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  • अध्याय-7 : स्वाधीनता के पश्चात् सक्षम राज्यों में उत्तरदायी सरकारों का गठन

     07.12.2017
    अध्याय-7 : स्वाधीनता के पश्चात् सक्षम राज्यों में उत्तरदायी सरकारों का गठन

    अध्याय-7


    स्वाधीनता के पश्चात् सक्षम राज्यों में उत्तरदायी सरकारों का गठन

    राजाओं को चाहिये कि वे जनता के सेवक बन जायें। वे जिस ऊंचे पायदान पर खड़े हैं, वहाँ से उन्हें नीचे उतर आना चाहिये। - महात्मा गांधी।

    महारानी विक्टोरिया द्वारा 1 नवम्बर 1858 की घोषणा में कहा गया था कि अच्छी सरकार तथा आंतरिक शांति की शर्त पर रियासतों को पूर्ण संरक्षण दिया जायेगा किंतु अधिकांश राजाओं ने अच्छी सरकार देने के लिये कोई प्रयास नहीं किये। ई.1903 में लॉर्ड कर्जन ने कहा कि राजाओं को अपनी प्रजा का स्वामी होने के साथ-साथ अपनी प्रजा का सेवक भी होना चाहिये। राज्य का राजस्व शासक के आमोद प्रमोद के लिये सुरक्षित नहीं है अपिुत प्रजा के कल्याण के लिये भी है। अगस्त 1917 में भारत सचिव ने घोषणा की कि प्रशासन की प्रत्येक शाखा में भारतीयों का अधिकतम सहयोग प्राप्त करने और भारत में उत्तरदायी शासन स्थापित करने के उद्देश्य से स्वयं शासित संस्थाओं का क्रमिक विकास किया जायेगा।

    नागरिक अधिकारों की मांग के लिये गठित आरंभिक संस्थाएं

    29 दिसम्बर 1919 को राजपूताना एवं मध्यभारत के कुछ जागरूक लोगों ने 'राजपूताना मध्य भारत सभा' की स्थापना की। इस संस्था का प्रथम अधिवेशन मारवाड़ी पुस्तकालय, चांदनी चौक नई दिल्ली में आयोजित हुआ। 1 फरवरी 1921 को विजयसिंह पथिक ने 'राजस्थान सेवा संघ' की स्थापना की। उसी वर्ष 'मारवाड़ सेवा संघ' की भी स्थापना हुई। अजमेर पुलिस अधीक्षक की सूचना के अनुसार 'राजस्थान सेवा संघ' के 4004 सदस्य थे। राजस्थान सेवासंघ के नेतृत्व में रियासती प्रजा का आंदोलन जोर पकड़ने लगा। अखिल भारतीय देशी राज्य लोकपरिषद की स्थापना

    ई.1927 में दक्षिणात्य दीवान बहादुर रामचंद्र राव, सी. वाई. चिंतामणि तथा एन. सी. केलकर आदि ने राज्यों की प्रजा के अधिकारों की रक्षार्थ संघर्ष करने के लिये 'इण्डियन स्टेट्स पीपुल्स कांफ्रेंस' नाम से एक संगठन खड़ा किया जिसे 'अखिल भारतीय देशी राज्य लोकपरिषद' भी कहा जाता है। नरेन्द्र मण्डल ने इस संगठन को अपने प्रतिद्वंद्वी शत्रु के रूप में देखा। अखिल भारतीय देशी राज्य लोकपरिषद ने 1927 में गठित बटलर समिति के समक्ष एक माँगपत्र प्रस्तुत कर देशी राज्यों में उत्तरदायी शासन की स्थापना की मांग की। बटलर समिति ने इस मांगपत्र को स्वीकार कर लिया।

    राज्यों में आंदोलन के प्रति कांग्रेस का बदलता हुआ दृष्टिकोण

    1920 के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने निर्णय लिया कि कांग्रेस देशी राज्यों में अहस्तक्षेप की नीति अपनायेगी। 1925 में गांधीजी ने दोहराया कि यदि ब्रिटिश भारत में स्वशासन के अधिकार प्राप्त हो जायेंगे तो देशी राज्यों में भी स्वतः ही सब ठीक हो जायेगा। दिसम्बर 1928 में कांग्रेस ने कलकत्ता अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित करके भारतीय राज्यों के शासकों से राज्यों में उत्तरदायी शासन स्थापित करने का अनुरोध किया और राज्यों की जनता के उत्तरदायी शासन के लिये किये जा रहे शांतिपूर्ण और उचित संघर्ष के प्रति सहानुभूति प्रकट की। कांग्रेस सवंधिान से वह धारा जो राज्यों में हस्तक्षेप के विरुद्ध थी, निकाल दी गयी। मई 1929 में अ. भा. देशी राज्य लोकपरिषद ने बम्बई अधिवेशन में राज्यों के लिये पृथक स्वतंत्र न्यायपालिका बनाने, राजाओं के व्यक्तिगत व्यय को प्रशासनिक व्यय से पृथक करने और प्रतिनिधि संस्थाओं की स्थापना करने पर अधिक बल दिया।

    19-31 दिसम्बर 1929 तक कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने देशी नरेशों से मांग की कि वे प्रजा को उत्तरदायी शासन प्रदान करें और जनता के आवागमन, भाषण, सम्मेलन व नागरिक अधिकारों के बारे में कानून बनायें। जयनारायण व्यास चाहते थे कि कांग्रेस देशी राज्यों को ब्रिटिश प्रांतों की तरह माने लेकिन गांधीजी के निकट सहयोगी मणिभाई इस विचार से सहमत नहीं थे। व्यास ने नाराज होकर ई.1934 में तरुण राजस्थान के संपादन का काम छोड़ दिया। ई.1933 में अ. भा. देशीराज्य लोकपरिषद के चौथे अधिवेशन के अध्यक्ष एन. सी. केलकर ने आशा व्यक्त की कि कांग्रेस राज्यों में उत्तरदायी शासन की स्थापना को अपने कार्यक्रम में सम्मिलित करे। कांग्रेस ने इसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि इससे कांग्रेस की समस्त शक्तियां विभिन्न राज्यों के राजाओं से उलझने में लग जाती। ई.1934 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने रियासतों में उत्तरदायी शासन की बात कही।

    फरवरी 1938 में कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में भारतीय राज्यों के सम्बन्ध में एक विस्तृत प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें कहा गया कि राज्यों की जनता के लिये सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्रों में भी वैसी ही स्वतंत्रता होनी चाहिये जैसी अंग्रेजी भारत में है। इस सम्मेलन में कांग्रेस ने देशी राज्यों में पूर्ण उत्तरदायी शासन स्थापित करने और नागरिक अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा करने के अपने लक्ष्य को भी स्पष्ट किया। कांग्रेस ने देशी राज्यों में स्वतंत्र संगठन बनाकर उत्तरदायी शासन स्थापित करने एवं काम करने की सलाह भी दी तथा उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये कार्य करना अपना कार्य क्षेत्र मान लिया परंतु इस बात पर जोर दिया गया कि राज्यों में जो संघर्ष का अभियान चलाया जाये, वह कांग्रेस की ओर से न हो अपितु स्वतंत्र लोकप्रिय समुदायों की ओर से हो जिससे विभिन्न राज्यों में 1938 के पश्चात् प्रजा मण्डलों अथवा प्रजा परिषदों की स्थापना हुई तथा स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक होने में बड़ी सहायता मिली।

    जवाहरलाल नेहरू के सभापतित्व में आयोजित लुधियाना की रियासती प्रजा कान्फ्रेन्स में स्थिति और स्पष्ट हो गयी। उसमें मुख्य प्रस्ताव यह था- समय आ गया है जब यह संघर्ष, भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष के साथ मिल कर चलाया जाये और यह उसी का एक अभिन्न अंग बना दिया जाये। ऐसा संपूर्ण अखिल भारतीय संघर्ष कांग्रेस के निर्देशन में चलाया जाना आवश्यक है। मार्च 1939 में कांग्रेस ने त्रिपुरी अधिवेशन में अनुभव किया कि अनेक भारतीय राजाओं ने यूरोप में चल रहे युद्ध में अपनी सेवायें और संसाधन यह कहकर प्रदान किये हैं कि यूरोप में लोकतंत्र की रक्षा के लिये युद्ध लड़ा जा रहा है। अतः राजाओं को सर्वप्रथम अपने राज्यों में लोकतंत्र लागू करना चाहिये जहाँ अत्यंत घनी राजशाही लागू है। 1940 में गांधीजी ने राजाओं को सलाह दी कि वे जनता के सेवक बन जायें। वे जिस ऊंचे पायदान पर खड़े हैं, वहाँ से उन्हें नीचे उतर आना चाहिये। विभिन्न स्तरों से उठ रही मांगों और अपीलों का राजाओं पर कोई असर नहीं हुआ। अ. भा. देशीराज्य लोकपरिषद ने 6 से 8 अगस्त 1945 तक श्रीनगर में हुई स्थायी समिति की बैठक में निर्णय लिया कि राज्यों के जन आंदोलन का लक्ष्य भारत के अभिन्न अंग के रूप में राज्यों में पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना करना है।

    ई.1945-46 में अ. भा. देशीराज्य लोकपरिषद के उदयपुर अधिवेशन में, लोकपरिषद के लक्ष्य की व्याख्या इस प्रकार की गयी- 'रियासतों को स्वतंत्र भारतीय संघ का एक अभिन्न अंग मानते हुए वहाँ की जनता द्वारा शांतिपूर्ण न्यायोचित उपायों से पूर्ण उत्तरदायी सरकार की प्राप्ति।' लोकपरिषद की विशेषज्ञ समिति ने 31 दिसम्बर 1947 को देशी राज्यों में उत्तरदायी सरकार के गठन के लिये 10 सिद्धांत प्रतिपादित किये।

    देशी रियासतों में उत्तरदायी शासन के प्रति ब्रिटिश शासन की नीति

    ई.1937 में राजनीतिक विभाग ने राजाओं को प्रेरित किया कि वे अपनी रियासतों में प्रशासनिक सुधार करें और प्रशासन में लोकप्रिय सरकार के तत्वों को शामिल करें किंतु इस सलाह पर ध्यान नहीं दिया गया। मार्च 1940 में दिल्ली में आयोजित नरेन्द्र मण्डल की बैठक में वायसराय लिनलिथगो ने राजाओं को सलाह दी कि वे अपने राज्यों में आंतरिक प्रशासन की स्थिति में सुधार लायें। 17 जनवरी 1946 को दिल्ली में अयोजित नरेंद्र मण्डल की बैठक में वायसराय वैवेल ने जोर दिया कि राज्यों के शासक अपने राज्यों में अच्छी सरकार की स्थापना करें तथा प्रशासन की व्यवस्था आधुनिक पद्धति से करें। उन्होंने अच्छी सरकार के तीन आधारभूत मानक बताये- राजनीतिक स्थायित्व, पर्याप्त वित्तीय संसाधन तथा प्रशासन में लोगों की प्रभावी भागीदारी। मार्च 1947 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री द्वारा वायसराय को लिखे गये नीति निर्देशक पत्र में कहा गया कि वायसराय अपने स्तर पर सर्वोच्च प्रयास करेंगे कि जिन भारतीय रियासतों में राजनीतिक प्रगति धीमी रही है, उनमें किसी प्रकार की अधिक लोकतांत्रिक सरकार के गठन की प्रक्रिया त्वरित गति से हो।

    बिल ऑफ पीपल्स राइट्स

    कैबीनेट मिशन योजना की घोषणा के पश्चात नरेन्द्र मण्डल के चांसलर भोपाल नवाब ने एक घोषणा की कि समस्त देशी राज्यों में विधान को स्थापित करने की राजाओं की तीव्र इच्छा है। निर्वाचित प्रतिनिधियों वाली लोकप्रिय संस्थायें स्थापित की जावेंगी जिससे राज्य के शासन में जनता का निकट तथा प्रभावकारी सम्बन्ध रहे। सुधारों की जो बहुसूत्री घोषणा की गयी थी उसमें सर्वप्रथम यह कहा गया था कि गैर कानूनी तरीके से किसी व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जायेगा और न उसकी संपत्ति या निवास को जब्त या उससे पृथक किया जायेगा। इसे अखबारों में 'राजाओं की ओर से प्रजा को प्रदान किया हुआ अधिकार पत्र' (बिल ऑफ पीपल्स राइट्स) कहा गया।


    बीकानेर राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना

    बीकानेर राज्य में ई.1907 में चूरू में सर्वप्रथम सर्वहितकारिणी सभा की स्थापना की गयी थी। यह एक सामाजिक, शैक्षणिक तथा अर्द्ध राजनैतिक संस्था थी। ई.1920 में बीकानेर में सद्विद्या प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। इस संस्था का उद्देश्य रिश्वतखोरी और अन्याय के विरुद्ध अभियान चलाना था। संस्था ने 'धर्मविजय' तथा 'सत्यविजय' नामक दो नाटक मंचित किये जिनसे सरकारी क्षेत्र में हलचल मच गयी। बीकानेर सरकार ने सभायें आयोजित करने, भाषण करने तथा बाहरी व्यक्ति के रियासत में प्रवेश करने पर रोक लगा दी। सरकार ने लगभग 100 पुस्तकें जब्त कर लीं। ई.1931 में जयनारायण व्यास ने बीकानेर और चूरू के कार्यकर्ताओं से बीकानेर नरेश के निरंकुशतापूर्ण आचरण, दमन, आतंक तथा मनमानी पर 18 पृष्ठों की एक पुस्तिका तैयार करवाकर द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के सदस्यों में बंटवायी। लॉर्ड सेंकी ने वह पुस्तिका गंगासिंह के सामने ठीक उस समय रखी जिस समय वे देशी राज्यों के भारतीय संघ में शामिल होने की ब्रिटिश सरकार की योजना के समर्थन और निजाम हैदराबाद के विरोध में भाषण दे रहे थे। अपने प्रशासन का पोस्टमार्टम देखकर महाराजा आपे से बाहर हो गये और तबीयत खराब हो जाने के बहाने भाषण वहीं खत्म करके भारत के लिये रवाना हो गये। भारत पहुँचते-पहुँचते उन्होंने गुस्ताखी करने वालों को कठोर दण्ड देने का मानस बना लिया। स्वदेश लौटकर उन्होंने ऐसा किया भी।

