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  • एलोपैथी से आलूमेथी तक

     02.06.2020
    एलोपैथी से आलूमेथी तक

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    इस देश की बहुत सारी खूबियों में से यदि कोई सबसे बड़ी खूबी है तो यही कि जितनी तरह की बीमारियाँ यहाँ पाई जाती हैं, उससे अधिक पैथियाँ उनके उपचार के लिये उपलब्ध हैं। एलोपैथी से लेकर आलूमेथी तक इतनी सारी पैथियाँ शायद ही किसी दूसरे देश में पायी जाती हों।

    जिसे देखो अपनी अलग पैथी लिये घूम रहा है। यह दूसरी बात है कि इतनी सारी पैथियों के होते हुए भी पूरा का पूरा देश बीमार है। कहने वाले इसीलिये तो कह गये हैं-'कोई तन दुखी, कोई मन दुखी, कोई धन बिन रहत उदास।'

    इसी दुख और इसी उदासी के चलते देश के लगभग छप्पन करोड़ सज्जन और छप्पन करोड़ देवियाँ देश में चल रही विभिन्न पैथियों की शरण में हैं और अपना-अपना विधिवत् उपचार करवा रहे हैं। जैसे ही किसी को यह पता लगता है कि अमुख पैथी उसके लिये अनुकूल सिद्ध नहीं हो रही है तो वह तत्काल दूसरी पैथी में शिफ्ट हो जाता है।

    पाठकों के सामान्य ज्ञान में वृद्धि के लिये आज हम इनमें से कुछ पैथियों के बारे में संक्षिप्त जानकारी प्राप्त करेंगे ताकि पाठक इन पैथियों के महत्व से भली भांति परिचित हो सकें तथा वक्त-जरूरत अपने लिये सुविधाजनक पैथी का चुनाव कर सकें।

    एलौपेथी भले ही इस देश में अन्य पैथियों के बाद आई हो किंतु आज यह देश की पहले नम्बर की पैथी है। यह मरीजों का कम और डॉक्टरों का अधिक उपचार करती है। इस बात को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है- यह पैथी बीमारी का कम और गरीबी का अधिक उपचार करती है। देश के लाखों-करोड़ों लोगों की गरीबी इसी पैथी से दूर होती आयी है।

    यह पैथी मेडिकल रिप्रजेंटेटिवों के ज्ञान और बुद्धिबल के भरोसे चलती है। यह मेडिकल रिप्रजेंटेटिवों का ही चमत्कार है कि फोड़े-फुंसी दूर करने से लेकर त्वचा को झुर्री रहित बनाने और नैचुरल गोरापन पाने के लिये करोड़ों स्त्री पुरुष कनस्तरों, बाल्टियों और बोरियों में भर-भर कर इस पैथी की दवायें और टॉनिक खरीद और खा रहे हैं।

    एलौपेथी में मरीजों को बिना किसी खटके के काटा-फाड़ा और चीरा जाता है तथा तत्काल ही फिर से साबुत कर दिया जाता है। देखने में तो यह छोटी सी प्रक्रिया है किंतु इस बीच काफी कुछ घट चुका होता है। डॉक्टर से लेकर मेडिकल रिप्रजेंटेटिवों और दवा विक्रेताओं के घर की गरीबी मरीज के घर पहुंच जाती है और मरीज की लक्ष्मी चंचल होकर उनके घर जा बैठती है। डॉक्टर स्कूटर से उतर कर कार में बैठ जाता है और मरीज स्कूटर से उतर कर धरती पर आ जाता है।

    कई बार देश में एलोपैथी के कृत्रिम चिकित्सकों द्वारा 'अचूक नेत्र शल्य चिकित्सा शिविर' आयोजित किये गये हैं जिनमें दस-बीस से लेकर पचास-सौ तक की संख्या में मरीजों ने अपने प्यारे नेत्र खो दिये हैं। उत्तरप्रदेश तथा बिहार जैसे प्रांत इस तरह के नेत्र शल्य चिकित्सा शिविरों के आयोजन के लिये बड़े ही उपयुक्त पाये गये हैं।

    देश की दूसरे नम्बर की पैथी है आयुर्पैथी। हिमालय की चमत्कारी जड़ी बूटियों से लेकर सिद्ध बाबाओं की जटाओं तक इसका प्रसार है। कई करोड़ लोग अपने गंजे सिरों पर बाल उगाने तथा खोई हुई जवानी फिर से प्राप्त करने के लिये आयुर्पैथी के बैद्यजी के निर्देशन में सालों से स्वर्णभस्म के नाम पर चूल्हे की राख फांके जा रहे हैं।

    सदियों से आजमाये हुए अनेक चमत्कारी फार्मूले आयुर्पैथी में हैं फिर भी इस पैथी के उपचार से न तो एक भी भाई के कान का मवाद सूखता है न एक भी बहिन की बहती हुई नाक रुकती है। हल्दी-चंदन से लेकर केशर-कस्तूरी, कड़वे करेले और जामुन की गुठलियों तक का इस पैथी में बड़ा महत्व है। इस पैथी में चीड़-फाड़ की अधिक गुंजाइश नहीं है फिर भी मौका पाते ही बैद्यजी मरीज की देह में एक-आध गर्म नश्तर तो चुभा ही देते हैं या फिर एकाध छेद करके ही संतोष प्राप्त कर लेते हैं।

