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  • सोलहवीं शताब्दी की अद्भुत घटना का नायक है ध्यानू भगत

     23.09.2018
    सोलहवीं शताब्दी की अद्भुत घटना का नायक है ध्यानू भगत

    सोलहवीं शताब्दी की अद्भुत घटना का नायक है ध्यानू भगत


    हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में एक प्राचीन पहाड़ी नगर स्थित है जिसे नगरकोट कहा जाता है। इस नगर में देवी दुर्गा के 51 सिद्धपीठों में से एक सिद्धपीठ स्थित है जिसे बज्रेश्वरी सिद्ध पीठ कहा जाता है। मान्यता है कि पाण्डवों ने इस स्थान पर एक मंदिर बनवाया। तब से यह मंदिर कई बार टूटा एवं कई बार बना।

    इस मंदिर में हजारों वर्षों से पूरे देश से श्रद्धालु आते हैं। हिन्दुओं में मान्यता है कि देवी माता, अपने भक्तों की प्रार्थना सुनती है और उनकी मनोकामनाएं पूरी करती है।

    मुख्य मंदिर के सभामण्डप के समक्ष दीवार में लगा पत्थर का एक पैनल बरबस ही सबका ध्यान खींचता है। इस पैनल में एक मनुष्य के मुंह की प्रतिमा लगी हुई है जिसके ऊपर ध्यानू भगत लिखा हुआ है। मंदिर के दाहिनी भाग में एक बरामदे में भी ध्यानू भगत की एक प्रतिमा बनी हुई है जिसमें मनुष्य के एक धड़ ने अपना सिर अपने हाथों में ले रखा है। इस प्रतिमा की भाव भंगमिा से ऐसा प्रतीत होता है कि इस व्यक्ति ने अपना सिर स्वयं ही काटकर किसी को अर्पित किया।

    मंदिर में भ्रमण करते हुए स्त्री-पुरुषों के कुछ छोटे समूह भी श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इनसे बात करने पर ज्ञात होता है कि ये ध्यानू भगत के वंशज हैं जो आज भी अपने पूर्वज की याद में इस मंदिर की यात्रा करते हैं। ये लोग अपने कंधे पर मोर के पंखों का एक गुच्छा धारण करते हैं तथा इनके शरीर पर लोहे की एक जंजीर भी पड़ी होती है। लोहे की जंजीर इस बात की द्योतक है कि किसी समय उनके किसी पूर्वज को लोहे की जंजीरों से बांधकर इस मंदिर तक लाया गया था।

    ध्यानू भगत की कथा इस प्रकार से बताई जाती है- सोलहवीं शताब्दी में जब भारत पर मुग़ल बादशाह अकबर का शासन था, उन्ही दिनों की यह घटना है। ब्रज प्रदेश में स्थित नदौन ग्राम निवासी ध्यानू, अपने एक हज़ार यात्रियों सहित माता के दर्शनों के लिए जा रहा था। इतना बड़ा दल देखकर बादशाह के सिपाहियों ने उन्हें रोक लिया और अकबर के दरबार में ले जाकर ध्यानू भक्त को प्रस्तुत किया।

    अकबर ने पूछा- तुम इतने आदमियों को साथ लेकर कहाँ जा रहे हो! ध्यानू भक्त ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया मैं ज्वाला माई के दर्शनों के लिए जा रहा हूँ मेरे साथ जो लोग हैं वे भी माता के भक्त हैं और यात्रा पर जा रहे हैं । अकबर ने यह सुनकर कहा- ज्वाला माई कौन हैं और वहाँ जाने से क्या होगा!

    ध्यानू भक्त ने उत्तर दिया- ज्वाला माई संसार की रचना एवं पालन करने वाली माता हैं। वे भक्तों द्वारा सच्चे हृदय से की गई प्राथनाएं स्वीकार करती हैं तथा उनकी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। उनका प्रताप ऐसा है कि उनके स्थान पर बिना तेलबत्ती के ज्योति जलती रहती है। हम लोग प्रतिवर्ष उनके दर्शन करने जाते हैं।

    अकबर बोला- तुम्हारी ज्वाला माई इतनी ताकतवर है, कि तुम्हारी सब मनोकामनाएं पूरी कर सकती है, इस बात का विश्वास हमें कैसे होगा? यदि कोई चमत्कार दिखाओ तो हम भी मान लेंगे।

    ध्यानू ने विनम्रता से उत्तर दिया- मैं तो माता का एक तुच्छ सेवक हूँ, मैं भला क्या चमत्कार दिखा सकता हूँ।

    अकबर ने कहा कि तुम्हें इम्तिहान तो देना ही पड़ेगा। हम तुम्हारे घोड़े की गर्दन अलग किये देते हैं। तुम अपनी देवी से कहकर उसे दुबारा ज़िंदा करवा लेना। इस प्रकार घोड़े की गर्दन काट दी गयी।

