• अध्याय - 8 : सक्षम राज्यों का राजस्थान में विलय

     09.12.2017
    अध्याय - 8 : सक्षम राज्यों का राजस्थान में विलय

    अध्याय - 8


    सक्षम राज्यों का राजस्थान में विलय


    बीकानेर राज्य को अलग रहने योग्य इकाईयों में सम्मिलित किया गया है। अब तक यह इकाई ऐसी ही मानी जाती रही है। एकाएक यह परिवर्तन कैसे हो गया? यह बल पूर्वक नियंत्रण क्यों ? - महाराजा सादुलसिंह।

    अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की राजस्थान कार्यकारिणी ने 9 सितम्बर 1946 को प्रस्ताव पारित किया कि राजस्थान का कोई भी राज्य आधुनिक प्रगतिशील राज्य की सुविधा उपलब्ध करवाने की स्थिति में नहीं है। इसलिये राजस्थान के समस्त राज्यों और अजमेर मेरवाड़ा प्रांत को मिला कर एक इकाई बनाना चाहिये। इस प्रस्ताव से प्रदेश की विभिन्न रियासतों की सीमाएं समाप्त करके संयुक्त राज्य बनाने की कल्पना सामने आयी। 18-19 सितम्बर 1946 की दिल्ली बैठक में लोक परिषद की स्थायी समिति ने राज्यों के अलग रहने योग्य सक्षमता की सीमा को 50 लाख जनसंख्या और 3 करोड़ वार्षिक आय मानने की अनुशंसा को स्वीकार कर लिया। 16-17 नवम्बर 1946 को लोक परिषद ने एक प्रस्ताव पारित कर भारत सरकार से अनुरोध किया कि वह राजस्थान राज्य के किसी भी संघ को उन राज्यों के लोकप्रिय प्रतिनिधियों का समर्थन प्राप्त करने के पश्चात ही मान्यता प्रदान करें।

    देशी राज्यों को आश्वासन

    बीकानेर नरेश तथा उनके समर्थक राजाओं का मनोबल बढ़ाने के लिये राष्ट्रीय नेता अनेक प्रकार के आश्वासन देते रहे थे। इन आश्वासनों में भविष्य में देशी राज्यों को स्वतंत्र इकाई के रूप में बने रहने देने का भी आश्वासन भी था। स्वयं गांधीजी ने कहा कि स्वराज्य आने पर ब्रिटिश भारत भारतीय रियासतों को मिटाना नहीं चाहेगा बल्कि उनका सहायक होगा। गांधीजी तो राजाओं से केवल यही चाहते हैं के वे अपनी रियासतों के वैधानिक प्रधान बन जाएं और उनकी देखरेख में जनता अपना शासन चलाये। दिसम्बर 1946 में जवाहरलाल नेहरू ने विधान निर्मात्री सभा में कहा कि यदि किसी विशेष रियासत की जनता अपने यहाँ के राजा को प्रधान स्वीकार करती है तो मैं निश्चय ही उसमें हस्तक्षेप नहीं करूंगा। अप्रेल 1947 में नेहरू ने पुनः कहा कि किसी रियासत में राजतंत्र की सरकार चालू रहने में कोई रुकावट नहीं पड़ेगी यदि रियासतें स्वतंत्रता के व्यापक चित्र में उचित लगें और वहाँ पर उतनी ही आजादी तथा उत्तरदायी सरकार हो। 5 जुलाई 1947 को सरदार पटेल ने राजाओं का आह्वान किया कि रियासतें सुरक्षा, विदेशी मामले और संचार के विषय में भारतीय संघ में सम्मिलित हों। देश के सामान्य हितों से सम्बन्धित इन तीन विषयों में सम्मिलित होने के अलावा हम उनसे और कुछ नहीं चाहते। अन्य मामलों में हम उनके स्वायत्त अस्तित्व का निःसंदेह सम्मान करेंगे।

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्थिति में परिवर्तन

    स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देशी राज्यों में राजनीतिक आंदोलन तीव्रता से फैलने लगे तथा जनता द्वारा उत्तरदायी शासन की मांग होने लगी। इन आंदोलनों पर टिप्पणी करते हुए सरदार पटेल ने 16 दिसम्बर 1947 को कहा कि जब तक छोटी रियासतों के स्वतंत्र अस्तित्व को मिटा नहीं दिया जाता तब तक उनमें जनतंत्रीय शासन की स्थापना असंभव होगी। एक प्रकार से यह भारत के गणतंत्रीय शासन का छोटे नरेशों के प्रति आदेश था जिसके सामने अपने अस्तित्व को विवश हो खो देने और जनतंत्रीय संस्थाओं का निर्माण करने के अतिरिक्त उनके समक्ष और कोई रास्ता नहीं रह गया था। इस पर कई राजाओं ने सरदार पटेल को पत्र लिखकर स्थिति स्पष्ट करने को कहा। सरदार पटेल द्वारा 5 जनवरी 1948 को बीकानेर नरेश सादूलसिंह को एक पत्र में सूचित किया गया कि मैं श्रीमान् को यह बात साफ बता देना चाहता हूँ कि हम स्वयं एकीकरण के किसी प्रस्ताव को प्रेरणा या बढ़ावा नहीं देते। हम ऐसे किसी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगे जब तक हमें संतोष न हो जाये कि इसे सम्बन्धित जनता और शासक दोनों का समर्थन प्राप्त है।

    7 जनवरी 1948 को लॉर्ड माउंटबेटन ने दिल्ली में राजाओं का एक सम्मेलन बुलाया जिसमें जोधपुर, बीकानेर, भोपाल, रीवा, कोटा तथा अलवर के शासक एवं कश्मीर, इंदौर, कोल्हापुर, उदयपुर, बीकानेर, जयपुर, कोटा, अलवर तथा रीवा के दीवान एवं त्रावणकोर, कोचीन, पटियाला एवं जोधपुर के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। माउंटबेटन ने राजाओं को सलाह दी कि छोटे राज्यों को आपस में विलय करके संघ बना लेने चाहिये। केन्द्र सरकार बड़े राज्यों के विलय के पक्ष में नहीं हैं। मेनन ने कहा कि एकीकरण का सिद्धांत उन रियासतों पर लागू नहीं किया जायेगा जिनके संविधान निर्मात्री समिति में अलग प्रतिनिधि हैं। प्रत्येक रियासत के लिये एक कसौटी बनायी गयी है जिसमें उसकी आय, जनसंख्या और विकास की संभावनाओं को ध्यान में रखा जायेगा। 20 फरवरी 1948 को पटेल ने पुनः बीकानेर नरेश को लिखा कि मैं इस बात को एक बार से अधिक बार स्पष्ट कर चुका हूँ कि रियासती मंत्रालय एकीकरण की योजना का तभी समर्थन करेगा जब इस विषय पर जनता और राजा दोनों सहमत हों। हमने इस स्थिति को लगातार बनाये रखा है।

    15 मार्च 1948 को एन. बी. गाडगिल ने एकीकरण के मामले में पटेल द्वारा दिये गये आश्वासन को पुनः दोहराया। उन्होंने कहा कि विधान निर्मात्री सभा में जिन रियासतों के अलग प्रतिनिधि हैं, उन्हें समय-समय पर भारत सरकार ने आश्वासन दिया है कि वे अलग रहने योग्य इकाईयां मानी जायेंगी। विलय या एकीकरण के लिये अपनी ओर से किसी प्रकार का दबाव डालने या डराने की हमारी कोई इच्छा नहीं है।

    29 मार्च 1948 को मेनन ने दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि कोचीन, त्रावणकोर, मैसूर, जोधपुर, जयपुर, बीकानेर और भोपाल जैसी बड़ी रियासतें स्वतंत्र इकाइयों के रूप में रहेंगी और ऐसे संघों और इकाइयों की संख्या 25 होगी। सरकार रियासती मंत्रालय द्वारा दिये गये इस वचन को मानती है कि अलग रहने योग्य इकाइयों को तब तक अलग रहने दिया जायेगा जब तक कि वे स्वेच्छा से शामिल न हों। भारत सरकार की घोषणा यह थी कि स्वतंत्र भारत में 1 करोड़ वार्षिक आय और 10 लाख जनसंख्या वाली रियासत पृथक अस्तित्व रखने योग्य समझी जायेगी। आरंभ में भारत सरकार ने घोषणा की थी कि 18 रियासतें ऐसी हैं कि वे भारतीय संघ की पूर्ण इकाई की शर्तों को पूरा करती हैं। विधान निर्मात्री सभा के समक्ष रखे गये संविधान के मसौदे के सम्बन्धित भाग में इन 18 रियासतों के नाम भी दिये गये थे।

    रियासती विभाग के मंत्री और सचिव के वक्तव्यों से सक्षम राज्यों के शासकों को लगा कि उनके राज्य स्वतंत्र रह सकेंगे जिससे उन्होंने जन आकांक्षाओं की अवहेलना आरंभ कर दी। वहीं कांग्रेस के प्रांतीय एवं स्थानीय नेताओं में राजस्थान के शीघ्र एकीकरण की मांग ने जोर पकड़ लिया। इस पर राजाओं ने राज्यों में प्रजा मंडलों तथा प्रजा परिषदों द्वारा चलाये जा रहे आंदोलनों को मजबूती से कुचलने का प्रयास किये गये वहीं झण्डा विवाद भी बड़े पैमाने पर मुखर हुए।

    बड़े राज्यों द्वारा छोटे राज्यों को मिलाने का प्रयास

    कैबीनेट मिशन ने 22 मई 1946 को घोषित किया था कि छोटी-छोटी रियासतों को चाहिये कि वे आपस में मिलकर बड़ी इकाईयों का गठन कर लें। इस से प्रेरित होकर मई 1946 में मेवाड़ महाराणा भूपालसिंह ने राजस्थान, गुजरात व मालवा के शासकों व प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन उदयपुर में आयोजित किया। 25-26 जून 1947 को महाराणा ने उदयपुर में पुनः राजपूताना के शासकों का सम्मेलन आयोजित किया। 14 फरवरी 1948 को राजाओं एवं उनके प्रतिनिधियों की सभा में यूनियन के विधान की रूपरेखा प्रस्तुत की गयी। महाराणा भूपालसिंह ने 6 मार्च 1948 को एक बार पुनः राजस्थान और गुजरात के शासकों से अपील की कि राजपूताना के चार बड़े राज्यों को छोड़कर शेष समस्त राज्य संघ में संगठित हो जायें। महाराणा के इस आग्रह का भी राजाओं पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। वस्तुतः राजपूताना के शासकों में अविश्वास की भावना व्याप्त थी। महाराणा ने अलवर महाराजा को लिखे एक पत्र में उल्लेख किया कि जब भी कार्य करने की बात आती है तो परस्पर संदेह के फलस्वरूप शासक कुछ नहीं कर पाते।

    महाराणा द्वारा किये जा रहे प्रयासों को छोटे राज्यों ने इस रूप में लिया कि बड़े राज्य छोटे राज्यों को निगल जाना चाहते हैं। महाराणा ने एकीकरण की चर्चा के दौरान जाने-अनजाने में ऐसे संकेत भी दिये थे। महाराणा छोटी रियासतों का मेवाड़ में विलय करके वृहत्तर मेवाड़ बनाना चाहते थे किंतु वे यह भी चाहते थे कि बाद में वृहत्तर मेवाड़ में जयपुर, जोधपुर और बीकानेर के साथ मिलकर ऐसा संघ बनाया जाये जो भारतीय संघ में महत्त्वपूर्ण इकाई के रूप में भूमिका निभा सके। प्रस्तावित संघ के बारे में जनता से कोई राय नहीं ली गयी थी अतः जनता तथा मेवाड़ प्रजा मण्डल ने इसका विरोध किया। अ. भा. राज्य परिषद की राजपूताना इकाई के अध्यक्ष जयनारायण व्यास ने 29 जून 1947 को महाराणा को एक पत्र लिखा कि प्रस्तावित योजना जनता के लिये वरदान के स्थान पर अभिशाप प्रमाणित होगी। इस प्रकार की योजना में जनता का सहयोग लेना अपेक्षित है। व्यास ने सरदार पटेल को लिखा कि प्रस्तावित संघ को मान्यता न दें। के. एम. मुंशी ने सरदार पटेल से शिकायत की कि मेवाड़ प्रजा मंडल राजस्थान संघ निर्माण कार्य में साथ नहीं दे रहा। इस पर पटेल ने व्यास को सलाह दी कि जननेताओं को प्रजातांत्रिक संघ बनाना चाहिये। के. एम. मुंशी के उदयपुर से चले जाने के बाद यह योजना स्वतः समाप्त हो गयी।

    जयपुर के महाराजा मानसिंह, कोटा के महाराव भीमसिंह व बीकानेर के महाराजा सार्दूलसिंह ने भी अपने स्तर पर पड़ौसी राज्यों को अपने राज्यों में मिलाने के असफल प्रयास किये। कोटा महाराव भीमसिंह ने प्रयास किया कि कोटा, बूंदी और झालावाड़ राज्यों को मिलाकर एक संयुक्त राज्य स्थापित किया जाये किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली।

