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  • अध्याय - 50 श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय पाली

     19.05.2020
    अध्याय - 50 श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय पाली

    अध्याय - 50


    श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय पाली

    पाली जिला मुख्यालय पर स्थित श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय का शिलान्यास 26 अप्रैल 1982 को तथा उद्घाटन 19 जुलाई 1991 को सम्पन्न हुआ। इस संग्रहालय में पाली एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्र में मानव सभ्यता के उषा काल से लेकर वर्तमान युग तक विकसित सभ्यता एवं संस्कृति के विविध सोपान देखे जा सकते हैं। संग्रहालय की पुरावस्तुएं एवं कला सामग्री एक बड़े कक्ष में प्रदर्शित की गई है।

    पाषाणकालीन उपकरण

    मानव सभ्यता के उषा काल में लूनी तथा उसकी सहायक नदियों के किनारे अस्तित्व में आईं पाषाणकालीन सभ्यताओं से प्राप्त मध्यपाषाण कालीन एवं नवपाषाण कालीन उपकरण पाली संग्रहालय में संगृहीत किए गए हैं जिनमें हैण्ड एक्स, स्क्रेपर, फ्लेक एवं कोर श्रेणी के उपकरण प्रमुख हैं।

    मृदभाण्ड

    पाली संग्रहालय में आसपास के क्षेत्रों से खुदाई में प्राप्त मृदभाण्डों के टुकड़े प्रदर्शित किए गए हैं। ये मृद्भाण्ड चाक पर बने हुए हैं। संग्रहालय में प्रदर्शित गाम बाड़ी से प्राप्त कुषाणकालीन विशाल मृणमय पात्र उल्लेखनीय है।

    पाषाण प्रतिमाएँ

    संग्रहालय में प्रदर्शित पाषाण प्रतिमाओं में हेमावास से प्राप्त 6ठी शताब्दी ईस्वी की विष्णु स्थानक प्रतिमा, 7वीं शती की विशालाकाय विष्णु प्रतिमा, नाडोल से प्राप्त 9वीं शताब्दी ईस्वी की नृत्य मुद्रारत नारी प्रतिमा, नीमाज से प्राप्त 9वीं शताब्दी ईस्वी की द्वारपाल प्रतिमा, नीमाज से प्राप्त 9वीं शताब्दी ईस्वी की चंवरधारणी प्रतिमा, नाडोल से प्राप्त 9वीं शताब्दी ईस्वी की नारी प्रतिमा, नीमाज से प्राप्त 10वीं शती ईस्वी की नारी प्रतिमा, नीमाज से प्राप्त 11-12वीं शताब्दी ईस्वी की अग्नि की प्रतिमा, सेवाड़ी से प्राप्त 11-12वीं शताब्दी की महिषासुरमर्दिनी प्रतिमा, नाडोल से प्राप्त 13-14वीं शताब्दी ईस्वी की मिट्टी से बनी महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा उल्लेखनीय हैं।

    जैन प्रतिमाएँ

    मध्यकाल में पाली में धातु प्रतिमा के ढलाई का काम बड़े स्तर पर होता था। पाली संग्रहालय में 8वीं शताब्दी ईस्वी से लेकर 13वीं शताब्दी ईस्वी की अवधि में बनी जैन तीर्थंकरों की धातु प्रतिमाएँ रखी गई हैं। ये प्रतिमाएँ पाली, नाडोल, भीनमाल, जालोर तथा बलवाना आदि स्थलों से प्राप्त हुई हैं। 8-9वीं शताब्दी ईस्वी की जीवंत स्वामी की कांस्य प्रतिमा दुर्लभ प्रतिमाओं में से एक है। भीनमाल से प्राप्त 9वीं शताब्दी की दिक्पाल प्रतिमा, पाली से प्राप्त 8-9वीं शताब्दी की जीवंत स्वामी प्रतिमा, नाडोल से प्राप्त जैन तीर्थंकर की 11-12वीं शताब्दी की प्रतिमा, नीमाज से प्राप्त 11-12वीं शताब्दी ईस्वी की तीर्थंकर प्रतिमा, बाली से प्राप्त 11-12वीं शती के तोरण के टुकड़े, बाली से प्राप्त 11-12वीं शताब्दी की पार्श्वनाथ प्रतिमा, बलवाना से प्राप्त 17-18वीं शताब्दी ईस्वी का जैन तोरण उल्लेखनीय हैं।