    ध्यानू भक्त ने मुक्ति का कोई उपाय न देखकर बादशाह से कहा कि वह देवी मां के पास जाकर अपनी प्रार्थना करेगा कि घोड़े को जीवित कर दें। आप एक माह की अवधि तक मेरे घोड़े के सिर एवं धड़ को सुरक्षित रखने की व्यवस्था करें। अकबर ने ध्यानू भक्त की बात मान ली और उसे यात्रा जारी रखने की अनुमति दे दी।

    बादशाह से विदा लेकर ध्यानू भक्त अपने साथियों सहित माता के दरबार में उपस्थित हुआ। स्नान-पूजन आदि के बाद उसने रात भर जागरण किया। प्रातः काल आरती के समय ध्यानू ने हाथ जोड़कर देवी से प्रार्थना की कि बादशाह मेरी भक्ति की परीक्षा ले रहा है। मेरी लाज रखो। मेरे घोड़े को अपनी कृपा से जीवित करो। अन्यथा मैं भी अपना सर काटकर आपके चरणो में अर्पित कर दूंगा।

    जब देवी ने कोई उत्तर नहीं दिया तो ध्यानू ने अपनी तलवार से अपना शीश काट कर देवी को भेंट कर दिया। उसी समय साक्षात ज्वाला माई प्रकट हुई और ध्यानू भक्त का सिर पुनः उसके धड़ से जुड़ गया। और वह जीवित हो गया।

    माता ने भक्त से कहा कि तेरे घोड़े का सिर भी धड़ से जुड़ गया है। तू कोई और वर मांग।

    ध्यानू भक्त ने माता के चरणों में शीश झुकाकर कहा कि हे जगदम्बे! आप सर्व शक्तिमान हैं किंतु अपने भक्तों की इतनी कठिन परीक्षा न लिया करें। सारे संसारी मनुष्य आपको शीश काटकर भेंट नहीं चढ़ा सकते। कृपा करके साधारण भेंट से ही अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण किया करें।

    तब देवी माता ने कहा कि अब से मैं केवल नारियल की भेंट एवं सच्चे ह्रदय से की गयी प्रार्थना से ही मनोकामना पूर्ण करुँगी। यह कहकर माता अंतर्ध्यान हो गयी।

    उधर अकबर के सेवकों ने उसे बताया कि ध्यानू का घोड़ा अचानक ही फिर से जीवित हो उठा है किंतु अकबर को अब भी उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। उसने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि वे माता ज्वालादेवी के मंदिर में निकल रही ज्योति पर लोहे के तवे रखवा दें।

    ऐसा ही किया गया किंतु जब इस पर भी अग्नि नहीं बुझी तो अकबर ने पहाड़ों से निकल रहे एक झरने के पानी को एक नहर के माध्यम से मंदिर पर डलवाया। इस पर भी मंदिर की ज्योति नहीं बुझी। तब अकबर ने स्वयं ज्वाला देवी के मंदिर जाने का निर्णय लिया। वह सोने का छत्र बनवाकर देवी के लिए ले गया।

    जब अकबर ने यह छत्र देवी को अर्पित करना चाहा तो वह अकबर के हाथों से गिरकर टूट गया तथा सोने की बजाय किसी और धातु का बन गया। यह धातु न तो पीतल थी, न सोना थी, न चांदी थी, न ताम्बा थी और न लोहा। यह पता नहीं लगाया जा सका कि छत्र के टुकड़े किस धातु में बदल गए।

    अकबर समझ गया कि देवी ने उसकी भेंट अस्वीकार कर दी है। इसलिए वह चुपचाप लौट गया। अकबर द्वारा चढ़ाया गया खंडित छत्र माता के दरबार में आज भी पड़ा हुआ है। यह घटना ज्वालादेवी के मंदिर की बताई जाती है जो नगर कोट के मंदिर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित है किंतु ध्यानू भगत की प्रतिमाएं नगर कोट के मंदिर में लगी हुई हैं।

    कुछ स्थानों पर नगरकोट मंदिर और ज्वाला देवी के मंदिर को एक ही माना जाता है। अतः हो सकता है कि ध्यानू द्वारा देवी को शीश अर्पित करने की घटना नगरकोट वाले मंदिर में ही हुई हो। बाद में इस मंदिर से ज्वाला देवी की ज्योति विलीन हो गई हो और यहां से 35 किलोमीटर दूर ज्वाला देवी के मंदिर में प्रकट हुई हो।

    यह भी संभव है कि ये दोनों पौराणिक काल के मंदिर आरम्भ से ही अलग रहे हों और ध्यानू भक्त की घटना नगरकोट के मंदिर में घटित हुई हो और उसकी कथा के साथ अकबर के साथ ज्वालादेवी के मंदिर में हुई किसी घटना को जोड़ दिया गया हो। पिछले पांच सौ सालों से ध्यानू भगत के वंशज अपने शरीर पर लोहे की जंजीरें बांध कर अपने कुनबे-गोटे के साथ इस मंदिर की परिक्रमा करने आते हैं।

    उन्हें लगता है कि ऐसा करके वे ध्यानू भगत की परम्परा को जीवित रखे हुए हैं। सच क्या है, यह तो काल के गाल में समा गया है किंतु ध्यानू भक्त आज भी मंदिर की प्रतिमाओं में तथा ध्यानू के वंशजों में पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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