Blogs Home / Blogs / धर्म-अध्यात्म / समन्वयवादी परम्परा के प्रवर्तक रामानंद
  • समन्वयवादी परम्परा के प्रवर्तक रामानंद

     26.10.2018
     समन्वयवादी परम्परा के प्रवर्तक रामानंद

    भारतीय धर्म, अध्यात्म एवं दार्शनिक चिंतन में दो प्रबल विरोधी धाराएं एक साथ विद्यमान रही हैं। इनमे से पहली धारा है- धार्मिक कट्टरता एवं दूसरी धारा है- धार्मिक सहिष्णुता।

    एकमात्र अपने ही मत तथा अपने ही इष्ट देव में सर्वोच्च आस्था रखे जाने के कारण भारत वर्ष में धार्मिक संप्रदायवाद अत्यधिक कट्टरता से विद्यमान रहा है। अपने गुरु के वचनों को ब्रह्म-वाक्य मानकर केवल उन्हीं के द्वारा उच्चारित शब्दों को ही स्वीकार करना भारतीय संप्रदायवाद की विशेषता रही है।

    दूसरी ओर भारत भूमि पर समय-समय पर ऐसी दिव्य विभूतियों का अवतरण हुआ है जिन्होंने सांप्रदायिक संकीर्णता को नकार कर जन कल्याण एवं राष्ट्र कल्याण को प्रधानता देते हुए सांप्रदायिक समन्वय को अपनाया तथा भारतीय संस्कृति को नवीन दिशा प्रदान की।

    प्राचीन भारतीय षड्दर्शन के समस्त छः अंग (सांख्य, योग, न्याय, मीमांसा, वेदांत और वैशेषिक) पूर्णतः आस्तिक हैं। वे वेदों को प्रामाणिक मानते हैं तथा मीमांसा को छोड़कर अन्य सभी अंग, ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हैं। इन समानताओं के उपरांत भी दार्शनिक धरातल पर चलने वाले बाह्य विरोधों तथा अध्यात्मिक धरातल पर प्रकट होने वाली अन्तमुर्खी समन्वयवादी प्रतिक्रियाओं के निरंतर प्रवाह से भारतीय अध्यात्म में अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, द्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद और शुद्धाद्वैतवाद जैसे विलक्षण दार्शनिक सिद्धांतों एवं मान्यताओं की प्रतिष्ठापना हुई।

    इनके प्रकट होने का क्रम इस प्रकार रहा- बौद्धों के शून्यवाद (ई.पू. 6ठी शताब्दी) की प्रतिक्रिया में शंकर (ई. 8वीं शताब्दी) का अद्धैतवाद प्रकट हुआ तथा शेष मत (विशिष्टाद्वैतवाद, द्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद और शुद्धाद्वैतवाद) शंकर के अद्वैतवाद की प्रतिक्रिया में प्रकट हुए।

    रामानुजाचार्य (ई. 11-12वीं शताब्दी) ने विशिष्टाद्वैतवाद की, माध्वाचार्य (ई. 13 वीं शताब्दी ) ने द्वैतवाद की, निम्बार्काचार्य (ई. 12-13 शती) ने द्वैताद्वैतवाद की प्रतिष्ठापना की। वल्लभाचार्य (ई. 15-16 वीं शताब्दी ) ने शुद्धाद्वैतवाद की स्थापना की।

    इन सिद्धांतों के प्रतिपादकों का भारतीय जन मानस में कितना गहरा आदर है, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि रामानुजाचार्य को भगवान् संकर्षण का अवतार माना जाता है। मध्वाचार्य को वायु देव का, निम्बार्काचार्य को भगवान के प्रिय आयुध सुदर्शन चक्र का तथा वल्लभाचार्य को अग्नि देव का अवतार माना जाता है।

    शंकराचार्य के मायावाद और रहस्यवाद के सिद्धांतों को काटनेे के लिये रामानुजाचार्य तथा माध्वाचार्य ने विष्णु की भक्ति का प्रचार किया। निम्बार्काचार्य ने लक्ष्मी और विष्णु के स्थान पर राधा और कृष्ण की भक्ति का प्रचार किया एवं वल्लभाचार्य ने भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की उपासना को ईश भक्ति का साधन बनाया।

