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     03.09.2018
    भगवद्गीता किसने लिखी ?

    भगवद्गीता किसने लिखी ?


    महाभारत के भीष्मपर्व में 23 से 40वें अध्याय तक गीता के अट्ठारह अध्याय वर्णित हैं। भारतीय जनमानस इस बात को मानता है कि भगवद्गीता मूलतः भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले, उपदेश के रूप में कही।

    संजय ने अपनी दिव्यदृष्टि से कुरुक्षेत्र के युद्ध का आंखों-देखा विवरण राजा धृतराष्ट्र को सुनाया। इस प्रकार भगवद्गीता भी संजय तथा धृतराष्ट्र तक पहुंची। जब भगवान वेदव्यास ने महाभारत को संहिताबद्ध किया तब उन्होंने पूरी कथा भगवान श्री गणेशजी को बोलकर सुनाई और भगवान गणेशजी ने इसे लिपिबद्ध किया।

    स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गीता का उपदेश देने से पहले, अर्जुन से कहते हैं कि तुझसे पहले मैं गीता का पावन ज्ञान सूर्यदेव को सुना चुका हूँ।

    इस प्रकार गीता के मूल रचयिता श्रीकृष्ण ही माने जाते हैं किंतु साहित्यिक, पुरातात्विक, भाषा वैज्ञानिक एवं अन्य साक्ष्य इन प्रश्नों के जवाब कुछ अलग तरह से देते हैं कि भगवद्गीता की रचना किसने एवं कब की ?

    अधिकांश हिन्दू इन तर्कों को स्वाीकार नहीं करते। आधुनिक विद्वानों के अनुसार, श्रीमद्भगवद् गीता को किसने लिखा, यह बात प्रमाणिक रूप से स्पष्ट नहीं हुई है।

    बहुत से पाश्चात्य एवं भारतीय विद्वानों ने इस बात पर विचार किया है कि भगवद्गीता का वास्तविक लेखक कौन था।

    भगवद्गीता के सबसे बड़े टीकाकारों में से एक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण ने लिखा है कि जिस प्रकार हमें भारत के प्रारम्भिक साहित्य की लगभग सभी पुस्तकों के लखकों के नाम ज्ञात नहीं हैं, उसी प्रकार हमें गीता के रचयिता का नाम भी ज्ञात नहीं है। सर्वपल्ली राधाकृष्ण के अनुसार, गीता की रचना का श्रेय, भगवान वेदव्यास को दिया जाता है जो महाभारत के पौराणिक संकलनकर्ता हैं।

    आधुनिक काल के विद्वानों का मानना है कि युद्ध क्षेत्र में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को 700 श्लोक बोलकर सुनाना संभव नहीं हुआ होगा। उन्होंने कुछ महत्वूपर्ण बातें कही होंगी जिन्हें बाद में किसी लेखक ने एक विशाल रचना के रूप में विस्तार से लिख दिया होगा।

    पाश्चात्य विद्वान गर्बे के अनुसार भगवद्गीता पहले, सांख्य-योग सम्बन्धी एक ग्रंथ था जिसमें बाद में कृष्ण-वासुदेव की पूजा पद्धति आ मिली और ईस्वी पूर्व तीसरी शताब्दी में कृष्ण को विष्णु का रूप मानकर, इसका मेल, वैदिक परम्परा के साथ बिठा दिया गया। भारत में गर्बे का सिद्धांत सामान्यतः अस्वीकार किया जाता है।

    डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण के अनुसार गीता की मूल रचना ई.पू. 200 में हुई थी और इसका वर्तमान स्वरूप ईसा की दूसरी शताब्दी में किसी वेदांती द्वारा तैयार किया गया था।

    होपकिन्स का विचार है कि गीता का अब जो कृष्ण-प्रधान स्वरूप मिलता है, वह पहले कोई पुरानी विष्णु-प्रधान कविता थी और उससे भी पहले वह कोई निस्सम्प्रदाय रचना थी। संभवतः विलम्ब से लिखा गया कोई उपनिषद्।

    हाल्ट्ज्मन गीता को एक सर्वेश्वरवादी कविता का बाद में विष्णु-प्रधान बनाया गया स्वरूप मानते हैं। कीथ का विश्वास है कि मूलतः गीता, श्वेताश्वतर के ढंग की एक उपनिषद् थी परंतु बाद में उसे कृष्णपूजा के अनुकूल ढाल दिया गया। बार्नेट का विचार है कि गीता के लेखक के मन में परम्परा की विभिन्न धाराएं गड्डमड्ड हो गईं। फर्कुहार लिखता है कि यह एक पुरानी पद्य-उपनिषद् है जो संभवतः श्वेताश्वतर के बाद लिखी गई है और जिसे किसी कवि ने कृष्णवाद का समर्थन करने के लिए ईसा के बाद के किसी सन् में भगवद्गीता के वर्तमान स्वरूप में ढाल दिया है। रूडोल्फ ओटो का कथन है कि मूल गीता, किसी महाकाव्य का एक शानदार खण्ड थी और उसमें किसी प्रकार का कोई सैद्धांतिक साहित्य नहीं था।

    कृष्ण का उद्देश्य, मुक्ति का कोई लोकोत्तर उपाय प्रस्तुत करने का नहीं था, अपितु अर्जुन को उस भगवान की सर्वशक्तिशाली इच्छा को पूरा करने की विशेष सेवा के लिए तैयार करना था जो युद्धों के भाग्य का निर्णय करता है।