    जयपुर के दीवान वी. टी. कृष्णामाचारी ने महाराजा मानसिंह की अनुमति से राजपूताना के शासकों व प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन बुलाया। महाराजा ने शासकों के समक्ष प्रस्ताव रखा कि राज्यों का ऐसा संघ बने जिसमें उच्च न्यायालय, उच्च शिक्षा, पुलिस आदि विषय संघ के नियंत्रण में रहें और शेष विषयों पर सदस्य राज्यों का अधिकार रहे। यदि ऐसा संभव न हो तो छोटे राज्यों को अपने पड़ौसी राज्य में मिल जाना चाहिये। सम्मेलन में कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। जयपुर के प्रधानमंत्री कृष्णामूर्ति का सुझाव था कि राजपूताना के राज्यों को तीन चार इकाइयों में विभक्त कर दिया जाये और अलवर व करौली राज्यों को जयपुर राज्य में मिला दिया जाये। दिसम्बर 1947 में बीकानेर शासक ने लुहारू राज्य को बीकानेर राज्य में शामिल करने के प्रयास किये परंतु भारत सरकार ने लुहारू राज्य को बीकानेर राज्य में विलय न कर इसका शासन अपने हाथ में ले लिया जिससे बीकानेर महाराजा को बड़ी निराशा हुई। डूंगरपुर और कोटा के शासक क्रमशः वृहत्तर डूंगरपुर और वृहत्तर कोटा के निर्माण में लगे हुए थे। छोटी रियासतें अपनी वंश परम्परा और प्राचीन प्रतिष्ठा के कारण बड़ी रियासतों में विलय होने से हिचकिचा रही थीं। अतः राजाओं द्वारा किये गये समस्त प्रयास विफल हो गये। उनके विलय के लिये प्रबल जनमत व केंद्रीय सत्ता के हस्तक्षेप की आवश्यकता थी।

    राजाओं पर मनोवैज्ञानिक दबाव

    भारत सरकार द्वारा किशनगढ़ तथा शाहपुरा रियासतों को केंद्र शासित प्रदेश अजमेर मेरवाड़ा में मिलाने का निर्णय लिया गया। किशनगढ़ के महाराजा सुमेरसिंह ने रियासती मंत्रालय के आदेश से 26 सितम्बर 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये। उसी दिन शाहपुरा के राजाधिराज सुदर्शनदेव को भी रियासती विभाग में बुलाया गया। सुदर्शनदेव ने कहा कि वह वैधानिक शासक है अतः अकेला कोई निर्णय नहीं ले सकता। रियासती विभाग के अधिकारी ने धमकी भरे शब्दों में सुदर्शनदेव से कहा कि ऐसा न करने पर आपको दुष्परिणाम भुगतने होंगे, उसने अलवर नरेश के विरुद्ध की गयी कार्यवाही का उदाहरण प्रस्तुत किया। इस पर महाराजाधिराज ने कहा कि अलवर नरेश के विरुद्ध गंभीर आरोप थे, मेरे विरुद्ध कोई आरोप नहीं है। सुदर्शनदेव ने अपने राज्य के मुख्यमंत्री गोकुललाल असावा को इन तथ्यों से अवगत करवाया। असावा ने राजपूताने के गणमान्य नेताओं को साथ लेकर मेनन तथा पटेल से कहा कि महाराजाधिराज की मंशा भारत सरकार की योजना का विरोध करने की नहीं है। जनप्रतिनिधियों की आम राय यह है कि राजपूताने की समस्त छोटी-बड़ी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाया जाये। किशनगढ़ तथा शाहपुरा को भी उसमें सम्मिलित किया जाये। जनभावनाओं को देखते हुए पटेल ने अपना निर्णय बदल लिया।

    के. एम. मुंशी व गुजरात के अन्य नेता महागुजरात संघ के निर्माण के लिये प्रयत्नशील थे। इसी क्रम में नवम्बर 1947 में सरदार पटेल को बताया गया कि पालनपुर, सिरोही, दांता, ईडर, विजयनगर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा और झाबुआ ऐसे राज्य हैं जहाँ अधिकांश लोग गुजराती भाषी हैं। अतः इन रियासतों को राजपूताना एजेंसी से हटाकर पश्चिमी भारत और गुजरात एजेंसी के नियंत्रण में रख दिया जाये। राजपूताने के राजाओं और स्थानीय प्रजामंडलों ने इस योजना का विरोध किया जिसके फलस्वरूप डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा को यथास्थिति में रखा गया किंतु 1 फरवरी 1948 को पालनपुर, ईडर, दांता एवं विजयनगर को राजपूताना एजेंसी से हटाकर गुजरात एजेंसी के अतंर्गत रख दिया गया। कुछ समय बाद सिरोही राज्य को भी गुजरात एजेंसी के सुपुर्द कर दिया गया।

    रियासती मंत्रालय की एकीकरण नीति की अखबारों में कटु आलोचना हुई तो सरदार पटेल ने मेनन को गांधीजी और पं. नेहरू के पास भेजा ताकि उन्हें इस कार्यवाही के औचित्य में विश्वास करा दिया जाये। मेनन के अनुसार गांधीजी को इस काम से पूरी तरह संतोष था। भारत सरकार की इस कार्यवाही से राजाओं के मन में भय उत्पन्न हो गया। भारत विभाजन के अवसर पर भड़के दंगों ने एकीकरण की प्रक्रिया को तेज कर दिया। अलवर एवं भरतपुर में मेव जाति ने आतंक फैला दिया था जिसके परिणामस्वरूप हिन्दुओं ने भी मेवों पर आक्रमण किये। दंगों में भरतपुर रियासत में 209 गाँव पूर्णतः नष्ट हो गये। मेव, भरतपुर रियासत का उत्तरी भाग, गुड़गांव और अलवर रियासत के दक्षिणी क्षेत्रों को मिलाकर मेवस्तान बनाने का स्वप्न देख रहे थे। अलवर राज्य के दीवान एन. बी. खरे ने मेवों को सख्ती से कुचला। खरे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भी रहे इसलिये कांग्रेसी नेताओं ने खरे पर कट्टर हिन्दूवादी होने के आरोप लगाये। कांग्रेसियों का मानना था कि खरे ने हिन्दुओं को मेवों के विरुद्ध भड़का कर दंगा करवाया। अक्टूबर 1947 में सरदार पटेल ने रियासती प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाईं
     सभा में पटेल ने भरतपुर के राजा तथा अलवर के दीवान से कहा कि जो लोग सांप्रदायिकता फैलाने का काम कर रहे हैं वे देश के शत्रु हैं। खरे ने पटेल की इस कार्यवाही को राज्य के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप माना।

    30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या हुई जिसमें अलवर नरेश और उनके प्रधानमंत्री एन. बी. खरे का हाथ होने का संदेह किया गया। भारत सरकार ने 7 फरवरी 1948 को अलवर नरेश तेजसिंह को दिल्ली बुलाकर कनाट प्लेस पर स्थित मरीना होटल में नरजबंद कर दिया तथा अलवर राज्य का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। खरे को पदच्युत करके दिल्ली में नजरबंद कर दिया गया। अलवर नरेश की नजरबंदी से राजपूताना के राजाओं में भय व्याप्त हो गया और वे राष्ट्रीय नेताओं के दबाव में आ गये। अब वे अपने राज्यों को राजस्थान में मिलाने के लिये प्रस्तुत हो गये। अलवर तथा भरतपुर राज्यों की ही तरह धौलपुर तथा करौली राज्यों में भी सांप्रदायिक दंगों की आशंका दिखाई देने लगी। अतः रियासती मंत्रालय ने इन चारों राज्यों के राजाओं को हटाकर इन राज्यों का एक संघ बनाने का निर्णय लिया।


    मत्स्य संघ का निर्माण

    रियासती विभाग भरतपुर राज्य की गतिविधियों से बड़ा खिन्न था। भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह के विरुद्ध भारत सरकार ने एक आरोप सूची तैयार की-

    (1.) भरतपुर के महाराजा ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया। उसने खुले तौर पर भारतीय नेताओं को भारत विभाजन के लिये उत्तरदायी बताया।

    (2.) महाराजा ने 1 लाख मुसलमानों को राज्य से भगा दिया। महाराजा को प्रसन्नता थी कि उनके राज्य में एक भी मुसलमान नहीं बचा था।

    (3.) भरतपुर राज्य में से जाने वाली बांदीकुई-आगरा रेलवे लाइन को सुरक्षा प्रदान करने के लिये महाराजा ने कारगर कदम नहीं उठाये।

    (4.) महाराजा की सेना में अनुशासन जैसी कोई चीज नहीं रह गयी थी।

    (5.) महाराजा ने राज्य में जाटवाद को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं रखी थी।

    (6.) भरतपुर राज्य में शस्त्र व गोला-बारूद तैयार करने के लिए अवैध कारखाना खोला गया था। राज्य में जाटों व राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र बांटे जा रहे थे।

    (7.) महाराजा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की गतिविधियों में रुचि लेता था।

    (8.) नेहरू ने अपने पत्र दिनांक 28 जनवरी 1948 के द्वारा पटेल को अवगत करवाया था कि भरतपुर राज्य में राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

    भारत सरकार ने 10 फरवरी 1948 को भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह को दिल्ली बुलाया और उनके विरुद्ध एकत्र किये गये आरोपों से अवगत करवा कर उन्हें निर्देश दिये कि वे राज्य प्रशासन का दायित्व भारत सरकार को सौंप दें। अलवर महाराजा तथा प्रधानमंत्री दिल्ली में नजरबंद किये जा चुके थे। इसलिये भरतपुर महाराजा अत्यंत दबाव में थे। उन्होंने अत्यंत अनिच्छा से सम्मति प्रदान की। 14 फरवरी 1948 को रियासती विभाग द्वारा एस. एन. सप्रू को भरतपुर राज्य का प्रशासक नियुक्त किया गया। कर्नल ढिल्लों को राज्य की सेना का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। महाराजा के भाई गिरिराजशरण सिंह, जिसके विरुद्ध नेहरू ने सरदार पटेल को लिखा था, को इंगलैण्ड भेज दिया गया। माउंटबेटन महाराजा भरतपुर को सांप्रदायिक आधार पर हत्याएं करने तथा खराब प्रशासन के आरोप में अपदस्थ करके दक्षिण में भेजना चाहते थे जहाँ उन्हें नजरबंद कर दिया जाना था किंतु सरदार पटेल ने महाराजा के भाग्य की रक्षा की।

    अलवर तथा भरतपुर राज्यों से सटे धौलपुर और करौली राज्यों के राजाओं को भी 27 फरवरी 1948 को दिल्ली बुलाया गया और सलाह दी गयी कि अलवर और भरतपुर राज्य के साथ संघ में शामिल हो जायें। इन्हें यह भी स्पष्ट किया गया कि बाद में आवश्यकता हुई तो इन चारों राज्यों के संघ को राजस्थान अथवा यूनाइटेड प्रोविंस में सम्मिलित कर दिया जायेगा क्योंकि मत्स्य यूनियन आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होगी। इस प्रस्ताव को चारों ही राजाओं ने मान लिया तथा 28 फरवरी 1948 को चारों राज्यों के राजाओं ने एकीकरण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिये। के. एम. मुंशी की सलाह पर इस संघ का नाम मत्स्य संघ रखा गया। चूंकि महाराजा अलवर तथा महाराजा भरतपुर के विरुद्ध जांच चल रही थी इसलिये धौलपुर महाराजा को संघ का राजप्रमुख तथा करौली महाराजा को उपराजप्रमुख बनाया गया। 18 मार्च 1948 को इसका विधिवत् उद्घाटन होना निश्चित किया गया।

    सरदार पटेल को अलवर में कुछ कठिनाई होने की आशंका थी। इसलिये शासकों द्वारा प्रसंविदा पर हस्ताक्षर किये जाने से एक दिन पूर्व वे अलवर आये तथा एक आम सभा में उन्होंने राजपूतों तथा राजपूत शासकों को उनके कर्त्तव्य का स्मरण करवाया- 'छोटे राज्य अब बने नहीं रह सकते। उनके सामने एक ही विकल्प है कि वे बड़ी तथा समुचित आकार की इकाईयों में सम्मिलित हो जायें। जो अब भी राजपूत आधिपत्य की स्थापना का स्वप्न देखते हैं, वे आधुनिक संसार से बाहर हैं। अब शक्ति, प्रतिष्ठा या वर्ग का चिंतन उचित नहीं होगा। आज हरिजन की झाड़ू राजपूतों की तलवार से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। जैसे माँ का झुकाव बच्चे की ओर होता है वैसे ही जो लोग देश के हितों की देखभाल कर रहे हैं वे सबसे ऊपर हैं। वे भी समान समर्पण तथा बराबर आदर सम्मान के अधिकारी हैं।'  सरदार ने लोगों का आह्वान किया के वे सांप्रदायिक सद्भाव, एकता तथा शांति बनाये रखें।

    जैसे ही भरतपुर महाराजा के भाई मानसिंह को इस बात का पता लगा कि भारत सरकार भरतपुर राज्य को मत्स्य संघ में विलय करने जा रही है, उसने जाट झण्डा खतरे में है, का आह्वान करके पूरे देश के जाटों को सशस्त्र होकर भरतपुर पहुँचने को कहा। उसका निश्चय था कि वह भरतपुर राज्य पर आक्रमण करके उसे अपने अधिकार में ले लेगा। उसने समस्त सरकारी इमारतों पर भरतपुर राज्य का झण्डा लगाने का आह्वान किया। किसान नेता देशराज ने भी इसमें सहयोग दिया। मानसिंह और देशराज गिरफ्तार कर लिये गये। जब 18 मार्च 1948 को संघ का उद्घाटन होने लगा तो उद्घाटन स्थल पर सशस्त्र भीड़ घुस गयी। पुलिस उसे नियंत्रित नहीं कर सकी। इस पर देशराज को उद्घाटन स्थल पर लाया गया। देशराज की इस बात को मान लिया गया कि मत्स्य संघ में किसान नेताओं को प्रतिनिधित्व दिया जायेगा। देशराज की अपील पर भीड़ शांत हो गयी। निर्धारित समय से दो घण्टे बाद मत्स्य संघ का उद्घाटन संभव हो सका। इस प्रकार 18 मार्च 1948 को मत्स्य संघ अस्तित्व में आया। इसके साथ ही राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई। इस संघ का क्षेत्रफल 7,589 वर्ग मील था तथा जनसंख्या 18,37,994 तथा वार्षिक राजस्व 183 लाख था। माउंटबेटन ने अलवर तथा भरतपुर राज्यों के शासकों के विरुद्ध जांच करने के लिये बड़ौदा, ग्वालियर, नवानगर तथा बीकानेर के शासकों की एक समिति नियुक्त की किंतु इन शासकों ने अपने भ्रातृ महाराजाओं की जांच करने से मना कर दिया। इस पर भारत सरकार के प्रतिनिधियों को इस कार्य के लिये नियुक्त किया। जांच में न केवल महाराजा अलवर तथा महाराजा भरतपुर निर्दोष पाये गये अपितु एन. बी. खरे के विरुद्ध भी किसी तरह का आरोप प्रमाणित नहीं हुआ।


