• खुला समाज

     02.06.2020
    खुला समाज

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    लो भई अब सबके दुख दूर हुए जाते हैं। अमरीका पूरी दुनिया में खुले समाज का निर्माण करने निकल पड़ा है। बहुत रह लिये बंद समाज में। आदमी कोई करमकल्ला है क्या जो बंद समाज में पड़ा सड़ता रहे!

    कैसी दुनिया है यह? चारों ओर से बंद। यहाँ बंद, वहाँ बंद। जहाँ नजर दौड़ाओ वहाँ बंद ही बंद। कहीं जाति के नाम पर बंद तो कहीं नस्ल के नाम पर बंद। कहीं धर्म के नाम पर बंद तो कहीं अनुशासन के नाम पर बंद। कहीं संस्कृति के नाम पर बंद तो कहीं परम्परा के नाम पर बंद। अब ये सारे 'बंद' खोल दिये जायेंगे।

    औरतों को अब पूरे कपड़ों में बंद होने की जरूरत नहीं। विद्यार्थियों को मास्टरों के डण्डे के भय में बंद होने की जरूरत नहीं। कर्मचारियों को अपने अधिकारियों के अनुशासन में बंद रहने की जरूरत नहीं। व्यापारियों को ग्राहकों के नाज-नखरों में बंद होने की जरूरत नहीं।

    अपने आप को भद्र समझने वाले जिस आदमी की गरज हो, वह औरतों के कम कपड़ों को देखकर अपनी आँखें बंद कर ले। जिस मास्टर की गरज हो वह विद्यार्थियों से मार खा-खाकर उन्हें पढ़ाये। जिस अधिकारी की गरज हो वह कर्मचारियों के सामने हाथ जोड़कर काम करवाये। जिस ग्राहक की गरज हो वह धोखा खा-खाकर व्यापारी से सौदा खरीदे।

    जाने क्या गोरखधंधा है? जाने क्यों अमरीका खुले समाज का निर्माण कर रहा है? बताने वाले बताते हैं कि अमरीका को अपना सामान बेचना है और भारी मुनाफा कमाना है। कलस्टर बम, एफ-16, टॉम और पैट्रिओटिक मिसाइलें बेचनी हैं। अंकल चिप्स, पैप्सी कोला, चॉकलेट और 'केंटुकी फ्राइड चिकन' बेचने हैं। अमरीकी डिजाइन के कच्छे और बनियान बेचने हैं।

    अमरीका जानता है कि यह सारा सामान बंद समाज के किसी काम का नहीं। इसका उपयोग तो खुले समाज में ही हो सकता है। औरतें घरों से निकलें, विद्यार्थी कक्षाओं से निकलें, कर्मचारी कार्यालयों से निकलें और ग्राहक दुकानों से निकलें तभी तो उनकी दृष्टि अमरीकी सामान पर पड़ेगी और वे उसे खरीदेंगे।

    खुले समाज और बंद समाज पर टिप्पणियाँ करने वाली दो कहावतें मैंने हाल ही में सुनीं। हालांकि ये कहावतें आज की नहीं हैं बहुत पुरानी हैं लेकिन मैंने इन्हीं दिनों में सुनी हैं। पहली कहावत यह है कि दुनिया में तीन आदमी सबसे अधिक दुखी हैं। पहला वह जिसके पास अमरीकी स्टाइल की बीवी हो क्योंकि वह बहुत कम समय ही टिकती है। दूसरा वह जिसके पास ब्रिटिश स्टाइल के वेतन वाली नौकरी हो क्योंकि उसे बहुत कम वेतन मिलता है। तीसरा दुखी आदमी वह है जिसके पास जापानी स्टाइल का मकान हो क्योंकि वह बहुत छोटा होता है।

    इसके ठीक उलट स्थिति दूसरी कहावत में है। यह कहावत इस प्रकार से है कि दुनिया में तीन लोग सर्वाधिक सुखी हैं। पहला वह जिसके पास जापानी स्टाइल की बीवी हो क्योंकि वह जीवन भर टिकती है। दूसरा वह जिसके पास अमरीकी स्टाइल के वेतन वाली नौकरी हो क्योंकि उसे वेतन अत्यधिक मिलता है। तीसरा सुखी आदमी वह है जिसके पास ब्रिटिश स्टाइल का मकान हो क्योंकि वह बहुत बड़ा होता है।

    जब मैंने यह कहावत सुनी तो मैं दंग रह गया। हर तरह से बंद समाज वाला देश होने के बावजूद यहाँ भी भारत अपना नाम लिखवाने से चूक गया! अमरीकियों से तो खैर भारतीयों का कहीं कोई मेल नहीं बैठता किंतु क्या भारतीय समाज जापानी और ब्रिटिश समाज से कम बंद है? क्या जापानियों के मकान भारतीयों के मकानों से भी छोटे होते हैं? क्या ब्रिटेन के लोगों को भारतीयों से भी कम वेतन मिलता है? क्या जापानी स्त्रियाँ भारतीय पत्नियों से भी अधिक वफादार होती हैं?

    मैंने सुना है कि अमरीका दुनिया भर में खुले समाज का निर्माण करते समय इन कहावतों को भी ध्यान में रखेगा। वह सब लोगों को बड़ी-बड़ी तन्खाह पर नौकर रखेगा। रहने के लिये बड़े-बड़े मकान देगा और दुनिया भर की महिलाओं को अमरीकी स्टाइल की पत्नियों में बदलेगा क्योंकि अमरीकी सामान को खरीदने के लिये लोगों को बड़ी-बड़ी तन्खाओं, बड़े-बड़े मकानों और ऐसी बीवियों की जरूरत होगी जो थोड़े-थोड़े दिनों में अपने घर बदल लेती हों।

    देखने में आया है कि खुले समाज का निर्माण करने के लिये अमरीका ने कई कदम उठा लिये हैं। वह दुनिया भर के लोगों के गलों में टाईयाँ बांधकर उन्हें अपने होटलों में झूठे बर्तन उठाने के काम पर रख रहा है और इस काम के लिये उन्हें बड़े मकान और बड़े वेतन दे रहा है। उसने दुनिया भर में औरतों के कपड़ों का साइज छोटा कर दिया है ताकि वे अधिक से अधिक कपड़े सिलवा सकें। इधर लोगों के गलों में बंधी टाईयाँ कसती जा रही हैं और उधर समाज खुलता जा रहा है।

    मैं जानता हूँ कि खुला समाज बनाने की अमरीकी कोशिशें बेकार नहीं जायेंगी। एक न एक दिन भारत में भी खुले समाज की स्थापना होकर रहेगी। सारे बंद खुल जायेंगे। भारतीय होने के नाते इन दिनों मैं हर रविवार को मंदिर में जाकर सवा ग्यारह रुपये का प्रसाद चढ़ाता हूँ और प्रार्थना करता हूँ- हे गिरधारी! हमारी लाज तेरे हाथों में है। भले ही अमरीका भारतीय समाज को ऐसा बना दे जिसमें हर भारतीय को अमरीकियों के बराबर वेतन मिले तथा हर भारतीय के पास अंग्रेजों के बराबर बड़े-बड़े घर हों किंतु ऐसा समाज कभी न बने जिसमें किसी भी भारतीय को अमरीकी स्टाइल वाली पत्नी मिले।

    मुझे विश्वास है कि ईश्वर मेरी प्रार्थना अवश्य स्वीकार कर लेगा क्योंकि ये भारतीय रमणियाँ ही हैं जो आज तक भारत को अमरीका बनने से रोके हुए हैं।

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