Blogs Home / Blogs / भारत में तांत्रिक साधनाएं / तंत्र साधना के तीन बड़े रहस्य, भाग-5
  • तंत्र साधना के तीन बड़े रहस्य, भाग-5

     27.10.2018
    तंत्र साधना के तीन बड़े रहस्य, भाग-5

    अपने पिछले चार आलेखों में हम चर्चा कर चुके हैं कि हम एक महाशून्य से उत्पन्न हुए हैं। प्रत्येक जड़ एवं चेतन अस्तित्व, एक महाशून्य से अपनी यात्रा आरम्भ करके यहां तक पहुंचा है और उसकी आगे की यात्रा निरंतर जारी है।

    इस आलेख में हमें यह जानना है कि हमारा अंतिम लक्ष्य क्या है! हमें यह जानकर हैरानी होती है कि हमारा अंतिम गंतव्य भी वही महाशून्य है जिससे चलकर हम यहां तक आए हैं। क्योंकि वास्तव में वही मोक्ष है, मुक्ति है, उद्धार है तथा किसी भी प्रकार की साधना का चरम लक्ष्य है।

    महाशून्य का एक प्रारूप हमारे भीतर भी रचा गया है और यह महाशून्य प्रत्येक योनि में और प्रत्येक जन्म में, हमारे भीतर विद्यमान रहता है। इसी महाशून्य में ईश्वर, माया और जीव अर्थात् हम स्वयं विराजमान रहते हैं।

    हमारा भौतिक शरीर तो केवल हमारे बाहरी उपकरण अर्थात् हमारी देह का अस्थाई निवास मात्र है जिसकी तुलना भगवद् गीता में पुराने कपड़े से की गई है। किसी भी साधना को करने का अर्थ यह है कि हम अपने भीतर छिपे उस महाशून्य को पहचानें जिसमें ईश्वर, माया और जीव अर्थात् हम स्वयं रहते हैं। हम, हमारे भीतर ही रहते हैं और अपना पता अर्थात् एड्रेस भी नहीं जानते, यह एक विचित्र बात है किंतु हम चर्चा कर चुके हैं कि माया ने ईश्वरीय अंश पर अर्थात् हम पर अपना पर्दा डाल दिया है।

    इस पर्दे को अविद्या कहते हैं। इस अविद्या को काटने के लिए हमें विद्या का सहारा लेना होगा अर्थात् स्वयं को पहचानना होगा और इसके लिए हमें अपने भीतर गहराई तक झांकना होगा। इसीलिए भारतीय शास्त्र बार-बार जोर देकर कहते हैं कि स्वयं को पहचानो। हम ही ईश्वर हैं। अपने भीतर झांको, स्वयं से संवाद स्थापित करो। इसी को लक्ष्य करके कबीर ने कहा है-

    मोको कहाँ ढूंढ़े बन्दे मैं तो तेरे पास में।

    ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकान्त निवास में।

    ना मंदिर में ना मस्जिद में, ना काशी कैलाश में।

    मोको कहाँ ढूंढ़े बन्दे मैं तो तेरे पास में।


    इस बात को सरल करके इस प्रकार कहा गया है- ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे।’ अर्थात् साधना का वास्तविक अर्थ यह हुआ कि अपने भीतर छिपे हुए महाशून्य को ढूंढना तथा उस महाशून्य में स्वयं को प्रवेश कराना। यह कैसे संभव है ? यह पूरी तरह संभव है किंतु इसका मार्ग हमने ही बंद किया हुआ है।

    इसे समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं, एक ही समय में हम या तो आगे चल सकते हैं, या पीछे। एक साथ आगे एवं पीछे की गति नहीं कर सकते हैं। यही स्थिति हमने स्वयं को अपने भीतर छिपे हुए महाशून्य में प्रवेश कराने के सम्बन्ध में कर रखी है।

    माया द्वारा डाले गए अविद्या के कारण के कारण हम प्रत्येक समय जगत में रहकर अपनी इंद्रियों को बाहरी सुखों से तृप्त करना चाहते हैं। इस कारण हम अपने भीतर की ओर गति नहीं कर पाते। यदि हमें अपने भीतर छिपे महाशून्य तक की यात्रा करनी है तो हमें अपनी समस्त इंद्रियों का मुंह बाहर की ओर से बंद करना होगा। अर्थात् भौतिक वासनाओं को त्यागकर भीतर की ओर उन्मुख करना होगा तथा अपनी समस्त ऊर्जा को अपने भीतर स्थित महाशून्य पर केन्द्रित करना होगा।

    स्वयं को अपने भीतर के महाशून्य तक ले जाने के कई रास्ते हैं। इनमें से कुछ रास्तों के बारे में हम बात करते हैं और अंत में साधना के तीन बड़े रहस्यों की चर्चा करेंगे। स्वयं को अपने भीतर के महाशून्य तक ले जाने का पहला रास्ता है ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क से तारतम्य बिठाना।

    हम 
    पिछले आलेख में चर्चा कर चुके हैं कि आत्मा, बुद्धि और मन का निर्माण स्थूल शरीरों के निर्माण से पहले हुआ और इन्हें ब्रह्माण्ड के भीतर स्थित एक विशाल भण्डार में रखा गया जिसे ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क कहा जाता है। यह ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क दो तरीके से कार्य करता है। इसके काम करने का पहला तरीका तो यह है कि यह स्वयं जड़ और चेतन पदार्थों तथा जीवात्माओं से सम्पर्क करता है। दूसरा तरीका यह है कि उच्च कोटि के साधक अपनी साधना के बल पर इस ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क से सम्पर्क साध लेते हैं।