    संयुक्त राजस्थान

    जिस समय मत्स्य संघ के निर्माण के लिये वार्त्ता चल रही थी, तब रियासती सचिवालय ने राजस्थान के राज्यों का मध्यभारत और गुजरात के राज्यों के साथ एकीकरण का प्रस्ताव रखा किंतु राज्यों के प्रजामण्डलों एवं शासकों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। 3 मार्च 1948 को कोटा, डूंगरपुर और झालावाड़ के शासकों ने रियासती विभाग के समक्ष प्रस्ताव रखा कि बांसवाड़ा, बूंदी, डूंगरपुर, झालावाड़, किशनगढ़, कोटा, प्रतापगढ़, शाहपुरा, टोंक, लावा और कुशलगढ़ को मिलाकर संयुक्त राजस्थान का निर्माण किया जाये। प्रस्तावित संघ के क्षेत्र के बीच में मेवाड़ राज्य था जो अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रख सकता था। कुछ शासकों के आग्रह पर रियासती विभाग ने मेवाड़ को नये संघ में शामिल होने का निमंत्रण दिया किंतु महाराणा भूपालसिंह तथा दीवान राममूर्ति ने कहा कि मेवाड़ का 1300 वर्ष पुराना राजवंश अपनी गौरवशाली परंपरा को तिलांजलि देकर भारत के मानचित्र पर अपना अस्तित्व समाप्त नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी कहा कि यदि दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान की रियासतें चाहें तो वे मेवाड़ में अपना विलय कर सकती हैं।

    रियासती सचिवालय ने मेवाड़ को छोड़कर दक्षिणी पूर्वी राजस्थान की रियासतों को मिलाकर संयुक्त राजस्थान का निर्माण करने का निश्चय किया। मेनन की इच्छा थी कि किशनगढ़ तथा शाहपुरा को अजमेर मेरवाड़ा से जोड़ दिया जाये किंतु इन राज्यों के शासकों तथा स्थानीय नेताओं ने इस विचार का विरोध किया। अतः इस विचार को त्याग दिया गया था। इन समस्त राज्यों के नरेशों ने विलय के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिये। कुछ राजाओं ने यह कार्य प्रसन्नता पूर्वक किया तो कुछ ने अत्यंत निराश होकर। बांसवाड़ा महारावल चन्द्रवीर सिंह ने हस्ताक्षर करते हुए कहा- 'मैं अपने मृत्यु दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर रहा हूँ।' टोंक रियसात का भी इस संघ में विलय किया गया किंतु यह निश्चय किया गया कि जब मध्यभारत संघ का निर्माण होगा तब इसे मध्यभारत संध में मिला दिया जायेगा किंतु बाद में इस रियासत के केवल कुछ क्षेत्र ही मध्य भारत संघ में जोड़े गये। यह निश्चय किया गया कि संविधान सभा में इस संघ से एक लाख प्रति सदस्य की गणना से कुल 24 प्रतिनिधि चुने जायेंगे तथा जागीरदारों का प्रतिनिधित्व करने के लिये राजप्रमुख द्वारा 4 प्रतिनिधि नामित किये जायेंगे।

    वरिष्ठता, क्षेत्रफल तथा महत्त्व के आधार पर कोटा के शासक को राजप्रमुख का पद दिया गया किंतु कुलीय परम्परा में बूंदी का शासक कोटा के शासक से उच्चतर था। इसलिये बूंदी के शासक को यह बात सहन नहीं हो सकी कि उस संघ में कोटा शासक राजप्रमुख हो। अतः बूंदी के शासक महाराव बहादुरसिंह ने मेवाड़ के महाराणा भूपालसिंह से प्रस्तावित संघ में शामिल होने का अनुरोध किया ताकि उसके (बूंदी के) कुलीय गौरव की रक्षा हो सके क्योंकि मेवाड़ के शामिल होने पर मेवाड़ के महाराणा ही राजप्रमुख होंगे किंतु महाराणा ने बूंदी के शासक को भी वही उत्तर दिया जो उन्होंने रियासती विभाग को दिया था। मेवाड़ महाराणा द्वारा प्रस्तावित संघ में मिलने से मना कर देने के बाद राजस्थान की दक्षिण पूर्वी रियासतों को मिलाकर संयुक्त राजस्थान का निर्माण कर लिया गया और 25 मार्च 1948 को बी. एन. गाडगिल द्वारा इसका विधिवत् उद्घाटन किया गया। कोटा नरेश को राजप्रमुख, बूंदी नरेश को वरिष्ठ उपराजप्रमुख और डूंगरपुर नरेश को कनिष्ठ उपराजप्रमुख बनाया गया। गोकुललाल असावा को मुख्यमंत्री बनाया गया। इस संघ का क्षेत्रफल 17,000 वर्ग मील, जनसंख्या 24 लाख तथा कुल राजस्व लगभग 2 करोड़़ था।


    552 राज्यों का एकीकरण सम्पन्न

    संपूर्ण भारत में इस समय तक 216 राज्य जिनका कुल क्षेत्रफल 1,08,739 वर्ग मील तथा जनसंख्या 19.158 मिलियन थी, प्रांतों में मिला दिये गये। 61 राज्य जिनका कुल क्षेत्रफल 63,704 वर्ग मील तथा जनसंख्या 6.925 मिलियन थी, केन्द्र शासित प्रदेश के रूप में अधिग्रहीत कर लिये गये। 275 राज्य जिनका कुल क्षेत्रफल 2,15,450 वर्ग मील तथा जनसंख्या 34.7 मिलियन थी, राज्य संघों में मिला दिये गये। इस प्रकार कुल 552 राज्यों का एकीकरण संपन्न हो गया जिनका क्षेत्रफल 3,87,893 वर्ग मील था तथा जनसंख्या 60.783 मिलियन थी। शेष बची रियासतों को वैसे ही बना रहने दिया गया तथा वे भारत संघ के भीतर सक्षम प्रशासनिक इकाईयों के रूप में कार्य करने लगीं।

    एकीककरण के अगले दौर में शेष बचे उन सक्षम राज्यों की बारी थी जो सक्षमता के आधार पर अब तक अपना पृथक अस्तित्व बनाये हुए थीं। रियासती विभाग अब भी यही कह रहा था कि केवल छोटे राज्यों को ही 7 बड़ी संघ इकाईयों- सौराष्ट्र, मत्स्य, मालवा, राजस्थान, विंध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश तथा फुल्कियान में मिलाया जायेगा तथा 19 सक्षम राज्यों- कश्मीर, हैदराबाद, त्रावणकोर, कोचीन, मैसूर, बड़ौदा, कच्छ, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल, बीकानेर, जोधपुर, कूच बिहार, त्रिपुरा, मनिपुर, जयपुर, उदयपुर, मयूरभंज तथा कोल्हापुर को अलग राज्य बने रहने दिया जायेगा।


    उदयपुर राज्य का संयुक्त राजस्थान में विलय

    राजपूताना के राज्यों के संघ के प्रति महाराणा की बेरुखी की मेवाड़ में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। मेवाड़ प्रजा मण्डल के प्रमुख नेता माणिक्यलाल वर्मा, जो उस समय भारतीय संविधान सभा में मेवाड़ के प्रतिनिधि थे, ने दिल्ली से जारी एक वक्तव्य में कहा कि मेवाड़ की 20 लाख जनता के भाग्य का फैसला अकेले महाराणा और उनके दीवान सर राममूर्ति नहीं कर सकते। प्रजामण्डल की यह स्पष्ट नीति है कि मेवाड़ अपना अस्तित्व समाप्त कर राजपूताना प्रांत का एक अंग बन जाये। प्रजा मण्डल के मुखपत्र 'मेवाड़ प्रजा मण्डल पत्रिका' के 8 मार्च और 15 मार्च 1948 के सम्पादकीय में भी मेवाड़ को प्रस्तावित संघ में विलय करने की मांग का जबर्दस्त समर्थन किया गया किंतु महाराणा अपने निश्चय पर अटल रहे। शीघ्र ही मेवाड़ की परिस्थितियों ने पलटा खाया। मेवाड़ में मंत्रिमण्डल के गठन को लेकर प्रजामण्डल और मेवाड़ सरकार के बीच गतिरोध उत्पन्न हो गया। अंत में प्रजामण्डल की बात स्वीकार करके यह गतिरोध समाप्त किया गया तथा यह निश्चित किया गया कि मंत्रिमंडल में दीवान के अतिरिक्त 7 मंत्री होंगे जिनमें से 4 प्रजामंडल द्वारा मनोनीत होंगे, 2 मंत्री क्षत्रिय परिषद से होंगे तथा एक का नामांकन महाराणा द्वारा किया जायेगा।

    प्रजामंडल की तरफ से प्रेमनारायण, बलवंतसिंह, मोहनलाल सुखाड़िया और हीरालाल कोठारी को नामजद किया गया। निर्दलीय सदस्य के लिये महाराणा की तरफ से मोहनसिंह मेहता को नामजद किया गया। मेहता उस समय भी वित्तमंत्री का काम देख रहे थे। प्रजामंडल को यह नाम स्वीकार नहीं हुआ क्योंकि मेहता ने 1942 में शिक्षामंत्री रहते हुए प्रजामंडल के आंदोलन को कुचलने में अहम भूमिका निभाई थी। इस बात को लेकर महाराणा और प्रजामंडल में फिर से गतिरोध उत्पन्न हो गया। 14 मार्च 1948 को प्रजामंडल ने एक आवश्यक बैठक बुलाई और उसमें निर्णय लिया कि मौजूदा मंत्रिमंडल से सुखाड़िया व कोठारी को त्यागपत्र दे देना चाहिये तथा शीघ्र ही प्रजामंडल की महासमिति की असाधारण बैठक बुलाकर राज्य सरकार के विरुद्ध कार्यवाही करने पर विचार विमर्श किया जाना चाहिये।

    राज्य सरकार प्रजामंडल के इस निर्णय से घबरा गयी। उसने प्रजामंडल के नेताओं को बातचीत करने के लिये आमंत्रित किया। प्रजामंडल ने मेहता के स्थान पर एडवोकेट जीवनसिंह चौरड़िया का नाम सुझाया। महाराणा ने प्रजामण्डल के प्रस्तावित उम्मीदवार को मंत्री बनाना स्वीकार कर लिया। राज्य का मुत्सद्दी वर्ग और सामंती वर्ग, प्रजामण्डल की जीत को सहन नहीं कर सका। उन्होंने महाराणा को परामर्श दिया कि मेवाड़ को संयुक्त राजस्थान में सम्मिलित कर लिया जाये क्योंकि यदि मेवाड़ बड़े राज्य में शामिल हो जाता है तो प्रशासन में मत्स्य संघ की भांति प्रजामण्डल के प्रतिनिधियों के स्थान पर भारत सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारियों का वर्चस्व रहेगा तथा बड़े राज्य में सम्मिलित होते समय समस्त शर्तें रियासती सचिवालय द्वारा निश्चित की जायेंगी। महाराणा को यह परामर्श उचित लगा। अतः संयुक्त राजस्थान राज्य के उद्घाटन से दो दिन पूर्व महाराणा ने 23 मार्च 1948 को एक विशेष गजट के द्वारा प्रेमनारायण माथुर को राज्य के प्रधानमंत्री के पद पर पदस्थापित कर दिया तथा उनके साथी मंत्रियों के नाम की भी घोषणा कर दी किंतु उनके शपथ ग्रहण समारोह को कुछ दिन के लिये टाले रखा।

    महाराणा ने मेवाड़ प्रजामंडल को अंधेरे में रखकर उसी दिन (23 मार्च 1948 को) मेवाड़ को संयुक्त राजस्थान में शामिल करने के अपने निश्चय की सूचना भारत सरकार को भेज दी। चूंकि ऐन वक्त पर उद्घाटन के कार्यक्रम में परिवर्तन संभव नहीं था, अतः पूर्व निर्णय के अनुसार 25 मार्च 1948 को संयुक्त राजस्थान का विधिवत् उद्घाटन किया गया। मेवाड़ को इसमें सम्मिलित नहीं किया गया। भारत सरकार की सलाह पर मंत्रिमंडल का गठन कुछ दिन के लिये स्थगित कर दिया।

    एम. एस. जैन ने बी. एल. पानगड़िया के इस तर्क से असहमति दर्शायी है कि जागीरदारों और प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं में झगड़ा हो जाने के कारण महाराणा ने उदयपुर राज्य को संयुक्त राजस्थान में विलय की स्वीकृति दी।

