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  • रामानंदाचार्य के शिष्य

     26.10.2018
    रामानंदाचार्य के शिष्य

    संत शिरोमणि रामानंदाचार्य के शिष्यों की वास्तविक संख्या कितनी थी, इसके सम्बन्ध में कोई निश्चित मत स्थापति नहीं किया जा सकता। सहज अनुमान किया जा सकता है कि इस युग प्रवर्तक विभूति के शिष्यों की संख्या अत्यधिक रही होगी। भारत भ्रमण के समय में स्थान-स्थान पर लोग उनके व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर उन्हें अपना गुरु मानने लगे होंगे। फिर भी उनके 12 प्रमुख शिष्यों का उल्लेख कई स्रोतों से मिलता है। इन शिष्यों के बारे में एक दोहा भी कहा जाता है-

    अनतानन्द, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्मावती, नरहरि।

    पीपा, भावानन्द, रैदासु, धना, सेन, सुरसरि की धरहरि।


    अर्थात्- अनंतानंद, कबीर, सुखानंद, सुरसुरानंद, पद्मावति, नरहरि, पीपा, भावानंद, रैदास, धन्ना, सेना तथा सुरसुरानंद की धर्मपत्नी।

    रामानंदाचार्य तथा उनके शिष्यों का एक चित्र अनेक पुस्तकों में प्रकाशित होता रहा है जिसमें मध्य स्थान में एक चौकी पर रामानंदाचार्य विराजमान हैं तथा उनके दोनों तरफ अर्द्धगोलाकार क्रम में उनके शिष्य सुशोभित हैं। सभी शिष्यों के तिलक छापे एक समान ही हैं। प्रायः कबीर एवं तुलसी के चित्रों में इस प्रकार के तिलक छापे मिलते हैं। यह चित्र विश्वसनीय नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें सभी बारह शिष्य पुरुष हैं, जबकि रामानंदाचार्य के 12 प्रमुख शिष्यों में दो चित्र स्त्री श्ष्यिों के होने चाहिये।

    रामानंदाचार्य के शिष्यों में से कबीर, पीपा तथा रैदास कवि थे। इन्हें मध्य युगीन भक्ति काल में संत कवि की प्रतिष्ठा प्राप्त है। कवि होने के कारण इन संतों की महिमा काल व लोक की सीमाओं को पार करके दूर दूर तक प्रकाशित हुई। नाभादास कृत भक्तमाल में रामानंदाचार्य के इन अद्वितीय शिष्यों का संक्षिप्त वर्णन मिलता है।

    अनंतानंद-

    रामानंद संप्रदाय के ग्रंथों में इनका नाम अत्यंत आदर से लिया जाता है। इन्हें भी अपने गुरु के ही समान जगद्गृरु कहकर संबोधित किया गया है। नाभादास ने भक्तमाल में लिखा है-

    अनंतानंद पद परिस कै लोकपाल से ते भए।

    अर्थात् अनंतानंद के शिष्य अपने गुरु के चरणों का स्पर्श करके लोकपालों के समान शक्तिशाली हो गये। अनंतानंद के बचपन का नाम छन्नूलाल था। वे ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए थे। अनंतानंद ने ‘‘श्री हरि भक्ति सिंधु - वेला’’ नामक ग्रंथ की रचना की।

    भक्त माल के अनुसार अनंतानंद के एक शिष्य का नाम नरहरि था। अब यह निर्धारित करना कठिन है कि ये वही नरहरि हैं जो रामानंदाचार्य के शिष्यों में गिने जाते हैं। अथवा कोई भिन्न व्यक्ति हैं। अनुमान यही होता है कि रामानंदा चार्य के शिष्य नरहरि तथा अनंतानंद के शिष्य नरहरि, एक ही व्यक्ति हैं क्योंकि काल गणना के अनुसार भी यही अधिक उपयुक्त सिद्ध होता है।

    यदि नरहरि अनंतानंद के शिष्य थे फिर भी वे रामानंदार्चा के प्रमुख शिष्यों में स्थान पा गये हैं तो भी कुछ अतिश्योक्ति नहीं मानी जा सकती क्योंकि शिष्य का शिष्य होने से नरहरि रामानंदाचार्य के भी शिष्य कहे जा सकते हैं।

