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  • अध्याय- 6 : बीकानेर, उदयपुर, जयपुर एवं जोधपुर राज्यों का भारतीय संघ में विलय

     06.12.2017
    अध्याय- 6 : बीकानेर, उदयपुर, जयपुर एवं जोधपुर राज्यों का भारतीय संघ में विलय

    अध्याय- 6


    बीकानेर, उदयपुर, जयपुर एवं जोधपुर राज्यों का भारतीय संघ में विलय

    मेरी इच्छा मेरे पूर्वजों ने निश्चित कर दी थी। यदि वे थोड़े भी डगमगाये होते तो वे हमारे लिये हैदराबाद जितनी ही रियासत छोड़ जाते। उन्होंने ऐसा नहीं किया और न मैं करूंगा। मैं हिन्दुस्तान के साथ हूँ। - महाराणा भूपालसिंह।

    भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की धारा 8 के अनुसार देशी राज्यों पर से 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश सरकार की परमोच्चता समाप्त हो जानी थी तथा यह पुनः देशी राज्यों को हस्तांतरित कर दी जानी थी। इस कारण देशी राज्य अपनी इच्छानुसार भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी भी देश में सम्मिलित होने अथवा पृथक अस्तित्व बनाये रखने के लिये स्वतंत्र थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में अधिकांश राज्य, हिंदू राज्य थे। राजपूताना में भी यही स्थिति थी। केवल टोंक राज्य में मुस्लिम शासक का शासन था किंतु वहाँ भी जनसंख्या हिन्दू बहुल थी। अतः जातीय आधार पर भारत तथा राजपूताना के राज्य और उनकी जनता ब्रिटिश भारत के हिंदू बहुल क्षेत्र से जुड़े हुए थे।

    कांग्रेस का मानना था कि जब ब्रिटिश सरकार सत्ता का हस्तांतरण भारत सरकार को कर रही है तब देशी राज्यों पर से ब्रिटिश सरकार की परमोच्चता स्वतः ही भारत सरकार को स्थानांतरित हो जायेगी। यद्यपि छोटे राज्यों के पास भारत संघ में मिल जाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था तथापि बड़े एवं सक्षम राज्यों की स्थित अलग थी। त्रावणकोर, हैदराबाद, जम्मू एवं कश्मीर, मैसूर, इन्दौर, भोपाल, नवानगर यहाँ तक कि बिलासपुर की बौनी रियासत ने भी पूर्णतः स्वतंत्र रहने का स्वप्न देखा। अलवर नरेश ने 3 अप्रेल 1947 को बम्बई में आयोजित नरेंद्रमंडल की बैठक में कहा कि देशी राज्यों के अधिपतियों को हिंदी संघ राज्य में नहीं मिलना चाहिये। 5 जून 1947 को भोपाल तथा त्रावणकोर ने स्वतंत्र रहने के निर्णय की घोषणा की। हैदराबाद को भी यही उचित जान पड़ा। जम्मू एवं कश्मीर, इन्दौर, जोधपुर, धौलपुर, भरतपुर तथा कुछ अन्य राज्यों के समूह के द्वारा भी ऐसी ही घोषणा किये जाने की संभावना थी।

    भारत के विभाजन के पश्चात् देश में रह गयीं 562 छोटी बड़ी रियासतों के शासकों की महत्त्वाकांक्षायें देश की अखण्डता के लिये खतरा बन गयीं। मद्रास के तत्कालीन गवर्नर तथा बाद में स्वतंत्र भारत में ब्रिटेन के प्रथम हाई कमिश्नर सर आर्चिबाल्ड नेई को रजवाड़ों के साथ किसी प्रकार की संधि होने में संदेह था। माउंटबेटन ने सरदार पटेल से कहा कि यदि राजाओं से उनकी पदवियां न छीनी जायें, महल उन्हीं के पास बने रहें, उन्हें गिरफ्तारी से मुक्त रखा जाये, प्रिवीपर्स की सुविधा जारी रहे तथा अंग्रेजों द्वारा दिये गये किसी भी सम्मान को स्वीकारने से न रोका जाये तो वायसराय राजाओं को इस बात पर राजी कर लेंगे कि वे अपने राज्यों को भारतीय संघ में विलीन करें और स्वतंत्र होने का विचार त्याग दें। पटेल ने माउंटबेटन के सामने शर्त रखी कि वे माउंटबेटन की शर्त को स्वीकार कर लेंगे यदि माउंटबेटन सारे रजवाड़ों को भारत की झोली में डाल दें। तेजबहादुर सप्रू का कहना था कि मुझे उन राज्यों पर, चाहे वह छोटे हों अथवा बड़े, आश्चर्य होता है कि वे इतने मूर्ख हैं कि वे समझते हैं कि वे इस तरह से स्वतंत्र हो जायेंगे और फिर अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखेंगे। दुर्दिन के मसीहाओं ने भविष्यवाणी की थी कि हिंदुस्तान की आजादी की नाव रजवाड़ों की चट्टान से टकरायेगी।

    भारत को स्वतंत्र किये जाने की घोषणा के बाद लंदन इवनिंग स्टैण्डर्ड में कार्टूनिस्ट डेविड लॉ का एक कार्टून श्ल्वनत ठंइपमे छवूश् शीर्षक से छपा था जिसमें भारत के राष्ट्रीय नेताओं के समक्ष भारतीय राजाओं की समस्या का सटीक चित्रण किया गया था। इस कार्टून में नेहरू तथा जिन्ना को अलग-अलग कुर्सियों पर बैठे हुए दिखाया गया था जिनकी गोद में कुछ बच्चे बैठे थे। ब्रिटेन को एक नर्स के रूप में दिखाया गया था जो यूनियन जैक लेकर दूर जा रही थी। नेहरू की गोद में बैठे हुए बच्चों को राजाओं की समस्या के रूप में दिखाया गया था जो नेहरू के घुटनों पर लातें मार कर चिल्ला रहे थे।

    जिन्ना का षड़यंत्र

    एक ओर कांग्रेस देशी राज्यों के प्रति कठोर नीति का प्रदर्शन कर रही थी तो दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने देशी राज्यों के साथ बड़ा ही मुलायम रवैया अपनाया। मुस्लिम लीग के लिये ऐसा करना सुविधाजनक था क्योंकि प्रस्तावित पाकिस्तान की सीमा में देशी राज्यों की संख्या केवल 3 थी। जबकि 562 रियासतें प्रस्तावित भारत संघ की सीमा के भीतर स्थित थीं। जिन्ना यह प्रयास कर रहे थे कि अधिक से अधिक संख्या में देशी रियासतें अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दें अथवा पाकिस्तान में सम्मिलित हो जायें ताकि भारतीय संघ स्थायी रूप से दुर्बल बन सके। जिन्ना राजाओं के गले में यह बात उतारना चाहते थे कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा देशी राजाओं की साझा शत्रु है।

    जिन्ना ने लुभावने प्रस्ताव देकर राजपूताना की रियासतों को पाकिस्तान में सम्मिलित करने का प्रयास किया। उन्होंने घोषित किया कि देशी राज्यों में मुस्लिम लीग बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करेगी और यदि देशी राज्य स्वतंत्र रहें तो भी मुस्लिम लीग की ओर से उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ नहीं दी जायेगी। लीग की ओर से राजस्थान के राजाओं में गुप्त प्रचार किया जा रहा था कि उन्हें पाकिस्तान में मिलना चाहिये, हिंदी संघ राज्य में नहीं।

    निजाम हैदराबाद के प्रति माउंटबेटन का रवैया अत्यंत नरम था। जिन्ना ने कोरफील्ड और भोपाल नवाब का उपयोग भारत को कमजोर करने में किया। त्रावणकोर के महाराजा ने 11 जून 1947 को एक व्यापारी दल अपने यहाँ से पाकिस्तान भेजना स्वीकार कर लिया। महाराजा जोधपुर और बहुत सी छोटी रियासतों के शासक बड़े ध्यान से यह देख रहे थे कि बड़ी रियासतों के विद्रोह का क्या परिणाम निकलता है, उसी के अनुसार वे आगे की कार्यवाही करना चाहते थे। महाराजा बड़ौदा ने अपने हाथ से सरदार पटेल को लिखा कि जब तक उनको भारत का राजा नहीं बनाया जाता और भारत सरकार उनकी समस्त मांगें नहीं मान लेती तब तक वे कोई सहयोग नहीं देंगे और न ही जूनागढ़ के नवाब की बगावत दबाने में सहयोग देंगे। इस पर भारत सरकार ने महाराजा प्रतापसिंह की मान्यता समाप्त करके उनके पुत्र फतहसिंह को महाराजा बड़ौदा स्वीकार किया।

    भारत सरकार का कठोर रवैया देखकर राजा विनम्र देश सेवकों जैसा व्यवहार करने लगे। जो राज्य संघ उन्होंने रियासतों का विलय न होने देने के लिये बनाया था, उसे भंग कर दिया गया। उन्होंने समझ लिया कि अब भारत सरकार से मिल जाने और उसका संरक्षण प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। वे यह भी सोचने लगे कि शासक बने रह कर विद्रोही प्रजा की इच्छा पर जीने के बजाय भारत सरकार की छत्रछाया में रहना कहीं अधिक उपयुक्त होगा।

    भोपाल नवाब का षड़यंत्र

    भोपाल नवाब हमीदुल्लाखां छिपे तौर पर मुस्लिम परस्त, पाकिस्तान परस्त तथा कांग्रेस विरोधी के रूप में काम कर रहे थे किंतु जब देश का विभाजन होना निश्चित हो गया तो तीसरे मोर्चे के नेता भोपाल नवाब ने अपनी मुट्ठी खोल दी और प्रत्यक्षतः विभाजनकारी मुस्लिम लीग के समर्थन में चले गये तथा जिन्ना के निकट सलाहकार बन गये। वे जिन्ना की उस योजना में सम्मिलित हो गये जिसके तहत राजाओं को अधिक से अधिक संख्या में या तो पाकिस्तान में मिलने के लिये प्रोत्साहित करना था या फिर उनसे यह घोषणा करवानी थी कि वे अपने राज्य को स्वतंत्र रखेंगे। रियासती मंत्रालय के सचिव ए. एस. पई ने पटेल को एक नोटशीट भिजवायी कि भोपाल नवाब, जिन्ना के दलाल की तरह काम कर रहे हैं।

    नवाब चाहते थे कि भोपाल से लेकर कराची तक के मार्ग में आने वाले राज्यों का एक समूह बने जो पाकिस्तान में मिल जाये। इसलिये उन्होंने जिन्ना की सहमति से एक योजना बनायी कि बड़ौदा, इंदौर, भोपाल, उदयपुर, जोधपुर और जैसलमेर राज्य पाकिस्तान का अंग बन जाये। इस योजना में सबसे बड़ी बाधा उदयपुर और बड़ौदा की ओर से उपस्थित हो सकती थी। महाराजा जोधपुर ने उक्त रियासतों से सहमति प्राप्त करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली। इस प्रकार भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का एक मानचित्र तैयार हो गया।

    धौलपुर के राजराणा षड़यंत्र में सम्मिलित

    हमीदुल्लाखां ने धौलपुर महाराजराणा उदयभानसिंह को भी इस योजना में सम्मिलित कर लिया। उदयभानसिंह जाटों की प्रमुख रियासत के बहुपठित, बुद्धिमान एवं कुशल राजा माने जाते थे किंतु वे किसी भी कीमत पर धौलपुर को भारत संघ में मिलाने को तैयार नहीं थे। जिन्ना के संकेत पर नवाब तथा महाराजराणा ने जोधपुर, जैसलमेर, उदयपुर तथा जयपुर आदि रियासतों के राजाओं से बात की तथा उन्हें जिन्ना से मिलने के लिये आमंत्रित किया। नवाब का साथ देने वाले हिंदू राजाओं में अलवर महाराजा भी थे।

    कोरफील्ड के दुष्प्रयास

    कोरफील्ड ने रेजीडेंटों और पॉलिटिकल एजेंटों के माध्यम से राजाओं को भारतीय संघ से पृथक रहने के लिये प्रेरित किया। कोरफील्ड चाहते थे कि कम से कम दो-तीन राज्य जिनमें हैदराबाद प्रमुख था, कांग्रेस के चंगुल से बच जायें। बाकी रजवाड़ों का भी भारत में सम्मिलित होना जितना मुश्किल हो सके बना दिया जाये। कोरफील्ड ने रजवाड़ों के बीच घूम-घूम कर प्रचार किया कि उनके सामने दो नहीं तीन रास्ते हैं, वे दोनों उपनिवेशों में से किसी एक में सम्मिलित हो सकते हैं अथवा स्वतंत्र भी रह सकते हैं। कोरफील्ड के प्रयासों से त्रावणकोर तथा हैदराबाद ने घोषणा कर दी कि वे किसी भी उपनिवेश में सम्मिलित नहीं होंगे अपितु स्वतंत्र देश के रूप में रहेंगे।

    रियासती विभाग का गठन

    5 जुलाई 1947 को सरदार पटेल के नेतृत्व में रियासती विभाग अस्तित्व में आया। कांग्रेस को आशा थी कि पार्टी का यह लौह पुरुष अपनी धोती समेट कर इनके पीछे पड़ जायेगा। हमीदुल्लाखां, कोरफील्ड तथा रामास्वामी अय्यर की योजना से निबटने तथा स्वतंत्र हुई रियासतों को भारत संघ में घेरने के लिये पटेल अकेले ही भारी थे। वी. पी. मेनन को पटेल का सलाहकार व सचिव नियुक्त किया गया। वे एकमात्र ऐसे अधिकारी थे जो देशी राज्यों की जटिल समस्या को सुलझा सकते थे। पटेल का जोरदार व्यक्तित्व और मेनन के लचीले दिमाग का संयोग इस मौके पर और भी अधिक खतरनाक सिद्ध हुआ। नेपथ्य में मंजे हुए राजनीतिज्ञ जैसे सरदार के. एम. पन्निकर, वी. टी. कृष्णामाचारी तथा भारतीय रियासतों के प्रतिष्ठित मंत्री और भारतीय सिविल सेवा के वरिष्ठ अधिकारी जैसे सी. एस. वेंकटाचार, एम. के. वेल्लोदी, वी. शंकर, पण्डित हरी शर्मा आदि अनुभवी लोग कार्य कर रहे थे। पटेल ने मेनन से कहा कि पाकिस्तान इस विचार के साथ कार्य कर रहा है कि सीमावर्ती कुछ राज्यों को वह अपने साथ मिला ले। स्थिति इतनी खतरनाक संभावनायें लिये हुए है कि जो स्वतंत्रता हमने बड़ी कठिनाईयों को झेलने के पश्चात् प्राप्त की है वह राज्यों के दरवाजे से विलुप्त हो सकती है।

    केवल तीन विषयों पर विलय

    आजादी की तिथि में पाँच सप्ताह शेष रह गये थे। एक ओर कोरफील्ड अंग्रेजों की सत्ता समाप्ति से पहले रजवाड़ों से केंद्रीय सत्ता का विलोपन करने के काम में लगे हुए थे जिससे एक-एक करके सारी व्यवस्थायें रद्द होती जा रही थीं। दूसरी ओर सरदार इस उधेड़-बुन में थे कि 15 अगस्त से पहले राजाओं की प्रत्येक व्यवस्था, जिन्हें अंग्रेजों ने रद्द करना आरंभ कर दिया था, जैसे सेना, डाक आदि को बनाये रखने के सम्बन्ध में कैसे बात की जाये? मेनन ने सरदार को सुझाव दिया कि राजाओं से केवल तीन विषयों में विलय के लिये कहा जाये। ये तीन विषय रक्षा, विदेशी मामले और संचार से सम्बन्धित थे। पटेल से अनुमति लेकर मेनन ने माउंटबेटन से इस कार्य में सहयोग मांगा। मेनन ने वायसराय से कहा कि यदि सारे रजवाड़े भारत में मिल जाते हैं तो विभाजन का घाव काफी कम हो जायेगा तथा यदि इस काम में माउंटबेटन ने सहयोग दिया तो भारत की जनता सदियों तक उनकी ऋणी रहेगी। माउंटबेटन ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया।

