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  • राजपूताना के सक्षम राज्यों का भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण (जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं उदयपुर के संदर्भ में) 1930-50 A.D.

     03.06.2020
    राजपूताना के सक्षम राज्यों का भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण  (जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं उदयपुर के संदर्भ में)  1930-50 A.D.

    राजपूताना के सक्षम राज्यों का भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण

    (जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं उदयपुर के संदर्भ में) 1930-50 A. D.

    जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर द्वारा डॉक्टर ऑफ फिलोसॉफी की उपाधि हेतु स्वीकृत शोध ग्रंथ

    अनुक्रमणिका

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    1. राजपूताना राज्यों में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का प्रवेश एवं ब्रिटिश ताज की सम्प्रभुता की स्थापना

    2. बीसवीं सदी में राजपूताना के प्रमुख एवं सक्षम राज्य

    3. अखिल भारतीय संघ के प्रति सक्षम राज्यों की प्रतिक्रिया

    4. क्रिप्स योजना एवं मंत्रिमण्डल योजना के प्रति राज्यों की प्रतिक्रिया

    5. माउण्टबेटन योजना और सत्ता हस्तांतरण

    6. भारतीय संघ में विलय (बीकानेर, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर)

    7. स्वाधीनता के पश्चात् सक्षम राज्यों में उत्तरदायी सरकारों का गठन

    8. सक्षम राज्यों का राजस्थान में विलय (उदयपुर, बीकानेर, जयपुर, जोधपुर)

    9. एकीकरण के पश्चात की समस्याएं (प्रशासनिक, राजनैतिक, नेतृत्व, वित्तीय मामले)

    10. परिशिष्ट

    11. संदर्भ सूची

    प्राक्कथन

    प्राचीन भारतीय क्षत्रियों ने राज्य व्यवस्था का निर्माण किया था। हजारों वर्षों तक यह राज्य व्यवस्था चलती रही। राजा का पुत्र प्रायः वंशानुगत अधिकार से राजा बनता था। राजपुत्रों द्वारा शासित क्षेत्र कालांतर में राजपूताना कहलाया। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में राजपूताना के राज्य, देश की राजनीतिक परिस्थितियों से विवश होकर अंग्रेजी संरक्षण में चले गये। राजपूताना में चार प्रमुख एवं सक्षम राज्य थे- जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और उदयपुर। ई.1818 से लेकर ई.1947 तक ये राज्य अंग्रेजी शासन के अधीन रहे। बीसवीं सदी में देश का राजनीतिक घटनाक्रम बहुत तेजी से घटित हुआ जिसकी परिणति ई.1947 में अंग्रेजी शासन से मुक्ति के रूप में हुई।

    प्रस्तुत शोध ग्रंथ में राजपूताना के सक्षम राज्यों की बीसवीं सदी में स्थिति, ई.1930 में प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ के प्रति उनकी प्रतिक्रिया, द्वितीय विश्वयुद्ध एवं उसके पश्चात् देशी राज्यों के प्रति ब्रिटिश नीति, देशी राज्यों का संविधान सभा में प्रवेश एवं परमोच्चता का विलोपन, भारतीय संघ में विलय, स्वाधीनता के पश्चात् सक्षम राज्यों में उत्तरदायी सरकारों का गठन, सक्षम राज्यों का राजस्थान में विलय तथा एकीकरण के पश्चात की समस्याओं का विश्लेषण किया गया है तथा इस विषय में अब तक अप्रकाशित रहे नये तथ्यों को भी सामने लाने का प्रयास किया गया है।

    अखिल भारतीय संघ के प्रति देशी राज्यों की प्रतिक्रिया, क्रिप्स मिशन, केबीनेट मिशन और देशी राज्यों के विलय और एकीकरण पर इस शोध ग्रंथ से पूर्व भी कतिपय ग्रंथ प्रकाश में आये हैं किंतु राजपूताना के चारों सक्षम राज्यों (जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और उदयपुर) के संदर्भ में ई.1930 ई. से 1950 ई. के बीच घटी घटनाओं यथा- संघीय प्रस्ताव, भारत संघ में विलय, राजस्थान में एकीकरण तथा एकीकरण के पश्चात् की समस्याओं के सम्बन्ध में समस्त सामग्री किसी एक पुस्तक में विस्तार पूर्वक एवं क्रमबद्ध रूप से उपलब्ध नहीं थी।

    इस ग्रंथ में ई.1930 से ई.1950 के बीच के 20 वर्षों में राजपूताना के चार सक्षम देशी राज्यों की भारत सरकार के साथ हुई विभिन्न वार्ताओं में रही अभिवृत्ति की भी समीक्षा की गयी है। ग्रंथ में कुल 9 अध्याय हैं।

    इस ग्रंथ हेतु शोघ सामग्री जुटाने के लिये ई.1930 से 1950 तक की अवधि की, राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली में उपलब्ध भारत सरकार के राजनीतिक विभाग, उसके बाद गठित रियासती विभाग तथा राजपूताना स्टेट एजेंसी की फाईलें, नेहरू स्मृति संग्रहालय एवं पुस्तकालय नई दिल्ली में उपलब्ध सामग्री, महाराष्ट्र राज्य अभिलेखागार बम्बई तथा राज्य अभिलेखागार बीकानेर में उपलब्ध देशी राज्यों की राजनीतिक विभाग की फाइलों से शोध सामग्री एकत्रित की गयी है।

