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  • आत्मा शरीर में कहाँ निवास करता है?

     29.10.2018
    आत्मा शरीर में कहाँ निवास करता है?

    आत्मा शरीर में कहाँ निवास करता है? पिछले दिनों मैंने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो फिल्म देखी जिसमें एक वयोवृद्ध एवं अनुभवी दिखने वाले उदपेशक बता रहे थे कि आत्मा शरीर के बाएं हिस्से में हृदय के ऊपर निवास करता है। उस वीडियो को कई लाख से अधिक लोगों ने देखा और पसंद किया है। पूरा वीडियो भ्रमपूर्ण बातों से भरा हुआ था जिसके कारण समाज में अनेक प्रकार की भ्रांतियां उत्पन्न हो सकती है।

    इस कारण मुझे लगा कि इस भ्रम को समाज में फैलने से रोका जाना चाहिए तथा इस सम्बन्ध में दार्शनिक, पौराणिक एवं वैज्ञानिक मान्यताओं की तात्विक विवेचना समाज के समक्ष रखी जानी चाहिए कि शरीर में आत्मा कहाँ निवास करता है।

    कठोपनिषद मानता है कि आत्मा का निवास मूलतः मस्तिष्क में है। योग की भाषा में मस्तिष्क का यह हिस्सा सहस्रार चक्र या ब्रह्मरंध्र कहलाता है।

    कुछ पश्चिमी वैज्ञानिक भी इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि आत्मा मस्तिष्क के भीतर एक विशिष्ट प्रकार की तंत्रिकाओं में निवास करता है।

    संसार के अधिकतर मुनष्य अपने अनुभव एवं अनुमान के आधार पर मानते हैं कि आत्मा शरीर के प्रत्येक हिस्से में निवास करता है।

    कुछ लोग यह मानते हैं कि शरीर में जहाँ-जहाँ भी संवेदना होती है, वहाँ-वहाँ आत्मा की उपस्थिति अनुभव की जा सकती है।

    आत्मा के सम्बन्ध में व्यक्त किए गए ये समस्त विचार आंशिक रूप से सत्य हैं, इनमें से कोई भी मान्यता पूर्णतः सत्य नहीं है, आइए जानते हैं, कैसे!

    सबसे पहले इस बात पर विचार करते हैं कि क्या आत्मा शरीर के बाएं हिस्से में हृदय पर निवास करता है! हमारे विचार से यह नितांत गलत विचार है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि जिस समय आत्मा नामक कोई तत्व, या ऊर्जा या अदृश्य अस्तित्व शरीर से बाहर निकलता है, उस समय मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। अर्थात् देह के जीवत रहने के लिए आत्मा का शरीर में रहना आवश्यक है।

    आजकल वैज्ञानिक हार्ट का ट्रांसप्लांटेशन करते हैं, तो उस समय मनुष्य का हृदय शरीर से बाहर निकालकर ऑपरेशन टेबल पर एक प्लेट में रख दिया जाता है, तो क्या उस समय आत्मा, हृदय का पीछा करता हुआ हृदय के साथ प्लेट में निवास करता है! यदि करता है तो उस समय आदमी को जीवित नहीं होना चाहिए। जबकि इस ऑपरेशन के दौरान भी मनुष्य जीवित रहता है।

    हार्ट ट्रांसप्लांटेशन के बाद मनुष्य के शरीर में से पुराना हार्ट निकाल दिया जाता है और नया हार्ट लगाया जाता है जो कि किसी अन्य बॉडी में से लाया जाता है तो क्या हार्ट ट्रांसप्लांटेशन के बाद मनुष्य के शरीर में पुराने आत्मा की जगह नया आत्मा आ जाता है?

    चिकित्सकों ने सूअर का हार्ट भी ह्यूमन बॉडी में ट्रांसप्लांट करने में सफलता पाई है तो क्या ऐसे मामलों में सूअर का आत्मा ह्यूमन बॉडी में प्रवेश कर जाता है?

    कुछ लोगों के शरीर में प्राकृतिक रूप से हार्ट, बाईं की जगह दाईं ओर पाया जाता है। तो क्या ऐसे लोगों में आत्मा शरीर के दायें हिस्से में निवास करता है?

    हम जानते हैं कि हार्ट ट्रांसप्लाण्टेशन के बाद भी देह में वही पुराना वाला आत्मा निवास करता है जिस आत्मा को लेकर शरीर इस धरती पर आया था। अतः निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि हृदय का आत्मा के निवास स्थल से कोई लेना-देना नहीं है।

    अब दूसरी मान्यता पर विचार करते हैं जिसके अनुसार आत्मा का निवास मूलतः मस्तिष्क में है तथा योग की भाषा में मस्तिष्क का यह हिस्सा सहस्रार चक्र या ब्रह्मरंध्र कहलाता है।

