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  • तंत्र साधना के तीन बड़े रहस्य, भाग-2

     27.10.2018
     तंत्र साधना के तीन बड़े रहस्य, भाग-2

    पिछले आलेख में हमने पढ़ा कि स्थूल एवं दृश्य जगत् की उत्पत्ति के पीछे सूक्ष्म शक्तियों ने किस प्रकार अपनी भूमिकाएं निभाईं तथा किस प्रकार ऊर्जा का एक अनंत स्रोत महाशून्य में बने विकराल दबाव के कारण भयानक विस्फोट को प्राप्त होकर विकास करता हुआ स्थूल जगत् के रूप में प्रकट हुआ। हमने यह भी जाना कि तंत्र साधना की अनिवार्यता के लिए यह जानना आवश्यक है कि हमें सम्पर्क किन शक्तियों से स्थापित करना है।

    इस 
    आलेख में हम जानने का प्रयास करेंगे कि ऊर्जा से पदार्थ बनने की प्रक्रिया के बीच में कौनसी अवस्था आती है।

    आधुनिक भौतिक विज्ञानी डीब्रोग्ली ने जब यह कहा कि ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती केवल उसका रूप बदलता है अर्थात् ऊर्जा को पदार्थ में तथा पदार्थ को ऊर्जा में बदला जा सकता है तो उसने भारतीय वैदिक विज्ञान की ही पुष्टि की जिसके अनुसार समस्त जगत् की उत्पत्ति एक ही स्रोत से हुई है तथा समस्त जड़ एवं चेतन सृष्टि ईश्वर से जन्म पाता है और ईश्वर में विलीन हो जाता है।

    पाश्चात्य विज्ञानियों की ‘बिग बूम थ्योरी’ भी भारतीय चिंतन की पुष्टि थी जिसमें ब्रह्म ने एकोऽहम् बहुस्यामि कहकर सृष्टि को जन्म दिया। वेद कहता है कि सृष्टि से पहले कुछ भी नहीं था, न सत् था न असत्, न प्रकाश था और न अंधकार। बिग बूम थ्योरी कहती है कि अंधकार में एक विस्फोट हुआ और प्रकाश अर्थात् ऊर्जा चारों ओर दौड़ पड़ी।

    इस अर्थ में बिग बूम थ्योरी, वेदों की थ्योरी के केवल स्थूल भाग की ही बात करती है, वह बिग बूम से पहले की बात नहीं करती है कि पहले क्या था, विस्फोट किसमें हुआ, किसने किया। वेद इस विस्फोट से पहले की बात भी करता है हालांकि वह केवल इतना कहकर चुप हो जाता है कि इस विस्फोट से पहले कुछ नहीं था।

    दृश्य जगत का निर्माण सूक्ष्म और स्थूल दोनों स्तरों पर हुआ। महाविस्फोट के बाद पहले सूक्ष्म जगत अर्थात् अदृश्य जगत बना जिसमें आत्मा, बुद्धि, मन आदि का निर्माण हुआ। ये तीनों अर्थात् आत्मा, बुद्धि और मन किसी भी प्रकार के कणों से नहीं बनते। ये केवल संकल्पित ऊर्जाएं हैं इनके निर्माण में किसी प्रकार के पदार्थ की भूमिका नहीं होती।

    आत्मा, बुद्धि और मन का कोई स्वरूप नहीं है, कोई आकार या रंग नहीं है। न ही यह निश्चित है कि ये शरीर के किस हिस्से में निवास करती हैं। शरीर में मस्तिष्क की जगह है किंतु बुद्धि केवल मस्तिष्क में निवास नहीं करती, पूरी देह में निवास करती है। यही स्थिति मन और आत्मा की है। वस्तुतः आत्मा, बुद्धि और मन, मनुष्य की समग्र चेतना के तीन हिस्से हैं। ये तीनों, एक दूसरे की बात को सुनते और समझते हैं।

    प्रकृति में ऊर्जा के महाविस्फोट के बाद जब परमात्मा की इच्छा से आत्मा, बुद्धि और मन का प्राकट्य हुआ तब इन्हें ब्रह्माण्ड के भीतर एक विशाल भण्डार में रखा गया जिसे ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क कहते हैं। ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क से इन तीनों को अर्थात् आत्मा, बुद्धि और मन को सृष्टि के भीतर भविष्य में बनने वाले स्थूल शरीरों में भेजा जाना अभी बाकी था किंतु उससे पहले प्रकृति के द्वारा बहुत सा काम किया जाना आवश्यक था।

