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  • ख्यातों के बिना अधूरा है मध्यकालीन राजस्थान का इतिहास

     03.06.2020
    ख्यातों के बिना अधूरा है मध्यकालीन राजस्थान का इतिहास

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    डिंगल भाषा में लिखे गये ग्रंथ- प्रबंध, ख्यात, वंशावली, वचनिका, गुटके, बेलि, बात, वार्ता, नीसाणी, कुर्सीनामा, झूलणा, झमाल, छप्पय, कवित्त, गीत तथा विगत आदि नामों से प्राप्त होते हैं। डिंगल गद्य को वात, वचनिका, ख्यात, दवावैत, वंशावली, पट्टावली, पीढि़यावली, दफ्तर, विगत एवं हकीकत आदि के रूप में लिखा गया है। ‘ख्यात’ शब्द ‘ख्याति’ से अपभ्रंश होकर बना है जिसका आशय प्रसिद्धि होना अथवा प्रकाशित होना है। ख्यात ग्रंथों को राजस्थानी गद्य का उत्तम स्वरूप माना गया है जिनमें गद्य साहित्य की प्रायः समस्त विधाओं के दर्शन होते हैं। इस प्रकार बात, विगत, वंशावली, हकीकत आदि इतिहास विषयक रचनाओं का विकसित रूवरूप ख्यात साहित्य है।

    ख्यात लेखन का कार्य ईसा की सत्रहवीं सदी में आरम्भ हुआ। भाट, बड़वे तथा जागे कहलाने वाले लोग अपने यजमानों की वंशावलियां लिखते थे। प्रारम्भ में मूलतः ख्यात शब्द का प्रयोग इन्हीं वंशावलियों के लिये हुआ। वंशावलियां लिखने वाले प्रायः अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे किंतु चूंकि उनके पास वंश विशेष का विवरण रहता था इसलिये उनका समाज में आदर किसी ऋषि जैसा होता था। समाज के इस विश्वास को बनाए रखने के लिये ख्यात लिखने वाले भाट, बड़वे एवं जागे अपनी सूचनाओं को कल्पनाओं के आधार पर भी पूरा कर देते थे। इस कारण ख्यातों में दी गई चौदहवीं सदी से पहले की वंशावलियां प्रायः अशुद्ध हैं तथा उनमें दिये गये संवत् भी कल्पित हैं। नैणसी जैसे इतिहास संग्रहकर्ताओं ने अपनी ख्यातों को वंशावलियों के रूप में न लिखकर इतिहास संग्रह के रूप में लिखा। राजस्थान की अन्य पूर्व रियासतों मेवाड़, कोटा, बूंदी, आमेर की अपेक्षा मारवाड़ रियासत में ही ख्यात लेखन का कार्य प्रमुखता से हुआ।

    ख्यातों के बिना राजस्थान का इतिहास असम्भव

    यद्यपि ख्यातों को अधिक प्रामाणिक नहीं माना जाता किंतु ख्यातों के खण्डन अथवा मण्डन के बिना राजस्थान का इतिहास लिखा ही नहीं जा सकता। जहां सिक्के, शिलालेख, ताम्रपत्र आदि ऐतिहासिक साक्ष्यों का अभाव है वहां तो केवल ख्यातें ही आगे चलने का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

    उदाहरण के लिये मारवाड़ के इतिहास को ही लें। मारवाड़ में राव सीहा से लगाकर राव रणमल तक कुल 17 राजा हुए जिनका वास्तविक इतिहास अब तक अंधकार में है। इन राजाओं के इतिहास के विश्वसनीय स्रोत के रूप में राव सीहा और राव धूहड़ के मृत्यु शिलालेखों को छोड़कर कोई भी विश्वसनीय सामग्री प्राप्त नहीं हुई है। इसलिये राव सीहा से लेकर रणमल तक सत्रह राजाओं के वृत्तान्त के लिए ख्यातों का ही आश्रय लेना पड़ता है। इनमें से कुछ तथ्यों की ही पुष्टि दूसरे वंशों के समकालीन इतिहास से हो पाई है।

    बहुत सी ख्यातों में राजाओं के साथ-साथ उनकी रानियों, कुंवरों तथा कुंवरियों के नाम भी दिये गये हैं। रानियों के पिता का नाम और उनके वंश परिचय भी दिये गये हैं। कहीं-कहीं कुंवरियों के विवाह जिन-जिन के साथ हुए, उनके नाम तथा उनके वंशों का भी उल्लेख है। एक ही राजा की कई रानियों के नाम भी मिलते हैं। शिलालेखों एवं सिक्कों में रानियों के नाम का उल्लेख बहुत ही कम होता था। कुछ रानियों एवं कुंवरियों द्वारा बनाये गये मंदिर, बावड़ी, तालाब आदि से ऐसे शिलालेख मिले हैं जिनमें उनके वंश परिचय के रूप में पति एवं पिता के नाम भी दिये गये हैं। इनकी संख्या बहुत ही कम है। इसलिये रानियों के नामों की पुष्टि प्रायः किसी अन्य स्रोत से नहीं हो पाती। तब ख्यातें ही आगे बढ़ने का मार्ग दिखाती हैं।