    रामानुजाचार्य द्वारा प्रतिपादित विशिष्टाद्वैतवाद को समझने के लिये अन्य मतों का भी संक्षिप्त परिचय होना आवश्यक है।

    शून्यवाद-

    बौद्धों ने जगत् तथा ईश्वर की सत्ता को नकार दिया और संपूर्ण जगत को दुखमय मानकर शून्य को ही परम तत्व मान लिया। उनके अनुसार परम तत्व न सत् है, न असत् है, न सत् और असत् दोनों है और न दोनों से भिन्न ही है। इस प्रकार वह इन चारों कोटियों से विलक्षण तत्व है। वह अलक्षण है। इसी को शून्यवाद तथा प्रतीत्यसमुत्पाद भी कहा जाता है। इस प्रकार बौद्धों के अनुसार ब्रह्म और जगत् दोनों ही असत्य हैं।

    अद्वैतवाद-

    शंकराचार्य का अद्वैतवाद समस्त दार्शनिक जगत को एक अनुपम देन है। इसके प्रतिपादन का उद्देश्य शून्यवाद का खण्डन करके प्राचीन आस्तिक दर्शन की पुर्नस्थापना करना था। यहाँ इस बात को समझा जाना आवश्यक है कि अद्वैतवाद का प्राकट्य केवल बौद्धों के शून्यवाद की प्रतिक्रिया में नहीं हुआ अपितु इसकी हुंकार में इस्लाम का मार्ग रोकने की प्रबल अभीप्सा दिखायी पड़ती है। अद्वैतवाद के अनुसार निर्गुण ब्रह्म ही सर्वोच्च परमार्थ तत्व है। वह अद्वैत, निर्विशेष, चिन्मात्र तथा निरुपाधि है। इस प्रकार निर्गुण ब्रह्म ही पूर्ण एवं एकमात्र सत्य है। ब्रह्म निर्गुण है किंतु शून्य नहीं है। आत्मा और ब्रह्म दोनों में कोई अंतर नहीं है। जो कुछ जीव में है, वही जगत् में है।

    शंकर के मत को मायावाद भी कहा जाता है। शंकर के अनुसार माया ईश्वर की शक्ति है तथा व्यवहारिक है। शंकर द्वारा प्रतिपादित मत का सर्वाधिक खण्डन-मण्डन हुआ। इसमें श्रद्धा रखने वालों ने शंकर को आदि जगत् गुरु कहा तो इसका खण्डन करने वालों ने शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध तक कह डाला। दूसरे शब्दों में शंकराचार्य के अनुसार ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है।

    विशिष्टाद्वैतवाद-

    रामानुज का वेदांत दर्शन विशिष्टाद्वैत के नाम से प्रसिद्ध है। यह दर्शन श्री संप्रदाय भी कहलाता है। रामानुजाचार्य के अनुसार तीन परम् मूल तत्व- चित्, अचित् और ईश्वर हैं। ईश्वर तो प्रधान अंगी है तथा चित् और अचित् उसके दो विशेषण अथवा अंग हैं। इसलिये यह मत ‘विशिष्ट-अद्वैत वाद’ कहलाता है।

    शंकर के अद्वैतवाद के विरुद्ध, रामानुज ने ब्रह्म को जीव से भिन्न माना है परंतु साथ ही उन्होंने द्वैतवाद का खण्डन भी किया है। उनके अनुसार कारण रूप ब्रह्म से जीव जगत् अनन्य है। इस कारण इन दोनों में अभेद है। रामानुज के अनुसार जीव ब्रह्म का अंश है किंतु जीव ब्रह्म नहीं है क्योंकि यदि यह मान लिया जाये कि जीव ब्रह्म है तो जीव के समस्त दोष ब्रह्म पर भी लागू हो जाते हैं। इस कारण जीव और ब्रह्म में अभेद भी है और भेद भी है। इस भेद-अभेद की व्याख्या को रामानुज यहाँ पर आकर समाप्त करते हैं कि ब्रह्म और जीव का अभेद मुख्य है तथा भेद गौण। इस कारण ब्रह्म और जीव में अभेद है किंतु वह विशिष्ट प्रकार का अद्वैत है।