    इस मान्यता के दो आधार प्रतीत होते हैं। आत्मा के मस्तिष्क पर निवास करने सम्बन्धी मान्यता का पहला आधार यह प्रतीत होता कि जब तक मनुष्य जीवित रहता है, उसकी स्मृति मस्तिष्क में निवास करती है और जब वह मर जाता है तो स्मृतियां, कर्मबंधनों के रूप में आत्मा के साथ गमन करती हैं। अतः यह मान लिया गया कि आत्मा, भी मस्तिष्क में निवास करता होगा और आत्मा जब शरीर से बाहर निकलता होगा तो मस्तिष्क से आवश्यक सूचनाएं लेकर जाता होगा।

    आत्मा के मस्तिष्क पर निवास करने सम्बन्धी मान्यता का दूसरा आधार यह प्रतीत होता है कि मनुष्य की मृत्यु के समय आत्मा प्रायः ब्रह्मरंध्र फोड़कर देह से बाहर नकलता है।

    हिन्दू धर्म में यह मान्यता है कि किन्हीं परिस्थितियों में यह हो सकता है कि मनुष्य की मृत्यु के समय आत्मा ब्रह्मरंध्र फोड़कर बाहर नहीं निकल पाया हो तथा कपाल में बंद हो गया हो इसलिए शव दाह के समय कपाल क्रिया की जाती है तथा आधे जले हुए शव का कपाल एक मजबूत लकड़ी से तोड़ा जाता है ताकि यदि आत्मा, कपाल में बंद हो या अटका हुआ हो, तो वह मुक्त होकर ब्रह्माण्ड में चला जाए।

    हमारी राय में आत्मा के मस्तिष्क पर निवास करने सम्बन्धी मान्यताओं के ये दोनों आधार सही नहीं है। जिस प्रकार स्मृति केवल मस्तिष्क में निवास नहीं करती अपितु हमारी रीढ़ की हड्डी में भी होती है, हमारी अंगुलियों में भी होती है, त्वचा एवं जीभ आदि सहित शरीर के प्रत्येक अंग में होती है, उसी प्रकार आत्मा की स्मृतियां का सम्बन्ध मस्तिष्क से नहीं होता, अपितु आत्मा की स्मृतियों का स्रोत अलग होता है।

    क्योंकि जब मनुष्य अपने कर्मबंधनों के कारण पागलपन में, बेहोशी में, कॉमा आदि की अवस्थाओं में जो कष्ट भोगता है। और इन कष्टों को भोगे जाने के बाद मनुष्य के बुरे कर्मों के बंधन स्वतः कट जाते हैं। यदि आत्मा उस काल की स्मृति नहीं रखेगा तो सजा भोगने के बाद भी कर्म का बंधन बना रहेगा।

    रही बात ब्रह्मरंध्र फोड़कर आत्मा के बाहर निकलने की तो इस सम्बन्ध में यह समझना चाहिए कि ब्रह्मरंध्र, आत्मा के शरीर में प्रवेश एवं निकासी का मार्ग है किंतु यह आवश्यक नहीं है कि आत्मा केवल यहीं पर निवास करे। वह शरीर में कहीं भी निवास करते हुए भी शरीर में आने-जाने के लिए ब्रह्मरंध्र का प्रयोग कर सकता है।

    प्राण शरीर में आते तो ब्रह्मरंध्र से हैं किंतु वे पालयन के समय शरीर के दस छिद्रों में से कहीं से भी होकर निकल सकते हैं और ऐसा होते हुए देखा भी गया है। मृत्यु के उपरांत किसी की आंखें खुली रह जाती हैं, किसी के कान से खून निकलने लगता है। किसी का मुंह फटा हुआ रह जाता है। किसी के मल-मूत्र के स्थान से रक्त बहने लगता है।

    अतः मस्तिष्क के ऊपर एवं ब्रह्म रंध्र के पास आत्मा के निवास करने की थ्योरी सही प्रतीत नहीं होती है।

    कुछ पश्चिमी वैज्ञानिकों ने आत्मा का मूल स्थान मस्तिष्क की कोशिकाओं के अंदर बने ढांचों में बताया है जिन्हें माइक्रोटयूबुल्स कहते हैं। इनका निर्माण उन्हीं तंतुओं से हुआ है जिनसे ब्रह्मांड बना था। इन वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत का आधार इस तथ्य को बनाया है कि माइक्रोटयूबुल्स पर जब क्वांटम गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव पड़ता है, तब हमें चैतन्यता का आभास होता है। अतः आत्मा का निवास स्थान माइक्रोटयूबुल्स को माना जाना चाहिए।

    हम इन वैज्ञानिकों की इस राय से सहमत नहीं हैं। गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव सजीव एवं निर्जीव दोनों अस्तित्वों पर समान रूप से होता है तब यह कैसे माना जा सकता है कि गुरुत्वाकर्षण का अनुभव केवल माइक्रोटयूबुल्स को होता है! जिसमें भार अर्थात् द्रव्यमान है, उस पर गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव पड़ता है। चूंकि आत्मा में भार अर्थात् द्रव्यमान नहीं होता, उसे गुरुत्वाकर्षण का अनुभव नहीं हो सकता। इसी कारण तो गुरुत्वाकर्षण बल उस पर प्रभाव नहीं डाल सकता। अतः माइक्रोटयूबुल्स की थ्योरी गलत प्रतीत होती है।

