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  • मृत्यु और उसके बाद की संभावनाएं

     07.07.2019
     मृत्यु और उसके बाद की संभावनाएं

     मृत्यु और उसके बाद की संभावनाएं


    मृत्यु! एक ऐसा शब्द है जिससे प्रत्येक प्राणी का सामनाा एक न एक दिन होता ही है। यह शब्द अच्छों-अच्छों के हृदय में भय उत्पन्न कर देता है। बड़े-बड़े बलवान, धनवान, गुणवान, रूपवान और सामर्थ्यवान व्यक्ति मृत्यु के नाम से भय खाते हैं। यही कारण है कि अधिकतर लोग इस शब्द को भूले हुए ही रहना चाहते हैं। उसका स्मरण भी नहीं करना चाहते। सबको पता है कि मृत्यु होनी निश्चित है किंतु वे मानकर चलते हैं कि अभी वह बहुत दूर है।

    हम यह भी जानते हैं कि जब वह आयेगी तो बता कर नहीं आयेगी, अवांछित अतिथि की भांति बलपूर्वक अचानक ही आ धमकेगी किंतु हम यह भी मानते हैं कि वह अभी इसी क्षण तो नहीं आयेगी। बहुत से लोग मानते हैं कि जब वह आनी ही है और उस पर हमारा कोई वश नहीं है तो फिर उसका चिंतन क्यों? उस के बारे में सोच-सोच कर अपना वर्तमान क्यों खराब करें? इसके स्मरण से जीवन में कड़वाहट उत्पन्न होती है।

    सदियों और सहस्राब्दियों से मनुष्य की आकांक्षा रही है कि वह मृत्यु पर विजय प्राप्त करे। उसे अमरत्व की प्राप्ति हो। इसके लिये उसने कभी अमृत की कल्पना की तो कभी अमरत्व प्रदान करने वाले वरदानों की। कभी उसने न मरने वाले देवताओं की बात की तो कभी सशरीर स्वर्ग जाने वाले इंसानों की। संसार की लगभग समस्त सभ्यताएं अतीत में देवताओं तथा भूतों का अस्तित्व स्वीकारती हैं, स्वर्ग और नर्क का अस्तित्व स्वीकारती हैं, देवताओं के धरती पर आने और मनुष्यों के स्वर्ग तक जाने की बात स्वीकारती हैं किंतु वर्तमान में ऐसा कहीं देखने में नहीं आता।

    हर सम्यता में देवता का अर्थ है न मरने वाला अतीन्द्रिय व्यक्ति। भूत का अर्थ है ऐसी आकृति जो दिखायी तो देती है किंतु उसके पास शरीर नहीं है। स्वर्ग का अर्थ है कष्टों से रहित स्थान जो पुण्य कर्मों के संचय से प्राप्त होता है और नर्क का अर्थ है अशुभ कर्मों की सजा भुगतने के लिये प्राप्त होने वाला स्थान। संसार की समस्त सभ्यताएं पुनर्जन्म में विश्वास रखती हैं तथा बारम्बार ऐसे दावे भी किये जाते हैं।

    भारत जैसे आस्था प्रधान देश में ही नहीं अपितु अत्यंत आधुनिक माने जाने वाले देशों में भी मृतकों की शांति के लिये कुछ न कुछ क्रियाएं अवश्य की जाती हैं। वस्तुतः ये सब धारणाएं भी मृत्यु और उसके बाद की संभावनाओं पर केंद्रित हैं।

    मृत्यु क्या है?

    इस प्रश्न पर संसार के प्रत्येक देश में, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में तथा काल प्रवाह के प्रत्येक युग में निरंतर चिंतन किया जाता है कि मृत्यु क्या है?