    द्वैतवाद-

    मध्वाचार्य ने शंकर के अद्वैत सिद्धांत का खण्डन करके द्वैतवाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया।

    द्वैताद्वैतवाद-

    निम्बार्क ने भी रामानुज की भांति ब्रह्म और जीव के बीच भेद और अभेद दोनों तरह का सम्बन्ध स्वीकार किया है। मध्वाचार्य भी रामानुज की भांति भेद और अभेद दोनों को ही वास्तविक माना है किंतु जहाँ निम्बार्क के लिये ब्रह्म और जीव के मध्य भेद और अभेद का स्तर एक ही है वहीं रामानुज के लिये अभेद प्रमुख है और भेद गौण।

    शुद्धाद्वैतवाद-

    इस मत के अनुसार ब्रह्म शुद्ध है तथा ब्रह्म में से जीव और जगत् उत्पन्न हुए हैं। इस कारण जीव भी शुद्ध है, जगत भी शुद्ध है और इसी कारण उनका अद्वैत भी शुद्ध है। इसी मान्यता के कारण इस मत को ‘शुद्ध-अद्वैत वाद’ कहते हैं। यह सिद्धांत मानता है कि ईश्वर, जीव तथा जगत में कोई अंतर नहीं है किंतु माया नामक शक्ति के कारण ब्रह्म, जीव और जगत् से भिन्न प्रतीत होता है। अर्थात् ब्रह्म भी सत्य है, जगत् भी सत्य है।

    श्री संप्रदाय के प्रवर्तक श्री रामानुजाचार्य-

    वि.सं. 1074 में दक्षिण भारत में श्रीरामानुजाचार्य का प्राकट्य हुआ। उन्होंने श्री वैष्णव संप्रदाय के विशिष्टाद्वैत मत की स्थापना की। वे भगवान् संकर्षण के अवतार माने जाते हैं। उनका संप्रदाय श्री संप्रदाय के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसमें विष्णु या नारायण की उपासना पर बल दिया गया। इस संप्रदाय में अनके अच्छे-अच्छे संत और महात्मा होते रहे।

    श्री रामानंदाचार्य-

    श्री रामानुजाचार्य की शिष्य परंपरा में विक्रम की चौदहवीं शताब्दी में श्री संप्रदाय के प्रधान आचार्य श्री राघवानंद हुए। राघवानंद, रामानंद को दीक्षा देकर निश्चिंत हुए। रामानंद ने इस मत के प्रमुख वैष्णव आचार्य हुए। भारत के मध्यकालीन इतिहास में रामानंद ऐसे अद्भुत संत हैं जो अपने समन्वयवादी दृष्टिकोण से समाज एवं राष्ट्र को नवीन दिशा देने में समर्थ हुए हैं। रामानंद ने देशव्यापी पर्यटन द्वारा अपने संप्रदाय का प्रचार किया। इनके दो ग्रंथ मिलते हैं- वैष्णव मताब्ज भास्कर तथा रामार्चन पद्धति।

    रामानुज का शिष्य होते हुए भी रामानंद ने अपनी उपासना पद्धति का विशिष्ट रूप रखा। इन्होंने उपासना के लिये बैकुंठ निवासी विष्णु का रूप न लेकर लोक में लीला करने वाले विष्णु के अवतार राम का आश्रय लिया। इनके इष्टदेव राम हुए तथा मूलमंत्र हुआ राम नाम।

    रामानंद का जीवन काल-

    रामानंदाचार्य के जीवन काल का सही निर्धारण अब तक नहीं किया जा सका है। हिन्दी साहित्य के विद्वानों ने रामानंद का काल 12वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध का माना है। दूसरी ओर उनके शिष्यों में कबीर, रैदास और नरहरि के नाम लिये जाते हैं। शिष्यों की नामावली को यदि सही माना जाये तो रामानंद का 12वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में होना सही नहीं है।

    यदि रामानंद 12वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुए तो कबीर, रैदास और नरहरि रामानंद की शिष्य परंपरा में तो हो सकते हैं किंतु रामानंद के स्वयं के शिष्य नहीं हो सकते। क्योंकि कबीर का समय वि. सं. 1455 (ई. 1398) माना जाता है। जबकि यह सर्वविदित मान्यता है कि रामानंद कबीर के गुरु थे और दोनों संत समकालीन थे।

