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  • परकाया प्रवेश की वैज्ञानिकता और उसके पौराणिक संदर्भ

     23.09.2018
    परकाया प्रवेश की वैज्ञानिकता और उसके पौराणिक संदर्भ

    परकाया प्रवेश की वैज्ञानिकता और उसके पौराणिक संदर्भ

    भगवान शंकराचार्य के परकाया प्रवेश पर हमारे पिछले ब्लॉग के बाद यह आवश्यकता अनुभव हुई कि परकाया प्रवेश की वैज्ञानिकता तथा उसके पौराणिक संदर्भों पर थोड़ी चर्चा और की जाना चाहिए ताकि इस परम्परा के बारे में और अधिक विश्वसनीयता से जाना जा सके।

    परकाया प्रवेश को प्रायः अस्वाभाविक घटना समझा जाता है किंतु यह प्राणियों का स्वाभाविक धर्म है। परकाया प्रवेश का अर्थ है एक देह को छोड़कर दूसरी देह में प्रवेश करना।

    माँ के गर्भ में संतान का शरीर बनता है, वहाँ नवीन आत्मा का निर्माण नहीं होता। माँ के गर्भ में बनने वाली शिशु देह में हँसने-रोने एवं बोलने वाला जीवात्मा कहाँ से आता है? निश्चित रूप से वह किसी अन्य देह को छोड़कर आता है जिसे इसी प्रकृति प्रदत्त एवं स्वाभाविक प्रक्रिया के द्वारा नवीन शरीर की प्राप्ति हाती है।

    परमात्मा, देवगण, योगीजन, सिद्धजन और कुछ अन्य प्रकार के दैवीय अस्तित्वों को मां के गर्भ में बन रहे शिशु-शरीर में प्रवेश करने की अनिवार्यता नहीं है। वे स्वयं अपनी शक्तियों के बल पर इच्छानुसार शरीर का निर्माण कर सकते हैं जिसे योगज शरीर कहा जाता है।

    माँ के पेट में बन रहे शिशु में आत्मा प्रवेश नहीं करता, जीवात्मा प्रवेश करता है। वह किसी अन्य स्थान से आकर उस निर्माणाधीन शरीर का स्वामी बनता है। आत्मा और जीवात्मा में अंतर है। आत्मा, परमात्मा का शुद्ध स्वरूप है जिसे सुख, दुःख, भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, नींद एवं थकान का अनुभव नहीं होता किंतु जीवात्मा को होता है।

    आत्मा की मृत्यु नहीं होती किंतु जीवात्मा की होती है। जीवात्मा की मृत्यु और जीवित मनुष्य की मृत्यु में अंतर है। इस अंतर को समझने के लिए जीवात्मा के स्वरूप को समझना जरूरी हो जाता है। आत्मा से ही जीवात्मा बनता है। आत्मा, परमात्मा का शुद्ध स्वरूप है किंतु जब आत्मा कर्मों के बंधन से संस्कारित हो जाता है तो वह जीवात्मा का रूप ले-लेता है।

    आत्मा एवं जीवात्मा का कोई लिंग नहीं है इसलिए उन्हें स्त्री-लिंग या पुल्लिंग दोनों से सम्बोधित किया जा सकता है। स्त्री देह और पुरुष देह में आकर बैठने वाला जीवात्मा एक ही होता है। वह अपने संस्कारों के आवरण के कारण मोहयुक्त होकर स्त्री-देह या पुरुष-देह का चयन करता है। जीवात्मा अपने जन्म-जन्मान्तर के संस्कारों के कारण काले, गोरे, अमीर, गरीब, स्वस्थ, रुग्ण आदि प्रकार की देह का चयन करता है। जीवात्मा के ये संस्कार उसके द्वारा किए गए कर्मों से उत्पन्न होते हैं।

    यदि पुनर्जन्म संभव है और शाश्वत सत्य है तो परकाया प्रवेश की घटनाएं भी संभव हैं और शाश्वत सत्य हैं। परकाया प्रवेश की थोड़ी बहुत शक्ति प्रत्येक प्राणी में होती है। यदि हम चींटी को भी कष्ट नहीं पहुंचाना चाहते तो इसका अर्थ है कि चींटी ने किसी न किसी रूप में हमारे भीतर प्रवेश कर लिया है। यह परकाया प्रवेश का सबसे छोटा रूप है जिसमें एक प्राणी केवल संवेदना या भावना बनकर दूसरे प्राणी के मन, बुद्धि एवं हृदय में प्रवेश कर जाता है।

    जब यह संवेदना या भावना विराट रूप धर लेती है तो एक प्राणी अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ दूसरे प्राणी की देह में प्रवेश कर लेता है। यहां प्रत्येक शब्द पर ध्यान देने की आवश्यकता है। सम्पूर्ण अस्तित्व का अर्थ है संस्कारों से युक्त आत्मा अर्थात् जीवात्मा। इसमें शरीर शामिल नहीं है।