    बीकानेर प्रजामण्डल की स्थापना

    4 अक्टूबर 1936 को बीकानेर प्रजामण्डल की स्थापना हुई। मघाराम वैद्य को इसका अध्यक्ष बनाया गया। इस संस्था ने किसानों पर होने वाले अत्याचार, लाग-बाग, हरिजन समस्यायें तथा पुलिस द्वारा जनता पर किये जाने वाले अत्याचार के विरुद्ध अपने कार्यक्रम चलाये। राज्य में प्रजामण्डल की लोकप्रियता बढ़ने लगी तथा गाँव-गाँव से लोग समस्यायें लेकर प्रजामण्डल के कार्यालय पहुँचने लगे। मार्च 1937 में सरकार ने प्रजामण्डल के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। बाद में उन्हें रिहा करके आदेश दिया गया कि वे राज्य की सीमा से बाहर चले जायें तथा बिना राज्यादेश के राज्य में प्रवेश न करें। इस निर्वासन की कड़ी प्रतिक्रया हुई। जनता ने निर्वासित नेताओं को जयघोष के बीच दिल्ली के लिये विदा किया। ये नेता दिल्ली में चल रही कांग्रेस समिति की बैठक में नेहरू, पटेल और सीतारमैया के समक्ष उपस्थित हुए तथा अपने निर्वासन के कारणों की जानकारी दी। 22 मार्च 1937 को अ. भा. देशीराज्य लोकपरिषद की दिल्ली में आयोजित सभा में बीकानेर राज्य की निष्कासन नीति की निंदा की गई। बीकानेर से निष्कासित लोगों ने कलकत्ता के प्रवासी राजस्थानियों के सहयोग से कलकत्ता में बीकानेर राज्य प्रजामंडल की स्थापना की तथा 'बीकानेर की थोथी पोथी' नामक पुस्तिका प्रकाशित करवायी। प्रजामंडल की शाखायें चूरू, राजगढ़, सुजानगढ़ तथा रतनगढ़ में भी खोली गयीं।

    उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये आंदोलन

    22 जुलाई 1942 को रघुवरदयाल गोयल के नेतृत्व में व्यापक जनाधार वाली 'प्रजा परिषद्' की स्थापना हुई। प्रजा परिषद ने अपनी स्थापना के सात दिन बाद उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये आंदोलन चलाने का निर्णय लिया। उसी दिन रघुवरदयाल गोयल को राज्य से निष्कासित कर दिया गया। 3 फरवरी 1943 को महाराजा गंगासिंह का निधन हो गया। महाराजा सादूलसिंह ने भी दमन की नीति जारी रखी तथा घोषित किया कि बीकानेर के लाखों लोगों का बहुमत अपने महाराजा का सम्मान करता है और महाराजा से प्रेम करता है। महाराजा की उदार और आधुनिक नीतियों के कारण जब प्रजा परिषद वाले कुछ नहीं कर सकते तो उनका कार्य राजा और जागीरदारों को 'अन्नदाता' के स्थान पर 'अन्नखोस' कहना रह गया है। वे भारतीय नेताओं को अमृत दे रहे हैं और राज्य की प्रजा को विष।

    चार वर्ष तक प्रजा परिषद का आंदोलन चलता रहा जिससे राज्य के अधिकारी तथा महाराजा सख्ती से पेश आये किंतु जब आंदोलन को राज्य के किसानों का भी समर्थन प्राप्त होने लगा तो महाराजा के रुख में बदलाव आया। राजगढ़ कस्बे में किसानों के जुलूस में पुलिस अधिकारी ठाकुरसिंह ने कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट की। महाराजा ने ठाकुरसिंह को मुअत्तल करके नेहरू को इसकी सूचना भिजवायी तथा राज्य की ओर से इस घटना के लिये खेद प्रकट किया। राज्य में तेजी से चल रहे किसान आंदोलन से महाराजा की सरकार घबरा गयी और वह आंदोलनकारियों की मांगे मानने के लिये विवश हो गयी।

    उत्तरदायी शासन की घोषणा

    21 जून 1946 को महाराजा ने घोषणा की कि राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना की जायेगी इसका विधिवत् प्रकाशन 31 अगस्त 1946 को किया जायेगा। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये संविधान समिति और मताधिकार निर्वाचन क्षेत्र समिति की नियुक्ति की घोषणा की गयी। इन्हें क्रमशः संविधान का मसविदा बना कर पेश करने और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा निर्धारित करने का काम सौंपा गया। प्रजा परिषद ने घोषित किया कि प्रजा परिषद् की कार्य समिति और कार्यकर्ता सम्मेलन ने संविधान और मताधिकार समितियों में बीकानेर सरकार से सहयोग करने का निर्णय किया है और वे घोषणा पत्र को सीधे अस्वीकार नहीं करेंगे। किसानों के आंदोलन से आशंकित होकर महाराजा को अपनी, अपनी रियासत की और अपने राजघराने की सुरक्षा के लिये उत्तरदायी शासन की घोषणा करनी पड़ी। महाराजा ने ख्यालीराम नाम के एक जाट को जो कि प्रजापरिषद का सदस्य था, लोकप्रिय मिनिस्टर के पद का प्रलोभन देकर ग्राम सुधार मंत्री मनोनीत किया जो किसान आंदोलन की पीठ में छुरा भौंक सके। लोगों ने ख्यालीराम को कठपुतली मिनिस्टर के नाम से पुकारा। साथ ही सरकार ने व्यापारी व बनिया वर्ग को खुश करने के लिये संतोषचन्द बरड़िया नाम के एक व्यापारी व पूंजीपति को कठपुतली स्वायत्त शासन मंत्री बना दिया।

    प्रजा परिषद ने इस मंत्रिमण्डल को जनता के साथ धोखा बताते हुए 9 अगस्त 1946 को बलिदान दिवस मनाया। परिषद द्वारा कहा गया कि 21 जून को महाराजा की घोषणा के बाद हमारे पास नागरिक स्वतंत्रता की पार्सल कई रूपों में भेजी गयी है। मसलन रायसिंहनगर में गोली चलाकर, राजगढ़ में फौज भेजकर, गंगानगर के मौहल्लों में फौजी परेड करवाकर, सारी रियासत में धारा 144 लगाकर, जनसेवकों के मुँह पर ताले लगाकर हमें सरकार द्वारा क्या ही सुंदर नागरिक अधिकारों का पार्सल भेजा गया है। चौ. ख्यालीराम की निंदा की गयी और बीकानेर सेफ्टी एक्ट, प्रेस रूल्स आदि दमनकारी कानूनों को रद्द करने की मांग की गयी। विधान निर्मात्री परिषद में राज्य का प्रतिनिधित्व राजा के मनोनीत प्रतिनिधि की बजाय किसी जननेता द्वारा करवाने की मांग की गयी। गोयल ने जनता को सचेत किया कि उत्तरदायी शासन की बातचीत के भुलावे में कहीं हमारी संघर्ष की बारूद गीली न हो जाये।

    एक तरफ महाराजा उत्तरदायी शासन की घोषणा कर रहे थे तो दूसरी तरफ नित्य ही लाठी-गोली और धारा 144 की खबरें आ रही थीं। अतः बीकानेर में नागरिक अधिकारों की सही स्थिति जांचने के लिये अ.भा. देशीराज्य लोकपरिषद की राजपूताना इकाई के अध्यक्ष गोकुलभाई भट्ट एवं मंत्री हीरालाल शास्त्री बीकानेर भेजे गये। 19 अगस्त 1946 को शास्त्री ने बीकानेर में आयोजित जनसभा में महाराजा को बधाई दी कि उन्होंने बीकानेर में उत्तरदायी शासन लागू करने की घोषणा कर दी है किंतु सावधान किया कि पूर्ण नागरिक अधिकारों के अभाव में उत्तरदायी शासन की सारी बातें बेमेल हो जाती हैं। इसलिए पब्लिक सेफ्टी एक्ट, कठोर प्रेस नियम और जूलूसों पर पाबंदी के नियम अतिशीघ्र हटा लेने की वृत्ति को राजा गंभीरता से अनुभव करें तो सामयिक होगा।

    वैधानिक सुधारों की घोषणा

    31 अगस्त 1946 को बीकानेर नरेश ने उत्तरदायी शासन की विधिवत् घोषणा की। घोषणा में कहा गया कि एक विधान समिति विधानसभा का प्रारूप तैयार करेगी और दूसरी मताधिकार समिति मताधिकार की शर्तें और निर्वाचन क्षेत्रों का निर्णय करेगी। ये समितियां अपना कार्य 1 मार्च 1947 तक पूरा करेंगी। नवम्बर 1947 से पहले-पहले अंतरिम सरकार बना दी जायेगी और नया संविधान तैयार हो जाने पर चुनाव से बनी असेम्बली में बहुमत के आधार पर शासन चलेगा। परिषद् वाले इन वैधानिक सुधारों की घोषणाओं में सहयोग करने का निश्चय कर ही रहे थे कि सरकार का दमन चक्र फिर आरंभ हो गया। राज्य भर में जगह-जगह नागरिकों व कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गयीं। न तो मार्च तक रिपोर्ट तैयार हुई और न नवम्बर 1947 तक अंतरिम सरकार बनी। महाराजा ने पूरा वर्ष उत्तरदायी शासन के लिये गठित समितियों की रिपोर्ट की प्रतीक्षा में निकाल दिया। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया किंतु बीकानेर नरेश बदली हुई परिस्थितियों को समझ नहीं पाया। उसने अपनी ठसक बरकरार रखते हुए, बीकानेर में स्वतंत्रता दिवस समारोह के आयोजकों को सूचना भेजी कि वे सभा स्थल पर तिरंगा फहरा सकते हैं। वहाँ बीकानेर राज्य का सरकारी झण्डा भी फहराया जायेगा। सरकार की ओर से ऐसा आग्रह, महाराजा सादूलसिंह और हीरालाल शास्त्री के मध्य हुए झण्डा विवाद समझौते के फलस्वरूप किया गया था। आयोजकों ने इसकी परवाह नहीं की और केवल तिरंगा झण्डा ही फहराया।

    बीकानेर संविधान एक्ट

    दिसम्बर 1947 में 'बीकानेर संविधान एक्ट 1947' प्रकाशित किया गया। इसके अनुसार महाराजा के संरक्षण में कार्य करते हुए जनता के प्रति उत्तरदायी सरकार बननी थी। उसी क्रम में व्यापक मताधिकार पर आधारित दो सदनों वाली व्यवस्थापिका अस्तित्व में आईं कुछ बातों को छोड़कर सारा शासन एक परिषद को सौंप दिया गया जो व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी था। महाराजा ने यह भी घोषणा की कि दो वर्षों के भीतर ही महाराजा के संरक्षण में एक पूर्ण उत्तरदायी सरकार बनायी जायेगी। महाराजा ने 2 फरवरी 1948 को घोषणा की कि अप्रेल 1948 तक पूर्ण उत्तरदायी सरकार अस्तित्व में आ जायेगी। इससे पूर्व 3 जनवरी 1948 को महाराजा ने सद्भावना के नाम पर हीरालाल शर्मा, रामलाल, बालचंद ब्राह्मण व मोहरसिंह को बीकानेर सेंट्रल जेल से तथा माणकचंद्र सुराणा, गिरीशचंद्र शर्मा, गणपत लाल, फूलचंद, नथमल व बेगाराम को ज्यूडिशियल लॉकअप से छोड़ने के आदेश दिये। मार्च 1948 में महाराजा ने दोहराया कि चुनावों के बाद नई व्यवस्थापिका संविधान एक्ट में संशोधन कर सकेगी।

    अंतरिम मंत्रिमण्डल

    18 मार्च 1948 को बीकानेर शासक ने अपनी मंत्रिपरिषद् के स्थान पर एक मिला-जुला अंतरिम मंत्रिमण्डल बनाने की घोषणा की जिसका कार्य राज्य के दैनिक शासन को चालू रखना था। उक्त मंत्रिमण्डल 16 जनवरी 1948 को राज्य के प्रधानमंत्री और राज्य प्रजा परिषद के कतिपय कार्यकर्ताओं के बीच एक समझौते का परिणाम था। समझौते की मुख्य धारायें इस प्रकार से थीं-

    (1.) अपने स्वाधिकार से बीकानेर राज्य भारतीय संघ की अलग इकाई के रूप में रहे।

    (2.) धारा सभा के चुनावों के लिये मतदाताओं की योग्यता में आवश्यक सुधार किये जाये।

    (3.) राजसभा के अधिकारों में कमी की जाये।

    (4.) दस सदस्यीय मंत्रिमण्डल में प्रधानमंत्री कुं. जसवंतसिंह होंगे, प्रजा परिषद के हरदत्तसिंह चौधरी, गौरीशंकर आर्य, सरदार मस्तानसिंह और चौ. कुंभाराम आर्य शामिल होंगे।

