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  • अध्याय - 40 श्री राजकुमार हरदयाल सिंह राजकीय संग्रहालय सीकर

     02.06.2020
    अध्याय - 40  श्री राजकुमार हरदयाल सिंह राजकीय संग्रहालय सीकर

     अध्याय - 40


    श्री राजकुमार हरदयाल सिंह राजकीय संग्रहालय सीकर

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    सीकर नगर के मध्य में माधोसागर तालाब के निकट स्थित राजकीय संग्रहालय में शेखावाटी क्षेत्र की पुरा-धरोहर प्रदर्शित की गई है। सीकर संग्रहालय की स्थापना का उद्देश्य शेखावाटी क्षेत्र की कला-पुरा सामग्री को संकलित कर संरक्षित करना है ताकि इस महान विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित किया जा सके।


    सीकर संग्रहालय की स्थापना पुरातत्व संग्रहालय विभाग द्वारा सार्वजनिक निर्माण विभाग द्वारा निर्मित भवन में ई.2006 में की गई। इस संग्रहालय में 1,436 कला एवं पुरा सामग्री संगृहीत एवं प्रदर्शित है। यह पुरा सम्पदा शेखावाटी क्षेत्र की संस्कृति के विभिन्न आयामों का दर्शन कराती है। संग्रहालय में इस क्षेत्र की प्राचीन प्रतिमाओं का संग्रह उल्लेखनीय है। विभाग के अन्य संग्रहालयों में संगृहीत एवं प्रदर्शित शेखावाटी क्षेत्र की पुरासमाग्री को इस संग्रहालय में स्थानान्तरित किया गया है। भेंट-स्वरूप तथा अन्य स्त्रोतों से भी पुरासामग्री अवाप्त की गयी है।

    सीकर संग्रहालय को आठ दीर्घाओं में विभाजित किया गया है जिनमें उत्खनन से प्राप्त सामग्री, पाषाण प्रतिमाएं, शिलालेख, लघुचित्र, सिक्के और कलात्मक पुरावस्तुओं का प्रदर्शन किया गया है। रावराजा सीकर द्वारा हर्षनाथ मंदिर का एक शिलालेख एवं 252 प्रस्तर प्रतिमाएँं संग्रहालय को प्रदान की गई थीं।

    उत्खनन सामग्री

    संग्रहालय में संकलित पुरासामग्री में गणेश्वर पुरास्थल से प्राप्त 3000 ई.पू. की पुरासामग्री प्रदर्शित है। इसमें विभिन्न प्रकार के मृदभांड, जिनमें अलंकृत तथा सादे दोनों प्रकार के हैं। ये मृदभांड संकरे और चौड़े मुँह वाले लोटे, छोटे प्याले, छोटी हांडियां तथा विभिन्न आकर-प्रकार के हैं। सम्भवतः संकरे मुँह वाले बेलनाकार बर्तनों का प्रयोग बहुमूल्य द्रव्य तथा छोटे प्यालों का प्रयोग चषक के रूप में किया जाता था। इसके अलावा उत्खनित सामग्री में ताम्र धातु के बाणाग्र, मछली पकड़ने के कांटे, चूड़ियाँ, मनके, चकरी, ताम्र कुल्हाड़ियां आदि प्रदर्शित हैं।

    झुंझुनू के पुरास्थल सुनारी से प्राप्त प्रस्तर एवं मृण्मय मनके, खेलने की मोहरें, अस्थि उपकरण, खिलौना गाड़ी के पहिये, बौद्ध मांगलिक चिन्ह युक्त फलक, चूड़ियाँ, लौह कुल्हाड़ियाँ, कूबड़दार वृषभ (खिलौना) आदि प्रदर्शित किए गए हैं। इसी दीर्घा में गालावाश्रम पुरास्थल से प्राप्त कलश, मृण्मय कन्दुक, प्रस्तर एवं मृण्मय मनके, लौह एवं शंख की चूड़ियां, अलंकृत मृदुल प्रस्तर खण्ड, लौह भालाग्र, हंसिया आदि प्रदर्शित किये गए हैं। गणेश्वर, सुनारी (झुंझुनूं) एवं गालावश्रम पुरास्थलों से प्राप्त पुरा सामग्री को तुलानात्मक अध्ययन की दृष्टि से एक साथ प्रदर्शित किया गया है। उत्खनन की प्रणाली पर आधारित एक मॉडल प्रदर्शित किया गया है जो विभिन्न काल खण्डों की परतों को दर्शाता है। प्राचीन जनजीवन के दृश्यों को प्रदर्शित करते हुए कुछ चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    पाषाण प्रतिमाएं