    संयुक्त राजस्थान के उद्घाटन के तीन दिन बाद संयुक्त राजस्थान में मेवाड़ के विलय पर वार्त्ता आरंभ हुई। मेवाड़ के दीवान रामामूर्ति दिल्ली गये और भारत सरकार को महाराणा की तीन प्रमुख मांगों से अवगत करवाया। पहली यह कि महाराणा को संयुक्त राजस्थान का वंशानुगत राजप्रमुख बनाया जाये, दूसरी यह कि उन्हें 20 लाख रुपया प्रिवीपर्स दिया जाये, तीसरी यह कि उदयपुर को संयुक्त राजस्थान की राजधानी बनाया जाये। भारत सरकार ने महाराणा की मांगों के सम्बन्ध में कोटा, डूंगरपुर व झालावाड़ के शासकों से विचार विमर्श कर मेवाड़ को संयुक्त राजस्थान में विलय करने का निश्चय किया। यद्यपि प्रत्येक राज्य का भारत सरकार के साथ अलग समझौता हुआ किंतु सामान्यतः छोटे राज्यों के मामले में राज्य के कुल राजस्व का 10 प्रतिशत तथा बड़े राज्यों के मामले में राज्य के कुल राजस्व का 8 प्रतिशत प्रिवीपर्स देना निश्चित किया गया था। रियासती सचिवालय ने यह नीति निश्चित कर ली थी कि किसी भी रियासत के शासक को 10 लाख रुपये से अधिक प्रिवीपर्स नहीं दिया जायेगा किंतु महाराणा की मांग पूरी करने के लिये निश्चय किया गया कि महाराणा को 10 लाख रुपये वार्षिक प्रिवीपर्स, 5 लाख रुपये राजप्रमुख पद का वार्षिक भत्ता और शेष 5 लाख रुपये मेवाड़ के राजवंश की परंपरा के अनुसार धार्मिक कृत्यों में खर्च के लिये दिया जायेगा।

    महाराणा को संयुक्त राजस्थान का आजीवन राजप्रमुख बनाना स्वीकार कर लिया गया किंतु यह पद उन्हें वंशानुगत नहीं दिया गया। मेवाड़ के महाराणा को संतुष्ट करने के लिये संयुक्त राज्य के संविधान में संशोधन किया गया और नये संघ को 'यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ राजस्थान' कहा गया। इसे द्वितीय राजस्थान भी कहते हैं। उदयपुर को संयुक्त राजस्थान की राजधानी बानाना भी स्वीकार कर लिया गया किंतु संविधान में तय किया गया कि विधान सभा का प्रतिवर्ष एक अधिवेशन कोटा में भी होगा। कोटा में कमिश्नरी कार्यालय रखा गया। फॉरेस्ट स्कूल, पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज, हवाई प्रशिक्षण कॉलेज आदि संस्थायें कोटा का महत्त्व बनाये रखने के लिये कोटा में ही रखे गये।

    रियासती विभाग ने महाराणा की निजी संपत्ति के प्रश्न पर उदारतापूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया तथा उदयपुर में चुनावों के दौरान पुलिस द्वारा की गयी गोलीबारी की जाँच नहीं करवाने की मांग भी मान ली। रियासती विभाग ने महाराणा की मनचाही शर्तें स्वीकार कर लीं। उस समय तक संघ में विलय होने वाली किसी भी रियासत के शासक को इतनी रियायतें नहीं दी गयी थीं। भारत सरकार के लिये उदयुपर राज्य द्वारा किसी संघ में विलय हो जाने का बहुत बड़ा महत्त्व था क्योंकि इससे बड़े राज्यों के भी संघों में मिल जाने का मार्ग प्रशस्त हो गया।


    संयुक्त राजस्थान की प्रसंविदा का निर्माण

    10 अप्रेल 1948 को प्रस्तावित संघ की प्रसंविदा (Covenant) बनाने के लिये नई दिल्ली में बैठक बुलाई गयी। इसमें कोटा, बूंदी, डूंगरपुर, झालावाड़, प्रतापगढ़ तथा टोंक राज्यों के शासक, उदयपुर की ओर से दीवान एस. वी. राममूर्ति तथा राजस्थान संघ के मुख्यमंत्री गोकुललाल असावा उपस्थित हुए। यह प्रसंविदा सौराष्ट्र, मत्स्य, तथा विंध्यप्रदेश संघ के लिये तैयार की गयी प्रसंविदाओं से भिन्न था। इससे पूर्व की प्रसंविदाओं में राज्यों में से केवल तीन विषयों- रक्षा, विदेश मामले तथा संचार के सम्बन्ध में ही उपाय किये गये थे किंतु संयुक्त राजस्थान के गठन के लिये बनायी गयी प्रसंविदा में राजप्रमुख को शक्तियां दी गयीं कि वह संयुक्त राजस्थान के लिये (कर तथा शुल्क के अतिरिक्त) संघीय तथा समवर्ती सूची के किसी भी विषय को कानून बनाने के लिये डोमिनियन संविधान को समर्पित कर सकता था। 11 अप्रेल 1948 को प्रसंविदा को अंतिम रूप दे दिया गया तथा उपस्थित शासकों द्वारा इस पर हस्ताक्षर कर दिये गये। इस संघ का कुल क्षेत्रफल 29,977 वर्ग मील, जनसंख्या 42,60,918 तथा वार्षिक राजस्व 316 लाख था।

    मेवाड़ महाराणा भूपालसिंह को राजप्रमुख, कोटा के महाराव भीमसिंह को वरिष्ठ उप राजप्रमुख, बूंदी एवं डूंगरपुर के राजाओं को कनिष्ठ उपराजप्रमुख बनाया गया। मेवाड़ प्रजामण्डल के प्रमुख नेता माणिक्यलाल वर्मा को राज्य का प्रधानमंत्री नियुक्त किया। माणिक्यलाल वर्मा ने महाराणा भूपालसिंह से मंत्रिमण्डल निर्माण के सम्बन्ध में चर्चा की। महाराणा ने वर्मा से आग्रह किया कि वे मंत्रिमण्डल में जागीरदारों को भी प्रतिनिधित्व दें। वर्मा ने महाराणा का सुझाव मानने से मना कर दिया। 18 अप्रेल 1948 को पं. नेहरू संयुक्त राजस्थान का विधिवत् उद्घाटन करने के लिये पहुँचे तो वर्मा ने नेहरू से कहा कि वे ऐसे किसी मंत्रिमण्डल का निर्माण नहीं करेंगे जिसमें जागीरदारों का प्रतिनिधित्व हो। नेहरू ने निर्णय दिया कि प्रधानमंत्री को इस सम्बन्ध में महाराणा तथा अन्य व्यक्तियों से विचार विमर्श करना चाहिये किंतु अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री को ही लेना है। नेहरू ने वर्मा को सलाह दी कि इस समय तो प्रधानमंत्री तथा राजप्रमुख अपने पदों की शपथ ले लें तथा यदि मंत्रिमण्डल बनने में कठिनाई हो तो वे तथा राममूर्ति दिल्ली आकर रियासती विभाग से सलाह कर लें। नेहरू की सलाह पर वर्मा ने प्रधानमंत्री पद की तथा महाराणा ने राजप्रमुख के पद की शपथ ली। प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद वर्मा दिल्ली जाकर सरदार पटेल से मिले। पटेल ने महाराणा को पत्र लिखकर सलाह दी कि वे वर्मा की बात मान लें। इस पर महाराणा ने वर्मा मंत्रिमण्डल को स्वीकृति दे दी तथा मंत्रिमंडल में जागीरदारों के प्रतिनिधित्व पर जोर नहीं दिया। मंत्रिमण्डल में गोकुललाल असावा (शाहपुरा), प्रेमनारायण माथुर, भूरेलाल बया और मोहनलाल सुखाड़िया (उदयपुर), भोगीलाल पांड्या (डूंगरपुर), अभिन्न हरि (कोटा) और बृजसुंदर शर्मा (बूंदी) सम्मिलित किये गये। मंत्रिमण्डल ने 28 अप्रेल 1948 को शपथ ली।

    बीकानेर महाराजा द्वारा उदयपुर को राजस्थान में विलय से रोकने का प्रयास

    उदयपुर राज्य अलग रह सकने योग्य इकाई अर्थात् सक्षम राज्य की श्रेणी में आता था किंतु उसके संयुक्त राजस्थान संघ में मिलने के निर्णय से जोधपुर, बीकानेर तथा जयपुर को बड़ा धक्का लगा। बीकानेर महाराजा सादूलसिंह ने मेवाड़ महाराणा को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि मेवाड़ राजस्थान यूनियन में नहीं मिले। सादूलसिंह ने बीकानेर रियासत की अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री कुंवर जसवंतसिंह दाउदसर को उदयपुर भेजा ताकि वह महाराणा से व्यक्तिगत भेंट करके महाराणा को राजस्थान में मिलने से रोके। जसवंतसिंह ने महाराणा से कहा कि मेवाड़ एक ऐसी रियासत थी जो मुगलों के सामने नहीं झुकी, आज वही रियासत कांग्रेस सरकार के सामने कैसे झुक रही है? महाराणा ने महाराजा सादूलसिंह के इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया और सादूलसिंह को कहलवाया कि वह तो अपनी रियासत कांग्रेस को समर्पित कर चुके हैं, अन्य राज्यों का समर्पण भी अवश्यंभावी है। महाराणा के इस जवाब से बीकानेर नरेश के मनोबल में काफी गिरावट आईं


    राममूर्ति विवाद

    राजस्थान का उद्घाटन होने के बाद 29 अप्रेल 1948 को वी. पी. मेनन उदयपुर आये। महाराणा ने मेनन से अनुरोध किया मेवाड़ के पूर्व प्रधानमंत्री सर राममूर्ति को संयुक्त राजस्थान सरकार का सलाहकार नियुक्त किया जाये। मेनन ने माणिक्यलाल वर्मा से पूछे बिना ही यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। महाराणा ने भी वर्मा को बताये बिना राममूर्ति की नियुक्ति के आदेश जारी कर दिये। इस पर राममूर्ति ने यह कहना आरंभ कर दिया कि राजप्रमुख के सलाहकार होने के नाते वे मंत्रिमण्डल से ऊपर हैं। प्रधानमंत्री माणिक्यलाल वर्मा ने 13 मई 1948 को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि जो अधिकारी सरकार का सलाहकार होगा, वह मंत्रिमण्डल के अधीन रहकर कार्य करेगा। राजप्रमुख को राज्य सम्बन्धी सलाह देने की जिम्मेदारी मंत्रिमण्डल की है। यदि सलाहकार जैसी एक और एजेंसी राजप्रमुख को सलाह देना आरंभ कर देगी तो राज्य में दोहरा शासन आरंभ हो जायेगा जो जनतंत्र के सर्वसम्मत सिद्धांतों के विपरीत होगा। वर्मा ने राममूर्ति से कहा कि वे प्रधानमंत्री के लिये आवंटित आवास खाली कर दें क्योंकि राममूर्ति को दूसरा आवास आवंटित कर दिया गया है।

    राममूर्ति ने वर्मा का पत्र राजप्रमुख के सम्मुख रखा तो राजप्रमुख बड़े खिन्न हुए। उन्होंने उसे अपना अपमान समझा। राजप्रमुख ने 15 मई 1948 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखा कि आप से अधिक कोई नहीं जानता कि मैंने अपनी रियासत का संयुक्त राजस्थान में विलय अपनी स्वयं की तरफ से पहल कर पूरी तरह स्वेच्छा से किया है। मुझे विश्वास है कि आप सहमत होंगे कि मेरे साथ जो व्यवहार किया जा रहा है वह मेरे द्वारा प्रदर्शित सद्भावना और सहयोग के अनुरूप नहीं है।.........मैं आपसे हृदय से निवेदन करूंगा कि सर राममूर्ति की सलाहकार के पद पर की गयी नियुक्ति में किसी तरह दखल नहीं होना चाहिये। पटेल ने वर्मा को दिल्ली बुलाकर कहा कि सर राममूर्ति को लिखे गये पत्र को वापस ले लें। वर्मा ने सरदार के आदेशानुसार अपना पत्र वापस ले लिया। सरदार ने महाराणा को लिखा कि वर्मा ने मेरी सलाह पर 15 मई का पत्र वापस ले लिया है। मेरा विश्वास है कि प्रधानमंत्री के निवास स्थान को लेकर राममूर्ति अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बना सकते। आप उन्हें इस सम्बन्ध में मंत्रिमण्डल के निर्णय को स्वीकार कर लेने की सलाह दें। बार-बार इस प्रकार की घटनायें होना बताता है कि सर राममूर्ति अपने आपको देश के बदले हुए हालात में ढाल नहीं पाये हैं। राममूर्ति को बता दें कि अपने तौर तरीकों में परिवर्तन करें अन्यथा यह संभावना है कि उनकी गलतियों के कारण आपके और मंत्रिमण्डल के सम्बन्ध बिगड़ जायें और बेकार में ही आपकी प्रतिष्ठा और पद को आंच पहुँचे।

    एल. सी. जैन की नियुक्ति को लेकर विवाद

    रियासती विभाग रियासतों के विलय से बने हर नये राज्य संघ में एक या दो आई.सी. एस. अधिकारी मुख्य सचिव या सलाहकार के रूप में नियुक्त करता था। माणिक्यलाल वर्मा ने एक स्थानीय अधिकारी बी. एस. मेहता को संयुक्त राजस्थान सरकार का मुख्य सचिव नियुक्त कर दिया। रियासती विभाग ने वर्मा की इस कार्यवाही को पसंद नहीं किया तथा एक वरिष्ठ आई.सी. एस. अधिकारी एल. सी. जैन को संयुक्त राजस्थान का मुख्य सचिव नियुक्त करके उदयपुर भेज दिया। वह अधिकारी कई दिनों तक अपने सैलून में उदयपुर के रेलवे स्टेशन पर ही रुका रहा। उसे मुख्य सचिव के पद का कार्यभार नहीं दिया गया। पटेल ने वर्मा को दिल्ली बुलवाया। वर्मा ने सरदार से कहा कि यदि उनकी इच्छा के विपरीत आई.सी. एस. अधिकारी थोपा गया तो रियासती विभाग को किसी अन्य प्रधानमंत्री की तलाश करनी होगी। सरदार ने वर्मा की बात मान ली और जैन को अन्यत्र भेज दिया।


