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     02.06.2020
    लिफाफों के फाफे

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    लिफाफों और उनके महत्व के बारे में पूरा हिन्दुस्थान जानता है किंतु बहुत से लोग संभवतः न समझें कि फाफे क्या होते हैं! जो लोग राजस्थान और गुजरात से थोड़ा बहुत सम्बंध रखते हैं वे फाफों के बारे में अच्छी तरह जानते हैं। शेष भारतीयों की सुविधा के लिये मैं बता दूँ कि फाफे दो तरह के होते हैं एक तो वे जो बेसन से बनते हैं, उनमें नमक और सोड़े के अतिरिक्त और कोई मसाला नहीं होता। उन्हें चटनी के साथ खाना पड़ता है। इन्हें खाने के बाद हर बार आदमी यही सोचता है कि आखिर उसने फाफे क्यों खाये? क्या इसलिये कि उसे चटनी खानी थी! क्योंकि स्वाद चटनी में तो हो सकता है किंतु फाफों में नहीं। इसीलिये इन्हें तिरस्कार पूर्वक फाफड़ा कहा जाता है। मेरा विश्वास है कि यदि इनमें जरा भी स्वाद होता तो इन्हें फाफड़ा के स्थान पर 'फाफेजी' या 'फाफड़ेजी' कहा जाता।

    अब रहे दूसरी तरह के फाफे। दूसरी तरह के फाफे कोई वस्तुवाचक संज्ञा नहीं है। वे विशुद्ध भाव वाचक संज्ञा हैं। इसे आप यूँ समझ सकते हैं कि कुछ लोग तो जीवन भर लिफाफे मारते हैं और जो अपने जीवन में लिफाफे नहीं मार पाते वे बेचारे फाफे मारते हैं।

    आधुनिक भारत में लिफाफे मारने की एक पूरी संस्कृति ही चल पड़ी है। लिफाफे मारने वाले अर्थात लिफाफे हथियाने वाले और लिफाफे देकर मारने वाले अर्थात् लिफाफे प्रस्तुत करने वाले इस संस्कृति के दो प्रमुख पहिये हैं जिनके मिलकर चलने से लिफाफा-संस्कृति की गाड़ी चल पाती है।

    हमें उन लोगों से अधिक लेना देना नहीं है जो लिफाफों के अभाव में फाफे मार रहे हैं, उनके लिये तो हम ईश्वर से प्रार्थना ही कर सकते हैं कि प्लीज एक दिन उनके भी दिन फेरना और उन्हें भी लिफाफे नसीब करवाना। हमारा असली उद्देश्य तो लिफाफा संस्कृति के बहुआयामी तत्वों पर विचार विमर्श करना है।

    लिफाफे बहुत काम की चीज हैं, इससे भला किसे इन्कार हो सकता है! लिफाफों के विरोध में आप अधिक से अधिक यह कह सकते हैं कि कई बार ये इतने छोटे पड़ जाते हैं कि इनकी जगह सूटकेस काम में लेने पड़ते हैं। हमें आपकी बात स्वीकार है और हम उन्हें शीश झुकाते हैं जिन्हें लिफाफों के स्थान पर सूटकेस प्राप्त होते हैं। फिर भी आपको भले ही हो न हो हमें तो लिफाफों पर ही पूरा गर्व है।

    इन लिफाफों के चलते पूरे देश में समृद्धि आई है। जिनके सिर पर एक दिन टाट-पटोरे तक नहीं थे, उनके सिर पर पक्की छतें झूल रही हैं। जो लोग सिटी बस तक के पैसे नहीं जुटा पाते थे, वे कारों में घूम रहे हैं। जिन्हें दाल-दलिया तक नसीब नहीं था, वे पाँच सितारा होटलों में डिनर कर रहे हैं। आप मानें न मानें, ये छोटे-छोटे लिफाफे वस्तुतः लिफाफे नहीं हैं, समृद्धि के द्वीप हैं जिन पर खड़ा होकर राष्ट्र फल-फूल रहा है।