    आयुर्पैथी के जानकारों का दावा है कि वे सौ वर्ष तक लोगों को जीवित रख सकते हैं क्योंकि इस पैथी को जिन लोगों ने ईजाद किया था वे लोग 'जीवेम शरदः शतम्' का मंत्र देने वाले थे। यही कारण है कि इस पैथी के जानकार अर्थात् बैद्यजी भले ही पैसा न कमा पा रहे हों किंतु 'अमृतम् राजसम्मानम्' को आदर्श मानकर वे देश की सरकार से प्रतिवर्ष पद्म भूषण पुरस्कार अवश्य पाते हैं। यह भी देखा गया है कि बहुत से नेता लोग सौ बरस नहीं तो उसके आस पास तो पहुँच ही जाते हैं। कौन जाने इनकी आयु का रहस्य आयुर्पैथी में ही छुपा हो!

    देश की तीसरी प्रमुख पैथी है होमियोपैथी। इसका तो पूछना ही क्या है! हर आदमी इसे अपनी जेब में लिये घूमता है। यह इतनी जबर्दस्त पैथी है कि जब किसी असाध्य रोग का उपचार ऐलोपैथी और आयुर्पैथी से नहीं हो तब इसकी शरण में आया जाता है। इधर चन्द मीठी गोलियाँ जीभ पर धरी नहीं कि उधर रोग गायब होने का दावा किया जाता है। इस पैथी में न तो थर्मामीटर की जरूरत है न सुईं से लेकर किसी भी प्रकार के काटने, चुभोने अथवा छीलने वाले यंत्र की। साधारण से साधारण पढ़ा लिखा व्यक्ति भी किसी दुकान से दो किताबें खरीद कर होम्योपैथी का चिकित्सक बन सकता है। इसी कारण यह पैथी देश के हर मुहल्ले और हर घर में धड़ल्ले से फल-फूल रही है।

    इस पैथी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि मीठी गोलियाँ यदि लाभ नहीं करतीं तो नुक्सान भी नहीं करतीं! चूंकि इस पैथी में पैसा-वैसा अधिक नहीं लगता इसलिये मरीजों को भी ठीक होने की अधिक चिंता नहीं करनी पड़ती। ठीक हुए तो ठीक, नहीं हुए तो भी ठीक।

    वैसे भी इस देश के लोग समझदार हैं वे जानते हैं कि हारी-बीमारी का क्या है, यह तो शरीर के साथ लगी ही रहती हैं। इसीलिये तो ज्ञानियों ने कहा है- 'देह धरे का दण्ड तो सब काहू को होय, ज्ञानी काटे ज्ञान से मूरख काटे रोय।' इसी कहावत के चलते इस महान देश के महान नागरिकों ने देह का दण्ड काटने के लिये इन तीनों पैथियों के निष्फल हो जाने पर कई तरह की और भी पैथियों का अविष्कार कर रखा है। लगे हाथों उन पैथियों की भी चर्चा कर ली जानी चाहिये।

    यूनानी पैथी, जल-मृदा पैथी (नेचुरोपैथी), एक्यूपैथी (एक्यूप्रेशर), पंचर पैथी (एक्यूपंक्चर), स्पर्श पैथी (रैकी) आदि अनेकानेक पैथियाँ भी इस देश के लोगों की देहों का कष्ट हर ही रही हैं किंतु कुछ और भी पैथियाँ हैं जिन पर हम विचार करना चाहते हैं। इनमें से कुछ पैथियाँ हजारों बरसों से हमारे बीच हैं तो कुछ पैथियों का अविष्कार हाल ही के बरसों में हुआ है।

    इस महान देश का शायद ही कोई ऐसा नागरिक होगा जिसने टोटकापैथी का नाम न सुना हो। 'सबहि सुलभ सब दिन सब देसा' को चरितार्थ करते हुए देश के कई करोड़ लोग विशेषकर मातायें-बहनें तो इस टोटकापैथी की दीवानी हैं। ये टोटकापैथी वाले भी बड़े अजब-गजब लोग हैं। जाने किन-किन समस्याओं का समाधान इस पैथी में है! रात-बेरात कोई बालक जोर से रोया नहीं कि टोटकापैथी शुरू। बालक के सिर पर नमक-मिर्च घुमाकर अग्निदेव को समर्पित किये नहीं कि रोता हुआ बालक हँसने लगेगा। किसी को मिर्गी का दौरा पड़े तो जूता सुंघाईये, देखते ही देखते धरती पर गिरा हुआ आदमी उठ कर खड़ा हो जायेगा। किसी आदमी की कमर में झटका आ गया हो तो किसी ऐसे आदमी से लात खाइये जो सिर के बजाय पैरों के बल पैदा हुआ हो, तुरंत ही कमर का झटका निकल जायेगा।

