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  • अध्याय - 59 सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय संगरिया

     21.12.2018
    अध्याय - 59 सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय संगरिया

    अध्याय - 59


    सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय संगरिया

    सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय हनुमानगढ़ जिले के संगरिया नामक कस्बे में स्थित है। इसकी स्थापना स्वामी केशवानन्द द्वारा की गई थी। वे बचपन में घर छोड़कर साधु बन गए थे। ई.1932 में वे संगरिया आए तथा विद्यार्थियों के लिए काम करने लगे। ई.1938 में स्वामीजी को कहीं से पत्थर की कुछ मूर्तियां मिलीं। उन्हें मूर्तियों के महत्व की जानकारी नहीं थी। फिर भी उन्होंने उन मूर्तियों को अपने विद्यालय के छात्रावास में रखवा दिया। छात्र उन प्रतिमाओं के साथ छेड़छाड़ करने लगे तो स्वामीजी ने उन्हें एक कमरे में रखवा दिया। उन मूर्तियों को देखने के लिए लोग उस कमरे में जाने लगे। इसी से स्वामीजी को प्रेरणा मिली और उन्होंने एक संग्रहालय की स्थापना का काम आरम्भ किया। स्वामीजी जहाँ भी जाते, मूर्तियाँ, चित्र, सिक्के, वस्त्र और कलात्मक सामग्री एकत्रित कर लेते। कुछ ही वर्षों में संग्रहालय बनाने योग्य विपुल सामग्री एकत्रित हो गई।

    संग्रहालय की सामग्री जुटाने के लिए स्वामीजी ने एशिया के कई देशों का भ्रमण किया। बीकानेर, अलवर एवं भरतपुर के महाराजाओं, कलाप्रेमियों, प्रशंसकों एवं जनसाधारण ने अपने निजी संग्रह से उन्हें अनेक दुर्लभ वस्तुएं एवं कलाकृतियां भेंट कीं। स्वामीजी ने विशाल विद्यालय भवन की दूसरी मंजिल पर संग्रहालय के लिए कई कमरों और दीर्घाओं का निर्माण करवाया। संग्रहालय के ऊपर की मंजिल पर पुस्तकालय भी स्थापित किया गया। कुछ समय बाद संग्रहालय के लिए स्कूल भवन से पृथक् नया भवन बनाया गया। यह भवन एक पार्क के बीच स्थित है। मुख्य द्वार के निकट महारानी लक्ष्मीबाई की विशाल प्रतिमा है। इसके निकट स्वामी केशवानन्द का स्मृति मंदिर स्थापित है। स्वतंत्रतापूर्व के संयुक्त पंजाब के किसान नेता सर छोटूराम के संगरिया आगमन के उपलक्ष्य में इस संग्रहालय का नामकरण 'सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय' संगरिया कर दिया गया।

    इस संग्रहालय में 4 विशाल दीर्घाओं एवं 6 बड़े कमरों में इतिहास, पुरातत्व, मूर्तिकला, चित्रकला, हस्तकला एवं लोक संस्कृति से सम्बन्धित बहुमूल्य सामग्री प्रदर्शित की गई है। संग्रहालय में विदेशों से सम्बन्धित सामग्री भी है। संग्रहालय में भारतीय ग्रामीण जनजीवन में प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं से लेकर राजमहलों में प्रयुक्त होने वाली सामग्री भी प्रदर्शित की गई है। हजारों साल पहले की सभ्यताओं के अवशेष, मूर्तियां, सिक्के, बरतन, प्राचीन एवं आधुनिक चित्र भी संगृहीत किए गए हैं। स्वतंत्रता सेनानी स्वामी केशवानंद के हृदय में शहीदों के लिए विशेष स्थान था। उन्होंने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले वीरों के चित्र संगृहीत करवाये और उन्हें संग्रहालय में एक विशाल कक्ष में प्रदर्शित करवाया। इसे शहीद कक्ष कहा जाता है। संग्रहालय की सामग्री को कला दीर्घा, लघुकला दीर्घा, पशुजीवन शास्त्र कक्ष, बुद्ध कक्ष, सामुद्रिक सामग्री कक्ष, संस्कृति कक्ष, शस्त्र दीर्घा, पुरातत्व कक्ष एवं स्वामी केशवानंद स्मृति कक्ष में प्रदर्शित किया गया है।