    एक जीवात्मा किसी अन्य जीवात्मा में प्रवेश नहीं कर सकता है, केवल दूसरी काया अथवा किसी दूसरे प्राणी की काया में प्रवेश कर सकता है।

    हमारे इस  ब्लॉग में परकाया प्रवेश की जिस संदर्भ में चर्चा की जानी है वह आदि जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा किए गए परकाया प्रवेश की है। अर्थात् एक जीवात्मा द्वारा एक शरीर में निवास करते हुए ही, अपना शरीर छोडकर, दूसरे जीवित या मृत शरीर में प्रवेश कर जाना।

    ‘तंत्र सार’, ‘मंत्र महार्णव’, ‘मंत्र महोदधि’ आदि तंत्र सम्बधी प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार आकाश तत्त्व की सिद्धि के बाद परकाया प्रवेश सम्भव होने लगता है। खेचरी मुद्रा का सतत् अभ्यास और इसमें पारंगत होना परकाया सिद्धि प्रक्रिया में अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होता है।

    ‘व्यास भाष्य’ के अनुसार अष्टांग योग अर्थात यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के अभ्यास; निष्काम भाव से भौतिक संसाधनों का त्याग और नाड़ियों में संयम स्थापित करके चित्त के उनमें आवागमन के मार्ग का आभास किया जाता है। चित्त के परिर्भ्रमण मार्ग का पूर्ण ज्ञान हो जाने के बाद साधक, योगी, तपस्वी अथवा संत पुरूष अपनी समस्त इन्द्रियों सहित चित्त को निकालकर परकाया प्रवेश कर जाते हैं।

    ‘भोजवृत्ति’ के अनुसार भौतिक बन्धनों के कारणों को समाधि द्वारा शिथिल किया जाता है। नाड़ियों में इन बन्धनों के कारण ही चित्त अस्थिर रहता है। नाड़ियों की शिथिलता से चित्त को अपने लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त होने लगता है। इस अवस्था में पहुँचने के बाद योगी अथवा साधक अपने चित्त को इन्द्रियों सहित दूसरे अन्य किसी शरीर में प्रविष्ट करवा सकता है।

    जैन धर्म में सूक्ष्मतर शरीर अर्थात् आत्मा को अरूप, अगन्ध, अव्यक्त, अशब्द, अरस, चैतन्य स्वरूप और इन्द्रियों द्वारा अग्राह्य कहा गया है। स्थूल और सूक्ष्म के अतिरिक्त आत्मा को धर्म में संसारी और मुक्त रूप से जाना गया है।

    यूनानी पद्धति में परकाया प्रवेश को छाया पुरूष से जोड़ा गया है।

    विभिन्न त्राटक क्रियाओं द्वारा परकाया प्रवेश के रहस्य को सिद्ध किया जा सकता है। हठ योगी परकाया प्रवेश सिद्धि में त्राटक क्रियाओं द्वारा मन की गति को स्थिर और नियंत्रित करने के बाद परकाया प्रवेश में सिद्ध होते हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथ परकाया प्रवेश की घटनाओं का उल्लेख करते हैं जिनमें महाभारत तथा योग वसिष्ठ आदि भी सम्मिलित हैं।

    महाभारत के ‘अनुशासन पर्व’ में आई एक कथा के अनुसार एक बार इन्द्र किसी कारण, ऋषि देवशर्मा से कुपित हो गया। इन्द्र ने ऋषि की पत्नी से बदला लेने का निश्चय किया। देवशर्मा के शिष्य ‘विपुल’ को योग दृष्टि से ज्ञात हो गया कि मायावी इन्द्र, गुरु-पत्नी से बदला लेने वाला है। ‘विपुल’ ने सूक्ष्म शरीर से गुरु-पत्नी के शरीर में प्रवेश करके उसे इन्द्र से बचाया।

    महाभारत के शान्ति पर्व में वर्णन है कि सुलभा नामक एक विदुषी महिला, अपने योगबल की शक्ति से राजा जनक के शरीर में प्रविष्ट होकर, अन्य विद्वानों से शास्त्रार्थ करने लगी थी। उन दिनों राजा जनक का व्यवहार भी स्वाभाविक नहीं था।

    योग वसिष्ठ नामक ग्रंथ में महर्षि वसिष्ठ अपने शिष्य श्रीराम को परकाया प्रवेश की विधि समझाते हुए कहते हैं कि जिस तरह वायु पुष्पों से गंध ख्रींचकर उसका सम्बन्ध घ्राणेन्द्रिय से करा देती है, उसी तरह योगी, रेचक के अभ्यास से कुंडलिनी रूपी घर से बाहर निकलकर दूसरे शरीर में जीव का सम्बन्ध कराते हैं।

