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  • तंत्र साधना के तीन बड़े रहस्य, भाग-3

     27.10.2018
    तंत्र साधना के तीन बड़े रहस्य, भाग-3

    पिछले आलेख में हमने महाविस्फोट की घटना के बाद सूक्ष्म जगत के उत्पन्न होने की घटना पर चर्चा की तथा माया द्वारा ईश्वरीय अंश से जीव उत्पन्न करने की प्रक्रिया को भी जानने का प्रयास किया। साथ ही आत्मा, बुद्धि और मन को एक ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क में रखे जाने पर भी चर्चा की।

    इस आलेख में हम ऊर्जा तथा पदार्थ के विभिन्न रूपों तथा उनके बीच की अवस्थाओं पर चर्चा करेंगे। साथ ही ऊर्जा तथा पदार्थ के विभिन्न रूपों के अन्तर्सम्बन्धों एवं उनके बीच स्थापित होने वाले संतुलन की भी चर्चा करेंगे।

    हाल ही में वैज्ञानिकों ने डार्क एनर्जी तथा डार्क मैटर का पता लगाया है जिसे विज्ञान जगत में पिछले सौ साल की सबसे बड़ी खोज माना जा रहा है। डार्क एनर्जी तथा डार्क मैटर के कण दिखाई नहीं देते किंतु वैज्ञानिकों ने पता लगा लिया है कि वे हैं। सृष्टि में स्थित वह ऊर्जा तथा वे पदार्थ जिन्हें हम जानते हैं, उनके नियंता यही डार्क एनर्जी तथा डार्क मैटर हैं।

    वर्तमान में ब्रह्माण्ड का 96 प्रतिशत हिस्सा डार्क एनर्जी तथा डार्क मैटर से बना हुआ है। अर्थात् जितना भी ब्रह्माण्ड अभी हमारी कल्पना में आता है, जो कि 92 अरब प्रकाश वर्ष की दूरी में फैले हुए आकाशीय पिण्डों तथा उनके बीच समाए हुए प्रकाश एवं ऊर्जा के रूप में है, वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का केवल 4 प्रतिशत ही है, 96 प्रतिशत ब्रह्माण्ड तो अभी भी डार्क एनर्जी तथा डार्क मैटर के रूप में छिपा हुआ है।

    डार्क मैटर तथा डार्क एनर्जी दोनों ही दिखाई नहीं देते हैं क्योंकि न तो ये सामान्य प्रकाश को सोखते हैं और न प्रकाश का उत्सर्जन करते हैं। इन दोनों में अंतर यह है कि डार्क मैटर गुरुत्व बल को उत्पन्न करता है जबकि डार्क एनर्जी गुरुत्व बल को नष्ट करती है अर्थात् एण्टी ग्रेवीटेशनल फोर्स उत्पन्न करती है।

    यदि डार्क एनर्जी में गुरुत्व बल के विपरीत बल उत्पन्न करने की क्षमता नहीं होती तो डार्क मैटर द्वारा उत्पन्न किए गए गुरुत्व बल के कारण कोई भी गैलेक्सी, सौर मण्डल या आकाशीय पिण्ड उस स्थान पर बने नहीं रह सकते थे, जहां वे आज वह स्थित हैं। वे सब पिण्ड एवं रचनाएं एक दूसरे के निकट आकर टकरा जातीं तथा एक दूसरे में समा जातीं तथा फिर से उसी महाशून्य में विलीन हो जातीं जहां से वे प्रकट हुई थीं।

    हमें ज्ञात है कि ब्रह्माण्ड का निरंतर प्रसार हो रहा है तथा ब्रह्माण्ड में स्थित प्रत्येक रचना तेजी से एक दूसरे से दूर भाग रही है। ब्रह्माण्ड के प्रसार के लिए आवश्यक शक्ति, ईश्वर द्वारा दी जाती है। ब्रह्माण्ड में स्थित प्रत्येक रचना अनियमित रूप से एक दूसरे से दूर भाग कर नहीं जाती और अचानक कहीं दूर जाकर विलीन नहीं हो जाती, यह काम ईश्वर की माया अर्थात् डार्क मैटर अर्थात् ग्रवीटेशनल फोर्स करती है।

    डार्क एनर्जी तथा डार्क मैटर के परस्पर सम्बन्ध से ब्रह्म और माया के स्वभाव को समझा जा सकता है। डार्क एनर्जी का गुण ईश्वर के समान है जो अत्यंत उदार हृदय से सृष्टि को बल दे रहा है और सृष्टि की रचनाओं को एक दूसरे से दूर जाकर अपना अस्तित्व स्थापित करने की स्वतंत्रता दे रहा है .... .... जबकि डार्क मैटर उस माया के समान है जो उन्हें आकर्षित करके बांध रही है। उनकी स्वतंत्रता का हरण कर रही है। उन्हें एक व्यवस्था में पिरो रही है।