    वृहद राजस्थान की ओर

    एकीकरण के लिये जन आंदोलन

    देशी राज्य प्रजा परिषद की राजस्थान इकाई राजपूताना के समस्त राज्यों को एक इकाई के रूप में संगठित करने के पक्ष में थी। इसके समर्थन में मार्च 1948 में उसने मांग की कि अजमेर मेरवाड़ा सहित प्रदेश की समस्त रियासतों को मिलाकर वृहत् राजस्थान गठित किया जाये। मई 1948 में मध्यभारत संघ का निर्माण होने पर समाजवादी दल ने वृहत् राजस्थान के निर्माण की मांग की तथा अखिल भारतीय स्तर पर 'राजस्थान आंदोलन समिति' का गठन किया। समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने 9 नवम्बर 1948 को उदयपुर में आयोजित एक आमसभा में वृहत राजस्थान के निर्माण की मांग की। आंदोलन समिति ने एक प्रस्ताव पारित किया कि राजपूताने की समस्त रियासतों और केन्द्र शासित प्रदेश अजमेर मेरवाड़ा को मिलाकर अविलम्ब वृहत राजस्थान का निर्माण किया जाये। समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने भी जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और मत्स्य संघ को संयुक्त राजस्थान में मिलाकर वृहत राजस्थान का निर्माण करने की मांग की।

    राजाओं की विचारधारा में बदलाव

    पूरे देश में तेजी से चले घटनाचक्र में बड़ी बड़ी रियासतें एकीकरण के दायरे में ली जा चुकी थीं, साथ ही देशी राज्यों में जनता द्वारा राज्यों के एकीकरण की मांग जिस बड़े स्तर पर उठने लगी थी, उससे जयपुर, जोधपुर और बीकानेर के राजा भी अपने आप को इस बात के लिये मानसिक स्तर पर तैयार कर चुके थे कि उनके राज्य राजस्थान में मिला दिये जायें। अब देश उस दौर में प्रवेश कर चुका था जहाँ या तो राजा लोग अपनी रियासतों को एकीकरण के लिये प्रस्तुत कर दें या फिर सत्ता से वंचित हो जायें। यहाँ तक कि यदि वे अपने राज्यों को राजस्थान में विलीन होने की सहमति न भी दें तो भी उन्हें अपनी सत्ता से हाथ धोना पड़ सकता था। संयुक्त राजस्थान में सत्ता विहीन होकर रहना कम अपमानजनक था बजाय इसके कि वे अपने ही राज्य में सत्ता विहीन होकर रहें।

    यदि ये शासक अपने व्यक्तिगत अधिकार एवं प्रयास से विलयन की प्रक्रिया को कुछ समय के लिये टाल भी देते तो भी उन्हें वह सम्मान और अधिकार उतनी सरलता से नहीं मिलते और उस सीमा तक नहीं मिलते जितने कि उन्हें विलयन के लिये तैयार होने पर मिलते। दिल्ली, बीकानेर, जयपुर और जोधपुर में मेनन और इन राज्यों के शासकों के बीच अलग-अलग और साथ साथ कई बैठकें हुईं। यह बात शीघ्र ही स्पष्ट हो गयी कि इन राज्यों का मिलन अवश्यंभावी है और इस आशा से कि यह रियासती जनता तथा देश के व्यापक हित में होगा, चारों शासक वृहद राजस्थान संघ बनाने में सहमत हो गये।

    सक्षम राज्यों का राजस्थान में विलय

    18 अप्रेल 1948 को संयुक्त राजस्थान का उद्घाटन करने के बाद दिल्ली लौटकर नेहरू ने पटेल को पत्र लिखा कि मेरे उदयपुर प्रवास के दौरान प्रजामण्डल के कई नेताओं ने प्रबल इच्छा प्रकट की है कि जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर को यूनाईटेड स्टेट्स ऑफ राजस्थान में मिलाया जाये। नेहरू ने अपने पत्र में राजस्थान के लोगों की उस मांग का भी उल्लेख किया जो सिरोही राज्य को राजस्थान में मिलाये जाने के सम्बन्ध में थी। जवाब में सरदार पटेल ने नेहरू को लिखा कि जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर का राजस्थान में विलयन निःसंदेह एक आदर्श स्थिति है किंतु यह तभी संभव है जब इन राज्यों के लोग स्वयं इस कार्य के लिये आगे आयें। तेजी से बदलते राष्ट्रीय परिदृश्य एवं पाकिस्तान के शत्रुवत् व्यवहार के कारण इन राज्यों को स्वाधीन भारत के अंतर्गत स्वतंत्र रखा जाना संभव नहीं रह गया था। जोधपुर, बीकानेर तथा जैसलमेर की सीमायें पाकिस्तान के साथ लगती थीं। इस सीमा से भविष्य में किसी भी समय आक्रमण होने का खतरा बना हुआ था।यह समस्त क्षेत्र रेगिस्तानी था। आर्थिक संसाधनों की दृष्टि से भी इस क्षेत्र में विपन्नता थी। संचार के साधन भी पर्याप्त नहीं थे। इस कारण भारत सरकार ने एकीकरण से शेष बचे तीन सक्षम राज्यों- जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर एवं चौथे छोटे राज्य जैसलमेर को संयुक्त राजस्थान में मिलाकर वहत् राजस्थान के निर्माण करने का निर्णय लिया।

    इन राज्यों के शासकों को पूर्व में दिये गये वचनों के कारण ऐसा करना सरल नहीं था फिर भी मेनन को विश्वास था कि कोई हल निकल ही आयेगा। मेनन का विचार था कि इन तीनों सीमावर्ती राज्यों को कच्छ के साथ जोड़कर केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया जाये जिस पर चीफ कमिश्नर का नियंत्रण हो। ऐसा करने से पाकिस्तान की सीमाओं से लगने वाला पूरा क्षेत्र केन्द्रीय शासन के अधीन हो जायेगा। यदि इन राज्यों को राजस्थान में मिलाया गया तो सीमाओं की रक्षा का विशाल व्यय प्रदेश पर आ पडे़गा तथा यह राजस्थान पर बड़ा भारी दबाव होगा। इन राज्यों का विशाल क्षेत्र अविकसित था अतः इन राज्यों को राजस्थान को न दिया जाकर भारत सरकार अपने पास रखे और इन राज्यों की विकास परियोजनाओं के लिये सहायता करे।

    नेहरू ने भी इस सम्बन्ध में पटेल को लिखा कि पनिक्कर ने सुझाव दिया है कि इस सीमावर्ती पट्टी को केन्द्र सरकार अथवा हमारे रक्षा मंत्रालय के अधीन रखा जा सकता है तथा यह सुझाव मानने योग्य है। राष्ट्रीय सुरक्षा तथा आर्थिक विकास, दोनों ही दृष्टि से इन राज्यों को एक केंद्र शासित क्षेत्र के अधीन रखा जाना उचित जान पड़ता था किंतु मेनन की इस योजना को जयनारायण व्यास व अन्य नेताओं ने स्वीकार नहीं किया। इस योजना के मित्र कम थे और शत्रु अधिक। अतः इस विचार को छोड़ देना पड़ा। मेनन ने पटेल को सुझाव दिया कि इन चारों राज्यों को राजस्थान में मिला दिया जाये। पटेल ने इस विचार का स्वागत किया। पटेल 14 जनवरी 1949 को उदयपुर जाने वाले थे। उन्होंने मेनन से कहा कि मैं इस यात्रा के दौरान ही वृहद राजस्थान के निर्माण की घोषणा करना चाहूंगा, अतः मेनन राज्यों के राजाओं से बात करके उन्हें इस कार्य के लिये तैयार करें।


    जयपुर राज्य का विलय

    जयपुर के महाराजा मानसिंह विलय के प्रस्ताव से प्रसन्न नहीं थे। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र और उत्तराधिकारी राजकुमार भवानीसिंह को अपने एक पत्र में लिखा कि मुझे डर है कि यदि राजपूताना का कोई राजा त्याग और बलिदान करने के लिये नेतृत्व करने आगे नहीं आया तो प्रदेश का भविष्य अंधकार में है। इस पत्र में उन्होंने उदयपुर, जोधपुर और बीकानेर के राजाओं की कमजारियों पर भी प्रकाश डाला। पर महाराजा स्वयं आगे आने से झिझके। महारानी गायत्री देवी के अनुसार यद्यपि जय ने मुझे यह समझाने का प्रयास किया था कि वृहत्तर राजस्थान में मिलना क्यों आवश्यक है किंतु मुझे उनका जयपुर राज्य का शासक न रहने का विचार अच्छा नहीं लगा। वृहत्तर राजस्थान में जयपुर राज्य का विलय जय के लिये राजनीतिक एवं ऐतिहासिक रूप से अपरिहार्य था। वह केवल अकेले ही राजपूत रियासत के शासक नहीं बने रह सकते थे। उन्हें जयपुर का शासन छोड़ने तथा अपनी प्रजा के प्रति व्यक्तिगत जिम्मेदारी त्याग देने से घृणा थी किंतु उन्हें पता था कि देश का हित उनकी व्यक्तिगत भावना से ऊपर है।

    11 जनवरी 1949 को वी. पी. मेनन ने जयपुर राज्य के महाराजा तथा दीवान सर वी. टी. कृष्णामाचारी से राज्य के विलय पर वार्त्ता की। कृष्णामाचारी बड़े राज्यों के विलय के पक्ष में नहीं थे। उनका तर्क था कि ऐसा करने से राजस्थान राज्य में राजपूतों की प्रधानता बनी रहेगी जैसे पूर्वी पंजाब में सिक्खों की प्रधानता थी। ऐसा करना देश के लिये हितकर प्रमाणित नहीं होगा। कृष्णामाचारी राजस्थान को तीन इकाइयों में विभाजित रखने के पक्ष में थे। उनके अनुसार संयुक्त राजस्थान यथा स्थिति में रहे। दूसरी इकाई में जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर राज्यों को रखा जाये और इसे पश्चिमी राजस्थान संघ का नाम दिया जाये। राजस्थान की तीसरी इकाई जयपुर, अलवर और करौली रियासतों को मिलाकर बनाई जाये। भरतपुर और धौलपुर राज्यों को उत्तरप्रदेश में सम्मिलित कर दिया जाये। कृष्णामाचारी का अनुमान था कि भरतपुर और धौलपुर के शासक जाट होने के कारण संयुक्त प्रांत में मिलना चाहेंगे।

    मेनन इस सुझाव से सहमत नहीं हुए। इस समय तक समाजवादी दल द्वारा राजस्थान के निर्माण के लिये आंदोलन आरंभ करने की घोषणा की जा चुकी थी। मेनन राजस्थान के निर्माण का श्रेय उन्हें नहीं देना चाहते थे तथा उनका आंदोलन आरंभ होने से पहले ही राजस्थान के निर्माण की गुत्थी सुलझा लेना चाहते थे। विचार विमर्श के दौरान महाराजा जयपुर ने शर्त रखी कि उन्हें इस नये राज्य का वंशानुगत राजप्रमुख बनाया जाये व जयपुर नये राज्य की राजधानी हो। मेनन ने महाराजा को जवाब दिया कि इन बातों पर तब विचार किया जा सकता है जब इन मुद्दों पर विस्तार से वार्त्ता की जायेगी। मेनन का तात्कालिक उद्देश्य राजाओं को उनके राज्य के राजस्थान संघ में विलय के लिये सैद्धांतिक तौर पर सहमत करने का था। इससे सरदार 14 जनवरी को वृहद राजस्थान के निर्माण की योजना की घोषणा कर सकते थे। मेनन ने एक प्रारूप तैयार किया जिसे महाराजा और उनके दीवान, दोनों ने स्वीकार कर लिया। इसका मसौदा तार द्वारा जोधपुर और बीकानेर के महाराजाओं को भेज दिया गया। उसी शाम जोधपुर के महाराजा ने इस घोषणा की सहमति के बारे में मेनन को सूचित किया। बीकानेर के महाराजा ने भी उस प्रारूप पर अपनी सहमति जताते हुए मेनन को वापस तार भिजवाया।

    12 जनवरी 1949 को मेनन ने उदयपुर जाकर महाराणा से बात की। महाराणा ने स्वीकृति दे दी। 14 जनवरी 1949 को पटेल ने उदयपुर में एक विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए वृहत् राजस्थान के निर्माण की घोषणा कर दी। सरदार पटेल ने अपने भाषण में कहा कि जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं जैसलमेर के राजा सैद्धांतिक रूप से राजस्थान संघ में एकीकरण के लिये सहमति दे चुके हैं। अतः वृहद राजस्थान का निर्माण शीघ्र ही सच्चाई में बदल जायेगा। यद्यपि इस योजना के विस्तार में जाना अभी शेष है। इस घोषणा का पूरे देश में स्वागत किया गया। इस घोषणा के बाद रियासती मंत्रालय ने वृहद राजस्थान के निर्माण पर कार्य करना आरंभ किया। इस कार्य से सम्बद्ध तीन पक्षों से अलग-अलग तथा साथ बुलाकर बात की गयी। पहला पक्ष जयपुर, जोधपुर, बीकानेर तथा जैसलमेर राज्यों के राजाओं तथा उनके सलाहकारों का था। दूसरा पक्ष संयुक्त राजस्थान संघ में पहले से ही सम्मिलित राज्यों के राजाओं का था तथा तीसरा पक्ष हीरालाल शास्त्री, जयनारायण व्यास, माणिक्यलाल वर्मा और गोकुलभाई भट्ट आदि लोकप्रिय नेताओं का था।

