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  • तंत्र साधना के तीन बड़े रहस्य, भाग- 4

     27.10.2018
    तंत्र साधना के तीन बड़े रहस्य, भाग- 4

    पिछले तीन आलेखों में हमने चर्चा की कि ईश्वर परम प्रकाशवान अस्तित्व है, वह परम चैतन्य, परम ज्ञानवान तथा परम शक्तिशाली है। उसी ने माया को उत्पन्न किया है और माया ने ईश्वरीय अंश को अर्थात् आत्मा को जकड़कर उसे अंधकार में डाला है। माया के जोर से जीवात्मा बना हुआ ईश्वरीय अंश, अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है तथा अपने कर्मों के बंधन में मजबूती से जकड़ा हुआ रहता है।

    इस आलेख में हम ईश्वर, माया और जीव के बीच के अद्भुत सम्बन्ध को समझने का प्रयास करेंगे।

    यद्यपि ईश्वर से ही माया उत्पन्न होती है तथा ईश्वर से ही जीव उत्पन्न होता है तथापि इनके स्वभाव बिल्कुल अलग-अलग होते हैं। इस कारण ईश्वर, माया और जीव के बीच के सम्बन्ध भी बहुत अद्भुत होते हैं।

    इनके स्वभाव तथा सम्बन्धों की वैचित्र्यता को समझने के लिए हमें स्थूल जगत से एक उदाहरण लेना होगा। हाइड्रोजन का गुण है जलना और ऑक्सीजन का गुण है जलाना, किंतु हाइड्रोजन के दो परमाणु, ऑक्सीजन के एक परमाणु से मिलकर एक नवीन पदार्थ का निर्माण करते हैं जिसे जल कहते हैं। जल का गुण है आग को बुझाना। अर्थात् पानी के भीतर मौजूद हाइड्रोजन और ऑक्सीजन अपने मूल गुणों को पूरी तरह से भूलकर अपने मूल गुणों से विपरीत आचरण करते हैं किंतु जैसे ही पानी का अणु टूटता है अर्थात् माया बिखर जाती है और हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के परमाणु मुक्त हो जाते हैं तो पुनः अपने मूल स्वभाव में लौट जाते हैं।

    ऐसा ही ईश्वर, माया और जीव के साथ होता है। जीव, ईश्वर और माया के संयोग से प्रकट होता है किंतु जीव में न तो ईश्वर का कोई गुण धर्म होता है और न माया का। गोस्वामी तुलसीदास ने इसी को लक्ष्य करके कहा है- जीव की ईस समान! अर्थात् जीव को ईश्वर के समान समझना भारी भूल करना है।

    ईश्वर का गुण है कि वह कभी च्युत नहीं होता, न उसका कोई आदि है न अंत। उस पर काल का प्रभाव नहीं पड़ता। वह कोई कर्म नहीं करता न किसी प्रकार का फल भोगता है। वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होता है। वह अपनी इच्छा से अवतार लेता है। ईश्वर कभी विलीन नहीं होता। वह सम्पूर्ण जगत में समाया हुआ है किंतु जगत् में लिप्त नहीं होता।

    जबकि ईश्वर से प्रकट होने वाले जीव का स्वभाव बिल्कुल अलग होता है। उस पर काल का प्रभाव होता है। वह बनता है और नष्ट होता है। वह कर्म करता है और उसका फल भोगता है। उसे अपनी इच्छा से अवतार नहीं मिलता, अपितु कर्मफल से उत्पन्न संस्कारों के वशीभूत होकर जन्म लेना पड़ता है। वह जन्म-मृत्यु के चक्र में धंसा हुआ होता है। जीव को अंततः ईश्वर में विलीन होना होता है।

    माया का स्वभाव ईश्वर और ब्रह्म दोनों से अलग है। यह माया कभी ईश्वर से बाहर आकर अपना अस्तित्व स्थापित करती है तो कभी ईश्वर के भीतर स्थित रहकर पूर्णतः विलीन हो जाती है। ईश्वर से बाहर होने पर यह माया, ब्रह्म और जीव के बीच स्थित रहती है। माया की स्थिति को लक्ष्य करके गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है- ब्रह्म जीव बिच माया जैसे। अर्थात् सीताजी, राम और लक्ष्मण के बीच ऐसे चल रही हैं जैसे ब्रह्म और जीव के बीच में माया चलती है।

    जीव के लिए माया अत्यंत शक्तिशाली होती है। जीव इसके बंधन से आसानी से मुक्त नहीं होता। गोस्वामी तुलसीदासजी ने जीव की इसी स्थिति को लक्ष्य करके लिखा है- हरि माया अति दुस्तर, तरि न जाइ बिहगेस।

    जीव के लिए माया अत्यंत शक्तिशाली होते हुए भी वह ईश्वर के सामने बहुत कमजोर होती है और ईश्वर का अनुशासन स्वीकार करती है। माया के अस्तित्व की सीमा का निरूपण करते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है- सो माया प्रभु सों भय भाखे।

    कभी-कभी जीवात्मा पर माया का कोई प्रतिबंध मजबूती से बंद नहीं होता। इस कारण किसी-किसी मनुष्य में अलौकिक प्रतिभा दिखाई देने लगती है। पंद्रहवीं शताब्दी में जन्मे इटली के चित्रकार लियोनार्डो दा विंची ऐसे ही जीव थे। उन्होंने हवाई जहाजों के कलपुर्जों के चित्र उस युग में बना दिए थे जिस युग में हवाई जहाज का आविष्कार नहीं हुआ था।

    बीसवीं शताब्दी में जन्मीं मानव कम्प्यूटर के नाम से विख्यात शकुंतला देवी हमारे सामने ऐसा ही एक और उदाहरण हैं। वे बड़ी से बड़ी संख्याओं को केवल देखकर ही जोड़ देती थीं, उनकी गणना नहीं करती थीं। उन्होंने गणितीय गणनाओं के मामले में कई बार कम्प्यूटर को भी परास्त करके दिखाया। संभवतः शकुंतला देवी पर माया का कोई प्रतिबंध ठीक से नहीं लग पाया था।

    अतीन्द्रिय शक्तियों से सम्पन्न समस्त व्यक्ति, लियोनार्डो दा विंची तथा शकुंतला देवी की तरह ऐसी ही जीवात्माओं के उदाहरण हैं जिनकी ईश्वरीय शक्तियों पर पड़े हुए पर्दे का कोई न कोई बंधन ढीला रह जाता है। कई लोग केवल स्पर्श मात्र से किसी का रोग हर लेते हैं तो कई लोग भविष्य में होने वाली घटनाओं का भी ठीक-ठीक वर्णन कर देते हैं।

    अपने अगले आलेख में हम जानने का प्रयास करेंगे कि जीव पर माया के बंधन के होते हुए भी ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क किस प्रकार साधारण जीवों से सम्पर्क करके उनसे अलौकिक प्रतिभा से युक्त कार्य करवाता है। हम यह भी जानने का प्रयास करेंगे कि किस प्रकार चौरासी लाख योनियों में भटकता हुआ जीव अंततः अपने कर्मबंधनों को काटकर माया का पर्दा फाड़ देता है और फिर से ईश्वर में कूद जाता है।


    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    Note : You can watch a video series of six episodes prepared on the same subject at our YouTube Channel Glimpse of Indian History By Dr. Mohanlal Gupta

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