    5 जुलाई 1947 को पटेल ने राजाओं से अपील की कि वे 15 अगस्त 1947 से पूर्व भारत संघ में सम्मिलित हो जायें। देशी राज्यों को सार्वजनिक हित के तीन विषय- रक्षा, विदेशी मामले और संचार संघ को सुपुर्द करने होंगे जिसकी स्वीकृति उन्होंने पूर्व में केबीनेट मिशन योजना के समय दे दी थी। भारतीय संघ इससे अधिक उनसे और कुछ नहीं मांग रहा। संघ देशी राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की मंशा नहीं रखता। राज्यों के साथ व्यवहार में रियासती विभाग की नीति अधिकार की नहीं होगी। कांग्रेस राजाओं के विरुद्ध नहीं रही है। देशी नरेशों ने सदैव देशभक्ति व लोक कल्याण के प्रति अपनी आस्था प्रकट की है। पटेल ने राजाओं को चेतावनी भी दी कि यदि कोई नरेश यह सोचता हो कि ब्रिटिश परमोच्चता उसको हस्तांतरित कर दी जायेगी तो यह उसकी भूल होगी। परमोच्चता तो जनता में निहित है। एक प्रकार से यह घोषणा, राजाओं को समान अस्तित्व के आधार पर भारत में सम्मिलित हो जाने का निमंत्रण था। सरदार के शब्दों में यह प्रस्ताव, रजवाड़ों द्वारा पूर्व में ब्रिटिश सरकार के साथ की गयी अधीनस्थ संधि से बेहतर था।

    इस प्रकार पटेल व मेनन द्वारा देशी राजाओं को घेर कर भारत संघ में विलय के लिये पहला पांसा फैंका गया जिसका परिणाम यह हुआ कि बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने सरदार पटेल की इस घोषणा का एक बार फिर तुरंत स्वागत किया और अपने बंधु राजाओं से अनुरोध किया कि वे इस प्रकार आगे बढ़ाये गये मित्रता के हाथ को थाम लें और कांग्रेस को पूरा समर्थन दें ताकि भारत अपने लक्ष्य को शीघ्रता से प्राप्त कर सके किंतु अधिकांश राजाओं का मानना था कि उन्हें पटेल की बजाय कोरफील्ड की बात सुननी चाहिये।

    सम्मिलन प्रपत्र

    रियासती विभाग ने देशी राज्यों के भारत अथवा पाकिस्तान में प्रवेश के लिये दो प्रकार के प्रपत्र तैयार करवाये- प्रविष्ठ संलेख (Instrument of Accession) तथा यथास्थिति समझौता पत्र ( Standstill Agreement) प्रविष्ठ संलेख एक प्रकार का मिलाप पत्र (Joining Letter) था जिस पर हस्ताक्षर करके कोई भी राजा भारतीय संघ में प्रवेश कर सकता था और अपना आधिपत्य केंद्र सरकार को समर्पित कर सकता था। यह प्रविष्ठ संलेख उन बड़ी रियासतों के लिये तैयार किया गया था जिनके शासकों को पूर्ण अधिकार प्राप्त थे। इन रियासतों की संख्या 140 थी। इन रियासतों के अतिरिक्त गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में 300 रियासतें ऐसी थीं जिन्हें जागीर (Estates) अथवा तालुका कहा जाता था। इनमें से कुछ जागीरों व तालुकों को 1943 में संलग्नता योजना (Attachment Scheme) के तहत निकटवर्ती बड़े राज्यों के साथ जोड़ दिया गया था किंतु परमोच्चता की समाप्ति के साथ ही यह योजना भी समाप्त हो जानी थी। अतः इन ठिकानों एवं तालुकों के ठिकानेदारों एवं तालुकदारों ने मांग की कि उन्हें वर्ष 1943 वाली स्थिति में ले आया जाये तथा उनकी देखभाल भारत सरकार द्वारा की जाये जैसी कि राजनीतिक विभाग द्वारा की जाती रही थी। इन ठिकानों एवं तालुकों के लिये अलग प्रविष्ठ संलेख तैयार करवाया गया। काठियावाड़, मध्य भारत तथा शिमला हिल्स में 70 से अधिक राज्य ऐसे थे जिनका पद ठिकानेदारों और तालुकदारों से बड़ा था किंतु उन्हें पूर्ण शासक का दर्जा प्राप्त नहीं था। ऐसे राज्यों के लिये अलग से प्रविष्ठ संलेख तैयार करवाया गया।

    स्टैण्डस्टिल एग्रीमेण्ट प्रशासनिक एवं आर्थिक सम्बन्धों की यथास्थिति बनाये रखने के लिये सहमति पत्र था। भारत सरकार ने निर्णय किया कि वह उसी राज्य के साथ यथास्थिति समझौता करेगी जो राज्य, प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करेगा। इन दोनों प्रकार के प्रपत्रों को वायसराय ने 25 जुलाई 1947 की बैठक में उन देशी राज्यों के शासकों को दे दिया जो भारत की सीमा में पड़ने वाले थे क्योंकि जिन्ना ने वायसराय को कह दिया था कि पाकिस्तान की सीमा में आने वाले राज्यों से वे स्वयं बात करेंगे।

    राजाओं का वास्तविकता से साक्षात्कार

    25 जुलाई 1947 को वायसराय ने दिल्ली में नरेंद्र मण्डल का पूर्ण अधिवेशन बुलाया। माउंटबेटन द्वारा क्राउन रिप्रजेण्टेटिव के अधिकार से बुलाया जाने वाला यह पहला और अंतिम सम्मेलन था। सम्मेलन में उपस्थित लगभग 75 बड़े राजाओं अथवा उनके प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए माउंटबेटन ने कहा कि भारत स्वतंत्रता अधिनियम ने 15 अगस्त 1947 से राज्यों को ताज के प्रति उनके दायित्वों से स्वतंत्र कर दिया है। राज्यों को तकनीकी एवं कानूनी रूप से पूरी संपूर्ण स्वतंत्रता होगी....किंतु ब्रिटिश राज के दौरान साझा हित के विषयों के संबध में एक समन्वित प्रशासन पद्धति का विकास हुआ है जिसके कारण भारत उपमहाद्वीप ने एक आर्थिक इकाई के रूप में कार्य किया। वह सम्पर्क अब टूटने को है। यदि इसके स्थान पर कुछ भी नहीं रखा गया तो उसका परिणाम अस्तव्यस्त्ता ही होगा। उसकी पहली चोट राज्यों पर होगी। उपनिवेश सरकार से आप उसी प्रकार नाता नहीं तोड़ सकते जिस प्रकार कि आप जनता से नाता नहीं तोड़ सकते, जिसके कल्याण के लिये आप उत्तरदायी हैं।

    राज्य तीन विषयों- रक्षा, विदेशी मामले और संचार पर भारत या पाकिस्तान, जो उनके लिये उपयुक्त हो, के साथ अपना विलय कर लें। राज्यों पर कोई वित्तीय जवाबदेही नहीं डाली जायेगी तथा उनकी संप्रभुता का अतिक्रमण नहीं किया जायेगा। उन्होंने हिन्दू बहुल क्षेत्रों के राजाओं को सलाह दी कि वे अपने राज्यों का विलय भारत में करें।

    प्रविष्ठ संलेख प्रारूप को स्वीकृति

    वायसराय ने एक वार्त्ता समिति का गठन किया जिसमें 10 राज्यों के शासक तथा 12 राज्यों के दीवान सम्मिलित किये गये। यह समिति दो उपसमितियों में विभक्त हो गयी। एक उपसमिति को प्रविष्ठ संलेख पर तथा दूसरी उपसमिति को यथास्थिति समझौता पत्र पर विचार विमर्श करना था। इन दोनों उपसमितियों ने 25 जुलाई से 31 जुलाई तक प्रतिदिन दिल्ली स्थित बीकानेर हाउस में अलग-अलग बैठकें कीं। लगातार छः दिन एवं रात्रियों तक परिश्रम करने के बाद दोनों दस्तावेजों को अंतिम रूप दिया जा सका। 31 जुलाई 1947 को दोनों प्रारूप स्वीकार कर लिये गये।

    राजाओं के विशेषाधिकारों की संवैधानिक गारण्टी

    अधिकांश राजाओं को डर था कि आजादी के बाद या तो उनकी जनता ही उनकी संपत्तियों को लूट लेगी अथवा कांग्रेस सरकार उसे जब्त कर लेगी। ब्रिटिश सत्ता आजादी के बाद किसी भी तरह राजाओं की रक्षा नहीं कर सकती थी। उनमें से अधिकांश को समझ में आने लगा था कि या तो अत्यंत असम्मानजनक तरीके से हमेशा के लिये मिट जाओ या फिर किसी तरह सम्मानजनक तरीके से अपनी कुछ सम्पत्तित तथा कुछ अधिकारों को बचा लो। 31 जुलाई 1947 को बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने रियासती मंत्रालय के सचिव को एक पत्र लिखकर विशेषाधिकारों की मांग की। रियासती मंत्रालय के सचिव ने महाराजा को लिखा कि नेरशों के व्यक्तिगत विशेषाधिकारों के विषय में हमने केन्द्र सरकार के समस्त सम्बंधित विभागों से राय ली है और मुझे यह आश्वासन देने का निर्देश हुआ है कि नरेशगण व उनके परिवार जिन विशेषाधिकारों का उपयोग करते आये हैं, वह भविष्य में भी करते रहेंगे। बीकानेर महाराजा ने इस पत्र की प्रतियां बहुत से राजाओं को भिजवायीं। जोधपुर महाराजा इस पत्र से आश्वस्त नहीं हुए किंतु उन्होंने केन्द्र सरकार से किसी विशेष अधिकार की मांग नहीं की। उनका मानना था कि प्रजा के साथ पीढ़ियों पुराने व प्रेमपूर्ण सम्बन्ध होने तथा अपने पूर्वजों द्वारा प्रजा की भलाई के लिये किये गये असंख्य कार्यों के कारण उन्हें प्रजा का सौहार्द्र मिलता रहेगा और यही उनका सबसे बड़ा विशेषाधिकार होगा।

    शासकों द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर

    सरदार पटेल की अपील, माउंटबेटन द्वारा नरेंद्रमंडल में दिये गये उद्बोधन, कोरफील्ड की रवानगी, रियासतों में चल रहे जन आंदोलन तथा बीकानेर नरेश को रियासती मंत्रालय के पत्र आदि परिस्थितियों के वशीभूत होकर राजपूताने के अधिकांश राजाओं ने भारत में विलय के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये। बीकानेर नरेश सादूलसिंह हस्ताक्षर करने वाले प्रथम राजा थे। अधिकतर राज्यों, विशेषकर छोटे राज्यों, जिन्हें अपनी सीमाओं का पता था तथा वे ये भी जानते थे कि रोटी के किस तरफ मक्खन लगा हुआ है, स्वेच्छा से भारतीय संघ के अंतर्गत आ गये। न तो वे अर्थिक रूप से सक्षम थे और न ही आंतरिक अथवा बाह्य दबावों का विरोध करने की उनमें क्षमता थी। कई बुद्धिमान तथा यथार्थवादी राजाओं ने विरोध की व्यर्थता तथा शक्तिशाली भारत संघ की संविधान सभा की सदस्यता की सार्थकता को अनुभव किया तथा शालीनता पूर्वक भारत संघ में सम्मिलित हो गये। कुछ हंसोड़ एंव मजाकिया स्वभाव के थे वे भी संघ में धकेल दिये गये। कुछ राजा अपने घोटालों और कारनामों से डरे हुए थे, उन्हें भी बलपूर्वक संघ में धकेल दिया गया। राजनीतिक विभाग के मखमली दस्ताने युक्त हाथ, राजाओं की भुजाओं पर काम करते रहे।

    एक एक कर रजवाड़ों ने दस्तखत करने के लिये कतार लगा दी। कुछ रजवाड़ों ने अपना विलय स्वीकार तो किया किंतु बेहद रंजिश के साथ। मध्य भारत का एक राजा विलय के कागजात पर हस्ताक्षर करने के साथ लड़खड़ा कर गिरा और हृदयाघात से उसकी मृत्यु हो गयी। बड़ौदा का महाराजा दस्तखत करने के बाद मेनन के गले में हाथ डालकर बच्चों की तरह रोया। भोपाल ने सेंट्रल इण्डियन स्टेट्स का एक फेडरेशन बनाने का प्रयास किया किंतु वह असफल हो गया। राजपूत राजाओं ने भारतीय सेना के राजपूत सिपाहियों को आकर्षित करके रजवाड़ों की सेना में सम्मिलित कर लेने की आशा की थी किंतु यह आशा फलीभूत नहीं हुई।

    जब त्रावणकोर ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया तो स्टेट्स कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी ने महाराजा के खिलाफ आंदोलन किया। त्रावणकोर की पुलिस के साथ सड़कों पर मुठभेड़ हुई। 29 जुलाई को एक अनजान हमलावर ने सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर को छुरा मारकर बुरी तरह घायल कर दिया। रामास्वामी के चेहरे पर गहरी चोट आयी। हमलावर भागने में सफल रहा। इस हमले ने निर्णय कर दिया। महाराजा ने वायसराय को तार दिया कि वह दस्तखत करने को तैयार है। सरदार पटेल ने स्थानीय कांग्रेस कमेटी को तुरंत प्रदर्शन बंद करने का आदेश दिया। इसका जादू का सा प्रभाव हुआ। राज्यों को सबक मिला। वे और अधिक संख्या में हस्ताक्षर करने लगे। इस हमले ने निजाम को हिला दिया। राजा लोगों के नष्ट होने के तीन कारण थे- एक तो वे राष्ट्रवादी थे, दूसरे वे कायर थे तथा तीसरा कारण यह था कि उनमें से अधिकांश मूर्ख थे और अपने ही पापाचार में नष्ट हो गये थे।

    हैदराबाद, त्रावणकोर, भोपाल, जोधपुर व इंदौर दस्तखत करने वालों में सम्मिलित नहीं हुए। वायसराय ने हैदराबाद के अतिरिक्त शेष समस्त रियासतों के शासक अथवा दीवान को वार्त्ता के लिये बुलाया।


    बीकानेर राज्य का भारत में विलय

    बीकानेर राज्य संविधान सभा में अपना प्रतिनिधि भेजने से लेकर भारत संघ में विलय की घोषणा के मामले में देश के समस्त देशी राज्यों में अग्रणी रहा किंतु महाराजा स्वतंत्र भारत में अपने अधिकारों को लेकर अत्यंत सतर्क थे।