    संसार की प्रत्येक वस्तु से ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क का सम्बन्ध है, चाहे वह जड़ हो या चेतन अथवा पदार्थ हो या ऊर्जा। उस सम्बन्ध की सीमा सामान्यतः ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क स्वयं तय करता है।

    हम संसार के बहुत से लोगों के बारे में जानते हैं जिनका सम्पर्क इस ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क से साधारण मनुष्यों की तुलना में कहीं अधिक था।

    मान्यता है कि वैदिक ऋचाएं ऋषियों के समक्ष स्वयं प्रकट हुई थीं और ऋषियों ने उन ऋचाओं को न केवल याद कर लिया अपितु दूसरे मनुष्यों तक पहुंचाया भी। इन्हीं ऋचाओं को बाद में जब भगवान वेदव्यास ने संहिता बद्ध किया, तब उन्होंने भी ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क की सहायता प्राप्त की जिसे हम स्थूल रूप में भगवान गणेश कहते हैं। गणेश बुद्धि और ज्ञान के देवता हैं, वस्तुतः गणेशजी ही ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क के स्वामी हैं।

    गोस्वामी तुलसीदास ने ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क से रामकथा का वास्तविक स्वरूप प्राप्त किया था। कहा जाता है कि तुलसीदासजी ने रामचरित मानस की रचना ध्यानावस्था में की। वे स्वयं भी लिखते हैं-

    ‘रचि महेस निज मानस राखा, पाय सुसमउ सिवा सन भाषा।’

    अर्थात् भगवान शिव द्वारा राम कथा को रच कर अपने मानस में रखा गया था और बाद में प्रकट किया गया था। भगवान शिव के इस मानस को ही ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क समझना चाहिए।

    आधुनिक काल में यहूदी वैज्ञानिक आइंस्टीन तथा हिन्दू गणितज्ञ रामानुजन के नाम लिए जा सकते हैं जिन्हें ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क स्वयं ज्ञान उपलब्ध करा रहा था। रामानुजन के बारे में कहा जाता है कि वे रात्रि को नींद में उठकर कागज पर कुछ गणितीय समस्याएं लिखते थे और प्रातः उठकर आश्चर्य में पड़ जाते थे कि उन्होंने यह क्या और कैसे लिखा! आज भी दुनिया भर के वैज्ञानिक, रामानुजन की गणितीय समस्याओं को सुलझा नहीं पाए हैं। उन्हें केवल 33 वर्ष की आयु मिली।

    ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क उनसे इतना ही काम लेना चाहता था। आइंस्टीन ने ऊर्जा के सम्बन्ध में जिस ज्ञान का प्राकट्य किया, वह साधरण मनुष्य के मस्तिष्क में आना असंभव जैसा है। इसलिए आइंस्टीन की मृत्यु के बाद वैज्ञानिकों ने उनके मस्तिष्क को प्रयोगशाला में संभाल कर रखा है ताकि जब कभी विज्ञान सक्षम हो जाए तो आइंस्टीन के मस्तिष्क के रहस्य को समझने का प्रयास किया जाए।

    फ्रांस के प्रसिद्ध भविष्यवक्ता नेस्त्रोदोमस ने भी इसी ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क की सहायता लेकर आने वाले सैंकड़ों वर्षों में जगत् में होने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं को देख लिया था तथा उन्हें अपने समय की भाषा एवं संदर्भों के माध्यम से कागज पर अंकित किया था। उदाहरण के लिए उन्होंने हवाई जहाज को ‘स्टील बर्ड्स’ लिखा है।

    यद्यपि यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क से कौन सम्पर्क कर पाता है और कौन नहीं तथा यह भी नहीं कहा जा सकता कि प्रत्येक प्राणी से निरंतर सम्पर्क रखने के उपरांत भी ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क किस प्राणी पर अधिक अनुग्रह करता है, किंतु वह विशेष अनुग्रह करता है इसके उदाहरण भगवान वेदव्यास, गोस्वामी तुलसीदास, गणितज्ञ रामानुजन, वैज्ञानिक आइंस्टीन तथा भविष्यवक्ता नेस्त्रोदेमस के रूप में दिखाई देते हैं।

    लियोनार्डो दा विंची तथा शकुंतला देवी के प्रकरण भगवान वेदव्यास, गोस्वामी तुलसीदास, गणितज्ञ रामानुजन, वैज्ञानिक आइंस्टीन तथा भविष्यवक्ता नेस्त्रोदेमस से अलग हैं। लियोनार्डो दा विंची तथा शकुंतला देवी के मामले में माया के बंधन कमजोर रह गए थे इसलिए उनमें अतीन्द्रिय शक्तियां थीं और वे अपना कार्य प्रत्येक समय कर सकते थे जबकि भगवान वेदव्यास, गोस्वामी तुलसीदास, गणितज्ञ रामानुजन, वैज्ञानिक आइंस्टीन तथा भविष्यवक्ता नेस्त्रोदेमस अपना कार्य हर समय नहीं कर सकते थे, जब उन्हें ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क से सिगनल मिलते थे, तब ही वे अपना विशिष्ट कार्य करते थे।

    अगले अर्थात् छठे और इस शृंखला के अंतिम आलेख में जानेंगे अपने भीतर स्थित महाशून्य में प्रवेश करने के लिए की जाने वाली विभिन्न प्रकार की साधनाओं के तीन बड़े रहस्य।


    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    Note : You can watch a video series of six episodes prepared on the same subject at our YouTube Channel Glimpse of Indian History By Dr. Mohanlal Gupta

  • अपने पिछले च"/> अपने पिछले च"> अपने पिछले च">
    Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×