    महाराजा द्वारा मनोनीत चार और मंत्रियों- खुशालचंद डागा, पं. सूर्यकरण आचार्य, ठाकुर कुम्हेर सिंह व अहमदबख्श सिंधी को भी शपथ दिलवाई गयी। चौ. हरदत्तसिंह को उप प्रधान मंत्री बनाया गया तथा गृह मंत्रालय भी दिया गया। चौ. कुंभाराम राजस्व मंत्री एवं पं. गौरी शंकर आचार्य को शिक्षा मंत्री बनाया गया। प्रजा परिषद के कोटे का एक स्थान रिक्त रखा गया जिसे बाद में भरने की व्यवस्था थी। इस मिले जुले मंत्रिमण्डल में कांग्रेस के प्रतिनिधियों और महाराजा द्वारा मनोनीत राज्य के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों की संख्या बराबर-बराबर रखी गयी थी।

    इस मंत्रिमण्डल ने 18 मार्च 1948 को पद ग्रहण किया। महाराजा ने जिस द्विसदनीय व्यवस्थापिका, राजसभा और धारासभा का ऐलान किया था, उसका कांग्रेसी क्षेत्रों में पहले ही विरोध होना आरंभ हो गया था। इन दोनों सदनों में कुल 88 स्थान थे जिनमें से 46 स्थान राज्य के जमींदार वर्ग के लिये सुरक्षित रखे गये थे। रिजर्व सीटों की संख्या और व्यवस्था को अपरिवर्तनीय घोषित किया गया था। प्रीवीपर्स, बीकानेर फौज, जागीरें और जागीरदार, हाईकोर्ट जज, व महाराजा के आपात्कालीन अधिकारों आदि के बारे में न तो कोई विधेयक प्रस्तुत किया जा सकता था, न कोई प्रस्ताव ही लाया जा सकता था तथा न ही उपरोक्त मामलों के सम्बंन्ध में कोई प्रश्न ही पूछा जा सकता था। परिषद के अनेक कार्यकर्ताओं का कहना था कि उपरोक्त व्यवस्था में वांछित मताधिकार की कहीं कोई व्यवस्था नहीं है, अतः इस व्यवस्था के अंतर्गत अगर चुनाव होता है तो उसका कोई मतलब नहीं होगा। इसके अतिरिक्त जो परिषद जागीरदारों द्वारा किसानों पर किये जाने वाले जुल्मों को लेकर बराबर लड़ती रही, वह ऐसी व्यवस्था कैसे स्वीकार कर सकती है जिसमें जागीरदारों को विशेषाधिकार प्राप्त हों तथा सदन में उनके बारे में प्रश्न तक न पूछा जा सकता हो?

    मंत्रिमण्डल का विरोध

    बीकानेर राज्य प्रजापरिषद के मंत्री की ओर से इस संविधान के विरोध में 'बीकानेर का खोखला संविधान' शीर्षक से एक लेख छपवाया गया। बीकानेर राज्य प्रजा परिषद के अध्यक्ष चौ. हरदत्तसिंह, रघुवरदयाल गोयल, चौ. कुंभाराम, सरदार गुरदयालसिंह संधु व स्वामी कर्मानंद ने इस संविधान का भारी विरोध किया। हरदत्तसिंह ने 9 जनवरी 1948 को गंगानगर की एक विशाल जनसभा में कहा- वह विधान हमें अमान्य है जिसमें पूर्ण उत्तरदायित्व शासन का ढोल पीटा गया है। सारे विधान को देखने से मालूम होता है कि मध्यकालीन धार्मिक शक्तियों तथा सामंतवाद को पनपाने के लिये ही प्रगतिशीलता और जनतंत्र की आड़ में यह शिकार खेला गया है।

    नये संविधान से असहमत होने के बावजूद प्रजा परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष हरदत्तसिंह और मंत्री केदारनाथ शर्मा आदि ने इस मिले-जुले मंत्रिमण्डल के निर्माण के समय यह मान लिया था कि कांग्रेस 23 सितम्बर 1948 और उसके बाद के दिनों में होने वाले आम चुनावों में भाग लेगी और इस बीच यह मंत्रिमण्डल चालू नियम पद्धति से काम करता रहेगा। कुछ समय तो कार्य ठीक चलता रहा किंतु कुछ समय बाद बीकानेर प्रजा परिषद के असंतुष्ट दल के लोग मंत्रिमण्डल के विरुद्ध आंदोलनरत हो गये और सरकार पर कई तरह के आरोप लगाने लगे। प्रजा परिषद के असंतुष्ट कार्यकर्ताओं के सरकार के विरुद्ध लगाये गये आरोपों का खण्डन करने के लिये बीकानेर नगर में सुनारों की गुवाड़ में एक सभा बुलाई गयी। किंतु प्रजा परिषद के विरोध के कारण सभा शोर-गुल में समाप्त हो गयी। इसके पश्चात् प्रजा परिषद के असंतुष्ट सदस्यों ने राज्य के एकीकरण की आवाज उठानी आरंभ कर दी।

    प्रजा परिषद का आंदोलन रुकवाने के लिये सरदार पटेल से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया गया जिससे यह आंदोलन समाप्त हो गया। इसी समय राज्य की ओर से घोषणा की गयी कि बीकानेर राज्य में पूर्व निर्धारित आम चुनाव 23 सितम्बर 1948 व उसके बाद के दिनों में होंगे परंतु बीकानेर राज्य प्रजा परिषद ने अगस्त माह में इन चुनावों को स्थगित करने की मांग की।

    इन दिनों महाराजा अपने उपचार के लिये इंगलैण्ड गये हुए थे तथा उनके पुत्र करणीसिंह अपनी माता सुदर्शना कुमारी के सहयोग से राजकार्य देख रहे थे। चुनाव की इस गुत्थी को सुलझाने के लिये राजस्थान कांग्रेस के प्रांतीय नेता हीरालाल शास्त्री और गोकुल भाई भट्ट पुनः बीकानेर आये और करणीसिंह से बात की। इससे पूर्व राजपूताना प्रांतीय कौंसिल अप्रेल में एक प्रस्ताव पारित करके बालिग मताधिकार के अभाव में चुनाव में भाग लेने से राज्य प्रजा परिषद को मना कर चुकी थी।

    22 जुलाई 1948 से राज्य प्रजा परिषद को कांग्रेस कहा जाने लगा था। उसने 28 अगस्त 1948 को एक प्रस्ताव पारित करके कहा कि कांग्रेस आम चुनावों में भाग न ले तथा मिले-जुले अंतरिम मंत्रिमंण्डल से अपने प्रतिनिधियों को त्यागपत्र दिलवाकर वापिस बुलवाये। 31 अगस्त 1948 को महाराजा इंग्लैण्ड से लौटे। उन्होंने चुनावों में आये गतिरोध को दूर करने के लिये कांग्रेस को एक पत्र लिखकर उससे स्पष्टीकरण मांगा तथा उसका जवाब 4 सितम्बर तक भिजवाने के लिये कहा। इस बीच महाराजा ने दिल्ली में सरदार पटेल से भेंट की तथा उनसे राज्य में आम चुनावों में कांग्रेस द्वारा बाधा पहुंचाने के प्रयास पर विचार-विमर्श किया। पटेल ने महाराजा को सलाह दी कि वे इस विषय पर वी. पी. मेनन, हीरालाल शास्त्री, गोकुलभाई भट्ट व जयनारायण व्यास से बात करें। ये समस्त लोग उस समय दिल्ली में ही थे। मेनन, शास्त्री, भट्ट व व्यास ने महाराजा को सलाह दी कि चुनाव स्थगित कर दिये जायें। महाराजा ने उनकी बात मान ली और 7 सितम्बर 1948 को कांग्रेसी मंत्रियों के त्यागपत्र स्वीकार करके अंतरिम मंत्रिमण्डल को भंग कर दिया। चुनाव भी स्थगित कर दिये। महाराजा ने जोधपुर राज्य के भूतपूर्व दीवान सी. एस. वेंकटाचार (आई.सी.एस.) को जसवंतसिंह के स्थान पर नया प्रधानमंत्री बनाया।


    जयपुर राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना

    जयपुर रियासत में सवाई मानसिंह द्वितीय के शासन काल में जनता द्वारा उत्तरदायी शासन की मांग को लेकर व्यापक आंदोलन चलाया गया। ई.1931 में जमनालाल बजाज तथा कर्पूरचंद्र पाटनी के प्रयास से प्रजामण्डल की स्थापना की गयी किंतु अपनी स्थापना के पाँच वर्षों तक यह संगठन निष्क्रिय बना रहा तथा इसकी संपूर्ण गतिविधियाँ खादी उत्पादन तक सीमित रहीं। ई.1936 में हीरालाल शास्त्री द्वारा इस संस्था का पुनर्गठन किया गया तथा वकील चिरंजीलाल मिश्र को इसका अध्यक्ष बनाया गया। इसकी शाखायें तहसीलों तक बढ़ा दी गयीं। रियासत के इंस्पेक्टर जनरल पुलिस मि. एफ. एस. यंग को आशंका हुई कि कहीं प्रजा मण्डल जयपुर महाराजा को हटाने के लिये तो कार्य नहीं कर रहा है? प्रजामंडल का उद्देश्य जानने के लिये मि. यंग ने 24 जुलाई 1937 को हीरालाल शास्त्री को एक पत्र लिखा। इस पर हीरालाल शास्त्री ने मि. यंग को पत्र लिखकर सूचित किया कि प्रजामंडल का उद्देश्य महाराजा को हटाना नहीं है।

    उत्तरदायी शासन की मांग

    1938 में जमनालाल बजाज जयपुर प्रजामण्डल के सभापति बनाये गये। उनकी अध्यक्षता में आयोजित प्रजामण्डल के पहले सम्मेलन में जयपुर महाराजा से उत्तरदायी शासन की मांग की गयी। इस सम्मेलन में लगभग 10 हजार स्त्री-पुरुष सम्मिलित हुए। अपने भाषण में बजाज ने कहा कि उत्तरदायी शासन की जो मांग की जाती है, उससे कुछ राजा लोग यह समझ लेते हैं कि ऐसी मांग करने वाले उनके दुश्मन हैं, यह ठीक नहीं है। राजा भले ही राजा बने रहें, मगर वे जो राजकाज करें, वह जनता के महज नाम पर नहीं बल्कि उसकी इच्छा, सलाह और स्वीकृति से करें।

    30 मार्च 1938 को राज्य सरकार ने आदेश जारी किया कि राज्य में कोई भी संस्था बिना पंजीकरण करवाये किसी तरह की गतिविधि नहीं चला सकती। संस्था के पंजीकरण के लिये ऐसी शर्तें लाद दी गयीं जिससे प्रजामण्डल अपनी गतिविधियाँ चला ही नहीं सके। प्रजामंडल ने इस आदेश का विरोध किया। 29 दिसम्बर 1938 को बजाज को जयपुर राज्य में प्रवेश नहीं करने दिया। राज्य के प्रधानमंत्री सर बीचम ने प्रजामण्डल आंदोलन को सख्ती से कुचलने की धमकी दी।

    महात्मा गांधी ने कहा- 'कांग्रेस ताकत में होते हुए भी इंतजार करती रहे और चुपचाप देखती रहे तथा जयपुर की जनता को मानसिक और नैतिक रूप से मरने दे, विशेषकर जबकि एक प्राकृतिक अधिकार पर लगाई गयी ऐसी पाबंदी के पीछे बिटिश साम्राज्य का पंजा हो, ऐसा कांग्रेस के लिये संभव नहीं है। जयपुर के प्रधानमंत्री अगर कोरी सत्ता के बल पर यह सब कर रहे हैं तो कम से कम उनको इस पद से ही हटा देना चाहिये। ' 

    जमनालाल बजाज और उनके साथियों को दुबारा जयपुर में प्रवेश करने पर गिरफ्तार कर लिया गया। इस पर राज्य में सत्याग्रह किया गया। राज्य की ओर से अत्यधिक दमन किये जाने तथा 500 से अधिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किये जाने पर गांधीजी के आदेश पर 19 मार्च 1939 को यह सत्याग्रह बंद कर दिया गया। स्थिति इतनी खराब हो गयी कि गांधीजी ने समाचार पत्रों को एक बयान जारी करके कहा कि 'यदि जयपुर राज्य ने जमनालाल और उनके साथियों को मुक्त नहीं किया तो कांग्रेस के पास जयपुर को अखिल भारतीय मुद्दा बनाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं रहेगा।' 

    संवैधानिक सुधारों की शुरुआत

    प्रजामंडल की मांग सर बीचम के स्थान पर किसी भारतीय व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त किये जाने को लेकर थी। जयपुर नरेश ने राजा ज्ञाननाथ को जयपुर राज्य का प्रधानमंत्री बना दिया। हीरालाल शास्त्री के अनुसार यह व्यक्ति अंग्रेजों का हुक्मी बंदा था। इस व्यक्ति से प्रजामंडल वालों का विरोध ही रहा तथा उत्तरदायी शासन की मांग बनी रही। कुछ दिनों बाद मिर्जा इस्माइल को जयपुर राज्य का प्रधानमंत्री बनाया गया। 1942 में मिर्जा इस्माइल तथा प्रजामण्डल के बीच समझौता हुआ जिसमें यह स्वीकार किया गया कि जयपुर महाराजा की ओर से जनता को उत्तरदायी शासन देने की दृष्टि से कार्यवाही जल्दी शुरू की जायेगी।

    विधान सभा का गठन

    26 अक्टूबर 1942 को जयपुर नरेश ने राज्य में संवैधानिक सुधारों के लिये एक विशेष समिति नियुक्त की। इस समिति ने राज्य में प्रतिनिधि सभा तथा लेजिस्लेटिव एसेम्बली के गठन का सुझाव दिया। ई.1944 में राज्य में कुछ संवैधानिक सुधार किये गये तथा सरदारों की काउंसिल को समाप्त कर दिया गया। 1 जून 1944 को जयपुर राज्य में उत्तरदायी सरकार की स्थापना के लिये 'जयपुर राज्य अधिनियम' पारित किया गया। ई.1945 में राज्य सरकार ने प्रतिनिधि सभा तथा लेजिस्लेटिव एसेम्बली बनाने का निर्णय लिया। प्रजामण्डल को प्रतिनिधि सभा की 27 सीटों पर तथा लेजिस्लेटिव एसेम्बली की 3 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। सितम्बर 1945 में नये व्यवस्थापक मण्डल का गठन हुआ और उत्तरदायी सरकार के लक्ष्य की नीति के अनुसरण में मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री सहित पाँच सदस्यों में एक-एक मंत्री की नियुक्ति धारा सभा में बहुमत प्राप्त दल में से की गयी। विधानसभा के दोनों सदनों में धर्म, व्यवसाय और जागीरदारों को इस ढंग से प्रतिनिधित्व प्राप्त था कि सत्ता जनप्रतिनिधियों को दी जानी संभव नहीं थी।