    फिरोजपुर वाटर हैड वर्क्स का मामला

    ब्रिटिश सरकार की घोषणा के अनुसार भारत और पाकिस्तान में सम्मिलित किये जाने वाले क्षेत्रों का निर्णय हिन्दू अथवा मुस्लिम बहुल जनसंख्या के आधार पर किया जाना था। इस आधार पर पाकिस्तान ने पंजाब के फिरोजपुर स्थित 'वाटर हैड वर्क्स' पर भी अपना दावा जताया। इस नहर से बीकानेर राज्य की एक हजार वर्ग मील से अधिक भूमि सिंचित होती थी। महाराजा सादूलसिंह ने प्रधानमंत्री के. एम. पन्निकर, जस्टिस टेकचंद बक्षी और मुख्य अभियंता कंवरसेन को बीकानेर राज्य का पक्ष रखने के लिये नियुक्त किया। पन्निकर ने रियासती विभाग के मंत्री तथा विभाजन हेतु गठित उच्चस्तरीय परिषद के सदस्य सरदार पटेल पर इस बात के लिये दबाव डाला कि वे सुनिश्चत कर लें कि फिरोजपुर हैड वर्क्स पूर्णतः भारत सरकार द्वारा नियंत्रित रहेगा। महाराजा ने माउंटबेटन तथा पटेल को संदेश भिजवाया कि यदि फिरोजपुर हैड वर्क्स और गंगनहर का एक भाग पाकिस्तान में जाता है तो हमारे लिये पाकिस्तान में सम्मिलित होने के अलावा और कोई चारा नहीं रहेगा। 17 अगस्त 1947 को रेडक्लिफ ने फिरोजपुर हैड वर्क्स को भारत में बने रहने का निर्णय दिया।

    स्वतंत्र भारत में बीकानेर राज्य द्वारा अलग इकाई बने रहने के लिये प्रयास

    15 जुलाई 1947 को महाराजा सादूलसिंह ने नेहरू को एक पत्र लिखा जिसमें 110 पैरागा्रफ थे। महाराजा ने लिखा कि प्रजा परिषद वाले राज्य में इस प्रकार का प्रचार कर रहे हैं कि निकट भविष्य में समस्त भारत में गांधी राज हो जायेगा और भारतीय राज्य भी उन में मिला लिये जायेंगे। तिरंगा ही एकमात्र झण्डा होगा। जबकि वास्तविकता तो यह है कि न तो गांधीजी के ऐसे विचार हैं और न ही भारतीय राज्य भारत में अपने अस्तित्व को सम्मिलित करने जा रहे हैं। इस पत्र से यह आभास होता है कि बीकानेर नरेश भले ही जोर-शोर से भारत संघ में मिलने की घोषणा कर रहे थे किंतु वे यह आश्वासन भी चाहते थे कि स्वतंत्र भारत में उनकी रियासत पूरी तरह स्वतंत्र बनी रहेगी।

    बीकानेर द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर

    6 अगस्त 1947 को सादूलसिंह ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिये। यथास्थिति समझौता पत्र पर राज्य के प्रधानमंत्री के. एम. पन्न्किर द्वारा हस्ताक्षर किये गये। रियासती विभाग ने महाराजा को पत्र लिखकर सूचित किया कि वायसराय और सरदार पटेल ने महाराजा द्वारा निर्वहन की गयी भूमिका के प्रति आभार व्यक्त किया है। संक्षिप्त अवधि में ही इस समझौते पर हस्ताक्षर करके महाराजा ने भारत तथा राज्यों के समान हित के लिये त्याग किया है। वायसराय तथा सरदार ने आशा व्यक्त की है कि इस विलय पत्र के माध्यम से प्रस्तुत उदाहरण से, आने वाले समय में भारत तथा राज्यों के मध्य सहयोग का एक नया युग आरंभ होगा जो संपूर्ण देश को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से मजबूत बनायेगा। बाद में ऐसे ही पत्र प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने वाले अन्य समस्त राज्यों के शासकों को भी भिजवाये गये। इस प्रविष्ठ संलेख के द्वारा महाराजा ने रक्षा, संचार और विदेश मामलों पर अपनी सारी सत्ता केंद्र सरकार को सौंप दी और शेष विषयों में महाराजा ने अपने आप को स्वतंत्र मान लिया। अधिकांश रियासतों ने भवितव्य के आगे सिर झुका कर प्रविष्ठ संलेख पर दस्तखत कर दिये। इनमें सबसे पहला बीकानेर का महाराजा था, जो वायसराय का पुराना दोस्त था। बड़े नाटकीय अंदाज में उसने हस्ताक्षर किये।

    15 अगस्त 1947 को महाराजा ने एक भाषण में कहा कि ब्रिटिश सत्ता की समाप्ति के साथ भारतीय रियासतों को यह छूट थी कि वे अलग रहें और नये राष्ट्र के साथ सम्बन्धित होने से मना कर दें। कानूनी दृष्टि से आज हम समस्त स्वतंत्र हो सकते हैं क्योंकि हमने ब्रिटिश साम्राज्य को आधिपत्य का जो अधिकार सौंपा था, वह भारतीय स्वतंत्रता कानून के अंतर्गत हमें वापिस मिल गया। हम अलग रह सकते थे और भारतीय राष्ट्र में विलय नहीं करते। एक क्षण के विचार से ही यह स्पष्ट हो जायेगा कि इसका परिणाम कितना विनाशकारी होता। शुरू से ही मेरे दिमाग में यह बात आ गयी थी कि इससे भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जायेगा। इसके परिणाम का पूर्व ज्ञान रखते हुए मैंने बिना हिचकिचाहट के भारत के उन तत्वों के साथ सहयोग करने का निश्चय किया जो एक मजबूत केन्द्रीय सरकार की स्थापना के लिये कार्य कर रहे थे।

    बीकानेर राज्य में शराणार्थियों की समस्या

    पाकिस्तान के साथ बीकानेर राज्य की लगभग 200 मील लम्बी सीमा थी। बीकानेर द्वारा भारत संघ में सम्मिलित होने का निर्णय लेने पर इस सीमा को पार करके लाखों लोग पाकिस्तान से भारत आये तथा भारत से पाकिस्तान गये। लगभग 7-8 लाख लोग भारत से निकाल कर सुरक्षित रूप से पाकिस्तान पहुंचाये गये। बीकानेर राज्य की सीमा पर बहावलपुर राज्य था जिसमें 1.90 लाख हिन्दू तथा 50 हजार सिक्ख रहते थे। बहावलपुर राज्य के हासिलपुर में 350 सिक्ख एवं हिन्दू मार डाले गये। इससे बहावलपुर राज्य के अन्य कस्बों में गाँवों में में भगदड़ मच गयी। 15 अगस्त 1947 के बाद बीकानेर राज्य में लगभग 75 हजार शरणार्थी आये जिनके लिये शरणार्थी शिविरों की स्थापना की गयी। बहुत से लोगों को बीकानेर से 40 किलोमीटर दूर कोलायत में भेजा गया।

    इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थियों के आने से राज्य की व्यवस्थायें गड़बड़ा गयीं। राज्य की ओर से शरणार्थियों के ठहरने व भोजन-पानी की व्यवस्था की गयी। कोलायत तथा सुजानगढ़ आदि कस्बों में शरणार्थियों को ठहराया गया। गंगानगर क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में शरणार्थी आये। इन शरणार्थियों पर पाकिस्तान में बहुत अत्याचार हुए थे इसलिये वे मुसलमानों से बदला लेने पर उतारू थे। उन्हें शांत रखने तथा मुसलमानों पर आक्रमण न करने देने के लिये राज्य की ओर से सेना लगायी गयी। सेना ने बहुत से मुसलमानों को बहावलपुर राज्य में सुरक्षित पहुंचाया। जब चूरू के महाजनों ने अपने मुसलमान नौकरों को नौकरी से निकाल दिया तो वे मुसलमान, महाराजा सादूलसिंह के पास बीकानेर आ गये। महाराजा ने विशेष रेलगाड़ी से नौकरों को वापस चूरू भिजवाया तथा महाजनों को कहकर वापस नौकरी में रखवाया।

    जो लोग बीकानेर राज्य छोड़कर पाकिस्तान चले गये थे उन्हें महाराजा ने फिर से बीकानेर राज्य में आकर बसने का न्यौता दिया तथा जो हिंदू शरणार्थी पाकिस्तान से बीकानेर राज्य में आ गये थे उन्हें ब्रिटिश भारत में भेजने के लिये महाराजा ने भारत सरकार से अनुरोध किया। पाकिस्तान से आये कुल 50,746 शरणार्थियों को बीकानेर राज्य द्वारा 2,58,516 बीघा जमीन आवंटित की गयी। बहुत से सिक्ख पास्तिान के रहीमयार खान नामक जिले में घेर कर रोक लिये गये। बीकानेर राज्य के अधिकारियों ने बहावलपुर के राज्याधिकारियों से बात करके इन शरणार्थियों को निकलवाया।

    बीकानेर नरेश की प्रशंसा

    सरदार पटेल ने देशी राज्यों के भारत में विलय के पश्चात महाराजा सादूलसिंह का धन्यवाद करते हुए उन्हें लिखा कि राजाओं को गलत राह पर ले जाने के लिये जान-बूझकर जो संदेह और भ्रम उत्पन्न किये गये उन्हें मिटाने में महाराजा ने जो कष्ट किया, उससे मैं भलीभांति परिचित हूँ। महाराजा का नेतृत्व निश्चय ही समयानुकूल और प्रभावशाली रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ माह बाद जनवरी 1948 में लॉर्ड माउंटबेटन बीकानेर राज्य के दौरे पर आये। उन्होंने अपने भाषण में सादूलसिंह की बड़ी प्रशंसा की और कहा कि महाराजा प्रथम शासक थे जिन्होंने भारत का नया संविधान बनाने में मदद देने के लिये संविधान निर्मात्री सभा में प्रतिनिधि भेजकर यह अनुभव कर लिया कि भविष्य में राजा लोगों को क्या करना है। महाराजा पहले शासक थे जिन्होंने रियासतों के अपने पास के संघ में सम्मिलित होने के मेरे प्रस्तावों का समर्थन किया। 2 सितम्बर 1954 को राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने बीकानेर में महाराजा सादूलसिंह की मूर्ति का अनावरण करते हुए उनके योगदान की प्रशंसा की कि जब एक ओर भारत के बंटवारे की विपत्ति आ रही थी और दूसरी ओर भारतवर्ष के टुकड़े किये जाने के लिये द्वार खोला जा रहा था, उन्होंने जवांमर्दी, देशप्रेम तथा दूरदर्शिता से अपने आप को खड़ा करके उस दरवाजे का मुँह बंद कर दिया।

    बीकानेर महाराजा का पाकिस्तान की ओर झुकाव

    बीकानेर के अधिकारियों तथा बहावलपुर राज्य के प्रधानमंत्री नवाब मुश्ताक अहमद गुरमानी के मध्य भारत सरकार के सैन्य अधिकारी मेजर शॉर्ट की अध्यक्षता में बीकानेर में एक बैठक रखी गयी। 7 नवम्बर 1947 को मेजर शार्ट की मध्यस्थता में दोनों रियासतों के मध्य शरणार्थियों एवं सीमा सम्बन्धी विवादों पर चर्चा हुई तथा एक समझौता भी हुआ। इसके बाद उसी दिन शाम की ट्रेन से मेजर शॉर्ट दिल्ली चला गया और गुरमानी को भी सरकारी रिकॉर्ड में बहावलपुर जाना अंकित कर दिया गया जबकि महाराजा ने गुरमानी को गुप्त मंत्रणा के लिये लालगढ़ में ही रोक लिया। तीन दिन तक गुरमानी लालगढ़ में रहा। इस दौरान राजमहल का सारा स्टाफ मुसलमानों का रहा। अपवाद स्वरूप कुछ ही हिन्दू कर्मचारियों को महल में प्रवेश दिया गया। इनमें से राज्य के जनसम्पर्क अधिकारी बृजराज कुमार भटनागर भी थे। उन्हें इसलिये प्रवेश दिया गया कि वे महाराजा के अत्यंत विश्वस्त थे तथा उर्दू के जानकार भी थे। 10 नवम्बर तक गुरमानी और सादूलसिंह के बीच गुप्त मंत्रणा चलती रही। इस दौरान सादूलसिंह का झुकाव पाकिस्तान की ओर हो गया। यह निर्णय लिया गया कि प्रायोगिक तौर पर छः माह के लिये बीकानेर और बहावलपुर राज्यों के मध्य एक व्यापारिक समझौता हो। समझौता लिखित में हुआ तथा दोनों ओर से हस्ताक्षर करके एक दूसरे को सौंप दिया गया।

    बृजराज कुमार भटनागर ने यह बात बीकानेर में हिन्दुस्तान टाइम्स के संवाददाता दाऊलाल आचार्य को बता दी। यह समाचार 17 नवम्बर 1947 को हिन्दुस्तान टाइम्स के दिल्ली संस्करण में तथा 18 नवम्बर को डाक संस्करण में प्रकाशित हुआ जिससे दिल्ली और बीकानेर में हड़कम्प मच गया। बीकानेर प्रजा परिषद के नेताओं ने इस संधि का विरोध करने का निर्णय लिया और दिल्ली जाकर भारत सरकार को ज्ञापन देने की घोषणा की। यह रक्षा से सम्बद्ध मामला था तथा संघ सरकार के अधीन आता था इसलिये पटेल ने तुरंत एक सैन्य सम्पर्क अधिकारी को बीकानेर तथा बहावलपुर की सीमा पर नियुक्त किया और बीकानेर महाराजा को लिखा कि वे इस अधिकारी के साथ पूरा सहयोग करें। बीकानेर के गृह मंत्रालय द्वारा समाचार पत्र के संवाददाता को समाचार का स्रोत बताने के लिये कहा गया। उन्हीं दिनों बीकानेर सचिवालय की ओर से रायसिंहनगर के नाजिम को एक तार भेजा गया। इस तार में रायसिंहनगर के नाजिम को सूचित किया गया था कि बहावलपुर रियासत से हमारा व्यापार यथावत चल रहा है। रायसिंहनगर में रेवेन्यू विभाग के भूतपूर्व पेशकार मेघराज पारीक ने वह तार नाजिम के कार्यालय से चुरा लिया और दाऊलाल आचार्य को सौंप दिया। इस तार के प्रकाश में आने के बाद बीकानेर राज्य का गृह विभाग शांत होकर बैठ गया।

    बीकानेर महाराजा ने हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित समाचारों का विरोध करते हुए भारत सरकार को लिखा कि बीकानेर प्रजा परिषद और बीकानेर राज्य के सम्बन्ध ठीक नहीं हैं इसलिये प्रजा परिषद के एक कार्यकर्ता ने जो कि हिन्दुस्तान टाइम्स का संवाददाता भी है, इस खबर को प्रकाशित करवाया है ताकि बीकानेर राज्य पर दबाव बनाकर उसे उपनिवेश सरकार द्वारा अधिग्रहीत कर लिया जाये। क्या प्रजा परिषद बीकानेर राज्य को जूनागढ़ तथा हैदराबाद के समकक्ष रखना चाहती है? महाराजा ने पटेल से अनुरोध किया कि वह इस सम्बन्ध में दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही में सहायता करें तथा एक आधिकारिक बयान जारी करके इस आरोप को निरस्त करें।

