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  • क्या भगवान शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था?

     23.09.2018
    क्या भगवान शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था?

    क्या भगवान शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था?


    भारतीय जनमानस में यह प्रबल धारणा है कि आदि जगद्गुरु भगवान शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था। क्या परकाया प्रवेश संभव है? क्या आज तक किसी ने भी परकाया प्रवेश किया है? क्या भगवान शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था? इन प्रश्नों के जवाब देश, काल और पात्र के अनुसार अलग-अलग प्राप्त होते हैं।

    श्रद्धा, तर्क, बुद्धि, मन, अनुभव, भक्ति, चित्तवृत्ति एवं अहंकार के कारण इन प्रश्नों के जवाब बदल जाते हैं। कुछ लोग इसे आंखों देखे सत्य की तरह बताएंगे तो कुछ इसे पाखण्ड बताने में भी संकोच नहीं करेंगे।

    शंकराचार्य के साथ हुई परकाया प्रवेश की घटना का इतिहास लगभग हर भारतीय जानता है। जब वे बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को खोखला सिद्ध करने और वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना करने में लगे थे तब उन्होंने अद्वैतवाद के दर्शन का प्रतिपादन किया। इस सिद्धांत के अनुसार ईश्वर और जीव एक ही हैं, ये दो नहीं हैं। ईश्वर ही जीव बनता है और जीव पुनः ईश्वर में लौट जाता है। अर्थात् जीव का क्षरण नहीं होता केवल रूपांतरण होता है। यह सिद्धांत एकोअ्हम् द्वितीयो नास्ति के मूल सिद्धांत पर खड़ा है। वे भारत भर में घूम-घूम इन सिद्धांतों का प्रचार कर रहे थे तथा मनुष्य मात्र को संदेश दे रहे थे कि आप स्वयं ईश्वर ही हैं अतः अपनी आत्मा को ऊपर उठाने का प्रयास 
    करें। इसी में जीवन की सार्थकता है। 

    जब शंकराचार्य ने काशी के समस्त विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया तब वे मिथिला की ओर गए जहां उन दिनों मण्डन मिश्र की बहुत ख्याति थी। उन्होंने मण्डन मिश्र को शास्त्रार्थ करने की चुनौती दी। मण्डन की पत्नी भारती अत्यंत विदुषी स्त्री थी। मण्डन और शंकर के बीच हुए शास्त्रार्थ की निर्णायक भारती को ही बनाया गया। क्योंकि उस स्तर का अन्य कोई विद्वान वहां उपलब्ध नहीं था। कई दिनों तक हुए शास्त्रार्थ के बाद शंकराचार्य ने मण्डन मिश्र को परास्त कर दिया।

    यह देखकर मण्डन मिश्र की पत्नी भारती को बहुत दुःख हुआ। अतः उसने शंकर से कहा कि मैं अपने पति का आधा शरीर हूँ। इसलिए आप मुझसे भी शास्त्रार्थ करें। कई दिनों तक शंकराचार्य को सुनने के कारण भारती, शंकराचार्य के ज्ञान की सीमाओं को पहचान गई थीं। अतः उन्होंने शंकराचार्य से कहा कि वे कामशास्त्र पर शास्त्रार्थ करेंगी।

    शंकराचार्य ने भारती की चुनौती तो स्वीकार कर ली किंतु उन्होंने भारती से कहा कि मैं आदि ब्रह्मचारी हूं। मुझे कामशास्त्र का कोई ज्ञान नहीं है। अतः मुझे छः माह की अनुमति दें ताकि मैं इस शास्त्र का अध्ययन करके स्वयं को शास्त्रार्थ के योग्य बना सकूं। भारती ने शंकर को छः माह की अनुमति दे दी।

    शंकरचार्य ने काम का ज्ञान प्राप्त करने की अनुमति तो ले ली किंतु उन्हें योग्य गुरु मिलना संभव नहीं था। इसलिए उन्होंने परकाया प्रवेश करके स्वयं इसका अनुभव करने का निश्चय किया।