    उत्तरदायी शासन की स्थापना

    मार्च 1946 में टीकाराम पालीवाल ने विधानसभा में राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना सम्बन्धी प्रस्ताव प्रस्तुत किया जो स्वीकृत हो गया। 15 मई 1946 को प्रजामंडल के अध्यक्ष देवीशंकर तिवाड़ी को राज्य मंत्रिमण्डल में सम्मिलित किया गया। इस प्रकार जयपुर राज्य राजस्थान का पहला राज्य बना जिसने अपने मंत्रिमंडल में गैर सरकारी मंत्री की नियुक्ति की। अक्टूबर 1946 में जयपुर राज्य प्रजामंडल ने एक प्रस्ताव पारित करके देश में हो रहे बड़े परिवर्तनों के मुकाबले जयपुर सरकार की ओर से शासन सुधार मामले में चल रही निष्क्रियता पर विस्तार से प्रकाश डाला तथा मांग की कि जयपुर राज्य की विधान समिति जयपुर के लिये जून 1948 से पहले ऐसे विधान की रचना करे जिसमें शासनतंत्र पूर्ण रूप से जयपुर की जनता के प्रति उत्तरदायी हो। 10 मई 1947 को दौलतमल भण्डारी को प्रजामंडल के दूसरे प्रतिनिधि के रूप में मंत्रिमण्डल में शामिल किया गया। जागीरदारों में से डॉ. खुशालसिंह गीजगढ़ और राव अमरसिंह अजयराजपुरा भी मंत्री बनाये गये।

    मार्च 1946 में जयपुर धारासभा में स्वीकृत उत्तरदायी शासन सम्बन्धी प्रस्ताव को देखते हुए राज्य सरकार की ओर से 14 मई 1947 को एक समिति गठित की गयी। इस बीच राज्य सरकार तथा प्रजामंडल के बीच वार्त्ता चलती रही। तीन माह तक वार्त्ता चलने के बाद राज्य में संवैधानिक सुधारों को लेकर एक समझौता हो गया। राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना का निश्चय किया गया। राज्य के प्रधानमंत्री वी.टी. कृष्णामाचारी ने महाराजा की ओर से 1 मार्च 1948 को संवैधानिक सुधारों की घोषणा की। इस घोषणा का सर्वत्र स्वागत किया गया। यह निश्चय किया गया कि मंत्रिमण्डल को विकसित किया जाये और प्रधानमंत्री को छोड़कर शेष समस्त मंत्री धारासभा के समस्त दलों में से लिये जायें। प्रधानमंत्री को दीवान, मुख्यमंत्री को मुख्य सचिव और मंत्रियों को सचिव कहा जाये। इस प्रकार नये मंत्रिमंडल में एक दीवान, एक मुख्य सचिव तथा पाँच सचिव लिये जाने थे। ये सब वर्तमान विधान के अधीन एक उत्तरदायी मंत्रिमंडल की भांति मिलकर कार्य करेंगे।

    28 मार्च 1948 को महाराजा ने वी.टी. कृष्णामाचारी को दीवान नियुक्त किया तथा हीरालाल शास्त्री को मुख्य सचिव बनाया। देवीशंकर तिवाड़ी, दौलतमल भंडारी और टीकाराम पालीवाल प्रजामंडल की ओर से सचिव बनाये गये। गीजगढ़ के ठाकुर कुशलसिंह और अजयराजपुरा के मेजर जनरल रावल अमरसिंह, जागीरदारों का प्रतिनिधित्व करने वाले सचिव थे। हीरालाल शास्त्री ने सचिव के स्थान पर मंत्री शब्द प्रयुक्त किया है- 'ई.1948 में राज्य में मैसूर मॉडल पर मंत्रिमण्डल का गठन किया गया जिसमें एक दीवान, एक मुख्यमंत्री तथा शेष मंत्री होते थे। राज्य के प्राइम मिनिस्टर वी. टी. कृष्णामाचारी को दीवान बनाया गया। कुछ ऐसा सोचा गया कि सर वी. टी. जैसे दीवान के मुकाबले में किसी मजबूत आदमी को मुख्यमंत्री बनना चाहिये। एसी हालत में जयपुर का मुख्यमंत्री बनने का भार मुझ पर आ पड़ा। मेरे साथ प्रजामंडल से देवीशंकर तिवारी, दौलतमल भंडारी तथा टीकाराम पालीवाल को भी मिनिस्टर बनाया गया। इनके अतिरिक्त ठाकुर कुशालसिंह गीजगढ़ तथा रावल अमरसिंह अजयराजपुरा को भी जागीरदारों की ओर से मिनिस्टर बनाया गया।'

    इस समय तक राजपूताना के राजा कांग्रेस से सहयोग के लिये तैयार हो गये थे। अब वह अपने राज्यों में पहले की तरह इसके अधिवेशन पर रोक लगाने की स्थिति में नहीं रहे थे। 18 दिसम्बर 1948 को जयपुर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। इस पर 55 लाख रुपया खर्च हुआ। इस सम्मेलन के लिये जयपुर राज्य की विशेष मदद रही। जोधपुर, बीकानेर व सिरोही रियासतों एवं राजस्थान संघ ने भी मदद की। सरदार वल्लभ भाई की सहायता से जयपुर, जोधपुर, उदयपुर तथा बीकानेर के महाराजाओं से चंदा लेकर कांग्रेस अधिवेशन का हिसाब साफ किया गया। वृहद राजस्थान का निर्माण होने तक यही लोकप्रिय मंत्रिमण्डल रहा। इस प्रकार जयपुर राज्य में प्रजामंडल द्वारा उत्तरदायी शासन के लिये चलाया गया संघर्ष सफल हुआ।


    जोधपुर राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना

    ई.1917 में जोधपुर में मारवाड़ हितकारणी सभा बनी जिसका संविधान 1924 में प्रकाशित हुआ। इस संस्था ने नगर परिषद व पुलिस एक्ट में सुधार करने के लिये हड़ताल की। ई.1920 में दिल्ली में 'राजस्थान सेवा संघ' की स्थापना के समय जोधपुर में 'मारवाड़ सेवा संघ' की स्थापना हुई। 'मारवाड़ सेवा संघ' का उद्देश्य भ्रष्ट नौकरशाही के कुशासन का प्रतिरोध करना और अवैधानिक कार्यवाहियों के विरुद्ध आवाज उठाना था जिससे कि मारवाड़ की जनता में अपने अधिकारों के प्रति जागृति उत्पन्न हो सके। इस संगठन का सम्बन्ध राजस्थान सेवा संघ से था। मारवाड़ सेवा संघ के सदस्य जयनारायण व्यास, कानमल, दुर्गाशंकर श्रीमाली, भंवरलाल सर्राफ और प्रयागराज भण्डारी थे।

    ई.1924 में 'मारवाड़ सेवा संघ' वालों ने 'मारवाड़ हितकारणी सभा' को एक बार फिर से सक्रिय किया। इस बार संस्था ने महाराजा उम्मेदसिंह के संरक्षण में मारवाड़ राज्य में जनता की स्थिति में सुधार लाने का संकल्प व्यक्त किया। ई.1925 में मारवाड़ हितकारिणी सभा के प्रतापचंद सोनी, चांदमल शर्मा व शिवकरण जोशी को मारवाड़ छोड़कर जाने के आदेश दिये गये तथा जयनारायण व्यास, आनंदराज सुराणा, अब्दुल रहमान अंसारी, अमरचंद मूथा, किस्तूरकरण एवं बच्छराज व्यास को बदमाश घोषित करके उनके नाम पुलिस के रजिस्टर संख्या 10 में लिखे गये। उन्हें प्रति दिन पुलिस केंद्र पर उपस्थित होने तथा प्रति रात्रि पुलिस केंद्र की गार्ड की निगरानी में सोने के आदेश दिये गये। राज्याधिकारियों की ज्यादती से तंग आकर व्यास ने जोधपुर छोड़ दिया और ब्यावर जाकर रहने लगे।

    लोकमान्य तिलक द्वारा आरंभ किये गये गणपति उत्सव और शिवाजी उत्सव की राजनीतिक जागृति में प्रभावी भूमिका को देखते हुए वैद्य हेमचन्द्र छंगाणी ने जुलाई 1928 में जोधपुर में दुर्गादास जयंती के आयोजन की योजना तैयार की। उन्होंने दुर्गादास जयंती उत्सव समिति की ओर से राजकीय प्रेस के अधीक्षक को इस जयन्ती के आयोजन का दो पृष्ठों को एक नोटिस छपने के लिये भेजा जिसमें मारवाड़ की जनता से दुर्गादास जयन्ती मनाने का अनुरोध किया गया। इस अनुरोध को एक असाधारण बात समझा गया। प्रेस अधीक्षक ने इस नोटिस को स्टेट कौंसिल के उपाध्यक्ष विंडम को भेज दिया।

    विंडम ने पुलिस प्रमुख कोठावाला को लिखा- 'दुर्गादास राठौड़ों के इतिहास में अमर है किंतु 200 वर्षों की दीर्घ अवधि में यह प्रथम अवसर है कि कोई व्यक्ति उसकी जयंती के लिये आगे आया है । यदि कोई राठौड़ राजपूत आगे बढ़कर ऐसा अनुरोध करता तो वह अधिक तर्क संगत लगता। हेमचंद छंगाणी एक पुष्करणा ब्राह्मण है और असहयोग आंदोलन के काल से उसकी गतिविधियां संदेहास्पद रही हैं। और मैं यह नहीं समझ पाता कि अगर वह वास्तव में दुर्गादास जयंती मानने के लिये आतुर है तो वह इस सूचना को राज्य के गजट में छपवाने के लिये इतना व्याकुल क्यों है? इस तरह वह प्रशासन से अर्द्धशासकीय अनुमति प्राप्त करना चाहता है। इस पर विंडम ने प्रेस अधीक्षक को आदेश दिया कि यह सामग्री राजकीय गजट में नहीं छापी जाये और नोटिस को गोपनीय फाइल में रखा जाये।' 

    राजकीय प्रेस में प्रकाशित न होने पर वैद्य हेमचन्द्र ने अपने एक अन्य नोटिस को निजी प्रेस में छपवाया तथा 29-31 अगस्त 1928 को जयंती का आयोजन करवाया। राज्य सरकार की ओर से इस जयंती को मनाने में बाधा उत्पन्न की गयी काफी तर्क वितर्क के बाद इसे मनाने की अनुमति दी गयी। इस उत्सव की सफलता से अप्रसन्न होकर राज्य कौंसिल ने निर्णय लिया कि अब किसी भी वक्ता को सार्वजनिक भाषण देने के लिये कौंसिल के उपाध्यक्ष से अनुमति लेनी होगी। 11-12 मई 1929 को जोधपुर में हितकारणी सभा के तत्वावधान में सभायें आयोजित की गयीं। इनमें हेमचन्द्र छंगाणी, जयनारायण व्यास, प्रयाग राज भण्डारी आदि के भाषण हुए। लोगों से बम्बई में आयोजित होने वाले देशी राज्य परिषद के सम्मेलन में भाग लेने की अपील की गयी।

    मारवाड़ हितकारणी सभा ने जोधपुर राज्य में उत्तरदायी शासन की मांग की और राज्य में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समाचार पत्रों की स्वतंत्रता तथा संस्था बनाने की स्वतंत्रता की भी मांग की। ई.1929 में इस सभा ने जागीरों में बेगार रोकने, न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने, धान व चारे के निर्यात पर रोक लगाने, नौकरियों में भर्ती हेतु बोर्ड बनाने आदि मांगों को लेकर आंदोलन किये।

    1929 में अ. भा. देशी राज्य लोक परिषद के बम्बई अधिवेशन में जोधपुर राज्य के जयनारायण व्यास, हेमचंद्र छंगाणी, बद्रीप्रसाद, वेदांत भूषण, जयनारायण तापड़िया, कन्हैयालाल कलयंत्री, भंवरलाल सर्राफ और जयनारायण गज्जा ने भाग लिया। इन नेताओं ने अ. भा. देशीराज्य लोकपरिषद का अगला अधिवेशन जोधपुर में आयोजित करने की योजना बनायी जिसमें गांधी, नेहरू, सप्रू और मालवीय आदि नेताओं को आमंत्रित किया जाना था। सितम्बर 1929 में सम्मेलन के आयोजन पर रोक लगा दी गयी। 22 नवम्बर 1929 को हेमचन्द्र छंगाणी ने वायसराय लॉर्ड इरविन को खुला पत्र भेजकर मारवाड़ के कुशासन की कटु आलोचना की। पत्र में भ्रष्टाचार और विलासिता का वर्णन करते हुए राज्य कौंसिल को एक स्वांग बताया गया जिसमें विंडम के अलावा समस्त सदस्य अनुभवहीन तथा बौने थे। ई.1934 में मारवाड़ पब्लिक सेफ्टी ऑर्डीनेंस लागू किया गया जिससे मारवाड़ की जनता के नागरिक स्वतंत्रता के अधिकारों को धक्का लगा। महाराजा चाहते थे कि जनता ब्रिटिश ताज के संरक्षण में उत्तरदायी शासन के लिये शांति और सहयोग से कार्य करे।