    संग्रहालय में विभिन्न काल खण्डों की मिट्टी, धातु, पत्थर एवं काष्ठ की प्राचीन मूर्तियां, पुराने सिक्के, शिलालेख, ताम्रपत्र, शस्त्र, वस्त्र, दुर्लभ ताम्रचित्र तथा अन्य ऐतिहासिक सामग्री प्रदर्शित है। संग्रहालय में गुप्तकालीन, पूर्वमध्यकालीन एवं उत्तरमध्य कालीन युग की प्रस्तर कला के अनेक उत्कृष्ट नमूने एकत्रित किए गए हैं। गुप्तकालीन प्रतिमाओं में गज, भगवान बुद्ध की चरण-चौकी, ऋषिमूर्ति, देवमूर्ति तथा विष्णुमूर्ति प्रमुख हैं। ई.600 से ई.900 तक के समय की प्रतिमाओं में एक स्त्री-मूर्ति भी है। यह सारनाथ से प्राप्त किसी देवी अथवा राजमहिषि की मूर्ति का मस्तक भाग है। देवी के सिर पर एक बड़ा मुकुट है जिससे अनुमान लगाया जाता है कि यह देवी पार्वती की प्रतिमा का मस्तक भाग है।

    संग्रहालय में एक भैरव मूर्ति भी है। राजस्थान से प्राप्त इस प्रतिमा के सिर पर जटा-मुकुट पर चन्द्र स्पष्ट दिखाई देता है। ई.1000 से 1200 के काल की दो दर्जन से अधिक प्रस्तर मूर्तियां भी रखी हैं इनमें हनुमानगढ़ जिले के पल्लू से प्राप्त जैन प्रतिमा के खण्ड शामिल हैं। भगवान शिव की एक मूर्ति में भगवान सहज मुद्रा में खड़े हैं। उनके गले में माला एवं हाथ में त्रिशूल है। यहाँ बहुत सी धातु मूर्तियां भी हैं। एक मूर्ति जैन तीर्थंकर शांतिनाथ की है।

    धातुकक्ष में प्रतिमाओं के साथ-साथ 18वीं सदी का पीतल का एक विशाल कमण्डल दर्शनीय है। इतने विशालाकाय धातुपात्र विश्व में अन्यत्र कम ही देखने को मिलते हैं। इस कमण्डल पर भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों और महाभारत की घटनाओं के चित्र उत्कीर्ण हैं। चौबीस अवतारों के कमण्डल के नाम से प्रसिद्ध इस कलाकृति को देखने के लिए लोग दूर-दूर से संगरिया आते हैं। इस कमण्डल की ऊंचाई 5 फुट है। धातुकक्ष में 17वीं शताब्दी ईस्वी की नटराज की एक कांस्य प्रतिमा है।

    एक अन्य प्रतिमा बंगाल में प्राप्त 17वीं शताब्दी की वेणुगोपाल की है। नेपाल से प्राप्त अनेक प्रतिमाओं में से अवलोकितेश्वर की 17वीं शताब्दी की प्रतिमा तथा 18वीं शताब्दी की बुद्ध की प्रतिमा उल्लेखनीय हैं।

    संग्रहालय के ताम्रकक्ष में विशिष्ट कलानिधि संगृहीत है। विशाल तम्रपट्टों पर मुगल बादशाहों ने अपनी बेगमों के चित्र उभार कर बनवाए हैं। चित्रों की शैली ईरानी और भारतीय है। इनमें सबसे पुराना चित्र सुल्तान उमर शेख मिर्जा का है जो तैमूर के वंश में चौथा बादशाह था तथा बाबर का पिता था। एक अन्य उल्लेखनीय ताम्रचित्र मुगल बादशाह शाहजहाँ और कदीसा बेगम का है। चित्र में शाहजहाँ अपनी बेगम के हाथ में फल लिए बेगम के कंधे पर हाथ रखे खड़ा है और बेगम तनिक तिरछी खड़ी है।