    ऋषि, मुनि, दार्शनिक, चिंतक एवं उपदेशकों से लगाकर वैज्ञानिकों तक ने इस विषय पर कार्य किया है। बहुत से लोगों ने मृत्यु की परिभाषाऐं दी हैं, इसके लिये मानदण्ड निर्धारित किये हैं तथा नितांत भिन्न मान्यताएं स्थापित की हैं। सबसे पहले विज्ञान के स्तर पर मृत्यु पर विचार किया जाना उचित होगा। विज्ञान मानता है मृत्यु एक ऐसी जैव रासायनिक क्रिया है जो प्राणी के शरीर में कुछ निश्चित परिवर्तनों को लाती है। इन परिवर्तनों के कारण प्राणी के शरीर में कुछ ऐसे जैविक परिवर्तन हो जाते हैं जिन्हें वापस उलटा नहीं जा सकता। ये परिवर्तन भौतिक लक्षणों के रूप में प्रकट होते हैं। इन लक्षणों को ही हम मृत्यु कहते हैं।

    शरीर के जिन लक्षणों को देखकर प्राणी की मृत्यु होना मान लिया जाता है, उनमें प्रमुख हैं- शरीर का निश्चेष्ट हो जाना। आँख, नाक, कान, जीभ तथा त्वचा आदि इंद्रियांे का काम करना बंद कर देना, जिनके कारण आदमी न तो हिल-डुल सकता है, न देख सकता है, न सुन सकता है, न बोल सकता है, न सूंघ सकता है, न विचार कर सकता है। चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से ऐसा प्रमुखतः तीन कारणों से होता है। पहला कारण है- हृदय का बंद हो जाना। इस स्थिति में हृदय धड़कना बंद कर देता है, फैंफड़ों, मस्तिष्क तथा शरीर के अन्य अवयवों को रक्त संचार बंद हो जाता है। दूसरा कारण है- फैंफड़ों का काम करना बंद कर देना। इस स्थिति में फैंफड़े रक्त कोशिकाओं को ऑक्सीजन की आपूर्ति करना तथा शरीर में उत्पन्न हुई कार्बन डाई ऑक्साइड को बाहर निकालना बंद कर देते हैं। तीसरा कारण है- मस्तिष्क का बंद हो जाना। इस स्थिति में शरीर के संवेदना तंत्र पर नियंत्रण हट जाता है। शरीर में संवेदना ग्रहण करने की तथा प्रतिक्रिया व्यक्त करने की शक्ति समाप्त हो जाती है।

    यही कारण है कि चिकित्सक किसी भी व्यक्ति को मृत घोषित करने से पहले तीन चीजों की जांच करते हैं। पहली जांच श्वांस की होती है। यदि श्वांस रुकी हुई है तो दूसरी जांच नाड़ी की होती है। यदि नाड़ी में स्पंदन नहीं है तो तीसरी जांच हृदय की होती है। यदि वहाँ भी धड़कन नहीं है तो अंत में आँखों की जांच की जाती है। यदि आँखों की पुतलियां फैल गयी हैं तो आँखों में टॉर्च से प्रकाश की बौछार की जाती है। आँख शरीर का अत्यंत संवेदनशील अंग है। इतना संवेदनशील कि वह प्रकाश की चोट को भी सहन नहीं कर सकता है। यदि प्राणी के शरीर में प्राण हैं और यदि उसकी आँखों में प्रकाश की बौछार की जाती है तो इस बात की काफी संभावना होती है कि उसकी आँखों की पुतलियों में हलचल हो। यदि आँखों से भी जीवन के कोई चिह्न नहीं मिलते तो इसके बाद चिकित्सक प्राणी की मृत्यु हो जाने की घोषणा कर देते हैं।

    ऊपर हमने जिन लक्षणों की चर्चा की है वस्तुतः वे मृत्यु के कारण नहीं हैं, लक्षण हैं। मृत्यु के कारणों पर चिकित्सा विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, भौतिक विज्ञान अथवा विज्ञान की अन्य कोई शाखा यह नहीं बता पाई है कि आखिर मृत्यु के लक्षण प्रकट क्यों हुए। यदि यह कहा जाये कि शरीर के वृद्ध हो जाने पर मनुष्य की स्वाभाविक मृत्यु हो जाती है तो भी मृत्यु की सही परिभाषा प्राप्त नहीं होती। वृद्धावस्था स्वयं भी एक लक्षण ही है, कारण नहीं है। वृद्धावस्था की भी कोई निश्चित परिभाषा नहीं है न ही इसकी कोई सीमा है।

    बहुत से लोग चालीस वर्ष की आयु में भी वृद्धों की तरह व्यवहार करने लगते हैं और बहुत से लोग सत्तर-अस्स्सी साल में भी पूरी तरह स्वस्थ एवं सक्रिय दिखायी पड़ते हैं। यदि वृद्धावस्था मृत्यु का स्वाभाविक कारण है तो फिर कोई आदमी पचास-साठ साल की आयु में ही स्वाभाविक मृत्यु को क्यों प्राप्त हो जाता है? कोई आदमी एक सौ पैंतीस वर्ष या उससे अधिक आयु तक क्यों जा पहुँचता है?