    शंकराचार्य को ज्ञात हुआ कि एक राजा की युवा अवस्था में ही मृत्यु हो गई है। शंकराचार्य ने उस राजा के शरीर में प्रवेश करने का निर्णय लिया। शंकर ने एक गोपनीय स्थान पर अपने शिष्यों के संरक्षण में अपनी देह का त्याग किया तथा अपने शरीर की देखभाल करने का निर्देश देकर स्वयं अपने सूक्ष्म शरीर के साथ राजा के मृत शरीर में प्रवेश कर गए।

    लोगों ने समझा कि राजा पुनर्जीवित हो गया है। इस प्रकार राजा की देह में रहकर शंकर ने कामकला का रहस्य ज्ञात किया तथा छः माह बाद राजा का शरीर छोड़कर पुनः अपनी देह में प्रवेश कर गए। इस बार उन्होंने देवी भारती को कामशास्त्र में परास्त कर दिया। मण्डन तथा भारती ने शंकराचार्य का शिष्यत्व ग्रहण किया तथा वे भी वैदिक धर्म तथा अद्वैत सिद्धांत के प्रचार में लग गए और इनके माध्यम से मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति का उपदेश करने लगे।

    यह एक बहुश्रुत कथा है किंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या वास्तव में शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था? क्या ऐसा किया जाना संभव है? परकाया प्रवेश का अर्थ है- मनुष्य के किसी अंश का एक शरीर में से निकल कर दूसरे शरीर में प्रवेश करना। इस अंश को सूक्ष्म शरीर कहते हैं। सूक्ष्म शरीर के भीतर जीवात्मा निवास करता है।

    यदि परकाया प्रवेश की प्रक्रिया संभव है तो इस प्रक्रिया के दौरान मनुष्य की एक अवस्था ऐसी अवश्य आएगी जब वह बिना स्थूल शरीर वाले, अर्थात् सूक्ष्म शरीर वाले अस्तित्व में आएगा। यदि ऐसा किया जाना संभव है, तभी परकाया प्रवेश भी संभव है, अन्यथा नहीं। भारत सहित विश्व भर की संस्कृतियों में बिना शरीर वाली आत्माओं के बारे में विश्वास किया जाता है। हिन्दू उन्हें भूत-प्रेत कहते हैं, ईसाई उन्हें घोस्ट एवं स्पिरिट कहते हैं और मुसलमान उन्हें जिन्न एवं परी कहते हैं।

    सूक्ष्म शरीर धारी जीवात्मा तथा बिना शरीर वाले भूत, प्रेत में अंतर है। विभिन्न संस्कृतियों में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार ये सभी परकाया प्रवेश कर सकते हैं किंतु इस प्रक्रिया एवं परिणाम दोनों में बहुत अंतर है। जीवित व्यक्ति यदि परकाया प्रवेश करता है तो उसे अपना स्थूल शरीर त्यागकर, अर्थात् सूक्ष्म शरीर के माध्यम से किसी अन्य काया में प्रवेश करना होता है। सूक्ष्म शरीर में भार नहीं होता किंतु उसमें रंग-रूप आकृति अत्यंत सूक्ष्म रूप से विद्यमान होते हैं जिन्हें साधारण मनुष्य की आंखों से नहीं देखा जा सकता। यह प्रायः मनुष्य के अंगूठे के आकार का होता है। जबकि भूत-प्रेत आदि के पास न तो स्थूल शरीर होता है और न सूक्ष्म शरीर ही। इसीलिए उन्हें ऊपरी-हवा भी कहा जाता है। वे अपने होने का अहसास करवाते हैं, उनके पास भौतिक रंग, रूप, शरीर, आकृति, भार जैसी चीजें नहीं होतीं। अतः मनुष्य इन अस्तित्वों को नहीं देख सकते। कई बार भूत-प्रेत अपने आसपास से बहुत थोड़ी मात्रा में भौतिक पदार्थ ग्रहण करके रंग-रूप एवं आकृति का अहसास करवाते हैं किंतु यह रंग-रूप और आकृति वास्तविक नहीं होते। परकाया प्रवेश की घटना को समझने के लिए सूक्ष्म शरीर तथा भूत-प्रेत का अंतर समझना चाहिए।

