• समय (हिन्दी कविता)

     22.03.2018
    समय (हिन्दी कविता)

    समय



    एक कनेर

    जो वर्षों पहले

    घर के सामने लगाई थी,

    लगातार तुम्हारी प्रसन्नताओं की

    आकांक्षिणी रही है।

    जब सुबह की धूप का नरम गद्दा

    मेरे कदमों में बिछा होता है,

    कनेर के एक-एक फूल में

    तुम्हारा चेहरा छिपा होता है।

    सच कहना

    क्या तुमने भी

    उस कनेर को देखा है ?



    दिन किसी चतुर मछुआरे सा

    अपना जाल फैंकता है

    और कुलांचें भरते हुए

    हरिण से घण्टे

    छोटी-छोटी मछलियां बनकर

    उसके अंक में समा जाते हैं।

    दोस्त! यही है

    समय की वास्तविकता

    कि मंदिरों में घण्टियां बनकर

    झूलता हुआ समय

    घाटियों में चिड़ियां बनकर

    चहकता हुआ समय

    धीरे-धीरे थपकियां देता हुआ

    जीवन रूपी नाव को

    खेता रहता है और

    किसी बुुढ़िया माँ की तरह

    झुर्रियों भरा चेहरा लेकर

    तेजी से व्यतीत हो जाता है।

    पता नहीं यह

    कहां जाकर खो जाता है।


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