    ओटो का विश्वास है कि सैद्धांतिक अंश प्रक्षिप्त है। इस विषय में उसका जैकोबी से मतैक्य है, जिसका विचार है कि विद्वानों ने मूल छोटे से केन्द्र-बिन्दु को विस्तृत करके वर्तमान रूप दे दिया है।

    इन विभिन्न मतों का कारण यह तथ्य प्रतीत होता है कि गीता में दार्शनिक और धार्मिक विचारों की अनेक धाराएं अनेक ढंगों से घुमा-फिरा कर एक जगह मिलाई गई हैं।

    पुराने आचार्यों ने भगवद्गीता को, भक्त को सुनाई गई देववाणी की बजाय एक दार्शनिक विमर्श के धरातल पर ही देखा है।

    चौथी शताब्दी ईस्वी के गुप्तकालीन कवि कालिदास के ग्रंथों रघुवंश एवं कुमारसंभव में गीता का उल्लेख हुआ है। सातवीं शताब्दी के हर्षकालीन कवि बाणभट्ट के ग्रंथ ‘कादंबरी’ में भी गीता का उल्लेख मिलता है।

    पांचवी शताब्दी ईस्वी में गुप्तों के शासन काल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया। उसने लिखा है कि भाइयों के बीच झगड़े को लेकर लिखे गए एक बड़े ग्रंथ में उपदेशात्मक वचनों को जोड़ने को लेकर उन दिनों भारतवासी चर्चा किया करते थे। अर्थात् फाह्यान यह कहता है कि उसके भारत में आने से कुछ समय पहले महाभारत में गीता का समावेश किया गया था। इससे पहले ‘गीता’ एक स्वतंत्र ग्रंथ था। यह बात फाह्यान को किसी भारतीय ने बताई होगी।

    प्रोफेसर दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने माना है कि गीता, गुप्तकाल के आसपास ही महाभारत में सन्निवेशित हुई। सातवीं शताब्दी में भारत की यात्रा पर आए चीनी यात्री यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में एक ऐसी कथा का उल्लेख किया है जो गीता के प्रसंग से मिलती-जुलती है।

    कहा जा सकता है कि गीता के विधिवत् और नियमित अध्ययन एवं टीका लिखने का काम आदि जगद्गुरु शंकराचार्य से प्रारंभ होता है। शंकराचार्य इस ग्रंथ के पहले टीकाकार माने जाते हैं।

    प्रोफेसर मेघनाद देसाई मानते हैं कि आदि शंकराचार्य के पूर्व, भारतीय ग्रंथों में गीता का उल्लेख बहुत कम हुआ है। आदि शंकराचार्य का जन्म 788 ईस्वी में माना जाता है। अर्थात् आठवीं शताब्दी के बाद ही भारत के साहित्य में गीता का उल्लेख होने लगा।

    प्रो. देसाई विभिन्न स्रोतों का हवाला देते हुए कहते हैं कि गीता के लिखने वाले कम से कम तीन लेखक थे, जो तीन अलग-अलग समयों में हुए। वे यह भी मानते हैं कि गीता अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग श्रोताओं को संबोधित थी।

    प्रो. देसाई के अनुसार प्रथम लेखक के श्रोता- पंडित, मुनि, योगी, तत्वदर्शी इत्यादि थे। दूसरे लेखक के श्रोता- चुने हुए यति, योगी आदि थे, जबकि तीसरे लेखक के श्रोता आमजन थे। इस विवेचना में वे डॉ. गजानन खेर से काफी सहायता लेते हैं जिन्होंने मराठी में ‘मूल गीता’ की खोज नामक शोध ग्रंथ लिखा था। प्रो. देसाई का मानना है कि गीता के तीसरे लेखक बादरायण थे जिन्होंने ब्रह्मसूत्र की रचना की थी। वे इन दोनों ग्रंथों में बहुत सी समानताएं पाते हैं।

    डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने गीता पर काफी विस्तार से लिखा है। उनकी मान्यता है कि बौद्ध धर्म के प्रतिकार के लिए ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने भगवद्गीता को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया।

    स्वामी स्वामी विवेकानंद ने लिखा है कि गीता एक ऐसा सुंदर गुलदस्ता है, जिसमें उपनिषदों से चुन-चुनकर दार्शनिक सूक्तियों के खूबसूरत फूल सजाए गए हैं।

    गीता के लेखक ने अद्वैत, योग, ज्ञान, भक्ति आदि को सम्मिश्रित करने का काम किया है। उसने सभी सम्प्रदायों से सर्वश्रेष्ठ चुनाव किया और गीता की माला में पिरो दिया।

    इस प्रकार कहा जा सकता है कि गीता किसी एक लेखक की लिखी हुई नहीं है, उसे बहुत लम्बे कालखण्ड में बार-बार परिवर्द्धित करके वर्तमान स्वरूप तक लाया गया।

    गीता का विचार निश्चित रूप से भगवान श्रीकृष्ण से पहले भी मौजूद था। इसलिए कहा भी जाता है-

    सर्वोपनिषदो गावो, दोग्धा गोपाल नंदनः

    पार्थो वत्स सुधीर्भोक्ता, दुग्धम् गीतामृतम् महत्।


    अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त उपनिषदों रूपी गायों को दुह कर गीतामृत रूपी दुग्ध प्राप्त किया तथा पृथा के पुत्र अर्जुन ने श्रद्धापूर्वक उसका सेवन किया।


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