Blogs Home / Blogs / डॉ. मोहनलाल गुप्ता की कविताएँ
  • बारहमासी कविताएँ

     14.03.2018
    बारहमासी कविताएँ

    बारहमासी कविताएँ


    जनवरी

    रेशमी धूप के गद्दों पर बैठकर

    ठिठुरती बूढ़ी नानी,

    रात मचलते ही महक उठती

    शोख, मनचली रात की रानी।



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  • मन (हिन्दी कविता)

     22.03.2018
    मन (हिन्दी कविता)

    मन

    मन वन उपवन,

    मन वृंदावन

    मन ही चंदन,

    मन गोरोचन।



    मन में पीपल,

    मन में तुलसी

    मन में बैठी

    माता हुलसी।



    मन में नाचे मोर पपीहा

    मन में बहती गंगा मैया।

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  • लो हारा सच, फिर जीता झूठ (हिन्दी कविता)

     22.03.2018
    लो हारा सच, फिर जीता झूठ (हिन्दी कविता)

    लो हारा सच, फिर जीता झूठ



    सन-सन चलती आंधी काली,

    उजड़ी बगिया, हतप्रभ माली।

    समय भी निकला गहन कुचाली

    हारा सुकण्ठ और जीता बाली।

    पुण्यों की

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  • समय (हिन्दी कविता)

     22.03.2018
    समय (हिन्दी कविता)

    समय



    एक कनेर

    जो वर्षों पहले

    घर के सामने लगाई थी,

    लगातार तुम्हारी प्रसन्नताओं की

    आकांक्षिणी रही है।

    जब सुबह की धूप का नरम गद्दा

    मेरे कदमों में बिछा होता है,

    कनेर के एक-एक फूल में
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  • प्यार ! (हिन्दी कविता)

     22.03.2018
    प्यार ! (हिन्दी कविता)

    प्यार !



    धूप छूकर

    चली जाती है

    जहां झूठे को

    और लौट कर नहीं आती

    फिर हफ्तों!

    पहाड़ियों की उन

    तमिस्र छाया में

    प्यार! तुम मुझे मिले

    झरना बनकर झूमते हुए।



    हिमाच्छादित शुभ्रवर्णा

    चोटियों के तले खड़े

    लम

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