    इस पर रियासती विभाग ने एक वक्तव्य जारी किया कि कुछ समाचार पत्रों में इस आशय के समाचार प्रकाशित किये गये हैं कि बीकानेर, पाकिस्तान एवं बहावलपुर के मध्य एक व्यापारिक संधि हुई है। यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि यह समचार पूर्णतः आधारहीन है। ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ है। बहावलपुर के मुख्यमंत्री सीमा के दोनों तरफ रह रहे शरणार्थियों में भय फैलने से रोकने के लिये किये जा रहे प्रयासों के लिये मैत्री यात्रा पर आये थे। बीकानेर के अंतिम महाराजा सादूलसिंह ने अंतरिम सरकार बनाकर आंशिक मात्रा में सत्ता जनता को सौंपी अवश्य पर रियासत को अलग इकाई रखने हेतु जो पापड़ बेले गये और दुरभिसंधियां की, उनकी सूचना दाऊलाल आचार्य एवं मूलचंद पारीक ने यथासमय उच्चस्थ विभागों को पहुंचायी, वह तो देशभक्ति की अनोखी मिसाल है। उसी के कारण बीकानेर रियासत भारत में रह पायी।


    जोधपुर राज्य का भारत में विलय

    8 जून 1947 को जोधपुर नरेश उम्मेदसिंह का आकस्मिक बीमारी से देहांत हो गया। 21 जून 1947 को दिवंगत नरेश के 25 वर्षीय पुत्र हनवंतसिंह का राज्यारोहण हुआ। वे जोधपुर राज्य के अड़तीसवें राठौड़ राजा थे। राज्यारोहण के अवसर पर हनवंतसिंह ने घोषणा की कि स्वर्गवासी महाराजा ने जिन वैधानिक सुधारों का श्रीगणेश किया था उनमें वृद्धि करते हुए, हनवंतसिंह वैधानिक शासक के रूप में शासन करेंगे। उन्होंने दिवंगत महाराजा द्वारा राज्य को संविधान सभा में सम्मिलित करने की जो घोषणा की थी उसकी भी पुष्टि की। स्थापित परम्परा के अनुसार नये महाराजा के राज्यारोहण के समय ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि के रूप में राज्य का राजनीतिक एजेंट एक खरीता भेंट करता था जिसमें नये महाराजा के राज्यारोहण की पुष्टि की जाती थी। चंूकि स्वतंत्रता की तिथि अत्यंत निकट आ गयी थी इसलिये निर्णय किया गया कि महाराजा को ब्रिटिश क्राउन रिप्रजेण्टेटिव की ओर से दिया जाने वाला खरीता डाक से भेजा जाये।

    जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र

    16 जुलाई 1947 को वी. पी. मेनन ने इंगलैण्ड में भारत उपसचिव सर पैट्रिक को एक तार दिया कि वायसराय ने मैसूर, बड़ौदा, ग्वालियर, बीकानेर, जयपुर और जोधपुर के प्रतिनिधियों से भारत में विलय के विषय में बातचीत की। उन सबकी प्रतिक्रिया सकारात्मक थी। 2 अगस्त 1947 को मेनन ने पैट्रिक को सूचित किया कि भारत के लगभग समस्त राजा अपने राज्यों का भारतीय संघ में विलय करने के लिये तैयार हो गये हैं। केवल हैदराबाद, भोपाल और इंदौर हिचकिचा रहे हैं। वायसराय ने देशी नरेशों से बात की है और इन राज्यों के नरेशों ने भारतीय संघ में सम्मिलित होने पर सहमति दर्शायी है- ग्वालियर, पटियाला, कोटा, जोधपुर, जयपुर, रामपुर, नवानगर, झालावाड़, पन्ना, टेहरी गढ़वाल, फरीदकोट, सांगली, सीतामऊ, पालीताना, फाल्टन, खैरागढ़, सांदूर।

    यद्यपि जोधपुर राज्य 28 अप्रेल 1947 से संविधान सभा में भाग ले रहा था तथा जोधपुर के युवा महाराजा हनवंतसिंह दो बार भारत में मिलने की घोषणा कर चुके थे किंतु वे देश को स्वतंत्रता मिलने से ठीक 10 दिन पहले पाकिस्तान का निर्माण करने वाले मुहम्मद अली जिन्ना और उनका साथ देने वाले नवाब भोपाल एवं धौलपुर के महाराजराणा के चक्कर में आ गये। जब राजपूताना के राज्यों का स्वतंत्र समूह गठित करने की योजना विफल हो गयी तो राजनीतिक विभाग के सदस्यों ने राजपूताना के राज्यों को सलाह दी कि वे पाकिस्तान में मिल जायें क्योंकि भारत पाकिस्तान की सीमा पर स्थित होने के कारण कानूनन वे ऐसा कर सकते थे। इनमें से जोधपुर राज्य एक था।

    महाराजा हनवंतसिंह कांग्रेस से घृणा करते थे तथा जोधपुर की रियासत पाकिस्तान से लगी हुई थी। इसलिये हनवंतसिंह ने जिन्ना से भेंट करने की सोची। जिन्ना और मुस्लिम लीग के नेताओं की जोधपुर नरेश से कई बार भेंट हुई थी और अंतिम भेंट में वे जैसलमेर के महाराजकुमार को भी साथ ले गये थे। बीकानेर नरेश ने उनके साथ जाने से मना कर दिया था और हनवंतसिंह जिन्ना के पास अकेले जाने में हिचकिचा रहे थे। उन लोगों को देखकर जिन्ना की बांछें खिल गयीं। जिन्ना जानते थे कि अगर ये दोनों रियासतें पाकिस्तान में सम्मिलित हो गयीं तो अन्य राजपूत रियासतें भी पाकिस्तान में सम्मिलित हो जायेंगी। इससे पंजाब और बंगाल के बंटवारे की कमी भी पूरी हो जायेगी तथा समस्त प्रमुख रजवाड़ों को हड़पने की कांग्रेसी योजना भी विफल हो जायेगी। जिन्ना ने एक कोरे कागज पर हस्ताक्षर करके अपनी कलम के साथ जोधपुर नरेश को दे दिया और कहा कि आप इसमें जो भी शर्तें चाहें भर सकते हैं। इसके बाद कुछ विचार विमर्श हुआ। इस पर हनवंतसिंह पाकिस्तान में मिलने को तैयार हो गये। फिर वे जैसलमेर के महाराजकुमार की ओर मुड़े और उनसे पूछा कि क्या वे भी हस्ताक्षर करेंगे? महाराजकुमार ने कहा कि वे एक शर्त पर हस्ताक्षर करने को तैयार हैं कि यदि कभी हिंदू और मुसलमानों में झगड़ा हुआ तो जिन्ना हिन्दुओं के विरुद्ध मुसलमानों का पक्ष नहीं लेंगे। यह एक बम के फटने जैसा था जिसने महाराजा हनवंतसिंह को अचंभे में डाल दिया। जिन्ना ने हनवंतसिंह पर बहुत दबाव डाला कि वे दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दें। जब महाराजकुमार जैसलमेर ने पाकिस्तान में विलय से मना कर दिया तो महाराजा डांवाडोल हो गये। इस अवसर का लाभ उठाकर महाराजा के ए. डी. सी. कर्नल केसरीसिंह ने महाराजा को सलाह दी कि वे अंतिम निर्णय लेने से पहले अपनी माताजी से भी सलाह ले लें। महाराजा को यह बहाना मिल गया और उन्होंने यह कह कर जिन्ना से विदा ली कि वे इस विषय में सोच समझ कर अपने निर्णय से एक-दो दिन में अवगत करायेंगे।

    कर्नल केसरीसिंह ने जोधपुर लौटकर प्रधानमंत्री सी. एस. वेंकटाचार को तथ्यों से अवगत करवाया। षड़यंत्र की गंभीरता को देखकर वेंकटाचार ने 6 अगस्त 1947 को बीकानेर राज्य के प्रधानमंत्री सरदार पन्निकर के पास पत्र भिजवाया। पत्र में लिखा था कि भोपाल नवाब महाराजा जोधपुर को जिन्ना से मिलाने ले गये थे। जिन्ना ने पेशकश की थी कि वे जोधपुर को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देकर संधि करने को तैयार हैं। उन्होंने यह भी पेशकश की कि जोधपुर राज्य को जो हथियार चाहिये वे पाकिस्तान के बंदरगाह से बिना सीमांत कर दिये, लाये जा सकते हैं। जिन्ना ने महाराजा जोधपुर को राजस्थान का सर्वेसर्वा बनाने की पेशकश की जिससे जोधपुर महाराजा चकित रह गये और उनके मन में इच्छा जागी कि वे राजस्थान के सम्राट बन जायेंगे। महाराजा के सेक्रेटरी कर्नल केसरीसिंह जिन्ना के निवास पर महाराजा के साथ गये थे किंतु उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया। अतः उन्हें पूरी शर्तों के बारे में पता नहीं था। जब महाराजा दूसरे दिन भोपाल नवाब के साथ जिन्ना से मिलने गये तो संधि का प्रारूप हस्ताक्षरों के लिये तैयार था। उस समय महाराजा ने केसरीसिंह से कहा कि मैं संधि पर हस्ताक्षर करके राजस्थान का बादशाह हो जाउंगा। केसरीसिंह ने उन्हें समझाया कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिये और ऐसा करने से पहले अपनी माता व अन्य सम्बन्धियों से विचार विमर्श करना चाहिये। इस पर महाराजा ने यह आश्वासन देकर जिन्ना से विदा ली कि वे अपने परिवार के अन्य सदस्यों से सलाह करके 8 अगस्त को संधि पर हस्ताक्षर करेंगे। केसरीसिंह ने भी इस आश्वासन को दोहराया।

    जोधपुर लौटकर हनवंतसिंह ने सरदार समंद पैलेस में राज्य के जागीरदारों की एक बैठक बुलायी तथा उनकी राय जाननी चाही। दामली ठाकुर के अतिरिक्त और कोई जागीरदार भारत सरकार से संघर्ष करने के लिये तैयार नहीं हुआ। महाराजा तीन दिन जोधपुर में रहे। पाकिस्तान में मिलने के प्रश्न पर जोधपुर के वातावरण में काफी क्षोभ था। जब हनवंतसिंह तीन दिन बाद दिल्ली लौटे तो मेनन को बताया गया कि यदि मेनन ने महाराजा को शीघ्र नहीं संभाला तो वे पाकिस्तान में मिल सकते हैं। मेनन ने माउंटबेटन से निवेदन किया कि वे जोधपुर महाराजा को भारत में सम्मिलित होने के लिये सहमत करें। मेनन इंपीरियल होटल गये और महाराजा से कहा कि लॉर्ड माउंटबेटन उनसे बातचीत करना चाहते हैं। मेनन तथा हनवंतसिंह कार में वायसराय भवन गये। वायसराय ने अपने आकर्षक व्यक्त्त्वि एवं दृढ़ निश्चय से महाराजा से इस प्रकार बात की जैसे कोई अध्यापक अपने अनुशासनहीन छात्र को समझाता है। उन्होंने महाराजा से कहा कि उन्हें अपने राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का पूरा अधिकार है किंतु उन्हें इसके परिणामों का भी ध्यान रखना चाहिये। वे स्वयं हिन्दू हैं व उनकी अधिकांश प्रजा हिन्दू है। महाराजा का यह कदम इस सिद्धांत के विरुद्ध होगा कि भारत के टुकड़े केवल दो भागों में होंगे जिनमें से एक मुस्लिम देश होगा और दूसरा गैर मुस्लिम देश। उनके पास्तिान में विलय से जोधपुर में सांप्रदायिक दंगे होंगे। कांग्रेस के भी आंदोलन करने की संभावना है।

    महाराजा ने माउंटबेटन को बताया कि जिन्ना ने खाली कागज पर अपनी शर्तें लिखने के लिये कहा है जिन पर जिन्ना हस्ताक्षर कर देंगे। इस पर मेनन ने कहा कि मैं भी ऐसा कर सकता हूँ किंतु उससे महाराजा को ठीक उसी तरह कुछ भी प्राप्त नहीं होगा जिस तरह जिन्ना के हस्ताक्षरों के बावजूद महाराजा को पाकिस्तान से कुछ नहीं मिलेगा। इस पर माउंटबेटन ने मेनन से कहा कि मेनन भी जिन्ना की तरह महाराजा को कुछ विशेष रियायतें दें। महाराजा ने अपने राज्य का विलय भारत में करने की बात मान ली और प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिये। महाराजा तथा मेनन के बीच कुछ विशेषाधिकारों पर सहमति हुई जिन्हें लिखित रूप में आ जाने पर मेनन स्वयं जोधपुर लेकर गये।

    8 अगस्त 1947 को माउंटबेटन द्वारा भारत सचिव को भेजे गये प्रतिवेदन में कहा गया कि जोधपुर के प्रधानमंत्री वेंकटाचार ने सूचित किया है कि जोधपुर के युवक महाराजा ने दिल्ली में वायसराय के साथ दोपहर का खाना खाने के पश्चात् यह कहा था कि वे भारतीय संघ में मिलना चाहते हैं परंतु इसके तुरंत बाद ही धौलपुर महाराजा ने जोधपुर महाराजा को दबाया कि वे भारतीय संघ में सम्मिलित नहीं हों। जोधपुर महाराजा को जिन्ना के पास ले जाया गया और नवाब भोपाल तथा उनके वैधानिक सलाहकार जफरुल्ला खां की उपस्थिति में जिन्ना ने यह पेशकश की कि यदि महाराजा 15 अगस्त को अपने राज्य को स्वतंत्र घोषित कर दें तो उन्हें ये रियायतें दे दी जायेंगी- (1.)कराची के बंदरगाह की समस्त सुविधाएं जोधपुर राज्य को दी जायेंगी। (2.) जोधपुर राज्य को शस्त्रों का आयात करने दिया जायेगा। (3.) जोधपुर हैदराबाद (सिंध) रेलवे पर जोधपुर का अधिकार होगा। (4.) जोधपुर राज्य के अकाल ग्रस्त जिलों के लिये पूरा अनाज उपलब्ध करवाया जायेगा।

    वायसराय ने लिखा कि महाराजा अब भी यह सोचते हैं कि जिन्ना द्वारा की गयी पेशकश सर्वोत्तम है और उन्होंने भोपाल नवाब को तार द्वारा सूचित किया है कि उनकी स्थिति अनिश्चित है और वे उनसे 11 अगस्त को मिलेंगे। 7 अगस्त को हनवंतसिंह बड़ौदा गये जहाँ उन्होंने महाराजा गायकवाड़ को समझाया कि प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर नहीं करें। भोपाल नवाब भी प्रयास कर रहे हैं कि जोधपुर, कच्छ व उदयपुर के नरेश भी प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर नहीं करें। मैंने जोधपुर के महाराजा को इस विषय पर तार भेजा है कि वे शीघ्रातिशीघ्र आकर मुझसे मिलें। मुझे सबसे अधिक दुःख इस बात का है कि भोपाल नवाब मेरे मुँह पर तो मित्र की भांति व्यवहार करते हैं परंतु पीठ पीछे मेरी योजना को विफल करने का षड़यंत्र करते हैं। मैं उनकी चालाकियों के विषय में उनके दिल्ली आने पर स्पष्ट बात करूंगा।

    11 अगस्त 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने देशी राज्यों के नरेशों से वार्तालाप किया तथा नवाब भोपाल से उस सूचना पर स्पष्टीकरण मांगा जो सरदार पटेल को प्राप्त हुई थी, जिसके अनुसार नवाब ने जोधपुर महाराजा पर दबाव डाला था कि वे उनके साथ चलकर जिन्ना से मिलें।

