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  • तंत्र साधना के तीन बड़े रहस्य, भाग-6

     27.10.2018
    तंत्र साधना के तीन बड़े रहस्य, भाग-6

    अंतिम भाग

    अपने पिछले पिछले पांच आलेखों में हमने पढ़ा कि किस प्रकार ईश्वरीय प्रेरणा से महाशून्य में विस्फोट हुआ और उससे निकली ऊर्जा से सूक्ष्म एवं स्थूल जगत् की उत्पत्ति हुई तथा किस प्रकार ब्रह्म एवं माया ने मिलकर जीव को उत्पन्न किया। हमने जाना कि इसी महाविस्फोट से प्रकट हुए जीव एवं जड़, अर्थात् प्रत्येक अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य भी उसी महाशून्य में पुनः प्रवेश करना है। हमने इस पर भी चर्चा की कि महाशून्य की यात्रा करने के लिए हमें अपनी इंद्रियों का मुंह जगत की तरफ से मोड़कर अपने भीतर की ओर केन्द्रित करना होगा तथा इसके कई उपाय हैं। इन उपायों में से एक उपाय अर्थात् ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क के अनुग्रह पर हम चर्चा कर चुके हैं। ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क द्वारा किया गया अनुग्रह वस्तुतः ईश्वरीय अनुकम्पा ही है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। 

    इस आलेख में हम जानेंगे कि मनुष्य द्वारा की जाने वाली विभिन्न साधनाओं में सिद्धि प्राप्त करने के अन्य कौनसे उपाय हो सकते हैं। इनमें सबसे श्रेष्ठ उपाय है वासनाओं तथा बाहरी सुखों से मुंह मोड़ कर शुद्ध-सात्विक जीवन जीने का अभ्यास करना। वासनाओं तथा बाहरी सुखों को त्यागने का अर्थ अपनी देह को दुखी करना नहीं है। जिस प्रकार जन्म और मृत्यु देह के धर्म हैं, उसी प्रकार भूख, प्यास, शौच, नींद तथा सुख-दुख की अनुभूति भी देह के धर्म हैं। देह के धर्मों से मुक्ति पाई जा सकती है किंतु केवल योगियों के द्वारा।

    सामान्य गृहस्थ देह के धर्मों से मुक्ति नहीं पा सकता। इसलिए सामान्य गृहस्थ होने के नाते हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय यह है कि किसी भी प्रकार की साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए हमें देह की न्यूनतम आवश्यकताएं ही पूरी करनी चाहिए। अर्थात् हमें कपड़ा पहनने की आवश्यकता है न कि महंगा कपड़ा पहनने की या अधिक से अधिक संख्या में कपड़े एकत्रित करने की।

    यही बात देह की प्रत्येक आवश्यकता पर लागू होती है। चूंकि हम देह में निवास कर रहे हैं इसलिए देह की न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करते हुए हमें अपनी वासनाओं पर नियंत्रण करना होगा। न्यूनतम भोजन करके देह को संतुष्ट, सुखी एवं स्वस्थ रखा जाना चाहिए। निराहार रहकर अथवा अधिक खाकर, देह तथा जीवन में मिले समय को नष्ट करना उचित नहीं है।

    तंत्र साधनाओं के नाम पर भोग किए जाने वाले पंचमकार अर्थात् मीन, मांस, मैथुन, मदिरा आदि जीभ एवं देह के स्वाद के लिए हैं। चरम लक्ष्य अर्थात् मोक्ष अर्थात् ईश्वर को प्राप्त करने के लिए की जाने वाली साधनाओं से उनका कोई लेना देना नहीं है।

    पंचमकार के सुख, साधकों को उनके पथ से भटकाने के लिए हैं। सिद्धियां इनसे नहीं मिलतीं, न सिद्धियों को अर्जित करने में इनका किंचित् मात्र भी योगदान हाता है। इन वस्तुओं की आवश्यकता भोगियों एवं अतृप्त आत्माओं को होती है जो देह के भीतर निवास करते हुए इन वस्तुओं का अत्यधिक उपभोग करें तथा फिर भी अतृप्त ही रह जाएं।