    शंकराचार्य भूत-प्रेत नहीं थे, उन्होंने परकाया प्रवेश के लिए स्थूल शरीर का त्याग करके, सूक्ष्म शरीर के माध्यम से दूसरे स्थूल शरीर में प्रवेश किया था। परकाया प्रवेश से पहले आदमी को सूक्ष्म शरीर की अवस्था में आना पड़ता है न कि भूत-प्रेत की। अतः कहा जा सकता है कि परकाया प्रवेश किसी साधना या सिद्धि का परिणाम है जबकि मनुष्य शरीर में भूत-प्रेत का प्रवेश किसी दुर्घटना या आधिभौतिक बाधा का परिणाम है।

    प्राचीन भारतीय ग्रंथ, परकाया प्रवेश की घटनाओं का उल्लेख करते हैं। महाभारत के ‘अनुशासन पर्व’ में आई एक कथा के अनुसार एक बार इन्द्र किसी कारण, ऋषि देवशर्मा से कुपित हो गया। इन्द्र ने ऋषि की पत्नी से बदला लेने का निश्चय किया। देवशर्मा का शिष्य ‘विपुल’ योग साधनाओं में निष्णात था। उसे योग दृष्टि से ज्ञात हो गया कि मायावी इन्द्र, गुरु-पत्नी से बदला लेने वाला है। ‘विपुल’ ने सूक्ष्म शरीर से गुरु-पत्नी के शरीर में प्रवेश करके उसे इन्द्र से बचाया।

    महाभारत के शान्ति पर्व में वर्णन है कि सुलभा नामक विदुषी अपने योगबल की शक्ति से राजा जनक के शरीर में प्रविष्ट कर विद्वानों से शास्त्रार्थ करने लगी थी। उन दिनों राजा जनक का व्यवहार भी स्वाभाविक नहीं था।

    योग वसिष्ठ नामक ग्रंथ में महर्षि वसिष्ठ अपने शिष्य श्रीराम को परकाया प्रवेश की विधि समझाते हुए कहते हैं कि हे राम! जिस तरह वायु पुष्पों से गंध ख्रींचकर उसका सम्बन्ध घ्राणेन्द्रिय से करा देती है, उसी तरह योगी रेचक के अभ्यास रूप योग से कुंडलिनी रूपी घर से बाहर निकलकर दूसरे शरीर में जीव का सम्बन्ध कराते हैं।

    ‘पातंजलि योग दर्शन’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में अनेकों शरीर धारण, परकाया प्रवेश जैसी अनेक योग विभूतियों का वर्णन है।

    मरने के बाद सूक्ष्म शरीर जब स्थूल शरीर को छोड़कर गमन करता है तो उसके कर्म भी गमन करते हैं जो उसके अगले जन्म का निर्धारण करते हैं। कई बार मनुष्य के शरीर पर पिछले जन्म की घटनाओं के निशान दिखाई देते हैं। जैसे तिल, मस्सा, गोली का निशान, चाकू का निशान, आचार-विचार, संस्कार आदि।