    संग्रहालय में संकलित पाषाण प्रतिमाओं में हर्ष से प्राप्त प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं जिनमें शेषशायी विष्णु, बैकुंठ विष्णु, हरिहर, पितामहमार्तण्ड, आसनस्थ शिव, ऊर्ध्वरेतस शिव, नृत्यरत शिव, लक्ष्मी, सपत्नीक ब्रह्माजी, गणेश, दशहस्ता माहेश्वरी, भैरवी, इन्द्राणी, चामुण्डा, ब्रह्मणी, कुमारी, अश्वत्थामा से युद्धरत भीम, सूर्यपुत्र रेवंत, स्थानक विष्णु, नवग्रह फलक तथा अष्ट दिक्पाल- इंद्र, अग्नि, यम, नैऋत्य, वरुण, वायु, कुबेर और ईशान, सुरसुन्दरी, शैवाचार्य, योगिनियां तथा विभिन्न प्रकार के जनजीवन और संगीत नृत्य आदि से सम्बन्धित फलक शामिल हैं।

    हर्षनाथ मंदिर से प्राप्त विश्व प्रसिद्ध लिंगोद्भव शिल्प खण्ड राजकीय संग्रहालय अजमेर में प्रदर्शित किया गया है। हर्ष से प्राप्त ललितासन में विराजमान त्रिमुखी विष्णु को अष्टहस्त वैकुण्ठ स्वरूप में प्रदर्शित किया गया है। वाम भाग में वराहमुख एवं दायीं तरफ नृसिंह मुख बने हुए हैं। आठ हाथों में से पांच हाथ खण्डित हैं तथा तीन हाथों में धारण किए गए आयुध दृष्टव्य हैं। विष्णु के शीष पर मुकुट, कानों में कुण्डल, गले में वनमाला, कंठाभूषण आदि धारण किए हुए हैं। मूर्तिफलक के दक्षिण पार्श्व भाग में दो परिचारिकाएं तथा वाम भाग में चंवरधारिणी एवं वीणावादिनी का अंकन है। किनारे के भाग पर अन्य स्त्री परिचारिका को दिखाया गया है।

    हर्षनाथ से प्राप्त मातृकाएं एवं देवी प्रतिमाएँ उल्लेखनीय हैं। इन प्रस्तर प्रतिमाओं को पृथक दीर्घा में प्रदर्शित किया गया है। हर्षनाथ मंदिर से प्राप्त प्रमुख प्रतिमाओं में द्विबाहु नटेश शिव का शिल्पखण्ड संग्रहालय के मुख्य प्रांगण में नृत्य वादन फलक के साथ प्रदर्शित किया गया है। द्विबाहु नटेश शिव के समतल शिलाफलक के मध्यवर्ती भाग में आयताकार स्थान पर चारों ओर बेलबूटे बने हैं। ढोल, बांसुरी, खड़ताल आदि लिए संगीत-वादकों के मध्य द्विबाहु नटराज शिव का भव्य अंकन किया गया है। नृत्य मुद्रा में शिव के ऊपर दाहिनें हाथ में डमरू है, वाम हस्त में त्रिशूल है। शिव के बांई ओर पार्वती एवं उसके आगे शिवभक्त ऋषि 
    शृंगी का अंकन किया गया है। भारतीय शिल्प में ऐसा फलक इस फलक की प्राप्ति से पूर्व तक अज्ञात था। 

    हरिहर मंदिर से प्राप्त हरिहर-पितामह-मार्तण्ड प्रतिमा अद्भुत है। इसमें विष्णु, शिव, ब्रह्मा और सूर्य का संयुक्त अंकन है। इस अष्टभुजी प्रतिमा के शरीर पर कवच, शीष पर मुकुट, दोनों ओर के मध्य हाथों में कमल तथा शेष हाथों में चक्र, त्रिशूल, सर्प, शंख, जलपात्र तथा पैरों में जूते हैं। देवता के वाहनों के रूप में नीचे दायीं ओर हंस, अश्व तथा बायीं ओर नंदी एवं गरुड़ उत्कीर्ण हैं। एक विराट् शिलाफलक पर वाम हस्त में वीणा लिए स्थानक सुर-सुन्दरी का अंकन किया गया है।

