• बेहोश हंस !

     02.06.2020
    बेहोश हंस !

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    किसी देश का राजा बहुत न्यायशील था। कई गुणों के साथ उसमें यह गुण भी था कि वह अपनी रानी से बहुत प्यार करता था। रानी थी भी बहुत सुंदर। वह भी राजा को बहुत प्यार करती थी इसलिये हमेशा राजा का भला सोचती रहती थी। रानी के कहने पर राजा ने रानी के भाई को राज्य का प्रधानमंत्री बना रखा था। स्वाभाविक ही था कि रानी का भाई होने के कारण वह राजा का अत्यंत विश्वासपात्र भी था।

    जो कहानी आप पढ़ने जा रहे हैं उस कहानी के नायक न्यायशील राजा, सुंदर रानी अथवा विश्वासपात्र प्रधानमंत्री नहीं हैं। वे तो इस कहानी के साधारण पात्र मात्र हैं। इस कहानी का वास्तविक नायक तो एक बूढ़ा हंस है जिसे एक दिन एक बहेलिया बहुत कम पैसों में रानी को बेच गया था। बूढ़ा हंस राजमहल के सरोवर में रहता था और अपने गुणों के लिये विख्यात था।

    कहानी का आरंभ तब हुआ जब प्रधानमंत्री ने रानी का भाई तथा राजा का विश्वासपात्र होने का लाभ उठाते हुए राज्य की समस्त गायें खरीद लीं। इससे पूरी प्रजा को अपने बच्चों के लिये प्रधानमंत्री की डेयरी से ही दूध खरीदना पड़ता था। कुछ दिन तक तो प्रजा को ठीक-ठाक दूध मिला किंतु शीघ्र ही दूध का स्वाद बदल गया। प्रजा को लगने लगा कि यह दूध नहीं है अपितु उसके स्थान पर यूरिया, साबुदाने और कास्टिक सोड़े का घोल है।

    प्रजा में असंतोष पनपने लगा और कुछ ही महीनों में बात राजा तक जा पहुंची। वह एक गरीब ब्राह्मण था जो सबसे पहले खराब दूध की शिकायत लेकर राजा के दरबार में पहुँचा। जाने क्यों उस ब्राह्मण की यह जिद्द थी कि वह अपने बच्चों को अच्छा दूध ही पिलायेगा!

    ब्राह्मण ने भरे दरबार में आरोप लगाया- 'दुहाई है महाराज! प्रधानमंत्री की डेयरी से आने वाले दूध में पानी है, स्वाद कतई नहीं है और बदबू अलग से आती है। सच पूछो तो वह दूध है ही नहीं। बच्चे उस दूध को पीकर सूख रहे हैं।'

    राजा ने प्रधानमंत्री से ब्राह्मण की शिकायत का स्पष्टीकरण मांगा तो प्रधानमंत्री चिढ़ गया। उसने चिल्लाकर कहा- 'महाराज! गरीबी के कारण इस ब्राह्मण की बुद्धि खराब हो गयी है अन्यथा यह यहाँ कदापि नहीं आता। दूध में कोई कमी नहीं है। यदि दूध खराब होता तो यह शिकायत किसी और को भी होती?'

    - 'महाराज! यह बात सही है कि गरीबी में बुद्धि नष्ट हो जाती है किंतु इतनी नष्ट भी नहीं हो जाती कि उसे अकारण ही प्रधानमंत्री की डेयरी के दूध में से बदबू आने लगे।' ब्राह्मण बोला।

    - 'किंतु विप्र देवता हम भी रोज दूध पीते हैं हमें तो बदबू नहीं आती!' राजा ने ब्राह्मण को टोका।

    - 'महाराज! राजमहल में जो दूध आता है वह प्रजा को मिलने वाले दूध से अलग है। इसलिये आपको दूध में बदबू नहीं आती।'

    - 'क्या पूरी प्रजा में से तुम ही अकेले हो जिसे दूध में बदबू आती है?'

    - 'बदबू तो पूरी प्रजा को आती है महाराज किंतु प्रजा प्रधानमंत्रीजी के डर से बोलती नहीं है।'

    - 'तो क्या तुम्हें प्रधानमंत्री से डर नहीं लगता?' राजा ने पूछा।

    - 'लगता तो है महाराज किंतु आपके रहते ये मेरा क्या बिगाड़ेंगे!'

    - 'ठीक है हम तुम्हारी शिकायत पर विचार करने को तैयार हैं। क्या तुम दूध का नमूना अपने साथ लाये हो?'