    वृहत राजस्थान का राजप्रमुख, मंत्रिमण्डल, प्रशासकीय स्वरूप तथा राजधानी आदि विषयों पर विचार करने हेतु 3 फरवरी 1949 को रियासती विभाग के तत्वावधान में दिल्ली में एक बैठक आयोजित की गयी जिसमें रियासती विभाग के सचिव वी. पी. मेनन, प्र्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोकुलभाई भट्ट, संयुक्त राजस्थान के प्रधानमंत्री माणिक्यलाल वर्मा, जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री जयनारायण व्यास तथा जयपुर राज्य के मुख्य सचिव (मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री) हीरालाल शास्त्री ने भाग लिया।

    बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह को जीवन पर्यन्त राजप्रमुख बनाया जाये। जोधपुर और बीकानेर के शासक इसके पक्ष में नहीं थे किंतु वे भारत सरकार के दबाव का सामना नहीं कर सके किंतु महाराणा भूपालसिंह ने इसे स्वीकार नहीं किया। महाराणा ने स्वयं को राजप्रमुख बनाये जाने का दावा किया। राजपूताना के अन्य शासकों, जननेताओं और भारत सरकार को महाराणा को राजप्रमुख बनाने में कोई आपत्ति नहीं थी किंतु महाराणा शारीरिक दृष्टि से अपाहिज थे और स्वतंत्रता पूर्वक बाहर आ-जा नहीं सकते थे। भावनात्मक आधार पर लोकप्रिय नेताओं ने सुझाव दिया कि महाराणा को संघ के सामान्य प्रशासन से अलग कोई अलंकृत स्थिति प्रदान कर दी जाये तथा उन्हें महाराज शिरोमणि की उपाधि दी जाये। महाराणा ने इसे स्वीकार नहीं किया और जोर डाला कि उन्हें महाराज प्रमुख कहा जाये। तब यह निश्चय किया गया कि महाराणा को महाराज प्रमुख बनाया जाये किंतु यह पद तथा उन्हें दिये जाने वाले भत्ते उनकी मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जायेंगे। महाराणा को आश्वस्त किया गया कि उन्हें समारोहों और उत्सवों पर 21 तोपों की सलामी वाले राजाओं की श्रेणी में शामिल किया जायेगा। जयपुर के महाराजा भी महाराणा के सम्मान को देखते हुए स्वेच्छा से इस पर सहमत हो गये। महाराणा भूपालसिंह ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया कि उनका पद तथा उनको दिये जाने वाले भत्ते उनकी मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जायेंगे। उन्हें महाराज प्रमुख बना दिया गया। करणीसिंह ने भारत सरकार के इस काम की तुलना अंग्रेजों द्वारा राजाओं को तोपों की सलामी के रूप में दिये जाने वाले लालच से की है- बहुत से मामलों में आजीवन राजप्रमुख का पद देना एक शासक के लिये विलय स्वीकार करने का बहुत बड़ा प्रलोभन था। कुछ राजाओं को जिनका स्वास्थ्य खराब था, विशेष प्रिवीपर्स दी गयी।

    शासकों के प्रिवीपर्स का निर्धारण

    शासकों के प्रिवीपर्स का निर्धारण करते समय लोकप्रिय नेताओं द्वारा सुझाव दिया गया कि जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर के राज्य इंदौर के समान ही स्थिति रखते थे जिसके महाराजा को 15 लाख रुपये प्रिवीपर्स तथा 2.5 लाख रुपये उपराजप्रमुख के पद के भत्ते के रूप में दिये गये थे। अतः जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर के शासकों को 17.5 लाख रुपये दिये जायें तथा जयपुर के महाराजा को 5.5 लाख रुपये राजप्रमुख पद के भत्ते के रूप में दिये जायें। अंत में बीकानेर को 17 लाख रुपये, जोधपुर को 17.5 लाख रुपये तथा जयपुर को 18 लाख रुपये प्रिवीपर्स देना निश्चित हुआ। राजप्रमुख को 5.5 लाख रुपये वार्षिक भत्ता दिया जाना निश्चित किया गया।

    सलाहकारों की नियुक्ति

    3 फरवरी की बैठक में निश्चित किया गया कि मंत्रिमंडल को सलाह देने के लिये केन्द्र सरकार से दो या तीन सलाहकार नियुक्त किये जायें तथा भावी वृहद राजस्थान राज्य की राजधानी का मसला सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा सुलझाया जाये। बैठक में यह भी तय किया गया कि राज्य के मंत्रिमण्डल में नौ से अधिक मंत्री नहीं होंगे, उनमें एक जागीरदारों का प्रतिनिधि होगा। नये चुनाव होने तक राजस्थान सरकार पर भारत सरकार का नियंत्रण रहना निश्चित किया गया। राजाओं ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया किंतु जन नेताओं ने पहले इसका विरोध किया पर समय रहते वे भी इससे समहत हो गये। मंत्रिमंडल पर नियंत्रण रखने के लिये राज्य सरकार के कतिपय महत्त्वपूर्ण विभागों में दो या तीन आई.सी. एस. अधिकारियों को परामर्शदाता के रूप में नियुक्त किया जाना निश्चित किया गया। यदि किसी विषय पर मंत्रिमंडल और सलाहकारों के मध्य मतभेद हो जाये तो इसका अंतिम निर्णय भारत सरकार द्वारा करवाया जाना था।

    उपराज प्रमुखों की नियुक्ति

    3 फरवरी की बैठक में निश्चित किया गया कि प्रस्तावित संघ में जोधपुर तथा कोटा के शासकों को वरिष्ठ उपराजप्रमुख और बूंदी तथा डंूगरपुर के शासकों को कनिष्ठ उपराजप्रमुख बनाये जाये। उपराजप्रमुखों का कार्यकाल पाँच वर्ष निश्चित किया जाये किंतु जयुपर के शासक को आजीवन राजप्रमुख बनाया जाये।

    जयपुर नरेश द्वारा प्रसंविदा पर हस्ताक्षर

    इन समस्त विषयों के निर्धारण के पश्चात् जयपुर राज्य ने प्रस्तावित वृहत राजस्थान में विलय की अनुमति प्रदान कर दी तथा प्रसंविदा पर हस्ताक्षर कर दिये। वृहत राजस्थान में विलय के समय जयपुर राज्य ने राजस्थान सरकार को 4 करोड़ 58 लाख रुपये की पोते-बाकी संभालाई।


    बीकानेर राज्य का राजस्थान में विलय

    बीकानेर नरेश को पूरा विश्वास था कि वह स्वतंत्र भारत में बीकानेर रियासत का अलग अस्तित्व बनाये रखने में सफल हो जायेंगे किंतु जब उदयपुर, जयपुर और जोधपुर नरेशों ने राजस्थान में विलय की स्वीकृति दे दी तो स्थिति पलट गयी। बीकानेर नरेश ने अपनी रियासत को विलय से बचाने के लिये खजाने की थैलियों के मुँह खोल दिये। पैसा पानी की तरह बह चला। परिणामतः बीकानेर में 'विलीनीकरण विरोधी मोर्चा' खड़ा हो गया। अनेक डॉक्टर, प्रोफेसर, वकील, भूतपूर्व न्यायाधीश व अवकाश प्राप्त उच्चाधिकारी इस मोर्चे में शामिल हो गये। इस मोर्चे द्वारा कई अजीबोगरीब कदम उठाये गये। उनकी मान्यता थी कि युद्ध एवं प्यार में उचित और अनुचित नहीं देखा जाता।

    इस मोर्चे द्वारा राजपूत सभा के नाम से जागीरदारों का एक संगठन खड़ा किया। इस समय प्रदेश के अन्य राज्यों 
    में भी जागीरदार वर्ग राजपूत समाज के माध्यम से अपने आप को संगठित करने का प्रयास कर रहा था। अतः देश में यह धारणा बनती जा रही थी कि इससे एकीकरण में रुकावट खड़ी हो सकती है। मोर्चे ने मुसलमानों को अपने राजा के प्रति वफादारी प्रदर्शित करने का आह्वान किया और इस कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिये मुस्लिम लीग के मुखपत्र डॉन के संपादक को बीकानेर राज्य में आमंत्रित किया। उसने मुस्लिम क्षेत्रों और मस्जिदों में लीगी प्रचार किया। इस संपादक को बीकानेर रियासत में लीग की विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने का सुंदर अवसर मिला जिसका लाभ उठाकर उसने मुसलमानों को इस बात के लिये प्रेरित किया कि वे अपने हितों की सुरक्षा के लिये पृथक निर्वाचन क्षेत्र और पृथक मताधिकार की मांग को बुलंद करें।

    मोर्चे ने बाकी बचे तबकों के लिये राजकीय डूंगर कॉलेज के प्रोफेसर श्री विद्याधर शास्त्री के नेतृत्व में प्रजा सेवक संघ नामक संस्था का निर्माण करवाया तथा बीकानेर लोकसेवक संघ खड़ा किया जिसके सर्वेसर्वा रियासत के भूतपूर्व न्यायाधीश बद्रीप्रसाद व्यास थे। राजपूत सभा का मोर्चा कोई बहुत बड़ी सफलता अर्जित नहीं कर सका क्योंकि इसमें जागीरदारों का वर्चस्व था, ग्रामीण जनता इनसे त्रस्त एवं आतंकित रहती थी। मुस्लिम मोर्चा भी महाराजा के लिये विशेष कुछ नहीं कर सका क्योंकि डॉन के संपादक ने इस अवसर का लाभ महाराजा के पक्ष में प्रचार करने की बजाय लीगी विचारधारा के प्रचार में किया और पृथक निर्वाचन क्षेत्र व पृथक मताधिकार की मांग करवाई जो महाराजा के खिलाफ पड़ती थी। ऐसा कर पाना इसलिये भी संभव नहीं था क्योंकि अत्यंत निकट भविष्य में ही उत्तरदायी सरकार के लिये चुनाव होने वाले थे।

    प्रजा सेवक संघ का मोर्चा इसलिये विफल हो गया क्योंकि इसके संचालक प्रोफेसर साहब केवल विद्यार्थियों में अपनी छाप छोड़ पाये थे किंतु इन विद्यार्थियों को मतदान का अधिकार ही प्राप्त नहीं था। लोक सेवक मोर्चे ने अपने आप को अछूतोद्धार विरोधी गतिविधियों से जोड़ लिया जिससे लोगों में उसकी दाल गली नहीं और जनता में महाराजा के प्रति आस्था का पुनर्निर्माण नहीं किया जा सका।

    नवम्बर 1948 में रियासती मंत्रालय और इसके प्रतिनिधि वी. पी. मेनन द्वारा बातचीत चालू की गयी। 6 दिसम्बर 1948 को मेनन बीकानेर आये। उन्होंने राज्य के मुख्य नागरिकों से मिलकर बीकानेर के राजस्थान में एकीकरण के सम्बन्ध में उनकी इच्छा मालूम की। बीकानेर के लालगढ़ महल के दरबार हॉल में यह बैठक हुई। बैठक में बीकानेर के प्रधानमंत्री सी. एस. वेंकटाचार भी उपस्थित थे। वी. पी. मेनन ने बैठक में उपस्थिति लोगों को राज्य के एकीकरण से होने वाले लाभों से परिचित करवाया। उन्होंने कहा कि इससे प्रशासन के व्यय में कमी आयेगी। पं. नेहरू और सरदार पटेल जैसे नेता ही इस बात का निर्णय कर सकते हैं कि लोगों की भलाई किसमें है। जब ये नेता कहते हैं कि रियासत का एकीकरण यहाँ के लोगों के हित में है तो वह वास्तव में हित में ही है और यहाँ के लोगों को उनके कथन का विश्वास करना चाहिये।

    बीकानेर राज्य के वकील पं. लक्ष्मीनारायण ने इस बैठक में यह मुद्दा उठाया कि एकीकरण के सम्बन्ध में राज्य में जनमत संग्रह करके जनता की राय मालूम करना उचित होगा। इस पर मेनन ने यह कहकर इसका विरोध किया कि किसी भी अन्य राज्य में ऐसी मांग नहीं की गयी है। एक अन्य वकील पं. सूरजकरण आचार्य ने मेनन से पूछा कि क्या एकीकरण का मामला पहले ही तय किया जा चुका है या अभी सलाह लेनी बाकी है? इस पर मेनन ने जवाब दिया कि यह मामला पहले ही तय किया जा चुका है और भारत सरकार एकीकरण की योजना को पूरा करेगी। श्री मेनन ने यह भी कहा कि सुविधा के लिये ही आरंभ में भारत सरकार राज्यों का भारतीय संघ में सम्मिलन करना चाहती थी।

    भारत सरकार 560 रियासतों को स्वतंत्र छोड़ना नहीं चाहती थी। भारतीय संघ में सम्मिलित होने के समझौतों का उल्लेख करते हुए वी. पी. मेनन ने कहा कि कोई भी जनतांत्रिक सरकार इस प्रकार के आश्वासनों से देश का भविष्य नहीं बंाध सकती। जब यह प्रश्न किया गया कि जब इस मामले में एकतरफा फैसला किया जा चुका है तो इस पर महाराजा के हस्ताक्षर कराने क्यों जरूरी हैं? मेनन ने बताया कि कानूनी दृष्टि से हस्ताक्षर कराने जरूरी हैं।

    बैठक के पश्चात् मेनन ने महाराजा से बीकानेर राज्य के राजस्थान में एकीकरण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने का निवेदन किया तो महाराजा ने हस्ताक्षर करने से स्पष्ट मना कर दिया। महाराजा ने मेनन को शर्तों की एक सांकेतिक सूची दी और कहा कि यदि ये राजा एकीकरण के लिये सहमत हो जायें तो आप इन शर्तों को मान लें। मेनन सहमत हो गये। मेनन ने महाराजा से दिल्ली चलने का आग्रह किया। दिल्ली में भी महाराजा ने पटेल के समक्ष दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने में अपनी अनिच्छा प्रकट की।

    कहा जाता है कि सरदार पटेल ने महाराजा को बहावलपुर-बीकानेर व्यापार संधि और चने की निकासी के परमिट जारी करने के घोटालों की जांच करने वाली महाजन कमेटी की रिपोर्ट की अदालती जांच करवाने की बात कही तो महाराजा एकीकरण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने को सहमत हो गये।

    महाराजा द्वारा तैयार की गयी एक गोपनीय सूची में महाराजा ने लिखा है कि बीकानेर को अलग रहने योग्य इकाइयों की श्रेणी में सम्मिलित किया गया है। अब तक यह ऐसा ही माना जाता रहा है। एकाएक यह परिवर्तन कैसे हो गया है? यह बलपूर्वक नियंत्रण क्यों?