    आधुनिक इतिहासकारों द्वारा ख्यातों का अवलम्बन

    कर्नल टॉड द्वारा राजस्थान में आधुनिक इतिहास लेखन की परम्परा आरम्भ हुई। वह ई.1806 से 1821 तक राजस्थान में रहा। उसने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान के लेखन में यद्यपि शिलालेखों, मौखिक वर्णनों, साक्षात्कारों एवं सिक्कों आदि की भी सहायता ली तथापि उसने मध्यकालीन ख्यातों को अपने ग्रंथ का प्रमुख आधार बनाया। उसके पास गलत एवं सही सूचनाओं को अलग करने योग्य सामग्री नहीं थी। इसलिये आगे चलकर इस ग्रंथ की बहुत सी बातें अप्रमाणिक सिद्ध हुईं।

    महामहोपध्याय रायबहादुर गौरीशंकर हीराचंद ओझा पहले इतिहासकार थे जिन्होंने मुहणोत नैणसी की ख्यात का संपादन किया। ओझाजी ने हिंदी में पहली बार ‘भारतीय प्राचीन लिपि माला’ ग्रंथ का शास्त्रीय लेखन कर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम लिखवाया। महाराजकुमार रघुवीरसिंह (सीतामऊ) ने जोधपुर राज्य की ख्यात का सम्पादन किया। डॉ. दशरथ शर्मा ने दयालदास री ख्यात का संपादन किया। पण्डित रामकरण आसोपा ने नैणसी की ख्यात का संपादन किया। पुरातत्व सर्वेक्षण भारत के महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने आसोपा की गणना प्राचीन भारतीय लिपि पढ़ने वाले भारत के प्रथम छः विद्वानों में की थी। बदरीप्रसाद साकरिया ने भी मुहणोत नैणसी री ख्यात का चार भागों में सम्पादन किया।

    कुछ प्रसिद्ध ख्यातें

    मुहणोत नैणसी री ख्यात (राजस्थान की पहली ख्यात) : मुहणोत नैणसी को मुहता नैणसी तथा मूथा नैणसी भी कहा जाता है। इनका जन्म वि.सं. 1667 में जोधपुर राज्य में हुआ। वे जोधपुर नरेश जसवंतसिंह प्रथम के दीवान थे। नैणसी ने अपने समय की समस्त महत्त्वपूर्ण घटनाओं का प्रामाणिक संकलन ‘नैणसी री ख्यात’ के रूप में तैयार किया जिसे राजस्थान की पहली ख्यात माना जाता है। इस ग्रंथ में तत्कालीन समाज और सभ्यता का जीवंत चित्रण है। तत्कालीन कृषि, व्यापार, रीति-रिवाज, मान मर्यादा, देवी-देवता, सैन्य संगठन, सैनिक आक्रमण, अस्त्र, शस्त्र, शिकार, वेषभूषा, आभूषण, महल, दुर्ग, कुएं तथा उस समय चलने वाली मुद्राओं का भी वर्णन किया गया है।

    राजपूताने की मारवाड़, जैसलमेर, आमेर, बीकानेर, कोटा एवं बूंदी आदि विभिन्न रियासतों के साथ-साथ गुजरात, सौराष्ट्र, मालवा तथा बुंदेलखण्ड की रियासतों का भी इतिहास दिया गया है। मुंशी देवीप्रसाद ने नैणसी को राजपूताने का अबुल फजल कहा है। राठौड़ां री ख्यात को देखने से अनुमान होता है कि नैणसी की ख्यात लिखने की पद्धति को सम्भवतः कम पसंद किया गया और ख्यात का लेखन राजवंशों के शासक विशेष के लिये होने लगा।

    बांकीदास री ख्यात: कविराजा बांकीदास का जन्म संवत 1828 में जोधपुर राज्य के पचपद्रा परगने के भांडियावास गाँव में हुआ। वे चारणों की आसिया शाखा से थे। ये डिंगल भाषा के श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। इन्होंने 26 ग्रंथों की रचना की। इनमें से ‘‘बांकीदास री ख्यात’’ सर्वप्रमुख रचना है। यह ग्रंथ, ख्यात लेखन परम्परा से हटकर लिखा गया है। यह राजस्थान के इतिहास से सम्बन्धित घटनाओं पर लिखा गया 2000 फुटकर टिप्पणियों का संग्रह है। ये टिप्पणियाँ एक पंक्ति से लेकर 5 से 6 पंक्तियों में लिखी गई हैं तथा राजस्थान के इतिहास लेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। नागरी प्रचारणी काशी ने बांकीदास ग्रंथावली का प्रकाशन किया।

