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  • प्यार ! (हिन्दी कविता)

     22.03.2018
    प्यार ! (हिन्दी कविता)

    प्यार !



    धूप छूकर

    चली जाती है

    जहां झूठे को

    और लौट कर नहीं आती

    फिर हफ्तों!

    पहाड़ियों की उन

    तमिस्र छाया में

    प्यार! तुम मुझे मिले

    झरना बनकर झूमते हुए।



    हिमाच्छादित शुभ्रवर्णा

    चोटियों के तले खड़े

    लम्बे देवदार की फुनगी पर

    प्यार! मैंने तुम्हें देखा

    किरण बनकर बिखरते हुए।



    विशाल, अनगढ़

    बेडौल चट्टानों के बीच

    दूर-दूर तक फैली

    झाड़ियों के किनारे किनारे

    मीलों चली गईं

    सर्पिलाकार पगडण्डियों पर

    प्यार! मैंने तुम्हें देखा

    खरगोश और मेमने बनकर

    डोलते हुए।



    आंखें फाड़-फाड़ कर

    देखा करता है हिमांशु

    रात-रात भर जागकर

    नदी के जिस उन्मुक्त प्रवाह को

    और विदा हो लेता है

    हर सवेरे अतृप्त ही,

    प्यार! मैंने तुम्हें देखा

    उर्मि बनकर फिसलते हुए।



    हजारों हाथ गहरी कन्दराओं में

    मारे तम के भय से

    वनैले हिंस्रक भी

    धरते नहीं पैर

    प्यार! मैंने तुम्हें वहां देखा

    हवा बनकर डोलते हुए।



    बड़ी-बड़ी चट्टानें खिसकती हैं

    प्रकृति के धनुष पर

    प्रत्यंचा बनकर

    और मुक्त कण्ठ से करती हैं

    ताण्डव का उद्घोष

    वहां पर प्यार! मैंने तुम्हें

    नदी बनकर

    उनका स्वागत करते देखा है

    छपाक की ध्वनि के साथ।

    मानों बोल उठी हों घाटियां

    घुंघरू बनकर।

    प्यार ! मैंने वह जलतरंग सुनी है।



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