    इस दीर्घा में कृष्ण पाषाण पर उत्कीर्ण शिलालेख से क्रमशः स्थानक शिव त्रिभंग मुद्रा में, अन्य स्थानक शिव, आसनस्थ शिव, शिवलिंग आराधना, द्वारशाखा पर प्रेमी युगल का अंकन विष्णु द्वारा गजासुर संहार, पुनः द्वारशाखा पर प्रेमी युगल का अंकन, शेषशायी विष्णु, नृसिंह वराह (वैकुण्ठ), नवग्रह फलक, दिक्पाल यम और नैऋत्य, वीणाधारिणी, दिक्पाल वरुण एवं वायु, चतुर्हस्ता लक्ष्मी, रेवन्त दिक्पाल कुबेर एवं ईशान, दिक्पाल इन्द्र, अग्नि, सपत्नीक-शैवाचार्य एवं अन्य स्त्री, पद्महस्ता स्त्री, केश-सज्जा युक्त स्त्री का शीष भाग, स्थानक अनुचर, देवी शीष भाग आदि प्रतिमाएँ भारतीय शिल्प कला की अनुपम कृतियां हैं।

    कृष्ण-पाषाण पर उत्कीर्ण प्रभामण्डल युक्त चतुर्हस्त विष्णु का सुन्दर अंकन है। इनके वाम हस्त में चक्र एवं शंख तथा दक्षिण हस्त में गदा एवं अभय मुद्रा का अंकन है। विविध प्रतिमा दीर्घा में संयोजित खरसाडू (सीकर) से प्राप्त 10वीं शताब्दी की लघु आकार प्रतिमाओं का शिल्प अनुपम है। इनमें हरिहर तथा विष्णु की प्रस्तर प्रतिमाएँ कला की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं। इस दीर्घा में सुदरासन (नागौर) से प्राप्त 9वीं शताब्दी ईस्वी की विराट प्रस्तर प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं।

    इस दीर्घा में गौराऊ (जिला नागौर) से प्राप्त ऋषभनाथ, पार्श्वनाथ, आदिनाथ एवं पद्मप्रभु की जैन धातु प्रतिमाएँ भी प्रदर्शित हैं। जैन प्रतिमाओं के परिकर में आसन के दोनों ओर विद्या देवियों का अंकन गौराऊ की प्रतिमाओं को विशिष्टता प्रदान करता है। तीर्थंकर के दोनों ओर खड्गासन में एक-एक अन्य तीर्थकर दर्शाये गए हैं। जायल से प्राप्त पार्श्वनाथ तथा रघुनाथगढ़ से प्राप्त महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमाएँ भी दर्शनीय हैं। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ पद्मासनावस्था में विराजमान हैं। पादपीठ के नीचे दोनों तरफ सिंह आकृतियां हैं, इनके नीचेे नवग्रहों का अंकन है।

    खरसाड़ु से प्राप्त महिषासुर मर्दिनि, हरिहर, गणेश, स्थानक विष्णु और अश्वनीकुमारों के साथ सूर्य एवं रगुनाथगढ़ से प्राप्त महिषासुरमर्दिनि और सुरसुन्दरी आदि भी प्रदर्शित हैं। मंडा सुरेरा से प्राप्त गजेंद्र मोक्ष, आसनस्थ शिव, यमदण्ड-धारिणी देवी और जटाधारी देव, बालेश्वर से प्राप्त शेषशायी विष्णु और स्थानक विष्णु, सुद्रासन से प्राप्त नृत्यरत शिव, तपस्यालीन पार्वती और अष्ठ दिक्पाल, खंडेला से प्राप्त सूर्यपुत्र रेवंत और विष्णु मंदिर का कलश आदि महत्वपूर्ण हैं।