    मारवाड़ प्रजा मण्डल

    ई.1934 में मारवाड़ प्रजामंडल अस्तित्व में आया। इसका मुख्य उद्देश्य सामंतों के अन्याय से पीड़ित किसानों की समस्याओं का निराकरण करवाना तथा राज्य में उत्तरदायी शासन एवं नागरिक स्वतंत्रता की प्राप्ति हेतु आंदोलन चलाना था। ई.1935 में डोनाल्डफील्ड राज्य के मुख्यमंत्री बने। ई.1936 में जोधपुर में भी 'नागरिक स्वतंत्रता संघ' बनाने की चेष्टा की गयी किंतु उस पर तत्काल रोक लगा दी गयी।

    मारवाड़ लोकपरिषद

    ई.1938 में मारवाड़ लोकपरिषद की स्थापना हुई। इस संस्था का उद्देश्य महाराजा की छत्रछाया में मारवाड़ में उत्तरदायी शासन स्थापित करना था। चूंकि जयनारायण व्यास निर्वासन में चल रहे थे इसलिये रणछोड़दास गट्टानी को इसका सभापति बनाया गया। महाराजा उम्मेदसिंह ने मारवाड़ लोकपरिषद में फूट डालने की कोशिश की थी। जब जयनारायण व्यास के पिता सेवाराम मृत्यु शैय्या पर थे तो उन्होंने व्यास को संदेश भिजवाया कि वे चाहें तो अपने पिता को देखने आ सकते हैं। इस पर व्यास ने महाराजा को सूचित किया कि वे आ रहे हैं। आप यदि गिरफ्तार करना चाहें तो कर लें। उनके पिता 12 दिन जिंदा रहे किंतु व्यास को कैद नहीं किया गया। इसके बाद महाराजा ने व्यास को आमंत्रित किया कि आप एडवाइजरी एसेम्बली के सदस्य हो जायें। व्यास ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। उन दिनों भींवराज पुरोहित मारवाड़ लोकपरिषद के अक्ष्यक्ष थे। उन्होंने इस मुद्दे पर कार्यकारिणी की बैठक बुलाईं रणछोड़दास गट्टानी ने मारवाड़ लोकपरिषद की कार्यकारिणी में आपत्ति की कि मारवाड़ लोकपरिषद को विश्वास में लिये बिना व्यास यह प्रस्ताव कैसे स्वीकार कर सकते हैं? इस पर महाराजा समर्थित एक साप्ताहिक समाचार पत्र मारवाड़ समाचार में एक गुमनाम लेख 'गट्टानी का गरल' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। ऐसा माना गया कि यह लेख व्यास ने ही लिखा है। गट्टानी ने समाचार पत्र पर मुकदमा कर दिया। इस पर समाचार पत्र ने गट्टानी से माफी मांग ली।

    1940 में जोधपुर के स्वतंत्रता सेनानी गणेशलाल व्यास 'उस्ताद' ने 'बेकसों की आवाज' नामक पुस्तक का सम्पादन किया। इसे मारवाड़ लोकपरिषद के नेता भंवरलाल सर्राफ ने कामर्शियल प्रेस नयी दिल्ली से छपवाया। 9 अप्रेल 1940 को जोधपुर राज्य ने इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया। 1940 में ही योगीराज ब्रह्मचारी की पुस्तक 'अमानत का हिसाब' को भंवरलाल सर्राफ ने ब्यावर के रामनिवास शर्मा के माध्यम से प्रकाशित करवाया। इस पुस्तक में जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री डोनाल्ड फील्ड के निरंकुश प्रशासन के विरुद्ध अभियान प्रारंभ करने की प्रार्थना जनता से की गयी थी। इस पुस्तक को भी जब्त कर लिया गया।

    मार्च 1940 में मारवाड़ लोकपरिषद को अवैध घोषित कर दिया गया। अप्रेल 1940 में महाराजा उम्मेदसिंह ने अपने एक भाषण में लोकपरिषद के आंदोलन को आधारहीन राजनीतिक आंदोलन बताया तथा चेतावनी दी कि मैं अपने युवा वर्ग को भ्रष्ट बनाने तथा किसानों को विद्रोह के लिये उकसाने हेतु डिजाइन किये गये इस तरह के खुले विध्वंसात्मक आंदोलन को सहन करने के लिये तैयार नहीं हूँ। लोकपरिषद में कई अनुभवहीन युवक हैं जिन्होंने अपने जीवन में कोई सफलता अर्जित नहीं की है। यह परिषद उन्हें नये स्वर्ग तथा नयी धरती के निर्माण का स्वप्न दिखाने की विधि अपना रही है। लोकपरिषद को अवैध घोषित किये जाने तथा महाराजा द्वारा परिषद के कार्यकर्ताओं पर अत्याचार किये जाने के सम्बन्ध में गांधीजी ने हरिजन में चिंता व्यक्त की। गांधीजी का कहना था कि लोकपरिषद की 30 शाखाएं हैं तथा उसमें अनेक अनुभवी सदस्य हैं। लोकपरिषद प्रशासन को सहयोग करने को तैयार है किंतु उसका लक्ष्य राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना है।

    जून 1940 में मारवाड़ लोकपरिषद पुनः वैध संस्था घोषित हुई किंतु जोधपुर नरेश ने राजनीतिक गतिविधियों को रोकने के लिये हर संभव अत्याचार एवं दबाव की नीति अपनायी। हुक्मराज मेहता राजनीतिक गतिविधयों में सक्रिय भाग लेते थे इसलिये मुख्यमंत्री ने बदले की भावना से 25 दिसम्बर 1941 को उनकी विधवा माँ को धमकी भरा पत्र भेजा कि हुक्मराज मेहता राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भाग लेता है, ये राज्य के विरुद्ध है, क्यों नहीं तुम्हारा स्टाईपेण्ड जो 35 रुपये मिलता है, बंद कर दिया जाये? समाचार पत्रों में इसकी भर्त्सना हुई। मारवाड़ लोकपरिषद ने भी सरकार की इस अमानवीय कार्यवाही की निन्दा की जिससे घबराकर सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। मेहता जो कि उम्मेद कृषि फार्म के विद्यार्थी थे, उन्हें कोई कारण बताये बिना प्रतिबंधित कर दिया गया।

    8 फरवरी 1942 को रणछोड़दास गट्टानी की अध्यक्षता में लाडनूं में मारवाड़ लोकपरिषद का तृतीय सत्र आयोजित किया गया। उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री डी. एम. फील्ड पर वचनभंग का आरोप लगाते हुए कहा कि हमारे राज्य का मुख्यमंत्री ब्रिटिश है। उसने अपने वायदों को गंभीरता से नहीं निभाया है। उसने 22 एडवाइजरी बोर्ड्स से ताश के पत्तों का घर बनाया और तोड़ दिया। उसने पंचायतें बनायीं तथा अब प्रतिनिधि सलहाकार सभा भी बनायी है किंतु इन संस्थाओं ने अपने निर्माण के बाद क्या भलाई की है? जनता तीन दारों- थानेदारों, हवलदारों तथा जागीरदारों की निरंकुशता से त्रस्त है।

    आंदोलन के दौरान जून 1942 में जेल में बंद लोकपरिषद के कार्यकर्ता बालमुकुंद बिस्सा की मृत्यु हो गयी। इस पर गांधीजी ने कांग्रेस के कार्यकर्ता श्रीप्रकाश को जोधपुर राज्य के अधिकारियों से वार्त्ता करने के लिये भेजा। श्रीप्रकाश ने रिपोर्ट दी कि जोधपुर राज्य के अधिकारियों ने लोगों को कुचलने के लिये मुक्त लाठी चार्ज के आदेश दिये। लोकपरिषद के कुछ नेता अपनी भाषा में संयमित नहीं रहे हैं। यदि लोकपरिषद के नेता अपनी भाषा सीमा के अंदर रखें तो राज्याधिकारियों को लोकपरिषद द्वारा बैठकें आयोजित करने तथा उत्तरदायी शासन की मांग करने में भी कोई आपत्ति नहीं है। 14 नवम्बर 1942 को डी. एम. फील्ड ने आदेश जारी किये कि चूंकि श्रीवल्लभ पुष्करणा जो कि कोर्ट ऑफ वार्ड्स विभाग का पूर्व कार्मिक है, उसने खुले रूप से लोकपरिषद के आंदोलन के प्रति सहानुभूति प्रकट की है इसलिये उसे किसी भी सरकारी विभाग में नौकरी न दी जाये। ई.1942 में जयनारायण व्यास ने एक पुस्तिका लिखी- 'उत्तरदायी शासन के लिये आंदोलन।' रणछोड़दास गट्टानी ने एक और पुस्तिका लिखी- 'आंदोलन क्यों?' सरकार ने व्यास की पुस्तिका के वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया और व्यास को गिरफ्तार कर लिया।

    विधान सभा का गठन

    ई.1944 में राज्य में संवैधानिक सुधारों को लेकर बड़ौदा राज्य के मुख्य न्यायाधीश राजरत्न एम. ए. सुधालकर की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी जिसने अपनी रिपोर्ट नवम्बर 1944 में राज्य सरकार को सौंपी। इस समिति की सिफारिश के आधार पर 24 जुलाई 1945 को महाराजा उम्मेदसिंह ने अपने जन्म दिवस पर जोधपुर राज्य में विधानसभा के गठन की घोषणा की। 28 मार्च 1947 को महाराजा ने दी जोधपुर लेजिस्लेटिव एसेम्बली रूल्स का अनुमोदन किया। राज्य सरकार इस समिति की सिफारिशों के आधार पर राज्य में संवैधानिक सुधार करना चाहती थी किंतु मारवाड़ लोकपरिषद् ने इस समिति की सिफारिशों को यह कह कर मानने से इन्कार कर दिया कि ये सुधार अपर्याप्त ही नहीं थे अपितु वे राज्यों में उत्तरदायी शासन प्राप्त करने की वैध जन आकांक्षा को भी पूरा नहीं करते थे। परिषद् ने सुधालकर समिति की पूरी रिपोर्ट को प्रकाशित करने की मांग की किंतु राज्य सरकार ऐसा करने के लिये तैयार नहीं थी।

    इसी बीच महाराजा उम्मेदसिंह की मृत्यु हो गयी तथा 21 जून 1947 को हनवंतसिंह को जोधपुर का महाराजा बनाया गया। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हो गया। स्वतंत्रता दिवस की प्रसन्नता में जोधपुर नगर में स्थित पीपलिया महादेव मंदिर के द्वार हरिजनों तथा अन्य अछूतों के लिये खोल दिये गये।

    लोकपरिषद द्वारा विधानसभा तथा मंत्रिमण्डल का विरोध जारी रहा। यह आरोप लगाया गया कि जोधपुर की मौजूदा मिनिस्ट्री जागीरदारों का अखाड़ा बना हुआ है। मौजूदा ऐसेम्बली अधिकार शून्य, थोथी और खोखली है जिसे कोई भी जनतंत्रवादी बर्दाश्त नहीं कर सकता। मारवाड़ की तमाम जनवादी संस्थाओं ने सुधालकर योजना पर किये गये सुधारों का डट कर विरोध किया था लेकिन उस सबके बावजूद थोथी और अधिकारहीन धारा सभा स्थापित कर दी गयी। लोकपरिषद्, किसान सभा, महिला परिषद और मजदूर सभाओं के बहिष्कार करने के परिणाम स्वरूप धारा सभा में जागीरदार, जातीय विद्वेष के हिमायती, या देहातों में जागीरदारों अथवा सरकारी हुक्कामों के कृपापात्र ही पहुँचाये गये हैं।

    नया मंत्रिमण्डल

    महाराजा हनवंतसिंह ने 24 अक्टूबर 1947 को राज्य में नये मंत्रिमण्डल के गठन की घोषणा की तथा कहा कि नये मंत्रिमण्डल में केवल मारवाड़ी लोग लिये गये हैं। उन्होंने अपने काका महाराजधिराज अजीतसिंह को राज्य का प्रधानमंत्री नियुक्त किया तथा दूसरे छोटे भाई 22 वर्षीय महाराज हिम्मतसिंह को राज्य का गृहमंत्री बनाया। संखवास के ठाकुर माधोसिंह को राजस्व मंत्री, लाला हरिश्चंद्र माथुर को न्यायमंत्री, ठाकुर भैंरूसिंह को जनस्वास्थ्य मंत्री तथा मेहता जसवंतराज को स्थानीय निकाय मंत्री नियुक्त किया।

    महाराजा ने उसी दिन यह घोषणा भी की कि 17 नवम्बर 1947 को विधान सभा का अधिवेशन बुलाया जायेगा। इस मंत्रिमण्डल के गठन से नेहरू और पटेल बहुत नाराज हो गये। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शीघ्रातिशीघ्र जनतंत्रवादी मंत्रिमण्डल बनना चाहिये तथा महाराजा को जयनारायण व्यास का विश्वास प्राप्त करना चाहिये और वैधानिक समस्या को जल्द सुलझा देना चाहिये। राष्ट्रपताका ने जातीयता के आधार पर बने इस मंत्रिमण्डल की कटु आलोचना की अपने पिता उम्मेदसिंह की तरह महाराजा हनवंतसिंह ने भी मारवाड़ लोकपरषिद में फूट डालने का प्रयास किया। रणछोड़दास गट्टानी के छोटे भाई मोहन गट्टानी महाराजा के सहपाठी थे। उनके माध्यम से हनवंतसिंह ने रणछोड़दास गट्टानी को मंत्रिपरिषद की सदस्यता के लिये आमंत्रित किया किंतु गट्टानी ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