    ‘पातंजलि योगसूत्र’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में कई शरीर धारण तथा परकाया प्रवेश जैसी अनेक योग विभूतियों का वर्णन है। बहुत से नाथ योगियों को भी परकाया प्रवेश की विद्या प्राप्त थी। नाथ साहित्य में योगी मछन्दनाथ का

    बड़ा आदर है। नाथ साहित्य में उल्लेख मिलता है कि योगी मछन्दरनाथ ने एक बार एक बकरे के शरीर में परकाया प्रवेश किया। एक योगिनी को इस बात का पता चल गया। उसने मछंदरनाथ को उस बकरे के शरीर में ही सीमित कर दिया तथा अपने घर में बांध लिया। जब कई दिनों तक गुरु वापस नहीं लौटे तो उनके शिष्य गोरखनाथ, मछंदरनाथ को ढूंढने निकले। बहुत से स्थानों का भ्रमण करते हुए गोरखनाथ कामरूप नामक देश में पहुंचे। आज का आसाम एवं बंगाल ही उस काल का कामरूप है। कामरूप में एक रूपसी तांत्रिक युवती के घर में गोरखनाथ को अपने गुरु, बकरे के रूप में बंधे हुए मिले। गोरखनाथ ने जोर से आवाज लगाई- जाग मछंदर गोरख आया। गोरख की आवाज सुनकर मछंदर को अपनी सिद्धियां पुनः स्मरण हो गईं और वे संकलप मात्र से बकरे का शरीर त्याग कर फिर से अपने मूल शरीर में आ गए।

    ‘भगवान् शंकराचार्य के अनुसार यदि सौन्दर्य लहरी के 87वें क्रमांक का श्लोक नित्य एक सहस्र बार जप कर लिया जाए तो परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।

    रानी चूड़ाला द्वारा अपने पति के शरीर में परकाया प्रवेश की घटना बहुत प्रसिद्ध है। इस आख्यान के अनुसार शिखिध्वज नामक एक राजा समाधि में बैठ गए। उनकी रानी चूड़ाला पर उनके शरीर की रक्षा की जिम्मेदारी थी। चूड़ाला दिन में कुंभ नामक एक व्यक्ति के मृत शरीर में परकाया प्रवेश करके अपने पति के शरीर की रक्षा करती थी और रात्रि में वह मदनिका नामक एक मृत स्त्री के शरीर में प्रवेश करके जीवन-संगिनी के रूप में अपने पति की सेवा करती थी। ऐसा करते हुए बहुत दिन बीत गए किंतु राजा शिखिध्वज की समाधि नहीं टूटी। एक दिन चूड़ाला ने अपने पति की नाड़ी परीक्षा की तथा उनके जीव की सही स्थिति का पता लगाया। वह समझ गई कि उसके पति जीवित तो हैं किंतु समाधि की जिस अवस्था में पहुंच गए हैं, वहां से उन्हें जगाया जाना संभव नहीं है। अतः देवी चूड़ाला ने अपने पति के शरीर में परकाया प्रवेश करने का निर्णय लिया। यह एक अनोखी घटना होने वाली थी। ठीक उसी प्रकार की जिस प्रकार देवी सुलभा ने राजा जनक के जीवित रहते ही उनके शरीर में प्रवेश कर लिया था। चूड़ाला ने शिखिध्वज के शरीर में प्रवेश करके उनकी चेतना को स्पंदित किया और स्वयं बाहर आकर अपने शरीर में प्रवेश कर गई। जैसे कोई चिड़िया अपने घोंसले में घुस जाती है। बाहर आकर चूड़ाला एक पुष्पाच्छादित वृक्ष के नीचे बैठकर सामगायन करने लगी। चेतना के स्पंदित होते ही शिखिध्वज की समाधि भंग हो गई और सामगायन सुनकर वे जागृत अवस्था में आ गए। 

    अभी हाल ही की एक घटना देश भर में चर्चित रही है। जालंधर के नूरमहल के दिव्य ज्योति जागृति संस्थान में आशुतोष महाराज के शिष्य उनके शरीर की रक्षा कर रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि उनकी क्लिनीकल डेथ हो चुकी है जबकि शिष्यों का मानना है कि महाराज समाधि अवस्था में हैं तथा एक दिन वे अपने शरीर में फिर से लौटेंगे। कोर्ट ने शिष्यों की भावना को स्वीकार करते हुए महाराज का शरीर सुरक्षित रखने की अनुमति दे दी है।

    हम अपने पिछले ब्लॉग में भी यह कह चुके हैं कि परकाया प्रवेश गृहस्थों के लिए नहीं है, केवल सिद्धों और योगियों के लिए है। यह योगियों का कौतुक मात्र है। परकाया प्रवेश का कोई लाभ नहीं है। न इसकी आवश्यकता है। न इससे मोक्ष प्राप्त होता है। आत्मा की उन्नति एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए निष्काम कर्म एवं नवधा भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है।  

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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