    भोपाल नवाब ने अपने उत्तर में वायसराय को सूचित किया- '6 अगस्त को महाराजा धौलपुर व दो अन्य राजाओं ने मुझे सूचना दी कि महाराजा जोधपुर मुझसे (भोपाल नवाब से) मिलना चाहते हैं। मैंने (नवाब ने) उन्हें उत्तर दिया कि मुझे उनसे मिलकर प्रसन्नता होगी। जब महाराजा मेरे पास आये तो उन्होंने कहा कि वे जिन्ना से शीघ्र मिलकर उनकी शर्तों का ब्यौरा जानना चाहते हैं। जिन्ना दिल्ली छोड़कर हमेशा के लिये कराची जाने वाले थे। इस कारण अत्यंत व्यस्त थे। फिर भी मैंने महाराजा के लिये साक्षात्कार का समय ले लिया। हमें दोपहर बाद का समय दिया गया जिसकी सूचना महाराजा को भिजवा दी गयी। महाराजा मेरे निवास स्थान पर तीसरे पहर आये और हम दोनों जिन्ना से मिलने गये। महाराजा ने जिन्ना से पूछा कि जो राजा पाकिस्तान से सम्बन्ध स्थापित करना चाहते हैं, उनको वे क्या रियायत देंगे? जिन्ना ने उत्तर दिया कि मैं पहले ही यह स्पष्ट कर चुका हूँ कि हम राज्यों से संधि करेंगे और उन्हें अच्छी शर्तें देकर स्वतंत्र राज्य की मान्यता देंगे। फिर महाराजा ने बंदरगाह की सुविधा, रेलवे का अधिकार, अनाज तथा शस्त्रों के आयात के विषय में वार्त्ता की। वार्त्ता के दौरान इस बात की कोई चर्चा नहीं हुई कि वे प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करें या न करें। मैं इस साक्षात्कार के बाद भोपाल लौट गया जहाँ मुझे महाराजा धौलपुर का टेलिफोन पर संदेश मिला कि महाराजा जोधपुर शनिवार (9 अगस्त) को दिल्ली लौट रहे हैं अतः मुझे (नवाब को) दिल्ली पहुँच जाना चाहिये। मैं शनिवार को दिल्ली पहुँचा तो हवाई अड्डे पर मुझे महाराजा का संदेश मिला कि मैं सीधे महाराजा जोधपुर के निवास स्थान पर पहुँचूं। वहाँ पहुँचने पर महाराजा धौलपुर ने कहा कि मुझे कुछ प्रतीक्षा और करनी पड़ेगी क्योंकि जोधपुर महाराजा वायसराय से मिलने गये हुए हैं और कुछ ही देर में लौटने वाले हैं परंतु महाराजा वायसराय के पास अधिक समय तक ठहर गये और हमारे पास आने का समय नहीं मिला। उन्होंने टेलिफोन द्वारा यह संदेश भिजवाया कि वे जोधपुर जा रहे हैं और संध्या को वापस लौटेंगे....शनिवार संध्या को महाराजा धौलपुर आये और कहा कि जोधपुर महाराजा अभी तक नहीं लौटे हैं, प्रतीत होता है कि वे रविवार सवेरे लौटेंगे। रविवार (10 अगस्त) को लगभग डेढ़ बजे मुझे धौलपुर नरेश का निमंत्रण मिला कि मैं उनके साथ दोपहर के खाने पर सम्मिलित होऊं। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि जोधपुर नरेश भी वहाँ थे। वे अपने गुरु को साथ लेकर आये थे। महाराजा ने मुझसे उनका परिचय करवाते हुए कहा कि ये मेरे दार्शनिक व मार्गदृष्टा हैं। जिन्ना से भेंट के बाद मैं उसी दिन जोधपुर महाराजा से मिला था। महाराजा ने कहा कि हम लोग उनके गुरु से बातचीत करें। धौलपुर व अन्य राजाओं ने गुरु से विस्तृत वार्तालाप किया जिसमें मैंने बहुत कम भाग लिया। जब मैं विदा लेने लगा तो महाराजा जोधपुर ने कहा कि वे सोमवार (11 अगस्त) को सवेरे मुझसे मिलने आयेंगे। अपने निश्चय के अनुसार वे सोमवार 10 बजे मुझसे मिलने आये तथा कहा कि उनके गुरु अभी किसी निर्णय पर नहीं पहुँचे हैं परंतु स्वयं उन्होंने निर्णय कर लिया है कि वे भारतीय संघ में ही रहेंगे। मैने महाराजा से कहा कि आप अपने राज्य के मालिक हैं और कुछ भी निर्णय लेने के लिये स्वतंत्र हैं।'

    वायसराय ने भोपाल नवाब द्वारा भेजे गये तथ्यों को सही माना है। ओंकारसिंह ने इस विवरण के आधार पर यह माना है कि जिन्ना और जोधपुर नरेश की भेंट के समय कर्नल केसरीसिंह महाराजा के साथ नहीं थे अन्यथा नवाब ने उनका उल्लेख अवश्य किया होता। ओंकारसिंह के अनुसार अवश्य ही केसरीसिंह ने यह मिथ्या भ्रम फैलाया था कि इस भेंट के दौरान केसरीसिंह भी उपस्थित थे और इसी भ्रम के कारण मानकेकर और पन्निकर आदि ने तथ्यों को विकृत कर दिया है।

    16 अगस्त 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा भारत सचिव को अपना अंतिम प्रतिवेदन भेजा गया जिसके अनुच्छेद 41 में कहा गया- '8 अगस्त को मैंने महाराजा जोधपुर को बुलाया तो वे उसी रात्रि को विलम्ब से जोधपुर से दिल्ली पहुँचे और अगले दिन सेवेरे (9 अगस्त को) मुझसे मिले। महाराजा ने निःसंकोच स्वीकार किया कि वे जिन्ना से मिले थे और नवाब भोपाल का विवरण सही है। पटेल को जब जोधपुर महाराजा की चाल का पता चला तो वे महाराजा को मनाने के लिये किसी भी सीमा तक जाने के लिये तैयार हो गये। पटेल ने यह बात मान ली कि महाराजा जोधपुर राज्य में बिना किसी रुकावट के शस्त्रों का आयात कर सकेंगे। राज्य के अकालग्रस्त जिलों को पूरे खाद्यान्न की आपूर्ति की जायेगी और इस हेतु भारत के अन्य क्षेत्रों की अवहेलना की जायेगी। महाराजा द्वारा जोधपुर रेलवे की लाईन कच्छ राज्य के बंदरगाह तक मिलाने में कोई रुकावट नहीं की जायेगी। पटेल की इस स्वीकृति से महाराजा संतुष्ट हो गये और उन्होंने निश्चय किया कि वे भारत के साथ रहेंगे।'

    ओंकारसिंह का मानना है कि महाराजा हनवंतसिंह न तो पाकिस्तान में मिलना चाहते थे और न ही राजस्थान के सम्राट बनना चाहते थे अपितु वे तो अपने राज्य के लिये अधिकतम सुविधायें प्राप्त करने के लिये सरदार पटेल पर दबाव बनाना चाहते थे। प्राप्त तथ्यों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि जोधपुर नरेश अवश्य ही भोपाल नवाब और महाराजराणा धौलपुर की चाल में फँस कर उन संभावनाओं का पता लगाने के लिये जिन्ना तक पहुँच गये थे कि उनका अधिक लाभ किसमें है, भारत संघ में मिलने में, पाकिस्तान में मिलने में अथवा इन दोनों देशों से स्वतंत्र रहकर अलग अस्तित्व बनाये रखने में? जोधपुर और त्रावणकोर के हिन्दू राजाओं ने कुछ अलगाववादी चालाकियां करनी चाहीं किंतु पटेल की सजगता ने उन्हें पानी-पानी कर दिया।

    सबसे पहले सुमनेश जोशी ने जोधपुर से प्रकाशित समाचार पत्र 'रियासती' में जोधपुर नरेश के पाकिस्तान में मिलने के इरादे का भण्डाफोड़ किया। 20 अगस्त 1947 के अंक में 'राजपूताने के जागीरदारों और नवाब भोपाल के मंसूबे पूरे नहीं हुए' शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार जोधपुर राज्य के संघ प्रवेश से जो प्रसन्नता यहाँ के राजनैतिक क्षेत्र में हुई है उसके पीछे आश्चर्य भी है कि नये महाराजा ने बावजूद अपने तिलकोत्सव के भाषण के, संघ प्रवेश में क्यों हिचकिचाहट दिखायी? भोपाल नवाब ने हवाई जहाजों के जरिये 16 रियासतों के साथ सम्पर्क कायम करने का प्रयास किया। उन्होंने जोधपुर के मामले में इसलिये कामयाबी हासिल कर ली क्योंकि उनके चारों तरफ जागीरदार थे जो रियासत को पाकिस्तान में मिलाने के पक्ष में थे। जैसा कि महाराजा साहब के ननिहाल ठिकाने के प्रेस से प्रकाशित क्षत्रिय वीर के एक लेख में इशारा था, पाकिस्तान जागीरी प्रथा के प्रति उदार है जबकि हिन्दुस्तान इस प्रथा को उठाना चाहता है। अतः पैलेस के जागीरदार स्वाभवतः हिन्दुस्तान से पाकिस्तान को ज्यादा पंसद करते हैं। इससे जोधपुर रियासत की काफी बदनामी हुई है। हिन्दुस्तान यूनियन से दूर रहने का जो षड़यंत्र किया गया था उसमें यह भी प्रचारित किया गया था कि सर स्टैफर्ड क्रिप्स हिन्दुस्तान आयेंगे तथा उनसे बातचीत करके रियासतों का सम्बन्ध सीधा इंगलैण्ड से करवा दिया जायेगा। इस नाम पर बहुत लोग बेवकूफ बनने वाले थे। अतः और लोगों को भी पाकिस्तान की तरफ से स्वतंत्र रहने का लोभ दिया गया। जोधपुर की अस्थायी हिच, इन समस्त बातों का सामूहिक परिणाम था। जाम साहब के पास भी भोपाल का संदेश गया था पर उन्होंने उसे ठुकरा दिया। उदयपुर महाराजा के पास जोधपुर का संदेश गया जिसका महाराणा ने कड़ा उत्तर दिया। ऐसेम्बली लॉबी में भी जोधपुर का यूनियन में प्रवेश अत्यंत चर्चा का विषय है।

    रियासती विभाग के सचिव की कनपटी पर पिस्तौल

    जब 9 अगस्त 1947 को वी. पी. मेनन महाराजा हनवंतसिंह को लेकर वायसराय के पास गये तथा वायसराय के कहने पर मेनन ने महाराजा को विशेष रियायतें देने की बात मान ली तब वायसराय ने मेनन से कहा कि वे महाराजा से प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करवा लें और वायसराय हैदराबाद के प्रतिनिधि मण्डल से मिलने अंदर चले गये। वायसराय की अनुपस्थिति में महाराजा ने एक रिवॉल्वर निकाली और मेनन से कहा कि यदि तुमने जोधपुर की जनता को भूखों मारा तो मैं तुम्हें कुत्ते की मौत मार दूंगा परंतु महाराजा ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिये।

    मेनन के अनुसार हनवंतसिंह द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर देने के बाद माउंटबेटन दूसरे कमरे से चले गये और महाराजा ने अपना रिवॉल्वर निकालकर मेनन की तरफ करके कहा- 'मैं तुम्हारे संकेत पर नहीं नाचूंगा।' मेनन ने कहा कि 'यदि आप सोचते हैं कि मुझे मारकर या मारने की धमकी देकर प्रविष्ठ संलेख को समाप्त कर सकते हैं तो यह आपकी गंभीर भूल है। बच्चों जैसा नाटकर बंद कर दें। इतने में ही माउंटबेटन लौट आये। मेनन ने उन्हें पूरी बात बतायी। माउंटबेटन ने इस गंभीर बात को हलका करने का प्रयत्न किया और हँसी मजाक करने लगे। जब तक जोधपुर नरेश की मनोदशा सामान्य हो गयी। मैं उन्हें छोड़ने के लिये उनके निवास तक गया।'

    मोसले के अनुसार जब वायसराय के समझाने पर जोधपुर महाराजा अपने राज्य को भारत संघ में मिलाने पर सहमत हो गये तो वायसराय ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए महाराजा व मेनन की पीठ थपथपायी। इस प्रकार सारे मामले का अंत प्रसन्नता पूर्वक हुआ। उसी क्षण वायसराय को किसी काम से भीतर जाना पड़ा। उनके जाते ही महाराजा मेनन की ओर लपके और उनकी ओर रिवॉल्वर तानते हुए कहा- 'तुम चालाकी और बहाना बनाकर मुझे यहाँ लाये हो, मैं तुम्हें मार डालूंगा । मैं तुम्हारी बात बिल्कुल नहीं मानूंगा।'

    मेनन ने साहस बटोरकर उत्तर दिया- 'यदि आप यह समझते हैं कि मुझे मारने से आपको अधिक रियायतें मिलेंगी तो आपका अनुमान गलत है। आपको इस तरह के बचकाने नाटक नहीं करने चाहिये।'

    इस पर महाराजा जोधपुर जोर से हँसे और अपनी रिवॉल्वर एक तरफ रख दी। जब माउंटबेटन आये तो मेनन ने उन्हें बताया कि महाराजा ने मुझे रिवॉल्वर से मारने की धमकी दी है। इस पर वायसराय ने महाराजा से नम्रता पूर्वक कहा कि- 'यह समय हँसी मजाक का नहीं है। आप प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कब करेंगे?'