    विधान सभा का विरोध

    महाराजा की घोषणा को देखते हुए मारवाड़ लोकपरिषद ने 14 नवम्बर 1947 को एसेम्बली विरोधी दिवस मनाने का निर्णय लिया। अतः पूरे राज्य में विरोध सभायें आयोजित की गयीं। 16 नवम्बर 1947 को जोधपुर में आयोजित एसेम्बली विरोधी सभा में मारवाड़ लोकपरिषद के साथ-साथ किसान सभा, विद्यार्थी संघ, रेलवे यूनियन एवं महिला परिषद् के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सभा में जागीरदारों के प्रभुत्ववाली विधान सभा की समाप्ति तथा वयस्क मताधिकार के आधार पर राज्य में निर्वाचित संविधान निर्मात्री संस्था एवं जनता की अंतरिम सरकार की स्थापना की मांगें रखी गयीं। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये राज्य में विरोध सभायें आयोजित करने एवं आंदोलन चलाने का निर्णय लिया गया। साथ ही नेहरू ब्रिगेड की स्थापना की गयी जो राज्य में होने वाली जन सभाओं को हुल्लड़ करने वाले गुण्डा तत्वों से बचाये।

    हनवंतसिंह अपनी घोषणा पर डटे रहे। उन्होंने 17 नवम्बर 1947 को राइकाबाग राजमहल के कैबिनेट हॉल में राज्य की विधान सभा का उद्घाटन किया। महाराजा ने अपने उद्बोधन में कहा कि जोधपुर राज्य अधिनियम 1947 मारवाड़ के वैधानिक इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ है। राज्य शासन के साथ जनता का संपर्क स्थापित करने के अभिलिषित उद्देश्य की ओर यह पहला कदम है। मेरे जीवन में वह दिन सबसे अधिक आनंददायक होगा जब मैं अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह विधान के अनुरूप कर सकूंगा। राज्य के प्रथम सेवक के नाते मरुधर प्रदेश को यथासामर्थ्य सुखी तथा समृद्धिशाली बनाने की मेरी तीव्र आकांक्षा है।

    धारा सभा में मारवाड़ सेवा मण्डल के सदस्यों ने इन्द्रनाथ मोदी की अध्यक्षता में स्वतंत्र पार्टी का निर्माण किया। मदनगोपाल काबरा को इस पार्टी का मंत्री बनाया गया। इस पार्टी की तरफ से धारा सभा के मंत्री को 30 नवम्बर 47 को आगामी अधिवेशन के लिये प्रस्ताव भेजा गया कि राज्य की शासन व्यवस्था में आवश्यक वैधानिक सुधार प्रस्तुत करने हेतु एक विधान सुधार समिति शीघ्र स्थापित की जावे जिसका उद्देश्य महाराजा की छत्रछाया में जिम्मेवार हुकूमत कायम करने का हो। इस समिति के सदस्य केवल वर्तमान धारा सभा के सदस्यों में से ही न चुने जायें बल्कि उन वर्गों व राजनैतिक संस्थाओं में से भी शरीक किये जायें जिनका प्रतिनिधित्व धारा सभा में नहीं हो सका है। यह समिति तीन माह में नये विधान का मसविदा पेश करे ताकि उसे अति शीघ्र क्रियात्मक रूप दिया जा सके।

    7 दिसम्बर 1947 को जोधपुर में राजपूताना प्रांतीय परिषद का सम्मेलन हुआ। राजस्थान की विभिन्न रियासतों में बने लोकप्रिय मंत्रिमण्डलों में लोकपरिषद तथा प्रजापरिषद के जो नेता लिये गये थे, उन्होंने भी इस सम्मेलन में भाग लिया। महाराजा समर्थकों ने इस अधिवेशन का विरोध किया तथा कहा कि केवल बालिग मताधिकार के आधार पर बनने वाले मंत्रिमण्डल के मंत्री ही वास्तविक जनप्रतिनिधि होने का दावा कर सकते हैं। ऊपर से थोपकर बनाये गये मंत्री जनप्रतिनिधि नहीं माने जा सकते। जयनारायण व्यास द्वारा इस सम्मेलन में दिये गये भाषण की भी महाराजा समर्थकों द्वारा आलोचना की गयी। उन्होंने आरोप लगाया कि व्यास ने राजाओं से मोर्चा लेने के लिये रियासतों में सैनिक जन-संगठन बनाने की ओर इशारा किया है। भाषण के जोशीले शब्दों से आभास होता है कि रियासती जनता में क्रांति की भयानक आग धधक उठी है। ऐसा प्रतीत होता है कि आगामी कुछ ही महीनों में शायद राजपूताने के सामंतवादी ढांचे को चेतन जनता सशस्त्र विद्रोह के जरिये एक ही झटके में समाप्त कर देगी।......आज नेतागण लोकप्रिय मंत्रियों की नियुक्ति मात्र से संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने खुली चुनौती दी है कि या तो उनकी संस्था को सरकार सौंप दी जाये अथवा उन्हें समाप्त होने पर मजबूर होना पड़ेगा।

    जनवरी 1948 में लोकपरिषद ने घोषित किया कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यदि कोई महत्त्वपूर्ण समस्या रह गयी है तो वह है देशी राज्यों में राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने की। अतः अब उत्तरदायी शासन प्राप्त करने के लिये सीधी कार्यवाही की जाये। महाराजा समर्थकों के अनुसार जिन्होंने आंदोलन के बल पर ही देश के शासन को हथियाना अपना ध्येय बना रखा है, वे किसी बात की परवाह क्यों करने लगे? मारवाड़ लोकपरिषद ने अविलम्ब लोकप्रिय अन्तर्कालीन सरकार की स्थापना के लिये संघर्ष छेड़ने का निश्चय किया और व्यास को इसके संचालन के अधिकार सौंप दिये। महाराजा समर्थकों ने लोकपरिषद के इस कदम की आलोचना की।

    विधान निर्मात्री परिषद का गठन

    तो 4 फरवरी 1948 को हनवंतसिंह ने घोषणा की कि राज्य में काम कर रहे मंत्रिमण्डल में लोकप्रिय मंत्रियों की संख्या 2 से बढ़ाकर 4 की जायेगी। इनमें से एक मंत्री किसान प्रतिनिधियों में से होगा। महाराजा ने यह भी घोषणा की कि शीघ्र ही राज्य में विधान निर्मात्री परिषद् का गठन किया जायेगा जिसमें अल्पसंख्यकों के लिये पद सुरक्षित रहेंगे। परिषद के चुनाव में महिलायें भी भाग ले सकेंगी। परिषद् के विधान निर्माण सम्बन्धी अधिकारों पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं होगा। परिषद का निर्माण मेरे प्रजाजनों में से, मेरी छत्रछाया में होगा इसलिये यह परिषद मारवाड़ के शासन संचालन हेतु जो विधान बनायेगी उसको स्वीकार करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी।

    महाराजा ने राज्य के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति बनायी जिसमें निम्नलिखित सदस्य रखे गये- वर्तमान धारा सभा द्वारा मनोनीत दो जागीरदार, चार गैर सरकारी सदस्य जिनका मनोनयन विधान निर्मात्री परिषद द्वारा अपने सदस्यों में से किया जायेगा। इनमें से एक परिषद् के बाहर से भी लिया जा सकेगा। इन चार सदस्यों में से एक सदस्य विधान परिषद के मुस्लिम सदस्यों में से होगा। एक महिला सदस्य होगी जिसका मनोनयन विधान परिषद् द्वारा किया जायेगा। यह महिला परिषद् के बाहर से भी ली जा सकेगी। राज्य के विधि सलाहकार भी इसके सदस्य होंगे। राज्य के विधि सचिव इस समिति के मंत्री होंगे। जयनारायण व्यास ने महाराजा हनवंतसिंह की इस घोषणा पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि महाराजा ने जिन सुधारों व जिस प्रक्रिया की घोषणा की है उससे उत्तरदायी शासन के आरंभ होने में विलम्ब होगा। किसानों को अलग से प्रतिनिधित्व देकर महाराजा ने राज्य की जनता में फूट डालने का भी प्रयास किया है।

    व्यास ने महाराजा को चेतावनी दी कि यदि तुरंत प्रजातांत्रिक सरकार का निर्माण नहीं किया गया तो वे एक माह पश्चात् अर्थात 8 मार्च 1948 से आंदोलन आरंभ करेंगे। व्यास के इस वक्तव्य पर महाराजा समर्थकों की प्रतिक्रिया थी कि 'राज्य का शासन राजपूत जाति के हाथ में होने तथा राजपूतों पर ही सैनिक संरक्षण का भार होने पर भी क्या उचित होगा कि लोकपरिषद् जिसने इस जाति को भड़का रखा है, को शासन अधिकार देकर अव्यवस्था उत्पन्न की जावे?' 

    जब महाराजा ने देखा कि उनको छोड़कर सारे राजा केन्द्र के सामने समर्पण कर चुके हैं तो उन्होंने राज्य में उत्तरदायी सरकार के गठन करवाने के लिये वी. पी. मेनन को जोधपुर बुलाया। मेनन 28 फरवरी 1948 को जोधपुर आये। स्थानीय नेताओं में से उन्होंने केवल जयनारायण व्यास को ही बातचीत के लिये बुलाया। मेनन के समक्ष हजारों लोगों ने लोकपरिषद के विरुद्ध प्रदर्शन किया तथा नारे लगाये कि लोकपरिषद के नेता स्वार्थी और चोर हैं। उनमें कोई योग्यता नहीं है। जनता का भाग्य उनके हाथ में नहीं सौंपा जाना चाहिये।

    जागीरदारों के लोगों द्वारा मेनन के समक्ष किये जा रहे प्रदर्शन को देखकर लोकपरिषद के नेताओं ने भी मेनन के समक्ष अपने पक्ष में प्रदर्शन किया और पर्चे फैंके किंतु उनकी संख्या बहुत कम थी इसलिये मेनन का ध्यान उन तक नहीं पहुंचा। कुछ लोगों ने लोकपरिषद वालों की पिटाई कर दी। जब मेनन ने इस प्रदर्शन का जिक्र जयनारायण व्यास से किया तो व्यास ने कहा कि यह लोकपरिषद के विरोधियों का षड़यंत्र था।

    उत्तरदायी शासन की स्थापना

    1 मार्च को मेनन ने संवाददाता सम्मेलन में बयान दिया कि सम्बन्धित पक्षों में समझौता हो चुका है। जयनारायण व्यास राज्य प्रशासन के अध्यक्ष होंगे। 3 मार्च 1948 को एक संयुक्त मंत्रिमण्डल का गठन किया गया। संखवास के ठाकुर माधोसिंह को दीवान बनाया गया। जयनारायण व्यास को प्रधानमंत्री बनाया गया। ठाकुर भैरोंसिंह खेजड़ला को स्वास्थ्य मंत्री, चौधरी नाथूराम को कृषि पंचायत मंत्री तथा बरकत्तुल्ला खां को विशेष मंत्री बनाया गया। मंत्रिमण्डल में ठाकुर भैंरोसिंह जागीरदारों के, चौधरी नाथूराम किसानों के तथा बरकत्तुल्ला खां मुसलमानों के प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। इस मंत्रिमण्डल से आशा की जाती थी कि राज्य की जनता के समस्त वर्ग इससे संतुष्ट हो जायेंगे किंतु लोकपरिषद के नेता इससे संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने बरकतुल्ला खां को राज्य का जागीरदार होने के कारण नापसंद कर दिया। उस समय तक बरकतुल्ला खां अल्पज्ञात थे अतः लोगों के बीच लोकप्रिय भी नहीं थे। नाथूराम तथा बरकतुल्ला खां ने कभी भी लोकपरिषद द्वारा उत्तरदायी शासन के लिये चलाये गये आंदोलनों मे भाग नहीं लिया था। नाथूराम को मंत्रिमण्डल में लेने से जाटों के वरिष्ठ नेता बलदेवराम मिर्धा भी असंतुष्ट थे। उन्होंने महाराजा को संदेश भिजवाया कि किसानों के प्रतिनिधि के रूप में नाथूराम के स्थान पर मुझे मंत्री बनाया जाये। इस पर महाराजा ने व्यास से बात की किंतु व्यास ने बलदेवराम के स्थान पर नाथूराम को प्राथमिकता दी। व्यास ने यह कह कर मिर्धा का विरोध किया कि मिर्धा संकीर्ण विचारों के व्यक्ति हैं और वे जाटों के अतिरिक्त और किसी को किसान ही नहीं मानते।

    मंत्रमण्डल के गठन पर रियासती ने टिप्पणी की कि मारवाड़ में आज से हरिश्चंद्रशाही खत्म कर दी गयी.....उन्हें सपने में भी यह ख्याल न था कि उनकी सत्ता का पटाक्षेप इतनी जल्दी और अचानक हो जायेगा, स्वामी माधवानंदजी भी उन्हें नहीं बचा सकेंगे। माथुर ने अपने कई दोस्तों से एक पेशेवर कूटनीतिज्ञ की तरह गर्व और गुरूर की बोली में कहा था कि हमारी मिनिस्ट्री कोई हलवा नहीं है जिसे आसानी से चुपके से आकर कोई निगल जाये। यही हाल जसवंतराज मेहता का था। उन्हें पता नहीं था कि सामंती हुकूमत में मि. चौबेजी को छब्बे बनने के बदले इतनी जल्दी दुब्बे बनकर निकलना पड़ेगा। महाराज अजीतसिंह और महाराज हिम्मतसिंह मिनिस्ट्रियों से त्यागपत्र देकर अपनी जागीरों को संभालने के नाम पर चुपके से राजमहलों को लौट गये।

