं को प्रांतीय नेताओं द्वारा राष्ट्रीय नेताओं के सहयोग से सुलझा लिया गया। पूर्व रियासतों के शासकों की समस्याओं को सहानुभूति पूर्वक किंतु दृढ़ता के साथ निबटाया गया। सेनाओं के एकीकरण, विभिन्न रियासतों के कर्मचारियों की सेवाओं के एकीकरण तथा नेतृत्व सम्बन्धी विवादों के कारण काफी कटुता का वातावरण बना किंतु समय के साथ वे समस्याएं भी दूर हो गयीं।


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