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  • श्रीमद् भगवद्गीता कब लिखी गई ?

     26.10.2018
    श्रीमद् भगवद्गीता कब लिखी गई ?

    भारतीय जन मानस में यह सर्वप्रचलित धारणा है कि भगवद्गीता, भगवान श्रीकृष्ण के मुख से प्रकट हुुई। भगवान ने गीता का उपदेश अपने शिष्य अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में दिया।

    भारतीय मानते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण का अवतार द्वापर युग के अंत में हुआ। शास्त्रों में कहा गया है कि द्वापर युग की समाप्ति तथा कलियुग का प्रारम्भ आज से लगभग 4 लाख 32 हजार साल पहले हुआ।

    यह काल महाभारत के युद्ध के काल से मेल नहीं खाता है। नृवंश विज्ञानी, जीव विज्ञानी, पुरातत्व विज्ञानी तथा भौतिक विज्ञानी मानते हैं कि धरती पर वर्तमान मानव अर्थात् होमोसेपियन सेपियन की शुरुआत आज से लगभग 1 लाख 20 हजार साल पहले हुई एवं उसकी उन्नत पीढ़ी ‘क्रोमैगनन मैन’ की शुरुआत आज से लगभग 40 हजार साल पहले हुई।

    आज से लगभग 15 हजार साल पहले आदमी ने कृषि और पशु पालन आरंभ किया। पश्चिम एशिया से मिले प्रमाणों के अनुसार आज से लगभग 14,000 साल पहले, अफ्रीका में 12 हजार साल पहले और चीन तथा दक्षिण अमरीका में लगभग 10,000 साल पहले खेती करना आरंभ किया।

    भारत में भी खेती आरम्भ होने का काल यही माना जाता है। अतः महाभारत का युद्ध इस काल के बाद का ही है। भारत में आदमी द्वारा हाथों से मिट्टी के बर्तन बनाने के प्राचीनतम अवशेष आज से लगभग 6600 वर्ष पुराने मिले हैं। अतः माना जा सकता है कि महाभारत का युद्ध इस तिथि के बाद ही हुआ।

    हस्तिनापुर से हुई खुदाई में पेंटेड ग्रे रंग के मिट्टी के बर्तन तथा लोहे के तीर, तलवारें आदि मिले हैं। इनकी अवधि ई.पू. 3138 से लेकर ई.पू. 3000 अर्थात् आज से लगभग 5156 वर्ष से लेकर 5018 वर्ष पुरानी है। कुरुक्षेत्र में हुई खुदाई से प्राप्त लोहे के शस्त्रों की अवधि भी यही है।

    अन्य साहित्यिक, पौराणिक स्रोतों के आधार पर भी भारत में मान्यता है कि महभारत का युद्ध ईस्वी पूर्व 3102 में अर्थात् आज से लगभग 5120 वर्ष पूर्व हुआ। अतः गीता का प्राकट्य काल यही माना जाता है। आधुनिक भाषाशास्त्री, इतिहासकार, दर्शनशास्त्री तथा अन्य क्षेत्रों के विद्वान महाभारत युद्ध के काल को महाभारत ग्रंथ का रचना काल नहीं मानते। उनके अनुसार ग्रंथ की रचना, युद्ध के बहुत बाद में हुई।

    गीता के 700 श्लोकों को कहने या सुनने में चार से पांच घंटे लगते हैं। युद्ध के मैदान में किसी भी मानव के लिए यह संभव नहीं है कि वह चार से पांच घंटे तक युद्ध को रोककर गीता का उपदेश दे। भारतीयों का मानना है कि श्रीकृष्ण साधारण मानव नहीं थे, भगवान विष्णु के अवतार थे और उन्होंने गीता के उपदेश के दौरान समय की गति को रोक दिया था।

    बाली द्वीप से गीता की एक अत्यंत प्राचीन पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है जिसमें केवल अस्सी श्लोक ही हैं? बहुत से विद्वान इसी को गीता की मूल प्रति मानते हैं जिसे बाद में 700 श्लोकों में बदल दिया गया। भारतीय मुख्य भूमि और बाली द्वीप के बीच आर्यों एवं द्रविड़ों का आना-जाना रामायण काल एवं उससे भी पहले से है। अतः बाली में मिली गीता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    गीता में चार मनुओं का उल्लेख है-

    विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवे अब्रवीत्। (4, 1)

    महर्षयरू सप्त पूर्वे चत्वारो मनुस्तथा। (10, 6)


    बाद में मनुओं की संख्या बढ़कर 14 हो गई। कुछ पुराणों में 28 मनुओं की मान्यता भी है। अतः यह कहा जा सकता है कि गीता का लेखन पौराणिक काल से पहले उस समय हुआ जब देश में चार मनुओं को ही मान्यता थी। यह काल उपनिषदों का काल है। पुराण उस समय भविष्य के गर्भ में थे।