    मृत्यु का क्रम

    अभी तक वैज्ञानिक यह निश्चित नहीं कर पाये हैं कि मृत्यु के समय हृदय की धड़कन का बंद होना, फैंफड़ों का बंद होना तथा मस्तिष्क का काम करना बंद कर देना, इन तीन घटनाओं में से पहली घटना कौनसी होती है तथा इनका क्रम क्या होता है।

    सामान्यतः चिकित्सकों का अनुभव है कि यदि इन तीनों घटनाओं में से कोई एक घटना घटित हो गयी है तो दूसरी तथा तीसरी घटना कुछ ही क्षणों में स्वतः ही घट जायेगी। चिकित्सकों के अनुसार इन तीनों घटनाओं में से पहले कोई भी घट सकती है, उनके घटित होने का कोई क्रम निर्धारित नहीं है। यह कहना सही नहीं होगा कि मृत्यु के पश्चात प्राणी की देह में कोई परिवर्तन होना संभव नहीं है। प्राणी की स्वाभाविक मृत्यु के बाद भी उसके शरीर में कुछ जैविक परिवर्तन देखे गये हैं। जैसे बालोें का बढ़ना, नाखूनों का बढ़ना, शरीर से अपान वायु का निःसरण होना तथा मुँह से झाग आना। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि शरीर के बाह्य एवं आंतरिक भागों में आये परिवर्तनों को मृत्यु का कारण नहीं माना जा सकता।

    विश्व में जितनी भी सभ्यतायें हुई हैं उनमें यह विश्वास रहा है कि मनुष्य केवल शरीर नहीं है, शरीर के भीतर कोई रहता है जो मनुष्य की देह के जन्म लेने, जीवित रहने अथवा मृत्यु को प्राप्त हो जाने के लिये जिम्मेदार है। हिन्दू इसे आत्मा कहकर पुकारते हैं। इसाईयों ने सोल और मुसमानों ने इसे रूह कहकर पुकारा है। इसी प्रकार रोमन, सुमेरियन, माया तथा सिंधु सभ्यताओं सहित जितनी भी सभ्यताएं अतीत में हो चुकी हैं, उन सबमें थोड़े बहुत अंतर से इस बात को स्वीकार किया गया है कि मृत्यु का कारण आत्मा का देह त्याग देना है।

    चिरंजीवी होने की परिकल्पना

    आत्मा देह क्यों त्यागती है? इस प्रश्न के उत्तर में एक शाश्वत नियम बताया जाता है कि जिसका जन्म हुआ है, वह मृत्यु को अवश्य प्राप्त होगा।

    यद्यपि भारत में हनुमान, जाम्बवान, परशुराम, अश्वत्थामा, आल्हा आदि सप्त चिरंजीवियों की मान्यता है। अर्थात् सात महापुरुष ऐसे हुए हैं जिनकी मृत्यु नहीं हुई। इनमें से हनुमानजी तथा जाम्बवान देवता हैं, साधारण मनुष्य नहीं हैं। परशुराम भी विष्णु के अवतार हैं। ये तीनों, बिना देह के रह सकते हैं और इच्छानुसार कभी भी देह धारण एवं देह त्याग कर सकते हैं। ये रामायण काल में थे तो महाभारत के काल में भी। अनेक पुण्यात्माओं ने हनुमानजी के दर्शन होने की बात कही है। हनुमानजी, जाम्बवान तथा परशुरामजी के अतिरिक्त जिन चार चिरंजीवियों की मान्यता है, उन्हें कभी भी किसी ने भी देखने का दावा नहीं किया है। अतः यह शाश्वत सत्य ही जान पड़ता है कि जिसने जन्म लिया है, वह देह त्याग अवश्य करेगा। यह बात अलग है कि हर देह की आयु एक जैसी नहीं है।