    बहुत से लोग ऐसे हैं जिनमें अत्यधिक भोग करने के बावजूद इन वस्तुओं की लालसा बनी रहती है और वे मर जाते हैं। देह छूट जाती है किंतु इन भोगों की कामना नहीं छूटती। ऐसे लोग मरने के बाद प्रेत के रूप में इस धरती पर भटकते हैं तथा शमशानों, जुआघरों, बूचड़खानों, मांस-मदिरा की दुकानों और वेश्यालयों आदि विविध स्थानों पर रहकर दूसरे बुरे लोगों को इन वासनाओं को भोगते हुए देखकर आनंदित होते हैं। उनके माध्यम से ये प्रेतात्माएं अपनी वासनाएं पूरी करती हैं।

    तंत्र साधनाओं में पंचमकारों का उपयोग तथाकथित साधकों द्वारा अपनी देह एवं मन की वासनाओं की पूर्ति के लिए तथा बुरी प्रवृत्ति के प्रेतों को खुश करने के लिए होता है ताकि प्रेतों को यह विश्वास हो जाए कि इस तांत्रिक के माध्यम से प्रेत को मीन, मैथुन एवं मदिरा आदि के भोग प्राप्त होते रहेंगे और वे प्रेत, खुश रहकर या वशीभूत होकर साधक की इच्छापूर्ति करते रहेंगे।

    इन प्रेतों में निहित सूक्ष्म शक्तियों के बल ये तांत्रिक मारण, मोहन, वशीकरण और उच्चाटन जैसी क्रियाएं करवाते हैं किंतु इनके परिणाम अच्छे नहीं होते। तंत्र साधना के नाम पर प्रेतों को साधने वाले लोग, डाकिनी, शाकिनी और हाकिनी जैसी आत्माओं को वश में करने वाले लोग, अंत में दुःख ही पाते हैं। संसार छोड़ने के बाद उनकी गति बुरी होती हैं तथा उनकी मुक्ति का रास्ता और कठिन होे जाता है और वे स्वयं भी प्रेत योनि में पहुंच कर दीर्घकाल तक भटकते रहते हैं।

    तो क्या तंत्र साधनाएं नहीं करनी चाहिए? क्या तंत्र बकवास है?

    नहीं तंत्र बकवास नहीं है। इसका वैज्ञानिक आधार है।

    हमें तंत्र साधना के वास्तविक एवं वैज्ञानिक स्वरूप को पहचानना चाहिए। पहली बात तो यह है कि तंत्र दो प्रकार का है, सात्विक तथा तामिसक। एक सद्गृहस्थ को सात्विक साधना की ओर बढ़ना चाहिए। सर्म्पूण दृष्य एवं अदृश्य जगत् की भांति हमारा शरीर भी एक जटिल रचना है, उसमें दृश्य जगत्; कोशिकाएं, ऊतक, तंत्रिकाएं, रक्त, अंग, अस्थि, मज्जा आदि के रूप में दिखाई देता है।

    इसे हम भोजन एवं औषधि से पुष्ट एवं स्वस्थ रखते हैं। हमारे शरीर के भीतर स्थित समस्त दृश्य रचनाएं एक विशेष प्रकार की ऊर्जा से बनी हैं तथा भोजन एवं औषधि के माध्यम से मिलने वाली विशिष्ट ऊर्जा से ही जीवित, स्वस्थ एवं निरोग रहती हैं।

    जिस प्रकार जगत् का 96 प्रतिशत हिस्सा डार्क एनर्जी तथा डार्क मैटर के रूप में है तथा दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार हमारे शरीर का लगभग 96 प्रतिशत हिस्सा अृदश्य है, वह किसी एक्सरे, एंजियोग्राफी, सीटी स्कैन तथा एमआरआई में भी दिखाई नहीं देता। तंत्र साधना का काम या किसी भी प्रकार की साधना का काम, शरीर के इसी हिस्से से सम्पर्क करना और उसे प्रभावित करना है।