    कॉलिंस तथा लैपियरे का वर्णन भी मोसले के वर्णन से मिलता जुलता है। उनके अनुसार वायसराय ने महाराजा से कहा कि मैं और मेनन, पटेल से आग्रह करेंगे कि आपकी सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाये किंतु आप पाकिस्तान में जाने की न सोंचें। वायसराय तो यह कहकर चले गये और जोधपुर महाराजा ने जेब से एक ऐसा फाउंटेन पैन निकाला जिसे उन्होंने खास अपने लिये तैयार करवाया था। विलय के कागजात पर हस्ताक्षर करने के बाद उन्होंने फाउंटेन पैन का ढक्कन खोला जिससे एक नन्हीं सी टू टू पिस्तौल नंगी होकर मेनन की खोपड़ी पर तन गयी- सब तुम्हारे कारण हुआ! अपने को क्या समझते हो? महाराजा ने चिल्लाकर कहा। सौभाग्यवश खटके का आभास पाकर माउण्टबेटन वहाँ आ गये। उन्होंने महाराजा से पिस्तौल छीन ली। ओंकारसिंह के अनुसार महाराजा के पास रिवॉल्वर नहीं, एक छोटा पैन पिस्तौल था जिसे उन्होंने स्वयं ही बनाया था। इसी पैन पिस्तौल से उन्होंने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर किये थे। हस्ताक्षर करने के पश्चात् महाराजा ने मजाक में मेनन से कहा था कि मैंने जिस पैन से हस्ताक्षर किये हैं, उसी से तुम्हें भी मार सकता हूँ। मेनन भयभीत हो गये। इस पर महाराजा खूब हँसे। जब महाराजा ने पैन का एक हिस्सा खोलकर बताया कि वह पैन, पिस्तौल का भी काम कर सकता है तो मेनन भौंचक्के रह गये। उसी समय लॉर्ड माउंटबेटन कमरे में दाखिल हुए। उन्होंने सारे प्रकरण को परिहास के रूप में लिया। महाराजा हनवंतसिंह ने ये तथ्य नवम्बर 1947 में ओंकारसिंह को बताये थे। महाराजा ने यह पैन पिस्तौल लॉर्ड माउंटबेटन को दे दिया। माउंटबेटन उसे लंदन ले गये तथा लंदन के मैजिक सर्कल के संग्रहालय में रखने हेतु भेंट कर दिया। यह पैन-पिस्तौल आज भी लंदन में सुरक्षित है।

    वी. पी. मेनन घुटनों पर

    मोसले के अनुसार महाराजा हनवंतसिंह की माउंटबेटन से भेंट के तीन दिन बाद महाराजा से प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करवाने के लिये वी. पी. मेनन जोधपुर आये। हनवंतसिंह ने मेनन को खूब शराब पिलाई तथा स्वयं भी पी। महाराजा ने मेनन के लिये नर्तकियों का नृत्य दिखाने का प्रबंध किया किंतु मेनन ने नृत्यांगनाओं की तरफ देखा भी नहीं। महाराजा नशे में धुत्त हो गये और उन्होंने अपना साफा जमीन पर फैंक कर कहा कि मैं पराजित हुआ और तुम जीत गये। मेनन भी नशे में धुत्त हो गये किंतु उन्होंने महाराजा से प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करवा लिये। महाराजा मेनन को अपने वायुयान में पहुँचाने के लिये दिल्ली तक गये। मेनन दिल्ली में लड़खड़ाते हुए हवाई जहाज से उतरे किंतु उनके हाथ में वह प्रविष्ठ संलेख सुरक्षित था जिसके कारण उन्होंने जोधपुर को पाकिस्तान में विलय होने से बचा लिया था। मेनन जब दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरे तो लड़खड़ा रहे थे। वे घुटनों के बल रेंगते हुए वायुयान से उतरे परंतु उन्होंने अपनी अंगुलियों के बीच वे दस्तावेज दबा रखे थे जिनके द्वारा उन्होंने जोधपुर राज्य का विलय भारत में करवाया। मेनन अपनी जिंदगी में केवल एक बार 28 फरवरी 1948 को जोधपुर आये थे और वह भी लोक परिषद और महाराजा के बीच उत्तरदायी सरकार के निर्माण को लेकर हुए विवाद के सिलसिले में। मेनन अपनी पत्नी को साथ लेकर आये थे और उस रात्रि में वे जोधपुर में ही ठहरे थे। महाराजा ने उनके स्वागत के लिये शराब और संगीत का प्रबंध किया था। राज्य के अधिकारियों ने उस दौरान शराब पी किंतु मेनन और महाराजा ने शराब नहीं पी। मेनन को शास्त्रीय संगीत का शौक नहीं था अतः महाराजा ने थोड़ी देर बाद संगीत बंद करवा दिया। महाराजा को अगले दिन मौलासर गांव के गजाधर सोमानी परिवार के प्रमुख व्यक्तियों को सोना, पालकी तथा सिरोपाव देने के लिये मौलासर जाना था अतः महाराजा मेनन को छोड़ने के लिये दिल्ली नहीं गये।

    महाराजा द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर

    महाराजा हनवंतसिंह द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर अंकित करने की जो तिथि प्रविष्ठ संलेख पर दर्शायी गयी है वह मेनन तथा वायसराय दोनों के दावों से मेल नहीं खाती। वायसराय द्वारा भारत सचिव को भेजी गयी विभिन्न रिपोर्टों तथा मेनन द्वारा लिखित विवरण के अनुसार हनवंतसिंह 9 अगस्त को वायसराय से मिले एवं उसी भेंट के दौरान प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर हुए जबकि प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर अंकित करने की तिथि 11 अगस्त लिखी हुई है। इसके साथ जो यथास्थिति समझौता पत्र लगा हुआ है उस पर जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री सी. एस. वेंकटाचार के हस्ताक्षर हैं जो कि 9 अगस्त को महाराजा तथा वायसराय की भेंट के समय दिल्ली में उपस्थित नहीं थे। 11 अगस्त की तिथि सही प्रतीत होती है क्योंकि इस बात का कोई कारण दिखायी नहीं देता कि 9 अगस्त को हस्ताक्षर करते समय 11 अगस्त की तिथि लिखी जाये। 11 अगस्त 1947 को वी. पी. मेनन ने महाराजा जोधपुर को पत्र लिखकर सूचित किया कि महाराजा ने सरदार पटेल के साथ हुई वार्त्ता के दौरान जो मुद्दे उठाये थे उनका जवाब भिजवाया जा रहा है।

    थारपारकर का प्रकरण

    सिंध में सोढ़ा राजपूतों का सदियों पुराना ऊमरकोट नामक राज्य था। मुगलों के भारत आगमन से पूर्व से लेकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी से समझौता होने तक ऊमरकोट क्षेत्र जोधपुर राज्य का भाग था और एक संधि के अंतर्गत भारत की आजादी से लगभग एक शताब्दी पूर्व ब्रिटिश सरकार को दिया गया था। जोधपुर महाराजा उम्मेदसिंह इसे फिर से प्राप्त करने के लिये प्रयत्नरत रहे थे किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। जब भारत विभाजन योजना स्वीकार कर ली गयी तो सिंध के सोढ़ा राजपूतों के एक शिष्टमंडल ने जोधपुर आकर महाराजा हनवंतसिंह से प्रार्थना की कि सिंध प्रांत के थारपारकर जिले को भारत व जोधपुर राज्य में मिलाने का प्रयत्न करें। हनवंतसिंह ने वायसराय को लिखा कि ऊमरकोट को फिर से जोधपुर राज्य को लौटाया जाये परंतु वायसराय ने यह कहकर इस विषय पर विचार करने से इन्कार कर दिया कि देश के विभाजन व स्वतंत्रता के दिन निकट हैं और सीमा के सारे विवाद रैडक्लिफ आयोग के विचाराधीन हैं अतः अब इस विषय में कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती।

    सोढ़ा राजपूतों ने इस विषय पर एक पत्र केंद्र सरकार को लिखा और उसकी प्रतिलिपियां नेहरू को भी दीं कि उनकी भाषा व संस्कृति मारवाड़ राज्य की भाषा और संस्कृति से काफी मिलती है। उनके अधिकांश विवाह सम्बन्ध भी इस राज्य में होते रहे हैं। अतः उनके क्षेत्र को जोधपुर राज्य में मिला दिया जाये। सोढ़ों की इस मांग का समर्थन अखिल भारतीय हिन्दू धर्मसंघ ने भी किया। धर्मसंघ की मांग थी कि हिन्दू बहुलता के आधार पर सिंध प्रांत के दो टुकड़े कर दिये जायें एवं नवाबशाह, हैदराबाद, थारपारकर तथा कराची जिले के एक भाग को जोधपुर राज्य में मिला दिया जाये। सिंध की प्रांतीय कांग्रेस ने भी इस मांग का समर्थन किया। सिंध प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्ष डा. चौइथराम गिडवाणी ने भारत सरकार से अपील की कि थारपारकर जिले में हिन्दुओं का स्पष्ट बहुमत है अतः उसे जोधपुर राज्य में मिलाना न्यायसंगत होगा। महाराजा हनवंतसिंह ने दिल्ली में अनेक नेताओं से बातचीत की किंतु इस विषय पर श्यामाप्रसाद मुखर्जी के अतिरिक्त किसी अन्य नेता ने रुचि नहीं ली। मुखर्जी केंन्द्रीय मंत्रिमण्डल में अल्पमत में थे अतः उनके प्रयासों का कोई परिणाम नहीं निकला।

    बी. बी. एण्ड सी. आई.रेलवे की भूमि का जोधपुर राज्य द्वारा पुनः अधिग्रहण

    13 अगस्त 1947 को महाराजा हनवंतसिंह ने आदेश जारी किये कि मारवाड़ में बी. बी. एण्ड सी. आई.रेलवे द्वारा अधिकृत भूमियों पर जिस प्रत्येक प्रकार की सत्ता (दीवानी तथा फौजदारी सत्ता सहित) का क्राउन प्रतिनिधि द्वारा उपयोग किया जाता है वह सत्ता 15 अगस्त 1947 को समाप्त हो जायेगी और उस तारीख को जोधपुर सरकार के पास लौट आयेगी तथा इस जमीन पर वे कानून लागू होंगे जो इस राज्य में वर्तमान में लागू हैं अथवा आगे लागू होंगे। फिलहाल विद्यमान रेलवे पुलिस कर्मचारी वर्ग बना रहेगा और वह मारवाड़ पुलिस एक्ट के अधीन भर्ती किये हुए कर्मचारी के अधिकार काम में लेंगे।

    जोधपुर में स्वतंत्रता दिवस समारोह

    15 अगस्त 1947 को जोधपुर में दो स्थानों पर समारोह मनाया गया। एक समारोह गिरदीकोट में मनाया गया जिसमें 40 हजार व्यक्ति एकत्रित हुए। म्युनिसीपलैटी के चेयरमेन द्वारकादास पुरोहित ने झण्डारोहण किया। दूसरा समारोह राज्य सरकार की ओर से महाराजा हनवंतसिंह के नेतृत्व में मनाया गया। महाराजा ने तिरंगे को फौजी सलामी दी तथा परेड का निरीक्षण किया। इस अवसर पर महाराजा को 51 तोपों की सलामी दी गयी। महाराजा ने इस अवसर पर कोई भाषण नहीं दिया। स्टेडियम ग्राउण्ड में तिरंगे झण्डे को सलामी के वक्त उनके मौन और चुप्पी को उचित नहीं माना गया।

    महाराजा ने बादलिये (हलके नीले) रंग का साफा पहन कर परेड की सलामी ली। मारवाड़ में इस रंग को शोक के समय धारण किया जाता है। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं चम्पालाल जोशी तथा जसवंतराज ने महाराजा को टोका कि आज तो केसरिया साफा पहनना चाहिये था। इस पर पर महाराजा ने बताया कि म्हारो तो आज 36 पीढ़ियां रो राज्य खत्म हुओ है। म्हारे तो आज शोक है।

    बाली में स्वतंत्रता दिवस पर स्कूल के बच्चों को लड्डू बांटने के लिये हाकिम से शक्कर का कोटा मांगा गया लेकिन उसने देने से इन्कार कर दिया। परगने के हाकम और उसके कर्मचारियों ने स्वतंत्रता दिवस समारोह में भाग नहीं लिया। केवल जनता ने स्वतंत्रता दिवस मनाया। मारवाड़ परिषद के वे सदस्य जिन्होंने मारवाड़ सोशलिस्ट पार्टी का निर्माण किया था, 15 अगस्त के स्वाधीनता दिवस समारोह में सम्मिलित नहीं हुए। इन सदस्यों ने 'ये आजादी झूठी है, देश की जनता भूखी है' जैसे नारे लगाकर विरोध प्रकट किया।

    केसरीसिंह तथा वेंकटाचार को हटाया जाना

    महाराजा के ए. डी. सी. कर्नल केसरीसिंह ने राज्य के प्रधानमंत्री सी. एस. वेंकटाचार को महाराजा और जिन्ना की भेंट की सूचना दी थी तथा वेंकटाचार ने इसकी सूचना वायसराय को भिजवायी थी। इस घटना के दो माह बाद ही महाराजा ने केसरीसिंह को उसके पद से हटा दिया। राज्य में असंतोष न फैले इसलिये महाराजा ने कर्नल को अच्छे कार्य का प्रमाण पत्र तथा नयी ब्यूक गाड़ी भी दी। वेंकटाचार संयुक्त प्रांत के रहने वाले थे तथा वरिष्ठ आई.सी. एस. अधिकारी थे। वे भारत सरकार से प्रतिनियुक्त होकर जोधपुर आये थे। जिन्ना से हुई भेंट के बाद जोधपुर राज्य में घटित गतिविधियों से अप्रसन्न होकर हनवंतसिंह ने वेंकटाचार को पुनः भारत सरकार में लौट जाने की अनुमति दे दी तथा 17 नवम्बर 1947 को कार्यमुक्त कर दिया। वेंकटाचार की नियुक्ति महाराजा उम्मेदसिंह द्वारा पं. नेहरू की अनुशंसा पर की गयी थी। वेंकटाचार को इस प्रकार कार्यमुक्त करके दिल्ली भेजा जाना नेहरू को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने पटेल को पत्र लिखकर अप्रसन्नता व्यक्त की- 'जैसा कि आपको ज्ञात है कि अलवर, भरतपुर और जोधपुर के शासक अपने राज्य में जुल्म ढा रहे हैं। जोधपुर ने तो एक 18 वर्ष के विवेकहीन युवक को अपना गृहमंत्री बनाया है। वेंकटाचार को इसी कारण से जोधपुर छोड़ना पड़ा। ये राजा लोग बड़े बुद्धिहीन हैं और स्वयं को हानि पहुँचा रहे हैं।'

    जोधपुर राज्य में शरणार्थियों की समस्या

    जोधपुर राज्य में हिन्दू मुसलमानों के छुटपुट झगड़ों को छोड़ दिया जाये तो आमतौर पर सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित था। मुसलमानों के झगड़ालूपन को उनका अशिक्षाजन्य कृत्य माना जाता था। इससे उबरने के लिये महाराजा उम्मेदसिंह ने जोधपुर में मुस्लिम बालकों की शिक्षा हेतु दरबार हाईस्कूल की स्थापना की थी। दिल्ली, संयुक्त प्रांत तथा राजपूताना के अलवर एवं भरतपुर आदि राज्यों में में हो रहे सांप्रदायिक दंगों के समाचार भी जोधपुर में आने वाले समाचार पत्रों में निरंतर छप रहे थे। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान से लगने वाली 325 किलोमीटर लम्बी सीमा पर भी दोनों तरफ के शरणार्थियों का तांता लगा हुआ था। 28 अगस्त 1947 को मारवाड़ जंक्शन में एस. के. मुखर्जी की अध्यक्षता में एक शरणार्थी शिविर खोला गया जिसमें 2 लाख शरणार्थियों के अस्थायी निवास, भोजन, आश्रय तथा चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध करवायी गयीं। शिविर में कई महिलों ने बच्चों को भी जन्म दिया जिन्हें पूर्ण स्वास्थ्य सेवायें उपलब्ध करवायी गयीं। शिशुओं के लिये दोनों समय दूध की व्यवस्था की गयी। बहुत सी संस्थाओं तथा दानी लोगों ने इस शिविर को धन, दवायें, कपड़े तथा भोजन प्रदान किया। बहुत से लोगों ने शिविर में उपस्थित होकर निशुल्क सेवायें प्रदान कीं। महाराजा जोधपुर के अतिरिक्त बी. डी. एण्ड सी. आई.रेलवे, श्री उम्मेदमिल्स पाली तथा सोजत रोड प्रजा मण्डल ने भी शिविर को महत्त्वपूर्ण सहायता उपलब्ध करवायी।

    सितम्बर 1947 में सिंध प्रांत के प्रधानमंत्री एम. ए. खुसरो ने अपने सलाहकार व सिंध के बड़े नेता मोहम्मद हसीम गजदर को इस आशय से जोधपुर भेजा कि वे जोधपुर के मुसलमानों को समझायें कि वे जोधपुर के सुशासित व शांतिपूर्ण राज्य को छोड़कर पाकिस्तान नहीं आयें। जोधपुर राज्य में आये हुए शरणार्थियों को सुविधायें देने के लिये मारवाड़ शरणार्थी एक्ट 1948 बनाया गया तथा इस एक्ट के तहत पंजीकृत हुए शरणार्थियों को मारवाड़ राज्य में मारवाड़ियों के समान अधिकारों के आधार पर नौकरियां दी गयीं। जोधपुर राज्य में लगभग 46 हजार शरणार्थी पाकिस्तान से आये जिन्हें राज्य की ओर से मकान, भूखण्ड एवं कर्ज उपलब्ध करवाये गये। शरणार्थियों के लिये राज्य की ओर से विद्यालय तथा नारीशालायें बनायी गयीं। सिंध से आने वाले अधिकांश शरणार्थी जोधपुर नगर में ही बस गये।