    सुगाली माता की प्रतिमा

    संग्रहालय में रखी सुगाली माता (काली देवी) की प्रतिमा 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी सैनिकों की प्रेरणा स्रोत रही है। यह प्रतिमा आउवा के ठाकुर कुशालसिंह तथा उनके पूर्वजों की कुलदेवी है। ई.1857 के स्वातंत्र्य समर के दौरान अंग्रेज अधिकारी इस प्रतिमा को आउवा ठिकाणे से निकालकर आबू पर्वत पर स्थित अपने सैनिक गोदाम में ले गए।

    अंग्रेजों को भय था कि इस मूर्ति से जनता में विद्रोह की भावना जाग्रत होती है। 12 दिसम्बर 1909 को यह मूर्ति राजपूताना म्यूजियम अजमेर को दे दी गई। पाली में राजकीय संग्रहालय की स्थापना के बाद यह प्रतिमा अजमेर से पाली लाई गई। इस प्रतिमा के 10 सिर तथा 54 हाथ थे। इनमें से कुछ हाथ भंग हो गए हैं।

    नाडौल से प्राप्त पुरातत्व सामग्री

    ई.1990 में पाली जिले में स्थित प्राचीन ऐतिहासिक स्थल नाडोल में पुरातत्व विभाग द्वारा पुरा सामग्री का उत्खनन करवाया गया जिसके बाद 10वीं-14वीं शताब्दी ईस्वी की चौहान युगीन पुरा सामग्री एवं साक्ष्य उपलब्ध हुए हैं। इस सामग्री को भी पाली संग्रहालय में रखा गया है।

    शिलालेख

    संग्रहालय भवन में छोटी-छोटी पीठकाओं पर क्षेत्रीय प्रतिमाओं एवं शिलालेखों का प्रदर्शन किया गया है। राठौड़ राजकुमार छांदा से सम्बन्धित एक शिलालेख कुटिल लिपि में अंकित है। इस पर वि.सं. 1053 (ई.996) का उल्लेख है। एक सती स्तम्भ पर वि.सं.1745 (ई.1688) का उल्लेख है। राव सीहा की बीठू से प्राप्त देवली पर सं.1330 (ई.1273) का उल्लेख है। बीठू की देवली का शिलालेख राठौड़ों के रेगिस्तान में आगमन की समय-सीमा को निर्धारित करने के लिए एकमात्र विश्वस्त स्रोत है।

    ताम्रपत्र

    पाली क्षेत्र से प्राप्त ताम्रपत्रों से बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में पाली क्षेत्र के सांस्कृतिक, धार्मिक एवं राजनीतिक इतिहास की जानकारी मिलती है। संग्रहालय में प्रदर्शित प्रमुख ताम्रपत्रों में बामनेरा का वि.सं.1220 (ई.1163) का ताम्रपत्र है जिसमें कुमारसिंह के पुत्र अजयसिंह द्वारा कोरटा में सूर्यग्रहण के दिन ब्राह्मण नारायण को एक भूमि दान करने का उल्लेख है। बामनेरा से मिले इसी तिथि के एक अन्य ताम्रपत्र में नाडोल के चौहान शासक महाराजाधिराज केल्हण देव द्वारा ब्राह्मण नारायण को सरल, सवृक्ष कूप का दान किए जाने का उल्लेख है। बामनेरा से ही प्राप्त एक संवत् विहीन ताम्रपत्र में कुमारसिंह के पुत्र अजयसिंह द्वारा देवोत्थान एकादशी के दिन ब्राह्मण नारायण को कूपदान किए जाने का उल्लेख है। वि.सं.1238 (ई.1181) के नाडोल से प्राप्त ताम्रपत्र में नाडोल के चौहान शासक केल्हण के पुत्र कुमार जैतसिंह द्वारा पार्श्वनाथ मंदिर में कल्याणक महोत्सव हेतु प्रतिवर्ष द्रम्मों का दान किए जाने का उल्लेख है।