    किसी मूर्ख युवक की नौकरी न लगती हो, किसी बांझ स्त्री के बालक न होते हों, कोई भौंदू विद्यार्थी परीक्षा में उत्तीर्ण न होता हो, किसी कुरूप कन्या को वर नहीं मिलता हो, किसी घूसखोर अफसर की तरक्की न होती हो, किसी धोखेबाज बनिये का व्यापार न चलता हो, कोई थर्डक्लास नेता चुनाव न जीत पाता हो, कोई सड़क छाप मजनूं लैला को न रिझा पाता हो, किसी कलम तोड़ कवि द्वारा एक ही रात में पचास कवितायें लिखने के बावजूद एक भी कविता न छपती हो, किसी अनुभवहीन किसान के खेत में तरबूज-खरबूज न लगते हों, सब तरह की व्याधियों का उपचार इस पैथी में मौजूद है।

    इस पैथी के दीवाने परीक्षा निकट आते ही भैंरूजी को पैन और पैन की स्याही चढ़ाने चल देते हैं। घर में किसी को पीलिया होने पर इस उम्मीद में चौराहे पर लाल कपड़े से बंधी मटकी रख आते हैं कि पीलिया घर से निकल कर मटकी से टकराने वाले को लग जायेगा। लड़कियाँ झरबेरियों पर अपनी चुन्नी लटका आती हैं ताकि कोई दूल्हा उन्हें ढूंढता हुआ उनके घर तक आ जाये। किसी देवी का पति रात को देरी से घर आने लगेगा तो वह अपनी चूड़ियाँ और मेहंदी की एक पुड़िया पीपल के नीचे रख आयेगी। इस पैथी में काले कुत्ते को तेल और गुड़ के पुए खिलाने से लेकर सवा रुपये चढ़ाने का भी बड़ा महत्व है।

    देश में टोटकापैथी का प्रसार तो आदिकाल से ही है किंतु इधर पिछले कुछ दशकों से टचपैथी ईजाद की गयी है। यह पैथी किसी बीमारी का उपचार करने के लिये नहीं अपितु बीमारी की रोकथाम के लिये बनी है। जब भी आप अपने बारे में कोई झूठी शेखी बघारना चाहें, आत्म प्रशंसा करना चाहें तो अनिवार्य रूप से 'टचवुड' कहकर अपनी बात आरंभ करें ताकि आपको नजर न लगे और आप साल दर साल शेखी बघारते रहें। इस पैथी में लकड़ी का बड़ा महत्व है। 'टचवुड' कहते समय 'वुड' को 'टच' करना ही पड़ेगा।

    इधर इन दिनों पूरे देश में वास्तुपैथी भी जोर पकड़ रही है। यदि आप बीमार हैं तो बैक्टीरिया या वाइरस की वजह से नहीं अपितु इस वजह से कि आपने अपने घर के आग्नेय कोण में मटकी रख रखी है या ईशान कोण में भारी भरकम अलमारियाँ रख ली हैं। आपका बिजनिस नहीं चलता तो इसलिये नहीं कि आपमें उसको चलाने की योग्यता नहीं है, या आप परिश्रमी नहीं है, अपितु इसलिये कि आपकी दुकान का मुँह पूर्व या उत्तर में नहीं होकर दक्षिण में है। बिजनिस में घाटा इसलिये भी हो सकता है कि आपने अपने गल्ले पर सफेद या लाल रंग न करके काला या मटमैला रंग कर रखा है।

    इस पैथी में हर रोग का उपचार है तथा हर चीज का महत्व है। जिसके चलते यह पैथी ऐलोपैथी से भी अधिक महंगी है। एक बार वास्तुशास्त्रीजी के कदम आपके मकान में पड़े नहीं कि आपके घर के मानचित्र से लेकर, घर की प्रत्येक वस्तु का रंग, आकार, आकृति, स्थान सब-कुछ बदल जायेगा। शास्त्रीजी के विशद ज्ञान के कारण आपको न केवल अपने अपितु अपनी सात पीढ़ियों के सर्वनाश की चिंता छा जायेगी। इस पैथी की विशेषता है कि यदि आपने वास्तुशास्त्रीजी की बात मानी तो भी आप स्वयं को कंगाल अनुभव करेंगे और न मानी तो भी।

    फैंगशुई भी वास्तुपैथी की जापानी बहिन है जो चुपके से देश में घुस आई है तथा इसने भी कई मरीजों को अपनी चपेट में ले लिया है। यह एक कमाल की ही स्थिति है कि अब देश को बीमारियाँ नहीं 'पैथियाँ' चपेट में ले रही हैं। इन पैथियों से हटकर भी कुछ और पैथियाँ भी हैं जो इन दिनों फल फूल रही हैं। इनमें रैली पैथी, तेजी से उभर कर सामने आई है। अब तक देश में इस पैथी के तहत कई तरह की दवाईयाँ और मिक्सचर बनाये गये हैं। इनमें थू-थू, निन्दा, धिक्कार, गाली गलौच, भण्डाफोड़, लठ्ठ प्रदर्शन, आदि रोग निवारक उपचार काफी चर्चित रहे हैं किंतु इनकी चर्चा फिर कभी।

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