    इस प्रकार डार्क एनर्जी और डार्क मैटर प्रकृति में संतुलन स्थापित करते हैं। जब हम धरती पर लेटे हुए भगवान शिव की छाती पर काली को पैर रखे हुए देखते हैं तो वस्तुतः शिव द्वारा काली के वेग को संतुलित करने की घटना का चित्रण देखते हैं। इसे डार्क एनर्जी द्वारा डार्क मैटर पर संतुलन स्थापित करने की घटना के रूप में देखा जाना चाहिए।

    ईश्वरीय अस्तित्व तथा माया की एक रोचक तुलना डार्क एनर्जी तथा डार्क मैटर से इस प्रकार भी की जा सकती है कि जिस प्रकार माया, ईश्वर से उत्पन्न हुई है, उसी प्रकार डार्क मैटर भी डार्क एनर्जी से उत्पन्न हुआ है।

    वैज्ञानिकों ने डार्क एनर्जी तथा डार्क मैटर से बिल्कुल अलग प्रकार के कणों का भी पता लगाया है जिन्हें हिग्स बोसोन नाम दिया गया है। इन कणों का काम है पदार्थ को भार प्रदान करना। कुछ वैज्ञानिकों ने इन्हें ईश्वरीय कण भी कहा है। हिग्स बोसोन की तुलना भगवान शिव से की जा सकती है। शिव की पार्थिव पूजा की जाती है, उन्हें भीम अर्थात् भारी कहा जाता है। शिव ही इस सृष्टि को स्थायित्व अर्थात् भार प्रदन करते हैं। इसलिए उन्हें स्थाण् कहा जाता है। मान्यता है कि शिव के ताण्डव से जो ध्वनियां उत्पन्न हुईं, उन्हीं से समस्त पदार्थों की रचना हुई। अर्थात् ईश्वर रूपी डार्क एनर्जी को माया ने डार्क मैटर बनाया तथा हिग्स बोसोन अर्थात् शिव ने उसे द्रव्यमान प्रदान किया।

    डार्क एनर्जी, डार्क मैटर तथा हिग्स बोसोन के उदाहरणों से हम अनुमान लगा सकते हैं कि किस प्रकार माया, ईश्वर के अंश अर्थात् आत्मा पर अपना आवरण डालकर उसे जीवात्मा बना देती है तथा उसे कर्मबंधन एवं पुनर्जन्म के चक्र में फांस देती है और भगवान शिव के द्वारा किस प्रकार सृष्टि को रूप एवं संरक्षण प्रदान किया जाता है। शिवजी की कृपा से सृष्टि दिखाई देने लगती है। इसलिए भारतीय ऋषियों द्वारा हजारों वर्ष पहले ही हमें बता दिया गया था कि विष्णु का रंग काला है और शिव का रंग कपूर की तरह सफेद है। अर्थात् डार्क एनर्जी काली है और हिग्स बोसोन सफेद हैं।

    किसी भी साधक द्वारा की जा रही साधना चाहे किसी भी प्रकार की क्यों न हो, उसका चरम लक्ष्य, भगवान शंकर के रूप में स्थित ईश्वरीय कृपा प्राप्त करके, माया के आवरण को काटना तथा जीव को पुनः उसका वास्तविक स्वरूप लौटाना होता है। अर्थात् जीव को फिर से ईश्वर में समाहित कर उसे पुनः डार्क एनर्जी में बदलना होता है।

    हमारे पहले दोनों आलेखों तथा इस तीसरे आलेख में अब तक कही गई समस्त बातों का उद्देश्य यह समझना रहा है कि इस धरती पर या अन्य किसी भी लोक में जीव अनायास ही उत्पन्न नहीं हुआ है, उसके अस्तित्व के पीछे विशाल ईश्वरीय शक्तियां काम कर रही हैं और ये शक्तियां तब तक जीव के साथ रहती हैं जब तक कि जीव अपनी यात्रा पूरी करके पुनः ईश्वर में नहीं लौट आता।

    हम अपने अगले आलेख में जानेंगे कि प्रकृति अर्थात् माया किस प्रकार ईश्वरीय अंश पर अपना आवरण डालकर एक बिल्कुल ही अलग गुण धर्म वाले अस्तित्व अर्थात् जीव की रचना करती है तथा किस प्रकार जीव का गुण धर्म ईश्वर से बिल्कुल अलग हो जाता है।


    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    Note : You can watch a video series of six episodes prepared on the same subject at our YouTube Channel Glimpse of Indian History By Dr. Mohanlal Gupta

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