• बारहमासी कविताएँ

     02.06.2020
    बारहमासी कविताएँ

    बारहमासी कविताएँ


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जनवरी


    रेशमी धूप के गद्दों पर बैठकर

    ठिठुरती बूढ़ी नानी,

    रात मचलते ही महक उठती

    शोख, मनचली रात की रानी।



    फरवरी

    इस तरह चली हवायें

    प्यार में झूमकर

    कि सेमल हो गया लाल

    मारे शर्म के।



    मार्च

    सुरमई शाम

    मचलने लगे आम

    आई होली!

    गोरी के अंग-अंग

    बावरी कोयल ने

    कच्ची अमिया घोली।



    अप्रेल

    अरे! जरा सा

    ठहर 
    रे  अप्रेल!!

    गरमी देने लगी

    मेरी छोटी सी खपरैल।



    मई

    उठने लगी

    लपटें धरती से

    अब खुलती है आंख नहीं,

    भीगा तौलिया सिर पर लिये

    कौन रूपसी झांक रही !



    जून

    धूप, धूप, धूप!

    अरे बाबा धूप।

    उड़ा फ्यूज दिमाग का

    बिगड़ा पंखे का रूप।



    जुलाई

    मिट्टी पर पड़ गईं सलवटें!

    दो बूंद पानी की

    आज पड़ें या कल पड़ें।



    अगस्त

    लड़कियों का हॉस्टल

    भरने लगा है फिर से

    ज्यों वीर बहूटियां घूमने

    निकल पड़ी हों घर से।



    सितम्बर

    सितम्बर!

    हरी धरती

    नीला अम्बर।



    अक्टूबर

    तन दीप,

    मन लौ।

    री दीपावली

    शीघ्र आ

    तेरे उजालों में

    बोने हैं मुझे

    आशा जौ।



    नवम्बर

    बांधकर धूप

    कागज की पुड़िया में

    फैंक दी झील में

    शाम की बुढ़िया ने।



    दिसम्बर

    सुनहरी लहरें

    घड़ी भर न ठहरें,

    कल नवम्बर

    आज दिसम्बर

    कौन सुने किसकी

    बीती घड़ियां

    बीतीं पहरें।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×