    इसीलिए गीता पुराण नहीं है, उपनिषद है।

    गीता में उपलब्ध सामग्री पर ध्यान देने से ज्ञात होता है कि वर्तमान गीता में ब्रह्मसूत्र, तीन वेद तथा वेदांत का उल्लेख है। सांख्य दर्शन तथा योग का विचार भी गीता में अपने चरम पर है। गीता में अहिंसा, शील, यज्ञकर्म, पीपल की श्रेष्ठता, कुबेर यक्ष आदि की पूजा का उल्लेख किया गया है। ऐसे ही प्रमाणों के आधार पर गीता की रचना के काल को विचारा जा सकता है।

    गीता में अवतारवाद को पूरी तरह स्थापित किया गया है और श्रेष्ठ कर्म को भी योग बताया गया है।

    आधुनिक भाषाशास्त्री, इतिहासकार तथा दर्शनशास्त्री यह सिद्ध करने में सफल रहे हैं कि मूल रूप में भगवद्गीता, महाभारत का हिस्सा नहीं थी, यह गुप्त शासकों के काल में प्रक्षेपक के रूप में महभारत में जोड़ी गई। इस घटना का उल्लेख पांचवी शताब्दी ईस्वी में गुप्त शासकों के समय भारत आए फाह्यान ने किया है। वह लिखता है- ‘भाइयों के बीच झगड़े को लेकर लिखे गए एक बड़े ग्रंथ में उपदेशात्मक वचनों को जोड़ने को लेकर उन दिनों देशवासी चर्चा करते थे।’

    गीता के काल पर विशद् शोध करने वाले प्रोफसर दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने माना है कि गीता पहले अलग 
    ग्रंथ थी, गुप्तकाल के आसपास यह महाभारत में सन्निवेशित हुई। इस कथन से यह सिद्ध होता है कि गुप्तकाल में गीता न केवल मौजूद थी अपितु महाभारत का हिस्सा बन गई थी। इससे यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि गीता के 80 श्लोक, महाभारत में जुड़ने से पहले ही 700 श्लोकों में बदले गए होंगे।

    गुप्तकाल से पहले भारत में एक भी ग्रंथ ऐसा नहीं मिला है जिसमें भगवद्गीता का उल्लेख किया गया हो किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि गीता इससे पहले अस्तित्व में नहीं थी। निश्चित रूप से थी किंतु वह किसी स्वतंत्र ग्रंथ की तरह दर्शनशास्त्र का एक ग्रंथ थी। उसे भगवान की वाणी के रूप में मान्यता नहीं मिली थी और उस काल की गीता का दर्शन भी आज की गीता से भिन्न था।

    बहुत सी शोधों के आधार पर यह माना गया है कि भगवद्गीता की रचना पांचवी शताब्दी ईस्वी पूर्व में हुई। अर्थात् ईसा के जन्म से लगभग 500 साल पहले। हालांकि बाद में भी इसके मूल पाठ में अनेक हेर-फेर होते रहे। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् के अनुसार गीता की मूल रचना ई.पू. 200 में हुई थी और इसका वर्तमान स्वरूप ईसा की दूसरी शताब्दी में किसी वेदांती द्वारा तैयार किया गया था।

    होपकिन्स का विचार है कि गीता का अब जो कृष्ण-प्रधान स्वरूप मिलता है, वह पहले कोई पुरानी विष्णु-प्रधान कविता थी और उससे भी पहले वह कोई निस्सम्प्रदाय रचना थी। संभवतः विलम्ब से लिखा गया कोई उपनिषद्।

    पश्चिमी दर्शनशास्त्री सुकरात की मृत्यु ईसा से 399 साल पहले हुई। उसके विचारों में गीता के बहुत से सिद्धांतों का समावेश है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि उस काल में गीता का दर्शन धरती के अन्य हिस्सों में भी फैल चुका था। बहुत से भारतीय मानते हैं कि भारत में श्रीकृष्ण के जन्म से बहुत पहले से बहुत से उपनिषद मौजूद थे। भगवान श्री कृष्ण ने उन उपनिषदों के श्रेष्ठ विचारों के सार को गीता के रूप में उच्चारित किया। 

    अतः यह कहा जा सकता है कि गीता के विचार किसी एक समय में प्रकट नहीं हुए। यह सैंकड़ों वर्षों के चिंतन का परिणाम हैं जो ईसा से लगभग पांच सौ साल पहले ठोस रूप ले चुके थे। बाली द्वीप से मिली गीता के 80 श्लोकों को गीता का एक प्रारम्भिक रूप माना जाना चाहिए।


    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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