• मन (हिन्दी कविता)

     22.03.2018
    मन (हिन्दी कविता)

    मन

    मन वन उपवन,

    मन वृंदावन

    मन ही चंदन,

    मन गोरोचन।



    मन में पीपल,

    मन में तुलसी

    मन में बैठी

    माता हुलसी।



    मन में नाचे मोर पपीहा

    मन में बहती गंगा मैया।

    मन में खेले कृष्ण कन्हैया

    नाचें गोपी, ताता थैया।



    मन में बैठी एक कपोती

    पल में हंसती, पल में रोती।

    तिनके लाती दाने चुगती

    और न जाने क्या क्या करती।



    मन में हंसतीं आशा-तृष्णा

    मन में हंसती श्यामा कृष्णा।

    मन में उड़ते चार कबूतर

    काले, धोले नीले धूसर।



    मन में बैठा दास कबीरा

    तुलसी गाता, गाता सूरा।

    चंदन घिसता, दोहे रचता

    मन ना जाने क्या-क्या करता।



    मन में फैले सात समंदर

    मछली मोती गोपी चंदर।

    मन में क्षिप्रा, मन में काशी

    मुक्ति देता घट-घट वासी।


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