    मृत्यु के समय भौतिक देह में से निकल कर जाने वाले सूक्ष्म शरीर को यदि कोई मनुष्य, मृत्यु से पहले ही जाग्रत कर भौतिक शरीर से अलग करने में सफल हो जाए तो वह परकाया प्रवेश की शक्ति को प्राप्त कर सकता है। यह तभी संभव है जब कोई व्यक्ति अपने शरीर, मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार पर अधिकार कर ले। इन चीजों पर कई प्रकार से नियंत्रण पाया जा सकता है। पहला है योग, दूसरा है किसी सिद्ध पुरुष या गुरु की कृपा, तीसरा है भक्ति का बल, चौथा है ईश्वरीय अनुकम्पा, पांचवा है अपने पूर्व जन्मों के संस्कार अथवा उनकी स्मृति। इनके अतिरिक्त भी कुछ अन्य कारणों से भी मनुष्य अपने शरीर, मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार पर नियंत्रण पा सकता है किंतु ऐसा किए बिना न तो स्थूल शरीर छोड़कर सूक्ष्म शरीर में आना संभव है न परकाया प्रवेश करना।

    स्थूल शरीर से बाहर निकलकर सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करने की घटनाएं भारतीय संस्कृति में बहुत आम बताई जाती हैं। इसके लिए बहुत से परावैज्ञानिक एक तरीका बताते हैं जिसका उल्लेख यहां करना समीचीन होगा।

    कोई भी मनुष्य सात्विक भोजन, व्यायाम, प्राणायाम एवं अन्य योग अभ्यास से अपने शरीर को ऊर्जावान एवं स्फूर्ति युक्त बना सकता है। ऐसा व्यक्ति धरती या किसी तख्ते पर सीधा लेटकर यदि अपने मन को समस्त चिंतनों से मुक्त करके अपनी आंखें और अपना ध्यान अपने बाएं पैर के अंगूठे पर स्थिर करे और यह देखने का प्रयास करे कि उसका सूक्ष्म शरीर, उसके स्थूल शरीर से बाहर निकल कर ऊपर की ओर तैर रहा है तो कुछ दिनों के अभ्यास के बाद वह अपने स्थूल शरीर से बाहर आकर हवा में तैरने लगता है और स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर की इस क्रिया को होते हुए देखता है।

    थियोसॉफिकल सोसाइटी के अभ्यासकर्ताओं तथा अन्य परावैज्ञानिकों के अनुसार इस अवस्था में एक सिल्वर कॉड के माध्यम से मनुष्य के सूक्ष्म शरीर का सम्बन्ध स्थूल शरीर से बना रहता है। अर्थात् इस अवस्था में सूक्ष्म शरीर हवा में वैसे ही विचरण करता है जैसे कि कोई पशु अपने खूंट से बंधा हुआ रहकर घूमता हुआ घास चरता है। अंतर केवल इतना होता है कि पशु खूंटे के चारों ओर उतना ही घूम सकता है जितनी की रस्सी की लम्बाई है जबकि सूक्ष्म शरीर अनंत दूरियों तक विचरण कर सकता है क्योंकि सिल्वर कॉड की लम्बाई सूक्ष्म शरीर की इच्छा के अनुसार अनंत लम्बाई तक बढ़ सकती है।

    तुरीय अवस्था में भी प्रायः मनुष्य का सूक्ष्म शरीर अपने स्थूल शरीर से बाहर निकलकर अनंत ब्रह्माण्ड में विचरण करता है। तुरीय अवस्था क्या है, इसे जान लेना ठीक होगा। मनुष्य की चेतना के चार स्तर हैं - पहली अवस्था में हम जाग्रत अवस्था में होते हैं तथा या तो कुछ देखते हैं या सोचते हैं या कल्पना करते हैं। दूसरी अवस्था में हम आधी नींद में होते हैं तथा स्वप्न देखते हैं। चेतना की तीसरी अवस्था में हम गाढ़ी नींद में होते हैं। इस अवस्था में हम न तो कुछ देखते हैं, न सोचते हैं, न स्वप्न देखते हैं और न कल्पना करते हैं। चेतना की चौथी अवस्था को तुरीय अवस्था कहते हैं। इस चौथी अवस्था में हमें यह भी पता नहीं होता कि हम हैं भी या नहीं। चेतना की इस अवस्था का सबसे पहला उल्लेख माण्डूक्योपनिषद में हुआ है।