    संग्रहालय की महत्वपूर्ण पाषाण प्रतिमायों में हरिहरपितामहमार्तण्ड अद्भुत प्रतिमा है जिसमे सूर्य के साथ-साथ ब्रह्मा, विष्णु और शिव को प्रदर्शित करते हुए सभी चारों देवों के आयुधों के साथ-साथ वाहनों का भी अंकन किया गया है।

    दूसरी महत्वपूर्ण प्रतिमा नवग्रह फलक है जिसमे शुक्र, शनि, राहु और केतु के अंकन के साथ एक नारी प्रतिमा का अंकन है जो लम्बे उतरीय तथा बिजोरा-फल को थामे हुए है। प्रतिमा-विधान में यह अंकन अनोखा और दुर्लभ है।

    तीसरी प्रतिमा सूर्यपुत्र रेवंत की है जिसमें अश्वारूढ़ रेवंत के साथ सूर्य के परिचारकों- दांडी और पिंगल को भी अश्व पर सवार दिखाया गया है। यह स्वतंत्र प्रतिमा है जो किसी देवकुलिका में पूजांतर्गत रही होगी।

    चौथी प्रतिमा गजेंद्रमोक्ष है जिसमें भगवान विष्णु को ग्राह से गजेन्द्र का उद्धार करते हुए प्रदर्शित किया गया है। इसमें मानव रूप में गरुड़ का अंकन है।

    पांचवी प्रतिमा भैरवी की है, जटामुकुटधारी देवी के हाथों में पुस्तक, पुष्पकलिका और पानपात्र का अंकन है।

    छठी प्रतिमा नटेश शिव की है जो अपने गणों के साथ नृत्य कर रहे हैं।

    सातवीं प्रतिमा पाशुपत पूजा फलक है जिसमें मनुष्यों को मांसभक्षण तथा सुरापान करते हुए दिखाया गया है।

    संग्रहालय में संकलित पाषाण प्रतिमाओं के अलावा गौराउ (जिला नागौर) से प्राप्त धातु प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं जिनमे ऋषभदेव, पार्श्वनाथ और पद्मप्रभु की प्रतिमाएं सम्मिलित हैं। ये प्रतिमाएं 11 शताब्दी ईस्वी की हैं।

    शिलालेख

    इस संग्रहालय में शेखावाटी से सम्बन्धित शिलालेखों का अच्छा संकलन है। हर्षनाथ मंदिर से प्राप्त काले पत्थर पर उत्कीर्ण 1030 वि.सं. (973 ई.) का शिलालेख संस्कृत भाषा एवं देवनागरी लिपि में है। इस अभिलेख का प्रारम्भ शिव की स्तुति से हुआ है। इसमें चौहान शासकों की वंशवली दी गयी है। इसलिए यह चौहान वंश के राजनीतिक इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें हर्षगिरी तथा हर्षनाथ का भी विवरण दिया गया है। वि.सं. 1221 का सीकर से प्राप्त शिलालेख तथा वि.सं. 1243 के रैवासा से प्राप्त चन्देलों के शिलालेख भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    लघु चित्र

    संग्रहालय में जयुपर शैली की राग-रागिनी चित्रकला के साथ-साथ राधाकिशन, मायावी हाथी, राम का राज्याभिषेक, राम-रावण युद्ध, महिषासुर मर्दिनी और कुछ रेखाचित्र भी प्रदर्शित हैं। राग-रागिनी लघुचित्रों में छः रागों- भैरव, मालकौंस, हिंडोल, दीपक, श्री और मेघ तथा इन रागों की पांच-पांच रागनियों का चित्रण किया गया है। चित्रों की पृष्ठ भूमि में छः ऋतुओं के अनुसार मौसम का चित्रण किया गया है, शास्त्रीय मान्यताओं में रागों को गाने का समय और ऋतु निश्चित है। शृंगाररत नायिका अपने केशों को विशिष्ट मुद्रा में पकड़े हुए दृष्टव्य है। विभिन्न भाव-भंगिमाओं में नायिकाएं तथा विभिन्न मुद्राओं में राधा-कृष्ण के चित्र भी उपलब्ध हैं। संग्रहालय के प्रांगण में शेखावाटी क्षेत्र की प्रमुख हवेलियों एवं छतरियों के छायाचित्र प्रदर्शित किये गए हैं।