    आत्मा, बुद्धि और मन को प्रकट करने के बाद प्रकृति ने ऐसे अदृश्य कणों का निर्माण किया जो वास्तव में किसी प्रकार का पदार्थ नहीं थे अपितु पदार्थों को जन्म देने की क्षमता रखने वाले ऊर्जा के ही कण थे। संभवतः पश्चिमी भौतिक विज्ञानियों द्वारा इन्हीं कणों को डार्क मैटर कहा जा रहा है। इतना तो निश्चित है कि पदार्थों को जन्म देने की क्षमता रखने वाले ऊर्जा के कण, आत्मा, बुद्धि और मन की तुलना में स्थूल हैं तथा पदार्थ की तुलना में सूक्ष्म हैं। अर्थात् ऊर्जा और पदार्थ के बीच की अवस्था में हैं।

    भारतीय दर्शन में बौद्ध एवं जैन धर्मों में पुद्गलों की चर्चा की गई है। पुद्गल का संस्कृत एवं पाकृत में अर्थ है- जो उत्पन्न होता है और गल जाता है। आंशिक रूप से अंग्रेजी में पुद्गल को मैटर कहा जा सकता हैं, पर पाश्चात्य विज्ञान और जैन दर्शन में अणु की परिभाषा में भेद है, इस कारण पुद्गल को मैटर कहा जाना संदिग्ध है।

    जैन दर्शन के अनुसार स्थूल भौतिक पदार्थ पुद्गल कहलाता है क्योंकि यह अणुओं के संयोग और वियोग का खेल है। पुद्गल के पाँच गुण हैं - स्पर्श, दर्शन, रस, श्रवण और गंध। अतः, पुद्गल या तो छुआ जा सकता हैं या देखा जा सकता हैं या चखा जा सकता हैं या सुना जा सकता हैं या सूँघा जा सकता हैं। पुद्गल में इन में से एक या एक से अधिक गुण हो सकते हैं। पुद्गल का धर्म, बनना और बिगड़ना है, अतः, पुद्गल को पूर्णतः नष्ट करना असंभव है। पुद्गल केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित हो सकता है। जैन धर्म के अनुसार आत्मा और पुद्गल के मेल से, संसार चलायमान है। जैन दर्शन के अनुसार, पुद्गल एक अजीव तत्व है। वह चेतना रहित है। जब तक आत्मा पुद्गल से लिप्त है, तब तक वह संसार के जन्म-मरण के द्वंद्व में बंधी हुई है। पुद्गल से अलिप्त होने पर ही, आत्मा की मुक्ति संभव है।

    बौद्ध दर्शन में भी पुद्गल की चर्चा की गई है किंतु बौद्धों का पुद्गल , जैनियों के पुद्गल से बिल्कुल अलग है। बौद्ध दर्शन आत्मा को ही पुद्गल कहता है। बौद्धों का पुद्गल पाँच स्कंधों अर्थात्- रूप, वेदना, संस्कार, संज्ञा और विज्ञान का ऐसा समूह है जो निर्वाण की अवस्था में तिरोहित हो जाता है।

    इस प्रकार जैनियों का पुद्गल, आत्मा पर लिपटा हुआ रहता है तथा इन दोनों के अलग होने पर मोक्ष होता है जबकि बौद्धों का पुद्गल स्वयं आत्मा ही है, अर्थात् जब पुद्गल तिरोहित होता है तो मोक्ष मिलता है।

    हिन्दू दर्शन पुद्गल की बात नहीं करता। वह मूलतः तीन अस्तित्वों की बात करता है- ईश्वर, माया और जीव। इन तीनों अस्तित्वों को षड्दर्शन के प्रत्येक दर्शन में अलग-अलग नामों से पुकारा गया है। ईश्वर को ब्रह्म, परमात्मा तथा पुरुष आदि नामों से जाना गया है तो माया को विद्या तथा प्रकृति भी कहा गया है। जीव को आत्मा तथा जीवात्मा आदि कहा गया है।

    हिन्दू दर्शन में जीव की उत्पत्ति की प्रक्रिया बहुत सरल करके बताई गई है। इसके अनुसार ईश्वर अपनी इच्छा से माया को उत्पन्न करता है। माया ईश्वर से अंश ग्रहण करके जीव की उत्पत्ति करती है। जब माया अथवा प्रकृति, ईश्वर अथवा परमात्मा से अंश लेकर आत्मा अर्थातफ जीवात्मा को उत्पन्न करती है तो वह ईश्वरीय अंश में मौजूद ईश्वरीय गुणों को अपने आवरण से ढंक देती है जिससे ईश्वरीय अंश अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है और वह माया के बंधन में पड़कर अनंत काल तक जीवात्मा बनकर घूमता है।