    श्री रामानंदाचार्य के साकेतवासी होने पर अनंतानंद को ही वैष्णवाचार्य के पीठ पर अभिषिक्त किया गया था किंतु गुरु विरह को सहन नहीं कर पाने के कारण एक वर्ष बाद ही वे अपने वरिष्ठ शिष्य कृष्णदासजी को आचार्य पीठ पर अभिषिक्त करके स्वयं स्वच्छंद परिभ्रमण के लिये निकल पड़े। मान्यता है कि उन्होंने 113 वर्ष की आयु में साकेत गमन किया।

    कबीर-

    कबीर का प्राकट्य काल तो विवादास्पद है ही किंतु उनका कुल गोत्र आदि भी अज्ञात है। कबीर का जन्म विक्रम संवत 1455 में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को सोमवार के दिन हुआ। मान्यता है कि ये ब्राह्मण कुलोत्पन्न थे तथा किसी कुमारी के पुत्र होने के कारण माता द्वारा लोकलाज के भय से मार्ग में पटक दिये गये थे जहाँ से नीरु-नीमा नामक दम्पत्ति उन्हें अपने घर ले आया और अपने पुत्र की ही तरह इनका लालन पालन किया। यही बालक इतिहास में संत कबीर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इनकी विधिवत् शिक्षा दीक्षा नहीं हुई थी किंतु इन पर माता सरस्वती की विशेष कृपा रही। ये गृहस्थ संत थे तथा इनके एक पुत्र एवं एक पुत्री भी थी। कबीर का निधन मगहर में वि.सं. 1549 में हुआ। इस मान्यता के अनुसार उनकी आयु 94 वर्ष हुई।

    सुखानंद-

    ये उज्जैन के ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम त्रिपुरारि भट्ट तथा माता का नाम जाम्बुवती था। इनके बचपन का नाम चंद्रहरि था। नाभादास ने भक्त माल में इनके बारे में लिखा है-

    भक्ति दास भए हरण भुज सुखानंद पारस परस।

    सुख सागर की छाप राग गौरी रुचि न्यारी।

    पदरचना गुरु मंत्र मनो आगम अनुहारी।

    हरि गुरु कथा अपार भाल राजत लीला भर।

    भक्ति दान भए हरण भुज सुखानंद पारस परस।


    सुरसुरानंद-

    इनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। इनके पिता का नाम पं. सुरेश्वर शर्मा तथा माता का नाम सरला था। इनका जन्म वैशाख कृष्ण नवमी गुरुवार को वसंत ऋतु में हुआ था। जन्म का संवत ज्ञात नहीं है। इन्हें नारद मुनि का अवतार माना जाता है। मान्यता है कि सरयू के तट पर इन्हें भगवान श्री राम ने दर्शन दिये। नाभादास ने भक्तमाल में इनका परिचय दिया है।

    नरहरि-

    इन्हें नरहर्यानंद भी कहा जाता है। इनका जन्म वृंदावन में हुआ। इनके जन्म की तिथि वैशाख माह में कृष्ण पक्ष की तृतीया को हुआ। इनका जन्म संवत भी नहीं दिया गया है। आप रामचरित मानस के रचियता तुलसीदास इनके बारे में नाभादास ने लिखा है-