    भारतीय जनमानस अनेक तपस्वियों की सैंकड़ों- हजारों वर्षों की आयु 
    में विश्वास करता है किंतु बहुत कम लोगों ने इस बात का दावा किया है कि उन्होंने सैकड़ों या हजारों वर्ष की आयु के आदमी को स्वयं अपनी आंखों से देखा है।

    पुनर्जीवित होने की संकल्पना

    मृत्यु हो जाने के कुछ समय बाद पुनः जीवित हो उठने की कुछ घटनायें यदा-कदा घटती रहती हैं। इसी प्रकार मृत्यु हो जाने के बाद किसी अन्य देह को धारण करके पिछले जन्म की घटनाओं की स्मृति शेष रहने के दावे भी किये जाते हैं। हमारा अनुभव बताता है कि इनमें से अधिकांश घटनायें सही होती हैं। 

    पहले वाली स्थिति का कारण अक्सर यह बताया जाता है कि यमदूत ले जाने तो किसी और को आये थे किंतु ले गये किसी और को। अतः गलती का पता चलते ही वे जीवात्मा को फिर से पुरानी देह में लौटा जाते हैं। यह अनुमान लगाना सहज ही है कि कभी-कभी ऐसा भी होता होगा कि जब तक यमदूतों को अपनी गलती का पता चले, मृतक के शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया जाये और जीवात्मा बिना देह का ही रह जाये। दूसरी स्थिति में जीवात्मा स्वाभाविक अथवा अस्वाभाविक मृत्यु के बाद उसी क्षेत्र में कहीं जन्म ले लेता है तथा किन्हीं अज्ञात एवं अतिविशिष्ट परिस्थितियों में जीवात्मा को नयी देह प्राप्त होने पर भी उसे पुरानी देह की स्मृति बनी रहती है। देखने में आया है कि ऐसा प्रायः अस्वाभाविक मृत्यु के मामले में होता है।

    विज्ञान के शब्दों में मृत्यु की परिभाषा चाहे जो हो किंतु यह निश्चित है कि विज्ञान मनुष्य की मृत्यु के बाद की कोई बात नहीं करता। विज्ञान की दृष्टि में देह मर जाती है और उसकी मृत्यु के कारण भी भौतिक हैं। विज्ञान के अनुसार देह बीमार होने, वृद्ध होेने अथवा दुर्घटनाग्रस्त हो जाने के कारण मृत्यु को प्राप्त होती है। आुधनिक विज्ञान की धारणा के विपरीत, भारतीय अध्यात्म, मृत्यु को केवल जीवात्मा का देहांतरण मानता है। जैसे मनुष्य भौतिक जीवन में एक घर छोड़कर दूसरे घर में चला जाता है, या पुराना वस्त्र त्यागकर नया वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही मृत्यु की स्थिति में जीवात्मा पुरानी देह को त्याग कर नयी देह में चला जाता है।

    मृत्यु की इस परिभाषा से यह स्वतः स्पष्ट है कि जीवन, जीवात्मा तथा देह के सम्बन्ध से उत्पन्न होता है और इनके विलग होने पर मृत्यु जैसी घटना घटित होती है। इस परिभाषा से यह संभावना बनती है कि जीवात्मा और देह के विलग होने के बाद देह भले ही कार्य करना बंद कर दे किंतु जीवात्मा समाप्त नहीं होता। वह देह के बाद भी कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में बना रहता है।

    राम चरित मानस में प्रसंग आता है कि बाली वध के बाद जब तारा विलाप करने लगती है तब भगवान श्रीराम उसे समझाते हैं कि यह पांच तत्वों से बनी हुई देह तो नश्वर है। इसके भीतर जो आत्मा रहती थी वह नाश को प्राप्त नहीं होती। तुम्हें किससे काम है, इस नाशवान देह से जो तुम्हारे सामने पड़ी हुई है या उस अनश्वर आत्मा से जो तुम्हें दिखायी नहीं देता!