    जब जीवात्मा किसी शरीर में निवास करता है तो जीव कहलाता है और जब वह बिना शरीर के घूमता है तो जीवात्मा कहलाता है। जीव रूपी जीवात्मा, ना-ना प्रकार के भोगों में लिप्त रहता है। इन भोगों को प्राप्त करने के लिए ना-ना प्रकार के कर्म करता है। जीवात्मा द्वारा किए गए सकाम कर्मों के कारण वह कर्मफल के चक्र में धंस जाता है। जीवात्मा द्वारा किए गए सकाम कर्मों के कारण आत्मा के ऊपर संस्कारों के भी आवरण लिपटने शुरु हो जाते हैं तथा जीवात्मा, इस संसार रूपी कुएं में और भी गहरा डूब जाता है।

    कर्मफल के चक्र में फंसा हुआ जीवात्मा पुनर्जन्म के चक्र में फंस जाता है। वह बार-बार देह धारण करता है और बार-बार मृत्यु को प्राप्त होता है।

    यदि हिन्दू दर्शन के अनुसार जैनों के पुद्गलों की व्याख्या की जाए तो जीवात्मा द्वारा किए गए कर्मों के कारण उत्पन्न संस्कार ही पुद्गल हैं जो जन्म-जन्मांतर तक जीवात्मा का पीछा नहीं छोड़ते। इन्हें विविध प्रकार के उपाय करके नष्ट किया जाता है, इसीको जैन धर्म आत्मा से पुद्गल का अलग होना तथा मोक्ष प्राप्त करना कहता है।

    यदि हिन्दू दर्शन के अनुसार बौद्धों के पुद्गल की व्याख्या 
    की जाए तो जिसे हिन्दू धर्म में संस्कारों अथवा माया के बंधन में पड़ा हुआ जीवात्मा कहा गया है, उसी को बौद्ध धर्म में पुद्गल कहा गया है।

    किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक साधना या तंत्र साधना का चरण लक्ष्य, माया के आवरण को भेदकर, जीवात्मा के कर्म-बंधनों को काटना तथा पुनर्जन्म के चक्र को नष्ट करना ही है। इसी को मोक्ष, मुक्ति तथा उद्धार कहते हैं। इस अवस्था में जीवात्मा अपने कर्मजनित संस्कारों को काटकर विशुद्ध आत्मा का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। अर्थात् वह पुनः ईश्वर का अंश बन जाता है।

    जीव अथवा जीवात्मा पर पड़ा हुआ माया का यह आवरण कैसे कटेगा! इसे काटना आसान नहीं है, कई जन्म लग जाते हैं, 84 लाख योनियों में भटक कर मनुष्य देह में आना पड़ता है। बार-बार मनुष्य देह धारण करने से कर्मों के बंधन भी बढ़ते रहते हैं और हजारों लाखों वर्षों तक यह यात्रा चलती रहती है।

    जीवात्मा पर पड़े हुए माया के आवरण को काटना जितना कठिन है, यह उतना ही आसान भी है। इसे इस उदाहरण से समझा जाए। किसी भी गंतव्य का पता अर्थात् एड्रेस सही मालूम होने से ही हम उस गंतव्य तक पहुंच सकते हैं।

    जीवात्मा पर लिपटे हुए माया के आवरण को काटना इसलिए कठिन है क्योंकि हमें न तो जीवात्मा का एड्रेस मालूम है जिस पर से माया का आवरण हटाया जाना है। न हमें माया का एड्रेस मालूम है जिसका फंदा काटा जाना है और न ईश्वर का एड्रेस मालूम है जिस तक जीवात्मा को पहुंचना है। पिछले कई जन्मों से हम इन तीनों अस्तित्वों का एड्रेस जिस-तिस से पूछते हुए गली-गली में भटक रहे हैं।

    हमारी यात्रा की सही शुरुआत तो तभी संभव होगी जब हमें इन तीनों में से किसी एक का सही एड्रेस मिल जाए। इस सही एड्रेस को ढूंढना ही साधना कहलाता है।

    हम अपने अगले आलेख में इन तीनों अस्तित्वों के एड्रेस ज्ञात करने के तरीकों पर चर्चा करेंगे।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    Note : You can watch a video series of six episodes prepared on the same subject at our YouTube Channel Glimpse of Indian History By Dr. Mohanlal Gupta

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