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  • तंत्र साधना की सफलता के बड़े रहस्य भाग-1

     02.06.2020
    तंत्र साधना की सफलता के बड़े रहस्य भाग-1

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    तंत्र साधनाएं प्रायः सफल नहीं होतीं। कुछ किताबें पढ़कर अथवा तांत्रिक जैसे दिखने वाले कुछ लोगों की बातों में आकर बहुत से लोग तंत्र साधनाओं की तरफ आकृष्ट होते हैं। कुछ महीनों की साधना के बाद साधक तंत्र से निराश होकर उसे ढोंग, पाखण्ड और झूठ मान लेते हैं किंतु तंत्र झूठ नहीं है, सत्य है। हां तंत्र के नाम पर बहुत से लोग पाखण्ड अवश्य करते हैं। इस कारण तंत्र पर हमेशा संदेह बना रहता है।


    इस संसार में जो कुछ दिखाई देता है, वह किसी न किसी तंत्र का ही हिस्सा है। जगत में करोड़ों-करोड़ तंत्र हैं। ये छोटे-छोटे तंत्र न केवल परस्पर सम्बद्ध हैं अपितु प्रत्येक तंत्र किसी बड़े तंत्र का हिस्सा हैं। जगत् में जो कुछ भी हम आंखों से देखते हैं, वह स्थूल तंत्र है, और प्रत्येक स्थूल तंत्र जिस शक्ति से संचालित होता है, वह सूक्ष्म तंत्र है। वह दिखाई नहीं देता, सुनाई भी नहीं देता, केवल अनुभव होता है, वह भी बहुत प्रयासों के बाद।

    सूक्ष्म तंत्र कोई जादू नहीं है, अपितु प्रकृति के किसी अदृश्य विशालतम सूक्ष्म तंत्र का हिस्सा है। इस कारण कोई भी तंत्र सबसे शक्तिशाली नहीं है, प्रत्येक तंत्र की शक्ति की सीमा अवश्य है। यहाँ सूक्ष्म का अर्थ आकार में छोटा नहीं है अपितु अपने अस्तित्व की महीनता से है। इतना महीन, इतना महीन कि दिखे ही नहीं, केवल अनुभव हो। तंत्र साधना में हाथ आजमाने से पहले हमें प्रकृति के स्थूल तंत्र और सूक्ष्म तंत्र के रहस्यों को समझना चाहिए।

    इसे समझना कठिन नहीं है यदि कुछ आधारभूत चीजों को अच्छी तरह मस्तिष्क में बैठा लिया जाए। यदि स्थूल तंत्र और सूक्ष्म तंत्र के सम्बन्ध को समझ लिया जाए तो न केवल तंत्र का अपितु आधुनिक भातिक विज्ञान का रहस्य भी समझ में आ जाता है। स्थूल तंत्र और सूक्ष्म तंत्र के सम्बन्ध को समझने के लिए हम कुछ बिंदुओं पर चर्चा करते हैं। यदि हमने कुछ चीजों को सुना, या पढ़ा है लेकिन उनके स्रोत की विश्वसनीयता ज्ञात नहीं है, यदि ज्ञात है तो भी उस बात को स्वीकार नहीं किया है, या स्वीकार तो किया है किंतु उसे अनुभव नहीं किया है, तो वह चीज हमें उतना लाभ नहीं देगी जितना कि उससे मिल सकता है।

    इस बात को इस तरह सरल करके समझना चाहिए कि जब भी किसी बात को सुनें या पढ़ें, उस ज्ञान का लाभ उठाने के लिए तीन चरण अपनाएं। पहला चरण है स्रोत की विश्वसनीयता ज्ञात करना। यदि स्रोत विश्वसनीय है अर्थात् कोई बात यदि किसी योग्य गुरु, किसी अनुभवी साधक, किसी परमार्थी साधु, किसी वैरागी तपस्वी या समाज में सैंकड़ों वर्षों से स्वीकृत पुस्तकों द्वारा ज्ञात हुई है, तो उस बात को मानें अर्थात् स्वीकार करें। किसी बात को स्वीकार करना ही दूसरा चरण है।

    तीसरे चरण में उस बात को अनुभव करना होता है। केवल श्रद्धावश स्वीकार कर लेने से कुछ न कुछ लाभ तो होता है किंतु पूरा लाभ नहीं होता। उस ज्ञान को स्वयं अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए। किसी बात को अनुभव करके देखने का अर्थ यह नहीं है कि आपकी श्रद्धा में कोई कमी आ गई है, या साधक को कोई संदेह है! कोई संदेह नहीं है, पूरा विश्वास है किंतु विश्वास रूपी कंचन को अनुभव की आंच में तपाया जाना चाहिए। यह अनुभव ही साधना है। यही तंत्र सिद्धि का आखिरी पड़ाव है। पहले दोनों पड़ाव अर्थात् जानना और मानना जितने मजबूत होंगे, आखिरी पड़ाव प्राप्त करने की निश्चयात्मकता भी उतनी ही मजबूत होगी।