    मृत्यु के बाद का जीवन

    जिस क्षण यह अनश्वर आत्मा अर्थात् जीवात्मा देह छोड़ देता है, उसी क्षण से मृत्यु के बाद की संभावनाएं आरंभ हो जाती हैं। भारतीय अध्यात्म और दर्शन देह त्याग के बाद के जीवन की भांति-भांति की संभावनाओं को व्यक्त करते हैं। रामकथा में यह प्रसंग आता है कि जब भगवान शरभंग ऋषि के आश्रम पहुंचते हैं तो शरभंग ऋषि भगवान से कहते हैं कि मैं तो ब्रह्माजी के पास जा रहा था किंतु जब मैंने सुना कि आप आ रहे हैं तो मैं आपके दर्शनों के लिये रुक गया। इसके बाद शरभंग ऋषि योगानल से देह को भस्म कर देते हैं और जीवात्मा उसी समय तेज पुंज के रूप में बदल कर ऊर्ध्वगामी हो जाता है।

    राम चरित मानस में यह प्रसंग भी आता है कि जब दशानन रावण ने जटायु को बुरी तरह घायल कर दिया और भगवान श्रीराम, सीताजी को खोजते हुए जटायु तक पहंुचे तब जटायु ने भगवान राम के अंक में देह त्याग किया। देह त्यागने के तुरंत पश्चात् महात्मा जटायु ने चार भुजा धारी विष्णु रूप में प्रकट होकर भगवान की स्तुति की।

    जीवात्मा का कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में बने रहना ही मृत्यु के बाद का जीवन है। आदि काल से धरती के विभिन्न भागों में विकसित हुई सभ्यताओं की यह मान्यता रही है कि मृत्यु के बाद सब कुछ समाप्त नहीं हो जाता। किसी एक स्थान से जीवात्माएं आती हैं और फिर कुछ काल के लिये कहीं चली जाती हैं।

    जीवात्मा की शांति

    धरती से चली गयी जीवात्माओं के कल्याण की कामना से धरती के निवासी पिण्डदान और श्राद्ध जैसी क्रियाएँ करते हैं। महाभारत में भगवान वेदव्यासजी ने लिखा है कि महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद पाण्डवों ने राजा धृतराष्ट्र तथा अपने कुल के अन्य व्यक्तियों को साथ लेकर कौरव वंश के जो वीर युद्ध में हताहत हुए थे, उनका श्राद्ध किया। इसी प्रकार ऋषि वाल्मीकि लिखते हैं कि जब चित्रकूट में भगवान श्रीराम को अपने पिता के स्वर्गारोहण की सूचना मिली तो उन्होंने तीर्थ के जल से पिता का श्राद्ध किया।

    अधिकांश मनुष्यों का विश्वास है कि मृत व्यक्तियों के नाम से धरती पर किया गया दान पुण्य उन जीवात्माओं को तब तक प्राप्त होता है जब तक कि उनका अंतिम रूप से मोक्ष न हो जाये, चाहे वे जीवात्माएं जिस किसी लोक में हों, जिस किसी अवस्था में हों। राम चरित मानस में ही प्रसंग आता है कि जब भगवान राम ने दशानन रावण का वध कर दिया तब सारे देव गण भगवान की स्तुति के लिये आये, उनमें राजा दशरथ भी थे। अर्थात् देह त्याग के बाद भी दशरथजी की जीवात्मा किसी देवलोक में अपनी पुरानी स्मृति की अवस्था में ही बनी रही।

    इस प्रकार हमारे धार्मिक ग्रंथों के सारे दृष्टांत देह त्याग के बाद के जीवन की विभिन्न प्रकार की संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं।

    निश्चित है मृत्यु का समय

    भारतीय सभ्यता सहित संसार की अधिकांश सभ्यताओं की यह मान्यता भी रही है कि प्रत्येक मनुष्य को गिनी हुई साँसें मिलती हैं। जब साँसों की संख्या पूरी हो जाती है तो मानव साँस लेना बंद कर देता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। भारतीय ज्योतिष विज्ञान तो यहाँ तक मान्यता रखता है कि जीवात्मा के धरती लोक पर देह धारण करने और देह त्याग करने का समय निश्चित है, और इस समय से जीवात्मा के धरती पर आने या जाने के बाद का जीवन प्रभावित होता है।