    जयनारायण व्यास की टिप्पणी थी कि यथार्थ संवैधानिक अभिव्यक्ति के अनुसार वह पूर्ण उत्तरदायी सरकार नहीं थी परंतु निश्चित रूप से उसे प्राप्त करने का वह सही कदम था। मंत्रिमण्डल के गठन के बाद महाराजा हनवंतसिंह से हुई बातचीत के बाद व्यास ने कहा कि महाराजा ने बड़ी ही उदारता और न्यायोचित तरीकों से हमारी सिफारिशों को स्वीकार करते हुए अपने पास कुछ भी अधिकार सुरक्षित नहीं रखकर अपने व्यक्तिगत खर्च तक के सवाल को भी जनता के मत द्वारा तय करवाना मंजूर कर लिया है।

    नये मंत्रिमण्डल के बनने पर लोकपरिषद के असंतुष्ट नेताओं ने स्थानीय समाचार पत्रों के माध्यम से महाराजा के विरुद्ध प्रचार करना आरंभ कर दिया। सरदार पटेल तथा जयनारायण व्यास पर दबाव डाला गया कि वे लोकपरिषद के अन्य नेताओं को भी मंत्रिमण्डल में शामिल करवायें। व्यास ने पटेल से आग्रह किया कि वे महाराजा को मंत्रिमंडल में लोकपरिषद को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के लिये बाध्य करें। सरदार पटेल के प्रयास से मंत्रिमण्डल का तीसरी बार पुनर्गठन किया गया। 17 जून 1948 को फिर से महाराज अजीतसिंह को दीवान बनाया गया। जयनारायण व्यास को प्रधानमंत्री, राज्यरत्न लाला हरिश्चंद्र को गृहमंत्री, ठाकुर भैंरोसिंह को स्वास्थ्य मंत्री, नाथूराम मिर्धा को कृषि मंत्री, मथुरादास माथुर (लोकपरिषद) को शिक्षा मंत्री, द्वारिकादास पुरोहित (लोकपरिषद) को अर्थ मंत्री तथा रावराजा नरपतसिंह को मिनिस्टर इन वेटिंग (महाराजा की सेवार्थ मंत्री) बनाया गया। दीवान अजीतसिंह को मंत्रिमण्डल का अध्यक्ष घोषित किया गया।

    शीघ्र ही नये मंत्रिमण्डल में मतभेद उभर आये। महाराजा भी मंत्रिमण्डल के कामकाज से असंतुष्ट थे। जनता में भी मंत्रिमण्डल के विरुद्ध असंतोष फैलने लगा। मंत्रियों के विरुद्ध खुले आम जातिवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। इस पर महाराजा ने वी. पी. मेनन तथा गोपालस्वामी आयंगर से सहयोग मांगा। परिणामस्वरूप मध्यभारत के एक वरिष्ठ आई.सी. एस. अधिकारी पी. एस. राव को दीवान के पद पर नियुक्त करने पर विचार हुआ। 14 अगस्त 1948 को महाराजा ने पटेल से इस विषय पर विचार विमर्श किया तथा उनकी सलाह पर चौथी बार मंत्रिमण्डल का पुनर्गठन किया। 31 अगस्त 1948 को बने चौथे मंत्रिमण्डल में पी. एस. राव (आई.सी.एस.) को राज्य का दीवान, जयनारायण व्यास को प्रधानमंत्री, द्वारकादास पुरोहित को अर्थ मंत्री, नाथूराम मिर्धा को कृषि मंत्री तथा मथुरादास माथुर को शिक्षामंत्री बनाया गया। कर्नल महाराज प्रेमसिंह तथा ठाकुर भैंरोसिंह खेजड़ला को मंत्री बनाया गया। एक स्थान रिक्त रखा गया जिसकी घोषणा बाद में होनी थी।

    मंत्रिमण्डल में चार सदस्य लोकपरिषद से, एक जागीरदारों से, एक राजपूतों से तथा एक सदस्य किसान प्रतिनिधियों से लेना तय हुआ था। जागीरदारों के प्रतिनिधि के रूप में ठाकुर भैंरोंसिंह व राजपूतों के प्रतिनिधि के रूप में प्रेमसिंह को लिया गया। मारवाड़ राजपूत सभा ने इन दोनों को मंत्रिमण्डल से बाहर रहने के निर्देश दिये जिससे वे मंत्रिमण्डल में शामिल नहीं हुए। सरकार ने 6 सितम्बर 1948 को एक विज्ञप्ति जारी करके इस बात पर दुख प्रकट किया कि मंत्रिमण्डल में समस्त वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास इन प्रतिनिधियों के मना कर देने से असफल हो गया है। सरकार ने दोनों पदों को रिक्त घोषित किया और कहा कि इन पदों को निकट भविष्य में जागीरदारों और राजपूतों के प्रतिनिधियों से विचार करके भरा जायेगा।

    मारवाड़़ राजपूत सभा ने प्रस्ताव पारित किया कि कोई भी राजपूत इस मंत्रिमण्डल में शामिल नहीं हो। इससे महाराजा तथा लोकपरिषद वालों को चिंता हुई कि यदि राजपूत शामिल नहीं हुए तो वे मंत्रिमण्डल के विरुद्ध आंदोलन चलायेंगे जिससे राज्य का शासन ठप्प हो जायेगा। इस पर लोकपरिषद ने किसी तरह प्रयास करके ब्रिगेडियर रायबहादुर रावराजा हणूतसिंह तथा बाघावास के सेवानिवृत्त ले. कर्नल बहादुरसिंह को मंत्री बनवा दिया। राजपूत सभा ने इन दोनों को अपना प्रतिनिधि मानने से इन्कार कर दिया। जोधपुर राज्य का यह चौथा मंत्रिमण्डल वास्तविक अर्थों में लोकप्रिय मंत्रिमण्डल था। इसकी स्थापना के साथ ही राज्य में उत्तरदायी शासन का लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया किंतु इस समय तक देशी राज्यों में उत्तरदायी शासन की स्थापना का अधिक महत्त्व नहीं रह गया था। राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया काफी तेजी से चल रही थी। अतः यह मंत्रिमण्डल जोधपुर राज्य के राजस्थान में एकीकरण सम्बन्घी कार्यवाही में ही अधिक व्यस्त रहा। परिणामस्वरूप 30 मार्च 1949 को जोधपुर राज्य राजस्थान में मिल गया।


    उदयपुर राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना

    महाराणा भूपालसिंह (1929-1949) के शासन काल में उदयपुर राज्य में उत्तरदायी शासन के लिये राज्य की प्रजा के द्वारा आंदोलन चलाया गया। उदयपुर रियासत में भी राजपूताना की अन्य रियासतों की भांति नागरिक अधिकारों की स्थिति अत्यंत शौचनीय थी।

    मेवाड़ प्रजामंडल की गतिविधियां

    उदयपुर राज्य में बिजौलिया आंदोलन के कारण सरकार का दमन चक्र अपने जोरों पर था। बिजौलिया आंदोलन में भाग लेने के कारण माणिक्यलाल वर्मा को उदयपुर राज्य से निष्कासित कर दिया गया था। वर्मा ने अजमेर में रहते हुए मेवाड़ प्रजामंडल स्थापित करने की योजना बनायी। उन्होंने कुछ पर्चे, प्रजामण्डल के गीत तथा 'मेवाड़ राज्य का शासन' नाम से एक पुस्तिका छपवाईं इस पुस्तिका में मेवाड़ राज्य के प्रत्येक विभाग की आलोचना की गयी और कहा गया कि जब तक उत्तरदायी शासन की स्थापना नहीं होगी तब तक मौजूदा शासन की त्रुटियां समाप्त नहीं हो सकतीं। उन्होंने हर मेवाड़वासी से अपील की कि वह मेवाड़ में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये अपना तन-मन-धन अर्पित कर दे।

    निर्वासन समाप्ति के बाद माणिक्यलाल वर्मा ने उदयपुर पहुँचकर 24 अप्रेल 1938 को बलवंतसिंह मेहता, भवानीशंकर वैद्य, जमनालाल वैद्य, परसराम तथा दयाशंकर श्रोत्रिय के साथ मिलकर 'मेवाड़ प्रजामंडल' की स्थापना की। इसका प्रथम सभापति बलवंतसिंह मेहता को तथा मंत्री माणिक्यलाल वर्मा को बनाया गया। जनता में अभूतपूर्व उत्साह के साथ प्रजामंडल चर्चा का विषय बन गया। 6 मई 1938 से प्रजामंडल ने सदस्यता अभियान चलाया। एक सप्ताह से भी कम समय में इसके एक हजार सदस्य बन गये। इससे राज्य सरकार के कान खड़े हो गये। अतः राज्य सरकार ने 11 मई 1938 को एक राजाज्ञा प्रसारित करके महकमा खास को अधिकार दिया गया कि वह किसी भी समाचार पत्र के मेवाड़ में प्रवेश को रोक सकता है। नौ साल पहले के उस परिपत्र को फिर से लागू कर दिया गया जिसके अनुसार राज्य में बिना अधिकारियों की आज्ञा लिये सभा, कथा, रास, धार्मिक समारोह करने, संस्थायें बनाने और जुलूस निकालने पर प्रतिबंध लगा हुआ था।

    24 सितम्बर 1938 को राज्य सरकार ने मेवाड़ प्रजा मण्डल को गैरकानूनी संस्था घोषित कर दिया। समस्त पटेलों और पटवारियों को आदेश दिये गये कि यदि कोई व्यक्ति प्रजामंडल की गतिविधियों का प्रचार करता हुआ पाया जाये तो उसकी सूचना थानों में लिखवायें। पुलिस ने प्रजामंडल के कार्यालय पर ताले लगवा दिये तथा माणिक्यलाल वर्मा और रमेश व्यास को मेवाड़ से निष्कासित कर दिया।

    प्रजामंडल ने राज्य सरकार को अल्टीमेटम दिया कि यदि 4 अक्टूबर तक राज्य सरकार ने प्रजामंडल से प्रतिबंध नहीं हटाया तो आंदोलन चलाया जायेगा। माणिक्यलाल वर्मा को उस आंदोलन का डिक्टेटर बनाया गया। इस पर राज्य सरकार द्वारा प्रजामंडल के नेताओं का उत्पीड़न किया जाने लगा। अनेक लोगों को बंदी बना लिया गया। इस पर प्रजामंडल द्वारा एक और पर्चा 'मेवाड़ का बोपारी और कसान सू अरज' प्रकाशित किया गया। माणिक्यलाल वर्मा लगातार प्रजामंडल से प्रतिबंध हटाने की अपील करते रहे। जमनालाल बजाज ने भी मेवाड़ के प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर प्रतिबंध हटाने की मांग की किंतु मेवाड़ सरकार पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। पूरे राज्य में सत्याग्रह आंदोलन चलाया गया जिसका सरकार द्वारा बुरी तरह से दमन किया गया। राज्य के समस्त मुद्रणालयों पर छापे मारे गये तथा बाहर से आने वाले पार्सलों को पोस्ट ऑफिस के निकटतम पुलिस थाने में जमा करवाने के आदेश दिये गये। वर्मा अजमेर में रहकर प्रजामंडल का संचालन कर रहे थे। 2 फरवरी 1939 को जब वर्मा देवली में प्रजामंडल के गीत गा रहे थे तब मेवाड़ राज्य की पुलिस ने सादे कपड़ों में अजमेर कमिश्नरी के क्षेत्र में प्रवेश किया और वर्मा को घसीटकर मेवाड़ की सीमा में ले आये। उन्हें जबर्दस्त पीटा गया जिससे काफी रक्त बहा। जब मेवाड़ के इस अमानुषिक व्यवहार की जानकारी गांधीजी को हुई तो उन्होंने 18 फरवरी 1938 के हरिजन में एक वक्तव्य दिया कि प्रजामण्डल को इस अमानुषिक कार्यवाही के विरोध में कानूनी कार्यवाही करनी चाहिये। गांधीजी द्वारा की गयी इस आलोचना से भारत सरकार का विदेश विभाग सक्रिय हुआ और मेवाड़ रेजीडेंट से रिपोर्ट मांगी गयी।

    मेवाड़ में उत्तरदायी शासन की मांग

    जब राज्य का दमन बढ़ गया तो गांधीजी के आदेश से 3 मार्च 1939 को आंदोलन समाप्त कर दिया गया। दीवान धर्मनाराण के स्थान पर सर टी. विजयराघवाचारी उदयपुर राज्य के नये दीवान बने। उन्होंने 22 फरवरी 1941 को महाराणा के जन्म दिन पर प्रजामंडल पर से प्रतिबंध हटा लिया। प्रतिबंध हटते ही प्रजामंडल ने अपनी गतिविधियाँ तेज कर दीं। नवम्बर 1941 में प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन हुआ जिसका उद्घाटन आचार्य कृपलानी ने किया। सम्मेलन में मांग की गयी कि मेवाड़ में तुरंत उत्तरदायी शासन लागू किया जाये। निर्वाचित विधान सभा बनायी जाये। लोक सेवकों का निष्कासन रद्द किया जाये। किसान, व्यापारी, अल्प वेतन भोगियों को विशेष सुविधायें दी जायें। फरवरी 1942 में राज्य में उत्तरदायी शासन दिवस मनाने की घोषणा की गयी। 20 अगस्त 1942 को मेवाड़ प्रजामंडल ने माणिक्यलाल वर्मा के नेतृत्व में महाराणा से मांग की कि वह 24 घण्टे के भीतर-भीतर अंग्रेज सरकार से समस्त प्रकार के सम्बन्ध तोड़ ले तथा राज्य में शीघ्र ही उत्तरदायी शासन लागू करने की घोषणा करे।