    इसी प्रकार यदि नरहरि रामानंद के शिष्य थे तो भी रामानंद का जीवन 12वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में नहीं हो सकता। नरहरि गोस्वामी तुलसीदास के गुरु थे। तुलसीदास ने सं. 1631 (ई. 1574) में रामचरित मानस का लेखन आरंभ किया था तथा संवत् 1680 (ई. 1623) में शरीर का त्याग किया था। इस काल निर्धारण के आधार पर नरहरि रामानंद और तुलसीदास दोनों के समकालीन उसी अवस्था में हो सकते हैं जब रामानंद का जीवन काल 15वीं-16वीं शताब्दी ई. के मध्य माना जाये।

    इसी प्रकार रामानंद के अन्य शिष्य रैदास भी मीरां के गुरु माने जाते हैं। मीरां अकबर की समकालीन थीं इस प्रकार यह काल भी सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के लगभग आता है।

    गीता प्रेस गोरखपुर की मासिक पत्रिका ‘‘कल्याण’’ के संतवाणी अंक में रामानंदाचार्य के आविर्भाव का समय वि.सं. 1324 (ई. 1267) और अन्तर्धान होने का समय वि. सं. 1515 (ई. 1458) विनिर्दिष्ट किया गया है। इस काल गणना के अनुसार रामानंदजी की आयु 191 वर्ष बैठती है जो कि उचित प्रतीत नहीं होती। अतः विभिन्न साक्ष्यों का विवेचन करने के बाद निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि रामानंद 15वीं-16वीं शताब्दी ई. के मध्य विद्यमान थे।

    रामानंद का समन्वयवादी दृष्टिकोण-

    रामानंद ने उत्तरी भारत में रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत सिद्धांत का जोरों से प्रचार किया। उन्होंने विष्णु के सगुण और निर्गुण, दोनों रूपों की उपासना पर बल दिया। उनकी शिष्य परम्परा में राजा और रंक, ब्राह्मण और चर्मकार, सगुणवादी और निर्गुणवादी तथा स्त्री और पुरुष सभी प्रकार के व्यक्ति थे। ईश्वर कृपा के अधिकारी होने के सम्बन्ध में रामानंद स्वयं कहते हैं-

    सर्वे प्रपत्तेरधिकारिणः सदा। शक्ता अशक्ता अपि नित्यरंगिणः।

    अपेक्ष्यते तत्र कुलं बलं च नो न चापि कालो न हि शुद्धता च।


                                                  - वैष्णवमताब्जभास्कर 99

    अर्थात् भगवान के चरणों में अटूट अनुराग रखने वाले सभी लोग चाहे वे समर्थ हों या असमर्थ, भगवत् शरणागति के नित्य अधिकारी हैं। भगवत् शरणागति के लिये न तो श्रेष्ठ कुल की आवश्यकता है, न किसी प्रकार की शुद्धि ही अपेक्षित है। सब समय और शुचि अशुचि सभी अवस्थाओं में जीव उनकी शरण ग्रहण कर सकता है।

    दानं तपस्तीर्थनिषेवणं जपो न चात्स्यहिंसासदृशं सुपुण्यम्।

    हिंसामतस्तां परिवर्जयेज्जनः सुधर्मनिष्ठो दृढधर्मवृद्धये। 


                                             - वैष्णवमताब्जभास्कर 111

    अर्थात् दान, तप तीर्थ सेवन एवं मंत्र जाप, सभी उत्तम हैं किंतु इनमें से कोई भी अहिंसा के समान पुण्य दायक नहीं है। अतः सर्वश्रेष्ठ वैष्णव धर्म का पालन करने वाले मनुष्य को चाहिये कि वह अपने सुदृढ़ धर्म की वृद्धि के लिये सब प्रकार की हिंसा का परित्याग कर दे।