    भारतीय अध्यात्म के अनुसार मृत्यु के बाद का जीवन एक जैसा नहीं है। उसके कई रूप होते हैं। मृत्यु के बाद मिलने वाले अगले जीवन की नींव इस जीवन के कर्मों, मृत्यु की परिस्थितियों, मृत्यु के समय मस्तिष्क में आये विचारों तथा और भी बहुत सारे कारकों पर भी निर्भर करती है।

    शवों को सुरक्षित रखने की परम्परा

    भारतीय सभ्यता के अतिरिक्त भी, संसार में वर्तमान तथा अतीत में हो चुकी अनेकानेक सभ्यताएं मृत्यु के बाद के जीवन की कई तरह की संभावनाओं में विश्वास रखती आयी हैं।

    मिश्र वासियों द्वारा ममी बनाकर मृतक की देह को सुरक्षित रखने के विचार के पीछे यही एक धारणा छिपी हुई है कि हो न हो एक दिन आत्मा इस देह में वापस लौटे। इसलिये वे न केवल समाज के प्रमुख व्यक्तियों की देह को ममी के रूप में सुरक्षित रखते थे, अपितु मृतक व्यक्तियों के शवों के साथ जीवनोपयोगी सामग्री भी रखते थे। ताकि यदि किसी दिन आत्मा इस देह में लौटे तो उसे अपनी आवश्यकता की वस्तुएं तत्काल प्राप्त हो सकें। मिश्रवासी, राजा अथवा राजपरिवार के सदस्यों की ममियों के ताबूतों के साथ तो जीवित दास दासियों को भी कब्र में गाढ़ देते थे।

    इस्लाम का मानना है कि मृत्यु के बाद मनुष्य कब्र में सो जाते हैं। जब कयामत का दिन आता है तो सृष्टिकर्ता एक-एक मनुष्य को कब्र से उठाता है तथा उसके कर्माें का लेखा जोखा करता है और उन्हें उसी के अनुसार दण्ड अथवा पुरस्कार मिलता है।

    ईसाइयों में तो मृत्यु के बाद के जीवन की संभावनाओं पर सर्वाधिक विश्वास किया जाता है। बहुत से पाश्चात्य देशों में धनी व्यक्तियों ने लाखों करोड़ों डॉलर ऐसी कम्पनियों को फीस के रूप में चुकाये हैं जो उन धनी व्यक्तियों की मृत्यु के बाद उनकी देह को रासायनिक पदार्थों में तब तक सुरक्षित रख सके, जब तक कि विज्ञान एक दिन मरे हुए व्यक्तियों को पुनजीर्वित करने की विद्या की खोज करके उन्हें भी फिर से जीवित न कर दे।

    श्रीलंका में हुई पुरातत्व खोजों से यह तत्व सामने आया है कि किसी दुर्गम गुफा में रावण की देह को भी ममी बनाकर रखा हुआ है। हालांकि यह पुष्टि नहीं हो सकी है कि दुर्गम गुफा के भीतर रखे ताबूत मेें कोई शव या ममी है भी या नहीं! अथवा यदि है भी तो शव या ममी किस की है!

    तिब्बत देश की सीमा में स्थित दुर्गम हिमालय क्षेत्र में कुछ ऐसी रहस्यमय गुफाएं मिली हैं जिनमें आज के स्त्री पुरुषों से लगभग डेढ़ गुना लम्बे स्त्री पुरुषों के हजारों साल पुराने शव रखे हुए हैं। ये शव देवताओं के बताये जाते हैं। ये शव किसी रहस्यमय लेप से सुरक्षित हैं क्योंकि वे ममी के रूप में नहीं हैं, शव के रूप में हैं। अनुमान यही होता है कि ये शव भी इसी आशा में सुरक्षित रखे गये हैं कि एक दिन ऐसा आयेगा जब ये शव जीवित हो उठेंगे।

