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     02.06.2020
    सब कुछ बिकता है!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कहा यह जा रहा है कि 
    एक बार फिर से दुनिया में मंदी का दौर आने वाला है। मंदी का कारण यह बताया जा रहा है कि दुनिया के बाजारों में सब तरह का सामान ठसा-ठस भरा पड़ा है किंतु लोगों की जेब में उसे खरीदने के लिये पैसा नहीं है। मुझे लगता है कि यह एक मिथ्या बात है जो अमरीका ने उड़ाई है। कहाँ है दुनिया के बजारों में सामान और कहाँ है मंदी? मुझे तो चारों ओर दूसरी ही तस्वीर दिखाई देती है।

    आज आप भी उस तस्वीर को देखिये। यदि दुनिया के बाजारों में अच्छी गुणवत्ता का सामान ठसा-ठस भरा होता तो क्या लोग उस सामान को छोड़कर भारतीय उत्पादों के लिये इतने दीवाने होते कि भारत के घरों, मंदिरों, खण्डहरों और जंगलों तक से सामान चुरा-चुरा कर दुनिया के चोर बाजारों में उपलब्ध करवाया जाता?

    यदि दुनिया भर में मंदी होती तो क्या पूरा यूरोप और पूरा अमरीका गरीब भारतीयों के घरों से उतरे पुराने खिड़की-दरवाजों, झरोखों और सड़ी गली लकड़ियों को काला-बाजारी में खरीदता? क्या दुनिया भर के लोग भारतीय क्रिकेटियरों एवं एक्टर-एक्टरनियों के पुराने रूमालों और अण्डरवियर-बनियानों को खरीदने के लिये लाइन लगाते?

    यदि दुनिया के बाजारों में अच्छी गुणवत्ता का सामान ठसा-ठस भरा होता तो क्या पूरी दुनिया के चोर और तस्कर भारत के प्राचीन मंदिरों एवं महलों के खण्डहरों से मूर्तियों और पत्थरों की चोरी और तस्करी करते?

    यदि दुनिया के बाजारों में ठसा-ठस सामान भरा होता तो भारत से औरतें, बच्चे, गुर्दे और अन्य मानव तथा मानव अंग चुराकर दुनिया भर में बेचे जाते? जो भारत अपनी कम उत्पादन क्षमता के लिये पूरी दुनिया में बदनाम हैं भला आज उस भारत से कौनसा सामाना यूरोप, अमरीका और अरब देशों में बिकने के लिये नहीं जा रहा?

    पूरी दुनिया जानती है कि भारत का आदमी कम समय तक काम कर सकता है। भारत की गाय कम दूध देती है। भारत की मुर्गी कम अण्डे देती है। भारत के सूअर में कम मांस होता है। भारत की गोभी कम वजन की होती है। भारतीय मोती कम चमकता है। तो फिर भारतीय काठ-कबाड़, मूर्तियों और मानव अंगों में ही ऐसी कौनसी विशेष बात है?

    इसका अर्थ स्पष्ट है कि दुनिया के बाजारों में ढंग का सामान ही नहीं है इसीलिये जो घटिया और अनुपयोगी सामान भारत में भी नहीं बिक सकता वह पूरी दुनिया में अच्छे भावों पर बिक रहा है जिसके चलते भारतीय व्यापारियों और दलालों से लेकर भारतीय चोर तथा तस्कर तक मालामाल हो रहे हैं।

    केवल अमरीका और यूरोप ही नहीं सम्पूर्ण अरब भी भारतीय माल का दीवाना है। भारत से कम उम्र के लड़के चुरा कर बेचे जा रहे हैं ताकि अरब के शेख उन्हें ऊँटों पर बैठाकर उनके आतंकित होने का तमाशा देख सकें। भारत के गरीब प्रदेशों तथा गंदी बस्तियों से औरतें चुराई जा रही है तथा उन्हें भारी भरकम वेतन का झांसा देकर बेचा जा रहा है जो अरब देशों में बर्तन मांजने के साथ-साथ वेश्यावृत्ति के लिये विवश की जाती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि उन देशों में तो ढंग की वेश्याएं भी नहीं हैं।

    मैंने तो यहाँ तक सुना है कि बेचने वालों ने यूरोप के कुछ देशों में निःसंतान दम्पत्त्तियों को चिम्पाजी के बच्चे, आदमी के बच्चे बताकर बेच दिये। कुछ दिन तक तो वे बच्चे बोतल से दूध पीते रहे और एक दिन अचानक ही छलांग मारकर छत की मुंडेर पर जा बैठे। तब कहीं जाकर भेद खुला।

    इन सारी स्थितियों को देखते हुए लगता है कि दुनिया के बाजारों में सामान है ही नहीं। इसलिये बाजारों में तरह-तरह का वह सामान लाया और बेचा जा रहा है जिसकी वस्तुतः किसी को आवश्यकता नहीं होती। दूसरे शब्दों में कहें तो लोगों के दिमाग में नकली आवश्यकता और असली कुण्ठा का भूत घुसाया जा रहा है। कुछ लोग तो इस सड़े-गले माल को खरीद कर कुण्ठित होते हैं और कुछ लोग इसे न खरीद पाने के कारण कुण्ठित होते हैं। अन्यथा दुनिया में कही भी मंदी का दौर नहीं है। मंदी की यह परिभाषा अमरीका से आई है और इसके वास्तविक अर्थ कुछ और हैं।

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