Blogs Home / Blogs / धर्म-अध्यात्म / भगवान श्रीराम की दृष्टि में संत कौन है ?
  • भगवान श्रीराम की दृष्टि में संत कौन है ?

     02.06.2020
    भगवान श्रीराम की दृष्टि में संत कौन है ?

     भगवान श्रीराम की दृष्टि में संत कौन है ?

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    आज भारत भूमि में चारों ओर धूर्त बाबाओं, लालची मठाधीशों और अपने आप को संत कहने वाले मक्कार लोगों की भीड़ है, ऐसे में वास्तविक संत की पहचान करना अत्यंत मुश्किल काम हो जाता है। यही कारण है कि भारत की भोली-भाली जनता मक्कार बाबाओं के चक्कर में फंसकर अपनी सम्पत्ति एवं परिवार खो बैठती है।


    संत कौन है और उसकी पहचान कैसे की जा सकती है!

    वैसे तो संत के लक्षण बहुत स्पष्ट होते हैं, जो व्यक्ति पराई सम्पत्ति और पराई स्त्री से दूर रहता है, जो झूठ नहीं बोलता, जो दूसरों की भलाई करना अपना धर्म समझता है, किसी से कड़वा वचन नहीं बोलता, किसी का अहित नहीं करता, वह संत है। संत का सबसे बड़ा गुण है उदासीनता और क्षमाशीलता।

    उदासीनता का अर्थ चीजों से उकताए हुए रहना या अच्छी और बुरी चीजों को एक जैसी दृष्टि से देखना नहीं है अपितु भोग की प्रवृत्ति के प्रति वैराग्य भाव युक्त सम्यक दृष्टिकोण अपनाने से है। जो व्यक्ति अच्छी और बुरी चीजों को एक ही दृष्टि से देखता है, वह संत कैसे हो सकता है।

    इसी प्रकार क्षमाशीलता का अर्थ दुष्टों को क्षमा करने से नहीं है अपितु सज्जनों के प्रति आदर और प्रेम रखते हुए दुष्टों के प्रति उपेक्षा भाव दर्शाने से है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस में भगवान श्रीराम ने अनेक स्थानों पर संतों के लक्षणों का वर्णन किया है।

    इस
    आलेख का उद्देश्य उन्हीं लक्षणों की चर्चा करना है ताकि यह ज्ञात हो सके कि भगवान श्रीराम की दृष्टि में संत कौन है?

    रामचरित मानस के अरण्यकाण्ड भगवान राम द्वारा साधु-संतों, योगी-मुनियों, तापसों एवं भक्तों से भेंट किए जाने का वर्णन है। इसी अधयाय में देवर्षि नारद भगवान से मिलने के लिए आते हैं और कौशल्यानंदन श्रीराम उनसे संतों के लक्षणों की चर्चा करते हैं। भगवान कहते हैं कि जिन संतों में ये लक्षण होते हैं, मैं उनके वश में होकर रहता हूँ-

    षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।

    अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।


    अर्थात्- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर, इन छः विकारों को जीतकर, पापरहित, कामनारहित, स्थिरबुद्धि, अकिंचन, सर्वत्यागी, बाहर-भीतर से पवित्र, सुख के धाम, असीम ज्ञानवान, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान और योगी ही वास्तविक संत होते हैं।

    सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना।

    अर्थात्- वे सावधानी पूर्वक दूसरों को मान देने वाले, अभिमानरहित, धैर्यवान, धर्म के ज्ञान और आचरण में अत्यंत निपुण होते हैं।

    गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह। तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह।

    अर्थात्- गुणों के घर, संसार के दुःखों से रहित और संदेहों से सर्वथा छूटे हुए होते हैं। मेरे चरण कमलों को छोड़कर उनको न देह ही प्रिय होती है, न घर ही।

    निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।

    अर्थात्- वे कानों से अपने गुण सुनने में सकुचाते हैं, दूसरों के गुण सुनने से विशेष हर्षित होते हैं।

    सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहि सन प्रीति।

    अर्थात्- वे सम और शीतल हैं, न्याय का कभी त्याग नहीं करते। सरल स्वभाव होते हैं और सभी से प्रेम रखते हैं।

    जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा 

    अर्थात्- वे जप, तप, व्रत, दम, संयम और नियम में रत रहते हैं और गुरु, गोविंद तथा ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम रखते हैं।

    श्रद्धा छमा मयत्री दाया।  मुदिता मम पद प्रीति अमाया।

    बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना।


    उनमें श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया, मुदिता (प्रसन्नता) और मेरे चरणों में निष्कपट प्रेम होता है तथा वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान (परमात्मा के तत्व का ज्ञान) और वेद-पुराण का यथार्थ ज्ञान रहता है।

    दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ।

    वे दम्भ, अभिमान और मद कभी नहीं करते और भूलकर भी कुमार्ग पर पैर नहीं रखते। गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला। वे सदैव मेरी लीलाओं का गायन एवं श्रवण करते हैं तथा बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की भलाई करते हैं।

    मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सादर श्रुति तेते।

    इस चर्चा के अंत में भगवान श्रीराम कहते हैं कि हे नारद! साधु के इतने गुण होते हैं जिनका वर्णन वेद भी नहीं कर सकते। अर्थात् भगवान ने संतों को वेदों से भी बड़ा बता दिया है। अतः संत वही हो सकते हैं जिनमें वेदों की तरह संसार का कल्याण करने की क्षमता हो। अरण्यकाण्ड में ही भगवान श्रीराम अपनी भक्त शबरी के आश्रम जाकर उससे भेंट करते हैं। वे शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं। इस उपदेश में संत के लक्षणों को और भी सरल करके बताया गया है।

    सामान्य रूप से पढ़ने पर यह भक्त के गुण दिखाई देते हैं किंतु वास्तव में इन चौपाइयों में संत के लक्षणों को सरलीकृत करके बताया गया है। रामचंद्रजी कहते हैं-

    प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।

    अर्थात् पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम।

    गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।

    चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।


    मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।

    तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति है कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गायन। पाँचवीं भक्ति है मेरे नाम का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास।

    छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।

    छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील अर्थात् अच्छा स्वभाव और चरित्र, बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना।

    सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।

    सातवीं भक्ति है जगत् भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत अर्थात् राममय देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना।

    आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।

    आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना।

    नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।

    नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य का नहीं होना।

    नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।

    इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो, वह मुझे प्राप्त कर लेता है। वस्तुतः नौ प्रकार की भक्ति ही संत के नौ प्रकार के लक्षण हैं। इन लक्षणों को साधे बिना मनुष्य संत नहीं बन सकता।

    यहां यह अंतर समझना चाहिए कि देवर्षि नारद से भगवान ने संतों के जो लक्षण बताए हैं वे तत्वदर्शी, योगी और ज्ञानी के लिए हैं जबकि शबरी को उन्होंने नवधा भक्ति की चर्चा की है वह सामान्य जन तथा गृहस्थों के लिए है।

    गृहस्थी में रहकर भी मनुष्य संत बन सकता है। ऐसे संत का सबसे बड़ा गुण है अपनी समस्त उपलब्धियों को परमात्मा की उपलब्धि मानना। अपनी प्रत्येक सफलता का श्रेय परमात्मा को देना। अपनी प्रत्येक वस्तु परमात्मा को अर्पित करना और अपने जीवन की समस्त अच्छी बातों के लिए ईश्वर का धन्यवाद ज्ञापित करना।

    संत की जो प्रवृत्तियां ऊपर बताई गई हैं, उनके विपरीत प्रवृत्तियां अर्थात् घमण्ड से बोलना, ईश्वर का चिंतन नहीं करना, अपनी प्रशंसा करना एवं करवाना, अधिक भोजन करना, विलासिता पूर्ण जीवन जीना, प्रभु और उसके भक्तों से प्रेम नहीं करना, माया में फंसे रहकर कामनाओं और इच्छओं की पूर्ति में लगे रहना, ये सब असंत अर्थात् दुष्ट के लक्षण हैं।

    गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी अपनी ओर से संतों के गुणों का उल्लेख किया है। वे लिखते हैं-

    रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना।

    अर्थात् रामकथा चंद्रमा की किरण के समान है जिसका पान संत रूपी चकोर करते हैं। यह चौपाई संत की अलग तरह से पहचान करवाती है। वही संत है जो रामकथा रूपी चंद्रकिरणों का चकोर की भांति पान करते हैं। यदि किसी को रामकथा प्रिय नहीं लगती है तो वह संत नहीं है। एक अन्य चौपाई में गोस्वामीजी ने लिखा है-

    रामकथा चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू।

    अर्थात् रामजी का चरित्र सुंदर चिंतामणि है तथा वह संतों की सद्बुद्धि रूपी स्त्री का सुंदर शृंगार है।

    वर्तमान युग में भी बहुत बड़े संत हमारे बीच हुए हैं जिनमें से यहां केवल रामसुखदासजी का उल्लेख करना चाहूंगा। वे जीवन भर चकोर बनकर रामकथा रूपी चंद्रकिरणों का पान करते रहे। वे कभी किसी को अपने पैर नहीं छूने देते थे, न अपना चित्र खिंचवाते थे। उन्होंने कोई आश्रम स्थापित नहीं किया, कोई पंथ नहीं चलाया। कोई अगरबत्ती, हवनसामग्री या दुख-दर्द दूर करने की सामग्री या जादुई चूर्ण नहीं बेचा। उन्होंने लम्बी आयु पाई किंतु अंतिम अवस्था में गले के कैंसर से पीड़ित हो गए। उनके प्रशंसकों ने उनसे बहुत अनुरोध किया कि वे दवाई ले लें किंतु उन्होंने कभी दवाई नहीं ली। वे अपनी अंतिम सांस तक रामजी का गुणगान और केवल रामजी का गुणगान करते रहे। रामसुखदासजी पर लम्बी चर्चा फिर कभी।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता



    You can watch this video on youtube channel aso-

    https://www.youtube.com/watch?v=ZycKscGCeYA&t=611s

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×