    अस्त्र-शस्त्र

    इस दीर्घा में भरतपुर से प्राप्त हथियारों को प्रदर्शित किया गया है जिनमें विभिन्न प्रकार की तलवारें, तेगा, खांडा, किरिच, सेखला, नीमचा, ऊना, सुदेट और कत्ता आदि हैं। तोड़ेदार, पत्थरकला, टोपीदार और कारतूसी आदि विभिन्न प्रकार की बंदूकें और इसके अलावा पेशकब्ज, छुरियाँ, भाले और सैनिकों के कवच और ढाल प्रदर्शित किये गए हैं।

    सिक्के

    संग्रहालय में शेखावाटी के विभिन्न स्थानों से प्राप्त सिक्के प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें कुराधन (नीम का थाना), डाडा, फतेहपुरा (खेतड़ी, झुंझुनू) से प्राप्त कुषाण कालीन सिक्के, धमव (चूरू) से प्राप्त इंडो-ससैनियन सिक्के, गलेर (राजगढ़, चूरू) तथा गनेड़ी (सीकर) से प्राप्त आदिवराह सिक्के, लाडुसर (सीकर) गनेड़ी और गलेर से प्राप्त अश्वारोही एवं बृषभ प्रकार के सिक्के, हर्ष से प्राप्त दिल्ली सल्तनत कालीन सिक्के, झुंझुनू, कटराथल (सीकर), विलंगा की रोही (सुजानगढ़, चूरू) तथा खगीपावड़ा (सुजानगढ़, चूरू) से प्राप्त जौनपुर सुल्तान के सिक्के तथा सराय (उदयपुरवाटी, झुंझुनू) से प्राप्त विभिन्न रियासतों के सिक्कों का प्रदर्शन किया गया है।

    खण्डेला के निकट ग्राम गुरारा से 2,744 पंचमार्क सिक्के मिले थे जो जयपुर संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं। पंचमार्क सिक्के भारतीय मुद्रा इतिहास के प्राचीनतम सिक्के माने जाते हैं। विश्वस्तर पर इनका प्रचलन काल 600 ई.पू. से 200 ई.पू. तक माना गया है। ग्राम गुरारा में मिले सिक्कों में से 10 श्रेणी के सिक्कों के छायाचित्र संग्रहालय प्रांगण में प्रदर्शित किये गए हैं। सिक्कों पर टंकित चिह्नों को छायाचित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।

    प्रथम दो पुरुष आकृतियों के सिर पर केवल एक-एक जूड़ा बंधा हुआ है। जबकि प्रथम सिक्के पर अंकित तीसरी महिला आकृति के सिर पर तीन जूड़े बंधे हुए हैं। इस प्रकार तीसरी महिला आकृति दो चोटियाँ अथवा तीन जूड़े वाली है जो वामांग में विराजमान है। इस प्रकार के 7 श्रेणी के सिक्कों में अंकित तीसरी महिला आकृति, प्रत्येक सिक्के पर वामांग (बाएं) हाथ पर अंकित की गयी है। इन सिक्कों पर भगवान श्रीराम, वामांग में देवी सीता एवं दाहिनी ओर श्री लक्ष्मण का अंकन दर्शनीय है। खंडेला तहसील के गुरारा गाँव से मिली चांदी की आहत मुद्राएं, लाडुसर से प्राप्त 11-12वीं शताब्दी की अश्वारोही एवं वृषभ प्रकार की ताम्र मुद्राएं, गनेड़ी से प्राप्त नौवीं शताब्दी के आदिवराह प्रकार की चाँदी की मुद्राएं भी प्रदर्शित की गई हैं।

    लोकजीवन

    प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी प्रतिमाओं के माध्यम से शेखावाटी के लोकजीवन को प्रदर्शित किया गया है। पहली दीर्घा में रसोई का दृश्य है जिसमें एक महिला बाजरे की रोटियां बना रही है और रसोई में काम आने वाली विभिन्न वस्तुओं के साथ-साथ पुरुष को भोजन करते हुए एवं बच्चों को खिलौनों से खेलते हुए प्रदर्शित किया गया है। दूसरी दीर्घा में शेखावाटी के प्रसिद्ध गींदड़ नृत्य का प्रदर्शन किया गया है। आठवीं दीर्घा में शेखावाटी से सम्बन्धित कला-पुरा सामग्री को छायाचित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।

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