    सिक्के

    पाली क्षेत्र से कई प्रकार के सिक्के प्राप्त हुए हैं। संग्रहालय में प्रदर्शित सिक्कों में 10 इंडो-ससैनियन सिक्के, 14 अल्लाउद्दीन खिलजी (ई.1296-1316) के सिक्के, 22 गयासुद्दीन तुगलक (ई.1320-25) के सिक्के, 1 फिरोजशाह तुगलक (ई.1351-88) का सिक्का, 6 मुबारक शाह (ई.1421-34) के सिक्के तथा 2 शाहआलम (ई.1759-1806) के सिक्के सम्मिलित हैं। मारवाड़ नरेशों द्वारा स्वतंत्र रूप से सिक्कों का प्रचलन किया गया। उनकी एक टकसाल पाली में भी स्थित थी। रणकपुर (पाली) से दिल्ली के सुल्तानों के सिक्कों का एक दफीना उपलब्ध हुआ है।

    लघुचित्र

    पाली संग्रहालय के लघुचित्रों में राव सीहा (ई.1250-73), राव रिड़मल (ई.1427-38), राव जोधा (ई.1453-89), राव माल देव (ई.1532-62), मोटा राजा उदयसिंह (ई.1583-95) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। महाराजा गजसिंह (प्रथम) (ई.1619-38), महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम) (ई.1638-78), वीर दुर्गादास राठौड़ (ई.1638-1718), महाराजा अजीतसिंह (ई.1707-24) और महाराजा अभयसिंह (ई.1724-49) के चित्र दर्शनीय हैं। संग्रहालय में महाराजा रामसिंह (ई.1749-51), महाराजा बखतसिंह (ई.1751-1752), महाराजा विजयसिंह (ई.1752-93) और महाराजा मानसिंह (ई.1803-43) के लघुचित्र प्रदर्शित हैं। रियासती काल में बारहमासा, रागरागिनी, ढोलामारू, दरबारी दृश्य, मुगल शैली के चित्र एवं सामंतों आदि के चित्र बड़े स्तर पर बनते थे। कुछ चित्रों में केशव और मतिराम कवियों की रचनाओं को आधार बनाकर चित्रांकन किया गया है। इस शैली के चित्र भाटी किशनदास, भाटी शिवदास, भाटी देवदास आदि चित्रकारों ने बनाए हैं।

    काष्ठकला

    बगड़ी, सोजत एवं रायपुर आदि से प्राप्त अनेक काष्ठ कलाकृतियां भी संग्रहालय में प्रदर्शित की गई हैं।

    अस्त्र शस्त्र

    पाली संग्रहालय में मध्यकाल में मारवाड़ क्षेत्र में प्रचलित अस्त्र-शस्त्रों का संग्रह प्रदर्शित किया गया है। इनमें बन्दूक, देशी तमंचा, तबर, ढाल, तलवार आदि प्रमुख हैं।

    जनजातीय सामग्री

    पाली जिले की पहाड़ियों में आदिवासी संस्कृति का विकास हुआ। आज भी पाली जिले में हजारों आदिवासी परिवार रहते हैं। आदिवासियों के जनजीवन से सम्बन्धित कुछ सामग्री पाली संग्रहालय में प्रदर्शित की गई है। इनमें गरासिया जाति के लोकवाद्य यथा ढोल, मांदल, ढाक, मंजीरा, रुनझुनी, बांसली तथा गोरिया प्रमुख हैं। आदिवासियों के वस्त्र एवं आभूषणों को भी प्रदर्शित किया गया है। इनमें तोड़ाजोड़ी (पायजेब), करता (कड़ला), हथपान जोड़ी, रमझोल जोड़ी, कंठी, लंगर जोड़ी, कंदोरा, नथ, बटन, बोर तथा लसो, झोला जोड़ी, बली, बारली, गले की हंसली, हासली बियावली तथा पुरुष आभूषणों में बेड़ी, हाथ का कड़ा, जैला जोड़ी तथा लंगर उल्लेखनीय हैं। संग्रहालय में आदिवासियों के तीर-कमान भी संगृहीत हैं।

    खनिज पदार्थ

    पाली एवं उसके आसपास के क्षेत्र में कई प्रकार के खनिज प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। पाली संग्रहालय में ऐसबेस्टस, बाराइट्स, कैल्साइट, जिप्सम, मारबल, र्क्वाट्ज, टेल्क, ब्लस्टोवाइट, टंगस्टन तथा पेल्यूराइट आदि खनिज प्रदर्शित किए गए हैं।

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