    योग, तंत्र, ज्योतिष और आयुर्वेद धर्म नहीं हैं, न धर्म का हिस्सा हैं। ये साधनाएं हैं और इन्हें साधा जाता है। इनमें प्रकृति के रहस्यों का भण्डार छिपा हुआ है जिन्हें खोजा जाता है। ये भी सत्य विद्याएं हैं और संसार की अन्य बहुत सी सत्य विद्याओं की तरह इन्होंने भी वेदों से जन्म लिया है। वेदों में जो कुछ लिखा हुआ है उसका आशय सत्य जानने से है। वेदों की विश्वसनीयता इस बात में है कि इन्हें किसी या किन्हीं मनुष्यों ने अपनी किसी स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं लिखा है।

    वेदों में जो कुछ भी लिखा हुआ है वह अपौरुषेय है अर्थात् उसे धरती के मानवों ने नहीं, किसी अथवा किन्हीं ऐसी शक्तियों ने लिखा है जिनका इस संसार के मानवों से कोई स्वार्थ नहीं था। वे शक्तियां मानव जाति का उपकार करना चाहती थीं इसलिए उन्होंने समस्त सत्य विद्याओं की पुस्तकें बनाकर मनुष्य जाति को प्रदान कीं। वेदों को पढ़ने और रटने से बहुत सीमित लाभ होता है। केवल इतना कि हम उनके निकट जाते हैं, उनमें लिखी हुई बातों को कुछ-कुछ समझने लगते हैं और वे हमारे लिए अपरिचित नहीं रहते किंतु जब हम उस ज्ञान को समझकर उसे कार्यान्वित करने का प्रयास करते हैं तो हम साधना के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं।

    यह संसार किसने प्रकट किया, यह अचानक प्रकट हुआ या किसी ने सोच समझ कर प्रकट किया, इस पर अधिक समय खराब करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर पाना केवल तभी संभव है जब हमारी क्षमता इस संसार को बनाने वाले के समकक्ष हो जाए। इसलिए यह जानने पर अधिक समय एवं ऊर्जा व्यय करनी चाहिए कि इस संसार को किस उद्देश्य से बनाया गया है तथा इसे किन रहस्यमयी शक्तियों पर टिकाया गया है।

    यदि हम इन दो बातों पर अपना ध्यान केन्द्रित करें तो तंत्र साधना में सफलता मिलना अनिवार्य है। इस संसार को जिसने भी रचा उसने यह संसार वैसा नहीं रचा था जैसा कि यह आज दिखाई देता है या आज से करोड़ों साल पहले दिखाई देता था या अंधकार के उस महाविस्फोट के समय दिखाई देता था जिसके द्वारा प्रकाशमयी ब्रह्माण्डी की की उत्पत्ति हुई थी।

    हमारे वेदों से लेकर पश्चिमी जगत् के भौतिक विज्ञानी भी मानते हैं कि यह संसार इतने सूक्ष्म रूप में रचा गया था जिसमें सुईं की नोक के करोड़वें के करोड़वें के करोड़वें हिस्से के बराबर भी जगह नहीं थी।

    वस्तुतः जिस संसार को रचा गया था वह महाशून्य था। उसका अस्तित्व था किंतु उसमें स्थूलता कल्पना मात्र की भी नहीं थी। उस महाशून्य जितनी जगह में अरबों-खरबों की भी अरबों-खरबों गुना ऊर्जा भरी गई थी। रचने वाले ने केवल यह ऊर्जा ही रची थी।

    सृष्टि के आकार लेने का आगे का समस्त कार्य इसी ऊर्जा को स्वयं करना था। इस कारण यह ऊर्जा महाभयानक गति एवं अकल्पनीय दबाव से विस्फोटित होकर भयंकर गर्जन करती हुई अपने केन्द्र के विरुद्ध हर दिशा में दौड़ पड़ी। यह ऊर्जा कहां से आई, किसने बनाई, कितनी बनाई, क्यों बनाई, किसी भी प्रश्न का जवाब हमारे पास नहीं है। ऐसा नहीं है कि इन प्रश्नों के जवाब नहीं हैं, अवश्य हैं किंतु उनके पास हैं जो इस ऊर्जा को बनाने वाले के बराबर क्षमता रखते हैं।

    इसी ऊर्जा ने अपने संचरण के लिए ब्रह्माण्ड का निर्माण किया। इसी ऊर्जा ने दिशाएं बनाईं, काल अर्थात् समय का निर्माण किया। इसी ऊर्जा ने पंच महाभूतों अर्थात् अंतरिक्ष, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी की की रचना की। इसी ऊर्जा ने इन पंचमहाभूतों की तन्मात्राएं अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध की रचना की। पंचमहाभूतों के निर्माण अथवा प्राकट्य का एक क्रम है।

    सबसे पहले अंतरिक्ष प्रकट हुआ, इसका गुण है शब्द। शब्द को संचरण के लिए केवल अंतरिक्ष अर्थात् स्पेस अर्थात् स्थान चाहिए।