    भक्तापचार मासोढुं दयालुरपि स प्रभुः।

    न शक्तस्तेन युष्माभिः कर्त्तव्यो न च स क्कचित्।


                                - श्री रामानंद दिग्विजय 12/5

    अर्थात् यद्यपि प्रभु दयालु हैं, तथापि अपने भक्तों की अवहेलना को नहीं सह सकते। अतः तुम लोग कभी भी प्रभु भक्त का अपराध न करना।

    यद्यपि रामानंदाचार्य ने राम को ही अपना इष्ट देव घोषित किया किंतु उन्होंने श्री हरि नारायण विष्णु के बैकुण्ठ वासी स्वरूप की भी स्तुति की तथा उनके लौकिक अवतार दशरथ नंदन श्रीराम के साथ साथ देवकीनंदन श्रीकृष्ण की भी स्तुति करने में पूरा उत्साह दिखाया है। रामानंद का यही समन्ववादी दृष्टिकोण उनकी शिष्य परम्परा में दिखायी पड़ता है।

    रामानंद के शिष्य-

    रामानंदाचार्य के निम्नांकित 12 शिष्य कहे जाते हैं-

    अनतानन्द, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्मावती, नरहरि।

    पीपा, भगवानन्द, रैदासु, धना, सेन, सुरसरि की धरहरि।


    इन नामों को इस प्रकार से पढ़ा जा सकता है- अनंतानंद, कबीर, सुखानंद, सुरसुरानंद, पद्मावति, नरहरि, पीपा, भावानंद, रैदास, धन्ना, सेना तथा सुरसुरानंद की धर्मपत्नी।

    यदि शिष्यों की इस नामावली को ध्यान से देखा जाये तो इनमें से कबीर जुलाहे थे तथा कपड़ा बुनकर जीवन यापन करते थे। रैदास चर्मकार थे तथा जूतियां गांठकर जीवन यापन करते थे। पीपा राजा थे तथा गागरोन दुर्ग के स्वामी थे। नरहरिदास काशी की कुलीन परम्परा के सुंस्कृत ब्राह्मण थे तो सुरसुरानंद की पत्नी स्त्री थी। जिस संत के शिष्यों में राजा से लेकर चर्मकार तक अर्थात् समाज के सभी वर्गों के लोग हों उस संत की समन्वयवादी प्रवृत्ति का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

    रामानंदाचार्य के शिष्यों में से कबीर, नरहरि, पीपा तथा रैदास युग प्रवर्तक संत सिद्ध हुए जिन्होंने भारतीय मनीषा को झकझोर कर रख दिया। अपने शिष्यों पर गुरु के विशाल व्यक्तित्व की कितनी गहरी छाप रही होगी, इसका अनुमान इन शिष्यों द्वारा लिखे हुए पदों से लगाया जा सकता है। कबीर ने लिखा है-

    गुरु गोबिंद दोउ खड़े काके लागूं पाय।

    बलिहारी गुरु आपके गोबिंद दियो बताय।


    नरहरि स्वयं कवि नहीं थे। उन्होंने रामानंद से जो पाया था वह सब ब्याज सहित तुलसी को प्रदान कर दिया था। इसलिये नरहरि की वाणी तुलसी के रूप में प्रकट हुई मानी जा सकती है। तुलसी ने अपने गुरु नरहरि के लिये लिखा है- 

     बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि।

    महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर।


    तुलसी काव्य में अभिव्यक्त यह प्रगाढ़ गुरु-भक्ति, वस्तुतः संत नरहरि की अपने गुरु रामानंद के प्रति समर्पित गुरु-भक्ति की अभिव्यक्ति ही है। संत रैदास ने अपने गुरु की वंदना में लिखा है-

    साधो सतगुरु सब जग चेला।

    अबकै बिछुरे मिलन दुहेला।


    रामानंद के शिष्यों ने दो मार्ग पकड़े। इनमें से कबीर तो निर्गुणियों के तारणहार हो गये और नरहरि सगुणोपासकों की एकमात्र आशा। एक ही गुरु से ज्ञान पाकर उनके शिष्य इतने अंतर पर जा खड़े हुए और उन्होंने अपने-अपने मार्ग से संसार को जगाने का काम किया, यह एक आश्चर्य के ही समान है। सगुणोपासकों और निर्गुणोपासकों के भारी दार्शनिक अंतर के उपरांत भी रामानंद के शिष्य एक दूसरे के काफी निकट खड़े हैं।