    नपट नरहर्यानंद को कर दाता दुर्गा भई

    घर पर लकड़ी नहिं शक्ति को सदन उजारैं।

    शक्ति भक्त सो बोलि दिनहिं प्रति बरही डारैं।

    लगी परोसनि हबस भवानी भय सो मारैं।

    बदले की बेगारि मूडि वाके शिर डारैं

    भरत प्रसंग ज्यों कालिका लडू देखि तन में तई

    निपट नरहर्यानंद को कर दाता दुर्गा भई।


    पीपा-

    संत पीपा चौहान राजपूत थे। उनका जन्म विक्रम संवत् 1417 में चैत्री पूर्णिमा के दिन हुआ। वे गागरौन (पूर्वी राजस्थान, जिला झालावाड़) दुर्ग के स्वामी थे। उन्होंने अपने भाई अचलदास खींची को गागरौन का राजपाट देकर रामानंदाचार्य का शिष्यत्व ग्रहण किया। कहा जाता है कि जब ये राजपाट त्याग कर गुरु की सेवा में पहुँचे तो गुरु ने कहा कि कुएँ में गिर जाओ। पीपा उसी समय कुंए की ओर चल पड़े। पीपा को देह आसक्ति से मुक्त हुआ जानकर रामानंदाचार्य ने उन्हें अपनी शरण में ले लिया। संत पीपा की सहधर्मिणी भी रानी से सन्यासन बन गयी तथा जीवन भर इन्हीं के साथ रही।

    भावानंद-

    भावानंद को राजा जनक का पुनर्जन्म माना जाता है। इनका जन्म मिथिला क्षेत्र में बहुवर्ह नामक गाँव में मिश्र ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके बचपन का नाम विट्ठल पंत था। कहा जाता है कि रामानंदाचार्य की गुफा के बाहर पहुँच कर प्रणाम करते ही इन्हें भगवत्कृपा प्राप्त हो गयी। वे उसी समय वैष्णव संप्रदाय में दीक्षित होकर रामानंदाचार्य के शिष्य हो गये।

    रैदास-

    इन्हें धर्मराज का अवतार माना जाता है। इनका पहला जन्म विदुर के रूप में तथा दूसरा जन्म वाराणसी में एक ब्राह्मण कुल में हुआ। तीसरे जन्म में ये रैदास के रूप में प्रकट हुए । इनका जन्म वि.सं. 1465 में तथा साकेत गमन वि.सं. 1584 में हुआ। ये मीरां के गुरु भी कहे जाते हैं। यद्यपि इस बात पर मतभेद अधिक है। ये अपने युग की महान विभूतियों में से एक हुए हैं।

    धन्ना-

    ये एक कृषक परिवार में पन्ना जाट के घर में पैदा हुए। इनकी माता का नाम रेवा था। इनका जन्म वैशाख मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में हुआ। एक बार एक ब्राह्मण इनके घर में ठहरा। उसे पूजा पाठ करते हुए देखकर ये भी धर्म कर्म की ओर प्रवृत्त हुए। ये रामानंदाचार्य की शरण ग्रहण करने के लिये काशी आये तथा उनसे वैष्णव मत में दीक्षा ग्रहण की।

    सेन-

    इनका जन्म बांधवगढ़ के निवासी उग्रसेन नापति के घर में हुआ। इनकी माता का नाम यशोदा था। ये वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी को रविवार के दिन पूर्व भाद्रपद नक्षत्र में पैदा हुए। जन्म का संवत प्राप्त नहीं होता है। नाभादास ने भक्त माल में इनका परिचय दिया है। कहा जाता है कि भीष्म पिता को कलियुग में सेन के रूप में मृत्युलोक में आना पड़ा।

    इनकी दो महिला भक्तों पद्मावति एवं सुरसुरानंद की धर्मपत्नी के जीवन चरित्र के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त नहीं होती है।

    रामानंदाचार्य के शिष्यों की ओर संकेत करते हुए किसी अज्ञात कवि ने व्यंग्य पूर्वक लिखा है-

    जाट जुलाह जुरे दरजी, मरजी में रहै रैदास चमारौ

    ऐते बड़े करुणा निधि को इन पाजिन ने दरबार बिगारौ।


    ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हीं भक्तों की ओर संकेत करते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने ब्रह्माजी के मुख से पावर्तीजी की स्तुति के मिस कहा है-

    जिनके भाल लिखी लिपि मेरी सुख की नहीं निसानी।

    तिन रंकन कौ नाक संवारत हौं आयौ नकबानी।


    अर्थात् जिन दरिद्रों के भाग्य में मैंने सुख का कोई संकेत अंकित नहीं किया, उन दरिद्रों के लिये स्वर्ग संवारते-संवारते मेरी नाक में दम आ गया है।


     

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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