    बहुत से लोेग मानते हैं कि शरीर के जिस हिस्से में संवेदना होती है, वहाँ-वहाँ आत्मा निवास करता है। हमारी दृष्टि में यह मान्यता भी गलत है। बाल एवं नाखून को काटने पर दर्द नहीं होता किंतु बाल एवं नाखून में भी तब तक आत्मा होता है जब तक कि वे शरीर से जुड़े रहते हैं। कटने, चुभने या जलने का अनुभव शरीर को होता है न कि आत्मा को। अतः आत्मा के सम्बनध में निश्चित रूप से यह मान्यता भी गलत है कि वह शरीर के उस हिस्से में रहता है जिस हिस्से में संवेदना होती है। आत्मा तो नाखून और बाल में भी तब तक होता है, जब तक कि उन्हें काटकर शरीर से अलग नहीं किया जाता।

    तो फिर आत्मा शरीर में कहाँ निवास करता है? इस सम्बन्ध में तात्विक विवेचन किया जाना अनिवार्य है। उसी से बात समझ में आ सकती है।

    वस्तुतः हमारा आत्मा एक साथ दो शरीरों में निवास करता है। आत्मा अपने शुद्ध रूप में स्थूल शरीर में निवास नहीं कर सकता। शुद्ध अवस्था में आत्मा, परमात्मा ही होता है। हम यह भी जानते हैं कि आत्मा में अशुद्धि प्रवेश नहीं कर सकती। अतः परमात्मा की आदि शक्ति जिसे माया कहते हैं, आत्मा के ऊपर एक आवरण लपेटती है। वह आवरण किसी पदार्थ से नहीं बतना, वह बनता है, मन, बुद्धि एवं अहंकार से। मन, बुद्धि एवं अहंकार से युक्त इस आवरण को ही सम्मिलित रूप से सूक्ष्म शरीर कहते हैं। भगवद्गीता भी कहती है कि सूक्ष्म शरीर के तीन भाग होते हैं- मन, बुद्धि और अहंकार।

    माया की इच्छा से आत्मा जो कि वस्तुतः परमात्मा का ही अंश है, मन, बुद्धि और अहंकार से निर्मित इस सूक्ष्म शरीर के भीतर रहना स्वीकार करता है। आत्मा की इसी स्थिति के लिए गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरित मानस में लिखा है- ‘ता बस जीव परा भव कूपा।’

    जब कोई भी जरायुज प्राणी अपनी मां के गर्भ में होता है तथा अण्डज प्राणी अण्डे में होता है तो एक निश्चित समय पर सूक्ष्म शरीर में लिपटा हुआ आत्मा, निर्माणाधीन स्थूल शरीर में प्रेवश करता है। सूक्ष्म शरीर में लिपटा हुआ आत्मा ही जीवात्मा कहलाता है।

    इस जीवात्मा को रहने के लिए स्थूल शरीर की आवश्यकता होती है। इस प्रकार आत्मा एक साथ दो शरीरों में निवास करता है- सूक्ष्म शरीर एवं स्थूल शरीर।

    सूक्ष्म शरीर तथा आत्मा, दोनों ही वायवीय तत्व हैं। वायु को जिस भी पात्र में या स्थान में डाला जाता है, वह उस सम्पूर्ण पात्र अथवा स्थान में फैल जाता है। अतः आत्मा सूक्ष्म शरीर के पूरे आयतन को घेरता है और सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर के पूरे आयतन को घेरता है। इस प्रकार आत्मा हमारी देह के प्रत्येक हिस्से में फैलकर निवास करता है और हाथ-पैर, हृदय, मस्तिष्क, बाल-नाखून सहित शरीर के रोम-रोम में रहता है।

    बहुत से लोग सूक्ष्म शरीर को अंगूठे के आकार का बताते हैं, वस्तुतः यह सूक्ष्म शरीर का निश्चित आकार नहीं है अपितु इस आकार में सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर में प्रवेश या निर्गमन करता है। जब वह देह के भीतर होता है तो पूरी देह में फैल जाता है और जब वह देह से बाहर होता है तो पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाता है।

    इस पर भी एक सूक्ष्म शरीर, तब तक अपने अस्तित्व को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में स्थित अन्य सूक्ष्म शरीरों से पृथक् बनाए रखता है जब तक कि उसके मन, बुद्धि और अहंकार नष्ट नहीं हो जाते। जैसे ही मन, बुद्धि और अहंकार नष्ट होते हैं, सूक्ष्म शरीर भी नष्ट हो जाता है। यह जीवात्मा की अंतिम मृत्यु होती है। सूक्ष्म शरीर के नष्ट होते ही, मनुष्य अपने शुद्ध स्वरूप अर्थात् आत्म स्वरूप में आ जाता है और वह माया के बंधन को लांघकर पुनः परमात्मा में समा जाता है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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