    उमरकोट में रहने वाले पुष्करणा ब्राह्मणों ने महाराजा से प्रार्थना की कि महाराजा इस क्षेत्र के पुष्करणा परिवारों को पाकिस्तान से निकालने की व्यवस्था करें क्योंकि इस क्षेत्र से बाहर निकलने के लिये केवल उँट ही एकमात्र सवारी है तथा बड़े आकार वाले गरीब पुष्करणा ब्राह्मण परिवारों के लिये उँट की पीठ पर इतना लम्बा मार्ग पार करके निकल पाना संभव नहीं है। इन परिवारों ने स्वयं को मूलतः जोधपुर राज्य के शिव एवं पोकरण क्षेत्र की प्रजा बताते हुए महाराजा से रोजगार, काश्त हेतु भूमि एवं आवास की भी मांग की। मीरपुरखास के डिप्टी कलक्टर कार्यालय के हैडक्लर्क शामदास ताराचंद ने महाराजा को पत्र लिखकर मांग की कि इस क्षेत्र में पुष्करणा ब्राह्मणों के परिवारों से कुल 50 व्यक्ति राजकीय सेवा में हैं उन्हें जोधपुर राज्य की सेवा में नौकरी दी जाये। इनमें से 1 डिप्टी सुपरिंटेंडेण्ट ऑफ पुलिस, 1 मैडिकल ऑफीसर, 1 नायब तहसीलदार एवं सैकेण्ड क्लास मजिस्ट्रेट, 1 सबइंसपेक्टर ऑफ पुलिस, 5 अंग्रेजी के अध्यापक, 15 हिन्दी के अध्यापक, 10 महिला अध्यापक, 4 कम्पाउण्डर, 5 पुलिस हैडकांस्टेबल तथा 5 राजस्व विभाग के लिपिक हैं।

    जोधपुर से हज यात्रा पर गये हुए कुछ मुस्लिम परिवारों ने 2 अक्टूबर 1947 को मक्का से महाराजा हनवंतसिंह को लिखा कि हम अपने परिवारों को खुदा के भरोसे पर जोधपुर में छोड़कर आये थे किंतु यहाँ हमें अपने बच्चों तथा परिवारों से लगातार सूचना मिल रही है कि जोधपुर राज्य में उनकी जान को खतरा है। यद्यपि हमें विश्वास है कि जोधपुर राज्य के हिन्दू, मुसलमानों से झगड़ा नहीं करेंगे किंतु जोधपुर राज्य में बाहर से आने वाले सिक्खों के दबाव में वे ऐसा कर सकते हैं। अतः आपसे प्रार्थना है कि आप उनके जीवन की रक्षा करें। इस पत्र की प्रति राजमाता को भी भेजी गयी। पाकिस्तानी नेता एच. एस. सुहरावर्दी ने 18 अक्टूबर 1947 को जोधपुर महाराजा को पत्र लिखकर जोधपुर राज्य में सांप्रदायिक स्थितियों पर कड़ी आपत्ति जताईं उसने लिखा कि मुझे शिकायत प्राप्त हुई है कि अहमदाबाद-कराची के बीच यात्रा करने वाले मुस्लिम यात्रियों को लूनी व हैदराबाद सिंध के बीच स्थित बाड़मेर रेलवे स्टेशन पर लूटा जा रहा है जो कि आपके क्षेत्राधिकार में है। राजस्थान की रियासतों में शरणार्थियों की समस्याओं पर विचार करने के लिये 6 नवम्बर 1947 को गृहमंत्रालय ने अलवर, भरतपुर, बीकानेर, जयपुर तथा जोधपुर राज्य के राजाओं की एक बैठक बुलाईंI

    टाण्डो मुहम्मद खान से महाराज किशनचंद्र शर्मा ने 29 अक्टूबर 1947 को पत्र लिखकर जोधपुर महाराजा से मांग की कि सिंध हैदराबाद जिले के टाण्डो डिवीजन में 5-6 गौशालायें हैं जिनमें 1000-1500 गायें हैं। चूंकि इस क्षेत्र के सम्पन्न परिवार मारवाड़ को पलायन कर गये हैं इसलिये इन गौशालाओं की देखभाल करने वाला अब कोई नहीं है तथा गायों की स्थिति करुणा जनक है। उनके लिये 20-25 गरीब ब्राह्मण परिवार ही शेष बचे हैं। अतः आप इम्पीरियल बैंक के माध्यम से गौशालाओं के लिये धन भिजवायें। सिंध से आये कई पुष्करणा ब्राह्मणों ने जो कि ज्योतिष का काम करते थे, हनवंतसिंह को अलग-अलग पत्र लिखकर अनुरोध किया कि हमें राजज्योतिषी नियुक्त किया जाये। इन पत्रों में इच्छा व्यक्त की गयी कि महाराजा हमसे आशीर्वाद लेने के लिये हमें बुलाये।

    जोधपुर महाराजा की फाइल में एक गुमनाम पत्र लगा हुआ है। यह पत्र महाराजा के निजी सचिव के कार्यालय में 18 नवम्बर 1947 को प्राप्त हुआ था। इस पत्र में किसी व्यक्ति ने महाराजा से शिकायत की है कि जो हिन्दू शरणार्थी पाकिस्तान से आ रहे हैं उन्हें रेलवे कर्मचारियों एवं कस्टम वालों द्वारा तंग किया जा रहा है और रिश्वत मांगी जा रही है। शरणार्थियों द्वारा लाये गये सामान की मात्रा अधिक बताकर उसका किराया मांगा जा रहा है तथा पैसा न होने पर सामान छीन लिया जाता है। उधर तो हिन्दुओं को पाकिस्तान ने लूट लिया और इधर हिन्दूओं को हिन्दू ही लूट रहे हैं। महाराजा अपने गुप्तचरों के माध्यम से पता लगवायें तथा शरणार्थियों की रक्षा करें। शरणार्थियों के साथ समानता का व्यवहार नहीं हो रहा। कल की ही बात है कि जो मुसलमान हज करके लौटे हैं उनके पास बहुत सामान था किंतु न तो कस्टम वालों ने चैक किया और न रेलवे वालों ने सामान तोल कर देखा। ऐसे ही एक टंकित गुमनाम पत्र में महाराजा को शिकायत की गयी है कि सिंध से आये शरणार्थियों को राशन एवं आवास के स्थान पर लातें और मुक्के मिल रहे हैं जबकि पाकिस्तान पहुंचने वाले शरणार्थियों को पाकिस्तान में पूरा राशन, रोजगार और सुविधायें मिल रही हैं। जो हिन्दू अपने घरों को छोड़कर भारत भाग आये हैं, पाकिस्तानी अधिकारी उन हिन्दुओं के घरों के ताले तोड़कर उन्हें उन मकानों में घुसा रहे हैं। इसके विपरीत जोधपुर राज्य के मकान मालिक हिन्दू शरणार्थियों से 10-15-20 गुना किराया मांग रहे हैं। 6 से 12 माह तक का किराया एक साथ लिया जा रहा है। शरणार्थियों को अपने आभूषण बेचने पड़ रहे हैं। शरणार्थियों के लिये अलग से कॉलोनी बनायी जाये।

    कर्मचारियों की समस्या

    देश के विभाजन के समय सांप्रदायिक समस्या उठ खड़ी होने से जोधपुर रेलवे के कुछ कर्मचारियों को अपने परिवारों के साथ पाकिस्तान से निकल पाना कठिन हो गया। ऐसे 600 हिन्दू कर्मचारी जो सिंध प्रांत में नियुक्त थे, पाकिस्तान से निकलने में आई कठिनाई के कारण कुछ दिनों तक अपने काम पर नहीं आ सके। जब वे भारत लौटे तो रेलवे प्रशासन द्वारा उन्हें काम पर नहीं लिया गया तथा 3 माह तक निलम्बित रखने के पश्चात सेवा से मुक्त करने का निर्णय लिया। इस पर जोधपुर के रेलवे स्टाफ ने 28 नवम्बर 1947 को प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन भिजवाया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह ज्ञापन रेलवे मंत्रालय को भिजवा दिया। रेल मंत्रालय ने रियासती विभाग को सूचित किया कि वह इस प्रकरण में कुछ भी करने में समर्थ नहीं है।

    रियासती मंत्रालय ने रेलवे मंत्रालय को स्पष्ट निर्देश दे रखे थे कि जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं उदयपुर राज्यों को रेलवे मंत्रालय द्वारा सीधा पत्राचार नहीं किया जाना चाहिये। इसी प्रकार जोधपुर कर्मचारी संघ ने रियासती विभाग के समक्ष एक ज्ञापन प्रस्तुत कर मांग की कि इस कर्मचारी संघ को सरकार द्वारा मान्यता दी जानी चाहिये। कर्मचारियों के वेतन एवं भत्ते वेतन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ाये जाने चाहिये। महंगाई भत्ता बढ़ाया जाना चाहिये। श्रमिकों के लिये पुस्तकालय एवं क्लब की सुविधा होनी चाहिये। श्रमिकों एवं उनके परिवारों के लिये निशुल्क चिकित्सालय होना चाहिये। रियासती विभाग द्वारा इस प्रकरण को राजपूताना के रीजनल कमिश्नर को आबू भिजवा दिया गया।

    जोधपुर रेलवे की सम्पत्ति की निकासी

    स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व सिंध क्षेत्र ब्रिटिश भारत की बम्बई प्रेसिडेंसी के अंतर्गत आता था। ई.1900 में जोधपुर रेलवे ने 133.40 मील लम्बी रेल लाइन बालोतरा से पश्चिमी सीमा में ब्रिटिश राज्य की सीमा में बनायी थी। भारत सरकार ने 1 जनवरी 1929 को मीरपुर खास से जुडे़ खण्डों को सिंध लाइट रेल्वे कम्पनी लिमिटेड से खरीद कर जोधपुर रेलवे को प्रबंधन हेतु सौंप दिया। ई.1939 में जोधपुर रेलवे द्वारा खाडरू से नवाबशाह तक 30.72 मील लम्बा रेलमार्ग बिछाया गया। इसे 29 नवम्बर 1939 को आरंभ किया गया। 31 दिसम्बर 1942 को पुनः भारत सरकार ने सिंध लाइट रेलवे से मीरपुर खास से खाडरू तक का 49.50 मील लम्बा रेलमार्ग भी खरीद कर जोधपुर रेलवे को सौंप दिया जिससे जोधपुर रेलवे के ब्रिटिश खण्ड की लम्बाई 318.74 मील हो गयी। इस पथ पर रेल संचालन जोधपुर रेलवे द्वारा किया जाता था तथा सारा रॉलिंग स्टॉक जोधपुर रेलवे का था। जब सिंध क्षेत्र के पाकिस्तान में जाने के संकेत मिलने लगे तो उस समय जोधपुर रेलवे के मुख्य अभियंता सी. एल. कुमार ने सिंध क्षेत्र में स्थित रेलवे स्टेशनों एवं वहाँ कार्यरत निर्माण निरीक्षक एवं रेलपथ निरीक्षक कार्यालयों के भण्डारगृहों में पड़ी रेल-सम्पत्ति को जोधपुर में लाने का कार्य अत्यंत दक्षता एवं बुद्धिमत्ता से किया। यदि समय पर यह कदम नहीं उठाया गया होता तो लाखों रुपये की सामग्री पाकिस्तान में रह गयी होती।

    जोधपुर रेलवे के रॉलिंग स्टॉक के हस्तांतरण की तिथि 31.7.1947 निश्चित की गयी थी किंतु पाकिस्तान सरकार ने इस तिथि से कुछ दिन पूर्व ही 6 इंजन, 75 कोच, 4 ऑफीसर्स कैरिज तथा 300 से अधिक वैगन बलपूर्वक रोक लिये। इसका मूल्य 17 लाख रुपये आंका गया। इससे जोधपुर एवं पाकिस्तान के बीच चलने वाली रेल सेवा ठप्प हो गयी। जोधपुर सरकार ने पाकिस्तान सरकार से मांग की कि वह रोके गये रॉलिंग स्टॉक तथा पाकिस्तान में निकलने वाले जोधपुर राज्य के 50 लाख रुपये के राजस्व का भुगतान करे तथा अपना प्रतिनिधि जोधपुर भेजकर मामले का निस्तारण करे किंतु पाकिस्तान सरकार ने जोधपुर सरकार की कोई बात नहीं सुनी। जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री जयनारायण व्यास ने पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त श्रीप्रकाश से बात की। अंत में पं. जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप से पाकिस्तान सरकार ने 50 लाख रुपये जोधपुर सरकार को देने तय किये।


    उदयपुर राज्य का विलय

    महाराजाधिराज महाराणा सर भूपालसिंह बहादुर 24 मई 1930 को उदयपुर राज्य की गद्दी पर बैठे। उदयपुर राज्य आरंभ से राष्ट्रीय विचारधारा पर चल रहा था तथा अपनी स्वतंत्र प्रकृति के कारण कई बार अपने गौरांग प्रभुओं को नाराज कर चुका था। जब भारत की स्वतंत्रता का समय आया तब भी उदयपुर महाराणा ने स्वयं को राष्ट्र के साथ खड़े हुए दिखाया किंतु वे भारत संघ में प्रत्यक्ष विलय की अपेक्षा किसी संघ अथवा उपसंघ के रूप में सम्मिलित होना चाहते थे। मई 1946 में महाराणा भूपालसिंह ने राजस्थान, गुजरात और मालवा के शासकों व उनके प्रतिनिधियों का उदयपुर में एक सम्मेलन आयोजित किया।

    महाराणा ने इसकी एक कार्यकारिणी सभा भी बनायी जिसमें समस्त राज्यों के शासकों को समान स्तर प्रदान किया गया। उन्हें अपने में से किसी एक को तीन वर्षों के लिये अध्यक्ष चुनने का भी अधिकार दिया गया। द्विसदनीय व्यवस्थापिका का भी प्रस्ताव किया गया जिसके एक सदन में तो राज्यों से समान संख्या में प्रतिनिधि होंगे तथा दूसरे सदन में राज्यों की जनसंख्या के आधार पर निर्वाचित सदस्य होंगे। छोटे से छोटे राज्य को भी एक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार होगा। निर्वाचन में अधिक से अधिक लोगों को मताधिकार प्रदान किया जायेगा तथा मंत्रिमण्डल की भी व्यवस्था थी यद्यपि इसके कार्यों, अधिकारों अथवा इसके गठन के सम्बन्ध में कुछ स्पष्ट व्याख्या नहीं थी।

    जब भारत की स्वतंत्रता की तिथि घोषित हो गयी तो महाराणा ने 25-26 जून 1947 को उदयपुर में राजस्थान के शासकों का एक सम्मेलन पुनः आयोजित किया जिसमें 22 राजाओं ने भाग लिया। महाराणा ने उपस्थित नरेशों से अपील की कि वे सब मिलकर राजस्थान यूनियन का गठन करें ताकि भावी भारतीय संघ में वे एक सबल इकाई के रूप में काम कर सकें। महाराणा का सुझाव था कि प्रस्तावित यूनियन भारतीय संघ से सम्बद्ध उपसंघ के रूप में रहे। राजाओं ने महाराणा की योजना पर विचार करने का आश्वासन दिया।