    21 अगस्त 1942 को फिर से प्रजामंडल को गैर कानूनी संस्था घोषित कर दिया गया और माणिक्यलाल वर्मा सहित 15 प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इस पर छात्र भी आंदोलन में कूद पड़े। राज्य की शिक्षण संस्थायें कई दिनों तक बंद रहीं। सरकार ने लगभग 600 छात्रों को गिरफ्तार कर लिया। दो छात्रों ने हाईकोर्ट भवन पर चढ़ कर तिरंगा लगा दिया। उन्हें उसी समय गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। 25 जनवरी 1943 को उदयपुर में विक्टोरिया चबूतरे पर चढ़कर महारानी विक्टोरिया की मूर्ति पर काला रंग पोत दिया गया। राज्य की स्थिति बिगड़ती देखकर राज्य सरकार ने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के माध्यम से प्रजामंडल से समझौता करने का प्रयास किया किंतु माणिक्यलाल वर्मा ने झुकने से इन्कार कर दिया। राजगोपालाचारी ने वर्माजी से अनुरोध किया कि वे अपना आंदोलन वापस ले लें तो राज्य सरकार राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये कदम उठायेगी। वर्माजी ने उत्तर दिया कि हमारे नेता महात्मा गांधी हैं। उन्हीं के आदेश पर हमने आंदोलन छेड़ा है। हम एक सच्चे सिपाही की भांति सेनापति की आज्ञा के आदेश के बिना आंदोलन वापस नहीं ले सकते। राजाजी वर्माजी का उत्तर सुनकर हतप्रभ रह गये। राजाजी प्रजामंडल के अन्य नेताओं से भी मिले पर उनसे भी उन्हें निराशा हुई।

    इस पर राज्य सरकार ने फरवरी 1944 में समस्त बंदियों को रिहा कर दिया तथा 6 सितम्बर 1944 को प्रजामंडल पर से प्रतिबंध हटा लिया। 31 दिसम्बर 1945 तथा 1 जनवरी 1946 को उदयपुर में अखिल भारतीय देशी राज्य परिषद का सातवां अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की। इस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर देशी राज्यों के शासकों से अपील की गयी कि वे अपनी रियासतों में अविलम्ब उत्तरदायी शासन स्थापित करें। इस अधिवेशन से राज्यों में अभूतपूर्व जागृति आयी। यहाँ तक कि जनवरी 1946 में राज्य कर्मचारियों ने भी सरकारी नीतियों के विरुद्ध हड़ताल कर दी। पुलिस ने हड़ताली कर्मचारियों पर लाठी चार्ज किया तथा अनेक कर्मचारियों को बंदी बना लिया। अंत में कर्मचारियों को यह आश्वासन देने पर कि उनकी समस्याओं का शीघ्र ही समाधान किया जायेगा, हड़ताल समाप्त की गयी।

    संवैधानिक सुधारों की शुरुआत

    भारत में तेजी से हो रहे राजनीतिक परिवर्तनों को देखते हुए 8 मई 1946 को महाराणा ने ठाकुर राव गोपालसिंह की अध्यक्षता में एक सुधार समिति की नियुक्ति की जिसमें प्रजामण्डल द्वारा मनोनीत पाँच सदस्य भी शामिल किये गये। इस समिति ने 29 सितम्बर 1946 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। समिति ने राज्य में उत्तरदायी सरकार की स्थापना करने तथा शासन जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों को सौंपने की सिफारिश की। उसने एक संविधान सभा की स्थापना की भी सिफारिश की। संविधान सभा में पचास सदस्य होने थे जिनका निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर किया जाना था। राज्य सरकार ने इस समिति की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया क्योंकि इसमें कार्यकारिणी को व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी बनाया गया था। बदलती हुई परिस्थितियों को देखते हुए महाराणा ने अक्टूबर 1946 में मेवाड़ प्रजामंडल के सदस्य मोहनलाल सुखाड़िया और हीरालाल कोठारी को कार्यकारी परिषद का सदस्य नियुक्त किया।

    16 फरवरी 1947 को महाराणा ने अपने जन्म दिन पर घोषणा की कि वे शीघ्र ही राज्य में विधान सभा की स्थापना करेंगे और जनता के प्रतिनिधियों को सरकार में शामिल करेंगे। 2 मार्च 1947 को महाराणा ने मेवाड़ के नये विधान की घोषणा की। इसके अनुसार 46 सदस्यों की धारा सभा में 18 स्थान जागीरदार, उपजागीरदार, माफीदार, श्रमिक, उद्योगपति, व्यापारी और जनजातियों के लिये आरक्षित रखे गये। शेष 28 स्थान वयस्क मताधिकार एवं संयुक्त चुनाव प्रणाली के आधार पर भरे जाने थे। इसमें छः निर्वाचित एवं कुछ गैरसरकारी सदस्यों की विधानसभा स्थापित की जानी थी। इसे राज्य से सम्बन्धित समस्त विषयों पर कानूनों का निर्माण करना था। कुछ प्रतिबंधों के साथ यह राज्य के बजट पर बहस एवं मतदान कर सकती थी।

    मंत्रियों को विधानसभा द्वारा किये गये निर्णयों को लागू करना था। दोनों में मतभेद होने पर महाराणा का निर्णय अंतिम माना जाना था। महाराणा ने अपनी घोषणा में विश्वास दिलाया कि विधानसभा के चुनाव हो जाने के बाद धीरे-धीरे जनप्रतिनिधियों को मंत्रिमण्डल में शामिल किया जायेगा किंतु जागीरदारों को अन्य वर्गों से अधिक प्रतिनिधित्व देने, अध्यक्ष का मनोनयन करने तथा कार्यपालिका को विधानसभा के प्रति उत्तरदायित्व नहीं बनाने के प्रश्नों पर प्रजामण्डल ने यह कह कर इस घोषणा को मानने से अस्वीकार कर दिया कि यह विधान जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं है।

    ई.1947 में महाराणा ने के. एम. मुंशी को अपना संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किया। मुंशी ने राज्य के लिये नया संविधान बनाया जिसे 23 मई 1947 को प्रताप जयंती के अवसर पर लागू कर दिया गया। इस संविधान की प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित थीं-

    (1.) विधि के शासन की स्थापना,

    (2.) प्रताप विश्वविद्यालय की स्थापना,

    (3.) लोकसेवा आयोग की स्थापना,

    (4.) नागरिकों के मौलिक अधिकारों की स्थापना

    (5.) वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित विधान सभा की स्थापना।

    इस विधानसभा में कुल 56 सदस्य होने थे तथा विधानसभा को राज्य के समस्त लोगों के लिये समस्त विषयों पर कानून बनाने का अधिकार था किंतु निम्नलिखित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार इस विधानसभा को नहीं था-

    (1.) महाराणा के विशेष कर्त्तव्य तथा महाराणा का राज्य में स्थान,

    (2.) उत्तराधिकार तथा गोद का प्रश्न,

    (3.) महाराणा के जागीरदारों और उमरावों से सम्बन्ध,

    (4.) प्रताप विश्वविद्यालय,

    (5.) उच्च न्यायालय का व्यवहार,

    (6.) देवस्थान विधि,

    (7.) विदेशी मामले, राज्य के विकास तथा योजना।

    प्रजामण्डल ने मुंशी द्वारा प्रस्तुत विधान को सर्वथा अप्रगतिशील और अस्पष्ट बताया क्योंकि इसमें जागीरदारों को अपेक्षाकृत अधिक अधिकार दे दिये गये थे। प्रजामण्डल ने संविधान को दोष पूर्ण मानते हुए भी निर्वाचन में भाग लेना स्वीकार किया। एक ओर तो प्रजा मण्डल इससे अप्रसन्न था तो दूसरी ओर मेवाड़ क्षत्रिय परिषद ने इसे प्रजामण्डल के समक्ष समर्पण बताया। इसी बीच एस. बी. राममूर्ति मेवाड़ के दीवान नियुक्त हुए। उन्होंने जन आंदोलन के संदर्भ में महाराणा को परामर्श दिया कि वे संविधान में संशोधन करें। महाराणा ने डॉ. मोहनसिंह मेहता को मुंशी द्वारा प्रस्तुत संविधान में संशोधन करने के लिये नियुक्त किया। उनके सुझाव पर 11 अक्टूबर 1947 को महाराणा ने मुंशी द्वारा निर्मित संविधान में निम्नलिखित संशोधन करने की घोषणा की-

    (1.) ग्रामीण प्रत्यक्ष निर्वाचन,

    (2.) 90 हजार के स्थान पर 60 हजार लोगों पर एक प्रतिनिधि का चयन,

    (3.) संविधान में संशोधन प्रक्रिया का सरलीकरण।

    इन सुधारों से भी प्रजा मण्डल की मुख्य मांग पूरी नहीं हुई जिसके अनुसार कार्यकारिणी को व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी बनाया जाना था। प्रजा मण्डल की साधारण सभा की बैठक नाथद्वारा में हुई जिसमें संविधान को दोषपूर्ण मानते हुए भी नये संविधान के अनुसार निर्वाचनों में भाग लेना स्वीकार कर लिया। राजपूत सभा ने प्रजामंडल के विरुद्ध अपने उम्मीदवार चुनाव में उतारे। मोहनलाल सुखाड़िया सहित मेवाड़ प्रजा मण्डल के 4 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गये। 6 मार्च 1948 को महाराणा ने अपने जन्मदिन पर कुछ और सुधारों की घोषणा की तदनुसार महाराणा ने अपने दीवान के पद को छोड़कर शेष मंत्रिमण्डल को विधान मण्डल के प्रति उत्तरदायी बनाना स्वीकार कर लिया। महाराणा ने अंतरिम सरकार के गठन के लिये प्रजा मण्डल के चार प्रतिनिधि तथा क्षत्रिय परिषद के दो प्रतिनिधि को मंत्रिमण्डल में लेने की घोषणा की। एक मंत्री महाराणा द्वारा नामांकित किया जाना था। इस योजना को दोनों ही पक्षों ने स्वीकार कर लिया।

    4 अप्रेल 1948 को उदयपुर में विधान सभा के दो स्थानों के लिये चुनाव होने थे। एक स्थान पर प्रजामंडल के अध्यक्ष भूरेलाल बयां उम्मीदवार थे। उनके विरुद्ध क्षत्रिय परिषद का उम्मीदवार गुमानसिंह चुनाव लड़ रहा था। उस मतदान केंद्र पर क्षत्रिय परिषद के कार्यकर्ता ने अपना झण्डा लगा दिया। इस पर प्रजामंडल वालों ने भी अपना झंडा उस भवन पर लगा दिया। क्षत्रिय परिषद वालों ने प्रजामंडल का झंडा उखाड़ कर कुएं में फैंक दिया। इस घटना ने खतरनाक झगड़े का रूप ले लिया। प्रजामंडल ने तत्काल ही चुनावों के बहिष्कार का निर्णय लिया तथा दूसरे दिन पूरे शहर में पूर्ण हड़ताल रखी। भूरेलाल बया तुरंत महाराणा से मिले। बया ने महाराणा से कहा- 'आपका निकम्मा शासन राष्ट्रीय ध्वज की रक्षा करने में समर्थ नहीं है।अतः आपको चाहिये कि आप अविलम्ब ही सत्ता जन-प्रतिनिधियों को सौंप दें। महाराणा भूरेलाल बया की यह बात सुनकर हक्के-बक्के रह गये। उनसे कोई जवाब नहीं बन पड़ा।

    जागीरदारों के लोगों ने शहर में बंद असफल करवाने का प्रयास किया जिससे शहर में दंगा हो गया। भीड़ को नियंत्रित करने के लिये गोलियां चलाई गयीं जिससे दो विद्यार्थी मारे गये तथा अनेक व्यक्ति घायल हुए। इस गोली काण्ड के विरोध में प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं ने मेवाड़ कार्यकारिणी परिषद से त्यागपत्र दे दिये। अतः चुनाव स्थगित कर दिये गये। प्रजा मण्डल के मुखपत्र 'मेवाड़ प्रजा मण्डल पत्रिका' के 8 मार्च और 15 मार्च 1948 के सम्पादकीय में मेवाड़ को राजस्थान संघ में विलय करने की मांग का जबर्दस्त समर्थन किया गया था किंतु महाराणा ने यह मांग स्वीकार नहीं की थी किंतु अब मेवाड़ की परिस्थितियां पलटा खा रही थीं। राज्य में मंत्रिमण्डल के गठन को लेकर प्रजामण्डल और राज्य सरकार के बीच गतिरोध उत्पन्न हो गया। अंत में प्रजामण्डल की बात स्वीकार करके गतिरोध समाप्त किया गया।

    महाराणा ने प्रजामण्डल के प्रस्तावित उम्मीदवार को मंत्री बनाना स्वीकार कर लिया। राज्य का मुत्सद्दी वर्ग और सामंती वर्ग, प्रजामण्डल की जीत को सहन नहीं कर सका। उन्होंने महाराणा को परामर्श दिया कि मेवाड़ को संयुक्त राजस्थान में शामिल कर लिया जाये क्योंकि यदि मेवाड़ संयुक्त राजस्थान में शामिल हो जाता है तो प्रशासन में प्रजामण्डल के प्रतिनिधियों के स्थान पर भारत सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारियों का वर्चस्व रहेगा तथा संयुक्त राजस्थान में शामिल होते समय समस्त शर्तें रियासती सचिवालय द्वारा निश्चित की जायेंगी। महाराणा को यह परामर्श उचित लगा। अतः संयुक्त राजस्थान राज्य के उद्घाटन से दो दिन पूर्व 23 मार्च 1948 को महाराणा ने मेवाड़ को संयुक्त राजस्थान में शामिल करने के अपने निश्चय की सूचना भारत सरकार को भेज दी। 18 अप्रेल 1948 को उदयपुर राज्य का राजस्थान संघ में विलय हो गया। अतः उदयपुर राज्य में उत्तरदायी शासन की योजना लागू करने से पहले ही राज्य राजस्थान संघ में विलीन हो गया। अतः उदयपुर राज्य में उत्तरदायी शासन लागू करने की योजना लागू होने से पूर्व ही रियासत राजस्थान में विलीन हो गयी।


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