    अन्य दुर्लभ ताम्रचित्रों में बेगम के अख्तर जमानी, ईरान के बादशाह वीर रुस्तम, जहांगीर एवं नूरजहाँ तथा जहांदार शाह आदि के चित्र उल्लेखनीय हैं। हाथी 
    दांत के भारतीय शिल्प की वस्तुएं, बीदर के धातुपत्र, चंदन काष्ठ एवं सींग पर कारीगरी तथा जयपुर की मीनाकारी के अनेक नमूने दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। 

    संग्रहालय में शस्त्रों के लिए अगल कक्ष बना है। इसमें हिन्दू, सिक्ख एवं मुस्लिम हथियारों का अनूठा संकलन है। विभिन्न प्रकार की तलवारें, खंजर, कटारें, कृपाण, खाण्डे, तेगे, बरछे एवं चक्री आदि अनेक शस्त्र हैं। स्वामी केशवानंद बीकानेर, अलवर, जोधपुर आदि रियासतों से पुराने शस्त्र एकत्रित करके लाए थे।

    संग्रहालय के चित्र कक्ष में प्राचीन सुंदर चित्रों की भरमार है। यहाँ मुगल कलम, राजस्थानी चित्रशैली, पहाड़ी कलम, उड़ीसा की लोककला, सिक्ख तथा पिरंगी कलम सहित लगभग 230 चित्र प्रदर्शित हैं। इनमें 17वीं शती का जहांगीर का चित्र, इसी शताब्दी का शाहजहाँ का चित्र, 18वीं शताब्दी का बीकानेर नरेश अनूपसिंह (ई.1669-98) के दरबार का चित्र सम्मिलित हैं। संग्रहालय में राजघाट (वाराणसी) और पल्लू (राजस्थान) से प्राप्त पुरातात्विक सामग्री भी रखी गई है।

    अफ्रीकी हाथी का दिखाने का बड़ा दांत और खाने का दांत (दाढ़) भी रखे हैं। पशु-अस्थियों से बनी कलाकृतियां भी रखी गई हैं। महाराजा रणजीतसिंह (ई.17792-1801) के दरबार का चित्र और चैम्बर ऑफ प्रिंसेज की 14 फरवरी 1921 की कैमरा फोटो दर्शनीय है।

    इस संग्रहालय एवं पुस्तकालय को देश भर के विद्वानों और जनसाधारण के साथ-साथ, देश के कई प्रधानमंत्रियों यथा- जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चरणसिंह सहित जगजीवनराम, विनोबा भावे, आचार्य तुलसी, चौधरी देवीलाल एवं इतिहासविद् वासुदेवशरण अग्रवाल, पुरुषोत्तमदास टंडन आदि अनेक विद्वान देख चुके हैं। संग्रहालय देखने के बाद पं. जवाहरलाल नेहरू ने अपने उद्बोधन में कहा था- 'स्वामी केशवानंद के निमंत्रण पर मैं संगरिया आया। शहरों में बड़े-बड़े कॉलेज, विश्वविद्यालय, संग्रहालय आदि हैं परंतु गांवों में ऐसा कुछ नहीं, इसलिए इस स्थान को देखने का इच्छुक था कि यहाँ क्या-कुछ है! जो कुछ मैंने देखा, बड़े ध्यान से देखा और पूर्णतया संतोषजनक पाया। मैं स्वामीजी को इस बात की बधाई देता हूँ कि इतने अच्छे काम आपके संगरिया में हैं और मैं आशा करता हूँ कि आप इस काम को बहुत अच्छी तरह बढ़ाएंगे।'

    संग्रहालय में एक रंगशाला भी बनाई गई है जिसका उद्घाटन 1 अप्रेल 1959 को जवाहरलाल नेहरू ने किया था। स्वामी केशवानंद के देहावसान के बाद उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए संग्रहालय में स्वामी केशवानंद स्मृति कक्ष बनाया गया। यह कक्ष स्वामी केशवानंद द्वारा शिक्षा, समाज एवं कला के उन्नयन के लिए किए गए चालीस वर्ष के घोर परिश्रम का जीवंत दस्तावेज है। सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय के निकट स्वामी केशवानंद स्मृति मंदिर है जो अष्टभुजाकार बना हुआ है। इसमें स्वामीजी की विशाल प्रस्तर प्रतिमा के साथ-साथ उनकी पूरी जीवनी विशाल चित्रों में अंकित है।

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