    उदैभाण चांपावत री ख्यात: मुहणोत नैणसी री ख्यात में मारवाड़ के राठौड़ शासकों का क्रमबद्ध इतिहास नहीं मिलता। इस अभाव की पूर्ति उदैभाण चांपावत री ख्यात करती है।इसमें प्रारम्भ से लेकर महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम) तक मारवाड़ के शासकों की जीवन घटनाओं, युद्ध अभियानों, मुख्य उपलब्धियों और संतति आदि का क्रमबद्ध विवरण मिलता है। वहीं उनके कुंवरों से अंकुरित होने वाली शाखाओं के बारे में भी अलग से प्रकाश डाला गया है जो मारवाड़ के राठौड़ ठिकाणेदारों के परिचय और उनकी भूमिका को समझने में सहायक है। ई.1678 में महाराजा जसवंतसिंह की मृत्यु हो जाने के बाद जोधपुर दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया इस काल में दुर्ग में संचित विपुल साहित्य नष्ट हो गया किंतु एक ताक में बंद पड़ी रह जाने से उदैभाण चांपावत री ख्यात बची रह गई। रघुबीरसिंह सीतामऊ ने इसका सम्पादन किया।

    जोधपुर राज्य री ख्यात: महाराजा मानसिंह (1803-43 ई.) ने इतिहास की बिखरी हुई सामग्री का संकल करवाकर वृहदाकार ख्यात की रचना करवाई जो ‘‘राठौड़ों री वंशावली अर ख्यात’’ तथा जोधपुर राज्य री ख्यात के नाम से जानी जाती है। इसमें प्रारंभ से लेकर मानसिंह तक के शासकों का विस्तृत इतिहास लिपिबद्ध किया गया है। इस मूल ख्यात की प्रतिलिपियां करते समय जोधपुर शासकों के नाम से अलग-अलग ख्यातें बना ली गईं यथा- राव मालदेव री ख्यात, राव चंद्रसेन री ख्यात, मोटाराजा उदयसिंह री ख्यात, महाराजा जसवंतसिंह री ख्यात, महाराजा अजीतसिंह री ख्यात, महाराजा अभयसिंह री ख्यात, महाराजा विजयसिंह री ख्यात, महाराजा मानसिंह री ख्यात आदि।

    मारवाड़ री ख्यात: इस ख्यात के प्रारम्भ में जोधपुर के संस्थापक राव जोधा से लेकर महाराजा मानसिंह तक के शासकों, उनकी रानियों और मुत्सद्दियों आदि राजपरिवार से जुड़े हुए व्यक्तियों द्वारा बनवाये गये भवनों, कुओं, बावडि़यों, आदि जलाशयों का विवरण दिया गया है। इस ख्यात में महाराजा रामसिंह, महाराजा बखतसिंह, महाराजा विजयसिंह, महाराजा भीमसिंह के सम्पूर्ण कालखण्ड की और महाराजा मानसिंह के काल की प्रारम्भिक 10 वर्षों की घटनाओं का वर्णन किया गया है। महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम), अमरसिंह राठौड़ (नागौर), महाराजा अजीतसिंह और महाराजा अभयसिंह की कुछ घटनाओं का संक्षिप्त विवरण दिया गया है। मारवाड़ के शासक जसवंतसिंह प्रथम से लेकर भीमसिंह तक के जन्म, मृत्यु, दाह संस्कार, ब्रह्मभोज आदि की भी जानकारी दी गई है। महाराजा मानसिंह द्वारा बनवाये गये मंदिरों, भवनांे एवं जलाशयों की भी अच्छी जानकारी दी गई है। डॉ. हुकमसिंह भाटी ने मारवाड़ री ख्यात का सम्पादन किया है।

    अन्य महत्वपूर्ण ख्यातें

    शाहपुरा राज्य की ख्यात, झीथड़ां री ख्यात, मुरारीदान री ख्यात, मूंदियाड़ री ख्यात, ठिकाना पाल री ख्यात तथा गोगूंदा री ख्यात अन्य महत्वपूर्ण ख्यातें हैं।

    दयालदास री ख्यात (राजस्थान की अंतिम ख्यात): दयालदास को राजस्थान का अंतिम ख्यातकार माना जाता है। उनका जन्म ई.1798 में बीकानेर रियासत के कूबिया गाँव में हुआ। 93 वर्ष की आयु में ई.1891 में उनका निधन हुआ। उन्होंने बीकानेर राज्य की ख्यात लिखी जिसे ‘बीकानेर रै राठौड़ां री ख्यात’ तथा ‘दयालदास री ख्यात’ भी कहा जाता है। इसमें बीकानेर के राजाओं का प्रामाणिक इतिहास दिया गया है। इस ख्यात के बाद के समय की अब तक कोई भी ख्यात प्रकाश में नहीं आई है। अतः माना जा सकता है कि अठारहवीं शती के अवसान के साथ ही ख्यात लेखन परम्परा ने दम तोड़ दिया तथा इसके कुछ ही समय बाद कर्नल टॉड ने राजस्थान में आधुनिक इतिहास लेखन का सूत्रपात किया।

    ई-बुक : राजस्थानी भाषा एवं साहित्य का परिचय से उद्धृत अंश, लेखक -  डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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