    महाराणा ने सम्मेलन में उपस्थित शासकों को चुनौती देते हुए कहा- 'हम लोगों ने मिलकर अपनी रियासतों की यूनियन नहीं बनायी तो समस्त रियासतें जो प्रांतों के समकक्ष नहीं हैं, निश्चित रूप से समाप्त हो जायेंगी।' के. एम. मुंशी ने भी इस योजना का समर्थन किया। जयपुर, जोधपुर और बीकानेर रियासतों को छोड़कर शेष रियासतों ने सिद्धांततः यूनियन बनाने का सिद्धांत स्वीकार कर लिया। संविधान निर्माण के लिये एक समिति गठित की गयी।

    उदयपुर रियासत को पाकिस्तान में मिलाने का प्रयास

    धौलपुर नरेश महाराजराणा उदयभानसिंह ने जोधपुर नरेश हनवंतसिंह, उदयपुर नरेश भूपालसिंह तथा जयपुर नरेश जयसिंह से सम्पर्क किया ताकि इन राजाओं को पाकिस्तान में मिलाने के लिये सहमत किया जा सके। उदयपुर नरेश और जयपुर नरेश तो उदयभानसिंह की चाल में नहीं आये किंतु वह जोधपुर नरेश हनवंतसिंह को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हो गये। महाराजा हनवंतसिंह इस बात को जानते थे कि यदि राजपूताना की सर्वाधिक प्रतिष्ठित रियासत मेवाड़, भोपाल के नवाब की योजना में सम्मिलित हो जाती है तो यह योजना अच्छी तरह से कार्यान्वित की जा सकती है। अपने दीवान सी. एस. वेंकटाचार की सलाह के विरुद्ध महाराजा जोधपुर ने अपने साथ उदयपुर के महाराणा को पाकिस्तान में मिलने के लिये प्रेरित किया।

    महाराणा ने इसका प्रत्युत्तर देते हुए लिखा- 'मेरी इच्छा तो मेरे पूर्वजों ने निश्चित कर दी थी। यदि वे थोड़े भी डगमगाये होते तो वे हमारे लिये हैदराबाद जितनी ही रियासत छोड़ जाते। उन्होंने ऐसा नहीं किया और न मैं करूंगा। मैं तो हिन्दुस्तान के साथ हूँ।'

    दुर्गादास ने महाराणा के कथन को उद्धृत करते समय हैदराबाद के स्थान पर जयपुर और जोधपुर रियासतों का उल्लेख किया है। इस प्रकार महाराणा ने देशभक्ति का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए स्वेच्छा से भारतीय संघ में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया। जोधपुर राज्य पश्चिम की तरफ पाकिस्तान तथा पूर्व की तरफ मेवाड़, इंदौर तथा भोपाल के मध्य योजक कड़ी था। महाराजा इंदौर पहले से ही भोपाल नवाब के साथ था, यदि उदयपुर, जोधपुर राज्य के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता तो भोपाल भी पाकिस्तान से जुड़ सकता था तथा नवाब की पाकिस्तान में मिलने की इच्छा पूरी हो सकती थी।........किंतु महाराणा ने जोधपुर के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। महाराणा भूपालसिंह भारत में सम्मिलित होने वाले सर्वप्रथम राजाओं में से थे। बाद में वे स्वेच्छा से राजस्थान संघ में सम्मिलित हो गये। महाराणा ने 7 अगस्त 1947 को प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर किये। यथास्थिति समझौता पत्र पर कार्यकारी प्रधानमंत्री मनोहरसिंह ने हस्ताक्षर किये। इस प्रकार उदयपुर राज्य भी प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने वाले सर्वप्रथम राज्यों में शामिल था। इस दौरान राज्य में पूरी तरह शांति रही। सीमा पर स्थित न होने के कारण राज्य में किसी तरह के सांप्रदायित तनाव की स्थिति भी नहीं बनी।


    जयपुर राज्य का विलय

    ई.1922 में सवाई माधोसिंह (द्वितीय) की निःसंतान मृत्यु हो जाने पर ईसरदा ठिकाणे के 11 वर्षीय बालक मोरमुकुट सिंह को मानसिंह (द्वितीय) के नाम से जयपुर का राजा बनाया गया। भारत को आजादी मिलने के समय यही सवाई सर मानसिंह जयपुर के शासक थे। जब ब्रिटिश सरकार ने भारत की आजादी की घोषणा की तो जयपुर उन राज्यों में से था जो सबसे पहले भारतीय संघ में सम्मिलित हुए। महारानी गायत्री देवी के अनुसार यद्यपि मैंने इस विचार को स्वीकार किया था कि हम किसी न किसी रूप में भारत का अंग होंगे किंतु मुझे यह कभी नहीं लगा कि जब हमारे राज्यों की पहचान समाप्त हो जायेगी, तब हमारा जीवन इतना बदल जायेगा। मेरी कल्पना थी कि हम सदैव अपनी राज्य की जनता से अपना सम्बन्ध बनाये रखेंगे तथा सार्वजनिक जीवन में हमारी भूमिका बनी रहेगी।

    महाराजा द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करना स्वीकार कर लिये जाने के बाद भी महाराजा समय पर हस्ताक्षरों के लिये उपलब्ध नहीं हुए। रियासती विभाग द्वारा 1 अगस्त 1947 को समस्त राज्यों को प्रविष्ठ संलेख तथा यथा स्थिति समझौता पत्र की दो-दो प्रतियाँ भिजवायी गयी थीं। प्रविष्ठ संलेख की प्रतियों पर राज्य के शासक द्वारा तथा यथास्थिति समझौता पत्र की प्रतियों पर राज्य के प्रधानमंत्री द्वारा हस्ताक्षर करके रियासती विभाग को लौटाने थे।

    रियासती विभाग की योजना यह थी कि जब शासक द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिये जायेंगे तब वायसराय ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि के रूप में इस सम्मिलन को स्वीकार करेगा तथा प्रविष्ठ संलेख की एक प्रति पर हस्ताक्षर करके राज्य के शासक को लौटा देगा। इसी प्रकार राज्य के प्रधानमंत्री द्वारा हस्ताक्षरित यथा स्थिति समझौता पत्र को रियासती विभाग के सचिव वी. पी. मेनन द्वारा स्वीकार किया जाना था तथा मेनन के हस्ताक्षरों के बाद यथास्थिति समझौता पत्र की एक प्रति को राज्य को लौटाया जाना था।

    महाराजा जयपुर को भी सम्मिलिन पत्र तथा यथास्थिति समझौता पत्र की दो-दो प्रतियाँ यथा समय भिजवा दी गयी थीं किंतु महाराजा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने के लिये उपलब्ध नहीं हुए। इस पर जयपुर राज्य के प्रधानमंत्री वी. टी. कृष्णामाचारी ने रियासती विभाग से अनुरोध किया कि महाराजा संभवतः लंदन में होंगे इसलिये समझौता पत्र की दोनों प्रतियाँ लंदन स्थित भारत सचिव कार्यालय के लिये जाने वाली वायसराय की डाक में भेज दिया जाये। रियासती विभाग ने ऐसा ही किया किंतु महाराजा की ओर से इस सम्बन्ध में कोई प्रत्युत्तर नहीं आया। प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने की अंतिम तिथि को निकट आता देखकर प्रधानमंत्री वी. टी. कृष्णामाचारी ने फिर से रियासती विभाग को सूचित किया कि महाराजा की ओर से कोई प्रत्युत्तर नहीं आया है अतः संभव है कि महाराजा लंदन में न हों, वे स्विट्जरलैण्ड जाने की बात कर रहे थे। अतः संभव है कि उन्हें वह पत्र नहीं मिला। महाराजा को 8 अगस्त को एक केबल भी किया गया है किंतु उसका भी जवाब नहीं आया है। अतः रियासती विभाग लंदन स्थित भारत सचिव कार्यालय को केबल के माध्यम से अनुरोध करे कि विशेष संदेशवाहक के माध्यम से वह डाक, महाराजा जहाँ कहीं भी हों, उन्हें भिजवा दी जाये। इस सम्बन्ध में किया गया व्यय जयपुर राज्य द्वारा वहन किया जायेगा।

    इस पर मेनन ने भारत सचिव को तार भेजा कि कृष्णामाचारी के अनुरोध पर 1 अगस्त 1947 को महाराजा जयपुर को देने के लिये प्रविष्ठ संलेख वायसराय की डाक के साथ लंदन भिजवाया गया था किंतु महाराजा की ओर से कोई उत्तर नहीं आया है अतः विशेष संदेशवाहक के द्वारा यह प्रविष्ठ संलेख महाराजा जहाँ कहीं भी हों उन्हें भिजवायें। इसका व्यय जयपुर राज्य वहन करेगा। महाराजा की स्विट्जरलैण्ड में तलाश करवायी गयी किंतु वे फ्रांस में थे। किसी तरह महाराजा से सम्पर्क किया गया तथा उनसे अनुरोध किया गया कि वे प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करें। इस पर महाराजा ने सूचित किया कि वे स्वयं लंदन आकर प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर देंगे।

    12 अगस्त को भारत सचिव ने तार के द्वारा रियासती विभाग को सूचित किया कि महाराजा लंदन आ रहे हैं। भारत सचिव द्वारा वी. पी. मेनन को जो तार किया गया उसमें कहा गया कि महाराजा स्विट्जरलैण्ड से लौट रहे हैं तथा वायसराय को जो तार किया गया उसमें कहा गया कि महाराजा फ्रांस से लौट रहे हैं तथा वे 13 अगस्त को लौटेंगे। उनके द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिये जाने के बाद प्रविष्ठ संलेख तीव्र वायुडाक सेवा से भेज दिया जायेगा। महाराजा मानसिंह ने 12 अगस्त 1947 को प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर किये। 14 अगस्त को भारत सचिव ने गोपनीय तार द्वारा वी. पी. मेनन को सूचित किया कि महाराजा द्वारा हस्ताक्षरित दस्तावेज आज वायु सेवा द्वारा भेजा गया है।

    14 अगस्त को ही जयपुर राज्य के प्रधानमंत्री वी. टी. कृष्णामाचारी ने वी. पी. मेनन को सूचित किया कि महाराजा जयपुर ने केबल से सूचना भेजी है कि महाराजा ने प्रविष्ठ संलेख मुझे (कृष्णामाचारी को) देने के लिये वायसराय की डाक में दिल्ली भिजवायें हैं अतः आप (मेनन) उस डाक को संभाल कर रख लें। जब मैं 20 अगस्त को दिल्ली आऊंगा तो मैं ये कागज आप को दे दूंगा। 20 अगस्त को कृष्णामाचारी दिल्ली गये तथा उन्होंने मेनन से डाक प्राप्त करके 21 अगस्त को प्रविष्ठ संलेख की दो प्रतियाँ तथा यथास्थिति समझौता पत्र की एक प्रति मेनन को दी। राष्ट्रीय अभिलेखागार में इस विलय पत्र को सुरक्षित रखा गया है इस पर मेजर जनरल महाराजा सर सवाई मानसिंह जी. सी. आई.ई.की ओर से 12 अगस्त 1947 की तिथि में हस्ताक्षर अंकित हैं तथा इसे भारत के गवर्नर जनरल अर्ल माउंटबेटन ऑफ बर्मा की ओर से 16 अगस्त 1947 को स्वीकार किया गया है।

    15 अगस्त 1947 को भी महाराजा भारत में नहीं थे। वे अपने बच्चों को हैरो में उनके विद्यालय में छोड़ने के लिये गये हुए थे। वहाँ से उन्होंने जयपुर राज्य की जनता के नाम संदेश भिजवाया, जो इस प्रकार से था- स्वतंत्र भारत हमारे कंधों पर महान जिम्मेदारी लायेगा और मुझे पूरा विश्वास है कि हम जयपुर में प्रसन्नता पूर्वक अपनी जिम्मेदारियों को ग्रहण करेंगे तथा विश्व के स्वतंत्र देशों में भारत के उचित स्थान दिलाने के लिये भारत के निर्माण में अपनी पूरी क्षमता के साथ सहायता करेंगे।

    जयपुर राज्य में शरणार्थियों की समस्या

    जयपुर राज्य में बड़ी संख्या में मुस्लिम जनसंख्या रहती थी। जयपुर शहर में ही कुल आबादी की एक तिहाई आबादी मुसलमानों की थी। जयपुर राज्य में सांप्रदायिक दंगे कभी भी भड़क सकते थे किंतु महाराजा अपनी मुसलमान प्रजा की रक्षा करने के लिये दृढ़ था तथा उसने व्यतिगत रूप से उनकी सुरक्षा की देखभाल की। प्रत्येक रात्रि में खाना खाने के बाद महाराजा अपने महल से बाहर निकल जाता था तथा अपनी सेना के एक मुस्लिम कर्नल के साथ खुली जीप में बैठकर नगर की गलियों में चक्कर लगाता था। वह मुसलमानों को उनकी सुरक्षा के बारे में आश्वस्त करता था। शीघ्र ही पाकिस्तान की सीमा पार करके सिंध एवं पंजाब से आने वाले हिन्दू शरणार्थियों की बाढ़ से सामना हुआ। जयपुर सरकार ने इन शरणार्थियों के रहने के लिये योजनाएं बनायीं।

    जार्ज षष्ठम् द्वारा संतोष की अभिव्यक्ति

    भारत के एकीकरण पर संतोष व्यक्त करते हुए जॉर्ज षष्ठम् ने लिखा है- मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि लगभग समस्त भारतीय राज्यों ने किसी न किसी उपनिवेश में सम्मिलित होने का निर्णय कर लिया है। वे संसार में कभी भी अकेले खड़े नहीं हो सकते थे।

    दक्षिणात्य प्रधानमंत्रियों की भूमिका

    भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय राजपूताना के चारों बड़े राज्यों के प्रधानमंत्री दक्षिण भारतीय थे। वे देश की राजनीति में एक शक्तिशाली समूह के रूप में कार्य करने में सक्षम रहे। उदयपुर में सर टी. विजयराघवाचारी, जयपुर में सर वी. टी. कृष्णामाचारी, जोधपुर में सी. एस. वेंकटाचार एवं बीकानेर में सरदार के. एम. पनिक्कर दीवान के पद पर कार्यरत थे। वे चारों ही अच्छे मित्र थे तथा उन्हें एक दूसरे का विश्वास प्राप्त था इसलिये उन्होंने निकट संगति के साथ कार्य किया इसलिये इन चारों राज्यों ने भारत की राजनीति में सम्मिलित प्रभाव बनाया। राज्यों के भारत में विलय तथा बाद में राजस्थान में सम्मिलन में भी इन दक्षिणात्य प्रधानमंत्रियों की भूमिका प्रभावी एवं सकारात्मक रही। सर वी. टी. कृष्णामाचारी (जयपुर), सरदार के. एम. पनिक्कर (बीकानेर), एम. ए. श्रीनिवासन (ग्वालियर), सर बी. एल. मित्रा (बड़ौदा) एवं सी. एस. वेंकटाचार (जोधपुर) ने इस महान उद्देश्य के लिये दोनों पक्षों को एक साथ लाने तथा देश को बलकान प्रांतों की तरह बिखरने से बचाने के लिये कठोर परिश्रम से कार्य किया। उनके महान प्रयासों के बिना 2 जून से 15 अगस्त 1947 तक की मात्र 11 सप्ताह की अवधि में इस कार्य को नहीं किया जा सकता था।


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