    एक ओर तो निर्गुणिया कबीर अचानक सगुणोपासकों के आराध्य दशरथ नंदन को ही ईश्वर स्वीकार करते हुए कह उठते हैं-

    दशरथ सुत तिहुं लोक समाना।

    राम नाम का मरम है आना।


    तो दूसरी ओर सगुणोपासना की ध्वजा उठाने वाले तुलसी अचानक निर्गुणियों की वाणी बोलने लग जाते हैं-

    एक अनीह अरूप अनामा।

    अज सच्चिदानंद पर धामा।

    बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।

    कर बिनु करम करइ बिधि नाना।

    आनन रहित सकल रस भोगी।

    बिनु बानी बकता बड़ जोगी।

    तन बिनु परस नयन बिनु देखा।

    ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा।


    वस्तुतः रामानंद के भेदा भेद दर्शन को तुलसी के शब्द नयी वाणी देते हुए प्रतीत होते हैं, जब वे कहते हैं-

    सगुनहिं अगुनहिं नहिं कछु भेदा।

    गावहिं श्रुति पुरान बुध बेदा।


    संत कबीर-

    कबीर निर्गुणवादी तो थे ही किंतु अपने गुरु रामानंद के प्रभाव के कारण उन्होंने भगवान के सगुण उपाधियों वाले नामों का भी प्रयोग किया है। कबीर ने सिद्धों और नाथों की रहस्यमयी वाणी को जनोपयोगी वााणी में ढाल दिया। वाम मार्ग का निराकरण करके वैष्णव मत का प्रतिपादन करने में उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। एक स्थान पर वे कहते हैं-

    साखत बामन मत मिलो, वैष्णो मिलो चण्डाल।

    अंक माल दे भेंटिए ,  मानो मिले गोपाल।


    रामानंद द्वारा हिंसा के विरोध में मुखर किया गया स्वर कबीर की वाणी में इस प्रकार दिखायी देता है-

    बकरी पाती खात है तिनकी काढ़ी खाल।

    जे नर बकरी खात हैं तिनका कौन हवाल।


    संत नरहरि-

    संत नरहरि को शिष्य के रूप में प्राप्त करना, रामानंद की सबसे बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। नरहरि को रामानंदाचार्य से जो विराट व्यक्तित्व प्राप्त हुआ उसका संपूर्ण उपयोग तुलसीदास जैसे युग प्रवर्तक शिष्य को तैयार करने में हुआ। नरहरि सूकरखेत के रहने वाले थे। उनके जीवन चरित के सम्बन्ध में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं होती है किंतु गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में नरहरि को बारंबर स्मरण किया है और अगाध श्रद्धा के साथ स्मरण किया है।

    वस्तुतः रामानंद का विशाल दृष्टिकोण तुलसीदास की लेखनी के माध्यम से पूरे ठाठ बाट के साथ प्रकट हुआ। लोक कल्याण का जो चरम भाव तुलसी की लेखनी में प्रकट हुआ उसका वर्णन शब्दातीत है। वे लिखते हैं-

    कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें।

    तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।


    अर्थात् जो व्यक्ति सब के हित का साधन करता है उसे भला कैसे दुख हो सकता है ठीक उसी प्रकार जैसे पारस मणि के होने पर कोई निर्धन नहीं रह सकता। कहने का आशय ये कि तुलसी ने पर हित को पारस मणि के समान परिणाम देने वाला माना है।

    इतना ही नहीं रामानंद का समन्वयवादी दृष्टिकोण भी तुलसी की लेखनी में अपने चरम को प्राप्त कर गया है जब तुलसी, शिव और राम को एक दूसरे का स्वामी, एक दूसरे का सेवक और एक दूसरे का सखा घोषित करते हुए कहते हैं-

    ‘‘सेवक स्वामि सखा सिय पिय के।’’