    संसार के अन्य हिस्सों से भी मनुष्य जाति द्वारा इस प्रकार से सुरक्षित रखे गये शव या ममी मिल सकते हैं किंतु अब तक जितने भी उदाहरण ऊपर दिये गये हैं ये केवल सामाजिक एवं धार्मिक मान्यताएं हैं, इनमें से एक भी उदाहरण आज तक देखने मंे नहीं आया है कि कोई शव या ममी फिर से जीवित हुई हो किंतु विज्ञान के बल पर या किसी अन्य शक्ति के बल पर भविष्य में किसी शव या ममी को फिर से जीवित करना संभव हो जाये, इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

    तिब्बत, श्रीलंका, भारत तथा मिश्र सहित दुनिया की अनेकानेक सभ्यताओं में मृतकों के कंकाल अथवा उनकी देह की ममियां सुरक्षित रखी गयी हैं। एशिया के अतिरिक्त यूरोप और अमरीका में आधुनिक काल में कुछ अति धनाढ्य व्यक्तियों ने अपने शरीर रासायनिक लेपों से सुरक्षित करवाये हैं ताकि जब भी विज्ञान मृत्यु पर विजय प्राप्त करने में सफल हो जाये तो उनके मृत शरीरों में भी फिर से प्राण फूंके जायें।

    क्या शरीर के आकार के आधार पर आत्मा का आकार निश्चित होता है?

    भारत के उत्तरांचल की पहाड़ियों से एक विशालाकाय कंकाल प्राप्त हुआ है। यह इतना विशाल है कि आज का आदमी तो इसकी खोपड़ी से भी छोटा है। कई व्यक्ति मिलकर भी इस कंकाल को हिला तक नहीं सकते। यहां तक कि इसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक ढोने के लिये विशाल हवाई जहाज की आवश्यकता पड़ेगी। जिस स्थान पर यह कंकाल मिला है, वहां के लोगों की मान्यता है कि यह महाभारत कालीन घटोत्कच का कंकाल है। घटोत्कच कर्ण के हाथों युद्ध के दौरान ही मारा गया था। उसकी मृत्यु पर पाण्डवों के परम हितैषी श्रीकृष्ण ने युद्ध के मैदान में ही हर्ष से नृत्य किया था क्योंकि घटोत्कच के मरने से कर्ण के पास उपलब्ध वह शक्ति नष्ट हो गयी थी जो उसने अर्जुन को मारने के लिये सुरक्षित रख छोड़ी थी। यदि कर्ण उस शक्ति से घटोत्कच को नहीं मारता तो घटोत्चक अकेला ही कौरवों के लिये इतना भारी पड़ता कि इससे पहले कि कर्ण अर्जुन के प्राण ले, घटोत्कच ही कर्ण सहित कौरव पक्ष के समस्त लोगों का संहार कर डालता।

    महाभारत के वर्णन के अनुसार घटोत्कच इतना विशाल था कि उसकी आवाज से समुद्र, पर्वत और वनों के साथ सारी पृथ्वी डगमगाती थी और आकाश के साथ दिशाएं गूंजने लगती थीं। जब उसका शरीर पृथ्वी पर गिरा तो उसके विशाल शरीर के नीचे दब कर कौरवों की एक अक्षौहिणी सेना नष्ट हो गयी। यह तो निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि उत्तरांचल में मिला कंकाल घटोत्कच का ही है। हो सकता है उसी का हो, किंतु जब तक आधुनिक मानव सभ्यता ने उत्तरांचल में मिले कंकाल को अपनी आंखों से देख नहीं लिया तब तक कोई विश्वास नहीं कर पाया था कि क्या कभी धरती पर इतने बड़े इंसान भी होते थे!

    तो क्या पूर्व के विशाल देह के आदमियों में और आज के छोटे शरीर वाले आदमियों की देह में निवास करने वाली आत्मा एक ही थी! या जिस प्रकार एक कोषीय जीवों, वनस्पतियों, पशु-पक्षियों एवं मानवों में चेतना के स्तर के आधार पर उन्हें अलग-अलग कलाओं का जीव माना गया है, उसी प्रकार इन विशालाकाय देहधारी इंसानों में भी सामान्य मनुष्य से विलग किसी अन्य कला की शक्ति वाली आत्मा निवास करती थी!