    सूची से पता चलता है कि कि अखिल भारतीय रियासती जनता की राजपूताना प्रादेशिक परिषद ने एकीकरण की मांग पर बल दिया था। संयोग से उसमें बीकानेर का एक ही प्रतिनिधि रघुबर दयाल गोयल था और वह भी बीकानेरी नहीं था। समाजवादी पार्टी, जिसका कोई महत्त्व नहीं था, ने बीकानेर राज्य को पूर्वी पंजाब में मिलाने की मांग की। लोक परिषद, राज्य प्रजा सेवक संघ, करणीपुत्र संघ, अकाली जत्था तथा ऐसी ही अन्य अल्प संख्यक जातियों के संगठन बीकानेर राज्य के राजस्थान में विलय से सहमत नहीं थे केवल रघुवरदयाल गोयल ही बीकानेर के विलय के पक्ष में थे किंतु वे बाहर के आदमी थे। प्रजा परिषद की जाट लॉबी भी बीकानेर राज्य को अलग इकाई बनाये रखने के पक्ष में थी। बीकानेर रियासत को अलग इकाई बनाए रखने के महाराजा सादूलसिंह के तमाम प्रयत्न नाकामयाब होते जा रहे थे। ऐसे समय में जयपुर और जोधपुर नरेशों की अपने-अपने राज्यों को नए 'राजस्थान' राज्य में विलीन करने की स्वीकृति की घोषणा के बाद बीकानेर नरेश एकदम अलग-थलग पड़ गये थे।

    बीकानेर का राजस्थान में विलय

    5 दिसम्बर 1948 और 21 दिसम्बर 1948 को सरदार पटेल एवं मेनन के साथ बीकानेर महाराजा की आगे की बातचीत हुई। फरवरी 1949 में एक बैठक के में महाराजा ने रियासती मंत्रालय के समक्ष कुछ मांगें रखीं। उच्च न्यायालय, रेलवे तथा सेना के प्रशासनिक मुख्यालय बीकानेर में रखे जायें। बीकानेर में आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, सिविल अभियांत्रिकी महाविद्यालय तथा कृषि महाविद्यालय खोले जायें। महाराजा द्वारा बीकानेर राज्य के लिये अगले 20 साल हेतु बनाये गये विकास कार्यक्रम जिसमें चिकित्सा संस्थाएं, शैक्षणिक संस्थाएं, ग्रामीण विकास आदि सम्मिलित हैं, को छोटा न किया जाये। बीकानेर राज्य द्वारा एकीकरण से पहले जो कोष संचित किया गया है उसे बीकानेर राज्य की जनता पर व्यय किया जाये। एकीकरण से पूर्व जिन रियासती कर्मचारियों को पेंशन स्वीकृत की गयी हैं, उन्हें बनाये रखा जाये। बीकानेर राज्य के लोगों को राजस्थान राज्य की सेवाओं में समुचित भागीदारी दी जाये। मेनन ने इनमें से अधिकतर मांगों पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया।

    17 फरवरी 1949 को आयोजित इस बैठक में महाराजा सादुलसिंह ने मेनन से यह मांग भी की कि सादुलनगर के बाजार में उनकी (सादुलसिंह की) मूर्ति लगायी जाये। मेनन ने इन मांगों को सैद्धांतिक रूप से मान लिया। मेनन द्वारा लगभग समस्त शर्तें मान लिये जाने पर महाराजा सादुलसिंह ने वृहत्तर राजस्थान के निर्माण के लिये तैयार की गयी प्रसंविदा (Covenant) पर हस्ताक्षर कर दिये। वृहत राजस्थान के उद्घाटन समारोह से ठीक एक दिन पहले महाराजा ने सरदार पटेल को पत्र लिखकर सूचित किया कि मेरा परिवार विगत पाँच शताब्दियों से बीकानेर से अपने रक्त सम्बन्ध से जुड़ा रहा है। मेरे लिये यह दिन प्रसन्नता मनाने का नहीं है अपितु यह अवसर मेरे लिये अत्यंत अवसाद और दुख का दिन है। विलय के समय बीकानेर रियासत द्वारा संयुक्त राजस्थान को 4 करोड़ 87 लाख रुपये की नगद पोते-बीकी सम्भलाई गयी। यह रकम राजस्थान की समस्त रियासतों द्वारा दी गयी रकमों में सर्वाधिक थी। इसके अतिरिक्त बीकानेर स्टेट की सारी सम्पत्ति भी सरकार को सौंपी गयी। केंद्रीय सरकार को सौंपी गयी लगभग एक करोड़ की इस सम्पत्ति में रेलवे लाइन, रेल के डिब्बे, इंजन आदि थे।


    जोधपुर राज्य का राजस्थान में विलय

    जोधपुर नरेश हनवंतसिंह को आशंका थी कि राजाओं से जो भी वायदे केंद्र सरकार कर रही है, उन वायदों से वह समयांतर में मुकर जायेगी। महाराजा को आशंका थी कि कालांतर में सक्षम इकाईयों को भी समाप्त कर दिया जायेगा। इन आशंकाओं के कारण ही वे अंगीकार पत्र पर हस्ताक्षर करने में अंतिम समय तक झिझकते रहे। जब परिस्थितियों का दबाव बढ़ने लगा तो उन्होंने यह मानस बनाया कि अपने राज्य व प्रजा के हितार्थ केन्द्र सरकार से जितनी भी सुविधायें प्राप्त की जा सकें, कर ली जायें। महाराजा जानते थे कि केंद्रीय नेता देशी राज्यों में अपने स्थानीय पिछलग्गुओं द्वारा आंदोलन व दंगे करवाकर ऐसी स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं जिससे केन्द्र सरकार को हस्तक्षेप करके शासन अपने हाथ में लेने का औचित्य व अवसर प्राप्त हो जाये। उदयपुर, ग्वालियर व इंदौर जैसे सम्पन्न राज्यों के राजाओं द्वारा आत्मसमर्पण किये जाने के उपरांत भी महाराजा हनवंतसिंह ने अपने मनोबल को बनाये रखा। ध्रांग्धरा के राजा मयूरध्वजसिंह, जयपुर नरेश मानसिंह एवं बीकनेर नरेश सादूलसिंह ने हनवंतसिंह को समझाया कि माउंटबेटन, पटेल तथा रियासती मंत्रालय ने जब लिखकर दे दिया है तो किसी भी राजा को अपने राज्य, उसकी प्रजा व स्वयं अपने हितों के प्रति आश्वस्त हो जाना चाहिये परंतु हनवंतसिंह का कथन था कि नेताओं पर भरोसा नहीं किया जा सकता। वे अपने वायदों से कभी भी मुकर सकते हैं।

    जोधपुर राज्य का सेंदड़ा सम्मेलन

    जेाधपुर महाराजा ने 30 अक्टूबर 1947 को सेंदड़ा में रावत एवं मेर जातियों का सम्मेलन आयोजित किया। महाराजा पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने राज्य को राजस्थान से अलग इकाई बनाये रखने के लिये अपना समर्थन बढ़ाने व शक्ति जुटाने के उद्देश्य से इस सम्मेलन का आयोजन किया था। जोधपुर राज्य के उच्च रक्तवर्णी राजपूतों को महाराजा का यह कदम पसंद नहीं आया। महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश एवं शोध संस्थान जोधपुर में महाराजा के निजी सविच की एक फाइल में गुप्त पत्र रखा हुआ जो महाराजा के किसी निकटवर्ती राजपूत सरदार द्वारा लिखा गया प्रतीत होता है। इस पत्र में महाराजा को उलाहना दिया गया है कि जोधपुर राज्य में तमाम क्षुद्र जातियां राजपूतों में से ही निकली हुई हैं। यदि महाराजा उनके साथ बैठकर भोजन कर लें तो उनका राजस्थान पक्का हो जायेगा लेकिन आपकी प्रजा को यह मंजूर नहीं है। यदि आप प्रजा के विपरीत आचरण करेंगे तो आपका भी वही हाल होगा जो लोहारू, जूनागढ़ तथा कश्मीर के शासकों का हुआ। महाराजा को चाहिये कि वे अपने सलाहकारों को बदलें। अपने भाई हिम्मतसिंह को सरदार पटेल व नेहरू को सौंप दें तथा अपने भाई हरिसिंह को कोटवाली से काम सिखाना आरंभ करें ताकि वे राजकाज के कामों को अच्छी तरह समझ लें।

    जोधपुर राज्य का विलय

    14 जनवरी 1949 को उदयपुर में वृहत राजस्थान की घोषणा करने के बाद 25 जनवरी 1949 को सरदार पटेल ने जोधपुर में आयोजित एक आम सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया अभी चल रही है। हमें आशा है कि यह प्रक्रिया शीघ्र ही पूर्ण कर ली जायेगी तथा अति शीघ्र हम उस एकता को प्राप्त कर लेंगे जिसे इतिहास में शायद ही कभी प्राप्त किया गया हो। एक संघ बनाया गया है किंतु बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर तथा जयपुर अभी इससे बाहर हैं। यद्यपि अभी इन राज्यों से समझौता वार्त्ता चल रही है किंतु यह निर्णय कर लिया गया है कि यूनाईटेड राजस्थान जितनी शीघ्र संभव हो सके, अस्तित्व में आयेगा। राजस्थान के राजाओं ने एकता के लिये बहुत कुछ किया है तथा इस कार्य में हमारी सहायता की है कि हम स्वतंत्रता को फिर से न खो दें तथा हम अपनी कमजोरी से विदेशी सत्ता की गुलामी को फिर से न ले आयें।

    7 अप्रेल 1949 को महाराजा जोधपुर ने राजस्थान के महाराज प्रमुख को दिल्ली से तार किया कि मैं हनुवंतसिंह, जोधपुर का महाराजा, हस्ताक्षरित प्रसंविदा के अनुसार मारवाड़ रियासत आपके सुपुर्द कर रहा हूँ। राजस्थान के राजप्रमुख ने पी. एस. राउ को तार भेजकर निर्देशित किया कि आप जोधपुर रियासत का प्रशासन तत्काल प्रभाव से ग्रहण कर लें। पी. एस. राउ ने 7 अप्रेल 1949 को जोधपुर राज्य के प्रशासन का कार्यभार संभाल लिया। विलय के समय जोधपुर राज्य ने राजस्थान सरकार को 4 करोड़ 75 लाख रुपये की पोते-बाकी संभालाई।


    वृहत् राजस्थान का निर्माण

    मुख्यमंत्री के पद को लेकर विवाद

    14 फरवरी 1949 को गोकुलभाई भट्ट और माणिक्यलाल वर्मा ने सरदार पटेल से भेंट की। हीरालाल शास्त्री को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाने का निश्चय किया गया। 15 फरवरी 1949 को दिल्ली में राजपूताना कांग्रेस की बैठक में शास्त्री को सर्वसम्मति से पार्टी का नेता चुना गया। इस निर्णय पर सर्वत्र आश्चर्य व्यक्त किया गया क्योंकि राजनैतिक क्षेत्रों में ऐसी आशा थी कि नये राज्य के मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास होंगे। व्यास उस समय तक राजस्थान में सबसे प्रसिद्ध नेता थे, जिन्हें सब लोग जानते थे और जिनका प्रांत में आदर था। वे अ.भा. देशी राज्य लोकपरिषद के वर्षों तक महासचिव रहे थे जिसके अध्यक्ष नेहरू थे, अतः व्यास नेहरू के निकटतम सहयोगी माने जाते थे।

    जयनारायण व्यास को नहीं चुने जाने का कारण यह बताया जाता है कि नयी व्यवस्था में पटेल राजाओं के साथ संघर्ष के पक्ष में नहीं थे जबकि व्यास का राजाओं के साथ निरंतर संघर्ष रहा था। स्वाधीनता के पश्चात् भी व्यास के क्रिया कलापों से राजा लोग खुश नहीं थे। पटेल भी व्यास के बारे में ठीक राय नहीं रखते थे। जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री के रूप में व्यास का केंद्र से भेजे गये सलाहकारों से सदैव मतभेद रहा। दूसरी ओर महाराजा जयपुर तथा घनश्यामदास बिड़ला, हीरालाल शास्त्री के पक्ष में थे और बिड़ला का पटेल पर प्रभाव था।