    इसी प्रकार राम चरित मानस के बालकाण्ड में शिव, पार्वती से कहते हैं-

    जो नहिं करहिं राम गुन गाना।

    जीह सो दादुर जीह समाना।

    कुलिस कठोर निठुर सोई छाती।

    सुनि हरि चरित न जो हरषाती।


    दूसरी ओर रामचरित मानस के लंकाकाण्ड में राम, अपने मंत्रियों से कहते हैं-

    सिव द्रोही मम दास कहावा।

    सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।

    संकर बिमुख भगति चह मोरी।

    सो नारकी मूढ़ मति थोरी।


    उत्तर काण्ड में तो तुलसी के राम, अपने भक्तों को शिव भक्ति की प्रेरणा देने के लिये हाथ जोड़ते हुए दिखायी देते हैं-

    औरउ एक गुपुत मत सबहि कहऊँ कर जोरि।

    संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि।


    यह सब रामानंद की अद्भुत समन्वयवादी दृष्टि का ही प्रसाद है जो तुलसीदास, वैष्णव और शैव संप्रदायों में समन्वय स्थापित करने के लिये शिव और राम को एक दूसरे का आराध्य बताते हैं। यद्यपि शिव, विष्णु का ऐक्य कोई सर्वथा नवीन कल्पना नहीं थी तथापि बीज रूप से चले आ रहे इस दर्शन को रामानंद ने अध्यात्मिक जल से सींच कर प्रस्फटित किया।

    इसी प्रकार तुलसी ने शाक्तों को भी वैष्णव धर्म के निकट लाने के लिये पार्वती की स्तुति के माध्यम से नवीन भक्ति रस की वर्षा की। बालकाण्ड में वे जनक नंदिनी सीता के मुख से पार्वती की स्तुति इन शब्दों में करवाते हैं-

    नहिं तव आदि मध्य अवसाना।

    अमित प्रभाउ वेद नहिं जाना।

    भव भव विभव पराभव कारिनि।

    बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।

    सेवत तोहि सुलभ फल चारी।

    बर दायिनी पुरारि पिआरी।


    संत पीपा-

    संत पीपा पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में गागरोन के शासक थे। वे खीची चौहान थे। रामानंद की कृपा दृष्टि प्राप्त होने पर उन्होंने राजपाट त्याग दिया और संत बन गये। रामानंद ने हिंसा को सबसे बड़ा पाप और हर हालत में त्याज्य बताया। संत पीपा का यह अकेला दोहा ही न केवल पीपा के अपितु रामानंद के व्यक्तित्व को प्रकट करने में समर्थ है-

    जीव मारे जमर करे खाता करे बखान।

    पीपा यूं प्रत्यक्ष कहे, थाली में धके मसान।


    अर्थात् जो लोग जीव हत्या करते हैं और मांस का भक्षण करते समय उसके स्वाद का गुणगान करते हैं, पीपा को उनकी थाली में शमशान धधकता हुआ दिखाई देता है। वस्तुतः रामानंद न केवल वैष्णव संप्रदायों में समन्वयवादी दृष्टिकोण उत्पन्न करने वाले संत थे अपितु अपने शिष्यों में उन्होंने शैव, शाक्त और वैष्णव संप्रदायों को भी निकट लाने की अंतर्दृष्टि प्रदान की। उन्होंने हिंसा का जो प्रबल विरोध किया वह भारतीय जन मानस में गहराई तक पैठ गया।

    आज पूरे विश्व में भारत को अहिंसा का पुजारी कहकर सराहा जाता है, इसके पीछे रामानंदाचार्य और उनके शिष्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत के मध्य कालीन इतिहास में घटित हुए भक्ति आंदोलन में दशरथ नंदन राम का प्रबलता से प्रतिष्ठित होना भी रामानंद की ही देन मानी जा सकती है।

    रामानंद के शिष्य नरहरिदास का अकेला शिष्य तुलसीदास ही बैकुण्ठवासी विष्णु के लौकिक अवतार के रूप में राम को भारतीय मनीषा में जो स्थान दिला गया, वैसा उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है। वस्तुतः शंकराचार्य के बाद इतनी विशाल और व्यापक दृष्टि को लेकर आने वाले आचार्य रामानंद ही थे। उनके योगदान का वास्तविक मूल्यांकन किये जाने के लिये व्यापक शोध की आवश्यकता है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

  • भारतीय धर्म, "/> भारतीय धर्म, "> भारतीय धर्म, ">
    Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×