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  • लो हारा सच, फिर जीता झूठ (हिन्दी कविता)

     22.03.2018
    लो हारा सच, फिर जीता झूठ (हिन्दी कविता)

    लो हारा सच, फिर जीता झूठ



    सन-सन चलती आंधी काली,

    उजड़ी बगिया, हतप्रभ माली।

    समय भी निकला गहन कुचाली

    हारा सुकण्ठ और जीता बाली।

    पुण्यों की सलिला जाती खूंट 

    लो हारा सच, फिर जीता झूठ।।



    कल तक तो था गहरा पानी,

    प्रतिज्ञाओं की गहना वाणी।

    सप्त सुरंगी सरिता बहती

    मन-तरंग की कलकल कहती।

    क्यों गई क्यारियां सारी फूट

    लो हारा सच, फिर जीता झूठ।।



    सत्कर्मों की सूखी वापी,

    उथली थोथी, शापित थाती।

    शृगालों की सेना आती,

    कानन लूट नित रास रचाती।

    उनकी तृप्त न होती भूख,

    लो हारा सच और जीता झूठ।।



    अभिमानी हैं गंजे लंगड़े

    खाते-पीते मोटे तगड़े

    इंच न हटते महंगे मकड़े।

    पल-पल रचते लफड़े झगड़े।

    नाचें काले नकटे भूत

    लो हारा सच, फिर जीता झूठ।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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