    मारवाड़, बीकानेर, मेवाड़ तथा जयपुर रियासतों की वार्षिक 'एडमिनिस्ट्रेटिव रिपोर्ट्स' एवं विभिन्न शोध संस्थानों में उपलब्ध सामग्री से भी तथ्य जुटाये गये हैं। स्वतंत्रता से पूर्व भारत सरकार द्वारा प्रकाशित इम्पीरियल गजेटियर्स, स्वतंत्रता से पूर्व विभिन्न देशी राज्यों द्वारा प्रकाशित राजपत्रों एवं स्वतंत्रता के पश्चात् राजस्थान सरकार द्वारा प्रकाशित विभिन्न जिलों के गजेटियर्स का भी उपयोग किया गया है।

    प्रो. एफ. के. कपिल के निजी संग्रह में संकलित विभिन्न पुराने समाचार पत्रों, तत्कालीन सरकारी अभिलेखों की प्रतिलिपियों तथा पुस्तकों का उपयोग किया गया है। जोधपुर रियासत के सेवानिवृत्त एवं वयोवृद्ध कर्मचारी श्री हरिकिशन पुरोहित के निजी संग्रह तथा महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश एवं शोध संस्थान में संकलित जोधपुर महाराजा के निजी सचिव की पत्रावलियों तथा पुस्तकों का भी उपयोग किया गया है।

    जोधपुर राजपरिवार के निकट रहे एवं इतिहास विषयक सामग्री का संकलन करने वाले पारसमल खींवसरा द्वारा अपने संपूर्ण अभिलेख को महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश एवं शोध संस्थान जोधपुर को समर्पित कर दिया गया है। उस अभिलेख से भी कई तथ्य जुटाने में सहायता प्राप्त हुई है। इसी प्रकार जोधपुर स्थित चौपासनी शोध संस्थान में जोधपुर राज्य के राजपत्रों के संकलन से भी काफी सहायता मिली।

    स्वतंत्रता सेनानी श्री बालकृष्ण थानवी, श्री जोरावरमल बोड़ा, श्री महावीर प्रसाद व्यास, श्री रामचंद्र बोड़ा तथा जोधपुर रियासत के पूर्व कर्मचारी श्री हरिकिशन पुरोहित, महाराजा उम्मेदसिंह तथा हनवंतसिंह के समय जोधपुर महाराजा के निजी स्टाफ के अधिकारी श्री ओंकारसिंह, महाराजा हनवंतसिंह के समय जोधपुर राज्य में तोषाखाना के प्रभारी स्व. ठाकुर जगन्नाथसिंह राठौड़ के पुत्र श्री सज्जनसिंह राठौड़ एवं पौत्र श्री सुरेंद्रसिंह राठौड़ से साक्षात्कार करके तथ्यों को जुटाने का प्रयास किया गया है।

    अब तक प्रकाशित सामग्री के हिन्दी तथा अंग्रेजी में अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं जिनसे पुस्तक के विभिन्न अध्यायों को लिखने में बड़ी सहायता मिली। इन ग्रंथों का विवरण 'सन्दर्भ सूची' में दिया गया है।

    इस शोध कार्य में प्रमुख व्यक्तियों के जीवन-चरित, आत्म-कथाओं और पत्र-व्यवहार से भी उपयोगी सामग्री ली गयी है। समकालीन समचार पत्रों, पत्रिकाओं और संदर्भ ग्रंथों से भी सामग्री एकत्रित की गयी है।

    इस शोध ग्रंथ के लेखन हेतु नवीन तथ्य जुटाने के लिये मार्गदर्शन देने एवं अनेक प्रकाशित-अप्रकाशित तथ्यों को उपलब्ध करवाने में प्रो. एफ. के. कपिल का अत्यंत मूल्यवान योगदान रहा है। मैं इस शोध ग्रंथ के पूरा होने पर उनके प्रति आदर व्यक्त करता हूँ।

    महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश एवं शोध संस्थान के निदेशक डा. महेन्द्रसिंह नगर, दैनिक नवज्योति के स्थानीय संपादक श्री कुमार प्रवीण तथा जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के पुस्तकालय बोर्ड के अध्यक्ष प्रो. आर. एम. शर्मा ने संदर्भ ग्रंथ एवं सामग्री जुटाने में विपुल सहयोग प्रदान किया मैं, उनका भी आभार व्यक्त करता हूँ। बम्बई में शोध कार्य को सुगम बनाने के लिये मैं श्री संतोष गुप्ता (अब स्वर्गीय), दिल्ली में की गयी व्यवस्थाओं के लिये श्री प्रमोद गुप्ता तथा जोधपुर में विभिन्न कार्यों में सहयोग देने के लिये राजकीय महाविद्यालय बाड़मेर में इतिहास विषय की प्रवक्ता डा. अंजू सुथार, अपने मित्र श्री मनोज मेहता के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ। राजपूताने के सक्षम राज्यों का मानचित्र तैयार करने में सहयोग देने के लिये अपने सहकर्मी श्री महेंद्र कुमार दईया का भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ।

    साथ ही राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली, नेहरू स्मृति संग्रहालय एवं पुस्तकालय नई दिल्ली, महाराष्ट्र अभिलेखागार बंबई, राजस्थान राज्य अभिलेखागार बीकानेर, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर तथा राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर के उन समस्त विद्वानों, अधिकारियों एवं पुस्तकालय कर्मचारियों का भी आभार व्यक्त करता हूँ जिनके अमूल्य सहयोग से यह कार्य पूर्ण हो सका। आशा है यह ग्रंथ इतिहास के विद्यार्थियों, अध्यापकों, शोधार्थियों एवं इतिहास में रुचि रखने वाले पाठकों के लिये उपयोगी सिद्ध होगी।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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