    केवल शब्द के द्वारा अंतरिक्ष की अनुभूति होती है। अंतरिक्ष सर्वव्यापी है किंतु उसमें कोई हलचल नहीं होती। अंतरिक्ष को विष्णु से थोड़ा ही नीचे समझना चाहिए। क्योंकि विष्णु जगत् व्यापी होकर भी संसार से निर्लेप रहता है जबकि अंतरिक्ष जगत्व्यापी होने के साथ-साथ जगत् में लिप्त भी रहता है। विष्णु और अंतरिक्ष दोनों का रंग नीला है।

    अंतरिक्ष में से वायु नामक महाभूत प्रकट हुआ। वायु का गुण है स्पर्श। केवल स्पर्श के द्वारा वायु अपना परिचय करवाता है। पंचमहाभूतों में से सर्वाधिक बलशाली वायु ही है। वायु का कोई रंग नहीं होता, इसमें जो भी भौतिक रंग घुल जाता है, उसी रंग का दिखने लगता है। वायु को शिव से थोड़ा ही नीचे समझना चाहिए। हनुमानजी वायुपुत्र कहलाते हैं क्योंकि वे वायु के समान ही बलशाली हैं। रामचरित मानस में कहा गया है- पवन तनय बल पवन समाना।

    वायु में से अग्नि नामक महाभूत प्रकट हुआ। इसका गुण है रूप। अग्नि प्राप्त किए बिना कोई भी आकृति या रूप संभव नहीं होता। अग्नि के विविध रंग होते हैं किंतु सामान्यतः इसका रंग लाल-पीला होता है। हिन्दू धर्म में लाल और पीले रंग की महत्ता इसीलिए सर्वाधिक है। अग्नि ही इस संसार को विविध प्रकार के रूप प्रदान करता है।

    अग्नि में से जल नामक महाभूत प्रकट हुआ। इसका गुण है रस। संसार में जितने भी प्रकार के रस और स्वाद बने हैं, उनका आधार जल ही है। इसका कोई रंग नहीं होता। असुर रसों के लालची हैं इसलिए असुरों का वास जल के भीतर रहता है। वेदों में वरुण का प्रारम्भिक स्वरूप असुर के रूप में है, बाद में उसे देवता घोषित किया गया।

    जल में से पृथ्वी नामक महाभूत प्रकट हुआ। इसका गुण है गंध। पृथ्वी नामक महाभूत का संयोग पाए बिना सृष्टि में गंध की रचना नहीं हो सकती। पृथ्वी सबसे स्थूल है। यह समस्त सृष्टि को स्थूलता प्रदान करती है। संसार में जो कुछ भी दिखाई देता है या अनुभव होता है, वह इन्हीं पंचमहाभूतों के संयोग से होता है।

    जब पंचमहाभूत प्रकट हो जाते हैं तो ब्रह्माजी का काम शुरु होता है। वे पंचमहाभूतों के विविध संयोग से इस नाशवान सृटि का सृजन करते हैं। इसलिए ब्रह्माजी को सृष्टि का जन्मदाता कहा जाता है। भगवान विष्णु सृष्टि के मूलाधार पंचमहाभूतों की रक्षा करते हैं, उन्हें संरक्षण देते हैं तथा नष्ट होने से बचाते हैं, इसलिए उन्हें सृष्टि का पालक कहा जाता है।

    भगवान शिव को भूतभावन कहा जाता है, इसका अर्थ है कि वे विष्णु के काम को भौतिक रूप से आगे बढ़ाते हुए सृष्टि को आरोग्य प्रदान करते हैं तथा अंत में इन पंचमहाभूतों का विलय करके सृष्टि को एक महाशून्य में समेट लेते हैं। इसीलिए उन्हें रुद्र कहा जाता है।

    इस प्रकार हम देखते हैं कि निर्जीव एवं जड़ संसार, इस सृष्टि का आधार नहीं है, वह तो केवल सृष्टि का प्राकट्य भर है। संसार की असली ताकत उन सूक्ष्म शक्तियों के हाथों में हैं जो इस स्थूल संसार का निर्माण करती हैं, पालन करती हैं और उसका संहार करती हैं। सूक्ष्मता से स्थूलता की ओर आने के जिस क्रम पर हमने चर्चा की है, उसका उद्देश्य केवल सृष्टि के आधार में छिपे उस तंत्र को समझने का प्रयास मात्र है जिसे समझे बिना कोई भी साधना न तो सफल हो सकता है और न उससे कोई लाभ ही उठा सकता है।

    जब हमें यह क्रम ज्ञात हो गया है तो हमें जानना चाहिए कि हमें, तंत्र साधना के माध्यम से जो कुछ प्राप्त करना है, वह सूक्ष्म शक्तियों से प्राप्त करना है। इन सूक्ष्म शक्तियों से सम्बन्ध कैसे बनाया जाए, इसकी चर्चा हम अगले आलेख में करेंगे।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


    Note : You can watch a video series of six episodes prepared on the same subject at our YouTube Channel Glimpse of Indian History By Dr. Mohanlal Gupta 


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