    - 'हाँ महाराज! लाया हूँ।' राजा ने दरबारियों से दूध की जाँच करने को कहा। एक-एक करके दरबारियों ने दूध को 
    सूंघा लेकिन दूध सूंघते समय वे दूध को कम और प्रधानमंत्री को अधिक देख रहे थे। प्रधानमंत्री अपनी बड़ी-बड़ी मूंछो पर ताव दे रहा था। इस कारण किसी को भी दूध में बदबू नहीं आयी। अंत में राजा ने दूध का कटोरा अपने पास मंगवाया। ठीक उसी समय रानी ने दरबार में प्रवेश किया। रानी को देखते ही राजा की नाक ने काम करना बंद कर दिया।

    राजा सिर पकड़ कर बैठ गया। ब्राह्मण कह रहा था कि दूध में बदबू है और दरबारी कह रहे थे कि दूध में बदबू नहीं है। जबकि राजा की नाक ने काम करना बंद कर दिया था। कैसे हो फैसला!

    रास्ता रानी ने सुझाया- 'ऐसा करते हैं महाराज, यह फैसला राजमहल के बूढ़े हंस से करवाते हैं। कहते हैं कि हंस में नीर-क्षीर का जो विवेक होता है वह तो आदमी में भी नहीं होता।' राजा को रानी का सुझाव ठीक लगा।

    बूढ़े हंस को बुलवाया गया। बूढ़े हंस ने एक दृष्टि राज दरबार में खड़े लोगों पर डाली और फिर दूध में चौंच गढ़ा दी। अगले ही क्षण हंस बेहोश होकर गिर पड़ा।

    राजा कुछ समझ नहीं सका। ऐसा क्यों हुआ?

    ब्राह्मण बोला- 'दुहाई है महाराज! देख लिया आपने अपनी आंखों से ? दूध की बदबू से हंस को चक्कर आ गया।'

    - 'महाराज! यह तो सुना है कि हंस दूध में से पानी को अलग कर देता है किंतु यह तो नहीं सुना कि वह दूध की बदबू से बेहोश हो जाता है। कौन जाने बूढ़ा हंस किस कारण बेहोश हुआ है? प्रधानमंत्री ने कहा।

    बिना कोई फैसला किये राजा ने दरबार समाप्त कर दिया। हंस को उठाकर उपचार के लिये ले जाया गया। देर रात हंस को होश आया। उस समय तक सारे मनुष्य सो चुके थे। कुछ पक्षी थे जो हंस की चिंता में जाग रहे थे।

    हंस को होश में आया देखकर पक्षियों ने हंस को घेर लिया- 'क्या बात हुई? क्यों बेहोश हो गये आप? क्या दूध में बहुत बदबू थी?' पक्षियों ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी।

    हंस बहुत देर तक चुपचाप बैठा रहा। काफी देर बाद उसने मौन तोड़ा- ' मुझे नहीं मालूम कि उसमें बदबू थी या नहीं। हंसों को खुशबू या बदबू नहीं आती। हंसों को तो केवल एक ही बात आती है और वो ये कि वह दूध को पानी से अलग करके पी सकता है।'

    - 'फिर बेहोश क्यों हुए आप?' पक्षियों ने पूछा।

    - 'बेहोश होने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था। जब मैंने कटोरे में चौंच डाली तो प्रधानमंत्री और उसकी बहिन लाल-लाल आंखों से ब्राह्मण देवता को देख रहे थे। मैंने पाया कि कटोरे में दूध नहीं था अपितु यूरिया, साबुदाने और कास्टिक सोड़े का घोल था। उसे पी सकना मेरे वश की बात न थी।'

    - 'तो फिर आपने तुरंत ही चौंच कटोरे से बाहर क्यों न निकाल ली?' कम उम्र के पक्षी उत्तेजना से चिल्लाये।

    - 'यदि मैं ऐसा करता तो दुष्ट प्रधानमंत्री अवश्य ही ब्राह्मण देवता को मरवा डालता। मैं बेहोश नहीं हुआ था किंतु ब्राह्मण देवता के प्राणों की रक्षा के लिये मुझे बेहोश होने का नाटक करना पड़ा।'

    उसी रात हंस अज्ञात स्थान को उड़ गया। कहते हैं कि उस देश का राजा कभी नहीं जान सका कि आखिर हंस के बेहोश होने के पीछे क्या रहस्य था। कहने वाले यह भी कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने ही उसी रात बूढ़े हंस को मरवा डाला था।

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