    इधर कुछ बरसों से लिफाफों ने अपने पैर तेजी से पसारे हैं। पहले तो लिफाफों को व्यवसायिक आधार भूमि मजबूत बनाने के लिये ही अधिक काम में लिया जाता था किंतु अब पारिवारिक एवं सामाजिक कार्य-कलापों में भी लिफाफों की भूमिका तेजी से बढ़ी है। यदि आपके नाम किसी सगे-सम्बंधी, अथवा मित्र-परिचित के यहाँ से कोई निमंत्रण आया है तो आपको समारोह में पहुँचने के लिये किसी न किसी वजन के एक लिफाफे की आवश्यकता अवश्य होगी।

    चाहे वह समारोह बिटिया की सगाई का हो अथवा विवाह का, बिना लिफाफा लिये आप गये तो आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा खतरे में पड़ सकती है। आप समारोह में खाना खाईये अथवा मत खाईये किंतु लिफाफा अवश्य दीजिये। लिफाफे आपकी हैसियत का परिचायक हैं। ये वो राजदूत हैं जो आपके घर की ख्याति दूर-दूर तक फैला सकते हैं ताकि कभी आपके घर में बेटे-बेटी के लिये कोई रिश्ता लाने की सोचे तो हल्का-फुल्का आदमी तो पैर धरने की हिम्मत ही न कर सके।

    मुण्डन, कर्णछेदन, यज्ञोपवीत तथा इस तरह के अन्य संस्कार तो खैर अब होते ही नहीं तो उनके समारोह क्या होंगे किंतु इधर कई नये समारोह निकल पड़े हैं जिनके कारण लिफाफों का महत्व और भी बढ़ गया है। ये नवीन समारोह इतने जबर्दस्त हैं कि जवान लड़कियों के 'हैप्पी बर्थ डे समारोह' भी इनके सामने फीके पड़ गये हैं।

    देश भर में मनाये जाने वाले नवीन समारोह प्यार और मुहब्बत की देन हैं जिन्हें देखकर लगता है कि देश में अचानक प्यार की बाढ़ आ गयी है। जिधर देखिये उधर ही कोई न कोई लिफाफा लिये खड़ा है। कोई वेलेण्टाइन डे मनाने वालों को लिफाफा भेंट करने जा रहा है तो कोई 'हैप्पी मैरिज एनीवर्सरी,' कहने जा रहा है।

    इधर कुछ सालों से 'मैरिज सिल्वर जुबली सेरेमनियाँ' तथा 'मैरिज गोल्डन जुबली सेरेमनियाँ' भी बड़ी धूम-धाम से मनाई जा रही हैं। इतने सारे 'मैरिज सेरेमनी' देखकर तो लगता है कि कहीं दाल में काला तो नहीं! क्यों अचानक इस तरह के आयोजनों की बाढ़ आ गयी है!

    इन समारोहों की चमक-धमक देखकर अनुमान होता है कि इनके आयोजन के पीछे प्यार-मुहब्बत भले ही न हो, भय अवश्य है। तभी तो नवदम्पत्ति से लेकर प्रौढ़ और वृद्ध दम्पत्ति तक हर साल इन समारोहों का आयोजन करके अपने जीवन साथी का आभार प्रकट करते हैं कि आपने बड़ी कृपा की जो मुझ जैसे निकम्मे को छोड़कर नहीं भागे और मुझे एक, दो तीन, पच्चीस या पचास साल से झेल रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि आप आगे भी मुझ पर इसी तरह कृपा बनाये रखेंगे। स्थिति जो भी हो किंतु यह तय है कि इस तरह के आयोजनों में लिफाफों का महत्व सिर चढ़कर बोल रहा है।

    बेटे का इंजीनियरिंग, मेडिकल या एम.बी.ए. में चयन हुआ हो, अथवा बिटिया फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने अमरीका जा रही हो या फिर आपने उधार लेकर किश्तों में कार खरीदी हो, सब तरह के अवसरों पर एक समारोह का होना आवश्यक है और आपको हर समारोह में लिफाफा लेकर पहुँचना आवश्यक है।

    कभी-कभी तो लगता है कि वह दिन भी दूर नहीं जब लोग अंत्येष्टि के पुनीत अवसर पर भी एक दूसरे को लिफाफे पकड़ाकर कहेंगे- 'हैप्पी अंत्येष्टि सर!'

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