    यदि मृत्यु के बाद आत्माओं के पुनर्जन्म के सिद्धांत पर अडिग रहा जाये तो इन विशाल देह वाले इंसानों की आत्माएं कहां गयीं। क्या उन्होंने एक समय के बाद पुनर्जन्म लेना बंद कर दिया! या फिर उनका पुनर्जन्म भी सामान्य देह वाले इंसानों में होने लगा! यहां हम यह स्पष्ट कर देना आवश्यक समझेंगे कि भारतीय अध्यात्म में चींटी से लेकर हाथी और मनुष्य तक में एक ही आत्मा का निवास माना गया है।

    आत्माएं अलग-अलग तरह की नहीं होतीं। कर्मफल के सिद्धांत के अनुसार वे अलग-अलग कर्मफलों के संस्कारों से संस्कारित होती हैं। यद्यपि दर्शन और अध्यात्म मानव सभ्यता के इतिहास जितने ही पुराने हैं तथा आधुनिक विज्ञान की आयु अभी कुछ सौ वर्ष ही हुई है, तथापि विज्ञान ने जो भी उन्नति की है, उसके उपरांत भी आज तक दर्शन तथा विज्ञान के बीच चौड़ी खायी है।

    इस कारण एक दर्शन और अध्यात्म के बहुत से सिद्धांतों की पुष्टि आज भी विज्ञान के माध्यम से संभव नहीं है। फिर भी जैसे-जैसे समय व्यतीत होता जायेगा, वैसे-वैसे दर्शन तथा विज्ञान परस्पर निकट आते जायेंगे। लेखक की मान्यता है कि दुनिया भर का सारा दर्शन उस विज्ञान से परास्त हो जायेगा किंतु आने वाले समय का विज्ञान भारतीय दर्शन और अध्यात्म की पुष्टि करेगा। तभी यह कह पाना संभव हो पायेगा कि मृत्यु के बाद का जीवन किस तरह का है तथा विज्ञान उसे किस भांति परिभाषित कर पाता है।

    भारतीय दर्शन में मृत्यु के बाद के सम्बन्ध में की गयी समस्त चर्चाएं सत्य हैं। निःसंदेह मृत्यु के बाद जीवन है, उसके विविध रूप हैं तथा विज्ञान से परे हटकर आज भी समाज में उसकी झलक किसी न किसी रूप में यत्र-तत्र दिखायी देती रहती है।

    जीवों के क्लोन में जीवात्मा कहां से आता है ?

    विज्ञान तेजी से क्लोनिंग, जीन कल्चर और ह्यूमन ग्राफ्टिंग की तरफ बढ़ रहा है। क्लोनिंग का अर्थ है ठीक एक जैसे दो शरीर तैयार करना। जीन कल्चर का अर्थ है किसी मृत व्यक्ति के शव के किसी हिस्से में सुरक्षित रखे हुए डीएनए से मृतक व्यक्ति के गुणों वाला व्यक्ति तैयार कर देना तथा ह्यूमन ग्राफ्टिंग का अर्थ है किसी जीवित व्यक्ति के शरीर के जीन लेकर उनसे ठीक वैसे ही एक और व्यक्ति तैयार कर देना जैसे कि पेड़ पौधों में किया जाता है। भेड़ों, कुत्तों तथा चूहों आदि जीवों के क्लोन तैयार कर लिये गये हैं कुछ वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने अज्ञात स्थानों पर आदमी के क्लोन तैयार कर लिये हैं तथा वे जीवित भी हैं।

    यदि ये तथ्य सही हैं तो जीवात्मा के देह में आने और निरंतर देह बदलते रहने के सिद्धांत पर बड़ा प्रश्न चिह्न लग जायेगा। हमें हजारों वर्षों से चली आ रही इन मान्याताओं को नये सिरे से व्याख्यायित करना होगा। क्योंकि जीन विज्ञान की प्रगति का सिलसिला कहीं रुकने वाला नहीं। यदि ह्यूमन क्लोनिंग सफल हो गयी तो एक दिन वैज्ञानिक जो क्लोन तैयार करेंगे उसमें से वे मृत्यु के जीन निकाल फेंकेंगे।


    - मोहनलाल गुप्ता,

    63, सरदार क्लब योजना,

    वायुसेना क्षेत्र जोधपुर

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