    1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से जयपुर के प्रजामंडल को अलग रखने एवं सिरोही के सम्बन्ध में गोकुलभाई भट्ट के साथ तुष्टिकरण का रवैया अख्तियार करने के कारण जयपुर सहित प्रदेश के प्रायः समस्त कांग्रेस कार्यकर्ता हीरालाल शास्त्री से नाराज थे। कांग्रेसजनों में जयनारायण व्यास सर्वाधिक लोकप्रिय थे। अतः कांग्रेसजन चाहते थे कि जयनारायण व्यास ही प्रधानमंत्री बनें पर सरदार पटेल के दबाव से प्रदेश कांग्रेस ने दिल्ली में चली कई दिनों की बैठक के बाद 'अगर-मगर' के साथ शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाने के प्रस्ताव पर सहमति दे दी। शास्त्री के नेता पद पर चुने जाने के ढंग पर प्रांत भर में आलोचना हुई। इसे एक फासिस्टी चुनाव कहा गया, जिससे लोकतंत्र की हत्या हुई। कांग्रेसी सदस्यों को राय दी गई कि यदि वे चाहें तो अब भी भूल सुधार कर सकते हैं। शास्त्री का विरोध उस समय और भी बढ़ गया जब 19 फरवरी 1949 को गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी ने जयपुर में यह घोषणा की कि राजस्थान की राजधानी जयपुर बनेगी।

    अन्य राज्यों में इस निर्णय पर बड़ा रोष था कि जयपुर ने समस्त कुछ हथिया लिया है। इस अनिश्चय को दूर करने के लिये राजपूताना कांग्रेस कमेटी के 43 सदस्यों ने प्रदेश कांग्रेस की बैठक बुलाने की मांग की। 28 और 29 मार्च 1949 को किशनगढ़ में यह बैठक हुई। इसमें अजमेर और राजधानी के प्रश्न को लेकर बहुत वाद विवाद हुआ। अंत में एक प्रस्ताव द्वारा शास्त्री को मंत्रिमंडल बनाने की अनुमति दी गयी।

    राजधानी को लेकर विवाद

    राजधानी को लेकर विवाद उत्पन्न होने पर राजधानी का निर्णय सरदार पटेल पर छोड़ा गया। पटेल ने राजधानी निर्धारित करने हेतु एक विशेष समिति का गठन किया। मार्च 1949 में आई.सी. एस. अधिकारी बी. आर. पटेल की अध्यक्षता में कैपीटल कमेटी गठित की गयी। इस समिति में उप महानिदशेक स्वास्थ्य सेवाएं ले. कर्नल टी. सी. पुरी तथा केन्द्रीय सार्वजनिक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता श्री बी. एस. पुरी सम्मिलित किये गये। समिति को राजस्थान के नगरों में से किसी एक नगर का चुनाव प्रांतीय राजधानी के लिये करना था तथा अपनी रिपोर्ट 1 अप्रेल 1949 तक भारत सरकार को सौंप देनी थी। रियासती विभाग ने समिति के अध्ययन के लिये पाँच विषय सुझाये-

    (1.) प्रशासकीय सुविधाएं,

    (2.) भवनों की उपलब्धता,

    (3.) जलवायुवीय परिस्थितियां,

    (4.) उपलब्ध पेयजल एवं विद्युत की उपलब्धता,

    (5.) अन्य सम्बद्ध विषय जिसे समिति उचित समझे।

    इस समिति ने 17 व 18 मार्च 1949 को जयपुर का, 19 व 20 मार्च को अजमेर का, 21 व 22 मार्च को उदयपुर का तथा 23 व 24 मार्च 1949 को जोधपुर का दौरा किया। समिति ने 5 प्रमुख विषयों पर आधारित 13 बिंदुओं की विस्तृत प्रश्नावली तैयार की तथा उसे रीजनल कमिश्नर उदयपुर को भिजवा दिया।

    समिति ने जयपुर को राजधानी बनाये जाने के लिये सर्वाधिक उपयुक्त माना तथा बड़े नगरों के महत्त्व को बनाये रखने हेतु उच्च न्यायालय जोधपुर में, शिक्षा विभाग बीकानेर में, खनिज विभाग उदयपुर में तथा कृषि विभाग भरतपुर में रखने की अनुशंसा की जिसे स्वीकार कर लिया गया। हीरालाल शास्त्री ने लिखा है- 'मेरे एक दूसरे बड़े साथी ने यह प्रस्ताव भी मेरे सामने रखा कि मुख्यमंत्री भले ही मैं बना रहूं पर राजधानी जयपुर के अलावा किसी दूसरे शहर में बनवा दूं। किसी समय साथियों की यह कोशिश हुई कि राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से दूसरी जगह ले जाया जाये। हाई कोर्ट का जोधपुर में और उसकी एक बैंच का जयपुर में रखा जाना तय हो गया। बाकी विभागों का बंटवारा मैंने राजस्थान के मुख्य शहरों में जैसा हो सकता था कर दिया।'

    22 फरवरी 1949 को एक पत्रकार सम्मेलन में जयनारायण व्यास ने कहा- 'ऐसा सोचना ठीक नहीं कि जयपुर ने समस्त कुछ ले लिया है। हमें अपने आप को एक वृहद् इकाई का नागरिक मानना है। राजधानी के बारे में व्यास ने कहा कि अभी इसका निश्चय नहीं हुआ है, अजमेर के राजस्थान में विलय पर ही राजधानी की स्थायी समस्या का समाधान होगा।' उन्होंने कार्यकर्ताओं और समाचार पत्रों से संयम रखने की अपील की। जयपुर को राजधानी बनाने के लिये अजमेर का राजस्थान में विलय नहीं किया गया।

    जयपुर के राजधानी बनने की घोषणा होने के बाद अन्य नगरों की प्रजा एवं नेताओं को संतुष्ट रखने के लिये सरदार पटेल ने वक्तव्य दिया- 'राज्य के कई महत्त्वपूर्ण विभाग जयपुर से बाहर अन्य प्रमुख नगरों में स्थापित किये जायेंगे। इस बारे में पहले से ही निर्णय लिया जा चुका है कि इस सम्बन्ध में भारत सरकार द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय समस्त पक्षों को मान्य होगा। '

    जागीरदारों को मंत्रिमण्डल में सम्मिलित किये जाने का विरोध

    वृहद राजस्थान के मंत्रिमण्डल में अपने प्रतिनिधित्व को लेकर जागीरदार लोग रियासती मंत्रालय को ज्ञापन देने लगे। इस पर राजपूताना प्रोविंसियल किसान सभा के अध्यक्ष चौधरी बलदेवराम मिर्धा ने 10 जनवरी 1949 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखकर कड़ी आपत्ति व्यक्त की कि राजपूताना स्टेट्स यूनियन के लिये बनने वाली अंतरिम सरकार का कार्य निर्माणाधीन है जिसमें जागीरदारों द्वारा अपने प्रतिनिधित्व के लिये दिये जा रहे ज्ञापनों ने किसानों को उद्वेलित कर दिया है। जागीरदार लोग राजपूताना राज्यों में दमनात्मक कार्यवाहियाँ करने तथा काश्तकारों का शोषण करने के लिये जाने जाते रहे हैं। इनमें से कुछ लोग अब भी राजपूत आधिपत्य की शैली में सोचते हैं। सरकार में उन्हें सम्मिलित किये जाने का परिणाम भावी दमन तथा शोषण के लिये उनके हाथों को सशक्त करना होगा। इसलिये किसान इसका प्रबल विरोध करते हैं। 13 फरवरी 1949 को राजस्थान जागीरदार सभा ने उदयपुर में एक प्रस्ताव पारित किया कि चूंकि निकट भविष्य में वृहद राजस्थान का निर्माण होने वाला है जिसमें जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर आदि रियासतें भी सम्मिलित की जायेंगी अतः अंतरिम सरकार बनायी जायेगी। उसके बाद चुनावों का कार्य आरंभ होगा। यह सभा महसूस करती है कि वृहद राजस्थान में यदि किसी एक दल की सरकार बनायी गयी तो चुनावों का कार्य निष्पक्ष नहीं हो सकेगा। इसलिये सर्वदलीय सरकार बनायी जाये अथवा नये चुनाव होने तक नयी सरकार न बनाकर राजप्रमुख अपने हाथ में ही शासनाधिकार रखें।

    एकीकरण समिति का गठन

    14 जनवरी 1949 को पटेल द्वारा राजस्थान के एकीकरण की योजना घोषित कर देने के बाद एककीकरण समिति का गठन किया गया। रियासती विभाग के अधिकारी के. बी. लाल को इसका सचिव बनाया गया। जोधपुर राज्य के दीवान पी. एस. राउ, बीकानेर राज्य के मुख्यमंत्री सी. एस. वेंकटाचार तथा राजपूताना के रीजनल कमिश्नर वी. के. बी. पिल्लई को इस समिति का सदस्य बनाया गया। इस समिति को वृहद राजस्थान में मुख्य न्यायाधीश, मुख्य सचिव, अध्यक्ष राज्य लोकसेवा आयोग, वित्त सचिव, पुलिस महानिरीक्षक, महालेखाकार आदि पदों पर नियुक्त किये जाने के लिये अधिकारियों के नाम सुझाने थे।

    वायुयान दुर्घटनाओं से तनाव

    वृहत् राजस्थान के अस्तित्व में आने से पहले दो वायुयान दुर्घटनायें हुईं जिन्होंने कुछ समय के लिये राजस्थान के राजनैतिक वातावरण में तनाव उत्पन्न कर दिया। पहली दुर्घटना जयपुर नरेश के साथ हुई। इसमें महाराजा का वायुयान जलकर नष्ट हो गया पर महाराजा बाल-बाल बच गये। उनके पैर में गंभीर चोट आयी। दूसरी दुर्घटना तब हुई जब सरदार पटेल वृहत् राजस्थान का उद्घाटन करने आ रहे थे। वे भी बाल-बाल बचे।


    राजस्थान का उद्घाटन

    30 मार्च 1949 को सरदार पटेल ने राजस्थान राज्य का उद्घाटन किया। उद्घाटन स्थल पर जयपुर प्रशासन की ओर से सामंतों और अधिकारियों को अगली पंक्ति में बैठने की व्यवस्था की गयी। जबकि जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री जयनारायण व्यास तथा उदयपुर राज्य के प्रधानमंत्री माणिक्यलाल वर्मा को पीछे की पंक्ति में बैठाया गया। इसे इन नेताओं ने अपना अपमान समझा और उन्होंने उद्घाटन समारोह का बहिष्कार कर दिया। समारोह में पटेल ने स्वतंत्र भारत की एकता सुदृढ़ करने में राजाओं के योगदान और त्याग की प्रशंसा करते हुए कहा कि 'राजस्थान का निर्माण कर हमने आज राणा प्रताप का स्वप्न साकार किया है। '

    उन्होंने जनता से अपील की कि अब उन्हें जयपुर, जोधपुर बीकानेर आदि के बारे में न सोचकर संपूर्ण राजस्थान के बारे में सोचना चाहिये। पटेल ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सलाह दी कि उन्हें सद्भाव दिखाना चाहिये और सत्ता की अपेक्षा सेवा के बारे में सोचना चाहिये। मंत्री कौन बने और राजधानी कहाँ हो, यह छोटे लोगों की बातें हैं। अगर कांग्रेसी वास्तव में सच्चे हैं तो उन्हें जबर्दस्ती सत्ता सौंपी जायेगी। उन्होंने बैठने की व्यवस्था को लेकर समारोह का बहिष्कार करने की प्रदेश कांग्रेस के नेताओं की भर्त्सना भी की।

    राजस्थान में पहले ही सम्मिलित हो चुके 19 राज्यों के शासकों में से केवल 8 ही इस समारोह में उपस्थित हुए। कुछ लोगों ने जयपुर की महारानी गायत्री देवी से इस समारोह में बाधा उत्पन्न करने की अनुमति मांगी किंतु महारानी ने उन्हें ऐसा करने से मना किया।

    यह तय किया गया था कि जोधपुर तथा कोटा के महाराजाओं को वरिष्ठ उपराजप्रमुख बनाया जायेगा तथा बूंदी और डूंगरपुर के राजाओं को कनिष्ठ उपराजप्रमुख बनाया जायेगा जो पाँच साल के लिये अपने पदों पर रहेंगे। जब 30 मार्च 1949 को सरदार पटेल ने वृहत् राजस्थान का विधिवत् उद्घाटन किया तो बूंदी और डूंगरपुर के राजाओं ने कनिष्ठ उपराजप्रमुख के पद की शपथ नहीं ली।

    पटेल द्वारा दिये गये उद्घाटन भाषण में राजस्थान में सम्मिलित होने वाले चारों राज्यों के राजाओं की र्पंशसा की गयी तथा कांग्रेस के नेताओं द्वारा की जा रही अप्रजातांत्रिक कार्यवाहियों की आलोचना की गयी। इस पर जयनारायण व्यास ने 2 अप्रेल 1949 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखकर अप्रसन्नता व्यक्त की कि- 'आपके द्वारा जयपुर में जो भाषण दिया गया उसमें आपने कांग्रेस जनों के बारे में जो कहा है उससे तो राजस्थान में कांग्रेस कमजोर ही होगी। आपने कांग्रेसी नेताओं के अच्छे कार्यों के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा। इसके विपरीत आपने उन्हें बदनाम किया। आपका भाषण गैर कांग्रेसी तत्वों का समर्थक है। आपने महाराजा जयपुर को प्रसन्न करने के लिये कांग्रेसियों की आलोचना की है।' 

    संयुक्त राजस्थान के साथ जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं जैसलमेर राज्यों के विलय के बाद जब 24 जनवरी 1950 को सिरोही राज्य (माउण्टआबू एवं देलवाड़ा तहसीलों को छोड़कर) का विलय भी वृहत् राजस्थान में कर दिया गया तब राजस्थान संघ का कुल क्षेत्रफल 1,28,424 वर्गमील, जनसंख्या लगभग 153 लाख तथा वार्षिक राजस्व 18 करोड़़ था।


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×