    तुरीय अवस्था केवल गाढ़ी नींद में ही प्राप्त नहीं की जा सकती अपितु योग की ध्यान, धारणा समाधि आदि विधियों से भी तुरीय अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है।

    सूक्ष्म शरीर के स्थूल शरीर से बाहर निकलकर हवा में तैरने तथा स्थूल शरीर द्वारा उसे ऐसा करते हुए देखने की प्रक्रिया परकाया प्रवेश की दिशा में उठाया गया पहला किंतु बहुत छोटा कदम कहा जाना चाहिए। क्योंकि परकाया प्रवेश से पहले, सूक्ष्म शरीर को उस सिल्वर कॉड से मुक्त होना होता है जिसके माध्यम से वह स्थूल शरीर से बंधा हुआ है। यह अवस्था बहुत कठिन साधना एवं अभ्यास करके प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए अनुभवी मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है।

    सूक्ष्म शरीर एवं स्थूल शरीर के बीच से सिल्वर कॉड को हटाने तथा इस प्रक्रिया में सूक्ष्म शरीर की मृत्यु न हो इसकी साधना के लिए रेचक प्राणायाम सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। वशिष्ठ ऋषि ने भगवान श्रीरामचंद्र को इसी रेचक प्राणायाम का अभ्यास करवाया था। रेचक प्राणायाम से श्ंवास-प्रश्वास प्रक्रिया द्वारा पहले प्राण पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया जाता है। इसके बाद कुंडलिनी अर्थात् मूलाधार स्थान से जीव-आत्मा को बाहर निकालकर योगी मनचाहे शरीर में प्रवेश कर जाता है।

    व्यास भाष्य के अनुसार मनुष्य को परकाया प्रवेश के लिए तीन उपाय करने चाहिए। पहला है- अष्टांग योग अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का अभ्यास। दूसरा है- निष्काम भाव से भौतिक संसाधनों का त्याग और तीसरा है‘ नाड़ियों में सयंम की स्थापना करके चित्त के परिभ्रमण मार्ग का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना। इन तीनों को साधने के बाद ही मनुष्य परकाया प्रवेश की प्रक्रिया में सक्षम हो पाता है।

    वशिष्ठजी के अनुसार यदि योगी अपने पुराने शरीर को सुरक्षित रख सके तो वह उसमें पुनः प्रवेश भी कर सकता है। यहां यह ध्यान देने की बात है कि जिस पेड़ को सींचा नहीं जाता, वह सूख जाता है। परकाया प्रवेश में भी योगी के मूल शरीर के नष्ट होने तथा सड़ने का खतरा रहता है, अतः उसे बचाने के लिए भी विशेष यौगिक क्रियाएं करनी आवश्यक होती हैं। आदि शंकराचार्य निश्चित रूप से इस विद्या में भलीभांति पारंगत रहे होंगे।

    भारत के योगियों एवं सन्यासियों के पास यह विद्या अनंतकाल से है। नाथ संप्रदाय के बहुत से साधक इसकी तकनीक से अवगत थे। नाथ योगी मछन्दरनाथ को भी परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त थी। वे प्रायः अपने स्थूल शरीर से बाहर निकलकर अपनी इच्छानुसार परकाया प्रवेश करते थे और उनमें दीर्घकाल तक निवास भी करते थे।

    आम व्यक्ति को इस तरफ नहीं जाना चाहिए। न तो ऐसा करने की आवश्यकता है और न ऐसा करने में कोई समझदारी है। यह केवल योगियों और सन्यासियों के लिए है। परकाया प्रवेश मोक्ष अथवा मुक्ति का साधन नहीं है। उसके लिए ईश भक्ति एवं निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है। (नोट- आप इस ब्लॉग को हमारे यूट्यूब चैनल 
    Glimpse of Indian History by Dr. Mohanlal Gupta पर वीडियो-ब्लॉग के रूप में देख सकते हैं।)

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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