    शरीर का यह अदृश्य भाग एक अलग प्रकार की ऊर्जा से बनता है। हालांकि स्थूल शरीर को बनाने वाली ऊर्जा, सूक्ष्म शरीर को बनाने वाली ऊर्जा तथा शरीर में निवास करने वाली अन्य प्रकार की अदृश्य ऊर्जाओं का स्रोत एक ही है जिसे हम माया अथवा प्रकृति कहते हैं तथापि इन समस्त ऊर्जा से व्यवहार करते समय हमें अलग-अलग प्रकार के साधनों की जरूरत होती है।

    अपने भीतर छिपे महाशून्य तक पहुंचने के लिए हमें अपनी सामान्य इच्छओं की उपेक्षा करके विशिष्ट प्रकार की इच्छाओं को ऊर्जीकृत करना होता है। इच्छाओं को ऊर्जीकृत करने के लिए किए गए उपाय ही तंत्र कहलाते हैं। ध्यान रहे, ये विशिष्ट प्रकार की इच्छाएं हमारी सात्विक साधना का परम ध्येय है न कि वासना पूर्ति की ओर उठाया गया एक और कदम।

    चाहे तंत्र साधना हो या किसी अन्य प्रकार की साधना। समस्त साधनाओं की सफलता का रहस्य तीन बातों में निहित है जिन्हें वैराग्य, ध्यान और जप कहा जाता है। इन तीनों को ही सम्मिलित रूप से तंत्र समझना चाहिए।

    वैराग्य का अर्थ है अपनी आवश्यकताओं को सीमित एवं न्यूनतम करना।

    ध्यान का अर्थ है कि ईश्वर जो कि निर्गुण-निराकार है, उसका ध्यान करना, उसमें मन लगाना। अपने मन, मस्तिष्क और हृदय में कल्प्ना करना कि हमारा सम्पर्क ईश्वर से हो रहा है और हम अपने भीतर छिपे महाशून्य में प्रवेश कर रहे हैं।

    तीसरा और अंतिम किंतु सबसे महत्वपूर्ण रहस्य है जप। निरंतर ऊर्जीकृत शब्दों अर्थात् मंत्रों का जप करें। मंत्र क्या है, ऐसे शब्दों का समूह जिसमें हमारी इच्छाएं ऊर्जीकृत करके भरी गई हें। ईश्वर के लाखों नाम है, ये सभी मंत्र हैं। किसी भी नाम को स्वीकार कर लें और उसे जपें। ईश्वर के रूप और गुणों का ध्यान करें।

    न केवल तंत्र अपितु मंत्र और यंत्र का का आधार भी ये ही तीन रहस्य हैं- वैराग्य, ध्यान और जप। समस्त प्रकार की भक्ति, समस्त प्रकार की तपस्याएं और समस्त प्रकार की साधनओं के पथ पर चलने के केवल यही तीन रास्ते हैं- वैराग्य, ध्यान और जप।

    मूर्ति पूजन, मंदिर दर्शन, तीर्थ सेवन, व्रत, उपवास, कथा श्रवण, कीर्तन, ग्रंथपाठ आदि नाना प्रकार के उपक्रमों का आधार भी यही तीन शक्तियां हैं- वैराग्य, ध्यान और जप।

    जो इन तीन रहस्यमयी शक्तियों को जान लेता है, उसे इस संसार में तथा इस संसार के बाद, कुछ भी अप्राप्य नहीं रह जाता। जिस महाशून्य से परामात्मा ने यह विविध रूपा सृष्टि तथा उसके क्रम की रचना की है तथा जिस महाशून्य के भीतर परमात्मा, माया तथा जीव अर्थात् हम स्वयं बीज बनकर विरामजमान हैं, उसी महाशून्य तक की यात्रा करने के भी यही तीन उपकरण हैं- वैराग्य, ध्यान और जप। इस तंत्र को पहचानें तथा इसे साधने का प्रयास करें।


    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    Note : You can watch a video series of six episodes prepared on the same subject at our YouTube Channel Glimpse of Indian History By Dr. Mohanlal Gupta


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